रविवार, 31 मई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दूसरा दिन -तीन



लेकिन सर जी वो हेलनवा का का हुआ?
नाश्ता करते हुए होमर के महाकाव्य ईलीयड और ओडीसी पर चर्चा होने लगी डॉ.आर्य बताने लगे..”ट्राय जिसे प्राचीन यूनानी में इलियोस या इलियोन भी कहते हैं,यूनान से पश्चिम में इजियन सागर के तट पर बसा एक शहर था अपने सेना नायकों के नेतृत्व में यूनान के कबीलों ने उस पर आक्रमण किया ट्राय एक पहाड़ी पर था और उसके चारों ओर पत्थर की दीवार थी यूनानी दस वर्ष तक ट्राय को घेरे रहेयूनानियों का प्रमुख योद्धा एकीलीज था जिसका युद्ध ट्राय के योद्धा हेक्टर से हुआ कहते है एकीलीज एडी मे तीर लगने से मरा ,उसकी माँ ने जो एक देवी थी बचपन में उसे एड़ी पकड़कर पवित्र स्टिक्स नदी में नहलाया था जिसके कारण एड़ी के अलावा उसका सारा शरीर कठोर बन गया था ” “अरे “ राममिलन ने कहा “ ऐसी ही कथा हमारे यहाँ दुर्योधन की भी तो है महाभारत में “ डॉ. आर्य ने अपनी कथा जारी रखी. “हो सकता है ,पौराणिक कथायें एक सभ्यता से दूसरी सभ्यता में आती जाती रहती हैं, आगे सुनो .. लेकिन जब यूनानी युद्ध में उन्हे नहीं हरा सके तो उन्होनें एक चाल चली उन्होनें लकड़ी का एक घोड़ा बनाया जिसमें यूनानी सैनिक छुप गये बाकी सभी वापस लौटने का दिखावा करते हुए पास के एक द्वीप पर चले गये घोड़ा उन्होनें नगर द्वार पर रख दिया रात में ट्रायवासी अपने आप को जीता हुआ मानकर घोड़ा नगर के भीतर ले आये मौका देखकर उसमें छुपे हुए सैनिक बाहर निकले ,उन्होने ट्राय के सारे पुरुषों को मार डाला और स्त्रियों को बन्दी बना लिया तथा पूरे नगर में आग लगा दी उसके बाद वे विजयोल्लास के साथ वापस लौट गये यह पूरी घटना नेत्रहीन कवि होमर ने अपने महाकाव्य ओडीसी में लिखी है ईलीयड में सेना के वापस लौटने का वर्णन है
अजय ने सवाल किया ” लेकिन ऐसा क्या सचमुच में घटित हुआ था? “ डॉ.आर्य ने बताया “होमर के महाकाव्य में पौराणिक कथायें व लोककथायें इतनी हैं कि बहुत समय तक लोग इन्हे काल्पनिक ही मानते रहे लेकिन पुरातत्ववेत्ताओं ने एशियाई कोचक में सागर तट के पास हिसारलिक नामक टीले की खुदाई की है वहाँ विभिन्न कालों की अनेक बस्तियों के साथ ट्राय के खन्डहर भी मिले हैं जिनके अनुसार इतिहासकारों ने ट्राय पर यूनानी हमले की तिथी कोई 1200 ई.पू. तय की है हाँलाकि पुरावेत्ताओं का काम अभी अंतिम निष्कर्ष पर नही पहुंचा है और इसमे अभी बहुत विवाद है
“लेकिन सर जी वो हेलनवा का का हुआ? राम मिलन इलाहाबादी ने सवाल किया“अरे यार ,तुम अभी हेलेन पर ही अटके हो,अरे उसी की वज़ह से तो यह युद्ध हुआ । ना उसका अपहरण होता ना यह युद्ध होता.। “ “मतलब हमारी सीता मैय्या जैसी ही कहानी है क्या?” राम मिलन ने पूछा “और क्या” आर्य सर ने कहा “भाई पौराणिक कथायें तो सभी देशों में लगभग एक जैसी ही हैं बस देवी देवताओं,राजाओं और स्थानों के नाम देश-काल के अनुसार अलग अलग हैं” “लेकिन सर, कथाओं में जो है वैसा क्या सचमुच मे घटित हुआ है?” अजय ने पूछा “भाई यही सच और झूठ में अंतर ढूंढने का काम ही तो हम पुरातत्ववेत्ताओ का है लेकिन विडम्बना है कि लोग यहाँ भी पूर्वाग्रह से काम लेते हैं” आर्य सर ने लम्बी साँस लेते हुए कहा फिर उठने का इशारा करते हुए बोले ” खैर छोड़ो इस विषय पर बाद में बात करेंगे.अब यूनान से वापस अपने देश में आ जाओ और मालवा की ताम्राश्मयुगीन सभ्यता की खोज में टीले पर चलो
हम लोग उठे और अपनी नोटबुक्स उठाकर टीले की ओर चल पड़े।
आपका -शरद कोकास

