शनिवार, 16 मई 2026

12.👺 कोई मुझसा दबंगर न रश्के- क़मर 👺


इस नौटंकी में सुल्ताना डाकू की एक प्रेमिका भी है का नाम है उसका... हाँ नीलकमल...
जिससे वह कहता है कि हम कंगाल नहीं है

📖 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📖

✍ *शरद कोकास* ✍

*आज चौथे दिन की शाम* यह तमाम छात्र गाँव पहुँचे हुए हैं और वहाँ उनकी एक नौटंकी पार्टी से मुलाक़ात हो गई है । चाय पीने के बाद मटरगश्ती करते हुए यह छात्र वहाँ पहुंचते हैं और फिर शुरू होती है नौटंकी कला पर बात ..इसे ज़रूर पढ़िए .. इसमें नौटंकी के संवाद भी हैं .. मज़ा आएगा ..

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1⃣2⃣ *भाग-बारह* 1⃣2⃣

👺 *कोई मुझसा दबंगर न रश्के- क़मर* 👺

बिलकुल गाँव जैसा गाँव था दंगवाड़ा । पतली पतली संकरी गलियाँ, बेतरतीब बने हुए मकान, कुँओं के पास कीचड़ से भरे हुए डबरे , झोपड़ियों के छप्पर इतने आगे तक झुके हुए जैसे चरण स्पर्श करने आ रहे हों, अगर देखकर नहीं चलो तो सर टकरा जाए । गलियों में खेलते हुए बच्चे हम लोगों को उचटती निगाह से देखते और फिर अपने खेल में लग जाते । एक बूढ़ा ओसारे में बीड़ी के कश खींचता हुआ आसमान में छाये बादलों की ओर देख रहा था । मुझे वह किसी भविष्यवक्ता की तरह लगा ।

हम लोगों ने उस बूढ़े से पूछा “कईं बासाब, चाय की दुकान कठे हे ? ”उसने गाँव के बाहर जाने वाली सड़क की ओर इशारा किया और फिर बीड़ी पीने में मग्न हो गया । बूढ़े के बताये रास्ते पर हम चलते चले गए लेकिन दुकान कहीं नहीं दिखी । हमें लगा बूढ़े ने कहीं बेवकूफ तो नहीं बना दिया, फिर सोचा नहीं ..ऐसा तो अक्सर शहरों में बदमाश बच्चे करते हैं यह बूढ़ा बेचारा क्यों हमसे मज़ाक करेगा । आखिर में हम लोग गाँव के बाहर इंगोरिया वाली पक्की सड़क पर आ गए ।

गाँवों में अक्सर इस तरह की दुकानें गाँव के बाहर पक्की सड़क पर ही होती हैं ताकि एक शहर से दूसरे शहर आने जाने वालों से भी उनका व्यवसाय चल सके । नज़र घुमाई तो घास-फूस के एक छप्पर के नीचे चाय-पान की एक गुमटी नज़र आई । एक टूटी हुई टेबल जिसका एक पांव टूटा हुआ था और जिसे दो ईटें सहारा दे रही थी अपने सर पर एक पुराना सा स्टोव संभाले हुआ था । यह स्टोव धुएँ से काले हो चुके एक टीन के परदे के भीतर खामोश पड़ा हुआ था । स्टोव देखकर ही हम लोग समझ गए कि हमारी चाय की तलब यहाँ दूर हो सकती है ।

हम लोगों ने पहुँचते ही ऑर्डर किया “भई जल्दी से चाय पिलाओ ।” और पटिये पर बैठ गए । ‘चाय कम पान’ की दुकान वाले ने पान पर चूना लगाते हुए जवाब दिया “दूध खतम हो गया है साहब ।” यह तो आसमान से गिरकर खजूर पर लटकने जैसी स्थिति थी । इतनी दूर से चाय की तलाश में आए और यहाँ दूध नदारद । अजय ने आगे बढ़कर कहा “ कोई बात नहीं, दूध कहाँ मिलता है बताओ, हम ले आते हैं ।” “अभी नहीं मिलेगा साब, अभी टेम नहीं हुआ है ।“ चाय वाले ने बेरुखी से जवाब दिया । “ऐसे कैसे नहीं मिलेगा तुम ख़ाली गंजी तो दो ।” चाय वाला मुस्कुराया जैसे उसे हम पर विश्वास ना हो फिर गंजी पकड़ाते हुए कहा “लो देख लो साब वो सामने वाले घर में मिलता है मिल जाए तो अच्छा है ।“

चाय वाले ने जिस घर की ओर संकेत किया था हम लोग उस घर के दरवाज़े तक जा पहुँचे । दालान में एक बुज़ुर्ग सा व्यक्ति बैठा हुआ था और हुक्का गुड़गुड़ा रहा था । हमने उससे जयरामजी की और पूछा “दूध मिलेगा ?” उस बुज़ुर्ग ने कहा “दूध तो कोनी ।“ हम शहरी लोगों को देखकर वह कुछ समझने की कोशिश करे इससे पहले रवींद्र ने कहा “ ऐसा है बासाब , हम लोग छात्र हैं और उज्जैन से आये हैं । दूध वो सामने चाय की दुकानवाले को चाहिये, हमें चाय पीनी है लेकिन उसके पास दूध नहीं है ,उसने बताया कि आपके यहाँ मिल जाएगा । ” मुझे लगा शायद चायवाले के नाम से दूध अवश्य मिल जाएगा ।

“ऐसे बोलो ना साहब, चाय पीना है ..लेकिन दूध को तो अभी टेम है ।” उसने कहा । इससे पहले कि हम उसे अपनी भयानक तलब के बारे में समझा पाते उसने दालान में पड़ी बेंच पर बैठने का इशारा करते हुए कहा " तो साहब बैठिये न हम चाय पिलाते हैं ।" फिर उसने भीतर की ओर आवाज़ लगाई “बेटा जरा चा बनाना ।” हम लोगों की तो बाछें खिल गईं । हम लोगों ने अपना परिचय देने के साथ साथ उसके गाँव की तारीफ भी करनी शुरू कर दी । हाँलाकि वह सब समझ रहा था कि ये शहर के छोरे सिर्फ अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए उसकी तारीफ कर रहे हैं ।

खैर बातचीत के बीच चाय भी आ गई और हमने पी भी ली और चाय लाने वाली उसकी बेटी के बारे में यह जानकर कि वो स्कूल नहीं जाती है उसके बाप को सलाह भी दे डाली कि लड़कियों को पढ़ाना चाहिये, एक लड़की को पढ़ाने का अर्थ एक परिवार को पढ़ाना होता है, वगैरह वगैरह । उसके बाप ने सिर्फ इतना कहा कि ” बेटी भी काम पर जाती है तभी घर चलता है साब । ग़रीबी हमारी मजबूरी है ।” उसके प्रश्न का हमारे पास उत्तर नहीं था सो हम लोग चलने के लिए उठ खड़े हुए “ अच्छा भाई चलें, राम राम ।”

बुज़ुर्गवार के घर से बाहर निकलते हुए राम मिलन भैया ने अपनी जेब से पर्स निकाला और पांच का एक नोट उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा “लो भैया ।” वह ग्रामीण हाथ जोड़कर खड़ा हो गया “अरे मालिक आप लोग तो पहुना हो आप से कैसे पैसे ले सकता हूँ ।“ राम मिलन उसकी ग़रीबी से काफी द्रवित हो गए थे “कोई बात नहीं दूध के तो ले लो । “नई साब” उसने कहा “ दूध तो घर का ही बचा था उसके काहे के पैसे ?” हम लोग निरुत्तर थे और सोच रहे थे काहे हम अब तक इस गाँव को सिटी कहकर इसका अपमान कर रहे थे ।

गाँव की आत्मीयता और शहर की स्वार्थ से भरी ज़िन्दगी के बारे में अपना फलसफा बघारते हुए हम लोग बाहर निकले । “अब क्या प्रोग्राम है ?” रवीन्द्र ने एक सार्वजनिक सवाल किया । " चलो पहले सिगरेट पी जाए ।" अशोक ने कहा । उसे चाय के साथ सिगरेट पीने की आदत थी और बगैर सिगरेट के उसका दिमाग़ काम नहीं कर रहा था । उसने उसी चाय की दुकान की ओर इशारा किया उसे मालूम था दूध वहाँ भले न हो लेकिन सिगरेट ज़रूर मिल जायेगी ।

अशोक जितनी देर सिगरेट पीता रहा हम लोग दो खूंटों पर टिके दुकान के पटिये पर बैठकर दुकान वाले से गपियाते रहे । वहाँ खड़े गाँव के लोगों की बातचीत से हमें यह मालूम हुआ कि गाँव में इन दिनों यू.पी. से कोई नौटंकी पार्टी आई है और गाँव के मध्य में चौक पर उनका डेरा है । “चलो वहाँ चलते हैं । “ मैंने कहा ।“लेकिन अभी वहाँ क्या मिलेगा नौटंकी तो रात में होगी ।” अजय ने कहा । नौटंकी का नाम सुनकर राम मिलन भैया की आँखों में चमक आ गई थी । “चलो तो देखत हैं …का खेला है आज ।” उन्होंने कहा । “ चलो जैसी पंचों की राय ।“ मैंने कहा और हम लोग पूछते हुए उस दिशा में बढ़ गए ।

जैसा कि अक्सर गाँवों में होता है इस गाँव के बीचों बीच भी एक चौराहा था जहाँ एक ओर एक मंच बना था । हमने सामने पड़े पर्दे को ज़रा सा उठाया और भीतर प्रवेश कर गए । भीतर की ओर मंच बहुत सुसज्जित था । उस पर रंगबिरंगे पर्दे लगे थे जिन पर अनेक आकृतियाँ बनी हुई थीं ..किसी पर बडा सा मोर, किसी पर बडा सा पेड़ अंकित था । वहीं कुर्सी डाले मैनेजर टाइप का एक व्यक्ति बैठा था । हमें देखकर वह चौंक गया । फिर हमने उसे अपने बारे में बताते हुए उससे पता किया तो पता चला कि नौटंकी शुरू होने का समय रात नौ बजे के बाद है और उस वक़्त शाम के लगभग सात बजे थे ।

हमने सोचा चलो बातचीत कर टाइमपास किया जाए । ‘’ कौन कौन से खेल करते हो आप लोग ?‘’ मैंने नौटंकी वाले से पूछा .. “अरे भैया सब खेल करते है..” उसने कहा “राजा हरिश्चंन्द्र, सुल्ताना डाकू, गुल बकावली, सब्जपरी और गुलफाम ।” यहाँ कौन सा खेल लेकर आए हो ?” मैंने फिर पूछा । उसने बताया ‘’यहाँ तो भैया, राजा हरिश्चंन्द्र खेल रहे हैं ऊ भी बहुते लम्बा खेला है । फिर गाँव में तो यही ज्यादा पसंद किया जाता है ।“

हम लोग नौटंकी कला के विषय में ज़्यादा कुछ नहीं जानते थे । वैसे भी हम लोग मध्यप्रदेश के रहने वाले हैं और यहाँ की लोक कलाएं भिन्न थीं । नौटंकी वस्तुतः उत्तरप्रदेश का एक कलारूप है । हम लोगों ने बचपन में उत्तर प्रदेश की रामलीला पार्टियों द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली रामलीला अवश्य देखी थी सो उसके बारे में थोडा बहुत जानते थे । नौटंकी के मैनेजर द्वारा बताये गए नाटकों के यह नाम हमें बहुत रोचक लगे और उनके बारे में विस्तार से जानने कि जिज्ञासा बढ़ गई ।

अचानक मुझे याद आया कि हमारे राममिलन भैया तो इलाहाबाद उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं और वे अवश्य नौटंकी के बारे में जानते होंगे । लेकिन राममिलन भैया इस समय दूसरे ही मूड में थे सो उनसे यह ज्ञान उगलवाना ज़रा कठिन था ।राममिलन भैया नौटंकी के मैनेजर से बात करने में मशगूल थे । मैंने उनका ध्यान आकर्षित करने के लिए किशोर भैया से कहा " किशोर भैया अपने राममिलन भैया तो यू पी के ही हैं और बहुत बड़े स्कॉलर हैं, उन्हें नौटंकी के इतिहास के बारे में अवश्य जानकारी होगी ।

किशोर भाई हमारा संकेत समझ गए । उन्होंने राममिलन भैया को चने के झाड पर चढाते हुए कहा "राममिलन भैया, हम लोग तो मध्यप्रदेश के मूल निवासी हैं न राम के बारे में ठीक से जानते हैं न रामलीला के बारे में, नौटंकी क्या होती है इसका भी हमें पता नहीं । आप तो यू पी के विद्वान हैं आपको अवश्य पता होगा ।" यू पी का नाम आते ही राममिलन का ध्यान हमारी ओर आकृष्ट हो गया । वे अपनी प्रशंसा सुनकर गदगद हो गए । नौटंकी का मैनेजर भी हमारी इस बात से काफी प्रभावित हुआ ।
राममिलन भैया ने अपनी कमीज के कलर के बटन को थोडा टाइट किया और प्रोफ़ेसर के अंदाज़ में कहना शुरू किया "भाइयों बेसिकली यह यू पी की कला भी नहीं है । सबसे पहले मुल्तान में जो आज पकिस्तान में है 'नौटंकी शहजादी' नामका एक नाटक खेला गया ..उ उ नहीं... 'शहजादी नौटंकी' नाम था उसका । यह एक नृत्य नाटक था जिसमें शहजादी का नामई 'नौटंकी' था । उसीके नाम पर आगे चलकर इस कला का नाम नौटंकी हुआ । दरअसल यह नौटंकी स्वांग भरने की एक कला है । इसमें कलाकार तरह तरह के ऐतिहासिक और पौराणिक पात्रों के स्वांग रचते हैं । हालाँकि स्वांग भी अपने आप में एक कला है लेकिन स्वांग और नौटंकी में फर्क यह होता है कि स्वांग ज्यादतर धार्मिक विषयों पर आधारित होते हैं और नौटंकी का विषय प्रेम कथाएँ होती हैं । जैसे लैला मजनू, शिरी फरहाद , गुले गुलफाम आदि । हालाँकि अब तो सबै मिक्चर हो गया है और जो जनता चाहती है उसकी डिमांड पर प्रस्तुत करते हैं ।"

