सोमवार, 27 जुलाई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पाँचवा दिन-एक

हम लोगों ने 1-1 मीटर पर 10 पेग लगाये

आज हम लोगों ने एक नई ट्रेंच पर कार्य आरम्भ किया । इसे हमने क्रमांक-चार नाम दिया । सारा दिन उत्साहपूर्ण वातावरण मे बीता । आज दिन भर हम नई नई बातें सीखते रहे ,ट्रेंच के लिये जगह का चयन किस प्रकार किया जाये,किस प्रकार नाप लिया जाये, खूंटियाँ किस प्रकार गाड़ी जायें आदि आदि । हमारी यह नई ट्रेंच 10 x 4 मीटर की है ।सर्वप्रथम हमने चारों ओर 25 सेंटीमीटर का मार्जिन छोड़ा तथा 1-1 मीटर के अंतर पर 10 पेग लगाये । यहाँ पेग से तात्पर्य गाड़ी गई खूँटियों से है सारी ट्रेंच का एक साथ निरीक्षण करने हेतु पेग ix और x के बीच एक कंट्रोल पिट बनाया ।
आज की सतह निरीक्षण में हमे स्वास्तिक चिन्ह युक्त एक सिक्का , एक टेराकोटा ऑब्जेक्ट तथा एक स्टोन बॉल प्राप्त हुआ । आज हमने सतह से खुदाई प्रारम्भ की और 31 सेंटीमीटर तक पहुंचे । इन प्रारम्भिक बातों के लिये डॉ.आर्य हमारा मार्ग दर्शन करते रहे । शाम को कार्य समाप्त करने के बाद हमे यह भी बताया गया कि प्राप्त वस्तुओं की देखभाल कैसे की जाये और उन्हे सम्भाल कर कैसे रखा जाये । सदियों से जो अवशेष ज़मीन के भीतर दफ्न हैं बाहर आते ही ऐसे लगा जैसे वे हमसे बातें करने लगे है । मिट्टी का 4 से.मी. का एक छोटा सा पात्र हाथ में लिये अशोक उसे बहुत देर तक निहारता रहा । “क्या देख रहा है अशोक ?” मैने ध्यान से पात्र देखते हुए अशोक से पूछा । “ वाह कितना सुन्दर पात्र है “ अशोक ने कहा । मुझे लगा वह ताम्राश्मयुगीन सभ्यता की किसी विशेषता पर हम लोगों का ध्यान आकर्षित करने वाला है । लेकिन अशोक ने अपनी नज़रें उस पर से हटाये बगैर फिर कहा “ अपने तम्बू में सिगरेट की राख झाड़ने के लिये ऐश ट्रे नहीं है यह बढ़िया काम आयेगा । और फिर उसने धीरे से उसे अपनी पैंट की जेब में रख लिया ।
Trench no 4 10 metersx4meters
PEGX PEG IX PEG VIII PEGVII PEG VI PEG IV PEG III PEG II PEG I PEG 0
CONTROL
PIT




















