शनिवार, 30 मई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दूसरा दिन-दो


जय बाबा हेरोडोटस की
“चलो चलो जल्दी नहाओ नहीं तो हमारे फराओ नाराज़ हो जायेंगे।“रवीन्द्र ने फर्मान ज़ारी किया। “ठीक है” मैने कहा नहाने के बाद हम लोग नदी के आस-पास एक्स्प्लोर करेंगे ,क्या पता चीन की पीली नदी हुआंगहो के तट पर मिली कब्रों की तरह कोई प्राचीन कब्र मिल जाये।” “वहाँ किस पीरिअड की कब्रें मिली हैं? “ रवीन्द्र ने पूछा । “दूसरी शताब्दी ईसापूर्व की” मैने बताया और इनमें जोशव मिले हैं वे चटाईयों में लिपटे हैं,जिनके पास घडा,अन्य पात्र और खाने पीने की वस्तुएं रखी हैं।“
अशोक नदी के जल मे कमर तक पानी में खड़ा था, उसने इतिहासकारों के पुरखे हेरोडोटस का नाम लिया और पानी में डुबकी लगा दी । “जय बाबा हेरोडोटस की।” नहा धोकर अपने गीले वस्त्र और अन्य साजो-सामान उठाकर हम लोग शिविर की ओर निकल पड़े। भोजन स्थल और पाकशाला के निकट ही खड़े थे डॉ.सुरेन्द्र कुमार आर्य। हम लोगों के भीगे बदन भीगे केश देखकर उन्होनें टिप्पणी की “तुम लोगों को देखकर ऐसा लग रहा है जैसे यूनानी सेना समुद्र से निकलकर ट्राय के युद्ध में शामिल होने आ रही है।“ “क्यों मज़ाक कर रहे हैं सर..” मैने कहा “ बिना हेलेन के कैसी सेना और कैसा युद्ध? “रवीन्द्र ने चुटकी लेते हुए कहा “अबे तुझे यहाँ जंगल में हेलेन कहाँ मिलने वाली है? चुपचाप वस्त्र धारण करो और अल्पाहार हेतु भाटीजी की पाकशाला में उपस्थित हो जाओ।”
“ठीक है जैसी पंचों की राय” कहकर हम लोग कपडे बदलने के लिये तम्बू मे घुस गये।
आज इतना ही- शरद कोकास

शुक्रवार, 29 मई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दूसरा दिन-एक

पिरामिड की आड में..
सुबह छह बजे लगभग डॉ.वाकणकर की गरजती हुई आवाज़ सुनाई दी..”उठो रे सज्जनो..”रवीन्द्र सबसे पहले जागा और उसने हिला हिला कर हम लोगों को जगाया। हम लोग भुनभुनाते हुए अपनी अपनी रज़ाईयों से बाहर निकले ।टुथपेस्ट,ब्रश टॉवेल, अंडर्वीअर,बनियान प्रक्षालन के सारे ज़रूरी सामान लेकर हम लोग नदी की ओर चल पड़े .अशोक त्रिवेदी का मामला तो बगैर सिगरेट सुलगाये पिघलता नहीं था सो उसके पास यह अतिरिक्त वस्तु। रही बेड टी की बात ..उतने सभ्य हम लोग हुए नहीं थे।
चम्बल के पास किसी ज़माने का पथ्थरों का एक घाट जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मौजूद था। वही हम लोगों का स्नान-गृह बन गया। शौच के लिये हम लोगों ने चट्टानों के पीछे अपनी पोज़ीशन सम्भाल ली ।ब्रश करते हुए झाग भरे मुँह से हम लोग नदी के महात्म्य पर चर्चा करते रहे कि बस्तियाँ नदी के पास ही सबसे पहले क्यों बसीं। इसका कारण यही है कि जल जीवन के लिये सर्वाधिक आवश्यक वस्तु है और अन्य सुविधायें उपलब्ध होने के बावज़ूद जल के स्त्रोत का निकट होना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। कालांतर मे जब नदियों क प्रवाह दूर होता गया तो उसके अनुसार बस्तियाँ भी दूर होती गईं आज उत्खनन में कई ऐसे स्थान मिलते है जहाँ ज्ञात होता है कि पहले कभी यहाँ नदी थी। इसी सन्दर्भ में हम लोग सिन्धु घाटी से लेकर दज़ला फरात और नील नदी के कांठे में बसी सभ्यताओं पर विचार करते रहे।
बात चल ही रही थी कि राममिलन आता दिखाई दिया। “अरे तुम कहाँ चले गये थे भाई?” हम लोगों ने प्रश्न किया।“यहाँ हम लोग नहाने की तय्यारी में हैं और तुम्हारी लोटा परेड अभी तक चल रही है?” “भाईसाहब ,आप लोग तो बेशरम हो कहीं भी निपट लेते हो मुझे तो आड़ के लिये कोई पिरामिड चाहिये था” उसने कहा । हम लोग हंसने लगे “ तो अब पिरामिड का यह भी उपयोग होगा”। अजय ने पुछा” तो मिला कोई पिरामिड?” मैने हँसकर कहा” भाई सारे पिरामिड तो मिस्त्र में हैं।” अजय ने बात आगे बढाई” यह खुफू का पिरामिड कबका है?” मैने बताया..”लगभग छब्बीस सौ ईसा पूर्व का प्राचीन मिस्त्र में वहाँ के राजाओं फराओं द्वारा जीते जी अपनी कब्र का निर्माण किया जाता था। कहा जाता है कि ये शासक बहुत ही क्रूर होते थे । वे स्वयं को देवताओं के समकक्ष मानते थे।उन्होनें सभ्रांत लोगों को विभिन्न प्रदेशों का शासक नियुक्त किया था। ये लोग सम्पति छीनने व आम जनता को यंत्रणाएँ देने का कार्य किया करते थे तथा अपनी कठोरता व क्रूरता की डींगें हांका करते थे । उनके इस कार्य के बदले उन्हें जागीर व ज़मीनें मिला करती थीं। पिरामिडों के बाहर खडी नारसिन्ही मूर्तियाँ”स्फिंक्स” भी इन्ही फराओं की निरंकुश सत्ता का प्रतीक है।ठीक है इनकी भव्यता हमें^ आकर्षित करती है लेकिन इसके पीछे का सत्य हम कैसे नकार सकते हैं “ मुझे लगा बनियान पहने ठन्ड में ठिठुरते अपने मित्रों को इससे ज्यादा भाषण देना ठीक नहीं है।
आपका- शरद कोकास