रवींद्र को लगा राममिलन बस इतने में ही न टरका दें सो उसने उनसे सवाल किया "राममिलन भैया, तो फिर इसमें जो कहानियां बताई जाती हैं वे सच्ची कहानियां होती हैं कि काल्पनिक ?" राममिलन भैया अब तक खुद को नौटंकी कला का विशेषज्ञ समझने लगे थे सो उन्होंने जवाब दिया "भाई, इसमें कुछ तो सच्ची कहानियाँ होती हैं, जैसे कि आल्हा- उदल, यह बुंदेलखंड की लोककथा है । सुल्ताना डाकू नाम की नौटंकी में उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में हुए एक डाकू की सच्ची कहानी है हालाँकि उसमे भी प्रेमकथा मुख्य है फिर भी थोड़ा बहुत तो झूठ लोककथाओं में होता ही है ।

अजय ने कहा "मतलब इसमें नाटकों के विषय सिर्फ प्रेम कहानियां होती हैं ?" राममिलन भैया ने कहा "नहीं ऐसा भी नहीं है । नौटंकी के विषय समय समय पर बदले भी हैं । जैसे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बहुत सारे खेल देशभक्ति की भावना पर रचे गए । गाँव गाँव में स्वाधीनता की अलख जगाने का काम इन कलाकारों ने किया । आजकल तो समसामयिक विषय भी यह लोग अपने नाटकों में शामिल करने लगे हैं, जैसे दहेज़ प्रथा के खिलाफ, निरक्षरता उन्मूलन ,हिन्दू मुस्लिम एकता आदि आदि ।
"लेकिन भैया..." अजय ने शंका ज़ाहिर की "नौटंकी को तो अच्छा नहीं समझा जाता है । हम लोग भी बातचीत में अक्सर कहते हैं 'ज्यादा नाटक नौटंकी मत करो' ऐसा क्यों कहते हैं ?" राममिलन भैया तनिक सोचने लगे.." भाई ऐसा है कि नौटंकी का विषय भले जागरूकता का रहा हो लेकिन उद्देश्य तो विशुद्ध मनोरंजन ही होता है । प्रेमकथाओं पर आधारित नौटंकियों में कालांतर में कुछ अश्लील तत्व भी जुड़ गए । हालाँकि शुरू में इसमें लडकियाँ नहीं होती थीं लेकिन कुछ नौटंकी वालों ने अपने नाटकों में लडकियाँ रखीं तो छेड़छाड़, भद्दे इशारे और पैसे लुटाना जैसे काम शुरू हो गए ।

राममिलन भैया इतना कहकर रुके । फिर नौटंकी के मैनेजर पर एक नज़र डालते हुए कहा "अब ऐसा है ना कि नौटंकी के संचालक सब पर तो नज़र नहीं रख सकते इसलिए ऊँच - नीच भी हो जाती थी सो नौटंकी बदनाम हो गई । फिर नौटंकी वाले बहुत ग़रीब भी होते थे और यही उनकी रोजी-रोटी थी सो नौटंकी में भीड़ जुटाने के लिए उन्होंने नाच गाने , भद्दे शारीरिक क्रियाकलाप जैसे कारकों को बढ़ावा देना शुरू किया ताकि ज़्यादा भीड़ जुटे और वे ज़्यादा पैसे कमायें । अब इसे देखने के लिए समाज के निचले तबके के लोग ज़्यादा जाते थे, इसलिए सभ्य समाज में इसे बुरा माना गया । उन लोगों के लिए तो वैसे भी बड़े बड़े नाटक और शास्त्रीय संगीत जैसे कार्यक्रम होते थे ।

इतने में मेरे भीतर का कवि जाग गया था । मैंने कहा "राममिलन भैया, मैंने सुना है कि नौटंकी में पूरे संवाद कविता में होते हैं...।" राममिलन भैया ने मेरी बात पूरी होने से पहले ही तपाक से कहा "अरे काहे की कविता, सब तुकबन्दी होती है । हमारे देश की जनता को तुकबंदी और कविता में अंतर कहाँ मालूम है ।उन्हें तुकबंदी में ही मज़ा आता है । पात्रों को भी इस तरह डायलाग रटने में सुविधा रहती है । इसलिए इसमें साधारण बोलचाल की भाषा में संवाद रहते हैं । पात्र आपस में कविता जैसी तुकबंदी में बात करते हैं, अपनी भावनाएं प्रकट करते हैं । इससे ग्रामीण जनता को समझने में आसानी होती है हालाँकि नौटंकी में उर्दू फारसी के शब्दों का प्रयोग भी बहुतायत में होता है लेकिन यह तो यू पी की जनभाषा में शामिल है ।"
"लेकिन भैया इसमें संगीत मंडली भी बहुत महत्वपूर्ण होती है " मैंने कहा । " बिलकुल " राममिलन भैया बोले .."इसका कारण यह है कि इनके संवाद गेय होते हैं और यह गाकर ही अभिनय करते हैं इसलिए साथ में नगाड़े, सारंगी, ढोलक, तबला, हारमोनियम, बैंजो ,आदि वाद्ययंत्रों का भी खूब प्रयोग किया जाता है । इसके लिए पूरी संगीत मंडली अलग से होती है और कपड़े भी इन पात्रों के बहुत चमकदार होते हैं उनमे जरी के गोटे लगे होते हैं । नाचनेवालियों को नकली बाल लगाए जाते हैं और गाढ़ा मेकप किया जाता है ।"

नौटंकी के बारे में हम लोग राममिलन भैया से पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर चुके थे । अब हमारी नौटंकी देखने की इच्छा बलवती हो उठी थी लेकिन हमारी मज़बूरी थी कि रात तक वहाँ रुक नहीं सकते थे । गाँवो में अक्सर लोग के रात के भोजन के बाद निश्चिन्त होकर ऐसे कार्यक्रम देखते हैं सो नौ बजे के पहले कुछ होने का सवाल ही पैदा नहीं होता था । मैंने राममिलन भैया से कहा 'भैया हमें नौटंकी देखने की बहुत इच्छा है लेकिन आज तो संभव नहीं हो सकेगा ।" राममिलन भैया अपनी ही रौ में थे । उन्होंने कहा " ज़रूर देखो हम तो बहुत खेला देखे हैं अपने गाँव में, इसमें बहुतै मजा आता है ।" राममिलन भैया ने यह कुछ ऐसे स्टाइल में कहा कि मुझे गब्बरसिंह का डायलाग याद आ गया ..'बहूत याराना लगता है ।'

मैंने झट से राममिलन भैया से कहा "भैया कोई डायलाग याद हो तो सुनाओ ना ।" राममिलन भैया तो जैसे तैयार ही बैठे थे । उन्होंने झट से कहा "हाँ हाँ क्यों नहीं.. हम सुल्ताना डाकू का एक डायलाग सुनाते हैं । इस नौटंकी में सुल्ताना डाकू की एक प्रेमिका भी है का नाम है उसका... हाँ नीलकमल... जिससे वह कहता है कि हम कंगाल नहीं है बल्कि हमारा जन्म गरीबों की सहायता के लिए हुआ है ..इसलिए हम अमीरों को लूटते हैं ।" "ऐसे नहीं भैया" किशोर भाई ने कहा "जरा एक्टिंग करके सुनाओ तो मिजा आये ।" राममिलन भैया फिर चने के झाड पर चढ़ गए । वे थोडा दूर हट कर खड़े हो गए और पूरे हावभाव के साथ कहना शुरू किया

*प्यारी कंगाल किसको समझती है तू*
*कोई मुझसा दबंगर न रश्के- कमर*
*जब हो ख्वाहिश मुझे लाऊं दम भर में तब*
*क्योंकि मेरी दौलत है जमा अमीरों के घर*

उसकी बात सुनकर उसकी प्रेमिका कहती है ...

*आफरीन आफरीन उस खुदा के लिए*
*जिसने ऐसे बहादुर बनाये हो तुम*
*मेरी किस्मत को भी आफरीन आफरीन*
*जिससे सरताज मेरे कहाए हो तुम*


इसके बाद सुल्ताना डाकू फिर कहता है ...

*पाके जर जो न खैरात कौड़ी करे*
*जर माने धन*
*उनका दुश्मन खुदा ने बनाया हूँ मैं*
*जिन गरीबों का गमख्वार कोई नहीं*
*उनका गमख्वार पैदा हो आया हूँ मैं*

वाह वाह, वाह वाह कहते हुए हम लोगों ने ज़ोरदार तालियाँ बजाईं ।राममिलन भैया हमारी तालियों से निर्लिप्त होकर इस बीच ग्रीन रूम में प्रवेश कर गए थे । वहीं से उन्होंने चिल्लाकर पूछा । ‘’ कौनो नचकारिन नहीं है भैया नौटंकी में ? 'नचकारिन' शब्द सुनते ही हम लोगों की भी आँखे चमक उठी और राममिलन जी के बहाने हम लोग भी भीतर प्रवेश कर गए ।

भीतर ग्रीन रूम जैसा कुछ दृश्य था । हमने देखा हारमोनियम, सारंगी, क्लेरेनेट, तबला, नगाड़ा और बेंजो के अलावा मेक अप का बहुत सारा सामान वहाँ रखा है । अलग अलग खूंटियों पर रंगबिरंगे परिधान लटक रहे हैं और टीन की पेटियों और दरियों पर बैठ कर कुछ कलाकार सुस्ता रहे हैं । एक दो कलाकार शाम की प्रस्तुति के लिए मेकअप की तैयारी कर रहे हैं । नचकारिन के बारे में पूछने पर पता चला कि इस नौटंकी में पुरुष ही महिला पात्र का अभिनय करते हैं । हम लोगों को थोड़ी निराशा हुई । कलाकारों को हम लोगों ने अपना परिचय दिया और बताया कि रात को हम लोग नौटंकी देखने ठहर नहीं सकते हैं, बाहर से आए शिविरार्थी हैं और वापस शिविर में लौटना है ।

राममिलन ने इतनी देर में कलाकारों से दोस्ती गांठ ली थी, बोले “कौनो बात नहीं भैया, एकाध डायलाग ही सुना दो ।“ कलाकार हम शहर के लोगों को देखकर वैसे ही प्रभावित थे । एक कलाकार आगे आया और बोला "साहब, कोई बात नहीं, अभी तो बिगेर डिरेस के ही एक सीन आप लोगन को दिखा देते हैं ।" उसने अपनी मुद्रा संभाली और कहा .. "चलो 'राजकुमार गुलफाम' का एक डायलाग बताते हैं ।" फिर एकदम नाटकीय अंदाज में कहा ...
“ *मैं खास हूँ - नहीं कोई आम हूँ .. मैं गुलफाम हूँ* ... मेरे बिना ज़हर में ज़हर नहीं हैं, मेरे बिना कहर में कहर नहीं है ” फिर अपनी लकड़ी की तलवार उठाई और ज़मीन पर उसकी नोक टिकाते हुए कहा .. “ज़मीं से लगा दूँ ज़मीं छेद डालूँ ..आसमाँ से लगा दूँ आसमाँ भेद डालूँ ..मैं खास हूँ …नहीं कोई आम हूँ मैं गुलफाम हूँ …।” उसके इस प्रदर्शन पर हम लोगों ने ज़ोरदार तालियाँ बजाईं और फिर आने का आश्वासन देते हुए बाहर निकल आए ।

नौटंकी वालों से मिलकर मुझे फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यास 'मारे गये गुलफाम उर्फ़ तीसरी कसम' का भोला- भाला ,सीधा-सादा गाड़ीवान हिरामन याद आने लगा । वह भी नौटंकी में नाचने वाली अपनी मितानिन हीराबाई को मेले की नौटंकी में लेकर जाता है । मेरे मन में अनेक साज़ बजने लगे और हवाओं में घुंघरू की खनक गूंजने लगी .." पान खाए सैंया हमारो ..सांवली सूरतिया होंठ लाल लाल .. हाय हाय मलमल का कुरता ..मलमल के कुरते पे छींट लाल लाल ..। एक हूक सी मन में उठी और मुँह से अस्फुट से शब्द निकले ..मीता । रवीन्द्र ने पलटकर मेरी ओर देखा और पूछा .. "क्या हुआ ?" मैंने कहा " कुछ नहीं.. एक भूली -बिसरी कहानी याद आ गई ।

लौटते समय अंधेरा हो चला था । हवाएँ तेज़ तेज़ चल रही थीं और बूँदाबाँदी भी होने लगी थी । आसमान में काले बादलों के बीच विदा लेते हुए सूरज की रोशनी समाई हुई थी और वे बहुत भयावह दृश्य उपस्थित कर रहे थे । हमें एक बार लगा कि हमें जल्दी लौट जाना चाहिए था, लेकिन अब कोई चारा नहीं था । नाले तक पहुँचने का रास्ता तो समझ आ रहा था लेकिन नाले में कुछ नज़र नहीं आ रहा था । सेतु के वे पत्थर जिन पर राम मिलन जी ने खड़े होकर प्रार्थना की थी ग़नीमत कि दिखाई दे रहे थे । उन पर पाँव रखते हुए जैसे तैसे हम लोगों ने नाला पार किया और इससे पहले कि बारिश तेज़ हो जाती अपने तम्बुओं में लौट आए ।


🔲 *शरद कोकास* 🔲


11. तेरे बुलाने से आ भी गई तो यहाँ आकर करेगी क्या ..


