| खुफू का पिरामिड |
पुरातत्त्ववेत्ता
शरद कोकास की लम्बी कविता 'पुरातत्त्ववेत्ता' पहल पुस्तिका के अंतर्गत सन 2005 में प्रकाशित हुई थी , इस कविता की काफी चर्चा हुई .
बुधवार, 6 मई 2026
एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दूसरा दिन-एक-मोहनजोदाड़ो के स्नानागार की कल्पना
एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी - पहला दिन - चार -बताओ हरक्युलिस बड़े कि हनुमान
लेकिन सोने की हमारी कोशिश असफल रही। मैंने कहा, “चलो समय काटने के लिए मैं तुम लोगों को एक कहानी सुनाता हूँ उसी तरह जिस तरह ‘वेताल पच्चीसी’ में राजा विक्रमादित्य को उसके कंधे पर लदे हुए बेताल ने कहानियाँ सुनाई थीं।”
रवीन्द्र बोला, “भैया बेताल, पहले तय कर ले हम में से विक्रमादित्य कौन है जो तेरी कहानी ढंग से सुनेगा क्योंकि बाद में तो तू उसीसे सवाल पूछेगा।”
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| प्राचीन ग्रीस का नक्शा |
मैंने रवींद्र की ओर मुस्कुराकर देखा और कहा, “भाई, यह बाद में तय कर लेना फिलहाल तो यह कहानी सुनो। चलो, मैं तुम्हें यूनान ले चलता हूँ। योरोप और बाल्कन प्राय:द्वीप के दक्षिण में इजियन सागर से लगा प्रदेश है यूनान,वही प्रदेश जिसे वर्तमान में ग्रीस कहते हैं। यहाँ दक्षिण यूनान के पेलोपोनेसस क्षेत्र में उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उत्खनन किया गया जिससे माइसीनी नगर में प्राचीन सभ्यता का पता चला। इस तरह हमें यूनान के इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त हुई।
“तू कहानी सुना रहा है या यूनान का इतिहास?” अजय जोशी ने ऊबकर पूछा। रवीन्द्र ने उसे छेड़ते हुए कहा,“अबे गधे, इतना भी नहीं जानता कि कहानी और इतिहास में फर्क होता है।” “जानता हूँ यार, इसीलिए तो कहा, लेकिन यह इतनी देर से बोर कर रहा है, ठीक है, चल आगे सुना।” अजय बोला।
“चलो
ठीक है।” मैंने सकुचाते हुए कहा,“भाई हम लोग पुरातत्त्व के छात्र हैं अब हिंदी के
कथाकारों की तरह किस्सागोई में कहानी थोड़े ही सुना सकते हैं। चलो, फिर भी कोशिश
करता हूँ,तुम्हें हर्क्यूलिस या हेराक्लीज़ की कहानी सुनाता हूँ।”मेरे भीतर का
बेताल जाग गया था।
“प्राचीन यूनान में हेराक्लीज़ नामक एक प्रसिद्ध देवता था जो रोम में हरक्युलिस कहलाता था। हरक्युलिस के बारे में कहा जाता है कि वह आधा देवता और आधा मनुष्य था और उसके पास अद्भुत शक्तियाँ थीं।
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| हरक्युलिस |
यूनान और रोम के लोग पराक्रमी हर्क्यूलिस के कारनामों को बहुत पसन्द करते थे। यूनान में ऑजियस नामक एक राजा था जिसका राज्य बहुत विशाल था। उसकी गौशाला में पाँच हज़ार से अधिक गाय और बैल थे। लेकिन उसने सारे गौसेवकों को युद्ध और राजस्व वसूली जैसे दूसरे कामों में लगा दिया। स्वाभाविक था कि गौशाला की व्यवस्था बिगड़ गई और सफाई व्यवस्था ठप्प हो जाने के कारण गौशाला गोबर से भर गई। तब राजा ऑजियस को हरक्युलिस की याद आई। हरक्युलिस ने अपनी शक्ति से सबसे पहले पास की दो नदियों पर चट्टानों से एक बांध बना दिया, जब वे नदियाँ ऊपर तक भर गईं उसने एक झटके में वह बांध तोड़ दिया, बस पानी की तेज़ धार छूटी और सारा गोबर अपने साथ बहा ले गई।”
