मंगलवार, 26 मई 2026

21 - प्राचीन मूर्तियों पर तस्करों की नज़र


तस्करी कैसे होती थी , ज़मीन से निकली वस्तु घर क्यों नहीं ले जा सकते, पुरानी और प्राचीन मे क्या अंतर है पढिए इस एपिसोड मे 

🐴 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 🐴

शरद कोकास 

पूर्वकथा- पिछले भाग में आपने पढ़ा कि सारे छात्र शाम हो जाने के पास अलाव के पास बैठे हैं और आज की बातचीत में शामिल है प्राचीन समय में ग्रीस में होने वाले ओलम्पिक की बातें और पांच खुर वाले घोड़े की बातें .. लीजिये पढ़िए अब उससे आगे..*  

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🦄 *भाग - इक्कीस* 🐴

21 -  *प्राचीन मूर्तियों पर तस्करों की नज़र*

अलाव की आग बुझ चुकी थी और अंगारों के स्थान पर अब राख़ नज़र आ रही थी । मुझे यकीन था कि राख़ के नीचे कोई चिंगारी अवश्य दबी हुई होगी जिसे उम्मीद होगी कि किसी दिन आग की तलाश में भटकता हुआ कोई मुसाफ़िर शायद फिर यहाँ आएगा । 

मुझे दुष्यंत जी की ग़ज़ल का वह शेर याद आया 

"थोड़ी आँच बची रहने दो थोड़ा धुआं निकलने दो ,

तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफ़िर आयेंगे ।"  

हम लोग भी मुसाफ़िर की तरह ही तो यहाँ आये हैं ..कुछ दिन बाद यहाँ से चले जायेंगे । तब तक न आग बची होगी न चिंगारी ।  क्या पता इस साईट में भी आगे कुछ न निकले और फिर पुरातत्व विभाग इसे अन्य साइट्स की तरह विस्मृत कर किसी नई साईट पर काम की तलाश में जुट जाए । 

इस अनदेखे भविष्य के बारे में सोचते हुए मुझे जाने क्या क्या ख़याल आने लगे । मैंने सोचा हो सकता है फिर बरसों बाद यहाँ कोई बस्ती बसे और फिर एक दिन चम्बल की बाढ़ के बाद वह बस्ती भी उजड़ जाए । फिर बरसों बाद कोई पुरातत्ववेत्ता किसी प्राचीन सभ्यता की तलाश में यहाँ तक पहुँचे और उसे उपरी सतह पर राख का यह ढेर मिले ।

क्या उसे इस बात का ख़याल भी आएगा कि विक्रम विश्वविद्यालय के कुछ छात्र पुरातत्ववेत्ता यहाँ आये थे और सर्दियों की किसी रात में यहाँ बैठकर उन्होंने अपने पुरखों के साथ साथ ग्रीक के ओलिम्पिस पर्वत पर रहने वाले देवताओं को याद किया था ?

रात गहराने लगी थी । सारे मित्र नींद में दिनभर की स्मृतियों के साथ किसी दौड़ में शामिल हो चुके थे । मुझे नींद नहीं आ रही थी .. मैं चुपचाप लेटा हुआ और अपने घर के नर्म बिछौने के बारे में सोच रहा था । तम्बू में बीत  रही इस ज़िंदगी के बारे में सोचते हुए मुझे अपने आदिम पुरखों के बारे में कुछ ख़याल आने लगे  । 

मैं सोचने लगा .. उनका जीवन कितनी कठिनाइयों से भरा हुआ था । उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ भी ज्ञान अर्जित किया वे उसे किस तरह अपनी आने वाली पीढ़ी को सौंपते गए । आज एक बच्चा जन्म लेने के बाद अपनी उम्र के प्रारंभिक वर्षों में ही इतना कुछ सीख जाता है जिसे सीखने में हमारे पूर्वजों को हजारों साल लग गए । मुझे यह सोचकर अच्छा लगा कि हमारे आदिम पूर्वजों ने अपने स्वयं के प्रयासों से जो कुछ सीखा उसे अगली पीढ़ी को सौंपने की यह परंपरा अभी भी जारी है। 

मुझे अपनी सुविधाओं के बारे में सोचते हुए यह ख़याल भी आया कि यदि मैं अपने घर से बाहर नहीं निकलता तो शायद इतना कुछ ज्ञान अर्जित नहीं कर पाता । आज भी मैं इस बात में विश्वास रखता हूँ कि एक बच्चा अपने घर में रहकर जितना कुछ नहीं सीख पाता जितना वह घर से बाहर निकलकर अकेले ही कठिनाइयों से जूझते हुए सीख जाता है  । 

हम लोग अपने अपने घरों में माता-पिता के सान्निध्य में अनेक बातें सीख नहीं पाते हैं । यह शिविर हमारे लिए केवल पाठ्यक्रम से सम्बंधित ही नहीं है  बल्कि यहाँ रहकर हम विपरीत परिस्थितियों में कैसे जिया जाए इस बात का भी प्रशिक्षण ले रहे हैं । 

शिविर के अनुशासन का पालन करना हमारे लिए अनिवार्य ही नहीं है बल्कि घर में जिस तरह की सुविधाओं के साथ हम जीते हैं बगैर उनके भी जीना सीखना हमारे इस शिविर के प्रशिक्षण का एक भाग है । इसीलिए डॉ वाकणकर हमें रोज़ हिदायतें दिया करते हैं  और कभी -कभार हमारे तम्बू में निरीक्षण के लिए आया करते हैं ।

अगली सुबह की बात है 

सुबह हम नींद से भारी अपनी पलकों को खोलने के प्रयास में ही थे कि अचानक तम्बू के बाहर सर की आहट सुनाई दी " आता हूँ थोड़ी देर में, सब व्यवस्थित कर लो ।" उन्होंने बाहर से ही कहा । 

हम फुर्ती से उठे और बिस्तर वगैरह तह करके करीने से लगा दिए । सारी चीजें कपड़े, बैग आदि भी व्यवस्थित रख कर उनका इंतज़ार करने लगे । कुछ ही देर वे वापस लौटे और तम्बू में प्रवेश कर उन्होंने चारों ओर अपनी नज़र घुमाई । 

तम्बू में सुव्यवस्था देख कर वे खुश हो गए "बहुत बढ़िया ..सब सामान तो अच्छी तरह जमाकर रखा है तुम लोगों ने , इसे आदत में शामिल कर लेना .. शादी के बाद पत्नी बहुत खुश रहेगी। " उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा ।

निरीक्षण करते हुए अचानक उनकी निगाह उस चाल्कोलिथिक पात्र पर पड़ गई जिसे पाँच दिन पहले अशोक ट्रेंच से उठाकर ले आया था और बतौर ऐश ट्रे उसका बखूबी इस्तेमाल कर रहा था । “व्वा बेटा.. तो यह पात्र यहाँ रखा है ।“ उन्होंने  कटाक्ष करते हुए कहा  “शौक तो तुम्हारे रईसों के हैं ।“ 

इससे पहले कि अशोक अपने धूम्रपान की चोरी पकड़ी जाने पर शर्मिन्दा होता उन्होंने  कहा “ जानते हो तुम्हारी इस ऐश ट्रे की कीमत क्या है ? ये एक लाख से कम की नहीं है ।“ अशोक ने तुरंत माफी माँगी, बाहर जाकर ऐश ट्रे खाली की और डॉ. साब को देने लगा तो उन्होंने  कहा “ ऐसे नहीं इसे अच्छी तरह धोकर साफ करो, सुखाओ और फिर आर्काईव में जमा करो .. नहीं तो  तुम्हारा कोई जूनियर ‘चाल्कोलिथिक पीरियड में विल्स या पनामा का उद्भव’ जैसे विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत कर देगा । ऐसी ग़लती दोबारा नहीं होनी चाहिए ।“

डांट यद्यपि अशोक को पड़ी थी लेकिन हम सभी लोग अपने आप को अपराधी महसूस कर रहे थे । डांट का यह असर ट्रेंच पर पहुँचने तक भी कम नहीं हुआ था । हाँलाकि अशोक को इस बात पर संतोष था कि सिगरेट पीने के लिए उसे डाँट नहीं पड़ी । 

लेकिन बिना अनुमति उत्खनन में निकली किसी भी वस्तु को निजी उपयोग में लाना अपराध तो था ही ।  

इसी अपराध बोध के कारण हम सभी असहज थे यद्यपि सर ने इसे सहज बनाने का प्रयास किया था  । 

क्या ज़मीन  से नीचे कोई वस्तु निकले तो हम उसका उपयोग कर सकते हैं ?

हम सबके उतरे हुए चेहरे देखकर उन्होंने कहा " देखो भाई, हम सब इस बात को जानते हैं कि हम उन्हीं वस्तुओं का उपयोग कर सकते हैं जिन्हें हमने ख़रीदा है अथवा श्रम से प्राप्त किया है । पुरातत्व की खुदाई जिन साइट्स पर होती है वहाँ पहले से ही ऐसी वस्तुएँ मिलती रही हैं । अब कई बार यह वस्तुएँ लोगों की निजी ज़मीन में भी मिलती हैं लेकिन ग्रामीण लोग इन महत्वपूर्ण अवशेषों का महत्व नहीं जानते इसलिए इन्हें साधारण वस्तुएँ समझकर अपने घर ले जाते हैं । 

यह काम बिल्कुल नहीं करना है 

कई बार पुराने स्थापत्य की ईंटे मिलती हैं जिनका उपयोग वे अपने घर की दीवार बनाने में कर लेते हैं । ग़नीमत की मूर्तियों को वे देव प्रतिमा समझते हैं वर्ना उनका उपयोग भी सीढ़ियों की तरह कर लेते, हालाँकि प्रस्तर स्तंभों को लेकर उनकी यह समझ नहीं है इसलिए कई बार ऐसा करते भी हैं ।" 

ग्रामीणों द्वारा पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं के निजी उपयोग के ऐसे उदाहरण देकर सर ने हमें अपराध बोध से उबार लिया था । हालाँकि हम इस बात को जान रहे थे कि ग्रामीणों में और हम में फ़र्क है वे यह काम इसलिए करते हैं कि वे वस्तुओं के पुरातात्विक महत्व को नहीं जानते और हम...। 

बात फिर से अशोक के इस चौर्यकर्म पर न पहुँचे इसलिए अजय ने उनकी बात के तारतम्य में सवाल किया "लेकिन सर पुरातत्व विभाग ग्रामीणों को पुरातात्विक महत्व की सामग्री घर ले जाने से मना क्यों नहीं करता ?" 

सर ने कहा " जब तक पुरातत्व विभाग को इसकी खबर मिलती है तब तक बहुत सारी सामग्री गाँव वाले ले जा चुके होते हैं । कई बार खेत जोतते हुए सोने चांदी के सिक्के, नक्काशीदार बर्तन, मिटटी के खिलौने आदि मिलते हैं, गाँव वाले उन्हें घर ले जाते हैं । 

यह सिर्फ इसलिए नहीं है कि वे इसका महत्व नहीं जानते बल्कि मनुष्य की प्रवृत्ति ही ऐसी होती है कि जो वस्तु उसे लावारिस पड़ी मिल जाए उस पर वह कब्ज़ा कर लेता है ।"

"सर लेकिन मूर्तियाँ वगैरह तो जंगलों में पड़ी रहती हैं, उन्हें तो कुछ नहीं होता ।" रवीन्द्र ने कहा । 

"नहीं ऐसा नहीं है ।" सर ने कहा  " जंगलों में पड़ी मूर्तियों का पुरातात्विक महत्व वे नहीं जानते । उन्हें वे देव मूर्तियाँ समझते हैं और उन्हें हाथ लगाने से डरते हैं । या फिर किसी पेड़ आदि के नीचे रख देते हैं और हाथ जोड़ने लगते हैं या पूजा-पाठ करने लगते हैं । उनसे कोई ख़तरा भी नहीं है लेकिन मुश्किल तब होती है जब जंगलों में लावारिस पड़ी इन मूर्तियों की ख़बर फैलती है और यह ख़बर मूर्ति चोरों या तस्करों तक पहुँच जाती  है । 

कभी कभी किसी अन्य तरीक़े से भी उन पर तस्करों की नज़र पड़ जाती है । उनके मुखबीर घूमते रहते हैं ना । उनका सूचना तंत्र कुछ ऐसा होता है कि सरकारी अमले से पहले उन्हें सूचना मिल जाती है और वे रातों रात ट्रकों में भरकर मूर्तियाँ ले जाते हैं इसलिए कि वे अच्छी तरह जानते हैं प्राचीन भारतीय शिल्पकला की इन प्रस्तर प्रतिमाओं की अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बहुत कीमत है ।"

पुरानी और प्राचीन मे क्या अंतर होता है ?

