सोमवार, 1 जून 2026

51-बरसों बाद का उपसंहार डायरी की अंतिम किश्त


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼


*वस्तुतः यह कोई भाग नहीं है ...यह बरसों बाद लिखा गया उपसंहार है। यह उपसंहार भी वस्तुतः उपसंहार नहीं है क्योंकि डायरी का कोई उपसंहार नहीं होता वह हमारे जीवन में हमारे जीवन के साथ साथ चलती है। बस यह समझ लीजिये कि उत्खनन कैम्प से आने के बाद डायरी का वह हिस्सा ख़त्म हो गया और जीवन के दूसरे हिस्से की डायरी शुरू हो गई जिसमे नौकरी के लिए जद्दोज़हद थी , कुछ ख़्वाब थे , आशाएं थी । वे ख़्वाब भी पूरे हुए ।मेरी नौकरी लग गई । लेकिन वह नौकरी पुरातत्व विभाग में नहीं लगी बल्कि स्टेट बैंक में लग गई। मेरा पी एच डी का ख़्वाब भी पूरा नहीं हो पाया , शायद यही एक टीस थी इस डायरी को आप सबके सामने लाने की ..खैर अपना रोना छोड़ता हूँ ..उसके आगे का यह उपसंहार पढ़ ही लीजिये आपको यह डायरी कैसी लगी इस बात का भी इंतज़ार रहेगा ।*

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*भाग 51*

*बरसों बाद का उपसंहार* 

उत्खनन से लौटने के पश्चात प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व की स्नातकोत्तर कक्षा की फाइनल एग्जाम हमारे सर पर थी । हम लोग जी जान से परीक्षा की तैयारी में जुट गए । परीक्षाएँ समाप्त हुईं और फिर परिणाम भी घोषित हो गए । मेरा शोध प्रबंध जंच नहीं पाया था इसलिए मेरा परीक्षा परिणाम घोषित होने में कुछ विलम्ब हो गया । परीक्षा के उपरान्त मैं अपने गृहनगर भंडारा लौट आया था लेकिन कुछ दिनों के अंतराल पर उज्जैन में हम सभी मित्र मिलते रहे और आगे की योजनाएं बनाते रहे । इसी तारतम्य में हम लोगों ने पी एच डी के लिए भी फॉर्म भरा और मैं, रवीन्द्र ,अशोक और अजय स्कूल ऑफ़ आर्क्यालाजी दिल्ली में एक इंटरव्यू भी देकर आये । हालाँकि वहाँ किसी का चयन नहीं हुआ । पहली बार हमें पता चला कि दिल्ली की तुलना में हम मध्यप्रदेश जैसे पिछड़े क्षेत्र के निवासी हैं ।


डायरी के अंत में मैंने एक स्वप्न का ज़िक्र किया था । हमें उम्मीद थी कि हम सब आगे चलकर सफल पुरातत्ववेत्ता या इतिहासकार बनेंगे, हम सब इस स्वप्न को पूरा करने की ज़द्दोज़हद में भी लगे थे । अंततः मेरा परीक्षा परिणाम घोषित हुआ । मैंने यह परीक्षा पास करते हुए विक्रम विश्वविद्यालय की प्रावीण्य सूची में प्रथम स्थान प्राप्त किया था । एलोरा के कैलाश मंदिर में डॉ. हरिहर त्रिवेदी द्वारा की गई भविष्यवाणी सही साबित हुई । लेकिन शायद पुरातत्ववेत्ता बनना मेरी नियति नहीं थी । इस बीच मैंने स्टेट बैंक में नौकरी के लिए परीक्षा दी और उसमे मेरा चयन हो गया । मैं नौकरी ज्वाइन करने के लिए छत्तीसगढ़ आ गया । पिता चाहते थे कि मैं भले ही पुरातत्ववेत्ता न बनूँ लेकिन इतिहास में पी एच डी करूँ और कॉलेज में प्रोफ़ेसर बन जाऊं लेकिन मैं उनकी यह इच्छा पूरी नहीं कर सका । 


मित्रों ने कहा कि ऐसी अच्छी नौकरी पुरातत्व में पी एच डी करने पर भी नहीं मिलेगी सो जब तक संभव है करते रहो । बाद में पी एच डी कर लेना और नौकरी बदल लेना । लेकिन मैं नौकरी मिलने के बाद थोड़ा सुविधाजीवी हो गया था और नौकरी में मुझे आनंद आने लगा था इसलिए उनकी इच्छा भी पूरी करने में असमर्थ रहा । आज हर दो चार माह में नौकरी बदलने वाले युवाओं को देखता हूँ तो लगता है मेरा वह निर्णय ग़लत था । मैंने नौकरी छोड़ने का निर्णय लिया अवश्य लेकिन तब तक पच्चीस साल बीत चुके थे ।


फिर अगले ही साल नौकरी के लिए मैं दुर्ग आ गया । नौकरी और कविता में मन रम गया था । विवाह हुआ और एक बेटी का पिता भी बन गया । फिर दिन बीते, माह बीते और साल बीतते गए । बरसों तक किसी मित्र से मुलाक़ात नहीं हो पाई । सारे मित्र भी यहाँ वहाँ हो गए । रवींद्र और अशोक ने ज़रूर पी एच डी करने के बाद कॉलेज में प्रोफ़ेसर की नौकरी ज्वाइन कर ली । फिर एक दो बार उज्जैन में उनसे मुलाकात हुई, कुछ महीनों तक पत्र व्यवहार भी चलता रहा और एक दिन वह भी बंद हो गया । रवींद्र से संपर्क अवश्य बना रहा बाद में उसीसे पता चला कि अशोक सख्त बीमार हो गया था और यह दुनिया छोड़कर चला गया । डॉ. वाकणकर भी नहीं रहे,  उनके कुछ समय बाद डॉ आर्य भी बीमार पड़े और दुनिया छोड़कर चले गए । डॉ कैलाश चन्द्र जैन और हरिहर त्रिवेदी सर भी अब दुनिया में नहीं हैं ।


बाक़ी दोस्तों की हम लोगों ने बहुत तलाश की लेकिन उनका कुछ पता नहीं चल पाया । अजय जोशी पता नहीं अब कहाँ हैं । राममिलन शर्मा भी शायद उसी समय इलाहाबाद लौट गए थे और  महेश शर्मा भी राजस्थान चला गया था । किशोर भैया का कुछ पता नहीं शायद उज्जैन में ही हों ।  बी मुरलीधर रेड्डी , केम्पुला लक्ष्मीनारायण और सुब्बा रेड्डी दक्षिण के निवासी थे सो अपने घर चले गए । अभी कई सालों बाद सोशल मीडिया के माद्यम से उनसे संपर्क स्थापित हुआ है । अन्य मित्रों की तलाश भी जारी है ।


इन तमाम झंझावातों के बीच बस रवीन्द्र और मेरा साथ बना रहा और अब तक बना हुआ है । हम लोग अक्सर फोन पर बतियाते हैं और गुज़रे ज़माने को याद करते रहते हैं । हम लोगों की बातों में छात्र जीवन का वह समय होता है जिसे हम लोगों ने भरपूर जिया है  । जाने कितने बरस बीत चुके हैं दंगवाड़ा के इस उत्खनन कार्य को संपन्न हुए । दंगवाड़ा गाँव शायद अब पहले जैसा न हो । चम्बल भी अब शायद पहले जैसी न हो और उसने अपना रास्ता बदल लिया हो । लेकिन मुझे यकीन है कि उसके किनारे का वह टीला अब भी वैसा ही होगा और उस पर अब भी कोई नई बस्ती नहीं बसी होगी । जिन बरगदों के साये में हमारा शिविर लगा था वे बरगद के पेड़ अब कुछ और बूढ़े हो चुके होंगे । किनारे का शिव मंदिर शायद अब पहले से कुछ भव्य हो गया होगा । वह नाला जिसे पार कर हम सिटी जाते थे शायद पहले से अधिक दूषित हो गया हो ।


जिन मजदूरों के साथ हमने अपने सूख दुःख बाँटे थे वे मजदूर भी जाने कहाँ होंगे । हो सकता है मजदूरी करते हुए ही उनका जीवन बीता हो । हर सर्वहारा की यही नियति है । उन्हें शायद याद भी न हो कि कुछ छात्र कभी उनके घर आये थे और उनके घर के मिष्टान्न का स्वाद चखा था । आर्य सर की प्यारी बिटिया मागो शायद अब तक कई बच्चों की माँ बन चुकी होगी । वक्त का एक ऐसा भी टुकड़ा था जो खुशियों का गुलदस्ता लेकर उसके जीवन में आया था शायद उसे याद ही न हो । अब भी वह सांटा को हांटा और 'समझ नहीं आयो' को 'हमज नहीं आयो' ही कहती होगी । मैंने उससे फिर आने का एक वादा किया था , शायद उसे मेरा वह झूठा वादा याद भी न हो ।


दंगवाड़ा के उस एक माह के उत्खनन शिविर का भले ही मेरे कैरियर में कोई योगदान न रहा हो लेकिन एक माह का वह समय मेरे मनुष्य बनने की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है । इस एक माह में इतिहास और पुरातत्व को लेकर मेरी कई भ्रांतियां दूर हुईं, एक पुरातत्ववेत्ता के जीवन को मैंने क़रीब से देखा , धूप बारिश और ठण्ड जैसे मौसम के वैपरीत्य में उनका श्रम देखा और महसूस किया कि जिस इतिहास को हम यूँ ही अपनी श्रद्धा और आस्था के आधार पर तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत कर देते हैं उसका यथार्थ कितने प्रयोगों और परिणाम के पश्चात कितनी कठिनाई  से हासिल किया जाता है । यह भी सच है कि यदि यह समय मेरे जीवन में नहीं आता तो मैं 'पुरातत्ववेत्ता' जैसी लम्बी कविता की रचना भी नहीं कर पाता इसलिए अपने जीवन के उस कालखंड को मैं हमेशा धन्यवाद देता हूँ और कामना करता हूँ कि हरेक के जीवन में ऐसा समय अवश्य आये जो उनके सपनों की ज़मीन बने, जिसकी नींव पर वे मनुष्य होने का दायित्व पूर्ण करते हुए भाईचारे सौहार्द्र और आपसी सामंजस्य के एक संसार का निर्माण कर सकें ।


एक तमन्ना अभी बाक़ी है कि कभी हम सारे दोस्त मिलें और फिर एक बार दंगवाड़ा होकर आयें । रवींद्र ने बताया था कि उस साईट से अधिक कुछ हासिल नहीं हुआ इसलिए सरकार ने वहाँ उत्खनन का कार्य बंद करा दिया था । इसलिए हो सकता है कि हमारे संजोये हुए स्वप्न वहाँ पहुँचकर बिखर जाएँ । लेकिन स्वप्नों का क्या है, स्वप्न जन्म लेते हैं और एक झटके में टूट कर बिखर जाते हैं । सपनों का पूरा होना वस्तुतः एक भ्रम ही तो है । फिर यह स्वप्न तो वैसे भी पूरा नहीं होगा, अशोक जो हमारे साथ नहीं होगा और वाकणकर सर और आर्य सर भी नहीं होंगे । अब वे केवल तस्वीरों में शेष हैं, शेष उम्मीदों की तरह ।


*शरद कोकास*


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50- उसकी आँखों मे चम्बल की उदासी थी


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼


*पिछले भाग में आपने पढ़ा आदिम मातृसत्तात्मक समाज , स्त्रियों की स्थिति कृषि और पशुपालन में उनकी भागीदारी आदि के बारे में । साथ ही पढ़ा कि प्राचीन समय में विवाह की क्या क्या पद्धतियाँ थीं और कितने तरह के विवाह हुआ करते थे। इनका रोचक वर्णन ।आज इन छात्रों का अंतिम दिन है और वे अपने प्रशिक्षण शिविर से वापस जा रहे हैं आज उन्हें मजदूरों से मिलने उनके गाँव भी जाना है सभी लोग भावुक हो गए हैं विदाई की इस बेला में।*

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*भाग 50*

उसकी आँखों मे चम्बल की उदासी थी 


सुबह सुबह हाजिरी रजिस्टर पर अपने दस्तख़त कर हमारे सपनों के वापस जाने का समय हुआ ही था कि डॉ वाकणकर की आवाज़ सुनाई दी "उठो रे सज्जनों ।" सर भीतर आ गए थे । हमने मिचमिचाती आँखों से सर का स्वागत किया ।"आज तुम लोगों की परीक्षा होगी ।" सर के मुँह से निकला आज का यही पहला वाकया था । "क्यों सर ?" अशोक ने आँखें मिचमिचाते हुए पूछा । "बस हो गया, वापस नहीं जाना है क्या, या यहीं रहोगे ?" सर का जवाब था या सवाल हमें कुछ समझ में नहीं आया । बस इतना समझ गए कि हम लोगों की विदाई का दिन आ गया है । "सर लेकिन अभी तो एक महीना भी पूरा नहीं हुआ है । अजय ने झिझकते हुए कहा ।"क्यों कितने दिन हो गए ?" सर ने पूछा । सब ने मेरी ओर देखा । रवीन्द्र ने कहा "सर यह इसे ही मालूम है रोज डायरी लिखता है तो दिनों का हिसाब भी यही रखता है ।" मैंने सर से कहा "सर, आज छब्बीसवां दिन है ।" सर ने कहा "तो बस समझो हो गया पूरा महिना । आज की रात और यहाँ बिता लो.. कल जीप आयेगी उससे तुम लोग रवाना हो जाना ।" हम लोग क्या कह सकते थे.. सर का आदेश था । 


"अभी चलो फटाफट तैयार हो जाओ । आज मैं तुम लोगों की  ट्रेंच पर आऊंगा देखते हैं इतने दिनों में तुम लोगों ने क्या क्या किया ।" सर ने हम लोगों को पसोपेश से उबारते हुए कहा । अशोक सर के कहने का आशय समझने में असमर्थ था  "सर, वह रोज का तो विवरण आर्य सर लिख ही लेते हैं ।" सर ने मुस्कुराते हुए कहा "वह तो मुझे भी पता है । लेकिन कुछ दिमाग़ में भी तुम लोगों ने लिखा है या नहीं इसके लिए आज तुम लोगों की मौखिक परीक्षा होगी ।"  सर को मुस्कुराते देख मेरा हौसला थोड़ा बढ़ा "सर मौखिक परीक्षा भी तो आप रोज ले ही लेते है फिर...।" सर ने अपनी बात स्पष्ट की  "भाई वह तो मैं तुम लोगों से पूछ ही लेता हूँ और मुझे पता है कि तुम लोगों के ज्ञान में पर्याप्त वृद्धि हो चुकी है,  लेकिन तुम लोगों को एक प्रमाणपत्र भी तो देना है मुझे कि तुम लोगों ने यहाँ एक माह तक मेरे निर्देशन में एक पुरातत्ववेत्ता की तरह काम किया है सो उसके लिए यह औपचारिकता तो पूरी करनी होगी ना ।" "ठीक है सर ।" मेरी उलझन दूर हो चुकी थी । हम लोग उठे और घाट की और चल दिए ।