📓 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📓



✍ *शरद कोकास* ✍

इससे पहले के भागों में आप पढ़ चुके हैं विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला के छात्र उत्खनन के लिए दंगवाड़ा नामक स्थल पर आये हैं । अपने तकनीकी काम के अलावा उनके बीच विभिन्न चर्चाओं का दौर भी जारी है । अब तक उनकी बातचीत में अयनांत की चर्चा, हरक्युलिस और हनुमान, मिस्त्र के पिरामिड, ग्रीक माइथोलॉजी, ट्रॉय का युद्ध, सिक्कों के बारे में चर्चा आदि शामिल हो चुके हैं । आज चौथे दिन की दोपहर बीत रही है । बेमौसम की यह बारिश शुरु होने वाली है सो काम जल्दी बंद हो गया है । अब सवाल यह कि इस बचे हुए समय का क्या किया जाए ? छात्र भी जंगल में लगे इस कैम्प में रहते रहते बोर होने लगे हैं इसलिए थोड़ी मटरगश्ती करना चाहते हैं ।

आज वे जा रहे हैं गाँव की ओर ..आज की डायरी में गाँव जाने के रास्ते में हुई बातचीत है जिसमे मुख्य रूप से शामिल है देवी देवताओं के अस्तित्व पर बातचीत । इसे ज़्यादा सीरियसली न लें , छात्र हैं, बहस करते हैं लेकिन मतभेदों के बावज़ूद मिलकर ही रहते हैं ...चलिए इन छात्रों के साथ शामिल होते हैं इनकी इस सैर और बातचीत में ...

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1⃣1⃣ *भाग-ग्यारह* 1⃣1⃣

🏢 *चलो सिटी चलते हैं* 🏢

ट्रेंच क्रमांक दो पर हमारा कार्य अभी प्रारम्भ ही हुआ था कि हमें लगा जैसे प्रकृति को हमारी इस सफलता से ईर्ष्या होने लगी है । जाने कहाँ से आकर आकाश में काले बादल छाने लगे और हवाएँ जो पहले से ही ठंडी थीं और ज्यादा ठंडी हो गईं । मौसम भले ही सर्दियों का था लेकिन धूप में काम करते हुए हम लोगों का पसीना निकल गया था । अब वह धूप की वज़ह से था या काम की वज़ह से यह अलग बात है । लेकिन ऐसे में वे ठंडी हवाएँ बहुत भली लगीं ।

मैंने आसमान की ओर देखा और गुनगुनाना शुरू कर दिया “ठंडी हवाएँ ..लहरा के आएँ, रुत है जवाँ, उनको यहाँ कैसे बुलायें..” रवीन्द्र ने घूर कर मेरी ओर देखा ..” लो ई छोरा तो शुरू भी हो गया ..अबे, अव्वल तो यह कि उनको यहाँ बुलाकर करेगा भी क्या, और तेरे बुलाने से आ भी गई तो वो यहाँ आकर करेगी भी क्या ..हमने अकेले ही यहाँ पत्थरों से अपना माथा फोड़ना है ।” फिर वह रुका और बहुत गंभीरता पूर्वक उसने कहा .. “लेकिन सवाल यह है बावले कि बुलाएगा भी किसको , थारी तो कोई है ही नहीं ..च्च च्च ... “ रवींद्र की बात सुनकर मैं मुस्कुराता रहा ।

इस बीच वाकणकर सर किसी काम से कहीं चले गए थे और उनकी अनुपस्थिति में हम लोगों को ऐसा लग रहा था जैसे कॉलेज का आज पहला दिन है, कब क्लास की छुट्टी हो और कब घर जाएँ । इतने में आर्य सर आ गए और कहने लगे “भाईयों .. बारिश की संभावना है इसलिए सर का आदेश हुआ है कि आज काम यहीं पर समाप्त किया जाए । आज आप लोगों की छुट्टी ..लेकिन ट्रेंच में पानी भर सकता है इसलिए मौसम को देखते हुए ट्रेंच को ढाँकना ज़रूरी है । इसलिए हम तार्पोलीन से यह ट्रेंच ढँककर आते हैं आप लोग चलो ।“

आर्य सर की बात सुनकर अजय ने बच्चों की तरह खुशी ज़ाहिर करते हुए कहा “होहोहो मज़ा आ गया.. चलो सिटी चलते हैं ।” “सिटी ?” मुझे आश्चर्य हुआ “ अरे भैया अभी उज्जैन कहाँ जा सकते हैं ? ” “उज्जेन जाने की कोन केहवे हे बावड़े ।” अजय ने कहा “में तो दंगवाड़ा गाँव जाने की के रिया था यहाँ से डेढ़ किलोमीटर दूर ।” रवीन्द्र ने कहा …“ठीक तो कह रहा है । हम यहाँ जंगल में पड़े हैं अब हमारे लिए तो दंगवाड़ा ही सिटी है ।” “चलो शाम की चाय वहीं चलकर पीते हैं ।“ मैं यहाँ यह बताना चाहता हूँ कि “चलो सिटी चलते हैं“ यह शहर से दूर स्थित हॉस्टल में रहने वालों छात्रों के बीच कहा जाने वाला एक प्रचलित वाक्य है जो शहर जाकर मटरगश्ती करने या सिनेमा देखने जाने के सन्दर्भ में अक्सर कहा जाता है ।

तम्बू में लौटकर हम लोगों ने टॉवेल, साबुन वगैरह लिया और घाट पर हाथ मुँह धोने पहुँच गए । वहाँ से आकर कंघी - वंघी की और सिटी अर्थात दंगवाड़ा गाँव जाने के लिए पैदल पैदल निकल पड़े । शिविर के अनुशासन के अंतर्गत हमने आर्य सर से सिटी जाने की अनुमति ले ही ली थी । हमें निकलते हुए देख उन्होंने कहा “ देखो भाई ज़रा जल्दी आना , वरना अन्धेरे में रास्ता भटक जाओगे, मौसम का मिज़ाज़ भी कुछ ठीक नहीं लग रहा है ।” आर्य साहब ट्रेंच को तारपोलीन से ढांक कर आ चुके थे और मजदूरों की भी उन्होंने छुट्टी कर दी थी । वाकणकर सर की अनुपस्थिति में वे ही शिविर प्रभारी थे इसलिए हम लोगों का ख्याल रखना भी उनकी ज़िम्मेदारी थी । “नहीं भटकेंगे सर । आप चिंता न करें ।” अजय ने कहा । “ हम लोग रास्ते के चिन्हों को याद कर लेंगे और जल्दी लौट आयेंगे वैसे भी अभी चार ही बजा है ।”

कैम्प से निकलकर हम लोगों ने कच्चा रास्ता पकड़ा और शिविर परिसर के अंतिम किनारे का बरगद पारकर नदी के घाट को बायपास करते हुए आगे बढ़ गए । आगे एक बरसाती नाला था जो आगे जाकर चम्बल में मिल जाता था । उसमें पानी नहीं के बराबर था इसलिए नाला पार करने में हमें कोई दिक्कत नहीं हुई, लेकिन अपने जूतों को बचाने के ख्याल से हमने बीच बीच में दिखाई देने वाले पत्थरों पर पाँव रखकर पार जाना ही उचित समझा । राममिलन भैया निकले तो हमारे साथ ही थे लेकिन नाला पार करने के बाद वे हमें कहीं दिखाई नहीं दिये । नाले के बाद गाँव जाने के रास्ते पर एक मोड़ आता है , हमें लगा शायद मोड़ की वज़ह से वे नज़रों से ओझल हो गए हैं ।



राममिलन कहीं आसपास ही होंगे यह सोचकर किशोर ने आवाज़ लगाई “कहाँ हो राममिलनवा .?” मोड़ के पीछे से उनकी आवाज़ आई… “आईत हैं भैया ।” वहाँ क्या कर रहे हो ? ” किशोर ने चिल्लाकर पूछा । हमें लगा कहीं राममिलन किसी शंका के निवारण में ना लगे हों । हम लोगों का एक साथ रहना ज़रूरी था सो हम उन्हें साथ लेने के लिए चन्द कदम पीछे लौटकर फिर नाले तक पहुँच गए । देखा तो राम मिलन एक बड़े से पत्थर पर बगल में जूते दबाये, आँखें बन्द किये हाथ जोड़े खड़े हैं और हनुमान चालीसा जैसा कुछ बुदबुदा रहे हैं ।



“क्या हुआ ?” किशोर ने पूछा । “कुछ नहीं ।” राम मिलन ने जवाब दिया …“हमें याद आ गया कि बजरंग बली ने रामेश्वर से लंका जाने के लिए ऐसा ही पत्थरों का एक पुल बनाया था, सो हम उनका स्मरण कर उनकी स्तुति कर रहे थे ।” “ धन्य हो प्रभु ।” किशोर ने कहा “कहाँ वो विशाल समुद्र, कहाँ ये पिद्दी सा नाला । चलो ठीक है, जाकी रही भावना जैसी । लेकिन इतना तो बता दो, तुम लंका से आ रहे हो या लंका जा रहे हो या लंका में ही रहते हो ?” “अरे वाह ।” राम मिलन समझ नहीं पाये कि उनका मज़ाक उड़ाया जा रहा है… “ हम कोनौ राच्छस - वाच्छस हैं जौन लंका में रहेंगे । जहाँ हम रहत हैं, ऊ है अयोध्या और जहाँ हम जाइत हैं, का कहत हो दंगवाड़ा-फंगवाड़ा ऊ है लंका ।” “ तो देखना भाई वहाँ अपनी पूँछ बचाकर रखना ।” किशोर ने कहा । भैया राम मिलन ने तुरंत अपने कटि प्रदेश के नीचे हाथ लगाया और फिर मज़ाक में कही गई किशोर की बात का अर्थ समझकर खिसियाते हुए कहा “ हे ..हे ..काहे किशोरवा … काहे मजाक करत हो ।”

हम लोग अपनी हँसी के साथ किशोर के मज़ाक में शामिल हो गए । दर असल हम लोगों में किशोर त्रिवेदी सबसे बड़े हैं और राम मिलन की उम्र के ज़्यादा करीब हैं इसलिए ऐसे अवसरों पर उन्हें आगे कर हम लोग चुप हो जाते हैं । राम मिलन भी उनकी बात का बुरा नहीं मानते हैं और इस विनोद का आनंद लेते हैं । हम लोग आगे बढ़े ही थे कि अजय ने सेतु प्रसंग छेड़ दिया । “ ये बताओ यार, रामायण में जिस पुल का वर्णन है वह सचमुच में बना था या नहीं बना था ?” “कर दी ना तुमने नॉन टेक्निकल जैसी बात ।“ रवीन्द्र ने कहा । “ यदि पुल सचमुच बना होता तो अब तक पुरातत्ववेत्ताओं को मिल नहीं जाता ? और पुल क्या पुष्पक विमान भी मिल जाता और हाथी, घोड़े, रथ, सिंहासन, सोने के वस्त्र, धनुष्य-बाण, कवच, कुंडल, कमंडल सब कुछ मिल जाता । ”

“मतलब साफ है । रामायण की कथा पूरी तरह काल्पनिक है ।” अजय ने कहा “ तो फिर हम काल की गणना करते समय रामायण काल क्यों कहते हैं ? ”

“ भई, रामायण काल या महाभारत काल उस समय को कहते है जब ये महाकाव्य रचे गए थे । रवींद्र ने कहा । "और यह महाकाव्य भी किसी एक समय में नहीं रचे गए यह मौखिक परम्परा से होते हुए हम तक आये । इनका लिखित स्वरूप तो बहुत बाद में प्रकाश में आया । और इनका मूल रूप ढूँढना तो और भी मुश्किल है रामायण, महाभारत और चंद बरदाई कृत पृथ्वीराज रासो जैसे ग्रंथों में भी बाद में बहुत कुछ जोड़ा गया । जब अंतिम रूप से इनका लिखित स्वरूप तय हो गया तब उस काल को इनके नाम से जाना गया । इन महाकाव्यों में वर्णित घटनायें कब घटित हुईं, कहाँ घटित हुईं, हुई भी या नहीं जब तक इसके पर्याप्त पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिलते तब तक तो इन्हें काल्पनिक ही माना जाएगा ना ।”

"लेकिन पुरातत्ववेत्ता तो खोज में लगे हुए हैं ? " अजय का यह सवाल था या स्टेटमेंट मुझे समझ में नहीं आया । मैंने कहा "जो भी हो अगर पुरातत्ववेत्ता किसी धर्मग्रन्थ में आस्था रख कर या किसी पूर्वाग्रह के साथ काम करेंगे तो खोज ग़लत होने की संभावना बढ़ जाएगी । उनकी विशेषज्ञता पर उनकी धार्मिक आस्था हावी हो जाएगी । इसीलिए पुरातत्ववेत्ता का धर्म कोई भी हो या व्यक्तिगत आस्था किसी भी देवी देवता में हो उन्हें अपनी धार्मिक आस्थाओं को अलग रखकर ही काम करना होता है । पुरातत्ववेत्ता आस्था के आधार पर इतिहास नहीं रचते, न ही इतिहास में शामिल होने जैसी उनकी कोई ज़िद होती है । और यह केवल मिथकों के इतिहास की बात नहीं है अगर वे राजाओं के या जनता के इतिहास को खोजने में भी पूर्वाग्रह का सहारा लेंगे तो सत्य तक नहीं पहुँच पायेंगे ।"

अजय मेरी बात से संतुष्ट नहीं हुआ था, उसके मन में कुछ और सवाल उमड़ घुमड़ रहे थे

"लेकिन आज भी तमाम हिन्दू परिवारों में रामायण और महाभारत धार्मिक ग्रन्थ की तरह ही पूजे जाते हैं और जनता इनकी ऐतिहासिकता में विश्वास करती है ।"

मैंने कहा " इसमें कोई संदेह नहीं कि सामान्य जनता आस्थावश इन्हें धर्मग्रंथ मानती है और बिना किसी तर्क के इन्हें इतिहास भी मानती है । उसका विरोध करने का कोई औचित्य भी नहीं है लेकिन इतिहास आस्था के आधार पर रचा नहीं जाता । एक पुरातत्व का विद्यार्थी होने के नाते तुम इस बात को बेहतर जानते हो कि ज़मीन के भीतर क्या निकलेगा इसकी पूर्व से कल्पना नहीं की जाती बल्कि इतिहास खोजा जाता है और कई बार उसके परिणाम बहुत आश्चर्यजनक होते हैं ।

"लेकिन जब हमें लिखा लिखाया इतिहास मिल रहा है तो हम उसे क्यों नहीं मानते ? अजय ने फिर सवाल किया । मैंने कहा " इतिहास से इतर जो कुछ भी अन्य विधा में लिखा हुआ है वह सब साहित्य की श्रेणी में आता है और वह इतिहास से अलग होता है । इतिहास लेखन एक अलग विधा है और उसमें वैज्ञानिकता के आधार पर तथ्यों की और कालक्रम की प्रमुखता रहती है । साहित्य इतिहास इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि रचते समय उसमें कल्पना का समावेश भी होता है । अगर रामकथा की बात ही करें तो अलग अलग ग्रंथों में यह कथा अलग अलग रूप में दिखाई देती है वाल्मीकि , भवभूति और तुलसी की रामायण में ही काफी अंतर है । एक जैन ग्रन्थ तो रावण को दशानन ही नहीं मानता और उसे शाकाहारी कहता है । बौद्ध ग्रंथों में भी जैसे दशरथ जातक में यह कथा भिन्न रूप में मिलती है । फिर पुराणों में तो हर देवी देवता की कथा अलग अलग रूप में है । हर सभ्यता के अपने अलग अलग देवी देवता हैं । यदि लिखे हुए सम्पूर्ण साहित्य को ही इतिहास मानना है तो हमारे सामने यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि फिर इनमे से सही इतिहास किसे माने ?