"सर, लेकिन यह प्रतिमाएँ और उत्खनन में निकली वस्तुएँ तो कितनी पुरानी होती हैं ।अर्थशास्त्र का नियम है कि जो वस्तु जितनी पुरानी होती है उसकी कीमत उतनी ही कम हो जाती है फिर इनकी कीमतें इतनी ज़्यादा क्यों होती है ?" अजय ने सवाल किया । 

" यह तुमने बहुत सही सवाल किया है " सर ने कहा ।" लेकिन पुरानी और प्राचीन में फ़र्क होता है कार पुरानी हो सकती है और प्रतिमा प्राचीन । प्राचीनता का सन्दर्भ धर्म,संस्कृति, इतिहास और परंपरा  से होता है उसीके अनुसार उसकी कीमत तय होती है । 

"अजय ने पूछा " सर यह निर्धारित करने के लिए कि कोई वस्तु कितनी प्राचीन है और उसकी क्या कीमत है कोई नियम तो होता होगा ?" अजय बहुत सूझ-बूझ भरे सवाल कर रहा था ।

"हाँ, है ना ।" सर ने कहा " यह एन्शिएंट मान्युमेंट्स एंड अर्क्यालोजिकल साइट्स एंड रिमेन्स एक्ट 1958  द्वारा तय होता है । इसमें प्राचीन अवशेषों की परिभाषा के अंतर्गत सौ वर्ष से अधिक के सभी प्राचीन सिक्के , अभिलेख,इमारतें,प्रतिमाएँ इत्यादि आते हैं । वस्तुओं की प्राचीनता और महत्व के अनुसार उनकी कीमत निर्धारित होती है  । 

इस एक्ट में पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं की परिभाषा , उत्खनन के नियम और परमिशन की प्रक्रिया, किसी निजी स्थान के अधिग्रहण का मुआवजा, प्राचीन अवशेषों की देखभाल , उनकी सुरक्षा के नियम और चोरी या उन्हें अपने स्थान से हटाये जाने या नुकसान पहुँचाये जाने पर सज़ा के प्रावधान आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है ।"

  अशोक काफी देर से हम लोगों की बातचीत सुन रहा था । वह जान गया था कि इन बड़े बड़े चोरों के आगे उसकी चोरी तो बहुत मामूली सी है । अचानक उसके भीतर देशभक्ति का जज़्बा जाग गया .." सर ,सबसे ज़्यादा नुकसान तो हमारा अंग्रेज़ों ने किया है । जाने कितनी बेशकीमती पुरातात्विक धरोहर वे अपने साथ ले गए । उनके म्युज़ीयम्स हमारे यहाँ की वस्तुओं से भरे हुए हैं ।" 

सर ने कहा " हाँ यह बात तो है, इसलिए कि पुरातत्व का महत्व  हमारे देश में सबसे पहले उन्हीं ने जाना । उन्नीस सौ इक्कीस में जब जॉन मार्शल पुरातत्व के निदेशक थे उन्होंने दयाराम साहनी के साथ हड़प्पा में खुदाई करवाई । यह साईट भी अंग्रेज़ों द्वारा वहाँ रेल लाइन बिछाने के दौरान प्राप्त हुई थी । बहुत सारे अवशेष तो रेल लाइन में ही दब गए । उसके बाद अन्य स्थानों पर खुदाई हुई इसलिए इस बात की संभावना अधिक थी कि वे बहुत सारी सम्पदा अपने साथ ले गए ।" 

" सर, लेकिन यह भी तो हो सकता है कि हमारे यहाँ के लोगों ने इस चोरी में उनकी मदद की हो, जानते हुए या अनजाने में भी ? " अशोक की बात पर सर केवल मुस्कुराते रहे । 

अब किशोर की बारी थी " लेकिन सर हमारे यहाँ की सरकार क्या करती रही ? उस वक्त की बात छोडिये आज भी इतनी सारी मूर्तियाँ बाहर भेज दी जाती हैं इनका संरक्षण नहीं हो पाता ऐसा क्यों है ? " 

सर ने कहा " इसका सीधा सा कारण है हमारी सरकार में इतिहास बोध और चेतना का अभाव है । सरकारी लोग न अपनी संस्कृति के बारे में जानते हैं न अपनी विरासत के बारे में, जैसे गोरी और गजनी को देश लूटकर जाते समय उस समय के लोगों ने उनकी मदद की थी ना ,वैसी ही मदद यहाँ के भ्रष्टाचारी लोग भी चोरों और तस्करों की कर रहे हैं ।" 

उसके बाद वे हम लोगों की ओर मुखातिब हुए और कहा .." मेरे ख़याल से तुम लोग अब समझ गए होगे कि इन अवशेषों का निजी उपयोग करना ग़लत है ।" " हाँ सर, हम लोग समझ गए ।  " हमने कहा  । 

हालाँकि इतने बड़े बड़े चोरों के किस्से सुनकर हमारा अपराध बोध कुछ कम हो गया था ।  "तो चलो, अब खुदाई का काम शुरू करो ..बाक़ी गपशप रात में ।" सर ने काम की शुरुआत करने की घोषणा कर दी थी ।  

हम लोगों ने अपना अपना मोर्चा संभाल लिया ,अपनी कापियाँ निकालीं और पिछले दिन की खुदाई की प्रक्रिया और प्राप्त अवशेषों की सूची का अध्ययन किया । “ क्या यार इतने दिनों से खुदाई कर रहे हैं बस इतना ही खोद पाये ।“ अजय अभी भी वातावरण को सहज बनाने की कोशिश कर रहा था । 

जाने कैसे डॉ. वाकणकर ने उसकी बात सुन ली और कहा “ धीरज रखो बेटा, पुरातत्व की खुदाई इतनी आसान नहीं है । यह गढ्ढा खोदने का काम नहीं  है, रोज़ थोड़ा थोड़ा खोदते हुए आगे बढ़ना होता है, किसी वैज्ञानिक की तरह, किसी खोजी की तरह, किसी चिकित्सक की तरह ।  इसे हलके में बिलकुल नहीं लिया जाना चाहिए, गंभीर होकर काम करोगे तो परिणाम निकलेगा ।"

हम लोग पहले से ही मायूस थे, उनकी बात सुनकर और मायूस हो गए  । सर हम लोगों की उदासी भाँप गए  । मुस्कुराते हुए उन्होंने  कहा “ अरे दुष्टों, इसमें उदास होने की क्या बात है , तुम लोग तो इतिहास बोध से लैस नौजवान हो और इस देश के बहुत सारे पढ़े लिखे और बड़े बड़े लोगों से बेहतर हो । चलो तुमको एक बढ़िया किस्सा सुनाता हूँ ।" किस्सा सुनने के तो हम लोग शौक़ीन थे ही सो सर की बात सुनने के लिए फिर उनके पास आ गए ।

एक और मजेदार किस्सा 

"एक बार कि नई क्या हुआ " सर ने किस्सा बताना शुरू किया .." हम लोग एक साइट पर खुदाई कर रहे थे । एक दिन वहाँ एक नेताजी घूमते हुए आ गए । ट्रेंच को देखते हुए उन्होंने  अपने अन्दाज़ में पूछा “हूँ... कितने दिनों से खुदाई चल रही है ?“ 

हमने बताया “ साब, एक माह से । “ 

इतना सुनते ही वे आग बबूला हो गए  और ट्रेंच की ओर इशारा करके चिल्लाने लगे “एक महीने से खुदाई चल रही है और बस इतना ही खोदा है आप लोगों ने ? कितने आदमी लगा रखे हैं .. सरकार का पैसा क्या फालतू समझ रखा है जो इस तरह बरबाद कर रहे हो । मैं ये सब खुदाई-वुदाई बंद करवा दूंगा ।" 

इससे पहले कि हम उन्हें  कुछ समझा पाते कि नेताजी गड्ढा खोदने और पुरातत्व की खुदाई में बहुत फर्क होता है, वे आगबबूला होकर चल दिए और जाते जाते कह गए  ..” अभी तीन दिन बाद मैं फिर इधर आउंगा, मुझे ठीक- ठाक काम दिखना चाहिये ।“

"फिर आपने क्या किया सर?" अशोक अब पूरी तरह सहज हो चुका था "और वो नेताजी दोबारा वहाँ वापिस आये क्या ?" “अरे, नेता जी भी कहीं पांच साल से पहले सूरत दिखाते हैं क्या ..उनको कहाँ आना था वापस ..वो सब ऐसे ही कह दिया था ।“ सर ने कहा । “मगर मुझे लगा क्या पता वापिस आ जायें तो मैंने दो मज़दूरों को बुलाया और साइट से बाहर दूर की एक ज़मीन बताकर कहा, वहाँ खोद डालो रे जितना खोद सको, बस ऊंडे जाओ ऊंडे जाओ  । तो ऐसा है भाइयों अपने सत्ताधीशों का पुरातत्व ज्ञान ।" 

डॉ. वाकणकर द्वारा कहे गए शब्द ' ऊंडे जाओ ' मतलब खोदे जाओ , सुनकर हम लोग हँस हँस कर लोट पोट हो गए । "सर, ऐसे बेवकूफ नेता कौन थे और किस पार्टी के थे ?" अशोक ने हँसी रुकने के बाद उनसे पूछा । सर ने मुँह पर ऊँगली रखकर कहा "चुप । नाम नहीं बताऊंगा ।" । फिर कुछ देर बाद गम्भीर होकर कहने लगे  “ ऐसा नहीं है कि वे कुछ नहीं जानते थे या यह केवल तकनीकी ज्ञान के अभाव के वज़ह से हुआ । दरअसल समाज में व्याप्त यह मनोवृति इतिहास को और पुरातत्ववेत्ताओं के कार्य को गैरज़रूरी समझने के कारण है । इतिहास बोध की कमी तो समाज में है ही लेकिन इसके तकनीकी पक्ष को भी वे गौण मानते हैं इसलिए यह उनकी समझ से परे है ।"


*शरद कोकास*

दस्तावेज़ पढ़ने के लिए लिंक [1 2 3 4] पर क्लिक करें 

एन्शिएंट मान्युमेंट्स एंड अर्क्यालोजिकल साइट्स एंड रिमेन्स एक्ट, 1958 (The Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains Act, 1958) की मूल गजट (राजपत्र) प्रति का कानूनी प्रारूप कुछ इस प्रकार दिखाई देता है: [1]
यह एक आधिकारिक 'असाधारण राजपत्र' (Extraordinary Gazette) है, जो भारत के राजपत्र (The Gazette of India) का हिस्सा है और विधायी विभाग (Ministry of Law) द्वारा प्रकाशित होता है। इसके शीर्ष पर द्विभाषी (हिंदी-अंग्रेजी) प्रकाशन विवरण, अधिनियम संख्या (No. 24 of 1958) और राष्ट्रपति की सहमति (28 अगस्त, 1958) की तिथि अंकित होती है। दस्तावेज़ में प्रस्तावना, मुख्य विषय और उसके बाद अध्यायों (Chapters) तथा धाराओं (Sections) का संरचित विवरण शामिल है। [1, 2, 3, 4]
सरकारी दस्तावेज़ प्रारूप की मुख्य विशेषताएं: [1, 2]
  • शीर्षक: भारत का राजपत्र (The Gazette of India) - असाधारण (Extraordinary)।
  • विशिष्ट पहचान: अधिनियम संख्या, वर्ष और राष्ट्रपति की सहमति की तिथि।
  • संरचना: प्रस्तावना के बाद अनुभाग (Sections) और अध्याय (Chapters)।

विस्तृत जानकारी के लिए आप भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की आधिकारिक वेबसाइट देख सकते हैं।
[1]

20. क्या आपने पाँच खुर वाला घोडा देखा है ?

 


अरे, यह झूठ नहीं है एक ज़माने  मे सचमुच ऐसा घोड़ा होता था । विश्वास नहीं होता ना ? तो आगे पढिए इससे जुड़ी रोचक कहानी 
 

🐴 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 🐴

              शरद कोकास 

पूर्वकथा- अब तक आपने पढ़ा कि विक्रम यूनिवर्सिटी उज्जैन के कुछ छात्र एक ताम्राश्म्युगीन साईट पर उत्खनन के लिए पहुँचे  हैं । आज यहाँ पहुँचे उन्हें नौ दिन हो गए । आज सुबह साईट पर सांप निकल आया था सो काम कुछ देर के लिए रुक गया था लेकिन इस बहाने सांप के बारे में पूरी जानकारी उन्हें वाकणकर सर से मिल गई और उन्होंने कद्रू और विनता की पौराणिक कथा भी जान ली  । दिन का काम समाप्त करके वे अपने तम्बू में लौट आये हैं । फरवरी का महीना है लेकिन ठण्ड समाप्त नहीं हुई है इसलिए आज अलाव जलाकर आग के इर्द गिर्द बैठकर गपशप हो रही है । छात्रों में सब कुछ जान लेने की इतनी उत्सुकता है कि वे कोई भी अवसर छोड़ना नहीं चाहते ।चलिए देखते हैं आज क्या हुआ । आज का विषय है घोड़ा और ओलम्पिक*  ... 