गुरुवार, 28 मई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पहला दिन-चार


लेकिन हमारी कोशिश असफल रही। मैने कहा ‘चलो समय काटने के लिये मै तुम लोगों को बेताल की तरह एक कहानी सुनाता हूँ।“ रवीन्द्र बोला”मगर हम तो ज़िन्दा हैं यार” अशोक ने कहा “चुप बे.. ये जीना भी कोई जीना है लल्लू ” मैने मुस्कराकर अपना आख्यान शुरू कर दिया..”चलो मै तुम्हें यूनान ले चलता हूँ। योरोप और बाल्कन प्राय:द्वीप के दक्षिण में इजियन सागर सागर से लगा प्रदेश है यूनान। यहाँ दक्षिण यूनान के पेलोपोनेसस में उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उत्खनन किया गया जहाँ माइसीनी नगर में सभ्यता का पता चला। पुरातात्विक सामग्री के अलावा यूनान के प्राचीन इतिहास के बारे में जानने का स्त्रोत वहाँ की पौराणिक कथायें भी हैं। यद्यपि इन कथाओं के नायक व घटनायें काल्पनिक हैं लेकिन इनमें प्राचीन यूनानियों के काम धन्धे ,औज़ारों,रीती-रिवाज़ों आदि के बारे में बहुत सारी जानकारियाँ मिलती हैं। वे किन देशों की यात्रायें करते थे और किन किन देवी-देवताओं में विश्वास करते थे यह जानकारी भी इनमें है।
“तू कहानी सुना रहा है या इतिहास?” अजय जोशी ने ऊबकर पूछा। “जानता नहीं कहानी और इतिहास में बहुत फर्क होता है ।“रवीन्द्र ने जवाब दिया। “जानता हूँ यार,चल आगे सुना “ अजय बोला। “चलो ठीक है अब तुम्हे हर्क्यूलिस की कहानी सुनाता हूँ ।“ मैने कहा “यूनानी लोग पराक्रमी हर्क्यूलिस के कारनामों को बहुत पसन्द करते थे। वहाँ एक राजा ऑजियस था उसकी गौशाला में पाँच हज़ार बैल थे। एक बार उसकी गौशाला गोबर से भर गई,उसे साफ करने वाला कोई ना था, तब हक्यूलिस ने पास की दो नदियों पर बान्ध बना दिया, जल्द ही नदियाँ ऊपर तक भर गईं और जो पानी की धार छूटी सारा गोबर बहा ले गई”
“तू भी यार सोते समय क्या गन्दी गन्दी कहानी सुना रहा है..तेरे दिमाग में भी लगता है यही भरा है” अजय ने हँसते हुए कहा ।“सुनो तो “ मैं अपने प्रवाह में था “एक बार यही हरक्यूलिस सोने के सेब की खोज में निकला ।वह यूनान से पश्चिम में इजियन महासागर के किनारे किसी बाग में था । अब उस समय यूनानियों को आकाश की वास्तविकता तो मालूम नहीं थी ।वे सोचते थे कि आकाश पृथ्वी पर गिर रहा था लेकिन वीर अटलांटिस ने उसे अपनी पीठ पर थाम लिया जिसकी वज़ह से पृथ्वी बच गई।
“इसी के नाम पर अटलांटिक महासागर का नाम है ना?” अशोक ने पूछा “ हाँ “मैने कहा “ हरक्यूलिस ने अटलांटिस से सेब तोड़ने के लिये कहा । जितनी देर में अटलांटिस ने सेब तोड़ा हरक्यूलिस ने आकाश को थामे रखा। यूनानी कहते हैं कि आकाश का वज़न इतना अधिक था कि हरक्यूलिस के पाँव घुटनों तक पृथ्वी में धंस गये ,बोझ से उसकी हड्डियाँ चरमराने लगीं और पसीने की नदियाँ बहने लगीं।“
“हाँ यार वीर तो सारे यूनान में ही हुए हैं,लेकिन हमारे वीर हनुमान भी उनसे कम नहीं” हर्क्यूलिस के भारतीय संस्करण .हमारे हनुमान भक्त मित्र पंडित राममिलन शर्मा इलाहाबादी ने अपनी टिप्पणी दी। मैने कहा”हाँ भाई,यूनानियों की तरह पुराणकथायें तो हमारे यहाँ भी हैं और उनमे भी अनेक किस्से हैं। लेकिन कुछ बातों का श्रेय तो यूनानियों को दिया जाना चाहिये जैसे ओलम्पिक। जिस मैराथन दौड को हम लोग जानते हैं वह भी वहीं शुरु हुई। पाँचवी शताब्दी ईसा पूर्व में यूनान पर पारसिक सम्राट डेरियस का हमला हुआ था। यूनानियों पर पारसिक हमले में स्पार्टा से सहायता माँगने एक वीर धावक फिडिपिटस मेराथन नामक स्थान से एक सौ बीस किलोमीटर दूर स्पार्टा गया ,फिर वापस लौटकर मैराथन आया,इस बीच यूनानी पारसीकों को हरा चुके थे।इस जीत का समाचार देने वह फिर मैराथन से बयालीस किलोमीटर दौड़कर एथेंस पहुंचा,वहाँ पहुंच कर उसने यूनानिओं की जीत का समाचार दिया और प्राण त्याग दिये।उसी वीर धावक के नाम पर यह मैराथन दौड़ होती है।“
“ वह तो ठीक है यार लेकिन तेरी बातें समझने के लिये प्राचीन विश्व का नक्शा लेकर बैठना पड़ेगा “ रवीन्द्र ने कहा। वैसे भी रात काफी हो चुकी थी और नींद से सबकी आंखे बोझिल हो चली थीं। पूस की ठंडी हवा तम्बू के छेदों से भीतर प्रवेश कर रही थी। मैं उस हवा में पृथ्वी के पहले मनुष्य की देहगन्ध महसूस करता हुआ जाने कब नींद के आगोश में चला गया।
आपका- शरद कोकास