" तो इसका मतलब यह हुआ कि साहित्य में वर्णित घटनाएँ कभी हुई ही नहीं ?" अजय ने फिर सवाल किया ।

"नहीं ऐसा भी नहीं है " मैंने कहा । "साहित्यकार अपनी कथाएँ तो जन जीवन से ही उठाते हैं लेकिन उसमे वे फिर अपनी कल्पना से एक नया संसार रचते हैं । उनकी कथा के पात्र जैसे पात्र तो संसार में अनेक हो सकते हैं लेकिन जिस पात्र का वे वर्णन कर रहे हैं आवश्यक नहीं कि वह पात्र सचमुच में हुआ हो जैसे प्रेमचंद की कथा में होरी जैसे किसान इस देश में लाखों हो सकते हैं लेकिन वैसा ही कोई गाँव जहाँ होरी नामक वही किसान रहता हो मिलना मुश्किल है ।"

अजय के सवाल लगातार जारी थे "लेकिन यदि यह कहा जाए कि राम या कृष्ण ऐतिहासिक पुरुष नहीं थे और केवल मिथक थे तो जनता की आस्था पर चोट पहुँचती है और ऐसा कहने वाला धर्म द्रोही कहलाता है भले ही वह पुरातत्ववेत्ता क्यों न हो ।"

मैंने कहा " नहीं ऐसा भी नहीं है , जनता के बारे में तुम्हारा आकलन ग़लत है ।

सुप्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफ़ेसर रामशरण शर्मा कहते हैं कि “ लोग देवताओं को आस्था और विश्वास के कारण पूजते हैं न कि पुरातात्विक खोजों के कारण । आखिर क्यों दुर्गा, गणेश, शिव और विष्णु पूरे देश में पूजे जाते हैं जबकि इनके साथ कोई ऐतिहासिक सन्दर्भ नहीं जुड़ा हुआ है । आस्थाएं विकसित करना ज़रूरी हो सकता है लेकिन देवत्व की पूजा के लिए इतिहास को भ्रष्ट करना कतई ज़रूरी नहीं है ।"

रवीन्द्र काफी देर से हम लोगों की बातचीत सुन रहा था । उसने अपना मत प्रस्तुत किया " तुम ठीक कह रहे हो । विडम्बना यह है कि आम आदमी पौराणिक कथाओं, गाथाओं, धर्मग्रंथों के आख्यान, किंवदंतियों, किस्सों और कहानियों में फर्क करने की ज़द्दोज़हद नहीं करता । वह मनुष्य की जैविक अवस्थाओं के साथ साथ ईश्वर, धर्म,परम्परा,मिथकों,अविष्कारों आदि को उनके कालक्रमानुसार रखने में अनायास और कभी कभी सायास गड़बड़ियाँ करता है । जबकि पुरातत्ववेत्ता इन्हें सही कालक्रम में रखने की लगातार कोशिश करते है । आस्था अपनी जगह है और इतिहास अपनी जगह इसलिए इस मुद्दे पर बहस करने का कोई औचित्य ही नहीं है । बेहतर होगा कि हम आस्था,इतिहास,संस्कृति इन पर राजनीति न करें और इन्हें बाज़ार की वस्तु न बनायें । अगर इनकी ऐतिहासिकता सिद्ध न भी हो तो क्या फ़र्क पड़ता है क्या इससे लोगों की देवताओं पर आस्था कम हो जायेगी ?"

हमें इस बात का गुमान नहीं था कि पंडित राम मिलन हमारी बातें बहुत ध्यान से सुन रहे हैं । हमारी बातें सुनकर वे अचानक उखड़ गए … “तुम सब अधर्मी लोग हो, पापी हो,राम नहीं हुए थे, कृष्ण नहीं हुए थे,भगवानों का मजाक उड़ाते हो, तुम लोगों को नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी ।” हम समझ गए कि राम मिलन भैया के पूर्वज उनके भीतर जागृत हो गए हैं और अब वे शास्त्रार्थ करने पर उतर आए हैं । मैंने धीरे से रवींद्र को चुप रहने का इशारा किया ।

हम लोग इस बीच दंगवाड़ा गाँव तक पहुँच गए थे और चाय की तलब अपने शबाब पर थी । किसी भी अप्रिय वार्तालाप में संलग्न होकर हम लोग अपनी शाम बर्बाद नहीं करना चाहते थे । वैसे भी आस्थावान लोगों के लिए किसी तर्क को साहस के साथ स्वीकार करना बहुत कठिन होता है । अशोक हम सभी का आशय समझ गया और उसने वाकयुद्ध का पटाक्षेप करते हुए कहा “राम हुए हों या ना हुए हों, लेकिन हमारे बाल बच्चे बड़े होकर यह ज़रूर कहेंगे कि एक राममिलन ताउ ज़रूर हुए थे जो राम जी के और हनुमान जी के बहुत बड़े भक्त थे ।“ अपनी प्रशंसा सुनकर राम मिलन भैया प्रसन्न हो गए और उनका आक्रोश हम लोगों के ठहाकों में गुम हो गया ।

🔲 *शरद कोकास* 🔲

10.मिटटी के बैल को अंग्रेजी में क्या कहते हैं


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*एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

*शरद कोकास*

अब तक आपने पढ़ा कि विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला के छात्र उत्खनन के लिए दंगवाड़ा नामक स्थल पर आये हैं । आने के बाद से वे विभिन्न चर्चाओं में लगे हैं और अब तक उनकी बातचीत में अयनांत की चर्चा, हरक्युलिस और हनुमान, मिस्त्र के पिरामिड, ग्रीक माइथोलॉजी, ट्रॉय का युद्ध, सिक्कों के बारे में बातचीत आदि शामिल हो चुके हैं । आज उनका चौथा दिन है और सुबह हो चुकी है । आज उन्हें ट्रेंच पर नहीं जाना है बल्कि एक्सप्लोरेशन के लिए जाना है । आप जानेंगे कि यह सर्वेक्षण क्या होता है कैसे किया जाता है ? साथ ही यह भी कि खुदाई के लिए स्थान का चयन कैसे किया जाता है  । इसके अलावा आप जानेंगे कि टेराकोटा किसे कहते हैं , टेराकोटा यानि वही मिटटी का बैल जिसे आप 'पोला' त्यौहार पर देखते हैं , और प्राचीन समय से यह कला कैसे जीवित है .. *लीजिये पढ़िए आगे की डायरी* उम्मीद है यह डायरी पढ़ना आपको अच्छा लग रहा होगा ।

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🔟 *भाग दस* 🔟

🦍 *बैल नहीं भैया टेराकोटा* 🦍

            सूरज की नींद ज़रा देर से खुली थी और वह अभी तक उबासियाँ ले रहा था । ऐसा लगता था जैसे वह भी कल रात देर तक जागा हो । हम लोग तो सूरज के जाग जाने के बाद जागने वालों की जमात में शामिल थे और अक्सर सपनों में ही सूर्योदय देखा करते थे सो सूरज के तकाज़े से बेखबर अपने तम्बू में तानकर सो रहे थे कि अचानक डॉ.वाकणकर की आवाज़ सुनाई दी ..

            सज्जनों जाग जाओ, आज अपने को नदी के उस पार वाले टीले पर एक्सप्लोरेशन के लिए चलना है ।"  तम्बू के बाहर से  ही उन्होंने आज का प्रोग्राम बताया और चले गए । अभी तो सात ही बजा है यार ।" अशोक ने खीझकर कहा । मैंने कहा .."कोई नहीं, सर का आदेश यानि आदेश, वे तो नहा-धोकर तैयार भी हो गए हैं । " मजबूरी में हम लोगों को भी उठना पड़ा । प्रतिदिन की भांति फिर हम लोगों ने चम्बल के किनारे जाकर प्रक्षालन किया और नाश्ता कर जल्दी से तैयार हो गए ।

            नाश्ते के पश्चात शरीर में काफी उर्जा का संचार हो चुका था सो सर के साथ हम लोगों ने पैदल चलने में हमने कोई आलस्य नहीं महसूस किया । सर ने बताया कि नदी के उस किनारे वाला वह टीला यहाँ से लगभग दो-ढाई किलोमीटर पर ही स्थित है । हम लोग गपियाते हुए और टहलते हुए टीले पर पहुँच गए   हमारे साथ आज कुछ स्थानीय युवा भी आज शामिल हो गए । सर हमें एक ऐसे मार्ग से ले गए जहाँ पानी बहुत कम था और हमें नदी पार करने में कोई दिक्कत नहीं हुई । यह टीला अधिक ऊँचा नहीं था और पानी की धार के बहुत करीब था ।

            सर ने हमें पहले तो एक्सप्लोरेशन का अर्थ  और उद्देश्य बताया.. " एक्सप्लोरेशन एक तरह से सर्वे का काम होता है । कल मैंने तुम लोगों को बताया था कि सबसे पहले किसी भी पुरातात्विक साईट के बारे में सूचना प्राप्त होती है और उसे चिन्हित किया जाता है  । तत्पश्चात इस चिन्हित साईट पर उत्खनन कार्य प्रारंभ करने से पूर्व वहाँ सर्वे किया जाता है । इस आधार पर यह तय किया जाता है कि वहाँ किस प्रकार के अवशेष प्राप्त हो सकते हैं तथा किस स्थान से खुदाई प्रारंभ करना उचित होगा ।

            यह प्रारंभिक जानकारी देने के पश्चात सर ने आदेश दिया " अब तुम लोग नीचे झुक झुक कर ध्यान से देखो, यहाँ ज़मीन पर ताम्राश्म युगीन सभ्यता के बहुत सारे अवशेष बिखरे हुए हैं  । " हमें समझ में नहीं आया कि सर हमें प्राचीन अवशेषों की खोज के लिए वहाँ क्यों लेकर आए हैं इसलिए कि पत्थरों और मिटटी के बीच बड़ी मुश्किल से वहाँ सतह पर कोई अवशेष दिखाई देता था । बहुत देर तक खोजने के बाद आखिर एक जगह ताम्राश्मयुगीन सभ्यता के कुछ चित्रित मृद्भांड, दो सिक्के और दो बीड मिले ।

            अजय ने सर से कहा यहाँ ज़्यादा कुछ तो मिल नहीं रहा है  सर, फिर…? दरअसल वह  कहना चाहता था कि यहाँ कुछ ख़ास नहीं मिल रहा ही फिर सर हमें यहाँ लेकर क्यों आये हैं । सर उसका आशय समझ गए । क्यों , ज़्यादा कुछ मिलना ज़रूरी है क्या ? ऐसा कई बार होता है कि एक्सप्लोरेशन के दौरान दिन दिन भर कुछ नहीं मिलता, लेकिन क्या पता, ऊपर से कुछ न दिखाई दे लेकिन इस धरती के नीचे पूरी दुनिया बसी हो ।

            सर इस बात को समझ रहे थे कि यह काम हम लोगों के लिए बहुत उबाऊ है । उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा " देखो इसमें परेशान होने या बोर होने की ज़रूरत नहीं है, किसी भी पुरातत्ववेत्ता के लिए यह पहला लेसन है । इसे सम्पूर्ण रूचि और कंसेन्ट्रेशन के साथ करना आवश्यक है इसलिए कि एक्सप्लोरेशन से ही हमें पता चलता है कि उत्खनन की दृष्टि से यह साईट काम की है या नहीं । दुनिया में जितने भी पुरातात्विक महत्त्व के स्थान हैं वहाँ  सबसे पहले एक्सप्लोरेशन ही किया गया था । तुम लोगों ने स्विटज़र लैंड के ज्यूरिख शहर का नाम सुना होगा वह शहर पूरा का पूरा झील में पानी की सतह कम हो जाने पर मिला था, और दूर क्यों जाते हो अपने मोहनजोदाड़ो की खोज भी इसी तरह अंग्रेजों द्वारा रेल की पटरियाँ बिछाने के लिए खुदाई करते हुए हुई थी । अब इसी जगह को देख लो, अगर यहाँ थोड़े बहुत भी अवशेष मिल रहे हैं तो इससे पता चलता है कि यहाँ आसपास कोई बस्ती रही होगी और यह अवशेष भी इसलिए मिल रहे हैं कि नदी के बहाव से यहाँ की बहुत सारी मिटटी बह गई और यह अवशेष ऊपर आ गए । ऐसा भी हो सकता है कि यह अवशेष आसपास से कहीं से बहकर आये हों तो इस बात का भी हमें पता लगाना होगा ।