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🦄 *भाग - बीस* 🐴

🦄 20 - *पाँच खुर वाला घोड़ा* 🦄

 

🐴ठण्डी हवाओं ने आज अपने बक्से से कुछ तेज़ सुइयाँ निकाल ली हैं और हमें चुभो रही है  । ठण्ड से डरने का एक कारण यह भी है कि हम लोग शहर के रहने वाले हैं और इतनी ठण्ड की हमें आदत नहीं है । राममिलन भैया का बिस्तर अपने तम्बू में स्थापित करने के उपरांत हम लोग भोजन करने के लिए भोजनशाला में चले गए ।

अधिक रात नहीं हुई थी सो इतनी जल्दी बिस्तर में घुसने का मन भी नहीं था । ठण्ड की वज़ह से कहीं  टहलने जाने की इच्छा भी नहीं हो रही थी । लेकिन किसी न किसी तरह समय तो बिताना ही था और हम किसी उपाय की तलाश में थे । कभी कभी ऐसा होता है कि हम समय बिताने के समस्त विकल्पों के बावज़ूद संतुष्ट नहीं होते हैं और किसी नवीनता की तलाश में रहते हैं ।

🐴ठण्ड भगाने के उपायों के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है । सामान्य ठण्ड होती है तो हम हल्का फुल्का कोई स्वेटर पहन लेते हैं ,फिर ठण्ड बढ़ी तो कानों को ढँक लेते हैं । कोट, ओवरकोट,ऊनी पैंट , मफलर , इनर ,टोपी,शाल जाने कितने विकल्प होते हैं हमारे पास । 

लेकिन दुनिया में ऐसे करोड़ों लोग हैं जिनके पास यह सब कुछ नहीं होता । मुझे उस हिमयुग में जीवित रहने वाले उस आदिम मनुष्य की याद आई जिसके पास तन ढंकने के लिए भी कुछ न था उसके बाद भी वह भीषण ठण्ड में बचा रहा । ऐसा क्या था उसके पास मैं सोचने लगा और मुझे याद आया ...हाँ उसके पास आग थी ।

🐴सो हमने भी आज भोजनोपरांत कहीं टहलने जाने की बजाय तम्बू के सामने आग जलाकर ठण्ड से मुकाबला करते हुए गपशप करने का प्लान बनाया । कुछ लकडियाँ हम भोजनशाला से ले आए कुछ आसपास से इकठ्ठा कर लीं । 

आर्य साहब ने हम लोगों को लकड़ियाँ चुनते देखा तो खुश हो गए .." अच्छा तो आज कैंप फायर का प्रोग्राम है ?" मैंने कहा " सर, पहले लकड़ियाँ तो इकठ्ठी हो जायें , फायर तो बाद की बात है ।" 

उन्होंने हमारा उत्साह वर्धन करने के लिए घोषणा कर दी  “ जो सबसे ज़्यादा लकड़ियाँ इकठ्ठा करेगा उसे मेडल प्रदान किया जाएगा ।" इतने में डॉ. वाकणकर आते हुए दिखाई दिए उन्होंने आर्य साहब की यह घोषणा सुन ली थी । 

“ क्यों यहाँ कोई ओलम्पिक हो रहा है क्या ? “ उन्होंने सवाल किया । " हाँ सर , आग जलाने के लिए लकड़ी चुन कर लाने की स्पर्धा हो रही है । " अजय ने कहा ।

🐴अजय दौड़कर सर के तम्बू से एक मोढ़ा लेकर आ गया और उनके लिए बैठने की व्यवस्था कर दी । अब तक पर्याप्त लकड़ियाँ इकठ्ठा हो चुकी थीं । सर ने कहा "भाई आग तो जलाओ ।" अशोक की जेब में माचिस थी लेकिन पोल खुल जाने के भय से उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि जेब से माचिस निकाल कर आग लगाए । 

" अभी आया " कहकर वह उठा और भोजनशाला तक गया फिर तुरंत वहाँ से लौटकर आया और जेब से माचिस निकालकर आग जलाने लगा । सर मुस्कुराए और धीरे से कहा .. " अरे जेब में थी तो यहीं निकाल लेना था ना  ...इतना नाटक करने की क्या ज़रूरत थी ।" अशोक ने कुछ नहीं कहा और शर्म की वज़ह से लकड़ियों के परदे में अपना मुँह छुपा लिया ।

🐴हम लोग भी आग सुलगाने में अपनी अपनी तरह से अशोक की मदद करने लगे  । जैसे ही लकड़ियों ने आग पकड़ी और लपटें  कुछ तेज़ हुई  हम लोग उसके इर्द -गिर्द पालथी मारकर बैठ गए और सर से कुछ ज्ञानवर्धक बात सुनने की आशा में अपने कान खड़े कर दिए ।  

हमें पता था, सर से जब तक कोई सवाल नहीं करेंगे उनके मुखारविंद से कोई ज्ञानवर्धक बात नहीं निकलेगी । 

अजय ने इसका ज़िम्मा लिया और तुरंत उनकी पिछली बात के तारतम्य में प्रश्न उछाल दिया “ सर ये ओलम्पिक खेलों की शुरुआत कैसे  हुई ? 

🐴सर ने कहा “ यूनान या ग्रीस के बारे में तो तुम लोग जानते ही हो । ग्रीक माइथोलॉजी के अनुसार सबसे पहले खेल की यह प्रतियोगिताएँ ओलिम्पस पर्वत पर रहने वाले यूनानी देवी देवताओं के बीच प्रारंभ हुईं । 

एक दंतकथा के अनुसार एक प्रतियोगिता में सर्वोच्च देवता का पद प्राप्त करने के लिए उनके देवता ज्यूस या जीयस ने अन्य देवताओं को हराया । कुछ लोग कहते हैं हेराक्लीज़ नाम के एक देवता ने इसकी शुरुआत की । वैसे ओलम्पिक की शुरुआत के बारे में कुछ और दंतकथाएँ भी हैं । एक कथा तुम लोगों को सुनाता हूँ ।"

🐴सर की बात सुनकर हम लोग आग के और करीब आ गए । सर ने कहानी शुरू की । 

" प्राचीन यूनान में ओयेनामस नामका एक राजा था । उसकी हिप्पोडामिया नामक एक सुन्दर कन्या थी । एक श्राप के अनुसार यह तय था कि राजा की मृत्यु उसके ही दामाद के हाथों होगी इसलिए वह अपनी बेटी का विवाह ही नहीं होने देता था । लेकिन जब ज़रूरत हुई और रिश्ते आने लगे तो उसने यह शर्त रखी कि विवाह का इच्छुक जो भी युवक होगा उसे सर्वप्रथम राजा को रथ दौड़ में हराना होगा तभी वह उसकी कन्या से विवाह कर सकेगा । राजा ओयेनामस के पास समुद्र के देवता पोसाईडान द्वारा दिया गया एक दिव्य रथ था जिसके घोड़े हवा से भी तेज़ दौड़ते थे, इसलिए वह जानता था कि उसे हराना असम्भव है ।"

🐴कहानी में हम लोगों को मज़ा आने लगा था । सर ने कहानी आगे बढ़ाई "अब जो भी युवक राजा की  बेटी से विवाह करने आता था वह रथ दौड़ में राजा से हार जाता था और उसके हाथों मारा जाता । इस तरह अठारह युवकों को रथ दौड़ में हार जाने की वज़ह से अपनी जान गंवानी पड़ी ।

 अंततः पोलेप्स नामक एक राजकुमार हिप्पोडामिया से विवाह करने आया । वह इतना सुन्दर था कि उसे देखते ही राजकुमारी उसे अपना दिल दे बैठी । इधर राजकुमार पोलेप्स ने इस दौड़ में जीतने के लिए एक चाल चली । 

उसने राजा के इस दिव्य रथ के सारथी मार्तिलस को पटा लिया । उसने उसे प्रलोभन दिया कि वह अगर जीतेगा तो वह राजा को मार डालेगा और उसके राज्य का स्वामी बनने के बाद उसे आधा राज्य भी दे देगा । यही नहीं बल्कि विवाह के बाद उसे पहली रात भी राजकुमारी के साथ बिताने को मिलेगी ।"

🐴"बाप रे ।" अजय ने कहा । " यह तो बड़ा भारी प्रलोभन था ।" 

"आगे सुनो.." सर ने कहा । "मार्तिलस ने पोलेप्स की बातों में आकर राजा के रथ के पहिये से कांसे की पिन निकालकर उसकी जगह मोम की पिन लगा दी । अब जैसे ही रथ दौड़ प्रतियोगिता प्रारंभ हुई कुछ ही देर में राजा के रथ की मोम की पिन पिघल गई और वह अपने ही रथ के नीचे आ गया इस तरह उसकी मृत्यु हो गई  । हाँ उसका सारथी इसमें बच गया लेकिन राजकुमार ने उसे पकड़कर उसकी हत्या कर दी । "

🐴" बिलकुल ठीक किया सर उसने " अजय ने कहा । " लेकिन अपनी बीबी का सौदा किया यह अच्छा नहीं किया ।" "अरे यह कहानी है भाई ।" रवींद्र ने कहा "कहानियों में ऐसा ही होता है, हमारे यहाँ नहीं धर्मराज युधिष्ठिर ने अपनी पत्नी को ही दांव पर लगा दिया था । ' फिर वह सर की ओर मुख़ातिब होकर बोला .." हाँ सर, फिर क्या हुआ ? 

🐴"फिर क्या होना था ।" सर ने कहा " उसकी राजकुमारी से शादी हो गई । कहते हैं कि इसी जीत की स्मृति में और राजा को श्रद्धांजलि स्वरूप पोलेप्स द्वारा ओलम्पिक खेलों की शुरुआत की गई । इस तरह प्राचीन यूनान में उत्सव-पर्व आदि पर खेलकूद प्रतियोगिताएं  आयोजित होने लगीं । 

ओलिम्पस पर्वत

कहते हैं यह मशहूर प्रतियोगिता यूनान के पेलोपोनेसस प्रांत में ओलम्पिया नामक स्थान पर होती थी । इसीलिए इसका नाम ओलम्पिक पड़ा । यहाँ ओलिम्पस पर्वत पर रहने वाले ग्रीक देवता ओलिम्पी जियस का मन्दिर था जिसमें यूनानी मूर्तिकार फीडियस द्वारा निर्मित जियस की मूर्ति थी । साथ ही इस मन्दिर के आसपास अन्य देवी देवताओं, वीर पुरुषों और ओलम्पिक विजेताओं की भी अनेक मूर्तियाँ थी । यहाँ व्यायामशालायें भी थीं । एक दंतकथा के अनुसार हेराक्लीज़ ने यह ओलिम्पी जीयस का मंदिर बनवाया था । हालाँकि पुरातत्ववेत्ता जानते हैं कि सारे मंदिर और मूर्तियाँ मनुष्यों ने ही बनाई थीं ।"

🐴“सर जी, उनका देवता तो जियस था फिर ये ओलिम्पी जियस नामक देवता उससे कोई अलग देवता था क्या ?“ अजय ने बीच में ही सवाल किया ।

 “अरे नहीं रे बावड़े ।“ सर ने कहा “अपने यहाँ कैसे एक ही देवता के अलग अलग नाम होते हैं जैसे … “ वे आगे उदाहरण देने ही वाले थे कि राममिलन ने तपाक से कहा …” जैसे बजरंग बली के नाम पवनसुत, अंजनीपुत्र, महावीर, केसरी नंदन ,फिर दक्षिणमुखी हनुमान, उत्तरमुखी हनुमान, मनोकामना हनुमान आदि । 

“ वाह भाई वाह ।“ आर्य सर ने कहा …” देखो इस बजरंग बली के भक्त ने बिलकुल सही बताया । अपने यहाँ उज्जैन में जैसे कालभैरव हैं और उन्हें लोकभाषा में भेरू बाबा कहा जाता है उनके नाम से भेरू बाबा के कितने मंदिर बन गए हैं । 

"हाँ सर“  मैंने कहा “मैंने भी देवास गेट पर एक उखाड़ पछाड़ भेरू बाबा का मंदिर देखा है । ऐसा कहते हैं कि जब भेरू बाबा नाराज़ हो जाते हैं तो तबाही मचा देते हैं ।“ वाकणकर सर को पता नही यह सुनकर क्या याद आया , वे उठे और अभी आता हूँ कहकर अपने तम्बू की ओर चले गए ।

 🐴अशोक ने उनके जाते ही कहा “भाई अपने यहाँ तो भेरू बाबा ने अभी तक कोई तबाही नहीं मचाई है, लेकिन यह सही है कि एक भगवान से लोगों का मन नहीं भरता इसलिए सभी ने अपने अपने भगवान बना लिए हैं, उनके नाम पर अलग अलग धर्म बना लिए हैं और अब अपने अपने भगवानों को लेकर आपस में लड़ रहे हैं । एक कहता है मेरा भगवान बड़ा है दूसरा अपने भगवान को बड़ा बताता है, और तो और एक धर्म के भीतर भी कई उपधर्म हो गए हैं और उनके भी अपने अलग अलग भगवान हैं । जिनके भगवान एक हैं उनके अनुयायियों  में भी इस बात के लिए लड़ाई हो रही है कि मैं बड़ा भक्त हूँ । और जिनके अनुयायी एक हैं, उनके भगवानों में लड़ाई हो रही है । कहीं मनुष्य ने अपने आप को भगवान घोषित कर दिया है और दूसरे मनुष्य के भगवान को खारिज कर दिया है । सबके अपने अपने नियम हैं और वे अपने नियमों से अन्य को संचालित करना चाहते हैं । “

🐴“ यहाँ तक तो ठीक है …” किशोर ने कहा । “ लेकिन अपने धर्म को बड़ा और अपने भगवान को बड़ा और अन्य के धर्म और भगवान को छोटा बताकर जो वैमनस्यता फैलाई जाती है और दंगे किए जाते हैं वह तो बिलकुल ग़लत है । “ 