सच तो यह था कि विदाई के बारे में सुनकर ही हम लोग बहुत उदास हो गए थे । शुरू शुरू में अवश्य यहाँ का वातावरण हमें रास नहीं आया था और हम लोगों को यहाँ अच्छा नहीं लगता था  लेकिन अब धीरे धीरे इस काम में आनंद आने लगा था । ऐसा लग रहा था कि हम लोग आम लोगों से अलग एक विशिष्ट ज़िंदगी जी रहे हैं । एक ऐसी ज़िन्दगी जो बहुत कम लोगों को मिलती है । हम यही सोच रहे थे कि अगर हमारे जीवन में यह समय नहीं आता तो शायद हम लोगों का जीवन भी देश के उन तमाम युवाओं की तरह होता जो केवल पाठ्य पुस्तकों में लिखी बातें पढ़ते हैं और फिर जीवन भर उसी के अनुसार संसार में घटित होने वाली घटनाओं  को देखते हैं । उनके भीतर न इतिहास बोध पैदा होता है न वैज्ञानिक दृष्टिकोण । न वे इंसान की कहानी जान पाते हैं न उसका अतीत सो अपने  भविष्य को भी वे उसी तरह देखते हैं ।


ट्रेंच पर पहुँचकर जैसे ही हम लोगों ने घोषणा की  कि आज हम लोगों का यहाँ अंतिम दिन है और कल हम लोग यहाँ से चले जायेंगे  सारे मजदूर उदास हो गए । मागो मेरे पास आई और शिकायत के लहज़े में कहने लगी "साहब आप हमारे यहाँ नहीं आये न .." मुझे कुछ नहीं सूझा कि उससे क्या कहूँ वादा तो मैं कर चुका था और अपनी वादाखिलाफ़ी पर चुप्पी के अलावा मेरे पास कोई उत्तर न था । लेकिन मुझे इस चुप्पी से रवींद्र ने उबार लिया "अरे तो क्या हुआ अबकी बार नहीं आये तो क्या हुआ, परीक्षा  के बाद यहाँ फिर से आ जायेंगे तब ज़रूर तुम्हारे यहाँ आ जायेंगे ।" मैंने रवीन्द्र की ओर देखा, उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी ।


इतने में एक मजदूर हमारे पास आया और कहने लगा "ऐसे नहीं चलेगा साहब, दोबारा पता नहीं आप लोग आओ या नहीं आओ । आज तो आप लोगों को शाम को हमारे साथ हमारे गाँव चलना ही पड़ेगा ।" मैंने उसे टालने के लिए कहा "और कोई दिन होता तो ज़रूर चलते और किसी गुरूवार को चलते तो तुम लोगों के गाँव का बाज़ार भी देख लेते । उस दिन तो तुम लोगों की छुट्टी भी रहती है ।" उस मजदूर ने कहा "लेकिन साहब गुरूवार में तो अभी बहुत टेम है । आप लोग तो कल ही चले जाओगे फिर कब आओगे ।" फिर उसने जिद करते हुए कहा "कुछ नहीं सर, आज ही चलेंगे हम डाक्टर साब से कह देंगे कि आज हम लोग साहब लोगों को अपने गाँव ले जाना चाहते हैं सो हमें जल्दी छुट्टी दे दें ।" "ठीक है भाई जैसी तुम लोगों की इच्छा ।" मैंने कहा । मैंने कनखियों से देखा मागो की आँखों में ख़ुशी की रंगत थी ।


दोपहर में सर जैसे ही ट्रेंच पर पहुँचे सबसे पहले मजदूर लोग उनके पास पहुँच गए । "डाक्टर साब आज हम लोगों को जल्दी छुट्टी चाहिए ।" "क्यों भाई आज ऐसी क्या बात है ?" सर ने पूछा । उसने कहा "सर आज हम सब लोगों को गाँव ले जाना चाहते है आप भी हम लोगों के साथ चलिए । यह लोग तो कल चले जायेंगे रवीन्द्र भैया लोग ।" सर हम लोगों की ओर मुख़ातिब हुए  "क्यों भाई इन लोगों के गाँव जाना है क्या ?" अशोक ने कहा "हाँ सर, हम लोगों ने इनके गाँव जाने का वादा किया था सो जाना ही पड़ेगा ।"  "ठीक है ।" सर ने कहा "आज खाना खाने के बाद तुम लोगों की छुट्टी ।" "लेकिन सर.." उस मजदूर ने कहा "इन्हें लेकर तो हमी लोग जायेंगे ?" "हाँ भाई तुम लोगों की भी छुट्टी ।" सर ने अनुमति देते हुए कहा । "हुर्रे..." अजय ख़ुशी से उछल पड़ा । उसके बाद सर ने हम लोगों से ट्रेंच और उत्खनन संबंधी अनेक प्रश्न पूछे । हम सभी ने बहुत तत्परता से उनके जवाब दिए । सर ने प्रसन्न होकर कहा "बिलकुल ठीक, तुम लोग परीक्षा में पास हुए । उज्जैन पहुँचते ही तुम लोगों को इस पुरातात्विक प्रशिक्षण शिविर का प्रमाणपत्र मिल जाएगा ।"


खाना खाकर हम लोग तुरंत ट्रेंच पर आ गए और मजदूरों को उस दिन का काम समाप्त करने और उपकरण आदि उठाकर रखने में मदद की । हम सब लोग जाने के लिए तैयार हो गए । हमें नदी पार करके उनके गाँव जाना था । यह बात तो हमें पहले से ही बता दी गई थी कि नदी के बीच में घुटने से अधिक पानी है । हम लोगों ने नदी में उतरने से पहले अपने जूते निकालकर हाथ में ले लिए और पैंट को घुटनों से ऊपर तक मोड़ लिया । सारे लोग नदी में उतर गए । सबके भीतर बहुत उत्साह भरा था । मागो सबसे पीछे रह गई थी और मैं सब लोगों को आगे जाते हुए देख रहा था । मैंने उससे पूछा "चलना नहीं है क्या ?" उसने कहा "मैं तो आपके लिए रुकी हूँ ।" "चलो ।" मैंने कहा । वह नदी में उतरी और उसने मेरी ओर हाथ बढ़ाया ।  मैं एक हाथ में जूते  पकडे हुए था । उसने हाथ बढ़कर मेरे जूते थामने  चाहे, मैंने मना  कर दिया । फिर हम लोग नदी में उतरकर पार जाने लगे । 


"रोज इतनी बड़ी नदी पार कर आते थे तुम लोग ?"  मैंने मागो से कहा । "हाँ साब, मज़बूरी है ।" उसकी आँखों में रोजी रोटी की विवशता का बिम्ब था । रास्ते में मैं जरा सा लडखडाया तो उसने झट से मेरा कन्धा थाम लिया । थोड़ी देर में ही हम लोग नदी के दूसरे किनारे जा पहुँचे । सभी लोग हमसे पहले पहुँच चुके थे और नदी के तट पर खड़े थे । रवीन्द्र मेरी ओर देख रहा था । जैसे ही मागो ने देखा कि सभी लोग मुस्कुराते हुए हमारी ओर देख रहे हैं उसने शरमाकर झट से मेरा हाथ छोड़ दिया । मजदूरों के आगे बढ़ते ही सारे मित्र उनके साथ गाँव के भीतर प्रवेश कर गए । रवीन्द्र ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा .. "यार हाथ तो ज़िंदगी भर के लिए थामा जाता है तूने काहे छोड़ दिया .." मैंने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा । मैं कहना चाहता था कि हाथ मैंने नहीं थामा था ,हाथ तो उसने थामा था, लेकिन मेरे मुँह से कोई बोल नहीं निकले । 


हम लोगों के गाँव के भीतर पहुँचते ही गाँव में उत्सव जैसा माहौल हो गया था । हम लोगों के निकलने से काफी पहले ही मजदूरों ने अपने एक साथी को गाँव भेज दिया था सो हम लोगों के स्वागत की तैयारियां पहले से ही शुरू हो गई थीं । अब हमें एक एक मजदूर के घर जाना था । हर घर  में हमारे लिये कुछ न कुछ नाश्ते का इंतजाम था । हमारी शुरुआत भूषण के घर से हुई । फिर तो समझो खाने के लिए एक से एक पकवान हमें मिलने लगे । मागो हर घर में हमारे साथ जा रही थी । उसके घर सबसे अंत में था इसलिए वहाँ हमें सबसे बाद में जाना था । लेकिन उससे रहा नहीं जा रहा था  इस बीच शाम ढलने लगी थी और हमें वापस भी लौटना था । उसे लगा कि हम लोग उसके घर तक शायद ही जा पाएंगे सो उसने बीच में ही मुझसे कहा "साहब आपको तो सबसे पहले मैंने न्योता दिया था आपको तो मेरे ही घर आना था ।" मैं समझ गया कि मुझसे कहीं चूक हो रही है । मैं ने उससे कहा "चलो.." और हम दोनों सबके बीच से चुपचाप निकल पड़े । जाते हुए मैंने रवीन्द्र से बस इतना कहा कि "आता हूँ.." रवीन्द्र मुस्कुराया और कहा "जा मुन्ना जा .." 


गाँव की अँधेरी गलियों में मागो मेरा हाथ थामकर मुझे अपने घर ले जा रही थी । इस अल्हड़ युवती को इतना भी भय नहीं था कि कोई देखेगा तो क्या कहेगा । ऐसा लग रहा था कि उसके जीवन का बस यही एक ध्येय हो कि मुझे अपने घर ले जाना है । उसके घर में प्रवेश करते ही मैं चौंक गया । टिमटिमाती हुई ढिबरी के प्रकाश में भी उसके घर की विपन्नता साफ़ दिखाई दे रही थी । उसकी बूढ़ी माँ ज़मीन पर बैठी हुई थी और उसकी सद्यप्रसूता बहन खाट पर लेटी हुई थी । पास ही उसका नवजात शिशु सो रहा था । "बस इतने ही लोग हैं हम ।" उसने कहा । "और पिताजी ?" मैंने पूछा । "नहीं हैं.." उसकी आवाज़ से दुःख साफ़ झलक रहा था । "ओह सॉरी.." शहरी संवेदना के तहत मेरे मुँह से निकला । 


वह एक पल के लिए उदास हो गई । फिर उसने हँसते हुए पूछा  "क्या खाओगे साब ? मैंने कहा "कुछ नहीं.. सब लोगों के घर कुछ न कुछ खाकर अब मेरे पेट में जगह ही नहीं बची है । "नहीं ऐसे नहीं चलेगा, कुछ तो लेना ही पड़ेगा ।" कहकर वह रसोई में गई और मेरे लिए घर की ही बनी कोई मिठाई लेकर आ गई । मैंने एक टुकड़ा मुँह में रखा .."बहुत अच्छी है .." "आप सच में चले जाओगे साहब ?" उसने कहा । मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था क्या जवाब दूँ । फिर भी मैंने कहा " हाँ जाना तो होगा " .. "मत जाओ.." कांपती हुई उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि उसमे आदेश था अनुरोध या असहायता  कुछ स्पष्ट नहीं हो रहा था । 


इतने में तमाम मित्र मंडली वहाँ तक आ गई । मागो ने खुश होकर सबका स्वागत किया और माँ को बताया कि "साहब लोग हैं, हम लोग इन्ही के साथ साईट पर काम करते हैं ।" उसने सब लोगों को मिठाई खिलाई । "चलो भाई बहुत देर हो गई है, अब निकलें ।" राममिलन भैया की आवाज़ गूंजी । सब लोग घर से बाहर निकल गए । मैंने मागो की बहन के बच्चे के हाथ में दस का एक नोट पकड़ाया और मागो से कहा .."चलता हूँ .." उसने कुछ नहीं कहा । उसकी ऑंखें आंसुओं से डबडबा रही थीं । बाहर से रवीन्द्र की आवाज़ आई "शरद चलना नहीं है क्या, या यहीं रहना है..?" "आ रहा हूँ भाई । " मैंने कहा और घर से बाहर निकल गया । आगे चलकर मैंने पीछे पलटकर देखा मागो अपनी जगह पर खड़ी थी ।


मित्र लोग जाते हुए गाँव वालो से कह रहे थे .."भाइयों, हम लोग परीक्षा समाप्त होते ही फिर यहाँ आयेंगे । बहुत अच्छा लगा तुम लोगो के साथ । बहुत अच्छा समय गुजरा । हम लोग ज़रूर  आयेंगे ...आदि आदि । लेकिन मैं जानता था कि सब झूठ कह रहे हैं... अब यहाँ कोई कभी नहीं आएगा । लौटते समय काफी अँधेरा हो चुका था । दो मजदूर हम लोगों के साथ हमें नदी पार करवाकर हमें शिविर तक छोड़ गए । लौटते समय चम्बल पहले से ज़्यादा उदास और दुखी लग रही थी ।


हम लोगों का पेट इतना भरा हुआ था कि भाटीजी के हाथों का भोजन चखने की कोई गुंजाईश नहीं थी फिर हम लोगों ने थोड़ा सा दाल चावल ग्रहण कर लिया ताकि रात में भूख न लगे । भोजन करने के बाद मैं सीधे आकर बिस्तर पर लेट गया । बाक़ी मित्र टहलने निकल गए थे । रवीन्द्र जल्दी ही लौट आया और आकर मेरे पास बैठ गया । उसने मेरा हाथ थामा और मुझसे कहा "यार मैं तो अब तक इसे मजाक में ही ले रहा था लेकिन मामला तो वाकई  सीरियस है .. अब क्या करेगा तू ?" "क्या करना है .." मैंने कहा  "भावनाएं अपनी जगह हैं और यथार्थ अपनी जगह .. बस कल वापस लौट जाना है ।


सुबह जब हम लोगों को ले जाने के लिए जीप आई हम लोग अपना बिस्तर बैग आदि लपेटकर पैकिंग करके तैयार थे । नाश्ता तो हमने भरपूर कर ही लिया था । भाटी जी ने लंच  के लिए भी हम लोगों को आलू के पराठे पैक करके दे दिए थे इस हिदायत के साथ कि रात का इंतजाम तुम लोग खुद कर लेना । दस बज चुका था और ट्रेंच पर रोज की तरह काम की शुरुआत हो चुकी थी । मेरा मन हुआ एक बार ट्रेंच पर जाकर मागो से मिलकर आ जाऊं लेकिन मैंने अपने आप को रोक लिया । मुझे पता था आज वह काम पर नहीं आई होगी ।  


कुछ ही देर में हम लोग उज्जैन पहुँच गए । अशोक, किशोर और राममिलन भैया घंटाघर पर उतर गए। मुझे रवींद्र और अजय को जीप ने हॉस्टल तक छोड़ दिया ।भर्तृहरि छात्रावास की सीढियाँ चढ़ते हुए मुझे दंगवाड़ा का वह टीला याद आने लगा । उस टीले पर रोज़ हम ट्रेंच में उतरते हुए अतीत की सीढ़ियों से नीचे उतरते थे लेकिन उसके विपरीत यह सीढियां मुझे मेरे भविष्य की ओर ले जा रही थीं, उस कमरे की ओर जहाँ रहकर मुझे पुरातत्व की पढाई करना है और भविष्य में एक इतिहासबोध से लैस और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सम्पन्न एक पुरातत्ववेत्ता बनना है ।