            "लेकिन सर, क्या अवशेष मिलने भर से यह तय हो जाता है कि इस जगह की खुदाई करनी है ? अजय ने अपनी कमर सीधी करते हुए कहा । " नहीं रे, " सर ने हँसकर कहा  " खुदाई तो लास्ट स्टेप है इससे पहले अन्य माध्यमों से जगह के बारे में जानकारी लेना जरुरी होता है । एक्सप्लोरेशन में बहुत सारी चीज़ें आती हैं जैसे आसपास के ग्रामीणों से बात करना, वहाँ प्रचलित परम्पराओं, लोककथाओं और किंवदंतियों का अध्ययन करना, वहाँ के बारे में कोई साहित्यिक या पौराणिक स्त्रोत हो उसे देखना । आखिर हमारे पूर्वज बहुत कुछ लिख गए हैं । हमने विभिन्न स्थानों के उत्खनन के लिए ऐसी कई साहित्यिक सामग्री का सहारा लिया है जिनमे रामायण है, महाभारत है, कल्हण की राजतरंगिणी है, फाहियान मेगास्थनीज़ जैसे यात्रियों के लेख हैं । फिर स्थान विशेष से सम्बंधित भौगोलिक नक़्शे भी देखना होता है । स्थानों के नाम का भी महत्व होता है जैसे बुद्ध से सम्बन्धित स्थानों के नाम से उनके प्राचीन स्थान होने का पता चलता है । दक्षिण में ऐसी कई साइट्स पाई गई हैं जिनके नाम 'विभूतिपाडू' जैसे थे, यहाँ नव पाषाण युग के राख के ढेर पाए गए ।"

            " हाँ सर, विभूति या भभूती राख को कहते हैं मेरे ख्याल से इस शब्द का अर्थ राख का ढेर ही होगा ।" अजय ने उछलते हुए कहा । सर हँसने  लगे " लगता है इसकी समझ में आ गया ,इसको संस्कृत में अच्छे नंबर मिलते होंगे । अजय अपनी तारीफ़ सुनकर खुश हो गया । सर ने अपनी बात जारी रखी.." खैर एक्सप्लोरेशन के और भी तरीके हैं जैसे अब तो ताप,विद्युत और चुम्बक का प्रयोग भी होने लगा है, एरियल फोटोग्राफी भी होती है और रसायनों का प्रयोग भी  होता है, खैर उसके बारे में मैं बाद में बताऊंगा अब दो बज रहे हैं वापस चलते हैं ।" इसके साथ ही सर ने अन्वेषण कार्य समाप्ति की घोषणा की । अपने हिस्से के ढूँढे हुए अवशेष लेकर सर से बाते करते हुए हम लोग कैम्प की ओर वापस लौटने  लगे । यह एक पुरातत्ववेत्ता की प्रारम्भिक कक्षा थी और यहाँ धैर्य का पाठ भी पढ़ाया जाना ज़रूरी था । 

            झुक झुक कर अवशेष ढूँढने की वज़ह से हम लोगों की पीठ दुखने लगी थी । सर ने सबकी फिज़िकल एक्सरसाइज करवा दी थी । अब सबका मूड था कि भोजन के पश्चात तम्बू में तानकर सोया जाए लेकिन सर ने आदेश दिया "भोजन के उपरांत सभी लोग ट्रेंच क्रमांक दो पर पहुँचें  । " " दिन की नींद हमारी किस्मत में नहीं है ।" रवीन्द्र ने बुझे मन से कहा । "वैसे भी हम कहाँ रोज़ दिन में सोते हैं यार ,हमारी दोपहर तो लायब्रेरी में बीतती है ।" मैंने रवीन्द्र को दिलासा देते हुए कहा । वैसे भी सर की नज़रों से बचना बहुत मुश्किल था, हम कुल जमा छह लोग ही तो थे, एक भी अगर गायब होता तो पकड़ में आ जाता । भोजन के पश्चात बेमन से हम लोग साईट पर पहुँचे  और सर के आदेशानुसार ट्रेंच क्रमांक दो पर अपना कार्य प्रारम्भ करने की तैयारी करने लगे  । सर ने हमें कुदाल पकड़ना और चलाना सिखा ही दिया था सो आज कुदाल चलाने का पहला दिन था । हम सबने एक एक बार कुदाल पकड़कर देखी । चिकनी चिकनी लकड़ी का स्पर्श करते ही हमारा ध्यान मजदूरों के खुरदुरे हाथों की और गया । श्रम की इस भूमिका में कुदाल थामते ही हमारा मन प्रसन्न हो गया और आलस्य दूर हो गया ।

            मैंने कुदाल पकड़ी ही थी कि सर ने कहा "ठहरो ।" । मुझे लगा शायद मेरे कुदाल ग़लत पकड़ने के तरीक़े पर वे कुछ कहने वाले हैं ..। मैंने अपने अहम में कहा " सर, कुदाल चलाना तो मुझे आता है ?" सर ने कहा " वो तो ठीक है लेकिन इसके अलावा अन्य सहयोगी टूल्स का भी उपयोग कैसे करते हैं वह भी तो तुम लोगों को पता होना चाहिए । फिर अभी सबसे पहले कुछ और सेफ्टी प्रिकाशंस तुम लोगों को बताना है । अब विदेशी हिसाब से तो मैं बता नहीं सकता लेकिन खुदाई शुरू करने से पहले एक पुरातत्ववेत्ता को अपनी सुरक्षा का ध्यान भी रखना पड़ता है । ट्रेंच में उतरने से पहले यह देखना ज़रूरी है कि वह कितनी गहरी है और उसके भीतर कहीं कोई गैस आदि का रिसाव तो नहीं हो रहा है ऐसी स्थिति में कोई मास्क पहनकर जाना होता है । उसके अलावा भीतर कोई कीड़े-मकोड़े, सांप,चूहे,छिपकली आदि तो नहीं हैं उसकी भी जाँच करनी पड़ती है ।

            " सर , अगर सांप निकल आये तो क्या करना होगा ? अजय ने बीच में ही सवाल किया । " क्या करना होगा , अरे उसे भगाना होगा और क्या ।" सर ने कहा । " सर ये अजय को तो छिपकली से भी डर लगता है ।" अशोक ने हँसते हुए कहा । "अरे !" सर ने मज़ा लेते हुए कहा .." इसकी तो शादी हो गई है फिर भी डरता है ..और अगर इसकी बीबी भी छिपकली से डरती होगी तो फिर बहुत मुश्किल है ।"

            "ठीक है , कोई बात नहीं इसकी छिपकली तुम लोग भगा देना । " सर ने कहा " आगे सुनो । इसके अलावा अपनी वेशभूषा का ध्यान भी रखना है ,उचित जूते और कपड़े पहनने हैं ,सर पर भी सुरक्षा के लिए कुछ होना चाहिए । ट्रेंच में उतरते समय यह भी ध्यान देना ज़रूरी है कि इतनी सावधानी से उतरें कि ट्रेंच ढह न जाये, विशेषकर रेतीली ज़मीन या भुरभुरी मिटटी वाली ट्रेंच पर यह ध्यान रखना ज़्यादा ज़रूरी है ।" सर हमें सुरक्षा के विषय में बता रहे थे और हम उनकी बातें बहुत ध्यान से सुन रहे थे .." ट्रेंच में उतरने से पहले ट्रेंच के बाहर फर्स्ट एड बॉक्स है या नहीं यह भी देखना ज़रूरी है और उसमे आवश्यक वस्तुएँ जैसे टिंचर,मलहम,  चोट पर बांधने के लिए पट्टी आदि भी होनी चाहिए, पानी की बोतल भी रखें । इसके अलावा आग बुझाने का यंत्र भी होना चाहिए । हर एक की डायरी में पास के किसी अस्पताल का पता या डॉक्टर का फोन नम्बर भी होना चाहिए ।"

            सर की बात सुनकर हम लोगों ने आसपास नज़र डाली लेकिन वहाँ हेलमेट जैसी कोई चीज़ नहीं दिखाई दी न कोई फर्स्ट एड बॉक्स न आग बुझाने का यंत्र । यद्यपि यह सारी वस्तुएँ सामानों के टेंट में थी अब सर से कुछ कहते तो वे यही कहते ..तो जाओ लेकर आ जाओ । बहरहाल उनकी बात ख़त्म होते ही हम लोगों ने ट्रेंच पर अपना ध्यान केन्द्रित किया । इस ट्रेंच क्रमांक दो पर पिछले कुछ दिनों से उत्खनन चल रहा है । यह ट्रेंच 1. 9 मीटर पहले से ही खुदी हुई थी सो उसके आगे  हमने सर के मार्गदर्शन में लगभग एक घंटे में 20 सेंटीमीटर खुदाई और की । खुदाई प्रारंभ करने से पूर्व हम लोग एक अद्भुत कल्पना कर रहे थे । हमें लग रहा था कि जैसे ही हम खुदाई प्रारंभ करेंगे अवशेषों के ढेर मिलना शुरू हो जाएँगे । हम लोग बार बार आँखें फाड़कर ट्रेंच के भीतर झाँकते और कोशिश करते कोई दीवार नज़र आ जाए, या कोई मटका या कोई और महत्वपूर्ण वस्तु मिल जाए  लेकिन कोई विशेष उपलब्धि नहीं हुई । हाँ, ट्रेंच की दक्षिण दिशा, जिसे तकनीकी भाषा में साउथ एक्सटेन्शन कहा जाता है की ओर विस्तृत ट्रेंच में एक टूटा हुआ टेराकोटा ऑब्जेक्ट यानि पकी मिट्टी का टूटा हुआ एक बैल प्राप्त हुआ ।

            " सर यह बैल मिला है " अजय ने खुश होकर चिल्लाते हुए कहा । सर आये उसे हाथ में लिया और कहा "बढ़िया टेराकोटा है ।" "नहीं सर यह बैल है । " राममिलन ने कहा  । सर ने कहा " हाँ भाई यह बैल ही है लेकिन मिटटी को पकाकर जो शिल्प अथवा बर्तन बनाते हैं उसे 'टेराकोटा' ही कहते हैं । " अजय के चेहरे पर  ख़ुशी झलक रही थी इसलिए कि साउथ एक्सटेंशन की ओर वही काम कर रहा था ।

            "सर यह टेराकोटा बनाना मनुष्य ने कब सीखा ? उसने मौका देखकर सवाल पूछा । सर ने जवाब दिया "भाई, शिल्प तो पहले भी मिटटी के ही बनते थे लेकिन जब मनुष्य ने आग की खोज की और उसमें मिटटी को पकते हुए देखा तो उसने सायास मिटटी से शिल्प बनाकर उन्हें पकाना शुरू किया । टेराकोटा यह शब्द बहुत बाद का है और अंग्रेज़ों का दिया हुआ है । यह शब्द इटालियन भाषा से आया है जिसका अर्थ होता है पकी हुई मिटटी । ऐसे कई टेराकोटा मोहनजोदड़ो की खुदाई में मिले हैं, प्राचीन मिस्त्र, मेसोपोटामिया ,यूनान और चीन में भी प्राप्त हुए हैं । इसमें बिना चमक वाले और चमकदार दोनों तरह के टेराकोटा हैं ।"

            " सर हम लोग आजकल मिटटी को पकाकर जो शिल्प बनाते हैं वे भी तो टेराकोटा ही कहलायेंगे न ?"  अजय ने पूछा । " बिलकुल ठीक कह रहे हो तुम ।" सर ने कहा । " आज भी इनका प्रयोग बहुतायत में होता है । पोले के त्यौहार में तुम लोग जो मिटटी का बैल देखते हो वह भी टेराकोटा ही है । बल्कि प्राचीन काल से ही इसके विविध उपयोग हो रहे हैं, नक्काशीदार कवेलू और छतों को सजाने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है बंगाल में तो बहुत से मंदिरों की छत भी टेराकोटा की ही है ।"

            हमें अपनी इस उपलब्धि यानि उस टेराकोटा बैल को देख देखकर बहुत मज़ा आ रहा था । किशोर ने उसे देखकर कहा "इसकी सूरत तो राममिलनवा से मिलती है ।" सो उसने मज़ाक मज़ाक में उसका नाम ' राममिलनवा रख दिया । राममिलन ने भी बुरा नहीं माना आखिर यह हमारे छात्र दल की पहली सफलता थी । हम लोग खुशी के मारे फूले नहीं समा रहे थे, हमें ऐसा लग रहा था कि अब हमारा भविष्य तय हो गया है और आगे जाकर हमें इसी तरह देश भर में उत्खनन करना है, दबे हुए इतिहास को खोज निकालना है । सुखद भविष्य की कपोल कल्पना करते हुए हम इस यथार्थ को क्षण भर के लिए भूल गए कि एम. ए. करने के बाद हमें भी अन्य लोगों की तरह नौकरी के लिए परीक्षाएँ देनी होंगी, इन्टरव्यू देने होंगे और हिन्दी के मुहावरे में कहें तो  चप्पलें घिसनी होंगी ।

🔲 *शरद कोकास* 🔲

 

शुक्रवार, 15 मई 2026

9.यह वो जगह नहीं है जो हमने पहले देखी थी



📗 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📗

✍🏽 *शरद कोकास* ✍🏽

*इससे पहले के भागों में आपने पढ़ा*  कि विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययन शाला के छात्र शरद कोकास , रवीन्द्र भारद्वाज, अशोक त्रिवेदी, अजय जोशी और राममिलन शर्मा उज्जैन के निकट दंगवाड़ा नामक स्थान पर डॉ.वि श्री वाकणकर के निर्देशन में चल रहे पुरातात्विक उत्खनन शिविर में पहुँचे हैं । आज उनका तीसरा दिन है । पहली शाम चम्बल नदी के किनारे स्थित टीले पर चाँद की रोशनी में बिताने के बाद रोज सुबह शाम शुरू हुई उनकी यह गपशप देर रात तक चलती है जिसमे वे ग्रीक और रोम की सभ्यता के विभिन्न पात्रों के विषय में बात करते हैं । उनकी बातचीत में ग्रीक के हेराक्लीज़ या हरक्युलिस शामिल हैं सो वहीँ पंडित राममिलन उन्हें हमारे यहाँ के हनुमान जी के बारे में बताते हैं । उसके बाद वे ग्रीक की हेलेन , मिस्त्र के पिरामिड , और हम्मुराबी के बारे में भी बात करते हैं नोकझोंक के बाद नींद के आगोश में जाने के बाद होती है कैंप की सुबह .. लीजिये पढ़िए अब तीसरे दिन की दोपहर से रात तक की डायरी । इस भाग में बहुत महत्वपूर्ण सूचनाएँ हैं जिनसे आप जानेंगे कि किसी पुरातात्विक स्थल के बारे में कैसे पता चलता है और पुरातत्ववेत्ता वहाँ तक कैसे पहुंचते हैं...