बुधवार, 27 मई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पहला दिन -तीन

कंकाल के साथ सोए हो क्या?

भोजन के पश्चात तुरंत सोने की आदत नहीं थी,वैसे भी हॉस्टल में रहकर हम लोग इतने तो बिगड़ ही चुके थे। सो नींद किसीको नहीं आ रही थी सब चुपचाप लेटे हुए तार्पोलीन की बनी तम्बू की छत देख रहे थे। फरवरी का यह दूसरा सप्ताह था और ठंड जैसे लौटकर फिर आ गई थी। मै अपनी बदमस्ती में रज़ाई लेकर नहीं आया था और रवीन्द्र की रज़ाई में घुसकर सोने की कोशिश कर रहा था। रवीन्द्र अकेला सोने का आदी था। मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगा की तर्ज़ पर उसने कहा “मैं अपनी रज़ाई नही दूंगा।“ मैने उससे निवेदन किया,अंततः एक दूसरे की ओर पीठ करके सोने की बात पर समझौता हो गया। लेकिन नींद का समय अभी कहाँ हुआ था? अचानक डॉ.वाकणकर की बात याद करके हँसी आ गई। “क्यों हंसे ?” रवीन्द्र ने पूछा। मैने रवीन्द्र से सवाल किया”तुम कभी किसी कंकाल के साथ सोये हो रवीन्द्र ? “रवीन्द्र हँसने लगा अभी तो तेरे साथ सो रहा हूँ कंकाल के साथ सोने के लिये दक्षिण अफ्रीका जाना पडेगा क्योंकि हमारे यहाँ तो कंकाल मिलने से रहा.” मैने कहा “सही कह रहे हो यार, हमारे यहाँ तो लोग कंकाल क्या खोपडी देखकर ही डर जाते हैं..लेकिन एक बात है यार।” “क्या” रवीन्द्र ने शतुर्मुर्ग की तरह रज़ाई से बाहर गर्दन निकाल कर पूछा। “हमने शव जलाने की प्रथा शुरू कर इतिहास का बडा भारी नुकसान किया है” “वो कैसे” रवीन्द्र ने पूछा । मैने बताया “कंकाल ही तो मनुष्य का इतिहास तय करते हैं यार, गनीमत सभी जगह यह प्रथा नहीं है,दक्षिण अफ्रीका और योरोप में शव जलाने की प्रथा होती तो हमे पृथ्वी के पहले मनुष्य के दर्शन ही नहीं होते ।“
अशोक अब तक चुपचाप था और सिगरेट का आनन्द ले रहा था। उसने एक लम्बा कश लेकर छत की ओर धुआँ फेका और कहा”मैं सोच रहा हूँ पहली बार जब कोई इंसान मरा होगा तो उसे गाड़ा गया होगा या जलाया गया होगा..”मैने कहा “ना गाडा गया ना जलाया गया। पहली बार जब मनुष्य ने मृत देह देखी तो उसकी समझ में आया ही नहीं कि उसके जैसे दिखने वाले इस जीव को आखिर हुआ क्या है। वह बहुत देर बैठा रहा उसके पास कि शायद यह फिर से हिलने –डुलने लगे लेकिन जब कुछ नही हुआ तो वह अपनी भूख का इंतज़ाम करने निकल गया। लौटकर आया तो देखा मृत देह को जानवर खा चुके हैं। उसे देह की यह दुर्दशा देख कर अच्छा नहीं लगा आखिर था तो वह उसके जैसा ही मनुष्य जो उसके साथ रहता था । अगली बार उसने मृत देह को जानवरों से बचाने के लिये उसके चारों ओर, और उसके ऊपर बड़े- बड़े पत्थर रख दिये.। यह मनुष्य की पहली कब्र थी और यही मनुष्य का पहला अंतिम संस्कार था ।”
“पहला और अंतिम का जवाब नहीं भाई”रवीन्द्र ने उबासी लेकर कहा”लेकिन अब सो जाओ.. नही तो सपने में कंकाल ही कंकाल दिखेंगे। “ठीक है” मैने कहा “ कोशिश करते हैं । ”
आपका शरद कोकास