“ इसका केवल एक कारण है …” मैंने अपना ज्ञान बघारना शुरू किया । “ वास्तव में लोगों ने इतिहास को ठीक ढंग से पढ़ा ही नहीं है । इतिहास बोध के अभाव में केवल सतही ज्ञान व अपने ग्रंथों के आधार पर डींग हाँकना कहाँ तक उचित है । “ 

“ बिलकुल सही …” अशोक ने कहा “ कुछ ग्रंथ तो लिखे भी इसी उद्देश्य से गए जैसे बौद्ध धर्म की महत्ता समाप्त करने के लिए मनुस्मृति रची गई । फिर ग्रंथ लिखे जाने के बाद अपने ढंग से उनकी व्याख्या की गई । फिर किताबों को लेकर भी लोग लड़ने लगे । कुल मिलाकर यह धर्म है ही झगड़े की चीज ।“

🐴आर्य सर समझ गए कि अब बहस गम्भीर मोड़ की ओर जा रही है सो उन्होंने  इन्टरप्ट किया …”भाई यह भेरू बाबा से तुम लोग कहाँ पहुँच गए ?" फिर वे ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे और बोले …” सुनो,सुनो ..भेरू से याद आया, तुम लोगों से दो बैच पहले एक स्टूडेंट था भेरू मालवी नाम था उसका । एक दिन वो मेरे पास आया और कहने लगा, सर मेरा नाम बहुत खराब है मैं इसे बदलना चाहता हूँ । मैंने कहा, अरे तुम्हारा नाम तो बहुत बढ़िया है भेरू यानि भैरव, कालभैरव, शिव का नाम है यह । तुम अपने नाम का उच्चारण भैरव मालवी करो देखो कितना अच्छा लगता है । बस नाम को लेकर उसकी ग्लानि समाप्त हो गई ।“ हम लोग समझ गए कि धर्म  पर अब कोई गम्भीर चर्चा नहीं हो सकती ।     

🐴वाकणकर सर इस बीच अपने तम्बू से एक चक्कर लगाकर वापस आ चुके थे और मोढ़े पर विराजमान हो गए थे । “सर वो ओलम्पिक के बारे में बता रहे थे आप ।“ अजय ने सर को वापस आया देखकर मूल विषय पर वापसी के लिए संकेत दिया । 

“हाँ ।“ सर बोले “मैं कह रहा था कि उस दौर में ओलम्पिक देखने हज़ारों की संख्या में लोग आते थे । तम्बुओं में उनके रहने की व्यवस्था  की जाती थी लेकिन स्त्रियों के लिए इस ओलम्पिक में प्रवेश निषेध था । इस नियम का उल्लंघन करने वाली स्त्री को मौत की सज़ा तक दी जा सकती थी ।“ 

🐴“यह तो बड़ा अन्याय है सर ।“ रवीन्द्र ने कहा । “हाँ ।“ सर ने कहा “ हो सकता है देशकालानुसार ऐसा नियम रहा हो, यह तो बहुत बाद में स्त्रियों ने खेल में भाग लेना शुरू किया । हमारे देश में भी स्त्रियों के लिए बहुत से खेल वर्जित थे और आज देखो लड़कियाँ ही सर्वाधिक पदक जीतती हैं ।“  “ सर अपने यहाँ तो बचपन से ही लड़कियों को लड़कों के खेल खेलने से मना किया जाता है अपने यहाँ की लड़कियाँ कहाँ पदक जीतती हैं । “ अशोक बोला । 

🐴“ सर वो ओलम्पिक..” अजय ने फिर गाड़ी पटरी पर लाने के लिए इशारा किया । “ हाँ तो मैं बता रहा था... “ सर ने कहा “ इन प्राचीन ओलम्पिक खेलों में कुश्ती, चक्रफेंक, भालाफेंक, घुड़दौड़, रथदौड़ आदि प्रमुख खेल थे । रथदौड़ के मैदान को हिप्पोड्रोम कहते थे । एक ईवेंट में एक रथ को मैदान के बारह चक्कर लगाने होते थे । कई बार आपस में टकराकर भीषण दुर्घटनायें भी होती थीं ।" 

🐴“सर लेकिन इसमें तो केवल सम्पन्न लोग ही भाग ले पाते होंगे आखिर रथ और चार घोड़े जुटाना आसान नहीं है ।“ मैंने कहा । “हाँ ।“ सर बोले “सम्पन्न लोग ही विजेता होते थे । लेकिन वे रथ नहीं दौड़ाते थे बल्कि उनके सारथी दौड़ाते थे और विजेता भी रथ का सारथी नहीं बल्कि मालिक ही होता था । भले ही दुर्घटना में सारथी मारा जाये इनाम मालिक को ही मिलता था । क्योंकि सारथी तो दास होता था और उसकी कोई हैसियत नहीं थी । “

🐴"यह तो बहुत ही ग़लत बात है सर ।“ रवींद्र ने कहा " मतलब सारथी को मनुष्य ही नहीं समझा जाता था ।" " यार, तुम लोगों को मालिक और दास की पड़ी है और बेचारे घोड़े का कोई रोल नहीं ? इनाम तो घोड़े को भी मिलना चाहिए । “ मैंने कहा । 

मेरी बात सुनकर सारे लोग हँसने लगे " लो सुन लो इनकी बात ।" रवीन्द्र ने कहा यहाँ इंसान की बात हो रही है और इन्हें घोड़े की चिंता है । मैंने कहा " क्यों नहीं होगी भाई आख़िर है तो वह इंसान के बराबर का ही साथी आख़िर जंगल के घोड़े ने उंगलियाँ  गँवाकर खुर क्या प्राप्त किया इंसान का वाहन बन गया ।

“ ये क्या कहानी है भाई ? “ रवीन्द्र ने सवाल किया ।“ तुम्हें  नहीं पता ? “ मैंने कहा । “ चलो बताता हूँ ।"

🐴अब सब लोगों का ध्यान मेरी ओर था । मैंने अपनी बात शुरू की "लाखों साल जब इस धरती पर जंगल ही जंगल थे  घोड़े की पाँच उंगलियाँ हुआ करती थीं । इसका कारण यह था कि जंगलों में ज़मीन पर सूखे पत्ते बिछे होते थे और उन पर दौड़ने के लिए अधिक उंगलियाँ ही काम आती थीं । इनकी वज़ह से उसे ज़मीन पर पैर अच्छी  तरह टिकाने में मदद मिलती थी । 

कालांतर में जब महावन कम होते गए और मैदानों की संख्या में वृद्धि होने लगी तब घोड़े के उन पूर्वजों को भी खुले मैदान में आना पड़ा । जंगल में छुपने की जगह नहीं बची थी और केवल वही जानवर बच सके जिनकी लम्बी टांगें थीं जिनसे वे तेज़ दौड़ सकते थे । उस वक़्त सबसे ज्यादा तेज़ दौड़ने वाले जानवर घोड़े ही थे । 

🐴"लेकिन उसे मैदानी इलाके में आने की ऐसी क्या ज़रूरत पद गई ?" अजय ने सवाल किया ।मैंने कहा " अरे भाई ,उसे भी तो चारा चाहिए था ना और पहले जंगल में वह हिंसक प्राणियों से अपनी रक्षा कर लेता था जब जंगल कम हुए तो उसे भी मैदान में आना पड़ा । अब मैदान में दौड़ने के लिए  अधिक उंगलियों की ज़रूरत ही नहीं बची सो घोड़े की अगली नस्लों में पाँच से घटकर तीन उंगलियाँ हुईं और अंतत: हजारों साल बाद केवल दो उँगलियाँ रह गईं जिन्हें आज हम खुर कहते हैं  । 

इसके अलावा घोड़े भी पहले आज जैसे कद्दावर नहीं थे बल्कि बौने थे इधर उनकी उँगलियाँ कम होती गईं और कद बढ़ता गया । यह सब उनके जींस में परिवर्तन के कारण हुआ । 

पुरातत्ववेत्ताओं को सभी काल के घोड़ों की हड्डियाँ मिल चुकी हैं जिनके आधार पर घोड़े की इन प्रजातियों के नाम क्रमश: हिप्पस, मेसोहिप्पस ,प्लियोहिप्पस और इक्वस रखे गए हैं ।"

🐴सभी ने मेरी बात पर ताली बजाई । रवींद्र ने कहा “अच्छा इसलिए  ओलम्पिक में घुड़दौड़ के मैंदान को घोड़े के जैविक नाम हिप्पो की वज़ह से हिप्पोड्रोम कहते हैं ।“अजय का अभी ओलम्पिक की बात से मन नहीं भरा था उसने सर से कहा " सर यह तो हो गई प्राचीन काल के ओलम्पिक खेलों की बात लेकिन आधुनिक काल में यह खेल कैसे शुरू हुए ?" 

सर ने कहा "भाई, आधुनिक ओलम्पिक खेलों के बारे में तो कोई खिलाड़ी ही अच्छी तरह से बता पायेगा । लेकिन मेरी जानकारी में  तीन सौ तिरानबे ईसवी में यह खेल बंद हो गए थे । दोबारा इनकी शुरुआत 1896 में हुई । उसके बाद हर चार साल के अंतराल पर यह खेल होते रहे । 

बीच में शायद युद्ध के समय यह खेल बंद भी हुए थे ।" अजय ने फिर पूछा " सर भारत ने कब इन खेलों में भाग लिया ?" सर ने ऊब कर कहा.." अब सब मुझ से ही पूछोगे क्या .. वैसे मेरी जानकारी के अनुसार भारत ने उन्नीस सौ में इन खेलों में भाग लिया था और एथलेटिक्स में दो रजत पदक भी जीते थे ।

🐴हम सब लोगों को अब नींद आने लगी थी । रवीन्द्र ने कहा "आज ओलम्पिक  के बारे में बढ़िया कहानी सुनने को मिली, लेकिन यह बात तो है कि कहानियों का कोई ओलम्पिक होगा तो शरद को गोल्डमेडल ज़रूर मिलेगा । “ठीक है ठीक है । चलो अब सो जाकर …सुबह जल्दी सोकर नहीं उठे तो खैर नहीं । 

और सुनो ..ओलम्पिक की शुरुआत करने वाली उस राजकुमारी का नाम याद है न ..हिप्पोडामिया  ..इसका अर्थ होता है घोड़ों को काबू में रखने वाली, सो वह राजकुमारी भी कई घोड़ों की मालकिन थी । चलो अब सभा समाप्त ।“ सर ने हमारी अलाव सभा बर्खास्त करते हुए फरमान जारी किया ।


🔲 *शरद  कोकास* 🔲


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19 क्या गड़े खज़ाने पर कुण्डली मारे बैठा साँप होता है

यह एक ऐसा अंधविश्वास है जो सदियों से चला आ रहा है 

📙 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📙

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा- अब तक आपने पढ़ा कि विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के छात्र शरद,रवींद्र,किशोर, अजय ,अशोक राममिलन दंगवाड़ा नामक स्थान पर उत्खनन के लिए पहुंचे हैं । प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ.वि.श्री.वाकणकर के निर्देशन में यह शिविर जारी है । तम्बुओं में रहते हुए और चम्बल के पानी में नहाते -धोते हुए छात्र पुरातत्ववेत्ताओं का यह प्रशिक्षण जारी है ।रोज़ उनकी बातों में नए नए किस्से हैं, मानो ज्ञान प्राप्ति का कोई अवसर वे नहीं छोड़ना चाहते । आज डॉ वाकणकर बता रहे हैं उन्हें नागों की उत्पत्ति की कहानी*

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1⃣9⃣ *भाग- उन्नीस* 1⃣9⃣

*गड़े खज़ाने पर कुण्डली मारे बैठा साँप*   

🐍सुबह से ही हवाएँ कुछ तेज़ तेज़ बह रही थीं । चम्बल भी उनके ताल में ताल मिलाते हुए आज कुछ अधिक गति से गतिमान थीं और उसकी लहरें भी रोज़ की अपेक्षा आज कुछ अधिक ही हिलोरें ले रही थीं । घाट पर बैठकर मैं प्रशिक्षण शिविर में अद्यतन उपस्थिति का हिसाब करने लगा । 

मैंने रवींद्र से कहा " तुम्हें पता है शिविर में पहुँचने के दिन से अगर गिनती की शुरुआत करें तो उत्खनन शिविर में आज हमारा नौवाँ दिन है ?" " सही है.." रवींद्र ने कहा "इन नौ दिनों में जितने अनुभव हम लोगों ने प्राप्त कर लिए हैं  वे अद्भुत हैं । हर दिन हमारे जीवन में एक नया अनुभव लेकर आ रहा है  और हमें न केवल तकनीकी ज्ञान से बल्कि जीवन के विविध अनुभवों से भी समृद्ध कर रहा है ।" "यस बॉस, यू आर राईट " मैंने रवींद्र को अंगूठे से इशारा करते हुए कहा । 

🐍हम लोग नियत समय पर साईट पर पहुँच गए । राममिलन भैया हम लोगों से नाराज़ थे इसलिए वे हम लोगों से दूर दूर ही रह रहे थे  । नाश्ते के वक़्त भी उन्होंने हमारी सुप्रभात का उत्तर नहीं दिया । खैर ,ट्रेंच पर पहुँचकर हम लोगों ने खुदाई शुरु ही की थी कि जाने कहाँ से एक साँप घूमता हुआ आ गया और हमारी ट्रेंच में घुस गया । 