“तू भी यार, सोते समय क्या गन्दी गन्दी कहानी सुना रहा है। तेरे दिमाग में भी लगता है यही भरा है।” अजय ने हँसते हुए कहा।
“सुनो तो।” मैं अपने प्रवाह में था,“इसी तरह एक बार ऐसा हुआ कि यूनान के राजा यूरीस्थेयस ने हरक्युलिस से कहा कि मैं तुम्हें शक्तिमान तब मानूंगा जब तुम मेरे लिए सोने का सेब लेकर आओगे। यह सेब यूनान से पश्चिम में इजियन महासागर के किनारे या पृथ्वी के सुदूर उत्तर में किसी बाग में किसी पेड़ पर लगे थे जो देवताओं की संपत्ति थे। ये तो हरक्युलिस के लिए चैलेंज था, तो वह सेब लाने के लिए चल पड़ा ।
हरक्युलिस को रास्ते में किक्नोस नामक दैत्य और जल देवता नीरियस से लड़ना पड़ा। नीरियस के बारे में यह मशहूर था कि वह अपने शरीर को चाहे जितना बड़ा या छोटा कर सकता था।”“मतलब सुरसा राक्षसी की तरह?” राममिलन भैया बहुत ध्यान से कहानी सुन रहे थे।
“बिलकुल।” मैंने कहा,“लेकिन हरक्युलिस ने उसे भी परास्त कर दिया। आगे बढ़ने पर उसे समुद्र के देवता पोसायडान का बेटा एन्तेयस मिला जिसके बारे में मशहूर था कि धरती पर पाँव रखते ही उसके शक्ति दुगनी हो जाती थी। सो हरक्युलिस ने युक्ति लगाईं और उसे हवा में उछाल उछाल कर ही मार डाला।”
“फिर क्या हुआ?” रवींद्र ने पूछा। मैंने कहा, “उसके बाद वह काकेशस पर्वत पर आया जहाँ प्रोमेथ्युस बंदी था। यह वही प्रोमेथ्युस था जो मनुष्यों के लिए देवताओं से अग्नि चुराकर लाया था और उसे ज्यूस देवता ने इस बात की सजा देते हुए एक चट्टान से बांध दिया था।
वहाँ एक गरुड़ रोज आता था और उसके जिगर को थोड़ा थोड़ा खाता था। हरक्युलिस ने प्रोमेथ्यूस को उस दैत्य से भी मुक्ति दिलाई। इसके बदले में प्रोमेथ्युस ने उसे सेब के बाग़ तक पहुँचने का रास्ता भी बताया और यह भी बताया कि एटलास तुम्हें धोखा देगा अतः सावधान रहना।
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| सोने का सेब |
हरक्युलिस जब बाग़ में पहुँचा तो उसने देखा कि वहाँ वीर अटलांटिस या एटलास उस बाग़ में सोने के सेब की रक्षा कर रहा था। वह अपने काँधे पर आकाश को थामे हुए था और पृथ्वी पर खड़ा था। अब उस समय यूनानियों को आकाश की वास्तविकता तो मालूम नहीं थी। वे सोचते थे कि आकाश पृथ्वी पर गिर रहा है और वीर अटलांटिस उसे अपनी पीठ पर थामे हुए है जिसकी वज़ह से पृथ्वी बची हुई है।”
“इसी के नाम पर अटलांटिक महासागर का नाम पड़ा है ना?” अशोक ने पूछा।“हाँ।” मैंने कहा,“अब आगे सुनो। हरक्यूलिस ने वीर अटलांटिस से सेब की मांग की। उसने हरक्युलिस से कहा, 'मैं सेब तोड़ता हूँ तब तक तुम अपने कंधे पर यह आकाश थामे रखो।'
सेब तोड़कर वह जाने लगा। हरक्युलिस समझ गया कि उसके साथ
धोखा हुआ है। उसने कहा, 'भाई, मेरे कन्धों में बहुत दर्द हो रहा है एक मिनट के लिए
तुम यह भारी भरकम आकाश थाम लो।’एटलास उसकी बातों में आ गया और उसने फिरसे आकाश
अपने कंधे पर ले लिया। बस हरक्युलिस को मौका मिला गया और वह सोने के सेब लेकर भाग गया।”
“वाह
! वाह ! अच्छी कहानी है, लेकिन सारे वीर यूनान में ही पैदा नहीं हुए हैं।” हमारे