मंगलवार, 26 मई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पहला दिन-दो

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इस जंगल में हमारे लिये यह पहला मनोरंजन कार्यक्रम था। बरगद के ढेर सारे पेड़ों के बीच में लगा था हमारा शिविर। पास ही चम्बल नदी बहती थी। हम लोगों ने अपना सामान तम्बू में रखा और नदी पर चल दिये हाथ मुँह धोने। लौटकर आये तो रसोई प्रभारी भाटी जी ने गरमा गरम चाय पिलाई। चाय पीकर हम लोग टीले पर पहुंच गये। यद्यपि हम लोगों का काम अगले दिन से प्रारम्भ होना था लेकिन उत्खनन स्थल देखने की उत्सुकता तो थी ही।
अद्भुत दिखाई दे रहा था वह टीला..चांद के प्रकाश में। बीच में कहीं कहीं टेकडियों की छाँव । शांत वेग से बह रही थी चम्बल । हवा चलती तो चाँन्द का अक्स पानी में लहराता हुआ नज़र आता।वातावरण इतना खामोश कि हम बहते हुए पानी की आवाज़ साफ साफ सुन सकते थे।
डॉ.वाकणकर ने जिस ट्रेंच की खुदाई शुरू की थी वह अभी नींद के आगोश मे थी,उसे जगाना उचित नहीं समझा हमने और दूर खड़े चुपचाप उसे देखते रहे। उसके भीतर अन्धेरा था ,सदियों पुराना अन्धेरा। ऐसा लगा उसकी गहराई में कोई रंगमंच है,जिस पर सैकडों सालों से कोई ड्रामा चल रहा है। “सुन सुन”अजय ने कहा “घोडों की टापों की आवाज़ आ रही है” “बस कर यार” रवीन्द्र बोला,”जुकाम के कारण तेरे कान बन्द हैं,यह बलगम की आवाज़ होगी।“
कल दिन में निखात के उस अन्धेरे से साक्षात्कार करेंगे यह सोच कर हम लोग टीले की ढलान पर बैठ गये। मैने कमर सीधी करनी चाही। पूरा आसमान मेरी आंखों के सामने था और उसमे चमक रहा था पूर्णिमा का पूरा चांद। बेसाख्ता मेरे मुँह से एक गीत फूट पड़ा..”ये पीला बासंतिया चांद,संघर्षों का ये दिया चांन्द.चन्दा ने कभी रातें पी थीं, रातों ने कभी पी लिया चाँन्द “ कभी क्षेत्रीय शिक्षा महाविद्यालय भोपाल मे अध्ययन के दौरान कवि रमेश दवे से यह गीत सुना था।
“बस कर यार”शीत ऋतु में तुझे बासंतिया चांद कहाँ से दिखाई दे रहा है?रवीन्द्र भारद्वाज ने मेरे भीतर के कवि और गायक से पुरातत्ववेत्ता की तरह सवाल किया। और वह खुद शुरू हो गया ‘शरद रैन मदमात विकल भई, पिउ के टेरत भामिनी कैसी, कैसी निकसी चान्दनी कैसी॥ चांदनी चांदनी चांदनी....।
आपका शरद कोकास