*शरद कोकास*


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49-यह भी लड़की उठाकर लाया है


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

*पिछले भाग में आपने पढ़ा कि किस तरह विदेशियों ने भारत की खोज की और उसे किस तरह हमारे यहाँ के लोगों द्वारा स्वीकार कियागया । अब छात्रों के वापस जाने का दिन आ गया है वे लोग बहुत उदास हैं और बेचैन भी हैं । लेकिन बातों की कमी नहीं है उनके पास आज की चर्चा में शामिल है आदिम मातृसत्तात्मक समाज , स्त्रियों की स्थिति कृषि और पशुपालन में उनकी भागीदारी आदि। साथ ही पढ़िए कि प्राचीन समय में विवाह की क्या क्या पद्धतियाँ थीं और कितने तरह के विवाह हुआ करते थे। इनका रोचक वर्णन ।*

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*भाग 49*

*यह भी लड़की उठाकर लाया है*  

आज शाम से ही बेचैनी बार बार मन के भीतर झाँक रही थी । पता नहीं यह मौसम बदलने की वज़ह से हो रहा था या यह सोचकर कि अब हमारे वापस जाने के दिन आ गए हैं । ऐसा होता है कि शुरू में कोई नई जगह हमें अच्छी नहीं लगती लेकिन जब वहाँ रहने की आदत हो जाती है तो वह हमें अच्छी लगने लगती है फिर वहाँ से वापस जाने का ख्याल भी बुरा लगता है । हम लोग बार बार मन को समझा रहे रहे थे कि यह बेचैनी वापस जाने के ख़याल से नहीं है बल्कि मौसम की वज़ह से है । मौसम भी तो बड़ा अजीब हो रहा है इन दिनों । दिन अपना चरित्र बदलते हुए गर्म हो जाता तो रात ठंडी । धूप जो कुछ दिनों पहले भली सी लगती है अब बुरी तरह चुभने लगी है । शाम तक काम करते हुए हम लोग पसीने से तरबतर हो जाते हैं ।


काम ख़त्म करने के बाद हम लोग हाथ मुँह धोने घाट की और चल दिए । आज दंगवाड़ा जाने का भी मन नहीं था । जितना कुछ उस गाँव से हमें मिलना था हमने ले लिया था और अब हमारी यह सिटी हमें उबाऊ लगने लगी थी अब तो बस अपना शहर याद आ रहा था । फिर भी शाम थी और तम्बू में बैठकर तो नहीं बिताई जा सकती थी । हमें ख्याल आया कि पास ही बरगदों के निकट हाल ही में बना एक मंदिर है सो हम टहलते हुए वहाँ तक चले गए । सामान्यतः इस मंदिर तक गाँव के लोग नहीं आते हैं और यह सूना ही पड़ा रहता है । गाँव से बीच बीच में एक पुजारी जी आते हैं जो इसकी देखभाल करते हैं । रवीन्द्र ने बताया कि चैत्र के नव रात्र आते ही देवी के मंदिरों में भीड़ शुरू हो जायेगी । उस समय इस मंदिर में भी काफी लोग आते हैं और यह वीरान सी जगह गुलज़ार हो जाती है । "कितनी अच्छी बात है न ।" अजय ने कहा "देवियों को साल भर में दो बार नौ दिनों तक पूजा जाता है जबकि अन्य देवताओं को पुजवाने का इतना चांस नहीं मिलता । ऐसा लगता है देश में देवी के भक्तों की संख्या अधिक है । " 


रवीन्द्र ने कहा " भाई, ऐसा नहीं है पूजा तो सभी देवताओं की साल भर होती है लेकिन नवरात्र के इन दिनों में देवी की विशेष पूजा होती है । देवी देवताओं की पूजा करने वाले हमारे देश में अनेक पंथ रहे हैं । शैव शिव की पूजा करते हैं, वैष्णव विष्णु की पूजा करते हैं और शाक्त शक्ति अर्थात देवी की उपासना करते हैं । अब जिसकी जैसी श्रद्धा । हो सकता है कि शाक्तों की संख्या सबसे अधिक हो । लेकिन यह अच्छी बात है कि स्त्री को शक्ति का प्रतीक माना जाता है । "रहने दे यार ।" अशोक ने कहा "यह सब झूठे पाखण्डी लोग हैं , स्त्री को देवी का रूप मानते हैं, शक्ति का प्रतीक मानते हैं, साल में दो दो बार नौ दिनों तक उपवास करते हैं ,ऊँची ऊँची पहाडी चढ़कर देवी के दर्शन को जाते हैं लेकिन वहीं अपने घर की स्त्री को प्रताड़ित भी करते हैं, उसकी अवमानना करते हैं ।"


अशोक की बात पर अजय ने तुरंत प्रतिवाद किया " ऐसा नहीं है यार सब लोग ऐसे नहीं होते आज भी स्त्रियों का सम्मान करने वाले लोगों की संख्या अधिक है । और स्त्री भी अब पहले जैसी स्त्री नहीं है वह पहले की तुलना में अधिक ताकतवर हुई है आज की स्त्री पढ़ी लिखी है , ऐसा कौन सा काम है जो वह नहीं कर सकती वह नौकरी करती है , बड़े बड़े पद संभालती है म हवाई जहाज तक चलाती है और फिर घर आकर खाना भी पकाती है न बच्चे भी संभालती है देवी के आठ हाथ होते हैं न प्रतिमाओं में हमारे देश की स्त्री के भी आठ हाथ होते हैं , एक में दफ्तर की फाइल ,एक में कर का स्टीयरिंग , एक में बच्चे के दूध की बोतल, एक में चश्मा, एक में बेलन , एक में करछुल , एक में सब्जी से भरी थैली और एक में .." " बस भैया बस , आठ की गिनती हो गई " अशोक ने अजय के नवीन स्त्री प्रतिमा शिल्प के विवरण पर रोक लगाते हुए कहा .. अब चलें हमारे भाटीजी के दो हाथों से पकाया हुआ खाना खाने .. ज़ोरों की भूख लग रही है ।


खाना खाते हुए आज हम लोग अपनी अपनी माँ के हाथों बनाये खाने को याद करते रहे । आज टहलने का सत्र अधूरा रह गया था इसलिए खाने के बाद फिर हम लोग टहलने निकले । अशोक की भूख ने आज अजय की प्राणरक्षा कर दी थी । हम लोग चाहते थे कि किसी नए टॉपिक पर बात करें लेकिन अजय ने फिर वही राग  छेड़ दिया "लेकिन स्त्री को हमारे देश के ही लोग देवी मानते हों ऐसा नहीं है, विश्व की सभी सभ्यताओं में और धर्मों में स्त्री के देवी रूप को ही पूजा गया है । ग्रीस में देवी अथीना का मंदिर हैं । इसाइयत में मरियम है, इस्लाम में भी औरत का बहुत महत्व है , हमारे यहाँ भी सिर्फ हिन्दू धर्म में ही नहीं बल्कि बौद्ध और जैन धर्म में भी जाने कितनी देवियों के नाम से कई मंदिर हैं, फिर सप्त मातृकाएँ हैं महाविद्या समूह की देवियाँ हैं .. ।"


अशोक का मूड पता नही किस बात से उखड़ा हुआ था "रेन दे यार, बोला ना जितने भी यह सब देवी को पूजने वाले लोग हैं सब पाखंडी लोग हैं मंदिर में स्त्री के देवी रूप की पूजा करते हैं और घर में उसकी पिटाई करते हैं ।"  "तुम्हारा कहना अंशतः सही है अशोक ।"  मुझे किसी न किसी तरह अशोक का उखड़ा हुआ मूड ठीक करना था  "लेकिन शुरू से ऐसा नहीं था । स्त्री को वाकई में पूजनीय ही माना जाता था और न केवल उसके दैवी रूप की अपितु मानवी रूप की भी समाज में प्रतिष्ठा थी, लेकिन धीरे धीरे जब पुरुषप्रधान व्यवस्था हुई तो सब कुछ बदल गया । अजय ने पूछा "हाँ यार यह तो पता है कि पहले मातृसत्ता थी लेकिन पितृसत्ता में अचानक परिवर्तन कैसे हुआ ? 


" यह अचानक नहीं हुआ ।" मैंने सब की आँखों में झाँककर देखा उन्हें जानने की उत्सुकता है या नहीं  । "हाँ न बता न यार ।" रवींद्र ने लाड़ करते हुए  कहा । मैंने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा "दरअसल स्त्री का महत्व पशुपालन अवस्था से प्रारंभ हुआ । मैंने बताया था ना कि पुरुष शिकार करने जंगल में जाता था और कई बार वह जिंदा प्राणियों को पकड़ लाता था । स्त्रियाँ घर में रहती थीं सो उनकी देखभाल करने का ज़िम्मा स्त्रियों पर आ गया । स्त्रियाँ उन प्राणियों को चारा खिलातीं और बड़ा करती । दूध दुहने का काम भी वे ही करती थी ।


"हाँ ।" रवीन्द्र ने कहा । "इसलिए वेदों में बेटी को दुहिता कहा गया है और उसीसे बना है अंग्रेजी का डॉटर ।" "बिलकुल सही ।" मैंने कहा । "आगे चलकर जब कृषि की शुरुआत हुई तो स्त्रियों ने ही इसका बीड़ा उठाया । लेकिन कृषि के प्रारम्भिक काल में वे अनाज बीनकर लाती थीं या जो अनाज अनायास उग आता था उसे सहेजती थीं । जब मांस कम पड़ जाता तो उनके द्वारा आपातकाल के लिए सहेजा हुआ अनाज, जंगली बेर, अचार, महुआ जैसे फल या शहद ही काम आता था ।" लेकिन वे गौमाता भी पालते थे तो उनका दूध भी तो काफी होता होगा ?" राममिलन भैया ने कहा । "हाँ ।" मैंने कहा " दूध की तो कोई कमी न थी और वे उसका विविध रूपों में उपयोग भी करते थे । इसके अलावा गौमाता का ही नहीं भेड़ मौसी का भी दूध होता था । स्त्रियाँ ही यह सब करती थीं ,वे अन्नपूर्णा थीं इसलिए घर में उनका सम्मान भी सबसे अधिक होता था ।"


"लेकिन अक्सर ऐसा होता कि यह संचित खाद्य भी परिवार के लिए कम पड़ जाता । इतने बड़े कुनबे के लिए वह नाकाफी था । ऐसे समय उन्हें भूख मिटाने के लिए अतिरिक्त उपाय करने पड़ते थे सो उन्होंने अनाज बोना शुरू किया । लेकिन यह भी आसान नहीं था । अनाज का उत्पादन कम होता था और उसके आसपास घास ज्यादा उग आती थी । फिर उन्हें यह भी नहीं पता था कि अनाज बोने के लिए पहले खरपतवार की सफाई करनी पड़ती है, जमीन को जोतना पड़ता है हालाँकि वे  कुदाल से गड्ढा करके अनाज गाड़ती थीं लेकिन गड्ढा बहुत ज्यादा नहीं हो पाता था और लगभग सतह पर पड़ा अनाज पानी या नमी की कमी से शीघ्र ही सूख जाता था या पक्षी उन्हें चुग लेते थे । जब वे पके हुए अनाज  को बीनने जातीं तो देखती वहाँ कुछ नहीं बचा है ।"


"गजब है यार, रोटी के लिए इतनी ज़द्दोज़हद ।" अजय ने कहा "लेकिन ये पुरुष क्या हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते थे ?"  "नहीं,उनकी समझ अधिक विकसित नहीं हुई थी । वे तो घास देखकर ज्यादा खुश होते थे क्योंकि अधिक घास का मतलब है पशुओं के लिए अधिक चारा ।" मैंने कहा । "सो वे अपने पशुओं को वहाँ चरने के लिए छोड़ देते थे । पशु निरंतर बढ़ते चले जाते थे जिनसे अधिक मांस और अधिक दूध उन्हें मिलता था । अनाज भले ही कम हो जाए लेकिन दूध का पनीर अधिक मात्रा में होता था । "वाह क्या दृश्य रहता होगा उनकी डिनर टेबल का नॉन वेज और वेज दोनों ।" अशोक का मूड अब तक ठीक हो गया था  "पनीर मटर की सब्जी , पनीर कोरमा, पनीर दो प्याजा, भेड़ के मांस की बिरयानी और भेड़ के मेमनों का शोरबा ।"  


"ए भाई तुझे पुरातत्ववेत्ता का काम करना है या वेटर का ?" अजय ने अशोक को छेड़ते हुए कहा "ऐसी ऐसी डिशेस का नाम लेकर हमारी लौकी की सब्ज़ी का जायका क्यों ख़राब कर रहा है भाई ।"  "चुप रहो यार, इतनी सीरियस बात चल रही है तुम लोगों को मजाक सूझ रहा है ।" रवींद्र ने दोनों को चुप कराते हुए कहा ..हाँ आगे बता शरद ।" मैंने दोनों की ओर मुस्कुराते हुए देखा और कहा "लेकिन इस तरह पुरुष का काम ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया । क्योंकि घर की आन्तरिक व्यवस्था भले स्त्रियों के हाथ में हो दूध और मांस के लिए पशुओं की व्यवस्था तो पुरुष ही करता था।" "समझ गया मैं ।"  अजय ने कहा "पुरुष आज भी यही कहता है.. मैं सब्जी लाता हूँ खाना तुम पकाओ ।" 


मैंने कहा "बिलकुल ऐसा ही कुछ था । इस तरह पुरुष को अपनी प्रधानता स्थापित करने का अवसर मिलता गया । उसने पशुओं को खेती के काम में लगाना शुरू किया और एक हल भी बना लिया । औरतें जो बीज बोने के लिए बमुश्किल कुदाल से जो ज़मीन खोद पाती थीं उसे अब हल और बैल की मदद से पुरुष खोदने लगा और फिर बीज भी बोने लगा । उसके पशुओं ने घास खाकर ज़मीन भी साफ़ कर दी । यही नहीं उसके यह पशु उसका अनाज ढोते थे उसे अपनी पीठ पर लादकर अपने मालिक के घर तक पहुँचाते थे । पहिये का आविष्कार नहीं हुआ था लेकिन बिना पहियों की गाड़ी बन चुकी थी ।"