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 9⃣ *भाग नौ*  9⃣

*वो सपनों का गाँव* 

          हम लोग जब अपने शहर के किसी स्थान को देखते हैं तो अक्सर सोचते हैं कि आज से बरसों पहले वह स्थान कैसा रहा होगा ।  हमारे बचपन में यह शहर ऐसा नहीं था, न इतनी इमारतें थीं न इतनी गाड़ियाँ, न इतनी पक्की सड़कें थीं न ही इतने लोग थे । वर्तमान के अतीत की कल्पना करना वहीं तक संभव है जहाँ तक वह अतीत हमारा देखा हुआ होता है लेकिन हम उससे पहले की कल्पना नहीं कर पाते हैं इसलिए कि हमारे जन्म से पूर्व के दृश्य हमारे देखे हुए नहीं होते l फिर भी हम किताबों में पढ़कर और उस समय के चित्र देखकर कल्पना कर सकते हैं कि उस समय वहाँ का जीवन कैसा रहा होगा l

          दंगवाड़ा के इस टीले पर बैठकर मैं भी उस समय की कल्पना करने लगा जब यहाँ सचमुच की कोई बस्ती रही होगी हालाँकि मेरे पास न उस समय का कोई चित्र था न ही कोई किताब थी जिसमें मैं उस ताम्राश्म युगीन ग्राम्य जीवन की कोई झलक देख सकूँ । मेरे पास कल्पना करने के लिए बस यही कुछ टूटे -फूटे अवशेष थे जो सदियों पहले किसी बाढ़ या किसी आपदा के कारण मिटटी की इन सतहों के नीचे दब गए थे ।

          टीले पर खुदी हुई निखात की ओर देखते हुए अचानक मैं उस अतीत की कल्पना में खो गया और सोचने लगा ..यहाँ भी कभी कोई खूबसूरत बस्ती रही होगी जहाँ पेड़ों की घनी छाँव के नीचे खूबसूरत झोपड़ियाँ रही होंगी जिनमे गाँव के सीधे-सादे लोग रहा करते होंगे । गाँव की स्त्रियाँ चम्बल नदी से अपने मटकों में पानी भरकर लाया करती होंगी, किसान दिन भर अपने खेतों में हल चलाने के बाद शाम को जब थके-मांदे घर लौटते होंगे तो उनकी स्त्रियाँ ताम्बे की थाली में उन्हें खाना परोसती होंगी ..। सोचते हुए अचानक मेरे मुंह से बोल फूट पड़े .."वो अमुआ का झूलना वो पीपल की छाँव, घूँघट में जब चाँद था मेहंदी लगे थे पाँव .. आज उजड़ के रह गया वो सपनों का गाँव .. ।" 


          गीत गुनगुनाते हुए भी मेरे मन में कुछ और सवाल कौंध रहे थे ..लेकिन अच्छी खासी पनपती हुई यह सभ्यतायें अचानक लुप्त कैसे हो जाती थीं ? ठीक है एक पीढ़ी ख़त्म हो जाती होगी लेकिन उसका स्थान दूसरी पीढ़ी को ले लेना चाहिए ,जीवन का तो निरंतर विकास होता है ना, जीवन तो यहाँ फलना -फूलना चाहिए था जैसे कि हम आजकल देखते हैं ,कुछ दिन पहले जहाँ ख़ाली ज़मीन होती है कुछ दिनों बाद वहाँ इमारतें खड़ी हो जाती है, फिर वहाँ बस्ती बढ़ती ही जाती है ..लेकिन यहाँ ऐसा क्या हुआ होगा कि सब कुछ ख़त्म हो गया ..?”

          वाकणकर सर मजदूरों को उस दिन के कार्य के लिए आवश्यक निर्देश देकर हम लोगों के पास आ गए थे । मैंने अपने मन में उठते सवाल को आख़िर उनसे पूछ ही लिया। सर ने कहना शुरू किया तुमने हाल-फिलहाल किसी सभ्यता को लुप्त होते नहीं देखा है ना इसलिए  ऐसा कह रहे हो । लेकिन पिछले हजारों बरसों में ऐसा कई बार हुआ है। जीवन अपनी गति से चलता रहता है लेकिन कभी अचानक उस पर विराम भी लग जाता है । सभ्यताओं के समाप्त हो जाने के एक नहीं अनेक कारण हैं । अक्सर नदियों के किनारे बसी बस्तियाँ भीषण बाढ़ में डूब जाती हैं । भूकम्प, ज्वालामुखी, तूफान, अकाल, बाढ़  जैसी प्राकृतिक आपदाओं की वज़ह से भी लोग वहाँ से पलायन कर जाते हैं या समाप्त हो जाते हैं । फिर नदियाँ भी कालांतर में अपना मार्ग बदलती हैं तो उनके किनारे बसे लोगों को बस्ती छोड़ कर जाना पड़ता है । समुद्र के भीतर भी भूकम्प आते हैं तो उनके किनारे की बस्तियाँ नष्ट हो जाती हैं । इसके अलावा बस्तियों के नष्ट होने के पीछे आगजनी, दुश्मनों के आक्रमण, हिंसक प्राणियों के हमले, भोजन या जल की अनुपलब्धता जैसे अनेक कारण हैं ।


          "तो सर हमें पता कैसे चलता है कि कौनसी बस्ती का विनाश किस कारण से हुआ ?" अजय ने सवाल किया । सर ने कहा " किसी भी साइट पर उत्खनन करते हुए उसकी विभिन्न परतों में हर स्तर पर हमें विनाश के कारण मिल जाते हैं । जैसे यदि वस्तुओं पर आग से जलने के चिन्ह मिलते हैं तो हम अनुमान लगाते हैं कि वह बस्ती किसी अग्निकांड में नष्ट हुई होगी । बाढ़ से नष्ट हुई बस्तियों में घर के भीतर की वस्तुओं पर सूखी हुई गाद दिखाई देती है, समुद्र के किनारे पर यदि किसी ऊंची दीवार पर रेत दिखाई दे तो समझो वहाँ सुनामी की वज़ह से विनाश हुआ होगा । भूकंप और ज्वालामुखी की वज़ह से नष्ट होने वाली बस्तियों में भी खुदाई में ऐसे ही सम्बंधित प्रमाण मिलते हैं ।

          मेरे मन में उत्खनन के तकनीकी पक्ष का ज्ञान प्राप्त करने के साथ साथ उत्खनन के कारणों को जानने की जिज्ञासा अधिक थी । दंगवाडा की इस साईट पर विगत एक माह से उत्खनन चल रहा था । हम लोग उत्खनन प्रारंभ होने के कुछ समय बाद दंगवाड़ा पहुँचे थे इसलिए  पूर्व में हो चुके काम से खुद को अपडेट करना ज़रूरी था । हालाँकि  हम लोग प्रशिक्षणार्थी थे और हमारी  कोई प्रत्यक्ष भूमिका उत्खनन में नहीं थी फिर भी भविष्य में पुरातत्ववेत्ता बनने के लिए प्रारंभिक आवश्यक जानकारी से लैस होने की अनिवार्यता तो थी ही । विद्यार्थी थे सो प्रश्न करने की भी हमें छूट थी । हम भी ज्ञान प्राप्ति का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहते थे । बचपन से सुनते आ रहे थे कि पुरातत्ववेत्ताओं को जैसे ही पता चलता है कहीं कोई सभ्यता ज़मीन की परतों के नीचे दबी हुई है वे वहाँ पहुँच जाते हैं और खुदाई शुरू कर देते हैं । प्रश्न यह था कि उन्हें पता कैसे चलता है ? अब उन्हें सपना  तो नहीं आता होगा ।


          मैंने रवीन्द्र के सामने अपनी जिज्ञासा रखी तो रवीन्द्र ने कहा "चलो सर से ही पूछ लेते हैं  । "  फिर वह सर से मुखातिब हुआ .." अच्छा सर, यह बताइये , पुरातत्ववेत्ता को यह कैसे पता चलता है कि उसे कहाँ खुदाई करना है ? ”  तुम्हारा तात्पर्य इस बात से तो नहीं है कि हमें यह कैसे पता चलता कि कौनसी सभ्यता कहाँ दबी हुई है ? “ डॉ.वाकणकर ने प्रतिप्रश्न किया । जी । रवीन्द्र ने गर्दन हिलाई ।

          "चलो तुम्हारी बात को यहाँ से समझने का प्रयास करते हैं ।डॉ. वाकणकर ने बात जारी रखी दरअसल पुरातत्ववेत्ता विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त सूचना के आधार पर यह तय करते हैं कि उन्हें उत्खनन का कार्य कहाँ से प्रारम्भ करना है । अब हम देखते हैं कि उन्हें यह सूचनाएँ कहाँ से व कैसे प्राप्त होती हैं । यह तो हम देखते ही आ रहे हैं कि अधिकांश सभ्यताएँ बसाहट से दूर पाई जाती हैं । अक्सर जंगलों में या किसी नदी के किनारे किसी टीले पर इन बस्तियों के या सभ्यताओं के अवशेष ज़मीन के भीतर दबे होते हैं । लेकिन कभी कभी ऐसा होता है कि  तेज़ वर्षा के कारण, भूस्खलन से या किसी उथल - पुथल की वज़ह से कुछ चीज़ें सतह पर आ जाती हैं । कुछ अवशेष जंगलों के भीतर यूँ ही बिखरे हुए होते हैं जहाँ वर्षों से कोई गया नहीं होता है सो इसकी जानकारी किसी को नहीं होती ।

          "लेकिन सर इनकी जानकारी सरकार तक कैसे पहुँचती है ?" अजय ने सवाल किया । सर ने कहा "पुरातत्व विभाग या प्रशासन तक प्रारंभिक सूचना पहुँचाने वाले होते हैं ज्यादातर ग्रामीण लोग, किसान या उस जगह पर घूमने जाने वाले या काम करने वाले लोग , जैसे कभी कभी चरवाहे भी बताते हैं कि फलाँ जगह पर उन्हें कोई प्रतिमा मिली है या कोई सिक्का या बर्तन, पॉटरी या कोई स्क्रेपर मिला है । कभी किसी किसान को खेत में हल चलाते हुए ज़मीन के नीचे भी कुछ मिल जाता है । कभी मकान बनाने के लिए नींव खोदते हुए कुछ वस्तुएँ या कोई संरचना दिख जाती है ।  कभी जंगल में लकड़ी काटने वाले लकड़हारे या शिकारी जो बहुत भीतर तक जाते हैं सतह पर पड़े किसी अवशेष को देखकर ऐसी सूचना देते हैं ।"

          "लेकिन सर क्या लोग इमानदारी से ऐसी सूचना देते हैं ? " रवीन्द्र ने प्रश्न किया । सर ने कहा .." अरे नहीं.. उन लोगों को यह पता थोड़े ही होता है कि सरकार का कोई पुरातत्व विभाग है । वे लोग अक्सर अपने ग्रामीण साथियों को यह बात बताते हैं । फिर भी अगर हम तक सीधे सूचना न भी पहुँचे  तो कहीं कुछ मिला है यह बात धीरे धीरे फैलती ही है ।  हालाँकि  हमारे यहाँ छुपाने की प्रवृत्ति ज्यादा है, सिक्के वगैरह मिलते हैं तो लोग बताते ही नहीं, मूर्तियाँ मिलती हैं तो लोग घरों में रख लेते हैं या गाँव के बीच कहीं स्थापित कर पूजा शुरू कर देते हैं । तस्कर या चोर लोग तो वैसे भी बात गुप्त रखते हैं । लेकिन ग्राम सहायक, पटवारी, पुलिस या पत्रकारों  के माध्यम से बात हम तक यानि पुरातत्व विभाग तक पहुँच ही जाती है । फिर हम प्राप्त सूचनाओं के आधार पर सर्वे करते हैं और उन सूचनाओं की प्रामाणिकता की जाँच करते हैं, फिर प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा जाता है, मंजूरी मिलने के बाद पूरी कार्य योजना बनाई जाती है, खर्च की राशि  तय की जाती है । कार्य प्रारंभ करने से पूर्व कार्यस्थल पर जाकर यह  तय करते हैं कि खुदाई की शुरुआत कहाँ से करनी होगी, कहाँ ट्रेंच बनानी होगी, किस लेयर से शुरूआत  करना है, कहाँ तक खुदाई करना है आदि आदि  ..।

          "हाँ, एक बात बताना तो मैं भूल ही गया ।" सर ने कहा । "आजकल किसी साईट के बारे में हवाई जहाज के माध्यम से भी सूचना प्राप्त होती है इस हवाई सर्वेक्षण को एरोग्राफ़ी कहते हैं एक बार सेकण्ड वर्ल्ड वार के समय ऐसा ही हुआ था । युद्ध के दौरान जब सैनिक हवा में उड़ान भर रहे थे फिलिस्तीन और इज़राइल के पास सैनिकों को एक लुप्त बस्ती होने का आभास हुआ ।" "लेकिन सर इतनी ऊपर से कोई अवशेष कैसे दिखाई देता होगा?" रवीन्द्र ने सवाल किया ।

          " ऐसे डायरेक्ट थोड़े ही दिखता है भाई ।" सर ने कहा " उन्हें तो जंगल और वहाँ के पेड़-पौधे ही दिखाई दिए लेकिन सब ओर जहाँ हरे भरे जंगल थे बीच में एक हिस्सा ऐसा था जो अविकसित था और जहाँ के पेड़ पौधे स्वस्थ्य नहीं थे, उनके पत्ते अन्य पेड़ों के पत्तों की तुलना में कुछ पीले थे सो उन्हें संदेह हुआ कि यहाँ नीचे कोई बस्ती दबी होगी तभी पेड़ पौधों को ठीक से ख़ुराक नहीं मिल पाई है । उसके बाद उनकी सूचना के आधार पर वहाँ खुदाई की गई, और वहाँ पूरा एक शहर निकल आया तुम लोगों ने शायद जेरोम शहर का नाम सुना होगा यह वही शहर है । इसके अलावा अब मरीन आर्क्यालोजी नाम की एक ब्रांच भी है जिसमे समुद्र के भीतर डूबी हुई सभ्यताओं की खोज गोताखोरों द्वारा की जाती है । पुरातत्ववेत्ताओं को बाक़ायदा इसके लिए प्रशिक्षण भी दिया जाता है । "