चित्र गूगल से साभार रेखांकन-शरद कोकास

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-चौथा दिन-चार


कुबेर की भी कहीं पूजा होती है ?
खाना खाकर जब हम लोग अपने तम्बू में पहुंचे तो पता चला कि बिस्तर अभी तक नम हैं । हाँलाकि फुलान जाने से पहले हम उन्हे डंडा-वंडा लगाकर टांग गये थे ताकि रात मे सोने तक वे सूख जायें । “ चलो कोई बात नहीं शरीर की गर्मी से सूख जायेंगे” मैने कहा । लेकिन बिस्तर में घुसने पर पता चला कि नमीं के अलावा यहाँ ठंड का भी सामना करना है गनीमत की थकान हम पर हावी थी और मेहनत से थके हुए शरीर को नींद में जाने से वह नहीं रोक सकती थी ।
सोने से पहले एक बार दिन भर की गतिविधियों की चर्चा भी ज़रूरी थी सो हमने आज प्राप्त प्रतिमाओं अपनी बात शुरू की । “क्यों यार कुषाण पीरियड से पहले अपने यहाँ मूर्तिशिल्प का कोई कंसेप्ट नहीं था क्या ? “ अजय ने पूछा । रवीन्द्र ने बताया “ था तो लेकिन उसका कोई संगठित रूप नहीं था अगर ऐसा होता तो बुद्ध के जीवन काल में ही उनकी मूर्तियाँ बन जाती , वह तो बुद्ध के दो-तीन सौ साल बाद पश्चिमोत्तर से कलाकार आये और उन्होने जनता की श्रुति के आधार पर मूर्तियाँ गढ़ीं ।“ “ श्रुति के आधार पर मतलब ?” अजय ने पूछा । “मतलब उन्होनें लोगों से पूछा बुद्ध कैसे दिखते थे तो लोगों ने बताया विशाल,भव्य, जैसे उनके पीछे कोई प्रभामंडल हो । बस वैसी ही मूर्तियाँ उन्होने गढ़ीं जबकी वास्तव में बुद्ध तो तपस्या के कारण कृशकाय हो गये थे ।“ रवीन्द्र ने कहा । “
भाई हमारे देश में तो लोगों को पूजा से मतलब है , मूर्ति की सुन्दरता कौन देखता है “ मैने कहा । “और क्या “ रवीन्द्र बोला ” तुम्हे याद नहीं अपन भानपुरा गये थे जहाँ कुबेर की पूजा अन्नपूर्णा माता के रूप में हो रही थी। “ “ ये क्या किस्सा है ? ” अजय ने सवाल किया । “अरे वो बड़ा मज़ेदार किस्सा है “ मैने कहा “ आज से दो माह पूर्व मैं रवीन्द्र के साथ उसके गाँव भानपुरा गया था , सुबह सुबह जब हम लोग घूमने निकले तो देखा एक चौक पर बहुत भीड़ लगी है ,मैने रवीन्द्र से पूछा यहाँ क्या हो रहा है तो उसने बताया कि यहाँ अन्नपूर्णा माता की पूजा हो रही है । करीब जाकर मैने देखा तो वहाँ कुबेर की मूर्ति रखी थी तुन्दिल काया ,कानों मे बड़े बड़े कुंडल ,हाथ में धन की थैली । मैने रवीन्द्र से कहा “ रवीन्द्र यह तो कुबेर है , इसकी तो पूजा नहीं होती है ” तो रवीन्द्र बोला “ धीरे बोल अगर कोई सुन लेगा तो बहुत मार पड़ेगी । अब लोगों ने इसे अन्नपूर्णा माता मान लिया है तो मान लिया ,तू इसे कुबेर बतायेगा तो फालतू का बवाल खड़ा हो जायेगा ।“
मैने कहा “ लानत है हमारे प्रतिमा विज्ञान पढ़ने पर, यहाँ तो पत्थर पर सिन्दूर पोतकर उसे हनुमानजी बना दिया जाता है ।“ “ और यह हनुमानजी सरकारी जमीन पर बेजा कब्जा करने के काम आते हैं। “ अशोक ने अपना एक्सपर्ट कमेंट दिया और तानकर सो गया । हम लोगों ने भी अपने रज़ाई कम्बल ताने और बजरंग बली की जय कहकर सो गये (चित्र गूगल से साभार )

मंगलवार, 21 जुलाई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-चौथा दिन-तीन