किशोर ने इस बीच एक इंटेलिजेंट कोश्चन किया  "लेकिन क्या इन सब बातों के कहीं पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं ?" "हाँ ।" मैंने कहा " कुछ शैलचित्रों में यह दृश्य मिलता है कि  हल को बैलों की जोड़ी खींच रही है और यह हलवाहा भी साथ है । इस तरह अब पुरुष की भूमिका शिकारी के साथ चरवाहा और फिर कृषक की भी हो गई । स्त्री से जब उसके द्वारा मांस, अनाज, फल की व्यवस्था करने जैसे सब काम छीन लिए गए तो उसकी महत्ता भी कम होने लगी । अब स्त्रियों की महत्ता इसी बात में थी कि वे संतान को जन्म दे सकती थीं जो काम पुरुष नहीं कर सकता था । पहले जो आदेश पत्नी पति को देती थी अब वह पति पत्नी को देने लगा । पत्नी की नानी, मौसी आदि का जो आधिपत्य घर के पुरुष पर होता था वह भी धीरे धीरे ख़त्म होने लगा । अब उस जामाता पुरुष के साथ सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार किया जाने लगा इसलिए कि वह उनके कुनबे के लिए मांस, दूध, अनाज, वनस्पति आदि का प्रबंध करता था और उनके लिए मेहनत करता था । यही नहीं अब वे अपने कुल के बेटों को भी दूसरों के कुल में देने में झिझकने लगी क्योंकि एक पुरुष का शादी करके दूसरे घर जाना मतलब भोजन की व्यवस्था करने वाला एक हाथ कम हो जाना था ।" 


"इसका मतबल घर जमाई वाला सिस्टम भी फैल हो गया ?" राममिलन भैया ने कहा । "हाँ ।" मैंने जवाब दिया " यह प्रथा लगभग समाप्त हो गई । पहले बेटी किसी के बेटे को ब्याहकर घर ले आती थी अब बेटा बहू को ब्याहकर घर लाने लगा । धीरे धीरे उत्तराधिकार के नियम भी बदले । पहले पति की बहन और उसके बच्चे उत्तराधिकारी होते थे अब यह कानून बदलने लगा । इसका एक बढ़िया उदाहरण मैंने एक किताब में पढ़ा था । रूस के एक कबीले में जब कोई आदमी मरने लगता या मर जाता तो उसकी संपत्ति को न्यायपूर्ण और अन्याय पूर्ण ऐसे दो हिस्सों में बाँटा जाता । यह न्यायपूर्ण संपत्ति वही होती थी  जो उसे जीवनकाल में अपनी माँ से मिली होती यह  न्यायपूर्ण भाग तो उसे अपनी बहन के बच्चों को देना  पड़ता था  । अन्यायपूर्ण हिस्सा वह होता जिसे वह अपनी पत्नी के घर में रहते हुए इकठ्ठा करता । इसी भाग में युद्ध और लूटपाट से जीता माल भी शामिल होता था । यह हिस्सा घर में ही रहता और उसके बेटों को मिलता ।" "इसका मतलब यह हुआ कि शादी के बाद पुरुष के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार किया जाता था इसीलिए न शादी के बाद की कमाई संपत्ति अन्यायपूर्ण संपत्ति कहलाती थी " अजय ने ठंडी साँस भरते हुए कहा । " बेटा तुझपर यह नियम लागू नहीं होता " अशोक ने अजय को छेड़ते हुए कहा " तू तो अभी बाप कमाई पर ही बीबी को पाल रहा है "  


इससे पहले कि अजय और अशोक में वाकयुद्ध प्रारंभ होता मैंने कहा " भाई , अब हमारे बीच यही तो एकमात्र अन्याय का मारा है उसे बख्श दो ..खैर आगे की बात सुनो । अब हुआ यह कि पुरुष युवा अपना सामर्थ्य बढ़ जाने के कारण अपनी पसंद की स्त्री को लेकर घर आने लगे । लेकिन चूँकि पहले ऐसे  प्रथा नहीं थी सो उन्हें अपनी पत्नी को चुराकर लाना पड़ता । "ओ तेरे की ।" अजय ने कहा । "मतलब अपहरण ..अभी भी आदिवासी समुदाय में यही  प्रथा तो चलती है उठा लाने की ।" हाँ । " मैंने कहा " इस अपहरण के लिए सारे पुरुष साथी उस स्त्री के घर के आसपास कटार भाले लेकर छुप जाते थे और फिर मौका देखकर लड़की को उठा लाते । लड़की के घर वाले उनका विरोध करते मारपीट होती और खून ख़राबा भी होता । लेकिन बाद में जब सर्वसम्मति से ऐसा होने लगा तो यह प्रथा बन गई । तब भी वे लोग लड़की को उठाने ज़रूर जाते लेकिन लड़की वाले मारपीट नहीं करते बल्कि उन्हें नाश्ता वगैरह कराते और अपनी मुक्ति के लिए मूल्य में उपहार देते । लड़की उठाये जाते समय चीख चीख कर और घरवालों से लिपट कर रोती ।" 


"बस बस मैं सब समझ गया ।"  अजय ने कहा " आज भी यह प्रथा चली आ रही है , लड़का बारात लेकर जाता है फिर बारातियों का स्वागत होता है , दहेज़ दिया जाता है , लड़की का विदाई के समय रोती -धोती है .. सब क्लियर हो गया ।" रवीन्द्र ने कहा " देख ले यार ..इस अजय का हाल ..जब तू पितृसत्ता के प्रारंभ होने के बारे में बता रहा था तब यह अजय अपने शादी के बारे में सोच रहा था । अभी ताज़ा ताज़ा यह भी तो लड़की उठाकर लाया है ।"  अजय चलते हुए रुका और पलटकर तुरंत रवीन्द्र के घुटनों का स्पर्श किया । "महाराज, उठाकर नहीं लाया हूँ बल्कि सम्पूर्ण विधि विधान से ब्राह्म पद्धति से विवाह किया है ।" रवीन्द्र ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा ..तूने कोई गलत काम नहीं किया वत्स, सही पद्धति से ही विवाह किया है । हमारे यहाँ वैदिक काल में जो आठ पद्धतियों से विवाह होते थे उनमे से कुछ में ऐसी ही लड़की उठाकर लाने की प्रथा थी हो सकता है कुछ आदिवासी क्षेत्रों में अब भी वही प्रथाएँ चल रही हों । वैसे तूने उन आठ विवाह पद्धतियों के बारे में कोर्स में तो पढ़ा ही होगा? " अजय ने झट ऊँगली पर गिनना शुरू किया " पढ़ा है न महाराज, ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच ।" "बिलकुल ठीक " रवीन्द्र ने ताली बजाते हुए कहा "अच्छा है तुझे कोर्स का यह कोश्चन अब तक याद है । तो फिर यह भी याद होगा कि इन विवाह पद्धतियों की विशेषता क्या थी ?"


अजय ने बिना समय गँवाए जवाब दिया "ब्राह्म विवाह में दोनों पक्षों की सहमति से विवाह होता था,उचित एवं समान वर्ग के वर का चुनाव कर उससे कन्या का विवाह किया जाता था ,उसे उपहार आदि दिए जाते थे ,यह विवाह पद्धति हमारे यहाँ की अरेंज्ड मैरिज जैसी है जो आज भी चल रही है । दूसरी पद्धति यानि दैव पद्धति में वर वेदमंत्रों का ज्ञाता होता था इसलिए कन्या पक्ष द्वारा उसे उचित धन धान्य देकर कन्या का उससे विवाह किया जाता था । तीसरी पद्धति यानि आर्ष पद्धति में कन्या पक्ष वर से गाय बैल का एक जोड़ा प्राप्त करता था । प्राजापत्य विवाह भी ब्राह्म विवाह जैसा होता था लेकिन इसमें कन्या की सहमति  आवश्यक नहीं थी ,बाक़ी सब लेनदेन वैसे ही होता था । पांचवी पद्धति आसुर पद्धति के विवाह में दैव पद्धति के विपरीत वर पक्ष द्वारा कन्या पक्ष को धन धान्य और संपत्ति दिया जाना अनिवार्य था । इसके बाद गान्धर्व विवाह में केवल वर और कन्या की सहमति ही पर्याप्त थी मतलब आजकल की लव मैरिज । दुष्यंत और शकुंतला का विवाह इसी पद्धति से हुआ था । राक्षस विधि का विवाह सबसे ख़राब था इसमें वर पक्ष द्वारा कन्या पक्ष को आहत करके उनसे मारपीट करके जबरन रोती चीखती कन्या को उठा लिया जाता था और उससे विवाह कर दिया जाता था । और आठवीं पद्धति यानि पैशाच पद्धति का विवाह तो सबसे निकृष्ट कोटि का था । इसमें नींद में मत्त प्रमत्त ,बेहोश अथवा मानसिक रूप से निर्बल कन्या के साथ जबरन सम्भोग किया जाता तत्पश्चात उसके साथ विवाह कर लिया जाता था ।" 


"बिलकुल सही जवाब दिया तैने ।" रवींद्र ने कहा लेकिन एग्जाम में सिर्फ इतना लिखने से काम नहीं चलेगा, इसे विस्तार देना होगा ।" "चलो भाई , बहुत देर हो गई , अब वापस लौटें अपने डेरे में ,नींद आ रही है " अशोक ने वापसी का फरमान जारी किया फिर तो लौटते हुए अजय की शादी के किस्से चलते रहे जो बिस्तर में घुसने के बाद उसकी सुहागरात के किस्सों पर जाकर समाप्त हुए । अब मुश्किल यह है कि वह सब तो मैं यहाँ लिख नहीं सकता ।


*शरद कोकास* 


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48-चाचा चाचा कहानी सुनाओ ना


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

*पिछले भाग में आपने पढ़ा कि आदिम समय में विनिमय की क्या स्थिति थी , मनुष्य कैसे अपने उत्पादन का वितरण करता था साथ ही यह भी कि गाँव में हाट किस तरह होते थे । इस भाग में पढ़िए किस तरह विदेशियों ने भारत की खोज की और उसे किस तरह हमारे यहाँ के लोगों द्वारा लिया गया*

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*भाग 48*

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दंगवाड़ा का यह उत्खनन अब तक काफी प्रसिद्ध हो चुका है और इतिहास में रूचि रखने वाले देश -विदेश के कुछ शोध छात्र भी यहाँ पहुँचने लगे हैं । आज दोपहर के भोजन के समय ऐसे ही एक विदेशी छात्र से हमारी मुलाकात हुई । यह छात्र उत्तर भारत से भटकता हुआ यहाँ तक आ पहुँचा है  । अब इसे उसका दुर्भाग्य कहें या संयोग उसका सामना सबसे पहले  भारतीय संस्कृति के प्रेमी और विदेशी संस्कृति को गरियाने वाले राममिलन भैया से हुआ । उसने उनसे सवाल किया " हू डिस्कवर्ड दिस साईट?" राममिलन भैया ने जवाब दिया "हमका का मालूम ऊ हमरे सर हैं वही खोजे हैं ।" उसे कुछ समझ में नहीं आया । संयोग से आर्य साहब उसे मिल गए और वह उनसे बात करने लगा । 


साईट पर जाते हुए राममिलन भैया भुनभुनाये " ई देखो कोलम्बस का वंशज हमरे यहाँ आया है, जैसन कोलंबस ने डिस्कवर किया था अमरीका वैसन वो सोचता है । अरे हमरे यहाँ के लोग कुछ डिस्कवर नहीं कर सकते क्या ?" मैंने कहा " राममिलन भैया देश से बाहर तो सारी खोजें योरोप के लोगों ने ही की हैं इसलिए वह ऐसा सोचता होगा । उन्होंने ही अमरीका खोजा, आस्ट्रेलिया खोजा, मेक्सिको खोजा ।" "काहे?" राममिलन भैया विदेशियों की तारीफ़ सुनकर चिढ गए  "हमरे यहाँ वाकणकर सर ने भीमबैठका नहीं खोजा क्या ? और हड़प्पा मोहनजोदड़ो भी तो हमरे यहाँ के लोगों ने ही खोजा राखाल दास बैनर्जी सर ने ..नाम ऊ मार्शलवा का हुई गवा  ।" मैंने कहा "भाई हड़प्पा की प्रारम्भिक खोज भी तो अंग्रेजों के तत्वावधान में ही हुई । अब हमारे यहाँ तो हम खुद ही गुलाम थे । सो उन्होंने खोज के पश्चात जो लिख कर प्रस्तुत कर दिया वही हमें स्वीकारना पड़ा ।"


राममिलन भैया ने प्रतिवाद करते हुए कहा "वही तो ग़लती हुई न । अब जैसन वो बताये रहे वैसा ही हम मान लिए ।वो कहे रहे कि आर्य योरोप से आये तो हम मान लिए । वो कहे रहे कि हम जंगली थे और उन्होंने हमें सभ्य बनाया तो वो भी हम चुपैचाप मान लिए । ऐसा होता है कहीं ? हम गुलाम थे तो इसका ये मतलब तो नहीं कि सब मान जाते और अभी तक हम उन्हीका कहा मान रहे हैं ..यह ठीक बात नहीं है ।" राममिलन भैया गुस्से में ज़रूर कह रहे थे लेकिन ठीक बात कह रहे थे । "चलो चलो ट्रेंच पर पहुँचना है काम में देरी हो रही है ।"  आर्य साहब उस छात्र के साथ हम लोगों तक पहुँच गए थे । अब उस विदेशी छात्र की उपस्थिति में तो कुछ भी कहना असंभव था सो हम लोग इस विषय को रात्रिकालीन सत्र के लिए स्थगित कर ट्रेंच की ओर बढ़ लिए ।


शाम को काम समाप्त करने के पश्चात हम लोगों का विचार था कि उस विदेशी छात्र को घेरकर बैठा जाए और उसके साथ अपनी टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में बातें कर उसका मज़ा लिया जाए लेकिन वह जल्दी में था और पूरे समय आर्य सर के साथ था इसलिए हम अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पाए । शाम को फिर हम लोग गाँव की ओर निकल गए । लौटकर देखा तो वह जा चुका था ।


भोजन के उपरांत हम लोग तम्बू में आ गए हमारे आज के हीरो राममिलन भैया थे सो बात उन्हीं के कथन  से प्रारंभ हुई । "यार कुछ भी कहो राममिलन भैया ठीक कह रहे थे ।" अजय ने कहा । अशोक ने भी उनकी बात का समर्थन करते हुए कहा "सही बात है हम कब तक इन विदेशियों के गौरवगान से स्वयं को अपमानित और तुच्छ महसूस करते रहेंगे । सभ्य तो हम लोग भी योरोप के लोगों से पहले हुए हैं । एक समृद्ध परम्परा हमारे यहाँ रही है लेकिन योरोपीय पद्धति से हमारा इतिहास नहीं लिखा गया इसलिए योरोप के लोग हमें असभ्य मानते रहे  । जहाँ तक देश खोजने की बात है तब तक योरोपीय सभ्यताएँ भी इतनी विकसित हो चुकी थीं लेकिन उनके पास जहाजी बेड़े थे सो उन लोगों ने समुद्र के मार्ग से कई द्वीप खोज निकाले ।" 


