सोमवार, 13 जुलाई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-चौथा दिन-चार


13 - हाथ धोये हत्यारा पाँव धोये पापी 

             दंगवाड़ा की पहली यात्रा समाप्त कर अभी हमने टेंट में कदम रखा ही था कि बारिश तेज़ हो गई । कपड़े बदलकर हम लोग भोजन कक्ष में पहुँचे । शिविर का नियम था कि यहाँ शाम का भोजन जल्दी ही कर लेना होता था । वैसे भी ठण्ड के दिन थे और ज़्यादा देर करना उचित नहीं था । थाली सामने आते ही डॉ.वाकणकर ने ऋग्वेद का मंत्र पढ़ना प्रारम्भ किया ...ओम सहना ववतु, सहनौ भुनक्तु,माविद विषा वहहि , सहवीर्यम करवा वहहि , तेजस्विना वधीत मस्तु..। भूख ज़ोरों पर थी लेकिन सर का आदेश था बिना श्लोक पढ़े कोई भी निवाला मुँह में नहीं डालेगा । खैर, ओम शांति शांति कहते तक जीभ के साथ दाँतों ने अपना काम शुरू कर दिया था ।

            अचानक दाल की कटोरी में पानी की एक बून्द टपकी । ऊपर देखा तो टेंट की छत पूरी तरह गीली हो चुकी थी और पानी टपकना शुरू हो चुका था । फिर क्या था, हमारी पंगत तितर-बितर हो गई और जिसको जहाँ जगह मिली खड़े होकर बुफे स्टाइल में भोजन करने लगा । हमें अब पता चला कि दाल पतली होने का क्या अर्थ होता है । भोजन करते हुए भी हमें अपने बिस्तरों की चिंता हो रही थी अत: जल्दी-जल्दी भोजन सम्पन्न कर हम लोग अपने टेंट में पहुंचे । गनीमत हमारे तम्बुओं की छत का कपड़ा मज़बूत था और पानी टपकने का कोई चांस नहीं था ।

            यह फरवरी का मध्य था । दिन के समय तापमान अधिक रहता था और शाम होते ही वातावरण में ठंडक बढ़ जाती थी । लेकिन बारिश की वज़ह से आज ठंड कुछ अधिक ही बढ़ गई थी । रज़ाई को लेकर फिर रवीन्द्र से मेरी बहस हो गई, लेकिन हम लोगों ने साम्यवादी तरीक़े से उच्च वर्ग और निम्न वर्ग मिलकर मध्यवर्ग बनने का समझौता कर लिया और दोनों एक ही रज़ाई में घुस गए  । बाहर तेज़ बारिश और भीतर तेज़ ठंड, हम लोग किसी अज्ञात आशंका से भयभीत थे और सोच रहे थे कि अगर पानी तम्बू के भीतर गुस आया तो क्या करेंगे ..नींद वैसे भी नहीं आनी थी और इस भय की बार बार चर्चा करने में भी कोई अर्थ न था ।

            मैंने टाईम पास करने के लिए एक प्रश्न उछाला “अच्छा बताओ यार, इंसान के पास जब रज़ाई नहीं होती थी तब ठंड में उसे नींद कैसे आती होगी ? रवीन्द्र हँसने लगा “ वह अपनी गुफा में आग जलाकर सोता था और क्या ।“ “ लेकिन उससे भी पहले जब उसे गुफा का ज्ञान नहीं था और आग की खोज भी नहीं हुई थी तब ? “ मैंने बाल की खाल निकालनी शुरू की । “ तब क्या ? ” रवीन्द्र ने कहा “सुबह तक मर जाता होगा बेचारा ।‘ “ अभी भी हम अखबारों में नहीं पढ़ते ठंड से इतने लोग मरे, बारिश से इतने लोग मरे ।“ अशोक ने अपनी बेहतरीन टिप्पणी दी ।