इसकी थीसिस पर ओनली फॉर एडल्ट्स लिखा होना चाहिये
शिविर में पहुंचते पहुंचते अन्धेरा हो गया था भूख तो लगी थी लेकिन यह लंच का समय था ना डिनर का । फिर भी भूख का इलाज तो करना था । हमने हमारे भोजन मंत्री भाटीजी को मस्का मारा तो उन्होने हमारे लिये गरमा गरम पोहा बना दिया जिसे हमने बतौर “लनर” ग्रहण कर लिया । लंच और डिनर के बीच के भोजन को हम लोगों ने यह नया शब्द दिया था वैसे ही ब्रेकफास्ट और लंच के बीच के भोजन को हम लोग ’ ब्रंच ‘ और डिनर व सुबह के ब्रेकफास्ट के बीच रात में भूख लगने पर खाये जाने वाले भोजन को हम लोग ’ डिफास्ट ‘ कहते थे । आज टीले पर जाना नहीं हुआ था और पिंजरे में कैद तोते में बसे राक्षस के प्राण की तरह हमारे प्राण भी वहीं अटके थे सो हमने सोचा चलो एक चक्कर लगा लिया जाये ताकि लनर भी हजम हो जाये और अगले “ओम सहना ववतु” तक अच्छी भूख लग आये । बारिश रूक गई थी और आसमान साफ हो चला था इसलिये ठंड भी काफी बढ़ गई थी । अजय गुमसुम सा बैठा था । रवीन्द्र ने कुरेदा तो बोला “क्या करूँ यार भाभी की याद आ रही है ।“ हम लोगों की देखा-देखी वह भी अपनी पत्नी के लिये भाभी का सम्बोधन इस्तेमाल करने लगा था । यहाँ तक कि रवीन्द्र उसे मज़ाक में “भाभी का भैया “कहने लगा था ।
इतने में डॉ. आर्य भी हम लोगों के पीछे पीछे टीले तक आ गये । हम लोगों को चुपचाप बैठा देख “शोले” के हंगल की तरह उन्होने पूछा “इतनी खामोशी क्यों है भाई ?” हमने कहा “कुछ नही सर आज थक गये है । “ “क्या मिला फुलान के टीले पर ?” उन्होने अगला सवाल किया । हमने उन्हे बता दिया । प्रत्युत्तर मे उन्होने बताया कि वे भी कल भाटीजी के साथ फुलान गये थे और वहाँ से 54 सिक्के,कुछ मणि और यक्ष की मृण्मूर्ति का एक साँचा लेकर आये थे । “सर ये यक्षों की पूजा क्यों नहीं होती ?” यक्ष की बात आई तो अशोक ने पूछा । डॉ.आर्य ने बताया कि “ जैसे जैसे हमारे यहाँ देवी- देवताओं की रचना होती गई उनकी संख्या भी बढ़ती गई इसलिये उन्हे पूर्ण देव और अर्ध देव की श्रेणि में विभाजित कर दिया गया ,यक्ष किन्नर ,कुबेर आदि अर्धदेव बन गये और उन्हे पूजा के अधिकार से वंचित कर दिया गया ।“ “ मतलब देवताओं में भी मनुष्यों की तरह वर्ग विभाजन ? “ अशोक ने अपना एक्सपर्ट कमेंट दिया । मैने कहा “ यार जब मनुष्य ने ही देवता बनाये तो वह अपने सारे गुण दोष भी उन पर आरोपित करेगा और अपने जैसी व्यवस्था भी उनके लिये बनायेगा ।“
रवीन्द्र ने मेरी ओर घूर कर देखा और कहा “तू चुप रह यार, तैने तो अपने लिये बढ़िया बढ़िया यक्षी चुन ली है ,रात दिन उनकी फोटुएं देखता रहता है ।“ डॉ.आर्य ने कहा “अच्छा तुम्हारी थीसिस की बात हो रही है क्या विषय है..”कुषाण शिल्प में नारी प्रतिमाएँ। ” “हाँ सर” रवीन्द्र मुझे छेड़ने के मूड में था “ ये कि नई सर मथुरा म्यूज़ियम से नंगी नंगी यक्षियों की फोटो लेकर आया है शोध-प्रबन्ध में लगाने के लिये ,इसकी थीसिस पर तो ऑनली फॉर एडल्ट्स लिख देना चाहिये ।“ सर हँसने लगे “ ये शरद तो लेकिन अठारह का हो गया है ना ?” “क्या पता सर “ रवीन्द्र ने कहा “ मै तो इसे मुन्ना ही कहता हूँ ।“फिर डॉ.आर्य ने मुझसे पूछा “अच्छा शरद बताओ तुमने इन यक्षी प्रतिमाओं में क्या विशेषता देखी ?” मैने कहा “ सर ये यक्षियाँ स्तम्भों के बाहरी भाग पर उत्कीर्ण है लेकिन शिल्पी ने इनकी माँसलता और उभारों को इस तरह उकेरा है कि ये पूर्णता का आभास देती हैं यद्यपि ये पूर्णतया नग्न हैं लेकिन घुटने तक जाती एक महीन सी रेखा से ऐसा लगता है जैसे वे कोई पारदर्शी वस्त्र पहने हैं।“ “ यही तो है कुषाण काल के शिल्प की विशेषता “ डॉ.आर्य ने कहा । इतने में भैया राम मिलन का ध्यान हमारी बातों की ओर चला गया बोले “ए सरदवा, ये यक्षी-फक्षी का फोटुआ हमे भी दिखाओ भई ।“ हम समझ गये अब कोई गम्भीर बात होने से रही ।(यक्षी की छवि गूगल से साभार)
डायरी में प्रस्तुत मुद्दों पर आपके विचार आमंत्रित हैं
शरद कोकास
शरद कोकास

बुधवार, 15 जुलाई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-चौथा दिन -दो