'इसीलिए तो हम लोगों को अंग्रेज़ी ग्रामर में अभी भी पढ़ना पड़ता है ..कोलंबस डिस्कवर्ड अमेरिका, अमेरिका वास डिस्कवर्ड बाय कोलम्बस .." अजय ने कहा । "लेकिन हमका ई बताओ " राममिलन भैया आज फुल फॉर्म में थे  "जब ऊ कोलम्बस अमरीका पहुँचा तो अमरिका तो पहले से ही वहाँ था ना ? लोग भी वहाँ पहले से रहते थे, फिर उसने नया क्या खोजा ? जैसे कि वास्कोडिगामा के भारत आने से पहले भी भारत तो यहीं था ?"  मैंने कहा " बड़े भैया, बात तो तुम्हारी सही है लेकिन उस समय योरोपवासियों को यह कहाँ पता था कि उनके अलावा भी दुनिया में ऐसे भूभाग हैं जहाँ मनुष्य रहते हैं । वे तो यूरोप में ही पैदा हुए थे और वहीं सभ्य हुए थे । इसलिए जहाजी बेड़ों द्वारा जब वे लोग वहाँ पहुँचे तो उन्होंने देखा कि वहाँ नितांत पिछड़े हुए लोग हैं जबकि वे लोग खुद भी कई पीढ़ियों तक उस पिछड़ेपन से गुजरने के बाद ही सभ्यता की उस स्टेज तक पहुँचे थे । उन्होंने देखा कि उनके रहनसहन का तरीका बड़ा अजीब है,कपड़े भी ढंग के नहीं हैं, उनके पास वही पुराने चकमक के औजार हैं, वे लोग अभी भी शिकारी अवस्था में हैं और खेती के नाम पर कद्दू ,मक्का जैसे कुछ गिने चुने अनाज ही उनके पास हैं ।"


"लेकिन मैक्सिको में तो उस वक्त सोने की खदाने थी ना ? बहुत देर बाद रवीन्द्र की आवाज़ सुनाई दी । "हाँ ।" मैंने कहा " दक्षिण में जो आदिवासी रहते थे उनके पास ताम्बे के औजार अवश्य थे लेकिन सोने का पता उन्होंने लगा लिया था । यद्यपि सोने का महत्व वे नहीं जानते थे । इस चमकदार धातु के वे गहने बनाते थे । उनकी स्त्रियाँ नथ हंसुली जैसे आभूषण धारण करती थीं । इसलिए जब कोलम्बस के जहाजियों ने उन्हें सोने से लदे देखा तो वे ख़ुशी से उछल पड़े । उन्होंने उन आदिवासियों को कांच के टुकड़े दिए, सिगरेट के डिब्बे दिए और उनके बदले उनसे सोना ले लिया । "यह तो गलत है भाई, धोखा है ।" अजय ने कहा । "हाँ धोखा तो है ।" मैंने कहा  "लेकिन ऐसा तो अब भी होता है । हमारे यहाँ भी बस्तर जैसे आदिवासी क्षेत्रों में सभ्य समाज के जो लोग जाते हैं वे लोग वहाँ की महंगी वनोपज को बिलकुल सस्ते दाम में ले लेते हैं । जैसे शुरुआत में तो लोगों ने एक सेर नमक के बदले एक सेर चिरौंजी ले ली और उसे शहर में महंगे दामों में बेच दिया ।"


"ऐसे ही उन्होंने अमेरिका में भी किया । अमरीका का हाल यह था कि वहाँ के लोग आदिम अवस्था में थे ।  वे लकड़ी के सामूहिक घरों में पुरे कुनबे के साथ रहते थे । ज़मीन पर सबका सामूहिक स्वामित्व था । कोई दास नहीं था न कोई मालिक । सब लोग वस्तुओं का सामूहिक उपभोग करते थे जबकि योरोप उस समय संपत्ति का कानून बना चुका था । वहाँ कोई दूसरे की वस्तु न इस्तेमाल कर सकता था न चुरा सकता था अगर ऐसा करता तो उसे सजा दी जाती थी । लेकिन आदिम समाज में एक स्वतन्त्र व्यवस्था थी यहाँ न कोई चोर था न कोई थानेदार,  न किसी के पास कोई निजी संपत्ति थी बल्कि सारी संपत्ति कबीले की सामूहिक संपत्ति समझी जाती थी ।  उस वक़्त योरोप में राजतन्त्र था जिसमें राज्य के प्रमुख राजा रानी होते थे, राजकुमार होते थे जनता के बीच भी उनकी आर्थिक स्थिति के अनुसार नौकर और मालिकों जैसे लोग थे । धनाढ्य लोग अपनी सेवा के लिए नौकर रखते थे । लेकिन कबीलों में राजतन्त्र जैसा कुछ नहीं था इसलिए यहाँ ऐसा कोई राजा न था हाँ कबीले के सरदार ज़रूर थे जिन्हें उनकी योग्यता के अनुसार चुना जाता था लेकिन वे कबीले के मालिक नहीं थे । एक तरह से वे कबीले के जनप्रतिनिधि हुआ करते थे ।"


अजय ने कहा "जनप्रतिनिधि तो हमरे यहाँ भी होते हैं भैया लेकिन वे देश के सेवक नहीं बल्कि खुद को मालिक ही समझते हैं और खुद के बाद विरासत में यह देश अपनी औलादों  को सौंप देते हैं ।" "हाँ ।"  मैंने कहा " योरोप सहित सभी जगहों में उस समय भी ऐसा ही था । राजा राष्ट्र का प्रमुख होता था वही न्याय भी करता था और उसे प्रजा को दण्ड देने का अधिकार होता था । राजा के बाद उसकी संतान राज्य की मालिक होती थी । हमारे यहाँ भी उस समय ऐसे ही राजवंश चला करते थे । लेकिन अमेरिका के और आस्ट्रेलिया के उन आदिवासियों की दुनिया इनसे बिलकुल अलग थी वहाँ अभी भी मातृसत्तात्मक व्यवस्था चल रही थी । उनके घरों में स्त्रियाँ घर की प्रमुख हुआ करती थीं । बेटी विवाह के बाद पति को अपने घर लेकर आती थी जबकि पितृसत्ता वाली अनेक सभ्यताओं में बेटा विवाह के उपरांत अपनी पत्नी को घर लेकर आता था ।"


"भाई यह कैसे होता होगा ?" राममिलन भैया ने सवाल किया । "संसार में  अब तक तो यही हुआ है कि बेटे ही बहू को ब्याहकर लाये हैं, मतलब उस समय सब घर जमाई हुआ करते थे ।" "हाँ कहने को ऐसा कह सकते हैं ।"  मैंने कहा " लेकिन घर जमाई जैसा विचार उनकी परंपरा में था । सभ्य समाज में भी शुरुआत में ऐसा ही रहा होगा लेकिन बाद में औरत पर घर की ज़िम्मेदारी लाद दी गई और पुरुष को आर्थिक उपार्जन के लिए बाध्य किया गया जबकि उस प्राचीन आदिम समाज में स्त्रियाँ घर की व्यवस्था भी करती थीं और शिकार पशुपालन और खेती का काम भी करती थीं । वहाँ पति अपने कबीले या कुल से आता था । उसके कबीले का नाम उनके टोटेम देवता या टोटेम पशु जैसे भालू , खरगोश या शेर के नाम पर  हो सकता था जो उसके नाम से जुड़ा होता था और शादी के बाद भी वही नाम रहता था लेकिन माँ के कबीले का नाम अगर हिरण कबीला होता तो बच्चों को हिरण कबीले के नाम से ही जाना जाता था । 


"हमें लगता है यह बाघ ,कश्यप जैसे सरनेम ऐसे ही आये होंगे " राममिलन भैया ने कहा । " हाँ ऐसा हो सकता है ।" मैंने कहा " योरोप और अन्य देशों में बच्चे का नाम के साथ पिता का नाम जुड़ा होता था लेकिन मातृसत्तात्मक समाज में बच्चों के साथ उनकी माता का नाम जुड़ता था । स्त्रियों के पास असीमित अधिकार होते थे और अगर वे अपने पति से नाराज़ हो जाएँ तो उसे घर से निकाल भी सकती थीं और उन्हें बोरिया बिस्तर बांधकर घर से बाहर निकलना पड़ता था । यह एक स्वयं स्थापित व्यवस्था थी । स्त्रियों का बहुत सम्मान था । कबीले के सरदार भी उन्हीं की मर्ज़ी से चुने जाते थे और उन्हें बदलकर नया सरदार रखने का भी अधिकार उन्हीं के पास था । योरोप के लोगों ने जब यह देखा तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ उन्होंने इस मातृसत्तात्मक व्यवस्था को उनकी असभ्यता माना जबकि उनके भी पूर्वज इसी अवस्था से गुजर चुके थे । अफ़सोस यही कि यह योरोप के निवासी अपना इतिहास भूल चुके थे । "


"अच्छा हुआ भैया हम ऐसे समाज में पैदा नहीं हुए वर्ना .."  अजय ने कहा ।  " वर्ना क्या " रवीन्द्र ने चुटकी लेते हुए कहा " तेरे बच्चों के साथ भी भाभी का नाम जुड़ जाता ।" "क्या रवींद्र भैया " अजय ने झेंपते हुए कहा " अभी बच्चे पैदा तो होने दो ।" " हो जायेंगे भाई धीरज धर । " रवीन्द्र ने कहा "पहले पढ़-लिख कर कुछ कमाने लायक बन जा फिर बच्चों की सोचना वर्ना तेरे यहाँ भी मातृसत्तात्मक समाज ही चलेगा ..बच्चों को भाभी संभालेगी और तुझे घर से निकाल दिया जाएगा ।" " तो क्या हुआ मैं तुम्हारे यहाँ आ जाऊंगा , तुम्हारे बच्चों को कहानियां सुनाऊंगा, बच्चे मुझसे कहेंगे चाचा चाचा कहानी सुनाओ ना । " अजय ने हँसते हुए कहा । "लो आ गया भाई शोले का अमिताभ बच्चन ।" अशोक ने कहा । "चलो बच्चों..." रवींद्र ने कहा " आज की कहानी तो हमने शरद चाचा से सुन ली अब सब लोग ओढ़ आढ़ कर सो जाओ ।" 


*शरद कोकास*



47-इस हाथ दे उस हाथ ले


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼


*पिछले भाग में आपने पढ़ा कि आदिम मनुष्य के पास जब औजार बनाने वाले चकमक पत्थर के भण्डार ख़त्म होने लगे तो उसके सामने कैसा संकट आया, फिर उसे अचानक ताम्बा कैसे मिला, उस ताम्बे का उपयोग उसने औजार बनाने के लिए कैसे किया, क्या क्या कठिनाइयाँ आई । इस भाग में आप पढेंगे कि आदिम समय में विनिमय की क्या स्थिति थी , मनुष्य कैसे अपने उत्पादन का वितरण करता था इसी कड़ी में पढ़िए गाँव के हाट के बारे में आपको बहुत आनंद आएगा*

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*भाग 47*

इस हाथ दे उस हाथ ले  

कल शाम दंगवाड़ा में कुछ अलग ही नज़ारा था । कल वहाँ साप्ताहिक हाट का दिन था । गाँव का हाट अपने आप में अद्भुत होता है । सुबह से दुकानदार अपने रंगबिरंगे तिरपाल तान देते हैं । बैलगाड़ियाँ भर भर कर सामान आने लगता है । फिर दोपहर तक भीड़ होने लगती है । आसपास के गांवों से भी अनेक लोग वहाँ आते हैं । धोती बंडी पहने हुए किसान , बसंती रंग का साफा बांधे हुए किरानी , रंगीन लहंगों और चुनरियों में औरतें , फ्राक पहने हुए बच्चियाँ , सिर में तेल लगाकर करीने से मांग निकाल कर केश सजाये हुए बच्चे  । इस तरह हाट में घूमने का अलग ही आनंद है । कल हम लोग भी देर शाम तक हाट में घूमते रहे और सजी-धजी दुकानों और वहाँ आये लोगों को देखने का आनंद लेते रहे । 


जाने कितने तरह की वस्तुएँ गाँव के इस हाट में बिकने आई थीं, सामान्य उपयोग की वस्तुएँ जैसे बांस की टोकरी, सूपे,चारपाई, हंसिया, रसोई के बर्तन, कुल्हाड़ी जैसे औज़ार,लकड़ी की खाट, स्टूल, ब्रैकेट, महिलाओं के लिए सौन्दर्य प्रसाधन की चीज़ें, नकली चोटी, बिंदी की शीशी, झुमके, गले के हार, नथ, आलता, सिन्दूर, किसानों के लिए बैलों की झूल, गायों के गले में बांधने के लिए घंटियाँ, और बच्चों के लिए तरह तरह के खिलौने कागज़ की चकरी,लट्टू, पिटपिटी वाला बाजा, पतंग, किसिम किसिम  की मिठाइयाँ जैसे खाजा, जलेबी, शक्कर पारे, मैसूर पाक, मोटे वाले सेव, परमलयानि मुरमुरा, रेवड़ी और गज़क, रोज़मर्रा की सब्जियाँ, मौसमी फल इत्यादि ।  


गाँव की इस हाट का स्वरूप कुछ कुछ मेले की तरह ही था सो मनोरंजन के भी कुछ साधन थे । दो-तीन किस्म के झूले भी वहाँ लगे थे और एक बाइस्कोप वाला भी था । एक जगह रिंग फेंकने वाला खेल भी चल रहा था । हम लोगों का मन हुआ कि कुछ खाने की वस्तुएँ हम भी खरीदें सो हम लोगों ने एक दूकान पर खड़े होकर गर्म गर्म जलेबी खाई  । चीज़ें ख़रीदने के नाम पर मैंने दस दस पैसे में मिलने वाली फ़िल्मी गानों की दो-तीन फोल्डर नुमा किताबें खरीदीं । अब ज़्यादा पैसे तो हम लोगों की जेब में थे नहीं सो हम व्यर्थ का खर्चा कर नहीं सकते थे, और शाम की चाय के लिए भी पैसे बचाकर रखना ज़रूरी था । वैसे भी इन चीज़ों की ज़रूरत तो हमें है नहीं, हम तो इन वस्तुओं की पूर्वज उन पुरानी वस्तुओं की खोज में आये हैं ।


कल हाट में मटरगश्ती करते हुए समय का पता ही नहीं चला । लौटने के समय घड़ी देखी तो पता चला कि रात के लगभग नौ बज गए थे । देर तो हो गई थी लेकिन वाकणकर सर नहीं थे इसलिए डांट खाने का भय नहीं था । वैसे भी सर की अनुपस्थिति में पहली बार हम लोगों ने शिविर का अनुशासन तोड़ने का दुस्साहस किया था । इस बात का अपराध बोध भी कुछ देर सालता रहा लेकिन आर्य सर पर हमें पूरा ऐतबार था कि वे सर को नहीं बताएँगे.. हाँ भाटीजी ज़रूर कह सकते थे लेकिन उन्हें हमने पटा लिया । वे भी समझ गए कि बच्चे तीन हफ़्तों से एक ही रूटीन में बंधकर ऊब गए हैं, फिर हमारे उज्जैन वापस जाने का भी समय आ रहा है सो उन्होंने भी कुछ नहीं कहा । वे भी जानते हैं कि समय के इस टुकड़े में हम लोगों का साथ बस कुछ दिनों का है । यहाँ से जाने के बाद हम लोग परीक्षा देंगे फिर ज़िन्दगी के सफ़र में अपने अपने रास्ते चले जायेंगे । कौन कहाँ जाएगा, कहाँ सेटल होगा कुछ  पता नहीं।  फिर पता नहीं कौन कितने सालों बाद मिलें, मिले भी या न भी मिलें । 