          सर ने एक बार में ही हमें संक्षेप में पुरातात्विक साइट्स सम्बन्धी सूचनाएँ प्राप्त होने से लेकर उन पर क्रियान्वयन की पूरी प्रक्रिया बता दी थी । हालाँकि यह प्रारंभिक जानकारी थी और यह हम क्लास में भी पढ़ चुके थे लेकिन किसी साईट पर पहुँचकर प्रत्यक्ष रूप से यह जानकारी प्राप्त करने का यह पहला अवसर था । आखिर थ्योरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क तो होता ही है ।

          सर जैसे ही खामोश हुए मेरे  भीतर के कवि ने दर्शन बखानना शुरू कर दिया लेकिन कितना अजीब है ना, ऐसे जीवन के बारे में सोचना जो अचानक  लुप्त हो गया हो । जैसे आज यहाँ चूल्हा जल रहा है, माताएँ  खाना पका रही हैं, बच्चे खेल रहे है, लड़कियाँ पेड़ों पर झूला डालकर झूल रही हैं, कोई चरवाहा जंगल में किसी पेड़ के नीचे बैठा बंसी बजा रहा है , खेतों में किसान हल चला रहे हैं, रात में चौपाल पर गाना-बजाना चल रहा है, शादी-ब्याह में नाच-गाना चल रहा है, मंदिर में भजन चल रहे हैं और अचानक रात में भूकम्प आ जाए  या नदी में बाढ़ आ जाए या बस्ती में आग लग जाए और सुबह सब खल्लास 

          डॉ. वाकणकर मेरी बात ध्यान से सुन रहे थे उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा " लेकिन सभ्यता के विनाश से पूर्व का चित्र इतना भी रूमानी नहीं है भाई । मनुष्य के  जीवन में दुखों की कोई कमी तो है नहीं, सामान्य मनुष्य सदा से शोषित ही रहा है, कभी प्राकृतिक विपदा की वज़ह से तो कभी खुद की वज़ह से उसका विनाश हुआ है । चारागाह या खेतों के लिए, धन -संपत्ति के लिए मनुष्य ही मनुष्य पर आक्रमण करता रहा है । कई बार रोजी-रोटी की कशमकश भी उसे बस्ती छोड़ने को विवश कर देती है, गाँव के गाँव खाली हो जाते हैं  ऐसा तो अब भी होता है । लेकिन मनुष्य फिर भी हिम्मत नहीं हारता, वह नई जगह पर अपनी बस्ती बसाता है, हालाँकि अगली बार वह इतना सावधान तो रहता है कि फिर हादसे की पुनरावृत्ति न हो ।

          "सचमुच यह मनुष्य महान है सर ।" मैंने कहा । "हाँ यह मनुष्य ही है.." सर ने कहा "जिसने प्रकृति से युद्ध करके जीना सीखा है और जीवन को बेहतर बनाया है । जैसे कि आजकल आपदा प्रबंधन शब्द तुमने सुना होगा बाढ़, सुनामी, अकाल इन सब स्थितियों से निपटना अब मनुष्य पहले की अपेक्षा बेहतर जानता है और यह उसने पिछले अनुभवों से ही सीखा है । इसीलिए  जीवन के भविष्य के बारे में जानने के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है जीवन का अतीत जानना इसलिए कि अतीत ही जीवन के भविष्य का मार्ग प्रशस्त करता है । इस पर हमारे भविष्य की नीव टिकी है, हर नया आविष्कार या खोज पहले की गई खोज के आधार पर ही आगे बढ़ाया जाता है ।सर ने बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी ..अब सर खुजाने की बारी मेरी थी ।

          हमारा आज का दिन भी ऐसे ही अपनी जिज्ञासाओं को सर के सामने रखकर उनका समाधान पाने में बीत गया । हम लोग मजदूरों को खुदाई करते हुए देखते रहे और सोचते रहे क्या इस सभ्यता में निवास करने वाले इन्ही मजदूरों के पूर्वज रहे होंगे या वे कोई और थे जो कहीं और से आये थे और न जाने कहाँ चले गए । शाम तक आज का हमारा प्रशिक्षण समाप्त हो चुका था और हम लोग अपने तम्बुओं में लौट आये थे । भाटीजी के हाथों की गर्मागर्म चाय पीने के बाद हम लोग टहलने निकल गए और लगभग एक घंटे में लौट आये । सच कहें तो हम लोगों में से किसी का मन यहाँ नहीं लग रहा था ऐसा लग रहा था कि जल्द से जल्द यह प्रशिक्षण समाप्त हो और हम लोग अपने हॉस्टल लौट जाएँ हालाँकि हम लोग अपने मन को यह कहकर दिलासा दे रहे थे कि इससे क्या फ़र्क पड़ता है वहाँ रहें या यहाँ रहें घर से तो दूर हैं ही । देर रात तक हम लोग बात करते रहे । हम लोगों की बातों में घर की याद , माँ के हाथों का बना खाना ,अपने बचपन की शरारतें जैसे विषय शामिल रहे ।

 

🔲 *शरद कोकास*  🔲

गुरुवार, 14 मई 2026

8-भीमबैठका के आलू वाले बाबा


यानी हम सबके प्रिय डॉ वि श्री वाकणकर जिन्होंने 1957 मे भीमबैठका मे चट्टानों पर बनाए गए चित्रों की खोज की थी

📕 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📕

✍🏽 *शरद कोकास* ✍🏽

उज्जैन से बड़नगर जाने के मार्ग पर इंगुरिया है जहां से भीतर की ओर एक गाँव है दंगवाड़ा यहाँ चम्बल नदी के किनारे एक ताम्रशमयुगीन साइट मिली थी जहाँ सन 1979- 80 मे विक्रम यूनिवर्सिटी और मध्यप्रदेश शासन द्वारा उत्खनन करवाया गया था । विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला के छात्रों के लिए इस उत्खनन मे शामिल होना उनके कोर्स या प्रेक्टिकल के अंतर्गत शामिल था ।

तो अब हम अतीत मे वर्तमान का प्रक्षेपण करते हुए चलते हैं उन दिनों मे जब यह छात्र उत्खनन के लिए 'दंगवाड़ा' नामक स्थल पर आये हुए हैं । आने के बाद से वे विभिन्न चर्चाओं में लगे हैं और अब तक उनकी बातचीत में अयनांत की चर्चा, हरक्युलिस और हनुमान, मिस्त्र के पिरामिड, ग्रीक माइथोलॉजी, ट्रॉय का युद्ध, सिक्कों के बारे में बातचीत आदि शामिल हो चुके हैं । आज उनका तीसरा दिन है और सुबह हो चुकी है । चम्बल के घाट पर स्नानादि से निवृत होकर और भाटीजी की भोजनशाला में नाश्ता करने के उपरान्त अब सभी छात्र ट्रेंच पर पहुँच चुके हैं ..अब आगे पढ़िए

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8⃣ *भाग -आठ* 8⃣

भाग 8 - *भीमबैठका के आलू वाले बाबा*

उज्जैन के निकट दंगवाड़ा के इस पुरातात्विक उत्खनन शिविर में हम लोगों का यह तीसरा दिन है । हालाँकि सही ढंग से काम की शुरुआत का यह पहला ही दिन था । परसों हम लोग पहुँचे थे और कल का दिन तो केवल निरीक्षण में ही बीत गया था ।

आज हम लोग बिलकुल ठीक टाइम पर साईट पर पहुँच गये । डॉ.वाकणकर अपना चोगे नुमा काले रंग का लम्बा सा कोट पहने ट्रेंच पर उपस्थित थे और मजदूरों से पिछले दिन के काम की रपट लेते हुए उनके हालचाल पूछ रहे थे । 

यह फरवरी की एक सुहानी सुबह थी और बरगद के घने पत्तों से झाँकती हुई नर्म धूप हम तक पहुँच रही थी हालाँकि वातावरण में उपस्थित ठण्ड से वह खौफ़ खा रही थी और कुछ सहमी सी थी । हमने धूप को सलाम किया और उससे कहा ..डरो मत ठण्ड तुम्हें खा नहीं जायेगी ।
वाकणकर सर अपने दोनों हाथ किसी क्रिकेट अम्पायर के कोट की तरह दिखाई देने वाले अपने कोट की लम्बी जेबों के भीतर डाले हुए थोड़ा झुककर ट्रेंच की गहराई देख रहे थे । कार्य प्रारंभ करने से पूर्व यह परीक्षण आवश्यक होता है । मेरी इच्छा उनके हाथों को देखने की हो रही थी । मैं जानता था यही वे हाथ हैं जो इतिहास में गहराई तक उतरने का हौसला रखते हैं । 

रवीन्द्र ने देखा कि मैं सर के कोट को बहुत ध्यान से देख रहा हूँ तो जाने कैसे उसने मेरे मन की बात समझ ली । "पता है शरद " उसने कहा ... " सर हमेशा ऐसे ही लम्बी लम्बी जेबों वाले कोट पहनते हैं, ऐसे ही इनके एक कोट का किस्सा भीमबैठका गुफ़ाओं में शैलचित्रों की खोज से भी जुड़ा है । 

"अच्छा !" मुझे वह किस्सा जानने की उत्सुकता हो रही थी.. " कोट का भीमबैठका से क्या सम्बन्ध है ? ऐसा क्या हुआ था, बताओ तो .." मैंने उससे पूछा ।

रवीन्द्र ने धीमी आवाज़ में बताना शुरू किया .." यह सन सत्तावन की बात है । वाकणकर सर एक बार भोपाल होशंगाबाद मार्ग से कहीं जा रहे थे । अचानक बातों बातों में उनके एक सहयात्री ग्रामीण ने बताया कि साहब यहाँ जंगल के अन्दर भूत -प्रेतों के फोटो बने हुए हैं । वाकणकर साहब भूत-प्रेत में तो विश्वास करते नहीं हैं लेकिन उन्हें कुछ खटका हुआ, हो सकता है कोई प्राचीन धरोहर इन जंगलों में हो ।" 
"अरे हाँ.." मैंने बीच में रवीन्द्र को टोकते हुए कहा "अजंता की गुफाओं की खोज भी तो ऐसे ही हुई थी ना, एक अंग्रेज़ को किसी चरवाहे ने बताया था कि जंगल में कोई भूत का फोटो है फिर उसने दूरबीन से देखकर गुफाओं में चित्र ढूँढे थे ।" 

"हाँ ऐसा ही कुछ समझ लो ।" रवीन्द्र ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा " बस फिर क्या था, वे वहीं बस से उतर गए और जंगल के भीतर चले गए । वहाँ उन्हें एक बाबा की कुटिया मिली उन्होंने बाबा से वहाँ आने का अपना उद्देश्य बताया और उसी कुटिया में वे ठहर गए ।"
"फिर क्या हुआ ?" अब मुझे कहानी में मज़ा आ रहा था । "फिर.." रवीन्द्र ने मुझे उत्सुक जानकर मुस्कुराते हुए कहा । " अगले दिन वाकणकर सर जंगल के भीतर चले गए । वहाँ अभी जैसा कोई रास्ता तो था नहीं, बस जंगल ही जंगल था । फिर उन्हें बड़ी बड़ी चट्टानें मिलीं जिन पर चढ़ते - उतरते हुए वे पहली गुफ़ा तक पहुँच गए । 

उस पहली गुफ़ा में उन्हें जब आदिम मानव द्वारा बनाया गया पहला शैल चित्र मिला तो वे खुशी से उछल गए । फिर तो उन्होंने ठान लिया कि वे सुबह सुबह ही जंगल के भीतर निकल जाया करेंगे और गुफ़ाओं की खोज करेंगे ।
"यार, लेकिन गुफाओं की खोज से इस कोट का क्या ताल्लुक़ है? " मेरे दिमाग़ में अब भी वह कोट लहरा रहा था । " बता रहा हूँ ना भाई, इतने उतावले काहे हो रहे हो ।" रवीन्द्र ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और धीरे से कहा "अब वहाँ तो घना जंगल था । कुछ खाने पीने की व्यवस्था तो जंगल में थी नहीं । बाबाजी की कुटिया में भी कुछ नहीं था लेकिन कोई उनका भक्त उन्हें बोरा भर आलू दे गया था सो वे इसी चोगे नुमा कोट की जेब में बाबाजी की कुटिया से कुछ कच्चे आलू और माचिस रखकर जंगल के भीतर निकल जाते थे । 

वे दिन भर जंगल में भटककर लताओं और वृक्षों के झुरमुट के पीछे छुपी गुफाओं में हज़ारों साल पहले के मनुष्य द्वारा बनाई हुई रॉक पेंटिंग्स खोजते थे और शाम होते ही साधु बाबा की कुटिया में लौट आते । दिन में जब भी उन्हें भूख लगती वे आलू भूनकर खा लिया करते थे । । उनकी दाढ़ी बढ़ गई थी और हुलिया भी अजीब सा साधू सन्यासियों जैसा बन गया था ।
वे हमेशा जेब में आलू रखते थे और उन्हें भूनकर खाते थे इसलिए जंगल के पास के गाँव वासी उन्हें ‘आलू वाले बाबा‘ कहकर पुकारने लगे थे । आख़िर एक एक कर उन्होंने जंगल की गुफाओं में छिपे वे तमाम शैल चित्र ढूंढ निकाले जो उस आदिम मनुष्य ने बनाये थे । उनकी इस खोज के लिए उन्हें पद्मश्री अवार्ड हुई और सम्पूर्ण विश्व में उनका नाम हुआ । ऐसी होती है काम की लगन ।“