पुरातत्ववेत्ता बनना है या पुलिसवाला

नदी के घाट से हम लोग लौट कर आये तो देखा डॉ.वाकणकर , किशोर ,अशोक,राममिलन और अजय तैया
र खड़े थे।आकाश में बादल ज़रूर थे लेकिन बारिश थम गई थी । हम लोग पैदल पैदल दंगवाड़ा के लिये रवाना हो गये और वहाँ पहुंचकर सड़क पर बस की राह देखने लगे । थोड़ी देर में बस आई जिसमें सवार होकर हम लोग नरसिंगा तक गये । नरसिंगा ,दंगवाड़ा से सात किलोमीटर दूर इंगोरिया गौतमपुरा मार्ग पर स्थित है । वहाँ से पूर्व में लगभग एक किलोमीटर पर है फुलान का टीला ।फुलान के टीले पर एक्स्प्लोरेशन करते हुए हमे अनेक महत्वपूर्ण वस्तुएँ प्राप्त हुईं जिसमे दो टेराकोटा बुल ,स्वास्तिक चिन्हों से युक्त सिक्के,आहत सिक्के मिट्टी के बाँट,तथा कुषाण कालीन मिट्टी के मृद्भांडप्राप्त हुए
सब लोग तन्मयता से टीले पर बिखरे पड़े अवशेष ढूँढने में लगे थे कि अचानक अजय ने सवाल किया “ यार ये मृद्भांड मिट्टी के ही क्यों होते हैं, ताम्बे के या सोने चान्दी के क्यों नहीं होते ? “ रवीन्द्र ने ज़ोरदार ठहाका लगायाऔर कहा “ अरे बेवकूफ मृद्भांड हैं तो मिट्टी के ही होंगे ना , मृदा का अर्थ ही मिट्टी होता है ,तेरे से इसलिये कहा थाकि सुबह सुबह नहा लिया कर , नहाने की गोली खाने से ऐसा ही होता है ।“ अजय बेचारा बगलें झाँकने लगा ।चलो रे सज्जनों “ इतने में डॉ. वाकणकर की आवाज़ आई “ यह सब अवशेष झोले में रख लो ,चलो अब गाँव चलतेहैं “ गाँव जाकर क्या करेंगे सर ? “ अशोक इतनी ही देर में ऊब गया था । “ अरे चलो तो यहाँ बहुत सुन्दर मन्दिरऔर मूर्तियाँ हैं ।“ सर ने कहा । मै समझ गया था अशोक को सिगरेट की तलब लगी है मैने धीरे से कहा “ चल तो तेरे लिये भी वहाँ इंतज़ाम है किसी भी मन्दिर के पिछ्वाड़े जाकर... “ इतना सुनना था कि अशोक फट से तैयार होगया । हमारी कानाफूसी सर की कुछ समझ में नहीं आई ।
गाँव में प्रवेश से पहले ही बाहर एक चबूतरे पर हमें गणेश की एक दक्षिणावर्त प्रतिमा के दर्शन हुए । “अरे वाह “ डॉ.वाकणकर ने कहा “ श्री गणेश तो अच्छा हुआ है “ आगे बढ़ते ही हमे एक और चबूतरे पर नन्दी पर आसीन शिव-पार्वती की प्रतिमा, गरुड़ पर आसीन लक्ष्मी-नारायण की प्रतिमा,जटाधारी शिव और भैरव की प्रतिमा भी मिली । सर ने बताया “ध्यान से देखो यह सब नवीं से ग्यारहवीं शताब्दी की परमार कालीन शिल्प की प्रतिमायें हैं “ मतलब यहाँ परमारों का शासन रहा है ?” अशोक ने पूछा । “और क्या “ सर ने कहा “उनके बहुत से अभिलेख भी यहाँ मिलते हैं ।“ इतने में पास के ही एक चबूतरे से अजय ने आवाज़ दी “ सर मेरी समझ में नहीं आ रहा यह किसकी प्रतिमा है ।“ सर के साथ हम लोग भी वहाँ पहुंचे । अजय एक टूटी-फूटी प्रतिमा को लेकर अपना सिर खपा रहा था । “ देखो “सर ने कहा “ किसी भी प्रतिमा को पहचानने के लिये उसके लक्षण देखना ज़रूरी है ,जैसे विष्णु के चार हाथ जिनमें शंख,चक्र,गदा और पद्म याने कमल का होना अनिवार्य है । अब इसमें हाथ तो सब टूट गये हैं लेकिन अन्य लक्षण जैसे मुकुट है और इस टूटे हुए हाथ की बनावट नीचे की ओर है जिसके नीचे गदा साफ दिखाई दे रही है मतलब यह विष्णु की प्रतिमा हो सकती है । “ सर अगर यह गदा भी टूट जाती तो “अशोक ने पूछा तो हम शंख चक्र पद्म को ढूंढते “सर ने कहा । “ और सर ये शंख चक्र भी नही होते तो ? “ अशोक ने फिर पूछा । “ तो हम आभूषणों से या मुकुट से या वस्त्रों से पहचान करते “ सर ने कहा । “ और सर आभूषण भी नहीं होते तो ? “ अशोक ने फिर सवाल दागा ।“ डॉ.वाकणकर हँसने लगे “ तुम ये बताओ यार तुम्हे पुरातत्ववेत्ता बनना है कि पुलिसवाला , अरे कुछ भी नहीं रहता तो फिर पत्थर और प्रतिमा में फर्क ही क्या रह जाता । शिल्पकार की उंगलियों से उकेरे प्रतिमा के ये लक्षण ही तो पत्थर को भगवान बनाते हैं । चलो आज का काम खतम ,भूख लग रहीहै वापस चलें ।
हम लोगों ने घड़ी देखी शाम के चार बजने वाले थे और हम लोगों ने लंच भी नहीं लिया था इसलिये वापस जाना तो ज़रूरी था । लौटते हुए मैने भूख से ध्यान हटाने के लिये एक पहेली बुझवाई “ मानलो आज से हज़ार साल बाद का दृश्य है जब डॉ. वाकणकर की ऐसी ही भग्न प्रतिमा मिलती है और एक जन कहता है कि “ यह तो विष्णु की प्रतिमा है “ बताओ वह सच कहता है कि झूठ ? किशोर बोला “ वह झूठ बोलता है “ मैने कहा
“ “ "नहीं वह सच बोलता है जानते नहीं डॉ. वाकणकर का पूरा नाम विष्णु श्रीधर वाकणकर है “( चित्र गूगल से साभार)

(यह 25 वर्ष पुरानी बात है जो मैने विनोद में कही थी लेकिन आज आप उज्जैन के फ्रीगंज मे भारती कला भवन में डॉ.वाकणकर की प्रतिमा देख सकते हैं)

आपका शरद कोकास

सोमवार, 13 जुलाई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-चौथा दिन-एक