कल रात गाँव से लौटकर हम लोगों ने देर से ही खाना खाया । भाटी जी की रसोई के लिए हम लोग नमक मिर्च रखने की दो प्लास्टिक की छेदवाली डिब्बियाँ ख़रीदकर लाये थे । उन्हें दीं तो वे बहुत खुश हो गए और हम लोगों को गर्म गर्म रोटियाँ सेंक कर खिलाईं । कुछ देर बरगदों के साये में टहलने के बाद हम लोग तम्बू में लौट आये काफी चलना हो गया था इसलिए थकान सी महसूस हो रही थी । भाटीजी से खाना खाते हुए हमने काफी देर तक अपने भविष्य के प्लान पर बातें की थीं तम्बू में लौटकर भी भविष्य के जीवन की कुछ ऐसी ही बातों पर चर्चा चलती रही । नींद ने कब हमें अपने आगोश में ले लिया पता ही नहीं चला ।


मौसम का मिजाज़ आजकल कुछ बदला बदला सा नज़र आ रहा है । सुबह घाट पर जाते हुए हमने आश्चर्य से हवाओं को देखा, यह वे हवाएँ तो कतई नहीं हैं जिन्होंने तेईस दिन पूर्व हमारा स्वागत किया था । सर्दियाँ अब समाप्त हो चली हैं और हवाओं ने मोटे कम्बलों और रज़ाइयों की कैद से मुक्त होकर खुबसूरत बसंती परिधान ओढ़ लिया है  । इठलाती युवतियों की तरह चल रही ठण्डी हवाओं के झुण्ड में अचानक किसी शरारती युवक सा गर्म हवा का एक झोंका कहीं से घुस जाता है और उन्हें छेड़ देता है । दिन भर धूप में मेहनत करने के बाद मन होता है कि शाम को भी चम्बल में एक डुबकी लगा ली जाये लेकिन वाकणकर सर की सख्त हिदायत है कि ऐसा कोई काम नहीं करना है जिसकी वज़ह से हम लोग बीमार पड़ें । सो हम लोग हाथ मुँह धोकर शीतल होने की रस्म अदायगी करने के पश्चात दंगवाड़ा  की ओर निकल जाया करते हैं ।


डॉ. वाकणकर आज सुबह ही उज्जैन से लौट आये थे और दिनभर काम में लगे रहे । कल जो हमने मस्ती की थी उसका खामियाज़ा हम लोगों को भुगतना पड़ा और अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक काम करना पड़ा । शाम को थककर चूर हो जाने के पश्चात वैसे भी सिटी जाने की कोई तमन्ना नहीं थी । फिर कल हम लोग ज़रूरत से ज़्यादा एन्जॉय कर ही चुके थे । रात को बिस्तर पर लेटे हुए हम लोग गाँव के हाट की चर्चा कर रहे थे कि अजय ने फिर वर्तमान से अतीत में छलांग लगाई  "यार आदिम मनुष्य के कबीलों में भी इस तरह के बाज़ार लगा करते थे क्या ?" 


मैंने अपने संचित ज्ञान के आधार पर उसकी बात का जवाब देते हुए कहा "उस वक़्त बाज़ार की कोई अवधारणा नहीं थी लेकिन मनुष्य वस्तुओं का आपसी विनिमय करना ज़रूर सीख गया था । इसलिए वे एक कबीले से दूसरे कबीले जाते थे और वस्तुओं का आदान-प्रदान करते थे । जब चकमक के औजारों का स्थान ताम्बे के औज़ारों ने ले लिया तो ऐसा भी हुआ कि किसी कबीले के पास आवश्यकता से अधिक औज़ार हो गए । अब उसे अपने आसपास के कबीलों से उसका विनिमय करने की ज़रूरत आन पड़ी । ऐसे ही किसी गाँव में पशुओं की संख्या अधिक थी तो कोई गाँव अनाज उत्पादन में अग्रणी था, किसी गाँव के कुम्हार बहुत कुशल होते थे और वे बहुतायत में मिटटी के बर्तन बनाते थे । इस बीच लोगों ने डोंगियाँ भी बना ली थीं सो वे लोग उन डोंगियों के सहारे नदियों को पार करके आसपास के गांवों में जाते और अपनी इन्हीं वस्तुओं के बदले अन्य वस्तुएँ ले आते । अब मुद्रा तो कोई उस समय थी नहीं सो आवश्यकता पूर्ति हेतु वितरण की यह  सार्वजानिक प्रणाली थी ।


"मतलब उस समय क्रय-विक्रय या ऐसा ही कोई अर्थ देने वाले शब्द प्रचलित नहीं थे ?" अशोक ने सवाल किया । "क्रय विक्रय तो क्या अनेक वस्तुओं के लिए भी शब्द नहीं थे ।" मैंने कहा । "विनिमय की इस पद्धति में सबसे बड़ी कठिनाई भाषा की ही थी सो यह लोग अपनी वस्तुओं के बारे में अन्य लोगों को ठीक से बता नहीं पाते थे । शुरू शुरू में लोग भी अनेक नई वस्तुओं और उनके उपयोग से अनभिज्ञ थे फिर भी जिन वस्तुओं के उपयोग से वे परिचित थे उनके बारे में  किसी तरह संकेतों के माध्यम से अथवा दुभाषिये के माध्यम से वे प्रचार भी करते थे ।" 


"अरे वाह ।" अजय ने खुश होकर कहा "मतलब विज्ञापन संस्था उस समय भी मौजूद थी ।" "हाँ कुछ ऐसा ही समझ लो ।" मैंने कहा  "लेकिन इससे यह लाभ हुआ कि वस्तुओं के विनिमय के साथ साथ भाषा का भी विनिमय होने लगा । यह लोग इस तरह के हाट में जब भी मिलते तो अपनी बोली के शब्दों के साथ नए लोगों की बोली के कुछ शब्द भी अपने साथ ले आते । यह वह समय था जब लोगों के धार्मिक विश्वास उनके टोटेम थे  और हर कबीले के अपने कुछ विशिष्ट देवी-देवता थे जो लकड़ी पत्थर आदि की सांकेतिक प्रतिमाओं के रूप में विद्यमान थे । कबीले के लोग जब इस तरह के हाट से लौटते तो कभी कभी उन प्रतिमाओं को लेकर भी आ जाते । इस तरह दैवी प्रतिमाओं का भी आदान प्रदान उनके बीच होता था ।"


"हाँ ।" अशोक ने कहा "मैंने पढ़ा है कि इस्लाम के अविर्भाव के पहले जब अरब के लोग मूर्तिपूजक थे हर कबीले के अपने अपने देवता और मूर्तियाँ होती थीं । जब एक कबीले के लोग व्यापार के लिए यात्रा पर जाते तब दूसरे कबीले से वे उनकी मूर्तियाँ भी ले आते । इस तरह इस तरह काबा में तीन सौ चौसठ मूर्तियाँ इकठ्ठी हो गईं ।" "लेकिन वे लोग तो मूर्तिपूजक नहीं थे और आज भी नहीं हैं ?" अजय ने सवाल किया ।  "हाँ ।"  अशोक ने कहा " यह इस्लाम के अविर्भाव से पूर्व की बात है । मोहम्मद साहब ने लिखा है कि तत्कालीन समाज में यह लोग किसी तरह की मेहनत में विश्वास नहीं करते थे, मिस्त्र की ओर से आने वाले काफ़िलों में लदा सामान वे लूट लेते और उसी से गुजर बसर करते थे । वे केवल मूर्तियों की आराधना करते और उनसे अपने दुःख दूर करने की प्रार्थना करते । मोहम्मद साहब ने जब देखा कि यह लोग इतने अकर्मण्य हो गए हैं तो सबसे पहले उनकी अकर्मण्यता दूर करने के लिए ही उन्हें मूर्तियाँ नष्ट करनी  पड़ीं । उन्होंने कहा कि इन मूर्तियों में अलग अलग तुम्हारा ईश्वर नहीं है वह केवल एक है जो निराकार है । इसलिए बेहतर होगा एक ईश्वर की आराधना करो और जीने के लिए ग़लत काम छोड़कर मेहनत के काम करो ।" 


"भैया, इसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत तो हमरे यहाँ है ।" किशोर ने कहा । "हमरे यहाँ के लोग भी तो भगवान भरोसे ही रहते हैं बल्कि हमारा देश ही भगवान भरोसे चलता है ।" राममिलन भैया ने कहा "तुम लोग नाहक भगवान की उपस्थिति पर संदेह करते हो देख लो यही तो इस बात का प्रमाण है कि भगवान हैं । अगर भगवान न होते तो हमरा देश कैसे चलता ?" उनकी बात का हमने लाक्षणिक अर्थ ग्रहण किया और एक ज़ोरदार ठहाका लगाया । राममिलन भैया हम लोगों को हँसता देखकर नाराज़ हो गए .." तुम लोग सब पापी हो, भगवान की बात पर हँसते हो, भगवान तुम्हारा कभी भला नहीं करेगा ।"


"नहीं भाई इसमें हँसने जैसी कोई बात नहीं है ।" मैंने मित्रों को शांत करते हुए कहा "उस समय तो देवी देवता भी इंसानों की तरह यात्रा करते थे, यहाँ से वहाँ जाते थे और धीरे से उस नए समाज में स्थपित हो जाते थे । यह सिलसिला तो अभी तक चल रहा है इसीलिए विश्व की अनेक सभ्यताओं में एक जैसे गुणों वाले देवी देवता मिलते हैं,  जैसे बाबुल के ताम्मुज ,मिस्त्र के मृत्यु के देवता ओसारिस और यूनान के एडोनिस में एक जैसे गुण पाए जाते हैं । हमारे यहाँ वे यमराज हैं । हमारे यहाँ भी जो इंद्र है उसके गुण ग्रीस के देवता ज्यूस से मिलते हैं । तात्पर्य यह कि वस्तुओं के साथ साथ नये संकेतों, नये शब्दों और देवी देवताओं का भी आदान प्रदान चलता रहा । आप देख सकते हैं कि विश्व की अनेक भाषाओं में अन्य भाषाओं के भी काफी शब्द मिलते हैं यह इसी विनिमय प्रणाली या सांस्कृतिक आदान -प्रदान के कारण संभव हुआ है । 


"कितना अच्छा समय रहा होगा ना वह जब किसी तरह का लड़ाई झगडा नहीं होता था ।" अजय ने कहा । "लोग एक दूसरे की भाषा सीखते थे, एक दूसरे के देवी देवता पूजते थे, जिसे जिस वस्तु की ज़रूरत होती थी वह अपनी वस्तुएँ देकर दूसरे से वह वस्तु ले लेता था ।" "नहीं ।" मैंने कहा " हम इस व्यवस्था का इस तरह सरलीकरण नहीं कर सकते । यह विनिमय इतने शांतिपूर्ण तरीके से भी नहीं होता था । कभी कभी किसी कबीले के पास देने के लिए कुछ नहीं होता था लेकिन उसे ताम्बे के औजारों की, कपड़ों की या अनाज की ज़रूरत होती थी तब वह अन्य कबीलों पर आक्रमण करके बल्कि सीधे सीधे हत्याएं करके उनसे अपनी ज़रूरत की वस्तुएँ छीनने में भी झिझकता नहीं था ।" 


"मतलब डकैती की शुरुआत यहीं से हुई ?" अजय ने सवाल किया । "हाँ ।" मैंने कहा "यह बात मनुष्य के स्वभाव में सदा से ही रही है, अप्राप्य को श्रम पूर्वक प्राप्त करने की बजाय वह अन्य लोगों से छीन लेना चाहता है । ऐसे लोग अपने हथियारों के साथ किसी गाँव पर हमला करते और वहाँ से अपनी ज़रूरत के सामान उठा लाते । इसी वजह से धीरे धीरे गांवों को अपनी सुरक्षा का खयाल आया और वे लोग गाँव के बाहर मिटटी और पत्थर से एक परकोटा तैयार करने लगे जिसमें प्रवेश द्वार बनाये जाते थे । हड़प्पा सभ्यता में तो लगभग हर गाँव इसी तरह परकोटे से घिरा हुआ मिलता है । 


"फिर तो कबीलों के सरदार भी हुआ करते होंगे गब्बर  सिंह की तरह और वे लोग भी इसी तरह गाँव में घुसकर अनाज लूट ले जाया करते रहे होंगे ?" अजय ने कहा । " हाँ " मैंने कहा । "डाकू तो अभी भी पाए जाते हैं । लेकिन इसका कारण आर्थिक से ज़्यादा सामाजिक है । तुमने चम्बल के डाकुओं के बारे में सुना होगा वे भी इसी तरह जातिगत शोषण की वज़ह से डाकू बने । दरअसल इसकी शुरुआत भी उस आदिम व्यवस्था में थी भले ही यह सामुदायिक व्यवस्था थी लेकिन हर कबीला अपने काम की वज़ह से अपने आप को श्रेष्ठ मानता था और दूसरे कबीलों को कमतर आंकता था ।"


"आज भी तो यही हो रहा है ।" किशोर भैया ने अपनी टिप्पणी दी ।" जानबूझकर ऊँच - नीच की भावना फैलाई जा रही है, धर्म और जाति को लेकर विद्वेष पैदा किया जा रहा है । जबकि देखा जाए तो संसार में कोई जाति न ऊँची है न नीची हालाँकि जाति भेद और वर्ग भेद मौजूद है । कहने को अमेरिका और सोवियत रूस जैसी महाशक्तियाँ हैं, योरोप के विकसित राष्ट्र हैं लेकिन वहाँ अभी भी ऐसी जातियाँ रह रही हैं जो अभी भी लकड़ी के हलों से खेती करती हैं, जिनके पास वही आदिम संस्कार हैं । इतिहास के अनुसार भले ही इन जातियों की आयु एक समान न हो लेकिन विकास अभी भी उन तक नहीं पहुँचा है । विकसित जातियाँ अभी भी ऐसी जातियों से घृणा करती हैं । हमारे ही देश के आदिवासी क्षेत्रों में जाकर देख लो, अब कंप्यूटर का युग आनेवाला है लेकिन अभी भी उनके पास वही औजार हैं जो आदिम युग में हुआ करते थे ।" 