            “ इसका मतलब तो यही हुआ ना कि हम लोग अभी भी प्रारम्भिक विकास की अवस्था से आगे नहीं बढ़े हैं ।" मैंने कहा । " लेकिन यह बताओ यार, शीत वर्षा और लू से ग़रीब  लोग ही क्यों मरते हैं ? “ अशोक का सवाल मुझसे था । “ सीधा सा उत्तर है यार ।“ मैंने कहा “ मनुष्य का विकास तो हुआ लेकिन साथ साथ सम्पत्ति के आधार पर उसका वर्गों में विभाजन भी होता गया, कुछ लोग जिन्होंने सम्पति बटोरनी शुरू कर दी थी ,बहुत अधिक सम्पन्न हो गए और कुछ लोग निरंतर ग़रीब होते गए । तमाम अविष्कारों और सुविधाओं का लाभ सम्पन्न मनुष्यों को ही मिलना था सो अभी भी मिल रहा है । प्राकृतिक विपदाओं से निपटने के लिए अमीरों के पास ढेर सारे साधन होते हैं बड़ी बड़ी हवेलियाँ ,खाने-पीने का भरपूर सामान । ग़रीबों के पास क्या होता है ? देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनके पास सर छुपाने के लिए छत तक  नहीं है । लाखों लोग फुटपाथ पर जीते हैं वहाँ उनकी कई पीढियां निकल जाती हैं । उन्हें ठंड ,कड़ी धूप और बारिश का सामना करना पड़ता है । ग़रीब  की हालत तो सदा से ऐसी ही रही है और ऐसी ही रहेगी, सो वह तो मरेगा ही ।“

            " हाँ यार,वाकई दया आती है ऐसे लोगों के बारे में सुनकर " अजय ने कहा ।" ऐसे लोगों के लिए सरकार को कुछ इंतजाम करने चाहिए ।" "सरकार करती तो है इंतजाम " अशोक ने कहा " हमारी पार्टी ने बहुत काम किये हैं इंदिरा जी ने तो नारा ही दिया है " गरीबी हटाओ " अशोक के भीतर का एन.एस.यू.आई. का कार्यकर्ता बोलने लगा था । " भाई,सिर्फ गरीबी उन्मूलन के नारे देने से क्या होता है, क्रियान्वयन के लिए व्यवस्था भी करनी होती है ।" मैंने कहा ।

            अशोक ने तुरंत प्रतिवाद किया " हो तो रही है व्यवस्था ,अभी देश को आज़ाद हुए ही कितने साल हुए हैं । नेहरु जी की तो समाजवादी सोच ही थी उसके हिसाब से धीरे धीरे काम होगा । अब इतना बड़ा देश है कुछ समय तो लगेगा ही ।" " कितना समय लगेगा ?" मैंने कहा " जब पानी सर से ऊपर हो जायेगा । अभी तो देश में ग़रीब लोग मर रहे हैं और उन्हें सिर्फ आश्वासन दिया जा रहा है विकास सिर्फ़ अमीरों का हो रहा है और विकास के नाम पर ग़रीबों की  अवहेलना की जा रही है । सरकारी योजनाओं में घोर भ्रष्टाचार है । "

            अशोक ने कहा " अब योजनायें तो बनती ही ग़रीबों के लिए है लेकिन उसका लाभ वे नहीं ले पाते शिक्षा की कमी है , समझ की कमी है सो इसका फायदा यह इलीट वर्ग उठाता है ।" " अब आये  ना तुम लाइन पर ।" मैंने कहा " तो इसका ज़िम्मेदार कौन है ? सरकार को चाहिए कि उन्हें शिक्षित करे ताकि वे अपनी बदतर हालत को समझकर बेहतर जीवन की मांग कर सकें लेकिन यहाँ तो अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर जनता के विद्रोह की मानसिकता को ही समाप्त कर दिया गया है ।"

            “मतलब हमारे यहाँ क्रांति-व्रांति का कोई चांस नहीं है ?“ अशोक ने पूछा । “क्रांति और हमारे यहाँ ?” मैंने कहा “भईये, हमारे देश के लोगों के दिमागों को तो धर्म,परम्परा, ऊँच -नीच, जात-पात, मोक्ष,लोक-परलोक, पाप-पुण्य आदि के नाम पर बरसों पहले गुलाम कर दिया गया है । ये पहले अपने दिमाग की गुलामी से तो मुक्त हो जाएँ तब ही क्रांति की बात सोच सकेंगे ।“