नहाये धोये सो बेईमान

बारिश का मौसम नहीं था फिर भी रात भर रुक रुक कर बारिश होती रही । सर्द हवाओं से तम्बू किसी बारिश में भीगे हुए बच्चे की तरह काँपता रहा । हम अपनी गर्म रज़ाइयों में ,माँ की गोद में दुबके बच्चे की तरह आराम से सोते रहे ।सुबह देखा तो रज़ाईयाँ का ऊपरी हिस्सा और गद्दों का बाहरी हिस्सा गीला हो चुका था । अजय ने चीख कर कहा “अरे वा ! मैं कह रहा था ना आज काम नहीं हो सकेगा । “ मैने कहा “ज़्यादा खुश मत हो वैसे भी यहाँ भाभी नहीं है जो तुम्हे भजिया तल तल कर दे ।“ पत्नी की याद आते ही बेचारा अजय उदास हो गया । इतने में दूर से छाता लगाये डॉ. वाकणकर आते दिखाई दिये । हमें पता था वे मुँह अन्धेरे ही ट्रेंच की स्थिति देखने निकल गये होंगे । एक पुरातत्ववेत्ता की सबसे बड़ी चिंता यही होती है कि ऐसी विपरीत परिस्थितियों में प्राचीन अवशेषों को कैसे बचाया जाये । ज़्यादा बारिश हो तो टीले की मिट्टी गीली होकर ढह जाती है, निखातों में पानी भर जाता है फिर उसे पम्प से निकालना पड़ता है । वे लोग जो बार बार संस्कृति बचाने की दुहाई देते हैं ,बचाने की इस व्यावहारिक कठिनाई से नावाकिफ़ होते हैं । हमें जागा हुआ देखकर सर खुश हो गये “ अरे वा ! जाग गये सज्जनों, चलो आज पास में फुलान है वहाँ चलते हैं । आज तो वैसे भी काम तो नहीं हो सकेगा आज गुरुवार है ना गाँव में हाट लगने के कारण मज़दूरों की छुट्टी है ।“ अब हमें पता चला काम बन्द होने का असली कारण यह है ना कि बारिश । “ आलस क्या कर रहे हो चलो जल्दी नहाओ धो और तैयार हो जाओ नाश्ता करो फिर चलते हैं “ उन्होनें हमारी पलटन को आदेश दिया । अब असली समस्या यह थी के इतनी ठंड में नहाये कौन । अशोक त्रिवेदी ने कहा “भाई मै तो नहाने से रहा उसके बदले मैं नहाने के मंत्र का जाप कर लेता हूँ “ और वह पंडितों वाली स्टाइल में शुरू हो गया “ऊँऊँ..ओ ओम हाथ धोये हत्यारा ,पाँव धोये पापी, नहाये धोये सो बेईमान, पूजा-पाठ करे सो दुर्गुण की खान ओ ओम छोड़ पानी ... “ उसकी इस अदा पर हम लोग हँसते हँसते लोट-पोट हो गये । लेकिन हँसने से फायदा यह हुआ कि शरीर में थोड़ी गर्मी आ गई । अजय ने कहा “ भई अपना भी नहाना कैंसल उसके बदले अपन नहाने की गोली खा लेते हैं । स्नान पर्व पर यह दूसरा चुटकला था । बहर हाल रवीन्द्र ने कहा “ में तो भाई बिगेर नहाये नहीं रह सकता ।“रवीन्द्र का साथ तो मुझे देना ही था सो हम दोनों ने अपने वस्त्र लिये और चम्बल-स्नान करने चल दिये ।(चित्र गूगल से साभार)
आपका शरद कोकास

शनिवार, 4 जुलाई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-तीसरा दिन-पाँच