बस इतना कहकर किशोर भैया ने चादर तानी और मुँह ढांक कर सो गए । किशोर भैया को इतना लम्बा भाषण देता हुआ देखकर ही हम समझ गए कि किशोर भैया आज पिनक में हैं । हाट में उन्होंने कहीं से बूटी का जुगाड़ कर लिया था जिसका उपयोग उन्होंने अभी कुछ देर पहले किया था । थोड़ी बहुत खुशबू तो हमें आ ही रही थी लेकिन उनके वक्तव्य से हम लोगों को कन्फर्म हो गया । उनके निद्रामग्न होते ही सब लोग अलसाने लगे । हमारे रात्रिकालीन सत्र का यह नियम है कि यदि एक व्यक्ति भी सो जाता है तो फिर बातचीत करने में किसी का मन नहीं लगता सो हम लोग सभा समाप्त कर देते हैं । राममिलन भैया ने एक नज़र किशोर भैया की ओर डाली और 'गया काम से' के मौद्रिक भाव के साथ कहा .."ई किसोरवा तो गया सिव जी की सरन में.. चलो हम भी चले .. जय बजरंग बली  ।"


*शरद कोकास*


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46-ताम्बे की थाली में जेवना परोसा


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

*पिछले भाग में आपने पढ़ा कि कपड़ों की खोज कैसे हुई , कपड़े पहनने का विचार मनुष्य के दिमाग़ में कैसे आया, उसके लिए उसने क्या क्या किया ,प्रारम्भिक वस्त्र कैसे थे किस कपड़े के बनाये जाते थे ।इसके अलावा यह भी जाना कि पाखण्डी बाबा कैसे चमत्कार करते हैं , कैसे हवा से भभूत निकालते हैं , कैसे बिना माचिस के आग लगाते हैं आदि । इस भाग में पढ़िए कि आदिम मनुष्य के पास जब औजार बनाने वाले चकमक पत्थर के भण्डार ख़त्म होने लगे तो उसके सामने कैसा संकट आया, फिर उसे अचानक ताम्बा कैसे मिला, उस ताम्बे का उपयोग उसने औजार बनाने के लिए कैसे किया, क्या क्या कठिनाइयाँ आई ।*

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*भाग 46*

*ताम्बे की थाली में जेवना परोसा* 

सुबह सुबह घाट पर रवीन्द्र ने मुझे याद दिलाई  " यार हम लोगों को यहाँ आये आज तीन सप्ताह हो चुके हैं और आज हमारा बाइसवां दिन है । अब वापसी की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए ।" वापस जाने की बात सुनकर मैं थोड़ा सा उदास हो गया फिर भी उदासी के उस भाव को शब्दों से समायोजित करते हुए मैंने कहा " तैयारी क्या करना है ..जिस दिन डॉ. वाकणकर इज़ाज़त दे देंगे हम अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से रवाना हो जायेंगे ।" " हाँ यार..उज्जैन जाकर परीक्षा की तैयारी भी तो करना है ।" रवींद्र ने आनेवाली परीक्षा की याद दिला दी थी । "तो उसमे ऐसा परेशान होने की क्या बात है " मैंने रवीन्द्र के परीक्षा के भय को दूर करने के प्रयास में कहा । "साल भर से तो पढ़ ही रहे हैं ।" "तेरी बात अलग है ।" रवींद्र ने कहा । "तू तो साल भर से तैयारी में लगा है और टॉप भी तुझे ही करना है । लेकिन हमें तो पढना होगा । उसके बाद पता नही कब रिज़ल्ट आएगा फिर देखेंगे आगे क्या करना है । हम सब छात्र मध्यवर्गीय परिवारों से आये हैं । अब कोई बाप-दादा का धंधा तो नहीं है सो नौकरी तो ढूँढनी ही होगी ।"


"हाँ यार ।" भविष्य के चिंता ने हमें थोड़ा गंभीर कर दिया "सही है.. हमें लेकर हमारे माता-पिता के भी कुछ स्वप्न हैं । वे चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़ लिख कर कहीं ठीक ठाक जगह नौकरी पर लग जाएँ । हमारे लिए भी आनेवाले दिन एक समर की तरह हैं जब हम डिग्री लेकर विश्वविद्यालय से निकलेंगे और नौकरी के लिए भटकेंगे । हम नहीं जानते कि हमारा भविष्य क्या है । हमारे सामने उन लोगों का जीवन है  जो अपनी ज़िंदगी में सेटल हो चुके हैं जिनके पास एक अच्छी नौकरी है, रहने के लिए एक अच्छा सा मकान है, घर -परिवार है, सुविधा पूर्ण जीवन जीने के लिए बहुत सारी वस्तुएँ हैं । हमारे पास तो इनमें  से कुछ नहीं है बस देश के करोड़ों नौजवानों की तरह अच्छे भविष्य के स्वप्न है । हाँ, हम सबके भीतर कुछ करने की चाहत ज़रूर है, मन में ढेर सारी उमंगें भी हैं और उन्हें थपथपाती हुई कुछ उम्मीदें कि जीवन अच्छा ही बीतेगा।"


" सही कह रहा है तू ।" रवीन्द्र ने कहा "उम्मीद तो है कि हमें इस डिग्री के बाद अच्छी नौकरी मिल जायेगी या हो सकता है पहले पी एच डी करनी पड़े फिर नौकरी मिले । अच्छा बता नौकरी लग जाने के बाद तू सबसे पहले क्या खरीदेगा ?"  मैंने तपाक से कहा "रेडियो !" " अरे वा !" रवीन्द्र ने खुश होकर कहा । " हाँ यार यहाँ सबसे ज्यादा कमी संगीत की महसूस होती है , अगर रेडियो होता तो शायद काम करने में और मज़ा आता । वैसे तू तो है ही हमारा रेडियो आल इण्डिया रेडियो, बी बी सी लन्दन सब कुछ ।" मैंने कहा " देख भाई शेखचिल्ली की तरह सपने देखना तो मुझे भी आता है । एक बार सेटल हो जाएँ फिर देखेंगे.. जैसे जैसे सुविधा होगी, स्कूटर, मकान सब हो जाएगा । फिर शादी के बाद आटे दाल  के कनस्तर भी तो खरीदने पड़ेंगे ।"


"यार, ज़िन्दगी में जो ज़रूरी वस्तुएँ हैं वे तो लेनी ही पड़ेंगी । और न भी हो तो जीवन तो बीतेगा ही । बहुत अच्छा भले न हो एक सामान्य सा जीवन भी बीत जाए तो काफी है ।" रवींद्र के भीतर आशा का समंदर लहरा रहा था । "कभी कभी सोचता हूँ कि पहले के उस इंसान का जीवन कितना अच्छा था । न उसके पास अधिक इच्छाएँ थीं न उसे जीवन बिताने के लिए बहुत सारी वस्तुओं की आवश्यकता थी । अपनी अल्प सुविधाओं के बावजूद वह जीवित तो रहता ही था । और आज के मनुष्य को देखो उसने इतनी अधिक इच्छाएँ पैदा कर ली हैं कि उसी अनुपात में उसके पास अल्लम -गल्लम चीज़ों का ढेर भी बढ़ा गया है । कभी कभी लगता है यह अपनी इच्छाओं के बोझ तले दबकर ही न मर जाये । " 


रवींद्र का स्वर कुछ निराशावादी हो रहा था । मुझे उसे निराशा से उबारना उचित लगा । " इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं है भाई ।  यह विकास की सहज स्वाभाविक गति है इसे हम मनुष्य की प्रगति के सन्दर्भ में देख सकते हैं । उसने अपने दिमाग की ताकत से इस प्रकृति का दोहन किया और पदार्थ पर नियंत्रण करते हुए प्रकृति में सहज प्राप्य वस्तुओं को अपनी मनचाही वस्तुओं में बदल दिया । यह सिसिला तब से जारी है  जब वह भौतिक शास्त्र, रसायनशास्त्र जैसे विषयों को भी नहीं जानता था । आज मनुष्य ने अपने संचित ज्ञान के आधार पर कितनी सारी वस्तुएँ बना ली हैं कागज़, शीशा, प्लास्टिक, स्टील, कपड़ा, रबर और अभी इसका कोई अंत भी नहीं दिखाई देता ।"


रवीन्द्र ध्यान से मेरी बात सुन रहा था । उसके चेहरे पर जमी निराशा की धुंध धीरे धीरे छंट रही थी । मैंने अपनी बात जारी रखी "अशोक कह रहा था ना उस दिन कि यह तो कुम्हार की कहानी है । दरअसल सबसे पहली शुरुआत कच्ची मिटटी के बर्तनों को आग में पकाने से ही हुई । वह मिटटी, पानी और आग को अपनी इसी शक्ति से काबू में ला रहा था जबकि इसके पहले वह सिर्फ पत्थरों को अपने हाथों की शक्ति से अलग रूप देता था । अब उसने प्रकृति की शक्तियों का उपयोग करना शुरू किया । आग ऐसी ही एक शक्ति थी जो मिटटी को पका देती थी, रोटी और मांस को सुस्वादु बना देती थी । मनुष्य ने भी एक कुम्हार की तरह ही अपने जीवन को गढ़ा है उसे संघर्ष की आग में तपाकर मजबूत बनाया है फिर सुविधाओं से उसे सजाया है ।" 


सुबह भले ही हम लोगों ने बहुत गंभीर बातें की हों दोपहर में ट्रेंच पर आज हम लोग बहुत हल्के-फुल्के मूड में थे । वाकणकर सर उज्जैन गए हुए हैं और आर्य सर भी ट्रेंच क्रमांक एक पर अधिक व्यस्त थे सो हम लोग पूरी तरह स्वतन्त्र थे । उत्खनन करते हुए हम लोग आपस में मज़ाक भी करने लगे । सुबह की गंभीर बातों का हैंगओवर अभी बाक़ी था जिसे हँसी मज़ाक के साथ हम लोग दूर करने की कोशिश कर रहे थे । अजय ने कहा  .." काश ज़मीन के भीतर से सोने की मुहरों से भरा एक हंडा निकल आता तो सबकी लाइफ बन जाती । हम लोग आपस में बाँट लेते फिर न नौकरी की ज़रूरत होती न पढ़ने-लिखने की ।" 


अशोक ने चौंककर अजय की और देखा कहा " अबे ओ शेख चिल्ली .. सपने देखना बंद कर । वैसे भी तेरी लाइफ तो पहले ही बन चुकी है , अब तू कुछ नहीं भी करेगा तो चलेगा । पिताजी जैसे तुझे पाल रहे हैं वैसे ही तेरे बाल बच्चों को भी पाल लेंगे ।" अजय ने खिसियानी हँसी हँसते हुए कहा .."नहीं भाई पिताजी के पैसे पर कब तक ऐश करेंगे ख़ुद भी तो कुछ न कुछ करना ही होगा ।" किशोर भैया ने थोड़ी सी गर्दन नीचे झुकाई और कहा ..हं ..अब पता चला न ज़िन्दगी जीने के लिए खुद मेहनत करनी पड़ती है इसलिए बिना मेहनत के धन कमाने के सपने देखना बंद कर । वैसे भी तू जानता ही होगा .. ज़मीन से जो कुछ भी निकलेगा वह सब राष्ट्र की संपत्ति ही होगा इसलिए कि वह हमने नहीं कमाया है बल्कि हमारे पुरखों ने कमाया है । और सोने के हंडे की बात तो बिलकुल भूल जा ..वैसे भी हम लोग जिस साईट पर हैं  वहाँ ताम्बे से अधिक कुछ मिलने की उम्मीद नहीं है  क्योंकि यह सोने के जन्म से बहुत पहले की घटना है ।" 


आज वाकणकर सर दिन भर साईट पर उपस्थित नहीं थे । जिस तरह प्रिंसिपल के न होने पर स्कूल की छुट्टी जल्दी हो जाती है आर्य सर ने भी जल्दी ही काम समाप्ति की घोषणा कर दी । वैसे भी आज दंगवाड़ा में हाट था और मजदूरों को भी जाने की जल्दी थी । यद्यपि सूर्य के डूबने में अभी काफी समय था और मार्च के शुरुआती दिनों का आसमान धूप के सुनहले रंग में रंगा हुआ था । ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने सोने की अशर्फ़ियों से भरा हंडा पूर्व दिशा में उलट दिया हो । मजदूर जैसे ही कुदाल फावड़े,घमेले , खुरपियाँ और छन्नी टेंट में रखकर लौटे हम लोग भी शिविर की ओर चल दिए । लौटते हुए हम लोगों ने आर्य सर को अजय के शेखचिल्ली वाले ख़्वाब के विषय में बताया । सर ने भी एक ठहाका लगाया और कहा "भाई ऐसा हो तो बहुत अच्छी बात है हमारा राजकीय संग्रहालय कुछ समृद्ध हो जाएगा लेकिन सोना तो दूर यहाँ ताम्बा ही मिल जाए बहुत बड़ी बात है ।"


अजय का रंगीन ख़्वाब इतनी ठोकरों के बाद अब सोने की घाटी  से लुढ़ककर ताम्बे की घाटी में आ चुका था उसने सोचा थोड़ा कोर्स की बात कर अपना इम्प्रेशन जमा लिया जाए । "सर, चाल्कोलिथिक पीरियड के बारे में कोर्स में पढ़ते हुए हमने पढ़ा था कि मनुष्य को मिलने वाली सबसे पहली धातु ताम्बा ही है लेकिन ताम्बे की खोज के बारे में विस्तार से हमें नहीं पता । यह खोज भी बहुत मुश्किल से हुई होगी न ?" अशोक ने अजय की और इस अंदाज़ से देखा मानो उसने प्रायमरी कक्षा का सवाल हाईस्कूल की कक्षा में पूछ लिया हो । फिर वह सर से मुखातिब हुआ "सर, पुरातत्ववेत्ताओं को सबसे पहले ताम्बे के अवशेष कहाँ मिले ?" उसका सवाल भी अजय के सवाल के तारतम्य में ही था लेकिन वह थोड़ा एडवांस्ड था ।  


सर दोनों के सवाल सुन चुके थे । उन्हें अशोक का प्रश्न थोड़ा अधिक महत्वपूर्ण लगा इसलिए उसके सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा "भाई, पुरातत्ववेत्ताओं को ताम्बे के औज़ार सबसे पहले झीलों की सतह में मिले उसके अलावा भी कई अन्य साइट्स पर भी मिले हैं ।" अजय ने अशोक की और गुस्से से देखा ,सर ने उसके प्रश्न को सरपास करते हुए अशोक के सवाल का जवाब जो दिया था "लेकिन सर मनुष्य को यह पहली बार कैसे मिला होगा, मतलब ताम्बे की खोज कैसे हुई होगी ?" अबकी बार किसीने अजय की बात नहीं काटी । दरअसल अजय की तरह हम लोग भी इस बात को विस्तार से जानना चाहते थे । सर ने हमारी झोली में ज्ञान उंडेलना शुरू किया " यह बात तो तुम लोग जानते ही हो कि  ताम्बा प्रकृति से मिलता है और यह भी कि लाखों वर्षों से मनुष्य चकमक पत्थर से अपने औज़ार बना रहा था । यह चकमक पत्थर भी उसे प्रकृति में यूँही पड़ा मिल जाता था । लेकिन कई हज़ार वर्षों के पश्चात धीरे धीरे उसके चकमक पत्थर के भंडार समाप्त होने लगे । ज़ाहिर है उसने अपने इस भण्डार का मितव्ययिता के साथ उपयोग नहीं किया था तो यह तो होना ही था ।"