            ”तो इन्हें इस गुलामी से मुक्ति कौन दिलवायेगा ? फिर किसी अवतार-ववतार की सम्भावना है क्या ? रवीन्द्र ने कहा । “देखो भाई ...” मैंने कहा “ ये अवतार वगैरह तो सब उसी चालाक मनुष्य के दिमाग की कल्पना है जिसने आम आदमी के दिमागों को गुलाम बनाया है । उनके वंशज अभी भी यहाँ मौजूद हैं जो सत्ता में ऊँचे -ऊँचे पदों पर विराजमान हैं । यह लोग इस वर्ग भेद को बनाए रखना चाहते हैं ताकि वे जनता पर राज कर सकें जनतंत्र तो यहाँ बस नाम का है । वास्तव में यहाँ राजतन्त्र ही है जिसे अब पूँजीवाद पोषित कर रहा है राजसत्ता,धर्मसत्ता और अर्थसत्ता मिलकर काम कर रही है । वैसे भी यहाँ अब कोई मसीहा नहीं आनेवाला । इस गुलामी से मुक्त होने के लिए  मनुष्य को खुद प्रयास करना होगा । लेकिन सबसे पहले उसे यह अहसास दिलाना ज़रूरी है कि वह दिमागी तौर पर गुलाम है । अब्राहम लिंकन ने कहा है ‘ गुलाम को उसकी गुलामी का अहसास दिला दो तो वह खुद बाग़ी हो जाता है ।" मेरी बात पर राम मिलन भैया ने ज़ोरदार ताली बजाई।

            “क्यों रे दुष्टों अभी तक सोये नहीं “ टेंट के बाहर से डॉ.वाकणकर की कड़क आवाज़ से हम लोगों की बातचीत पर विराम लग गया । “ बस सर सोने ही जा रहे हैं । “ अजय ने कहा । रवींद्र खड़ा हुआ और उसने  टेंट का एक हिस्सा खोल दिया । सर एक चोगे जैसी बरसाती ओढ़े हुए थे । उन्होंने  भीतर झाँका और पूछा “ क्यों ..पानी-वानी तो अन्दर नहीं आ रहा है ? हमने कहा “ अभी तक तो नहीं आया है सर, हमने चारों ओर बोरों से पैकिंग कर दी है । लेकिन आप अभी तक नहीं सोये ?  सर ने जवाब दिया “ सोऊँगा, अभी जरा सब अंटिक्विटीज़ तो सम्भाल कर रख दूँ , अन पानी का क्या भरोसा । सब मिहनत पर पानी फिर गया तो । “

            “सर, ऐसे ही पानी गिरता रहा तो कल काम हो पायेगा क्या ? ” अजय ने पूछा “ क्यों कल क्या ससुराल जाना है ? “ सर ने उसे छेड़ते हुए कहा उन्हें पता था, अजय का विवाह पिछले दिनों ही हुआ था । अपनी बात से उपजी मुस्कराहट के बाद तुरंत गंभीर होते हुए उन्होंने कहा ..“ कल की चिंता तो मुझे भी है । खैर तुम लोग फिकर मत करो अभी सो जाओ ।“ हमें पता था, डॉ.वाकणकर एक ऐसे पुरातत्ववेत्ता हैं जो ज़मीन के गर्भ से जन्म लेने वाले अवशेषों की देखभाल अपने बच्चों की तरह करते हैं । वे सोने से पहले सभी अवशेषों को ढांककर रखेंगे, ट्रेंच पर जाकर देखेंगे कि वहाँ बारिश से कोई नुकसान तो नहीं हो रहा है ।