मजदूर लोग डर कर दूर खड़े हो गए । इन दिनों दक्षिण भारत की किसी युनिवर्सिटी से एक शोधकर्ता भी यहाँ  आया हुआ है, उसने आव देखा न ताव तुरंत वहाँ पड़ी हुई एक लाठी उठाई और साँप को मारने के लिए तत्पर हुआ ही था कि डॉ. वाकणकर ने उसे डाँट लगाई .. " ए मैन, क्या करते हो, यह साँप जहरीला थोड़े ही है .. और होता भी तो साँप को मारते हैं क्या ? ‘’ 

खैर हमने गढढे में फँसे उस बेचारे साँप को टहनियों की सहायता से किसी तरह टांग टूंग कर बाहर निकाला, बाहर निकालते ही वह झाड़ियों की ओर भागा और गुम हो गया  । अशोक ने कहा .. “ बेचारा .. सोच रहा होगा, कहाँ इन ज़हरीले आदमियों के बीच फंस गया ।"

🐍मैंने सर से पूछा .. ‘’ सर, आप कैसे पहचान जाते हैं साँप पायजनस है या नान पायजनस ? ‘’ सर ने कहा .. "भई, मुझे तो अब देख देख कर आदत हो गई है .. लेकिन यदि साँप काट भी ले और आप उसे काटते हुए न भी देख पायें तो उसके दंश से जाना जा सकता है कि वह पायजनस है या नान पायजनस । पायजनस साँप के दाँतों के निशान साफ दिखाई देते हैं यह दो गहरे बिन्दुओं की तरह होते हैं । नॉन पायजनस साँप के दांतों के निशान छोटे छोटे यू आकार के होते हैं । ‘’ 

लेकिन सर ये बैगा, ओझा, गुनिया लोग जो साँप का ज़हर उतारने का दावा करते है ....? ‘’ ‘’ अरे वो सब बेवकूफ बनाते हैं ।‘’ 

सर ने कहा .. "अव्वल तो वे दंश देखते है .. उन्हें ज्ञात होता है कि विषैले सांप के दांतों के निशान  कैसे होते हैं । यदि ज़हरीले साँप का दंश रहा तो मना कर देते है, तरह तरह के बहाने बनाते हैं, आज नहीं उतारुँगा, आज पूर्णिमा है, आज एकादशी है, गुरुवार है आदि कह कर .. और नानपायजनस रहा तो फिर बात ही क्या .. दो चार बार ज़हर उतारने का नाटक करते है और भोलेभाले ग्रामीणों से पैसा वसूलते हैं ।"

🐍‘’ सर, ऐसा कहते हैं कि मंत्र से ज़हर उतर जाता है ? ‘’ अजय ने पूछा । सर हँसने लगे ” अरे पगले .. ज़हर होगा तभी ना उतरेगा .. नानपायजनस साँप में ज़हर होता ही नहीं है ।अब  ज़हर चढ़ेगा ही  नहीं तो उतरने का सवाल भी पैदा नहीं होता और साँप पायजनस रहा तो मंत्र पढो या सिनेमा का गीत गाओ एक ही बात है उनके बाप से भी नहीं उतरनेवाला .. उसके लिए तो विषरोधी इंजेक्शन ही लगाना ही पड़ेगा ।‘’ 

‘’अच्छा ‘’ अजय ने कुछ इस तरह कहा जैसे उसे कोई गुरुमंत्र मिल गया हो ..‘’इसीलिए जब ये मान्त्रिक या बैगा लोग देख लेते हैं कि विषधारी साँप ने काटा  है तब ये बहाने बनाने लगते है .. या कहते हैं कि इसे अस्पताल ले जाओ ।" रवींद्र ने आगे कहा ‘’ या फिर कोई जिद्दी बैगा नाम कमाने में चक्कर में अपना जोर अजमाता है और तब तक देर हो जाती है और मरीज मर जाता है । ‘’

🐍"सर लेकिन हमने तो अपनी आँखिन से देखा है .." राममिलन भैया भी सर्प सम्बन्धी सामान्य ज्ञान के मैदान में अपनी एक शंका लेकर उतर आये " कि कई बार जहरीले सांप के काटने के बाद भी ओझा लोग मरीज को बचा लेते हैं ?" 

सर मुस्कुराये .सवाल ज़रा टेढ़ा था ‘’बिलकुल हो सकता है .. अगर किसी मनुष्य को काटने के बस थोड़ी देर पहले ही ज़हरीले सांप ने किसी जानवर पर दंश किया हो अथवा किसी पत्थर या लकड़ी को काटा हो तो ऐसी स्थिति में उसकी ज़हर की थैली खाली हो जाती है अब इतनी जल्दी तो ज़हर बनने से रहा सो उस मनुष्य के प्राण बाख जाते हैं ।" 

"और पूरा क्रेडिट उस ओझा को मिल जाता है और अन्द्धविश्वास की जड़ें और मजबूत हो जाती हैं ।" अजय ने तपाक से कहा । सर ने प्रशंसा भाव से अजय की ओर देखा .."क्या करोगे भाई .. अपने देश से अंधविश्वास कब दूर होगा .. पता नहीं । जो भी हो, सांप को मारना नहीं चाहिए, सांप हमारे मित्र होते हैं, खेत में चूहों आदि को खाकर वे हमारी फसलों की रक्षा करते हैं ।

🐍"हाँ सर, हमारे देश में तो नाग को देवता माना जाता है उसकी पूजा भी होती है ।" रवीन्द्र ने कहा .. "ख़ाक देवता माना जाता है, बस नागपंचमी के दिन पूजा होती है बाकी समय तो लठ्ठ लेकर उसके पीछे पड़े रहते  हैं । " अशोक  ने प्रतिवाद किया । 

अजय हमारी बैच का सबसे जिज्ञासु लड़का है । उसके मन में  एक सवाल गूँज रहा था । मौका देखकर उसने सर से पूछ लिया "सर यह नागों की पूजा कबसे हो रही है हमारे देश में ?" सर ने कहा भाई इसके पीछे बहुत सारी पौराणिक मान्यताएं हैं ।" हम समझ गए अब सर से कोई कहानी सुनने को मिलेगी सो हम लोग उनके करीब आ गए 

चलो सर से एक रोचक कहानी सुनते हैं 

🐍सर हम लोगों का इशारा समझ गए । उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा " विष्णु,शिव और ब्रह्मा इस त्रिमूर्ति में ब्रह्माजी को तो तुम लोग जानते ही होगे । उनकी मानस संतान थे दक्ष प्रजापति । दक्ष प्रजापति की दो कन्याएं थीं जिनका नाम था कद्रू और विनता । उसी तरह महर्षि कश्यप का नाम भी तुम लोगों ने सुना होगा । 

उनका विवाह दक्ष प्रजापति की इन्ही दो कन्याओं से हुआ  । विवाह के पश्चात प्रसन्न होकर महर्षि कश्यप ने अपनी पत्नियों कद्रू और विनता से वर माँगने को कहा । विनता ने अपने लिए दो तेजस्वी पुत्रों की मांग की और कद्रू ने एक हज़ार नाग पुत्रों की ।"

🐍"सर मतलब यह उस ज़माने की बात है जब आशीर्वाद से बच्चे पैदा हो जाते थे ?" अजय ने बहुत भोलेपन से कहा । हम लोगों को उसकी बात पर जोर से हँसी आई । 

सर ने मुस्कुराते हुए कहा " भाई, यह कहानी है ,इसे कहानी की तरह ही सुनो, फालतू के तर्क मत करो ..हाँ तो इसके बाद कद्रू और विनता दोनों ने दो- दो अंडे दिए जिनमे कद्रू के अंडों से एक हज़ार नाग उत्पन्न हुए । विनता के अंडे काफी समय तक फूटे नहीं सो उसने अपने उतावलेपन में एक अंडा फोड़ डाला । 

उसमे से जो बच्चा पैदा हुआ उसके उपरी अंग तो विकसित थे किन्तु नीचे के अंग पूरी तरह विकसित नहीं हुए  थे । अतः उस बच्चे ने क्रोध में आकर अपनी माँ को शाप दे दिया कि तुमने मुझे विकसित होने का अवसर नहीं होने दिया सो तुम्हे पांच सौ वर्षों तक अपनी बहन की दासी बनकर रहना होगा ।

 साथ ही उसने अपनी माँ को यह चेतावनी भी दी कि वह दूसरे अंडे को समय से पहले बिलकुल नहीं फोड़े इसलिए कि उससे जो बालक उत्पन्न होगा वह बहुत तेजस्वी होगा और वही अपनी माता को इस शाप से मुक्ति दिलाएगा । इतना कहकर वह बालक जिसका नाम अरुण था आकाश में उड़ गया और सूर्य का सारथी बन गया ।"

🐍आगे का कहानी पाठ हम लोगों की उत्सुकता पर अवलंबित था । सर ने एक नज़र हम लोगों के चेहरों पर डाली और वहाँ कौतुहल देखकर आगे कहा " अब  विनता जिसने समय से पूर्व अंडे फोड़ दिए थे अपनी बड़ी बहन कद्रू की  दासी कैसे बनी इसका भी एक किस्सा है । 

हुआ यह कि एक दिन विनता की नज़र उच्चै:श्रवा नामक घोड़े पर पड़ी । यह श्वेत अश्व समुद्र मंथन से निकला था । कद्रू और विनता में शर्त लगी कि घोड़े की पूँछ काली है अथवा सफ़ेद है । कद्रू ने विनता से कहा कि घोड़े की पूंछ काली है जबकि विनता ने कहा कि सफ़ेद है । विनता सही थी क्योंकि घोड़े की पूंछ का रंग सफ़ेद ही था लेकिन कद्रू ने छलपूर्वक शर्त जीतने के लिए अपने एक हज़ार नाग पुत्रों को आदेश दिया कि वे घोड़े की पूँछ से इस तरह लिपट जाए ताकि वह काली दिखने लगे । 

सो कुछ नागपुत्र पूँछ से लिपट गए । जो नहीं लिपटे उनके लिए उनकी माता कद्रू ने शाप दिया कि वे आगे जाकर जन्मेजय के यज्ञ में भस्म हो जायेंगे ।"

🐍"सर यह जन्मेजय वही है न अभिमन्यु का पोता और परीक्षित का पुत्र ?" अजय ने सवाल किया " हाँ" सर ने कहा " उसका किस्सा आगे है । इस तरह अनेक नागों के लिपट जाने की वज़ह से सफ़ेद घोड़े की पूँछ काली दिखाई देने लगी और छोटी बहन विनता को अपनी ही बड़ी बहन कद्रू से हार मानकर उसकी दासता स्वीकार करनी पड़ी । 

अब उस बात पर आते हैं कि विनता की शाप से मुक्ति कैसे हुई । विनता का वह पुत्र जो पूर्ण विकसित अंडे से निकला था उसका नाम गरुड़ था । एक दिन कद्रू ने गरुड़ से कहा कि तुम मेरी दासी विनता के पुत्र हो सो मेरे एक हज़ार पुत्रों को घुमाने ले जाओ । 

जब गरुड़ उन्हें घुमाने ले जा रहा था तब उसने अपने एक हज़ार भाइयों से कहा कि वे उसकी माता को अपनी माता के दासत्व से मुक्ति दिलाने में मदद करें । तब उन हज़ार सर्पों ने अपने भाई गरुड़ के सामने एक शर्त रखी और उस से कहा कि अगर वह उनके लिए अमृत ला देगा तो वे उसे दासता से मुक्त करवा देंगे । 

🐍"सर यह अमृत तो सागर मंथन से निकला था ना ?" रवींद्र ने कहा " हाँ उसी समुद्र मंथन के बाद की ही  यह कथा है, समुद्र से निकले घोड़े का भी उल्लेख आया है ना ।" सर ने कहा " अब अमृत तो इन्द्रादि देवताओं के पास था । गरुड़ बहुत शक्तिशाली था और उसने अमृत प्राप्त करने के लिए इंद्र से युद्ध किया और देवताओं को परास्त कर उनसे अमृत कलश ले लिया ।  लेकिन इंद्र ने कूटनीति पूर्वक गरुड़ से मित्रता कर ली  और उससे कहा कि वह  जिन नागों के लिए अमृत लेकर  जा रहा है वे बहुत ही दुष्ट हैं ।

गरुड़ ने कहा कि 'यह मुझे ज्ञात है लेकिन इसके बिना मेरी माँ को दासता से मुक्ति नहीं मिल पायेगी। ' यहाँ उनकी भेंट नारायण यानि विष्णु से होती है और विष्णु उन्हें अपने ध्वज में स्थापित कर लेते हैं । तत्पश्चात गरुड़ ने वह अमृत कलश सर्पों को सौंप दिया और उनकी माता विनता की दासता से मुक्ति हुई ।


🐍सर की इस कहानी में हमें मज़ा आ रहा था । वैसे भी पुराण कथाएँ चाहे किसी भी देश की हों रोचक तो होती ही हैं । सर ने आगे कहा "अब कद्रू के एक हज़ार सर्प पुत्रों में से शेषनाग अनंत, वासुकि और तक्षक बहुत प्रसिद्ध हुए । शेषनाग तो विष्णु के भक्त हैं और क्षीरसागर में उनके आसन को संभाले हुए हैं यही नहीं वे पृथ्वी को भी धारण किये हुए हैं । 