सोमवार, 25 मई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पहला दिन-एक

हमारे दंगवाड़ा पहुँचने से पहले ही अन्धेरा अपने पाँव पसार रहा था । पता चला कि वह टीला जिस पर खुदाई हो रही है,गाँव से एक किलोमीटर भीतर जंगल में है। हम लोग जिस वाहन में थे, वह जीप नुमा एक पुरानी गाडी थी,युनिवर्सिटी की। हमने ड्राईवर से जानना चाहा कि गाडी वहाँ तक जायेगी या नहीं वर्ना हमें अपना बिस्तरबन्द वहाँ तक लादकर जाना होगा । ड्राइवर खुशीलाल हंसने लगा “भैया मैं चार बार वहाँ तक जा चुका हूँ ,जंगल में भी मैने अपनी गाडी जाने लायक रास्ता बना लिया है । ‘चलो फिर ठीक है ”रवीन्द्र भारद्वाज ने उछलकर कहा । हम लोगों ने चैन की साँस ली ।पूर्णिमा का चान्द निकल रहा था और डूबते सूरज की मद्धम रोशनी में भी जंगल साफ दिखाई दे रहा था। खुशीलाल ने अपना बनाया रास्ता पहचानकर कैम्प तक गाडी पहुंचा दी। तम्बुओं के करीब कुछ भीड़ सी दिखाई दी। गाड़ी से उतरकर देखा तो एक मजदूर औरत ज़मीन पर लेटी हुई थी और लोग उसे घेरे खड़े थे। पता चला कि शाम को वह काम खत्म होने के पश्चात अचानक बेहोश होकर गिर पड़ी थी और उसके साथी गाँव से किसी झाड़-फूँक वाले को लेकर आये थे। डॉ.वाकणकर भी वहीं खड़े-खड़े उनसे बात कर रहे थे। हम सभी छात्रों ने उन्हे प्रणाम किया ।उन्होनें नमस्ते का जवाब देते हुए अपनी बात ज़ारी रखी..”कईं भूत- वूत नई लग्यो है..ईको उपवास थो,न ऊपर से इनने लंगन कर ल्यो,अणि लिये अणे चक्कर अईया,अबार होश में अई जांगा..” “नई बा साब ”ओझा अपनी इज़्ज़त बचाना चाहता था “अणि टीला में..जणि टीला की खुदाई कर रेया हो,उणमें लोगाँ की आत्मा रेवे हे, अब खुदई से वे बाहर अईगी हे,ओर उणी में से कोई आत्मा लागी गी हे..आज तो पूर्णिमा हे ..टांका का दिन..” डॉ.वाकणकर हँसने लगे “यदि ऐसा था तो सबसे पहले आत्मा को मुझे पकडना चाहिये था ,मैं तो ऐसे कई टीलों की कब्रस्तानों की खुदाई करवा चुका हूँ और खोपडियाँ और कंकाल तो बिस्तर में भी मेरे साथ रहते हैं,कोई आत्मा –वात्मा नहीं है. सब फालतू बात ...” वे कह ही रहे थे कि सबने देखा वह स्त्री होश में आ रही है .उन्होने कहा “देखो यह होश में आ गई है. इसे घर ले जाओ ठीक से खाना –वाना खिलाओ.. सब ठीक हो जायेगा .इसके बाद वे हम लोगों से मुखातिब हुए “ चलो रे सज्जनों, तुम लोगों को तुम्हारे तम्बू दिखा दें ।” मैं रवीन्द्र, अजय,और अशोक अपना अपना डेरा-डंडा उठाकर उनके साथ चल दिये ।

शरद कोकास

रविवार, 24 मई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी

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एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी
जिन दिनो मैं विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व में एम.ए. कर रहा था, भारत के विख्यात पुरातत्ववेत्ता पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के सान्निध्य में मुझे उज्जैन के निकट चम्बल के किनारे दंगवाडा नामक स्थान पर उत्खनन का प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ। वहाँ हमें फाईनल ईयर के कोर्स के अंतर्गत एक माह कैम्पिंग करनी थी। मेरे साथ मेरे सहपाठी रवीन्द्र भारद्वाज,अशोक त्रिवेदी, अजय जोशी और राम मिलन शर्मा थे। वह एक माह का समय मेरे लिये अविस्मरणीय है। वहाँ मैने पुरातत्ववेत्ताओं (एक उत्खनन स्थल का दृश्य)
के जीवन को बहुत करीब से देखा,उनकी जीवन चर्या, कार्यप्रणाली, लगन,धैर्य,मेहनत और इतिहास सम्बधी ज्ञान देखकर मैने बहुत कुछ सीखा।दरअसल मेरी लम्बी कविता पुरातत्ववेत्ता का बीजारोपण वहीं पर हुआ।इतिहास क्या है?इतिहासबोध क्या है? इतिहास का अध्ययन क्यों आवश्यक है?अतीतग्रस्तता और इतिहासबोध में क्या अंतर है? जैसे ढेरों प्रश्नों के उत्तर मुझे वहाँ मिले।उन दिनों के अनुभवों को मैने अपनी डायरी में लिखा है जिसे मैं आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ।यह रोचक तो है ही साथ ही ज्ञानवर्धक भी। इसमें आपको कहानी, कविता, यात्रा-विवरण,व्यंग,सभी का आनन्द आयेगा ।छात्र जीवन की मस्तियाँ हैं सो अलग।हाँ जिस तरह पुरातत्ववेत्ता का काम होता है,अर्थात शाम को सूरज ढलने पर निखात की खुदाई बन्द उसी तरह पोस्ट के बीच में कहाँ विराम लूंगा मैं नही जानता फिर भी मेरी कोशिश रहेगी कि ऐसे स्थान पर रुकूँ जहाँअगले दिन पढने की उत्सुकता बनी रहे। ऐसा ही हम जीवन में भी तो करते हैं,यदि अगले दिन के लिये कोई सवाल न हो तो ऐसे जीवन का उद्देश्य क्या और ऐसे जीवन में सुख क्या और ऐसा जीवन जीने का अर्थ क्या?
बहरहाल दर्शन की बातें बहुत हो गईं..तो कल से शुरुआत करते हैं.. हाँ बीच बीच में कुछ और जानकारी अपेक्षित हो जैसे इतिहास और कहानी मे क्या फर्क है?क्या पुराणकथायें इतिहास हैं?आदि तो ट्रेक चेंज भी किया जा सकता है।वैसे पुरातत्व के इस छात्र की डायरी मे आपको बहुत सारे प्रश्नों के उत्तर तो मिल ही जायेंगे ।यह पुस्तक के रूप मे आने से पूर्व आपका मार्गदर्शन और टिप्पणियाँ मेरे लिये महत्वपूर्ण होंगी।
आपका
शरद कोकास