            यह बारिश का मौसम नहीं था फिर भी रात भर रुक रुक कर बारिश होती रही । सर्द हवाओं से तम्बू किसी बारिश में भीगे हुए बच्चे की तरह काँपता रहा । हम अपनी गर्म रज़ाइयों में, माँ  की गोद में दुबके बच्चे की तरह आराम से सोते रहे । बीच में नींद खुलती तो बारिश की सिसकियाँ सुनाई देतीं । थोडा बहुत पानी तम्बू के भीतर भी आ रहा था, लेकिन अँधेरे में कुछ नज़र नहीं आ रहा था । हम लोग मुँह ढांक कर सोते रहे । सुबह देखा तो रज़ाईयों  का ऊपरी हिस्सा और गद्दों का बाहरी हिस्सा गीला हो चुका था । अजय ने चीख कर कहा “अरे वा ! मैं कह रहा था ना आज काम नहीं हो सकेगा । “ मैंने कहा “ज़्यादा खुश मत हो वैसे भी यहाँ भाभी नहीं है जो तुम्हें इस बरसात में भजिया तल तल कर दे । “ पत्नी की याद आते ही बेचारा अजय उदास हो गया । इतने में दूर से छाता लगाये डॉ. वाकणकर आते हुए दिखाई दिए  । हमें पता था वे मुँह अन्धेरे ही ट्रेंच की स्थिति देखने निकल गए  होंगे ।

            " देखो रवीन्द्र " मैंने कहा " गुरुदेव को निखातों की कितनी चिंता है रात भर से बारिश हो रही है । वे रात में भी ट्रेंच को तारपोलीन से ढंकने गए थे और अभी फिर सुबह सुबह उनकी हालत देखने चले गए पता नहीं रात में ठीक से सोये भी होंगे या नहीं । " रवींद्र ने कहा " हाँ हो सकता है । एक पुरातत्ववेत्ता की सबसे बड़ी चिंता यही होती है कि ऐसी विपरीत परिस्थितियों में निखात में स्थित प्राचीन अवशेषों को कैसे बचाया जाए। सामान्यतः यह टीलों के प्रकार पर होता है कि उनकी सुरक्षा कैसे की जाए । आमतौर पर जो टीले ऊंचाई पर होते हैं और जिनका क्षेत्र चट्टानी होता है वहाँ मिटटी खिसकने की गुंजाईश होती है क्योंकि चट्टानें बारिश के कारण ढीली हो जाती हैं । ज़्यादा बारिश हो तो टीले की मिट्टी गीली होकर नीचे की ओर ढह जाती है, निखातों में पानी भर जाता है फिर उसे पम्प से निकालना पड़ता है । लेकिन कीचड़ और गाद के कारण अवशेषों की स्थिति ख़राब हो जाती है ।"

            "हाँ " मैंने कहा " सबसे अधिक दुविधा उन अवशेषों को लेकर होती है जो निखात के ढह जाने के कारण अपने मूल स्तर से किसी और स्तर में पहुँच जाते हैं जैसे इल्तूत मिश का टंका पहुँच जाता है समुद्रगुप्त की जेब में और हुएनसांग के झोले से टपकी हुई सुपारी उछलकर पहुँच जाती है जहाँगीर के पानदान में । मतलब एक काल के अवशेष जिस सतह पर मिलते हैं वहाँ से खिसक कर वे दूसरे काल कि सतह में पहुँच जाते हैं । फिर उनका कालक्रम निर्धारित करना बहुत कठिन हो जाता है । मैदानी क्षेत्रों में बनी निखातों के साथ यह परेशानी होती है कि यदि वे सामान्य सतह से निचले स्तर पर खोदी गईं हो तो जाने कहाँ कहाँ से पानी आकर उनमे भर जाता है और कभी कभी तो वे पूरी की पूरी डूब जाती हैं ऐसी स्थिति में पानी कम होने और उनके सूखने का इंतजार करना होता है ।

            रवींद्र ने कहा " वैसे भी सामान्य रूप से भी ट्रेंच की सुरक्षा करनी ही होती है । काम समाप्त हो जाने के बाद उसके चारों ओर एक फेंसिंग लगा दी जाती है ताकि कोई पशु या मनुष्य उस गड्ढे में न गिर जाए । किसी जानवर के गिरने से अवशेषों की भी टूट-फूट कि संभावना रहती है । पेड़ों के नीचे या जंगलों में खोदी गई निखातों में कचरा जमा होने या पेड़ की डाल टूटकर गिर जाने की संभावना होती है । वे लोग जो बार बार संस्कृति बचाने की दुहाई देते हैं , अवशेषों को बचाने की इस व्यावहारिक कठिनाई से नावाकिफ़ होते हैं ।"