शेषनाग रामायण काल में राम के छोटे भाई लक्ष्मण बनते हैं और महाभारत काल में कृष्ण के बड़े भाई बलराम । उसी तरह वासुकि शिव के भक्त हैं सो शिव की गर्दन में लिपटे रहते हैं । अब बचे तक्षक जिन्हें सबसे ज़हरीला और खतरनाक माना जाता है । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तक्षक पाताल के आठ नागों में से एक था । उसने ही अभिमन्यु के पौत्र और जनमेजय के पिता परीक्षित को डसा था । 

जनमेजय  ने क्रुद्ध होकर सर्प यज्ञ किया जिसमें सर्पों की आहुति दी । तक्षक डरकर भागकर इंद्र की शरण में चला गया लेकिन जनमेजय  ने जब इंद्र को भी तक्षक के साथ भस्म करना चाहा तो उसने उसका साथ छोड़ दिया । परन्तु अंत में आस्तीक नाग की प्रार्थना पर उसे जीवनदान दे दिया । खैर यह एक अलग कथा है ।"

🐍"सर इस कहानी में कई गड़बडियां हैं ।" अशोक ने कहा " एक स्त्री बच्चे देती है वह अंडे कैसे दे सकती है?" इतना दिमाग़ क्यों लगा रहे हो भाई ? सर ने मुस्कुराते हुए कहा । " आख़िर यह भी और कहानियों जैसी काल्पनिक कहानी ही  है । और तुम बेहतर जानते हो कि यथार्थ और कल्पना में बहुत अंतर होता है  । 

लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि पौराणिक कहानियां भी उस समय के सामाजिक और राजनैतिक परिवेश को बताती हैं । विद्वानों के अनुसार प्राचीन भारत में असुर,गन्धर्व, राक्षस,यक्ष  की भांति तक्षक और नाग नाम की भी जातियाँ हुआ करती थीं । यह लोग अनार्य थे । कुछ लोगों ने इन्हें शक भी माना है । इन जातियों को पराजित करने और उन्हें अपना दास बनाने के बाद आर्यों ने यह कथाएँ गढ़ी थीं । 

ऐसा माना जाता है कि तक्षक जाति का महाभारत काल में बहुत प्रभुत्व था और सिकंदर के आगमन तक उनका राज्य काफी बढ़ चुका था । उनका टोटेम या गण चिन्ह भी सर्प ही था । परीक्षित की मृत्यु के बारे में यह कहा जाता है कि तक्षकों का परवर्ती पांडववंश के राजाओं या आर्यों के साथ युद्ध हुआ था । 

इस युद्ध में  परीक्षित मारे गए थे इसलिए उन्हें तक्षक द्वारा डसे जाने की कहानी गढ़ी गई । लेकिन बाद में फिर परीक्षित के पुत्र जनमेजय  ने तक्षक जाति पर आक्रमण कर उन्हें युद्ध में पराजित किया । सो इस बात को सर्प यज्ञ के रूप में वर्णित किया गया।"  

🐍"मतलब यह हुआ कि जब तक किसी बात को धर्म के आवरण में न प्रस्तुत किया जाए तब तक लोग उस पर विश्वास नहीं करेंगे ?" अशोक ने कहा।  

"हाँ ऐसा तुम कह सकते हो ।" सर ने उसकी बात का जवाब देते हुए कहा  "इतिहास बोध तो अभी भी तमाम लोगों के भीतर नहीं है । अगर किसी घटना का प्रमाण भी उनके सामने रख दो तो वे विश्वास नहीं करेंगे बल्कि उसी बात को सत्य मानेंगे जो धर्मग्रंथ में लिखी है । अफ़सोस यह कि मात्र हमारे देश में ही ऐसा है जबकि  विश्व के अन्य कई विकसित देश अपनी पौराणिक कहानियों से मुक्त हो गए हैं और विकास के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं । हम अभी भी उन तमाम अविश्वसनीय बातों का कारण जाने बिना उन्हें सत्य घटना के रूप में निरुपित करते हुए  प्राचीन संस्कृति के नाम पर आपस में लड़ रहे हैं ।"

🐍ट्रेंच से साँप की विदाई के पश्चात काम फिर आगे बढ़ा । आज हमें रेत की लेयर के नीचे फ्लोर तक पहुँचना ही था । लेकिन मज़दूरों में काम के प्रति कोई उत्साह नहीं दिखाई दे रहा था । शायद वे साँप देखकर डर गए  थे । “ कईं व्ही गयो ? “ डॉ. वाकणकर ने उनकी असमंजसता देख कर उनसे पूछा । 

एक मज़दूर ने धीरे से कहा “ बासाब, यहाँ गड़ा हुआ खजाना तो नहीं है ? “ सर ने ज़ोरदार ठहाका लगाया और कहा ..” अरे तुम लोग कहीं यह तो नहीं समझ रहे हो कि यह खजाने वाला साँप था और अपने खजाने की रक्षा के लिए  यहाँ बैठा था ? “ मज़दूर बेचारे क्या कहते, वे तो सदियों से चली आ रही इस मान्यता के निरक्षर संवाहक थे । 

सर ने कहा “भई ज़मीन में गड़े खज़ाने की  रक्षा करने वाला साँप  होता है, यह सब मनगढ़ंत बातें हैं । उस ज़माने में बैंक तो होते नहीं थे सो लोग देशाटन पर जाते हुए कई बार अपना खजाना ज़मीन में गाड़  देते थे और चोरों से बचाने के लिए यह अफ़वाह फैला देते थे । या जो चोर लोग होते थे वे भी जनता में भय व्याप्त करने के लिए ऐसी अफवाहें फैलाया करते थे ।“

🐍फिर सर हम लोगों की ओर मुखातिब होकर बोले “ यही कारण है कि अपने देश में अभी भी ऐसी मान्यतायें व्याप्त हैं । एक बार की बात है, हम लोग एक साइट पर उत्खनन कर रहे थे, वहाँ गाँव वाले रोज़ आते थे और पूछते थे “ कईं बा साब सोणा खोदण वास्ते आया हो कईं ? “ एक गड़रिया बालक तो रोज़ आता था और घंटों खड़ा रहता था । 

रोज़ सुबह आते ही सबसे पहले वह पूछता “ कईं, सोणा मिल्यों कईं ? “ मैं ना में सर हिला देता तो वो फिर पूछता “फेर कईं मिल्यो ? “ 

तो मैं ये टूटी - फूटी पॉटरीज़ की ओर इशारा कर देता और कहता “ई मिल्यो है ” । तो वह बड़े लोगों की तरह सिर हिलाता और कहता .…” हूँ.. ठीकरो मिल्यो है । “ और फिर वह हँसता हुआ चला जाता । 

तो बेचारे इन गाँव वालों को क्या पता हम जिस दबे हुए इतिहास को खोदकर निकाल रहे हैं वह सोने से भी ज़्यादा कीमती है ।“

🐍“ सही है ।“ रवीन्द्र ने कहा “हम लोग जब शाम को दंगवाड़ा जाते हैं तो गाँव के लोग यही सवाल करते हैं कि गड़ा हुआ खजाना खोदने आये हो क्या । "रवींद्र ने दंगवाड़ा का नाम क्या लिया सर का ध्यान हम लोगों की शरारत की ओर चला गया । 

उन्हें शायद भाटी जी ने या आर्य साहब ने या ख़ुद राममिलन ने बता दिया था कि हम लोगों ने राम मिलन को  अगिया बेताल के नाम पर डराने की शरारत की है । 

उन्होंने तुरंत कहा “ अच्छा तो तुम लोग दंगवाड़ा इसीलिए जाते हो कि इस बापड़े को परेशान करो । वो तो अच्छा हुआ मैंने तुम लोगों की तरफ से इसे समझा दिया नहीं तो यह कल ही कैम्प छोड़कर जा रहा था । ऐसा मत किया करो भाई ..“ हम लोग क्या कहते, कहाँ हमें इससे अधिक डाँट खाने की उम्मीद थी लेकिन सर ने तो खुद ही हमें उबार लिया था ।

🐍फिर भी इतनी शर्म तो थी हम में थी कि आज  हमने दंगवाड़ा जाना स्थगित कर दिया  और समय बिताने के लिए  भाटीजी की भोजन शाला के इर्द-गिर्द मँडराते रहे । हम लोगों ने प्लानिंग की कि राम मिलन भैया को मस्का लगाया जाए  और उनकी नाराज़गी दूर की जाए  । 

राम मिलन भैया को उत्खनन के औज़ार फावड़ा, गैंती, घमेले वाले तम्बू से अपने तम्बू में भी वापस लाना था । उनके बगैर रात्रिकालीन सत्र में आनंद ही नहीं आ रहा था । यह सोचकर हम लोग उनके तम्बू में प्रवेश कर गये । 

हमने देखा कि वे काफी प्रसन्न मुद्रा में थे । उन्होंने एक खम्भे पर हनुमान जी की तस्वीर की स्थापना भी कर दी थी और पलंग पर बैठे हुए, मंकी कैप लगाये हनुमान चालीसा का पाठ करने में व्यस्त थे । हम लोगों के तम्बू में प्रवेश करते ही उन्होंने अपना पाठ बन्द कर दिया और खीझते हुए कहा “पता नहीं पिछले जनम में कउन से पाप किये थे जौने के लाने प्राचीन भारतीय इतिहास में  इम्मे करना पड़ा और यहाँ जंगल में मरने के लिए  आना पड़ा । “

🐍हम लोग सोचकर गए थे कि परसों  की घटना के लिए  राममिलन भैया से माफी मांगेंगे और ऐसी कोई बात नहीं करने का वादा करेंगे जिस से उन्हें  बुरा लगे । लेकिन इस से पहले कि हम कुछ कहते उनके ज़िगरी दुश्मन किशोरवा ने उन्हें  छेड़ दिया “ तुम पिछ्ले जनम में क्या थे पंडत ? “ राम मिलन ने कोई जवाब नहीं दिया तो किशोर का हौसला बढ़ गया .. “ ज़रूर बन्दर रहे होगे ।“ 

हमने तुरंत किशोर भैया को आँख से इशारा किया । अब तो राम मिलन इस बात पर उखड़ गए  ..” और तुम किशोरवा ज़रूर गधे रहे होगे या उल्लू या सुअर रहे होगे । “ अरे रे... राममिलन भैया काहे नाराज़ हो रहे हो…। “ किशोर ने तुरंत बात सम्भाली “ अरे हम तो इसलिए कह रहे थे कि तुम इतनी हनुमान चालीसा पढ़ते हो, बन्दर माने आखिर हनुमान जी के वंशज ही हुए ना ? बन्दर होना कौनों ख़राब बात है का ? हम सब के पूर्वज भी तो बन्दर थे । “ 

🐍हनुमान जी का नाम सुनकर राम मिलन थोड़े नर्म हुए और हँसने लगे । मैंने सोचा अब बात कुछ सम्भाली जाए  और माफ़ीनामा पेश कर ही दिया जाए  सो उनसे कहा “ राममिलन भैया, हम सब उस दिन की घटना के लिए शर्मिन्दा हैं, कृपया हमें क्षमा प्रदान करें और हमारे साथ पुनः तम्बू में आ जायें । आपके बिना हमारी महफिल सूनी है । और किशोरवा की बात का बुरा न मानें सही तो यह है कि  मनुष्य का कोई अगला या पिछला जन्म नहीं होता । कोशिकाओं से यह शरीर बनता है और कोशिकाओं के मरने के साथ ही मर जाता है । न उसमें कोई जीव होता है न कोई आत्मा ,न कोई दबी छुपी इच्छा शेष रहती है न कोई पाप पुण्य बचा रहता है । यह जो जीवन है बस एक बार का है । सो यह जीवन हमारे साथ बितायें ।"

🐍राममिलन भैया ने मेरी बात के जवाब में जो कहा उसकी मुझे क्या किसी को उम्मीद नहीं थी । वे बोले "भाई, हमका सब मालूम है, कोई अगला पिछला जनम नहीं न होता है, न कोई भूत-प्रेत होता है, हम भी कौनो भूत- प्रेत से नहीं डरते हैं ,अगर डरते होते तो बताओ हियाँ अकेले रात बिताते ? हम कोई तुम लोगन से गुस्सा -वुस्सा नहीं हैं ,सब हमरे छोटे भाई जैसन हो ।

🐍इससे पहले कि किशोर भैया कुछ कहते रवींद्र ने कहा “सही कह रहे हो भैया आप ..भूत- प्रेत होते तो क्या वे हमारी मदद को नहीं आते ? जाने कितने पुरातत्ववेत्ता मनुष्य का इतिहास खोजने के इस कार्य में अब तक अपनी जान गँवा चुके हैं क्या उनके भूतों को हम पर रहम नहीं आता ? सर जॉन मार्शल का भूत आ जाता और ट्रेंच क्रमांक एक की खुदाई कर देता, राखाल दास  बेनर्जी का भूत आ जाता और दुसरी ट्रेंच खोद डालता ,फिर राय बहादुर दयाराम साहनी का भूत आ जाता और एक और ट्रेंच खोद डालता । आखिर हम उन्हीं  का अतीत तो खोज रहे हैं । रात भर में वे ट्रेंच खोद देते, सुबह हम अवशेष बटोर लेते । फिर वे सब अवशेषों की सोर्टिंग कर देते और उन पर टैग लगा भी लगा देते । हमें इतनी मेहनत तो ना करनी पड़ती ।“ 