कौनो नचनिया नहीं है नौटंकी मे ?
बिलकुल गाँव जैसा गाँव था दंगवाड़ा । पतली पतली गलियाँ,झोपड़ियों के छप्पर इतने आगे तक झुके हुए कि देखकर नहीं चलो तो सर टकरा जाये । गलियों में खेलते बच्चे हम लोगों को उचटती निगाह से देखते और फिर अपने खेल में लग जाते । एक बूढ़ा ओसारे में बीड़ी के कश खींचता हुआ आसमान में छाये बादलों की ओर देख रहा था । उससे हमने पूछा “कईं बासाब चाय की दुकान कठे हे ?” उसने गाँव के बाहर जाने वाली सड़क की ओर इशारा किया और फिर बीड़ी पीने में मग्न हो गया । बूढ़े के बताये रास्ते पर हम चलते गये लेकिन दुकान कहीं नहीं दिखी । हमे लगा बूढ़े ने कहीं बेवकूफ तो नहीं बना दिया फिर सोचा नहीं ऐसा तो शहर वाले लोग करते हैं यह बूढ़ा बेचारा क्यों करेगा । आखिर में गाँव के बाहर इंगोरिया वाली पक्की सड़क पर आ गये । गावों में अक्सर इस तरह की दुकानें गाँव के बाहर पक्की सड़क पर ही होती हैं ताकि आने जाने वालो से भी उनका व्यवसाय चल सके । नज़र घुमाई तो चाय-पान की एक गुमटी नज़र आई । हम लोगों ने पहुंचते ही ऑर्डर किया “भई जल्दी से चाय पिलाओ” और पटिये पर बैठ गये । चाय कम- पानवाले ने पान पर चूना लगाते हुए जवाब दिया “ दूध खतम हो गया है साहब” यह तो आसमान से गिरकर खजूर पर लटकने जैसी स्थिति थी । इतनी दूर से चाय की तलाश में आये और यहाँ दूध नदारद । अजय ने आगे बढ़कर कहा “ कोई बात नहीं ,दूध कहाँ मिलता है बताओ ,हम ले आते हैं ।“ “ अभी नहीं मिलेगा साब, अभी टेम नहीं हुआ है “ चाय वाले ने बेरुखी से जवाब दिया । “ऐसे कैसे नहीं मिलेगा तुम गंजी तो दो “ चाय वाला मुस्कुराया जैसे उसे हम पर विश्वास ना हो फिर गंजी पकड़ाते हुए कहा “ लो देख लो साब वो सामने वाले घर में मिलता है । “
चाय वाले के बताये घर में पहुंच कर हम लोगों ने पूछा “ दूध है ?” वहाँ उपस्थित एक व्यक्ति ने कहा “दूध तो कोनी “ वह समझने की कोशिश करे इससे पहले मैने उससे कहा “ वो सामने चाय वाले को चाहिये हमें चाय पीनी है लेकिन उसके पास दूध नहीं है । ”मुझे लगा शायद चायवाले के नाम से दूध मिल जायेगा । “ऐसे बोलो ना साहब, लेकिन दूध को तो अभी टेम है “ फिर इससे पहले कि हम समझ पाते उसने भीतर की ओर आवाज़ लगाई “बेटा जरा चा बनाना ।” हम लोगों की तो बाछें खिल गईं । हम लोगों ने उसके साथ साथ उसके गाँव की तारीफ भी करनी शुरू कर दी । हाँलाकि वह सब समझ रहा था कि ये शहर वाले सिर्फ अपना स्वार्थ पूरा करने के लिये उसकी तारीफ कर रहे हैं । खैर बातचीत के बीच चाय भी आ गई और हमने पी भी ली और चाय लाने वाली उसकी बेटी के बारे में यह जानकर कि वो स्कूल नहीं जाती है उसके बाप को सलाह भी दे दी कि लड़कियों को पढ़ाना चाहिये, एक लड़की को पढ़ाने का अर्थ एक परिवार को पढ़ाना होता है, वगैरह वगैरह । उसके बाप ने सिर्फ इतना कहा कि” बेटी भी काम पर जाती है तभी घर चलता है साब गरीबी हमारी मजबूरी है ।“ अच्छा भाई चलें राम राम” राम मिलन भैया ने अपनी जेब से पर्स निकाला और दस का एक नोट उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा “लो भैया ।” वह ग्रामीण हाथ जोड़कर खड़ा हो गया “ अरे मालिक आप लोग तो पहुना हो आप से कैसे पैसे ले सकता हूँ “ राम मिलन उसकी गरीबी से काफी द्रवित हो गये थे “ कोई बात नहीं दूध के तो ले लो “ नई साब,” उसने कहा “ दूध तो घर का ही बचा था उसके काहे के पैसे ? “ हम लोग निरुत्तर थे और सोच रहे थे काहे हम अब तक इस गाँव को सिटी कहकर इसका अपमान कर रहे थे ।