            इतनी देर में सर हमारे टेंट के करीब आ गए थे । हमें जागा हुआ देखकर वे खुश हो गए  “ अरे वा ! जाग गए सज्जनों, चलो आज पास में फुलान है वहाँ चलते हैं । आज तो वैसे भी काम तो नहीं हो सकेगा ।" अजय ने तपाक से कहा .." हाँ सर, रात में बहुत तेज़ बारिश हुई है ,अभी भी बूंदा-बांदी हो रही है , यह बारिश और भी तेज़ हो सकती है ।" सर ने अपने चश्मे के ऊपर से उसे देखा और मंद मंद मुस्कुराए .."बारिश का क्या है ,होगी तो काम बंद कर देंगे , लेकिन आज गुरुवार है ना गाँव में हाट लगने के कारण आज मज़दूरों की छुट्टी है ।“ अब हमें पता चला काम बन्द होने का असली कारण गुरूवार है ना कि बारिश । वैसे भी एक पुरातत्ववेत्ता के लिए कभी कोई छुट्टी नहीं होती  “आलस क्या कर रहे हो ..चलो जल्दी नहाओ धो और तैयार हो जाओ, नाश्ता करके  चलते हैं । “ वाकणकर सर ने हमारी पलटन को आदेश दिया ।

            अब असली समस्या यह थी कि इतनी ठंड में नहाए  कौन । अशोक त्रिवेदी ने कहा “ भाई मैं तो नहाने से रहा उसके बदले मैं नहाने के मंत्र का जाप कर लेता हूँ “ और वह पंडितों वाली स्टाइल में शुरू हो गया “ ओम हाथ धोए  हत्यारा, ओम पाँव धोए पापी, ओम नहाये धोए सो बेईमान, ओम पूजा-पाठ करे सो दुर्गुण की खान ओम...ओम..छोड़ पानी... “ उसकी इस अदा पर हम लोग हँसते हँसते लोट-पोट हो गए  । लेकिन हँसने से फायदा यह हुआ कि शरीर में थोड़ी गर्मी आ गई । अजय ने कहा “ भई अपना भी नहाना कैंसल । उसके बदले अपन नहाने की गोली खा लेते हैं । स्नान पर्व पर यह दूसरा चुटकला था । बहर हाल रवीन्द्र ने कहा “ में तो भाई बिगेर नहाये नहीं रह सकता ।“ रवीन्द्र का साथ तो मुझे देना ही था सो हम दोनों ने अपने वस्त्र लिए  और चम्बल-स्नान करने चल दिये । बाक़ी मित्र भी हमारे पीछे पीछे आ गए आख़िर सुबह के कुछ ज़रूरी काम तो निपटाने ही थे ।


आपका शरद कोकास

4 टिप्‍पणियां:

  1. हां भई, नहाना तपस्या है।

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  2. नहाने की गोली तो पता थी मगर मंत्र पहली बार पढ रहा हूं।सच है पुरातात्विक धरोहरो का संरक्षण आसान नही है।इसमे आदरणीय वाकणकर साब जैसे लोगो के मज़बूत इरादे ही काम आते है

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  3. "सर्द हवाओं से तम्बू किसी बारिश में भीगे हुए बच्चे की तरह काँपता रहा । हम अपनी गर्म रज़ाइयों में ,माँ की गोद में दुबके बच्चे की तरह आराम से सोते रहे ।"


    यह तो काव्य है। किसी उर्दूदाँ को दे दो तो ग़जल के दो शेर बना दे। कितनी ही ऐसी लाइनें हम ब्लॉगर यूँ ही ढकेल देते हैं;) और लोग कहते हैं कि ब्लॉग में साहित्य नहीं है।

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