🐍मैंने देखा रवींद्र की बात सुनते हुए अजय अपनी बाईं हथेली फैलाकर दाहिने हाथ से उस पर पतंग का मांजा लपेटने का अभिनय कर रहा है । यह हम लोगों का एक संकेत है जिसका मतलब यह है कि जब कोई ज़्यादा ही फेंकने लगता है तो हम लोग इस तरह का अभिनय करते हैं ताकि सामने वाला समझ जाए कि अब इससे ज़्यादा गप्प नहीं सुनाई जा सकती । 

रवींद्र ने उसकी ओर प्यार भरे गुस्से से देखा और उसका इशारा समझ कर उसकी पीठ पर एक जमाई । "चलो भाई राम मिलनवा का सामान उठाओ ।" किशोर भैया का आदेश हुआ । हम लोगों ने तुरंत  राममिलन भैया का बोरिया बिस्तर लपेटा और उसे कंधे पर उठाकर 'हाथी घोड़ा पालकी' करते हुए उन्हें अपने तम्बू में वापस लाकर उनकी घर वापसी का कार्यक्रम संपन्न किया  ।


🔲 *शरद कोकास* 🔲


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सोमवार, 25 मई 2026

18. माचिस तो अगिया बेताल ले गया

अगिया बेताल
(या अग्नि बेताल) मुख्य रूप से पौराणिक कथाओं, लोककथाओं और हिंदी मुहावरों में इस्तेमाल होने वाला एक शब्द है। इसे अलग-अलग संदर्भों में अलग तरह से समझा जाता है: [1, 2]
1. पौराणिक और लोककथाओं में (एक शक्ति या भूत)
लोक मान्यताओं के अनुसार, 'अगिया बेताल' एक प्रकार की अलौकिक या भूत-प्रेत योनि है जिसके मुख से आग निकलती है। ऐसा माना जाता है कि यह रात के समय श्मशान या मरघट में दिखाई देती है।
📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼


पूर्वकथा - छात्रों का यह दल उत्खनन शिविर में दंगवाडा नामक स्थान पर पहुँचा है ।छात्रों को इस शिविर में आये काफी दिन हो गए हैं और वे थोड़ा थोड़ा ऊबने भी लगे हैं इसलिए कुछ मस्ती तो चाहिए ।राममिलन भैया इन छात्रों में सबसे बड़े हैं और ईश्वर और धर्म कर्म को मानने वाले भी सो यह छात्र उनके साथ थोड़ी बहुत शरारत करते रहते हैं ।आज के इस भाग में भी ऐसी ही एक शरारत का किस्सा है पढ़िए आपको मज़ा आएगा *

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*भाग 18*

*माचिस कौन ले गया , अगिया बेताल*



वाकणकर सर के साथ अवशेषों को संरक्षित करने की प्रक्रिया पूर्ण करते ही हम लोगों के अध्ययन का एक आवश्यक अध्याय पूर्ण हो चुका था सो शाम को हम लोग थोड़ा मनोरंजन चाहते थे और उसके लिए सिटी अर्थात दंगवाड़ा जाने से बेहतर और क्या हो सकता था । 

किशोर हमेशा की तरह मुखर था और बार बार राममिलन को छेड़े जा रहा था । नदी के पास बरगद का एक बड़ा पेड़ देखकर किशोर ने कहा “ जानते हो पंडत , इस बरगद पर एक भूत रहता है ।“ राममिलन ने गुस्से में कहा “वो हमें भूत - वूत से डर नाही लगता हमरे बजरंग बली सब भूतों की छुट्टी कर देते हैं । भूत पिसाच निकट नहीं आवै महावीर जब नाम सुनावै ।"
हमें नहीं पता था पंडित राममिलन शर्मा की यह बात सुनकर किशोर त्रिवेदी के दिमाग़ में कोई शरारत जन्म ले चुकी है । खैर, ऐसे ही हँसी मज़ाक करते हुए हम लोगों ने नाला पार किया और दंगवाड़ा गाँव पहुंचे । चौक में पहुँच कर उसी दुकान के पटिये पर बैठकर चाय पी, अखबार पढ़ा और थोड़ी देर गाँव वालों के साथ गपशप करने के बाद वापस कैम्प में जाने के लिए निकल पड़े । 

इतने दिनों में गाँव वालों पर हम लोग ऐसा रोब जमा चुके हैं जैसे हम उन्हीं के बाप-दादों का इतिहास लिखने के लिए यहाँ आये हैं, सो हम लोगों की ख़ातिरदारी भी बढ़िया होने लगी है । गाँव की यह सैर हम लोगों के लिए बहुत रोमांचक होती है । हमें गाँव के लोगों की ज़िन्दगी को करीब से जानने का अवसर भी मिल रहा है और हमारी सामाजिकता की भूख भी इससे शांत हो रही है ।

" गाँव की ज़िंदगी भी कितनी अच्छी होती है ।" अजय ने ज़मीन पर पड़ा एक पत्थर उठाया और काल्पनिक आम की कैरी तोड़ने के अंदाज़ में उसे पेड़ की ओर घुमाकर फेंक दिया । 

"ख़ाक अच्छी होती है ! " रवीन्द्र ने तपाक से कहा "हम लोग एक पर्यटक की तरह यहाँ आये हैं इसलिए यह जीवन हमें अच्छा लग रहा है, अगर कुछ दिन गाँव में बिताना पड़े तो समझ में आ जायेगा, इसलिए कि जिन बुनियादी सुविधाओं की हमें आदत है वे यहाँ नहीं हैं ,सुबह सुबह लोटा लेकर कितने दिन जाओगे भाई ।"

" हाँ यह तुम ठीक कह रहे हो ।" अशोक ने कहा "यह गाँव भी भारत के अस्सी के दशक के अन्य गांवों जैसा ही है । यहाँ न ढंग का स्कूल है न ढंग का अस्पताल । सड़कें भी देखो कितनी ख़राब हैं, पीने का पानी भी अभी मिल रहा है लेकिन जैसे ही गर्मियाँ शुरू होंगी उसकी भी किल्लत हो जाएगी । देश के विकास के लिए कितनी पंचवर्षीय योजनायें बन चुकी हैं लेकिन विकास की रौशनी अभी तक यहाँ नहीं आई है ।" 
" फिर भी यार गाँव का जीवन शहर से तो अच्छा है, शुद्ध प्रदूषण रहित वायु, शुद्ध सुस्वादु भोजन और निश्चिन्तता की ज़िन्दगी अहाहा ..। " अजय जैसे किसी वादविवाद प्रतियोगिता में ग्राम्य जीवन के पक्ष में बोल रहा था ।

किशोर भैया हमारी बातें सुनकर ज़रा चिंतित हो उठे " भाई, यह सही है कि हमारी कल्पना के गांवों में बहुत सुन्दर जीवन है, कल कल करती बहती हुई नदियाँ, तितलियों के पीछे भागते बच्चे, गाँव की अमराइयों में ठंडी ठंडी हवा, पेड़ों से आम की खट्टी मीठी कैरियां तोड़कर खाती हुई अल्हड़ युवतियां, मक्के की रोटी सरसों का साग, हरी मिर्च की चटनी ..दूध ,दही,घी, गुड़ शहद आदि की बहुलता । 

लेकिन यह सब होते हुए भी ग्रामवासियों का जीवन दुखद तो है । किसान की फ़सल जब ख़राब हो जाती है वह कर्ज में डूब जाता है, वैसे भी कृषि कार्य से होने वाली आमदनी अब पूरे परिवार की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाती । अन्य रोजगार और कुटीर शिल्प आदि की स्थिति भी ठीक नहीं है । अर्थाभाव के कारण बच्चों को भी काम पर जाना पड़ता है, उनकी शिक्षा पूरी नहीं हो पाती, बीमार पड़ने पर कोई अस्पताल नहीं मिलता, फिर भूत -प्रेत, जादू -टोने जैसे अन्द्धविश्वास के चक्कर में वे आ जाते हैं ।" किशोर ने ग्राम्य जीवन के वास्तविक चेहरे पर पड़ा रूमानियत का पर्दा खींचकर उसे बेनक़ाब कर दिया था ।

अशोक ने किशोर भैया की बात का समर्थन करते हुए कहा "यह सच है कि भारत के गांवों की दशा अब दयनीय होती जा रही है । सिंचाई आदि की उचित व्यवस्था न होने के कारण किसान सूखे की चपेट में आ जाते हैं या बाढ़ उनकी फ़सल लील जाती है फिर उन्हें महाजनों और साहूकारों के चक्कर काटना पड़ता है । इसके अलावा उनके आपसी झगड़े भी हैं जिनकी वज़ह से उन्हें अदालतों के चक्कर काटना पड़ता है । गांवों की बनिस्बत शहरों की स्थिति अभी काफी अच्छी है । यही कारण है कि शहरों की चकाचौंध गाँव के युवकों को आकर्षित कर रही है ..वह पान ठेले पर कुछ युवक हमसे नहीं कह रहे थे ,भैया हम लोगों को भी शहर में कुछ काम -वाम दिलवा दो ।"

बातें करते हुए हम लोग नाले तक पहुँच गए । हम लोग शिविर की ओर लौट रहे थे और अन्धेरा हो चुका था । गाँव की ओर जाते समय हमने इस बात पर ध्यान नहीं दिया था कि पिछले दिनों हुई वर्षा के कारण नाले में पानी कुछ बढ़ गया है और वे पत्थर जिन पर पाँव रखकर हम लोग पहले नाला पार करते थे पानी में डूब गए हैं । जाते समय काफी रौशनी थी और वे पत्थर साफ़ साफ़ दिखाई दे रहे थे लेकिन गपशप के बीच हमें ध्यान ही नहीं रहा कि इस बार जिन पत्थरों पर हमने पाँव रखकर नाला पार किया था उन पत्थरों को चिन्हित कर लें । 

हालाँकि इससे भी कोई फायदा नहीं होता, अँधेरा गहन होता जा रहा था और हम रौशनी के आदी शहर वासियों को गांववालों की तरह अँधेरे में भी वस्तुएँ पहचान लेने का अभ्यास नहीं था अतः ठीक से कुछ दिखाई देना मुश्किल था ।

राम मिलन उन्हें छेड़े जाने की वज़ह से गुस्से में थे और अपनी खामख्याली में हम लोगों से अलग-थलग और आगे आगे चल रहे थे । नाले तक पहुँचने से पहले ही किशोर ने हम लोगों को धीरे से एक टीले की ओट में छुप जाने का इशारा किया और ख़ुद राममिलन के पीछे चलते हुए उनसे कुछ दूरी बना ली । हम समझ गए किशोर अपनी शरारत को अंजाम देने जा रहे हैं । राममिलन नाले पर पहुँचकर कुछ पल ठहरे, हम लोगों की राह देखी फिर यह सोचकर कि हम लोग बहुत पीछे रह गए हैं नाला पार करने के लिए अकेले ही आगे बढ़ गए । 
पत्थरों पर सम्भल कर पाँव रखते हुए जैसे ही वे बीच नाले तक पहुँचे किशोर तेज़ी से दबे पाँव आगे बढ़े और धीरे से उन्हें धक्का दे दिया । राम मिलन धड़ाम से पानी में गिर पड़े और हाय-तौबा मचाने लगे “ अरे कौन है ससुरा हमका गिराय दिया ..। “ और वे जोरों से राम राम कहने लगे । किशोर ने कुछ कदम पीछे हटकर इस तरह अभिनय किया जैसे वे उनकी आवाज़ सुनकर दूर से दौड़े चले आए हों ।

“क्या हुआ पंडत कौनो भूत वूत धक्का दे दिया का ? “ किशोर भैया ने हाँफने का अभिनय करते हुए कहा । 

भूत का नाम सुनते ही पंडित जी की घिग्गी बन्ध गई और वे ज़ोर ज़ोर से रटने लगे “जय हनुमान ज्ञान गुन सागर जय कपीस तिहूँ लोक उजागर ..राम दूत अतुलित बल घामा अंजनी पुत्र पवनसुत नामा ..संकट तें हनुमान छुड़ावै मन क्रम बचन ध्यान जो लावै .. ।“ 

हम लोग चट्टानों की ओट से बाहर निकलकर जब तक उनके करीब पहुँचे तब तक वे उठकर खड़े हो चुके थे । लेकिन फिर उन्हें ध्यान आया कि उनका एक जूता पानी के भीतर रेत - वेत में कहीं दब गया है । वे झुक कर पानी में हाथ डालकर अपना जूता तलाशने लगे ।

किशोर ने चिल्लाकर कहा “ अरे अशोक जरा माचिस तो देना… पंडत का जूता अन्धेरे में दिख नहीं रहा है ।“ अशोक ने दूर से हाथ बढ़ाकर कहा “लो“ । कुछ सेकंड रुककर किशोर ने फिर कहा “ तुमसे कहा ना ..माचिस तो दे यार अशोक, अन्धेरे में कुछ सूझ नहीं रहा है ।“ 