"लेकिन कुछ भी कहो, भीमबैठका की गुफाओं में शैलचित्रों की खोज बहुत महत्वपूर्ण काम है ।" मैंने कहा " अगर सर इन्हें नहीं खोजते तो न जाने और कितने साल यह चित्र जंगलों में लताओं और पेड़ों के बीच छुपे रहते । लेकिन उस आदिम मनुष्य के बारे में भी सोच कर देखो जिसने यहाँ ये चित्र बनाये होंगे । वैसे यहाँ कितने शैलाश्रय होंगे रवीन्द्र ? " रवीन्द्र ने बताया " यहाँ लगभग साढ़े सात सौ शैलाश्रय हैं जिनमें पाँच सौ शैलाश्रयों में चित्र बने हुए हैं जिनका काल चालीस हज़ार वर्ष से एक लाख वर्ष पूर्व तक का माना जाता है । इन आदिम गुफाओं में पूर्व पाषाण काल से मध्य पाषाण काल तक का मनुष्य रहता था ।
"भीमबैठका के इस पुरातात्विक क्षेत्र में इनके अलावा शिलाओं पर लिखी अनेक जानकारियाँ भी मिलती हैं । इन शैलचित्रों में उस आदिम मनुष्य के जीवन के अनेक क्षण चित्रित हैं जिनमें सामूहिक नृत्य, शिकार के दृश्य, पशु -पक्षी और वन्य प्राणियों के चित्र, युद्ध और मनुष्य के दैनिक क्रियाकलापों से जुड़े चित्र हैं । यह सारे चित्र विभिन्न खनिज और वानस्पतिक रंगों से बनाए गए हैं जिनमें गेरुआ, लाल, सफ़ेद रंग प्रमुख हैं कहीं कहीं पीले व हरे रंग का प्रयोग भी हुआ है ।" रवीन्द्र धीमी आवाज़ में वैश्विक महत्व के इन शैल चित्रों के बारे में बता रहा था ।
"बस कर भाई, तेरा तो पूरा निबंध रटा हुआ है ।" मैंने रवीन्द्र को रोकते हुए कहा " अब यह अपने कोर्स में भी नहीं है वर्ना मैं भी रट लेता ।" "तो मुन्ना, क्या जो चीज़ कोर्स में होगी वही रटेगा क्या और तुझे तो इस साल भी टॉप करना है फिर आगे चलकर कवि और कथाकार बनना है तुझे तो मनुष्य की इस कहानी में रूचि होना चाहिए ।" 
रवींद्र की बात सुनकर मुझे थोड़ी झेंप सी महसूस हुई " नहीं यार, मनुष्य की कहानी तो मुझे अच्छी तरह पता है ,दरअसल जब से तूने आलू का ज़िक्र किया है मुझे भूख सी लगने लगी है और मेरा आलूबोंडा खाने का मन हो रहा है ।" " धत तेरे की ..भुक्खड़ कहीं का । " रवींद्र ने कहा ।" कोई बात नहीं ,भाटी जी से कहेंगे कल नाश्ते में आलुबोंडा ही बनवायेंगे ।

रवींद्र कुछ देर तक चुप रहा फिर उसने गंभीर होकर कहा "अब तुझमें और उस आदिम इंसान में फ़र्क ही क्या है वह भी इसी तरह रात दिन सिर्फ़ खाने के बारे में ही सोचता रहता था । शिकार के लिए सुबह सुबह निकलता और देर रात घर लौटता फिर अगले दिन वही काम । 
हाँ याद आया, भीमबैठका के इन गुफ़ा चित्रों में उस आदिम मनुष्य के जीवन की दैनिक घटनाओं के अलावा उस मनुष्य के आदिम धर्म तथा उससे सम्बंधित अनुष्ठानों के चित्र भी हैं, जैसे मनुष्य जब शिकार करने जाता था तो वह हिरन की आकृति बनाकर उस पर भाले से वार करता था, उसकी मान्यता थी कि इससे शिकार अवश्य ही प्राप्त होगा । कुछ गुफाओं में शहद जमा करने के चित्र हैं , कुछ में हाथी घोड़ों की सवारी के चित्र हैं , कुछ में सूअर, कुत्तों,साँप बिच्छू और घडियालों के चित्र भी हैं । कार्बन डेटिंग से पता चला है कि प्याले नुमा कुछ निशान तो एक लाख वर्ष से भी पुराने हैं ।"
रवीन्द्र भीमबैठका के बारे में बताते हुए जैसे उन गुफाओं में ही पहुँच गया था । हम लोग पुरातत्व के छात्र है सो हमारी रूचि कुछ टेक्नीकल बातों में अधिक होती है सो उसका बताने का तरीका भी कुछ ऐसा ही था । "लेकिन यार उसने वे रंग बनाये कैसे होंगे जिनसे बनाए चित्र आज तक कायम हैं ? मेरे मन में यह सवाल शुरू से ही उमड़ रहा था । 

"भाई ,वह आदिम मानव इस तकनीक में तो वाकई बहुत आगे था ।" रवींद्र ने कहा " उसने यह चित्र प्राकृतिक रंगों से बनाये । प्रारंभिक चित्र तो उसने सफ़ेद और लाल रंग से बनाये जिसके लिए उसने मैंगनीज़, हैमेटाईट जैसे खनिजों और लाल पत्थरों का उपयोग किया । मध्यकाल के कुछ चित्र हरे व पीले रंगों से बने हैं इसके लिए उसने वनस्पतियों का उपयोग किया । इसके अलावा लकड़ी के कोयले से बने रंगों का भी प्रयोग है ।"
"लेकिन यह रंग अब तक टिके कैसे हैं?" मेरा अगला सवाल था ।रवीन्द्र ने बताया " हाँ यह बात थोड़ी आश्चर्यजनक लगती है लेकिन केमिकल प्रोसेस से यह पता लगा है कि इसके लिए उसने रंगों में पत्तियों का अर्क और जानवरों की चर्बी जैसी वस्तुएँ मिलाईं ।" 
"अरे वा !" मैंने कहा " इस तरह तो यह ऑइल पेंटिंग जैसी स्थाई वस्तु हो गई ।" " बिलकुल " रवीन्द्र ने कहा " इसके अलावा इनके बचे रहने का एक कारण और भी है जैसे अधिकांश चित्र गुफाओं की भीतरी दीवारों और छतों पर बने हैं इसलिए भी ये मौसम की मार से सुरक्षित रहे ।"

" अच्छा अब इतना बताया है तो यह भी बता दो कि इसका नाम भीमबैठका कैसे पड़ा ? किंवदंती तो यह है कि महाभारत के भीम से इसका सम्बन्ध है ।" मैंने रवीन्द्र को थोड़ा और कुरेदा । 

"तू भी ना यार.." रवीन्द्र ने कहा " किंवदंती तो किंवदंती होती है कोई भीम हुआ होता तब न उसकी बैठक होती । अब यहाँ सामने वाली जो विशालकाय चट्टान है उसे देखो तो लगता है कोई विशालकाय व्यक्ति उकडू बैठा हुआ है । अब विशालकाय के नाम से या तो पौराणिक पात्र भीम याद आता है या फिर कुम्भकरण । अब कुम्भकरण का नाम तो दिया नहीं जा सकता था क्योंकि वो दक्षिण में रहता था सो गुरुदेव ने इसे भीम का नाम दे दिया ।"
“क्या खुसुर-पुसुर चल रही है रे दुष्टों ?“ अचानक डॉ.वाकणकर का ध्यान हम लोगों की ओर गया । ‘सज्जनों’ और ‘दुष्टों’ उनके प्रिय सम्बोधन थे, जिनका अभिप्राय हम उनके बुलाने के तरीके से समझ जाते थे । जब उन्हें हम लोगों को कहीं ले जाना होता या किसी विषय पर जानकारी देनी होती वे हम लोगों को 'सज्जनों' कहते थे लेकिन हमारी बदमाशियों पर हमें डांटने के लहजे में 'दुष्टों' कहकर बुलाते थे, हालाँकि यह भी उनका प्यार भरा संबोधन ही होता था । हमें खुसुर-पुसुर करते देख उन्हें लगा कि हमारे दिमाग में कोई शरारत कुलबुला रही है सो उन्होंने हमें 'दुष्टों' कहकर सम्बोधित किया था । 

“ कुछ नहीं सर । ” रवीन्द्र ने मुस्कुराते हुए कहा “ हम लोग आपका कोट देख रहे थे ।”

“ऐसा क्या हे रे इस कोट में ?“ सर अपने कोट की दोनों जेबों में हाथ डाले हुए थे ,उन्होंने हाथों को थोड़ा सा फैलाया और भीतर की ओर झाँकते हुए कहा ।" सर, आप यही कोट पहनकर भीमबैठका के शैलचित्रों की खोज करने गए थे ना ?" मैंने उत्सुकतावश उनसे पूछ ही लिया । 

सर ज़ोर से हँसे .." अरे पगले वह उन्नीस सौ सत्तावन था .. इत्ते साल चलता है क्या कोई कोट ।" मैं थोड़ा झेंप गया फिर भी मैंने अपनी ओर से कहा " मतलब सर वह ऐसा ही मतलब इसी टाइप का लंबा सा कोट रहा होगा ना ।" सर को पता ही नहीं चला कि इस कोट के बहाने अभी अभी हम लोग भीमबैठका की सैर कर आये हैं । दरअसल वे ट्रेंच पर अपने काम में इतना डूबे हुए थे कि इन सब बातों के लिए उनके पास वक्त भी नहीं था ।

भीमबैठका की बात खतम औज़ारों की बात शुरू 

सर ने चश्मे के ऊपर से मेरी ओर देखा और कहा " ठीक ठीक है ..वो सब बातें बाद में ..अभी चलो आज तुम लोगों का परिचय उत्खनन में काम आनेवाले औज़ारों से करवाते हैं । किताबों में इनके चित्र तो तुम लोग देख ही चुके हो । देखो यह कुदाल है, खुदाई की शुरुआत इसी से होती है और यह खुरपी, प्रारम्भिक खुदाई के पश्चात इसका प्रयोग समय समय पर किया जाता है ताकि कुदाल के आघात से कोई वस्तु टूट ना जाए । 
फावड़ों से मिट्टी हटाई जाती है घमेलों में भरकर और यह ब्रश है, यह छोटे-बड़े कई प्रकार के होते हैं ,उत्खनन में प्राप्त वस्तुओं को इनसे साफ किया जाता है । किसी परत में किसी अवशेष का ऊपरी हिस्सा दिखाई देने पर उसे बाहर निकालने के लिए भी ब्रश का उपयोग किया जाता है ।
यह ब्लोअर है गाड़ी के भोंपू जैसा, इसे दबाने से हवा निकलती है, जहाँ ब्रश से भी नुकसान की सम्भावना हो वहाँ इसका उपयोग करते हैं । और भी बहुत से टूल्स हैं नापने के लिए टेप, कपड़े की थैलियाँ, मार्क करने के लिए पेन, बड़ा करके देखने के लिए यह मैग्निफाइंग ग्लास और प्रत्येक अवशेष का चित्र लेने के लिए यह कैमरा ।“
हमारे मन की तरलता में कुछ प्रश्न तैर रहे थे ...इतने महत्वपूर्ण कार्य के लिए इतने साधारण से औज़ार ? पुरातत्ववेत्ता क्या इन्ही की सहायता से ज़मीन के नीचे दबा इतिहास खोज कर निकालते हैं ? विज्ञान के बढ़ते चरणों के साथ तकनीक भी कितनी आगे बढ़ चुकी है लेकिन एक पुरातत्ववेत्ता के पास साईट पर कितने कम औज़ार होते हैं । 

सर ने हमारे मन की बात समझते हुए कहा “ इनके अलावा बाकी और भी टूल्स होते है जैसे माइक्रोस्कोप, फिर आगे काल निर्धारण के लिए उपयोग में आने वाले या कार्बन डेटिंग की मेथड में काम आने वाले भी बहुत से टूल्स होते हैं लेकिन वे यहाँ नहीं होते बल्कि लैब में होते है । बाक़ी सब टूल्स का उपयोग तो तुम लोग देख देख कर समझ जाओगे ।“ सर ने जैसे हम लोगों के दिमाग़ में चलने वाले सवाल पढ़ लिए थे । फिर जालियों की ओर इशारा करते हुए कहा “जैसे वो देखो अलग अलग मोटी - पतली जालियों वाली छन्नियाँ । निखात से निकली मिट्टी फेंकने से पहले इनमें छानना ज़रूरी होता है ।“
“और सर अगर बगैर छाने फैंक दे तो ?” राममिलन ने अपनी सहजता में सवाल किया । “अरे दुष्ट ! और कहीं उसके साथ नूरजहाँ की अंगूठी का हीरा भी फिका गया तो ?" डॉ. वाकणकर ने हँसते हुए कहा । 

हम लोगों ने सर के इस हास्य बोध पर ज़ोरदार ठहाका लगाया । राममिलन ने अपने कान पकड़ते हुए कहा “ तब तो साहब ऊ शाहजहाँ की आत्मा हमें कभी माफ नहीं करेगी ।“ ”अरे पंडित जी.. शाहजहाँ की नहीं जहाँगीर की , शाहजहाँ की बेगम का नाम तो मुमताज महल था ...इसकी बेगम का नाम उसके साथ जोड़ोगे तो नहीं चलेगा । “ किशोर त्रिवेदी ने राममिलन के स्टेटमेंट को सुधारते हुए कहा ।

किशोर आज सुबह सुबह ही दंगवाड़ा पहुँचा था । राममिलन किशोर का इशारा समझ गया और ज़ोर का अट्टहास करते हुए कहा “ ऐसन है भैया, ऊ जमाने में नहीं चलता होगा । ई जमाने में तो सबै चलता है किसीकी लुगाई का नाम किसी के भी साथ जोड़ दो क्या फरक पड़ता है ।“ हम लोगों ने देखा सर मज़दूरों के साथ बातचीत में मशगूल थे और हमारी बकवास पर उनका ध्यान नहीं था ।

🔲 *शरद कोकास* 🔲

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