शनिवार, 23 मई 2009

हिस्ट्री नेवर रीपीट्स इटसेल्फ़

इतिहास अपने आप को नहीं दोहराता

पता नहीं क्यों समाज में एक अवधारणा पनप गई है कि इतिहास की पुनरावृति होती हैयह अंग्रेजी के वाक्य history repeats itself का जस का तस अनुवाद हैहम इन्हे जीवन में बहुत छोटी छोटी जगहों पर लागू करते हैं जैसे यदि बाप अपने छात्र जीवन में किसी कक्षा में फेल हुआ हो और उसका बेटा भी फेल हो जाये तो कहा जायेगा history repeats itself यदि बाप शराबी हो और उसका बेटा उससे भी बढकर शराबी निकले तो यही कहा जायेगा,यदि किसी पीढी में कोई दुर्घटना हो जो अगली पीढ़ी मे भी घटित हो तब भीअक्सर गलत जगहों पर हम यह वाक्य कोट करते हैं परंतु ऐसा नहीं है.यदि इतिहास मे कुछ गलत हुआ है तो ज़रूरी नहीं कि भविष्य में उसकी पुनरावृत्ति हो उदाहरण के तौर पर मुहम्मद-बिन-तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से दौलताबाद रिवर्तित की जिसकी वज़ह से सैकडों लोग बेघर,बीमार व परेशान हुए और अंतत उसे वापस राजधानी दिल्ली लाना पडा। इसी पराक्रम की वज़ह से उसे विक्षिप्त की उपाधी मिलीलेकिन इसके विपरीत बहुत सारे सकारात्मक राजधानी परिवर्तन हुए जैसे कलकत्ता से दिल्ली, बर्लिन से बॉन और वर्तमान मे नये प्रदेशों की राजधानियाँदरअसल इतिहास में जो कुछ भी घटित हो चुका है वह बीता हुआ पल है जो दोबारा नहीं आता और आता भी है तो उसी रूप मे कतई नहींजैसे हम हर बार साँस लेते हैं लेकिन एक बार छोडी हुई साँस में जो वायु होती है क्या वह अगली साँस मे उसी रूप में वापस आती है?नदी में जो जल एक बार बह जाता है क्या वह उसी रूप में वापस आता है?यह तो समय की बात है रिसायकल होकर कोई भौतिक वस्तु भी उसी रूप में वापस नही आतीइसलिये जो बीत गया है उससे सबक लेने की ज़रूरत है ताकि हम भविष्य में गलती न करें हमारे पिता ने या उनके पिता ने अपने बच्चों के लिये जो कुछ किया क्या हम उससे बेहतर नही करना चाहते?यही है इतिहास से सबक लेना जो लोग इतिहास से सबक नहीं लेते वे पुरोगामी होने के बजाय और भी पीछे चले जाते हैं फिर सबक लेना ही काफी नही है गलत सबक लेने से भी बचना ज़रूरी हैसही सबक क्या है और गलत सबक क्या इसका निर्धारण आपका विवेक और इतिहासबोध ही कर सकता हैवैसे हीगेल का कथन है किइतिहास की सबसे बडी सीख यही है कि इतिहास से कोई सीख नही लेताहीगेल ने उसके देश जर्मनी ने और उसके अनुयायियों ने इतिहास से कोई सीख नही ली उसका क्या हश्र हुआ आप जानते हैंहमारे देश में भी बहुसंख्य लोग इतिहास से कोई सबक नहीं लेते लेकिन इतिहास सिर्फ उन्हे याद रखता है जो उससे सही सबक लेकर कुछ नया रचते हैं,कुछ नया सृजन करते हैं,वे ही नवनिर्माण करते हैआप भी इतिहास बोध से लैस होकर उनमें शामिल हो सकते हैं

शरद कोकास

बुधवार, 13 मई 2009

बिना बाप का भी कोई हो सकता है??