गाँव की आत्मीयता और शहर की स्वार्थ से भरी ज़िन्दगी के बारे में अपना फलसफा बघारते हुए हम लोग बाहर निकले ।“अब क्या प्रोग्राम है ?” रवीन्द्र ने एक सार्वजनिक सवाल किया । बातचीत में हमें यह मालूम हुआ था कि गाँव में यू.पी. से कोई नौटंकी पार्टी आई है । “चलो वहाँ चलते हैं “ मैने कहा ।“ लेकिन अभी वहाँ क्या मिलेगा नौटंकी तो रात में होगी” अजय ने कहा । नौटंकी का नाम सुनकर राम मिलन भैया की आँखों में चमक आ गई थी ।“ चलो तो देखत हैं का खेला है आज । ”उन्होने कहा । “चलो जैसी पंचों की राय “ मैने कहा और हम लोग पूछते हुए उस दिशा में बढ़ गये ।
गाँव के बीचों बीच एक चौराहा था जहाँ एक मंच बना था और उस पर रंगबिरंगे पर्दे लगे थे किसी पर बडा सा मोर , किसी पर बडा सा पेड़ । हमने पता किया नौटंकी तो रात को होने वाली थी और फिलहाल शाम के लगभग सात बजे थे । हमने सोचा चलो बातचीत कर टाइमपास किया जाए । ‘’ कौन कौन से खेल करते हो आप लोग ‘’ मैनें नौटंकी वाले से पूछा .. “अरे भैया सब खेल करते है..”उसने कहा “ राजा हरिश्चंन्द्र , सुल्ताना डाकू , गुल बकावली , सब्जपरी और गुलफाम ।‘’ यहां कौन सा खेल लेकर आए हो । मैने फिर पूछा । उसने बताया ‘’यहाँ तो भैया, राजा हरिश्चंन्द्र खेल रहे हैं । गाँव में तो यही ज्यादा पसंद किया जाता है ।“ राममिलन भैया इतनी देर मे भीतर ग्रीन रुम में प्रवेश कर गए थे । वहीं से उन्होने चिल्लाकर पूछा । ‘’ कौनो नचकारिन नहीं है भैया नौटंकी में ? हम लोगों की भी आँखे चमक उठी और राममिलन जी के बहाने हम लोग भी भीतर प्रवेश कर गए । देखा, एक ओर हारमोनियम ,सारंगी , क्लेरेनेट , तबला ,नगाड़ा और बेंजो रखे हैं । कुछ पात्र बैठे हुए सुस्ता रहें है । एक दो कलाकार मेकअप की तैयारी कर रहें हैं, नचकारिन के बारे में पूछने पर पता चला कि इस नौटंकी में पुरुष ही महिला पात्र का अभिनय करते हैं । हम लोगों ने अपना परिचय दिया और बताया कि रात को हम लोग नौटंकी देखने ठहर नहीं सकते हैं,बाहर से आये हैं । राममिलन ने इतनी देर में कलाकारों से दोस्ती गांठ ली थी , बोले “कौनो बात नहीं भैया , एकाध डायलाग ही सुनादो ।“ कलाकार , हम शहर के लोगों को देखकर वैसे ही प्रभावित थे । एक कलाकार आगे आया और बोला साहब , एक सीन आपको दिखा देते हैं । उसने अपनी मुद्रा संभाली और कहा .. चलो राजकुमार गुलफाम का एक डायलाग बताते हैं । फिर एकदम नाटकीय अंदाज में कहा ...
“मैं खास हूँ – नहीं कोई आम हूँ .. मैं गुलफाम हूँ ...
मेरे बिना जहर में जहर नही हैं , मेरे बिना कहर मे कहर नही है” फिर अपनी तलवार उठाई और ज़मीन पर उसकी नोक टिकाते हुए
कहा .. “ज़मीं से लगा दूँ ज़मीं छेद डालूँ ..आसमाँ से लगा दूँ आसमाँ भेद डालूँ ..मैं खास हूँ नहीं कोई आम हूँ मैं गुलफाम हूँ .” उसके इस प्रदर्शन पर हम लोगों ने ज़ोरदार तालियाँ बजाईं और फिर आने का आश्वासन देते हुए बाहर निकल आये ।
लौटते समय अंधेरा हो चुका था । हवाएँ तेज़ तेज़ चल रही थीं और बूँदाबाँदी भी होने लगी थी । नाले तक का रास्ता तो समझ आ रहा था लेकिन नाले में कुछ नज़र नहीं आ रहा था । सेतु के वे पत्थर जिन पर राम मिलन जी ने खड़े होकर प्रार्थना की थी थोड़े बहुत समझ में आ रहे थे खैर जैसे तैसे हम लोगों ने नाला पार किया और इससे पहले कि बारिश शुरू हो जाती अपने तम्बुओं में लौट आये ।
(चित्र गूगल से साभार )
आपका शरद कोकास