अशोक बोला “ अभी तो यार तुम्हारे हाथ में पकड़ाई है माचिस ..तुमने हाथ बढ़ाया था ना या किसने हाथ बढ़ाया था ? “ किशोर सहित हम सब ने एक स्वर में कहा “ हमने तो हाथ नहीं बढ़ाया । “ “ किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया तो ससुरी माचिस कहाँ गई ..कौनो अगिया बेताल ले गया क्या ? “ किशोर बोला ।

अगिया बेताल का नाम सुनते ही राममिलन भैया की तो हवा बन्द हो गई । गनीमत इस समय तक उनका जूता मिल गया था । लेकिन वे जूते पहन ही नहीं पाए और उन्हें हाथ में लिए लिए गीले कपड़ों में ठण्ड से काँपते हुए, डर के मारे हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए और लगभग दौड़ते हुए कैम्प की ओर बढ़ गए । 

हम लोग भी उनके साथ ही थे और बमुश्किल अपनी हँसी दबाते हुए उनका साथ दे रहे थे । हाँलाकि कैम्प तक पहुँचते हुए हँसी रोकना मुश्किल हो गया । पंडित राममिलन तो कपड़े बदलने के लिए तम्बू में घुस गए और हम लोग बाहर ही रुककर पेट पकड़ पकड़ कर हँसने लगे । यह हमने सोचा ही नहीं कि राममिलन भैया हमारे इस तरह हँसने से हमारी शरारत समझ गए होंगे ।

इस घटना से राममिलन भैया अत्यंत दुखी हो गए और उन्होंने घोषणा कर दी कि अब वे एक पल भी इस कैम्प में नहीं रहना चाहते । डॉ. आर्य के आगे जैसे ही हमने अपने उद्दंडता पुराण का पाठ किया उन्होंने बहुत गम्भीरता से कहा “ देखो भाई ,लगता है पंडित बहुत डर गया है, अब उसे और ज़्यादा परेशान मत करो वरना वह कैम्प छोड़कर चल देगा और बात सर तक पहँच जाएगी तो बहुत मुश्किल हो जाएगी ।“ 

डॉ.वाकणकर कुछ देर पूर्व ही किसी कार्यवश उज्जैन के लिए निकल गए थे । हमने सोचा जब तक वे वापस आएँ तब तक तो मज़ा लिया ही जा सकता है, उसके बाद हम लोग राममिलन भैया से माफ़ी-वाफी मांग लेंगे और उन्हें प्रसन्न कर लेंगे, वैसे भी इतने सह्रदय हैं कि बुरा नहीं मानेंगे । सो हमने डॉ. आर्य को भी मनाकर अपनी शरारत कम्पनी में शामिल कर लिया ।

राममिलन भैया चूँकि हम लोगों से सख्त नाराज़ हो गये थे इसलिए उन्होंने बाहर आकर घोषणा की कि वे हम लोगों के साथ टेंट में रात नहीं बिताएंगे सो वे तुरंत अपना बिस्तर हम लोगों के टेंट से उठाकर ले गए और अवशेषों वाले तम्बू में शिफ्ट हो गए । भोजन करते वक़्त भी राममिलन भैया हम लोगों से रूठे रूठे रहे और चुपचाप अपना भोजन ग्रहण करने के उपरान्त बिना कुछ बोले जाने लगे । 

किशोर भैया ने उन्हें छेड़ते हुए कहा " देखना भैया, अच्छे से सोना, उस तम्बू के ठीक ऊपर एक बरगद का पेड़ है कोई कह रहा था कि उस पर भी एक हज़ार साल से कोई जिन्न रहता है ।"

भोजन के बाद हम लोग धीरे से दबे पांव राममिलन भैया के टेंट की और गए लेकिन उन्होंने पर्दे की डोरियाँ बाँध रखी थीं और भीतर का कुछ नहीं दिखाई दे रहा था । किशोर भैया ने धीरे से एक दरार से झांककर देखा राममिलन भैया एक निवार वाले पलंग पर बैठे हुए थे और कुछ पढ़ रहे थे । 
वे हमारे पास आये और कहा "क्या ख्याल है जिन्न की आवाज़ निकाली जाए ?" मैंने उन्हें टालने के हिसाब से कहा " किशोर भाई अभी तो वो जाग रहे हैं सब समझ जायेंगे , जब सो जायें तब डराना ।" मुझे इस बात का आभास था कि अगर बात हद से बाहर चली गई तो मुश्किल हो जायेगी ।

फिर हम लोग अपने तम्बू में आ गए । रात के किस्सों में बस राममिलन भैया के ही किस्से शामिल थे । अशोक ने कहा " पता है अपने राममिलनवा एक बार पुलिस के सिपाही को धौंस देकर आ गए थे । " अरे.. अरे क्या हुआ था ?" अजय ने अपनी गर्दन सामने की ओर बढ़ाते हुए कहा । 

" हुआ यह कि .." अशोक ने बताना शुरू किया " अपना वह जूनियर नहीं है ..क्या नाम है उसका पटेल ,उसे अपनी साइकिल के पीछे बिठाकर राममिलन भाई कंठाल के पास से कहीं गुजर रहे थे । ग़लती से वे रांग साइड कहीं घुस गए । सामने ही ट्रेफिक का सिपाही था उसने इनकी साइकिल का हैंडल पकड़ लिया और कहा " रांग साइड कहाँ घुसते हो ?" राममिलन भैया का रौब तो उनके कपड़ों से ही जाहिर होता है , चुस्त पैंट वह भी कड़क क्रीज वाली, करीने से इन की हुई शर्ट ,चमचमाता हुआ चमड़े का जूता और आँखों पर गोगल्स । वे सीधे खड़े हो गए और कहा " हमका चीन्हे नहीं हो लगता । फिर डांटने के अंदाज़ में कड़कती हुई आवाज़ में उस सिपाही से कहा ..

 ए यू पुलिस मैन ..आई ऑफिसर ..टू द हेड मास्टर आई बेग टू से दैट आई ऍम सफरिंग फ्रॉम फीवर सिंस लास्ट नाईट काइंडली ग्रैंट मी थ्री डेज़ लीव ,अंडरस्टैंड यू ट्रेफिक मैन रोड साइड ... बस पुलिसवाले ने उनकी यह भयानक अंग्रेज़ी सुनकर उन्हें सलूट मारा और कहा .. ठीक है सर.. जाइए ।" उसके बाद हँसते हँसते ही हम लोग सो गए ।

बहरहाल आज की सुबह अन्य दिनों की भांति ही हुई । आज हमारा यहाँ आठवां दिन है । डॉ.वाकणकर कल शाम ही उज्जैन निकल गए थे और आज शाम तक लौटने वाले थे । उनकी अनुपस्थिति में आर्य सर के मार्गदर्शन में हम लोगों ने हमें स्वतन्त्र रूप से सौंपी हुई ट्रेंच क्रमांक चार पर स्वतंत्र रूप से कार्य प्रारंभ किया । 

आज हमने पुन: 'पेग क्रमांक दो' से प्रारम्भ कर दक्षिण की ओर दो मीटर के वर्गाकार टुकड़े में खुदाई की । डॉ.वाकणकर की अनुपस्थिति और आर्य साहब की हमारी ट्रेंच पर निरंतर उपस्थिति की वज़ह से आज मुख्य ट्रेंच पर काम बंद था । वहाँ के सारे मज़दूर भी आदेशानुसार हमारी ट्रेंच पर पहुँच चुके थे इसलिए काम बहुत तेज़ी से हुआ । दोपहर तक हम लोग उत्खनन करते हुए 1.35 मीटर तक पहुँच चुके थे । हम लोगों के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि थी ।

आज हमने सबसे ऊपरी सतह से अर्थात पहले स्तर से कार्य प्रारंभ किया था । आधे मीटर नीचे उतरने के बाद दूसरे स्तर पर हमें दस सेंटीमीटर मोटी रेत की एक परत मिली । हमने डॉ.वाकणकर को दिखाने के उद्देश्य से रेत की उस परत को यथावत रखकर उसके साइड में खोदना प्रारंभ किया । 

इसके पश्चात और गहराई में उतरने पर तीसरे स्तर पर ईट का बना एक फ्लोर प्राप्त हुआ । इस तरह अब हमारे सामने सीढ़ीनुमा तीन सतह थीं सबसे ऊपरी सतह पर मिट्टी, फिर दूसरी सतह पर भी मिटटी लेकिन उसके नीचे रेत और तीसरी सतह पर ईटों का बना फ्लोर ।

इस फ्लोर को स्पष्ट रूप से प्राप्त करने के लिए हमने बाईं ओर इसका विस्तार किया अर्थात बाईं ओर थोड़ी खुदाई और की । ज़मीन के इतने नीचे रेत की परत देखकर हम लोगों को आश्चर्य हुआ क्योंकि उसके ऊपर के दो स्तरों में सिर्फ मिटटी थी । हम सोच में पड़ गए कि इतने नीचे रेत कैसे पहुँची होगी ?
रेत की परत के विषय में बताते हुए डॉ.आर्य ने कहा " तीसरे स्तर पर जो ईटों का फ्लोर है वह किसी बस्ती का प्रतीक है । हो सकता है उस समय नदी की बाढ़ यहाँ तक आई हो और उसमें यह बस्ती डूब गई हो ,यह रेत की सतह उसी वज़ह से है, लेकिन अगर यह इसी स्तर पर काफी दूर तक मिलेगी तभी यह कन्फर्म होगा अन्यथा यह किसी के द्वारा इकठ्ठा की गई रेत भी हो सकती है । उसके ऊपर की सतह पर मिटटी होने का अर्थ है कि बाढ़ के बाद जब कई बरस बीत गए और यह ज़मीन गाद मिटटी आदि से पट गई उस पर फिर से नई बस्ती बस गई ।"

शाम का काम समाप्त होने से पूर्व डॉ.वाकणकर शिविर पहुँच चुके थे । मुख्य ट्रेंच देखने के बाद वे हमारी प्रशिक्षण ट्रेंच पर आये । सबसे पहले उन्होंने तीसरे स्तर पर प्राप्त ईटों की इस फ्लोर का अवलोकन किया। हम लोगों ने उनसे रेत की उस सतह के विषय में भी पूछा । 

काफी देर तक अवलोकन करने के पश्चात उन्होंने कहा " यह ईटों का फ्लोर किसी ताम्राश्मयुगीन मकान का हिस्सा लगता है जो किसी आक्रमण, अग्निकांड अथवा बाढ़ के फलस्वरूप नष्ट हुआ है । केवल रेत के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता है कि यह सभ्यता बाढ़ की वज़ह से नष्ट हुई होगी । यह भी केवल अभी अनुमान है । अभी हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच रहे हैं । उत्खनन के विस्तार में जाने पर ही यह तय हो सकेगा कि वास्तविक कारण क्या था ।"

सर द्वारा प्रदत्त इस जानकारी ने हमें उत्साह से भर दिया । हमें याद आया कि हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो में भी खुदाई के दौरान इसी तरह पूरा का पूरा शहर निकला था । वहाँ उन अवशेषों के बीच खड़े पुरातत्ववेत्ताओं के छाया चित्र हम लोगों ने किताबों में छपे हुए देखे थे । 

हम लोग कल्पना करने लगे कि बस दो-तीन दिनों में हम भी यहाँ पूरा शहर ढूँढ निकालेंगे और फिर इन अवशेषों के बीच खड़े रहकर फोटो खिचवायेंगे । ग़नीमत कि डॉ वाकणकर से हम लोगों ने अपने इस शेखचिल्ली वाले ख़्वाब के बारे में कुछ नहीं कहा वर्ना वे उसी क्षण हमें डंटियाते हुए हमारा स्वप्न भंग कर देते ।

यह बात तो हमें बहुत बाद में समझ आई कि किसी भी अवशेष की प्रारम्भिक अवस्था को देखकर उसके भविष्य के बारे में अटकलें नहीं लगाना चाहिये क्योंकि अनुमान गलत भी हो सकते हैं । बिना सम्पूर्ण प्रमाणों के केवल पूर्वाग्रहों के आधार पर लिखा गया इतिहास हमेशा हमेशा के लिए गलत मान्यताओं को स्थापित कर देता है । हमारे देश के इतिहास लेखन में कई बार ऐसा हुआ है जब यथार्थ से अधिक अनुमान या कल्पना को स्थान दिया गया ।

शिविर में वापस लौटते हुए हमने सर से सवाल किया "सर, लेकिन केवल अनुमान या कल्पना के आधार पर लोग इतिहास कैसे लिख देते हैं ? ' सर ने कहा "इसके अनेक कारण हो सकते हैं जैसे काम की जल्दबाज़ी, आधा अधूरा ज्ञान, पूर्वाग्रह, पुरस्कार या नाम हासिल कर लेने का लोभ या सत्ता का दबाव आदि । हालाँकि कई बार पूरे प्रमाण मिलते ही नहीं हैं । इतिहासकारों में इस बात पर विवाद अब तक जारी है कि ऐसी स्थिति में निष्कर्ष पर मुहर लगानी चाहिए या नहीं ।" 

जो भी हो आज साईट से लौटते समय हम लोग बहुत उत्साह में थे । ऐसा लग रहा था जैसे हमारा आना सार्थक हो गया है । इस खुशी में आज हम लोग फिर एक बार सिटी का चक्कर लगा आए । हाँ ..आज राम मिलन भैया हमारे साथ नहीं गए ।

*शरद कोकास*