हनुमान भक्त मित्र पंडित राममिलन शर्मा इलाहाबादी बहुत देर से हरक्युलिस का किस्सा
सुन रहे थे और मन ही मन नाराज़ हो रहे थे। उन्होंने गुस्से से कहा,“होगा हरक्युलिस
फर्क्युलिस बहुत बड़ा वीर, लेकिन हमरे यहाँ के वीर हनुमान जी भी उससे कुछ कम नहीं
हैं, उन्होंने तो सूरज को निगल जाने और संजीवनी बूटी का पहाड़ उठा लाने जैसे बड़े
बड़े कारनामे किये हैं उनको भी ऐसे ही राक्षस रास्ते में मिलते हैं और लंका जाते
समय ऊ सुरसा भी मिलती है.. ई हर्क्यूलिसवा भी तो उन्हीं का यूनानी अवतारहै। ये सब
कथाएँ हमरे यहाँ से ही ओ लोग चोरी किये हैं।”
मैंने
कहा,“हाँ राममिलन भैया,यूनानियों की तरह पुराणकथायें तो हमारे यहाँ भी हैं और
उनमें भी अनेक किस्से हैं जो दुनिया की अनेक सभ्यताओं के किस्सों जैसे ही हैं। अनेक
पात्र तो हमारे मिथकीय पात्रों से मिलते जुलते भी हैं जैसे उनका हरक्युलिस तो
हमारे हनुमान, उनका ज्यूस और हमारा इंद्र। जैसे हमारे यहाँ गांधारी के आँख की
पट्टी खोलकर देख लेने पर दुर्योधन के शरीर के वज्र के हो जाने की कथा है वैसे ही
उनके यहाँ एकिलिस की माँ द्वारा उसके शरीर को वज्र करने के लिए उसे स्टिक नामक नदी
में डुबोये जाने की कथा है।”
“भाई
अब तेरी कथा बाद में सुनेंगे।” रवींद्र ने कहा,“अब नींद आ रही है ..लेकिन यार यह
योरोप,बाल्कन द्वीप, पेलोपोनेस,लगता है अगली बार तेरी बातें समझने के लिए प्राचीन
विश्व का नक्शा लेकर बैठना पड़ेगा”। “बिलकुल।” मैंने कहा। वैसे भी रात काफी हो चुकी
थी और नींद से सबकी ऑंखें बोझिल हो रही थीं। बिजली के बल्ब से निकलने वाली रोशनी
के ड्यूटी आवर्स भी समाप्त हो चुके थे। जंगल की ठंडी हवा तम्बू के छेदों से भीतर
प्रवेश कर रही थी।
जाने
क्यों मुझे इस ठण्ड में इन काल्पनिक कहानियों के बरक्स यथार्थ के धरातल पर लिखी
प्रेमचंद की कहानी ‘पूस की रात’ याद आ रही थी। इससे पहले कि हम लोगों की हालत ठण्ड
में कांपते किसान हल्कू की तरह हो जाए हम लोगों ने सो जाना उचित समझा। अंततः मैं
उस हवा में पृथ्वी के पहले मनुष्य की देहगन्ध महसूस करता हुआ जाने कब नींद के आगोश
में चला गया।
आज की यह कहानी आप को कैसी लगी टिप्पणी मे अवश्य बताएं
आपका
शरद कोकास
गुरुवार, 10 सितंबर 2020
एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पहला दिन -तीन-हरक्युलिस और हनुमान भाग एक
दंगवाड़ा की पुरातात्विक साईट पर चल रहे उत्खनन शिविर में आगमन के
पश्चात सर्द मौसम की यह पहली रात हमारी प्रतीक्षा कर रही थी । उसकी काली आँखों में
धीरे धीरे हमारा अक्स उभर रहा था ।अभी उसे बहुत सारा वक़्त हमारे साथ बतकहियों में
बिताना था । आसमान साफ़ था और हमारे और तारों के बीच सीधे संवाद की पूरी पूरी
संभावना थी लेकिन सर्द रात में अधिक देर तक बाहर रहना एक मूर्खतापूर्ण ख़याल था । रात तो हमें
अपने तम्बू के भीतर ही बितानी थी । शिविर के व्यवस्थापकों ने यहाँ आवास
हेतु चार तम्बुओं की व्यवस्था की है इसके अलावा अवशेष और उपकरण रखने हेतु एक तम्बू
तथा भोजन तैयार करने हेतु एक तम्बू और है ।