बुधवार, 1 जुलाई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-तीसरा दिन -चार

रामसेतु की तलाश में
तम्बू में लौटकर हम लोगों ने टॉवेल साबुन वगैरह लिया और घाट पर हाथ मुँह धोने पहुंच गये । वहाँ से आकर कंघी- वंघी की और सिटी अर्थात दंगवाड़ा जाने के लिये पैदल पैदल निकल पड़े। “देखो भाई ज़रा जल्दी आना “ आर्य साहब ने हिदायत दी ।“वरना अन्धेरे में रास्ता भटक जाओगे ।“ “नहीं भटकेंगे सर “ अजय ने कहा ।“हम लोग रास्ते के चिन्हो को याद कर लेंगे ।“
कैम्प से निकलकर हम लोगों ने कच्चा रास्ता पकड़ा और शिविर परिसर के अंतिम किनारे का बरगद पारकर नदी के घाट को बायपास करते हुए आगे बढ़ गये । आगे एक नाला था जो आगे जाकर चम्बल में मिल जाता था उसमें पानी नहीं के बराबर था इसलिये नाला पार करने में हमे कोई दिक्कत नहीं हुई , लेकिन अपने जूतों को बचाने के ख्याल से हमने बीच बीच में दिखाई देते पत्थरों पर पाँव रखकर पार जाना ही उचित समझा । राममिलन भैया निकले तो हमारे साथ ही थे लेकिन नाला पार करने के बाद वे हमें कहीं दिखाई नहीं दिये । हमें लगा शायद मोड़ की वज़ह से वे नज़रों से ओझल हो गये हैं । किशोर ने आवाज़ लगाई “ कहाँ हो राममिलनवा .? “ मोड़ के पीछे से आवाज़ आई “ आईत हैं भैया । ” वहाँ क्या कर रहे हो ? किशोर ने चिल्लाकर पूछा । हमे लगा कहीं राममिलन किसी शंका के निवारण में ना लगे हों । हम उन्हे देखने के लिये चन्द कदम पीछे लौटकर फिर नाले तक पहुंच गये । देखा राम मिलन एक बड़े से पत्थर पर आंखे बन्द किये हाथ जोड़े खड़े हैं , जूते बगल में दबे हैं और वे श्लोक जैसा कुछ बुदबुदा रहे हैं । “क्या हुआ “ किशोर ने पूछा । “कुछ नहीं राम मिलन ने जवाब दिया “ हमे याद आ गया कि बजरंग बली ने रामेश्वर से लंका जाने के लिये ऐसा ही पत्थरों का पुल बनाया था, सो हम उनका स्मरण कर उनकी स्तुति कर रहे थे । “ धन्य हो प्रभु ।” किशोर ने कहा “कहाँ वो विशाल समुद्र, कहाँ ये पिद्दी सा नाला । चलो ठीक है ,जाकी रही भावना जैसी । लेकिन इतना तो बता दो ,तुम लंका से आ रहे हो या लंका जा रहे हो ? “अरे वाह “ राम मिलन समझ नही पाये कि उनका मज़ाक उड़ाया जा रहा है “ हम कोई राच्छस –वाच्छस हैं जौन लंका में रहेंगे । जहाँ हम रहत हैं , ऊ है अयोध्या और जहाँ हम जाइत हैं ,का कहत हो दंग्वाड़ा-फंगवाड़ा ऊ है, लंका ।“ “ तो देखना भाई वहाँ अपनी पूंछ बचाकर रखना ।“ किशोर ने कहा । भैया राम मिलन ने तुरंत अपने कटि प्रदेश के नीचे हाथ लगाया और फिर मज़ाक में कही गई किशोर की बात का अर्थ समझते हुए कहा “काहे किशोरवा काहे मजाक करत हो ।“
हम लोग अपनी हँसी के साथ किशोर के मज़ाक में शामिल हो गये । दर असल हम लोगों मे किशोर त्रिवेदी सबसे बड़े थे और राम मिलन की उम्र के ज़्यादा करीब थे इसलिये ऐसे अवसरों पर उन्हे आगे कर हम लोग चुप हो जाते थे और राम मिलन भी उनकी बात का बुरा नहीं मानते थे । हम लोग आगे बढ़े ही थे कि अजय ने सेतु प्रसंग छेड़ दिया । “ ये बताओ यार रामायण में जिस पुल का वर्णन है वह सचमुच में बना था क्या ?” “ कर दी ना तुमने नॉन टेक्निकल जैसी बात “ रवीन्द्र ने कहा । यदि पुल होता तो अब तक क्या पुरातत्ववेत्ताओं को मिल नहीं जाता ? और पुल क्या पुष्पक विमान भी मिल जाता और हाथी घोड़े रथ सिन्हासन सब कुछ मिल जाता । “ मतलब साफ है रामायण की कथा पूरी तरह काल्पनिक है “ अजय ने कहा “ तो फिर हम काल की गणना करते समय रामायण काल क्यों कहते हैं ?” “भई रामायण् काल या महाभारत काल उस समय को कहते है जब ये महाकाव्य रचे गये ये । घटनायें कब घटित हुईं ,कहाँ घटित हुईं ,हुई भी या नहीं जब तक इसके पर्याप्त पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिलते तब तक तो इन्हें काल्पनिक ही माना जायेगा ना ।“ मैने कहा .हमें पता नहीं था पन्डित राम मिलन हमारी बातें बहुत ध्यान से सुन रहे थे । मेरी बात सुनकर वे अचानक उखड़ गये ..”तुम सब अधर्मी लोग हो, पापी हो ,राम नहीं हुए थे कृष्ण नही हुए थे ,भगवानो का मजाक उड़ाते हो, तुम लोगों को नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी । हम समझ गये कि राम मिलन भैया के पूर्वज उनके भीतर जागृत हो गये हैं और अब वे शास्त्रार्थ करने पर उतर आये हैं । मैने धीर से अजय को चुप रहने का इशारा किया । वैसे भी हम लोग इस बीच दंगवाड़ा तक पहुंच गये थे और चाय की तलब अपने शबाब पर थी । किसी भी अप्रिय वार्तलाप में संलग्न होकर हम लोग अपनी शाम बर्बाद नही करना चाहते थे । अशोक हम सभी का आशय समझ गया और उसने वाकयुद्ध का पटाक्षेप करते हुए कहा “राम हुए हों या ना हुए हों, लेकिन हमारे बाल बच्चे बड़े होकर यह ज़रूर कहेंगे कि एक राममिलन ताउ ज़रूर हुए थे जो राम जी के बहुत बड़े भक्त थे ।“ अपनी प्रशंसा सुनकर राम मिलन भैया प्रसन्न हो गये और उनका आक्रोश हम लोगो के ठहाकों में गुम हो गया ।
(छवि गूगल से साभार)
आपका -शरद कोकास