डा.लालबहादुर वर्मा अपनी पुस्तक "इतिहास के बारे में" में लिखते हैं "कोई भी फॉर्म लें, उसमें प्रार्थी के नाम के बाद के दो तीन कालम महत्वपूर्ण होते हैं, बाप का नाम जन्मतिथि पता आदि .हमें तो महज़ प्रार्थी से मतलब है तो फ़िर अन्य विवरणों की क्या आवश्यकता ?पर हम जानते हैं की बिना बाप के पहचान ही पूरी नही होगी .हमारी पहचान के लिए हमारी जन्मतिथि और पता भी ज़रूरी है यानि हमें काल( जन्मतिथि )और देश (पता) में स्थापित करके अपने अतीत यानि बाप से जोड़ा जाता है ताकि हमारी शिनाख्त हो सके. इन तीन बातों से जुड़े बगैर किसी का परिचय और अस्तित्व पहचान नही बन सकता. "
चलिए मान लेते हैं आप को पिता के नाम की ज़रूरत नही है. कहीं कोई फिल्मी डायलॉग भी याद आ रहा होगा "बाप के नाम का सहारा कमज़ोर लोग लेते हैं" लेकिन यह सच है की पिता का अस्तित्व तो होता है .भविष्य में यदि बिना बाप के संताने उत्पन्न होने लगे तब भी मनुष्य का पूर्वज तो मनुष्य ही रहेगा और उससे जुडा रहेगा उसका इतिहास.अपने अतीत को जानने में हर किसी को सुख मिलता है लेकिन हमें अपना पूरा अतीत कहाँ मालूम रहता है हमें तो केवल वही बातें याद हैं जो हमारे होश संभालने के बाद की हैं.एक या दो साल की उम्र में जब हम बिस्तर से लुढ़क कर गिर पड़े थे या मम्मी पापा या चाचा की गोद में सू-सू कर देते थे हमें कहाँ याद है ?यह बातें तो हम हमारे माता पिता व घर के अन्य लोग ही बताते हैं कि कब हमने खड़े होना सीखा ,कब हमने चलना सीखा ,कब हमने अपने हाथ से निवाला उठाकर खाना सीखा .हमारे माता- पिता ने यह कब सीखा, यह हमें दादा -दादी या नाना- नानी बता सकतें है लेकिन हमारे दादा -दादी ने यह कब सीखा और उनके दादा- दादी ने कब, यह हमें कौन बताएगा।
दरअसल अमीबा से लेकर मनुष्य होने की प्रक्रिया तक हर पीढी अपनी अगली पीढी को यह ज्ञान देती आई है और इसमे हजारों वर्ष लगे हैं .यदि इसका माईक्रो संस्करण देखना हो तो बच्चे के जन्म से लेकर उसके पांच-छः वर्ष तक की आयु की गतिविधियाँ देख लीजिये इतने वर्षों में उसे खाना-पीना,चलना,बैठना,बोलना, कपडे पहनना सब सिखा दिया जाता है.कह सकते हैं की हज़ारों साल चलने वाली फ़िल्म का यह छोटा सा ट्रेलर है।
लेकिन ऐसा है तो हमें अपना इतिहास जानने से हासिल क्या होगा ?सीधी सी बात है अतीत में हमसे जो गलतियाँ हुई हैं उन्हे जाने बगैर हम गलतियों से बचेंगे कैसे?आग में हाथ डालने से हाथ जल जाता है यह बात मालूम होने के लिए क्या हम हाथ जलाकर देखेंगे?यह सबक हमें इतिहास ने ही सिखाया है।
अगर इतिहास की ज़रूरत को हमने न समझा होता तो हम आज भी उसी आदिम अवस्था में निर्वस्त्र वन में घूम रहे होते .खैर छोडिये ज़्यादा पीछे क्यों जायें कम्प्यूटर वैज्ञानिक यदि कम्प्यूटर के इतिहास से वाक़िफ न होते तो और उस आधार पर शोध नही करते तो आज आप चौथी और पांचवी पीढी के कम्प्यूटर के बजाय,पहली पीढी के बडे कमरे के आकार के बड़े से कम्प्यूटर पर मेरा यह लेख पढ़ रहे होते.फिलहाल इतना ही।

आपका शरद कोकास

शुक्रवार, 1 मई 2009

इतिहास क्या है


इतिहास तो दरअसल माँ के पहले दूध की तरह है
जिसकी सही खूराक पैदा करती हमारे भीतर
मुसीबतों से लडने की ताकत
दुख सहन करने की क्षमता देती जो
जीवन की समझ बनाती है वह
हमारे होने का अर्थ बताती है हमें
हमारी पहचान कराती जो हमीं से

SAMPADAK GYANRANJAN DWARA "PAHAL"PUSTIKA KE ANTARGAT PRAKASHIT SHARAD KOKAS KI LAMBI KAVITA "PURATATVAVETTA" SE