तम्बू में स्थित इस भोजनशाला के प्रभारी भाटी जी हैं जिनका कार्य सभी शिविरार्थियों को सुबह का नाश्ता,शाम की चाय और दो समय का भोजन करवाना है । ज्यों ज्यों अँधेरा बढ़ता जा रहा था हमारी भूख भी अपना आकार बढ़ाती जा रही थी । दोपहर का भोजन हम लोग उज्जैन से लेकर निकले थे जो जीप के उबड़-खाबड़ रास्ते पर चलने की वज़ह से और हमारे बेहतरीन हाजमे की वज़ह से समय से पूर्व ही हज़म हो चुका था । इधर भूख रोज़ पाठशाला आने वाले पढ़ाकू बालक की तरह लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी । हमने भूख के आग्रह पर भाटी जी को नमस्कार किया । उन्होंने ज़मीन पर पड़ी भोजन पट्टिकाओं की ओर इशारा किया । हमने तुरंत ज़मीन पर पट्टिकाएं बिछाई और पालथी मारकर बैठ गए । भाटी जी ने फिर थालियों की ओर इशारा किया । हम समझ गए, शिविर का यही अनुशासन होता है अपनी थालियाँ खुद उठानी होती हैं सो हम फिर उठे और थालियाँ और गिलास लेकर बैठ गए ।
भोजन
के पश्चात हम लोग अपने तम्बू में आ गए । तम्बू के बीचोबीच बांस के सहारे लटकते
बिजली के लट्टू पर हमारी नज़र पड़ी । वह लगातार बाहर के अँधेरे से लड़ने की कोशिश कर
रहा था । मैंने रवीन्द्र से कहा " यहाँ जंगल में बिजली कहाँ से आ गई ?"
रवीन्द्र ने कहा ..' तूने देखा नहीं गाँव के पास गुजरने वाली बिजली की लाइन से
यहाँ तक तार खींचकर बिजली लाई गई है ।" " ग़नीमत है " मैंने कहा
वर्ना हमें लालटेन युग में जीने का एक मौका मिल जाता । तम्बू में बल्ब होने के
बावज़ूद बाहर का अँधेरा भीतर घुसने का भरसक प्रयास कर रहा था .. मैंने इसका कारण
ढूँढने के लिए एक नज़र बाहर की ओर डाली और महसूस किया कि बल्ब की रोशनी और जंगल के अँधेरे
के बीच सिर्फ कपड़े की दीवारें हैं । उन पर पड़ती हमारी परछाइयाँ भी अँधेरे का ही
साथ दे रही थीं ।
भोजन
के बाद तुरंत सोने की आदत किसी की नहीं है । वैसे भी हॉस्टल में रहकर हम लोग इतने
तो बिगड़ ही चुके हैं कि जब तक कमरों के
दरवाज़े खटखटाकर मित्रों से उनका हालचाल न पूछ लें और थोड़ी मस्ती न कर लें नींद आती
ही नहीं है । सो यहाँ भी किसीको नींद नहीं आ रही थी । लेकिन बाहर ठण्ड थी और जिनके
हाल जानना था वे सारे मित्र भी एक ही तम्बू में थे सो बिस्तर में घुसने के अलावा
कोई चारा नहीं था । हम सब चुपचाप लेट गए और तार्पोलीन की बनी तम्बू की छत की ओर
ध्यान लगाकर देखने लगे, शायद देश की शासन व्यवस्था की तरह उसमें भी कोई छेद दिख
जाए ताकि हम ठण्ड का दोष उस पर मढ़ सकें । लेकिन ऐसी कोई गुंजाइश हमें दिखाई नहीं
दी ।
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| पत्थर की कब्र |
शुक्रवार, 19 जून 2020
एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पहला दिन-दो-चम्बल के पानी में चाँद
बुधवार, 10 जून 2020
एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पहला दिन-एक : चम्बल के पानी में चाँद
शरद कोकास
एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी -भूमिका
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| उत्खनन स्थल का एक दृश्य |
शरद कोकास
बुधवार, 7 अगस्त 2019
एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी - पन्द्रहवां दिन - दो
शरद कोकास