"अच्छा उस समय तो उसे बताने वाला भी कोई नहीं रहा होगा कि भाई ज़रा कंजूसी से उपयोग करो ।" अजय ने कहा " जैसा कि आजकल पेट्रोल के लिए हल्ला मचाने लगे  हैं कि भविष्य में पेट्रोल के भण्डार समाप्त हो जायेंगे । " ऐसा नहीं है ।" सर ने अजय की वर्तमान पर समीक्षा के उत्साह को कम करते हुए कहा " कंजूस तो तब कहलाता जब उपलब्ध होने पर भी वह इनका उपयोग नहीं करता । उसकी समस्या तो यह थी कि चकमक पत्थर उपलब्ध ही नहीं थे । वैसे वह मितव्ययिता के साथ तो सभी वस्तुओं का उपयोग करता था इसलिए नहीं कि उसे यह ज्ञात था कि यह सब वस्तुएँ शीघ्र समाप्त हो जायेंगी बल्कि इसलिए कि उसका दायरा ही इतना सीमित था कि उसे आसपास यह वस्तुएँ उपलब्ध ही नहीं होती थीं । तुम लोगों ने वेदों में पढ़ा होगा जाने कितने मन्त्र इस मितव्ययिता को लेकर ही लिखे गए हैं ।"


"मतलब यह हुआ सर कि चकमक पत्थर तो उपलब्ध था लेकिन उस जगह पर नहीं था जहाँ वह रहता था ..?" अजय ने कहा । "बिलकुल ठीक " आर्य सर ने कहा "अब उस समय कोई ट्रांसपोर्टेशन जैसा तो कुछ था नहीं जो वह आर्डर देकर दूसरी जगह से पत्थर मंगवा लेता । और ऐसा भी नहीं कि उसने इसके लिए कोशिशें नहीं कीं । पहले वह सतह पर पड़ा चकमक पत्थर इस्तेमाल कर लेता था लेकिन इस तरह जब उसे सतह पर चकमक मिलना बंद हो गया तो उसने ज़मीन खोदकर चकमक निकालना शुरू किया । इस तरह संसार की पहली खदानें  बनीं ।"


"मतलब उसे यह मालूम था कि ज़मीन के भीतर चकमक पत्थर है ?" अशोक ने कहा । "बिलकुल । " सर ने कहा "वह खाइयों या गड्ढों में झांककर देखता ही था वहाँ उसे यह पत्थर दिखाई दिया तो उसने खोदना शुरू किया । यह चकमक अक्सर चाक मिटटी के साथ या खड़िया मिटटी के साथ मिलता था । प्राचीन निक्षेपों में ऐसी कई खदानें मिलती हैं जहाँ चकमक और खड़िया साथ साथ मिलता है । लेकिन उस समय भी पत्थर खोदने के लिए ज़मीन के नीचे उतरना बहुत कठिन काम था । अब उनके पास ऐसा कोई तकनीकी ज्ञान तो था नहीं सो अक्सर वे लोग जब भीतर उतरते थे उनकी खदानें ढह जातीं और वे उसीमें दब जाते । पुरातत्ववेत्ताओं को ऐसी कई खदानें  मिली हैं जिनमें  मनुष्यों के कंकाल भी पाये गये हैं । फिर भीतर अँधेरा भी होता था इसके लिए वे लकड़ियाँ जलाते थे या जानवरों की चर्बी के दिए लेकर भीतर जाते थे लेकिन उससे इतना धुआं होता था कि कई बार भीतर दम घुटने से या कई ज्वलनशील गैसों के आग पकड़ लेने से भी वे लोग मर जाते थे ।" 


" यह सही है सर ।" अजय फिर अतीत से वर्तमान में लौट आया था  "आज भी खदानों में उतनी सुरक्षा कहाँ हैं, धनबाद में चासनाला खदान में कितनी बड़ी दुर्घटना हुई थी पूरा पानी खदान के अन्दर भर गया था । फिल्म 'काला पत्थर' इसी समस्या पर बनी थी । "हाँ यह समस्या तो आज भी है ।" सर ने कहा  "आज भी वहाँ पूरी की पूरी बस्ती खदानों के ऊपर बसी है, मकानों के नीचे खाली ज़मीन है, कौनसा मकान कब धंस जाए पता ही नहीं चलता । खैर..." सर अपनी बात के वर्तमान का खनन कर उसे फिर अतीत तक ले गए "इस तरह धीरे धीरे ज़मीन के भीतर का चकमक भी समाप्त होने लगा, या फिर कई बार भीतर जाने की असुविधा भी बढ़ती गई । अब उसे अपने चाकू, कुदाले, भाले बनाने के लिए चकमक की ज़रूरत तो थी ही क्योंकि बिना औजारों के उसका जीवन मुश्किल हो जाता । लेकिन अब समस्या चकमक पत्थर की थी ।"


" ओह यह तो बहुत ही बुरा हुआ ।" किशोर ने कहा । " हाँ ।" सर ने कहा " जब उसे अपने औजार बनाने के लिए अन्य किसी वस्तु की आवश्यकता महसूस होने लगी तब उसका ध्यान अन्य पत्थरों की ओर गया और इस प्रयास में उसे ज़मीन पर पड़ा यह हरा हरा सा पत्थर मिला । उसने सबसे पहले इस ताम्बे के खनिज को पत्थर समझ कर ही इस्तेमाल शुरू करना शुरू किया । उस समय आज जैसी स्थिति नहीं थी । ताम्बा खनिज के रूप में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था और वह सतह पर ही मिल जाता था सो उसने इस पत्थर से औजार बनाने शुरू किये । उसने अपने चकमक के हथौड़े से उस पर वार किया लेकिन जैसे ही ज्यादा  जोर से चोट पड़ती तो यह ताम्बे का पत्थर चूर चूर हो जाता था ।  ऐसे ही एक दिन उसने  तंग आकर उस पत्थर को आग में फेंक दिया और आश्चर्य कि उसे अगले दिन एक चमकदार धातु प्राप्त हुई  जो ताम्बा कहलाई ।"


"मतलब उसके बाद उसने सारे औज़ार ताम्बे के ही बनाए ?" अजय ने पूछा । " नहीं सारे हथियार तो नहीं बनाये लेकिन वह चकमक के औजारों के साथ इनका भी इस्तेमाल करने लगा ।" सर ने अजय के फास्ट फॉरवर्ड बटन पर स्टॉप का बटन लगाते हुए कहा ।" यह ताम्बा पृथ्वी के सभी भू भागों में एक साथ मिला होगा ?" किशोर ने पूछा । "नहीं ऐसा भी नहीं है ।" सर ने कहा " ताम्बा मिलने के प्रमाण अलग अलग जगहों पर अलग अलग समय के मिलते हैं जैसे मध्य पूर्व में यह लगभग नौ हज़ार ईसा पूर्व में मिला । पुरातत्ववेत्ताओं को उत्तरी इराक के क्षेत्र में लगभग आठ हज़ार सात सौ साल पुराना एक पेंडेंट मिला है ।" अच्छा !" अजय ने कहा "पेंडेंट यानि झुमका .. वाह झुमका गिरा रे ईराक के बाज़ार में ।" अजय की बात सुनकर हँसी की एक लहर फैल गई । सर ने मुस्कुराते हुए कहा " हाँ, यह धातुओं की खोज के हिसाब से एक महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है, कांस्य युगीन सभ्यता का प्रारम्भ भी यहीं से माना जाता है ।" 


"अच्छा तो फिर कांसा कहाँ से आया सर ?" अजय ने पूछा । सर ने जवाब दिया " कांसा ताम्बे और टीन का अलॉय है । इसी तरह जब ताम्बे के खनिज के साथ टीन के खनिज मिले दोनों के संयोग से कांसा बना । सुमेरिया और इजिप्त में यह लगभग तीन हज़ार  ईसा पूर्व पाया गया और इसका उपयोग लगभग एक हज़ार  ईसा पूर्व तक चलता रहा जब तक लोहे की खोज नहीं कर ली गई । इस तरह नियोलिथिक काल से लेकर कांस्य युग तक का काल चाल्कोलिथिक पीरियड या ताम्राश्म युग कहलाया अर्थात जिसमें  ताम्बे और पत्थर दोनों का उपयोग होता था । आज देखिये ताम्बा किस तरह उपयोग में लाया जाता है । इसके उपयोग की शुरुआत औजार बनाने से हुई, फिर बर्तन और आभूषण बनाये गए । आज सबसे ज्यादा उपयोग बिजली के तारों और उपकरणों के लिए होता है क्योंकि यह बिजली का सबसे बढ़िया संवाहक है ।"


 "सर जी इसका एक महत्वपूर्ण उपयोग तो आपने बताया ही नहीं ।" राममिलन ने कहा । "तो तुम्हीं बता दो भाई ।" सर ने मुस्कुराते हुए कहा । राममिलन भैया बोले "सर जी, इसका सबसे ज्यादा उपयोग तो पूजा पाठ के लिए होता है । पूजा के पात्र, थालियाँ, लोटे, ताम्बे के ही शुद्ध माने जाते हैं । और ताम्बे की ही थाली में भगवान को भोग लगाया जाता है ।" जय हो राममिलन भैया । " सर ने हाथ जोड़े और कहा " चलो भाई अब चाय पीने का मन हो रहा है भाटीजी की भोजनशाला में ताम्बे के पात्र नहीं बल्कि चीनी मिटटी के कप हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे ।" "बिलकुल सर ।" किशोर ने कहा "चाय की तलब हो रही है ..उसके बाद हमें सिटी भी तो जाना है ।" 


*शरद कोकास*


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45-मेरा लाल दुपट्टा मलमल का हो जी


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पिछले भाग में आपने पढ़ा झीलों के किनारे बस्ती कैसे बसी , वहाँ क्या क्या कठिनाइयाँ थीं , इस तरह से आग लग जाने पर सब कुछ नष्ट हो जाता था यह रोचक वर्णन आपको पसंद आएगा ।इस भाग में पढ़िए कि कपड़ों की खोज कैसे हुई , कपड़े पहनने का विचार मनुष्य के दिमाग़ में कैसे आया, उसके लिए उसने क्या क्या किया ,प्रारम्भिक वस्त्र कैसे थे किस कपड़े के बनाये जाते थे ।इसके अलावा यह भी जानिए कि पाखण्डी बाबा कैसे चमत्कार करते हैं , कैसे हवा से भभूत निकालते हैं , कैसे बिना माचिस के आग लगाते हैं आदि*

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*भाग 45*

*मेरा लाल दुपट्टा मलमल का हो जी*


स्नानादि के पश्चात घाट से लौटते हुए हम लोग अक्सर टावेल लपेट कर ही लौटते हैं और तम्बू में आकर कपड़े पहनकर फिर नाश्ते के लिए प्रस्थान करते हैं  । मैले कपडे भी घाट पर ही धो लेते हैं और तम्बू के बाहर रस्सियों पर उन्हें सूखने के लिए डाल देते हैं ताकि दिन भर में वे सूख जायें । टेरीकॉट के कपड़े हैं सो जल्दी सूख भी जाते हैं और प्रेस करने की झंझट भी नहीं रहती । आज सुबह कपड़े पहनते हुए रवीन्द्र ने कहा " यार ,हम लोग देखो कितने अच्छे समय में पैदा हुए हैं, एक मिनट में प्रागैतिहासिक अवस्था से आधुनिक अवस्था में आ जाते हैं । कहाँ वो इंसान नंगा घूमता था कहाँ हम इतने अच्छे अच्छे कपडे पहनते हैं ।" अजय ने कहा "और हमें यह सुविधा भी है कि जब मर्ज़ी हो फिर उसी अवस्था में पहुँच जाते हैं ।" 


"चुप रह यार । " रवीन्द्र ने कहा "जब देखो तब अश्लील बातें करता रहता है ।" "लो सुन लो इनकी ।" अजय ने मेरी और देखते हुए कहा  "कपडे उतारने में क्या अश्लीलता है ? जब हमारे पूर्वज कपडे नहीं पहनते थे तो क्या वे अश्लील थे ?"  "चुप रहो भाई दोनों ।" किशोर भैया ने कहा "अश्लीलता का कपडे पहनने न पहनने से कोई सम्बन्ध नहीं है, बल्कि विचारों से है, अश्लीलता दिमाग़ में होती है ।" अजय समझ गया अब किशोर भैया का श्लील- अश्लील पर व्याख्यान सुनने को मिलेगा । किशोर भैया ने जैसे उसके मन की बात ताड़ते हुए कहा "नहीं मैं फ़िलहाल कोई व्याख्यान देने के मूड में नहीं हूँ ।"


रवींद्र ने शर्ट की बटन लगाई और आईने में देखकर कंघी करते हुए कहा "मैं अक्सर सोचता हूँ इंसान ने जब पहली बार कपड़ा कब पहना होगा तो क्यों पहना होगा  ?" अजय ने कहा " क्यों पहना होगा.. अरे जब उसे नंगा घूमता हुआ देखकर किसीने टोका होगा तब पहना होगा और क्या । " अशोक हम लोगों के कुछ देर बाद नहाकर आया था और जल्दी के चक्कर में अभी तक गीले बदन ही था । उसने कांपते हुए कहा "अरे..जब ठण्ड लगी होगी तब पहना होगा और क्या ।" "नहीं भाई ।" मैंने दोनों महानुभावों की बात को नकारते हुए कहा  " उस समय नंगेपन को छुपाने के लिए कपड़ा पहनने का कोई कॉन्सेप्ट नहीं था न ही ठण्ड से बचने के लिए भालू की खाल या पेड़ की छाल पहनने का कोई सवाल था, यह काम तो वह शुरू से ही करता आ रहा था  । यह सवाल बुने हुए कपड़े के बारे में हैं । यानि पहला कपड़ा तो तब ही पहना गया होगा जब बुना गया होगा ।" 


"और बुना कब गया होगा ?" अजय ने सवाल किया । मैंने कहा "अभी मैंने तुम लोगों को स्वित्ज़रलैंड की उस झील के बारे में बताया था ना, उसी झील के तल से सन या जूट के कपडे का एक टुकड़ा मिला है । उस टुकड़े पर भी झुलस जाने के कारण हलकी सी एक कोयले की परत चढ़ गई थी जिसने उसे भविष्य के लिए संरक्षित कर दिया । इसके अलावा कुछ गुफाओं में भी सन के कपडे के अवशेष मिले हैं । जार्जिया की एक गुफा में तो रंगे हुए सन के कपडे का टुकड़ा मिला है जिसका काल छत्तीस हज़ार साल पहले का माना जा रहा है ।" 


"इसका मतलब यह हुआ कि काफी साल पहले इंसान ने कपड़ा बनाना सीख लिया था ?" अजय ने कहा । "बनाना नहीं बे, बुनना ।" रवीन्द्र ने अजय की  हिंदी सुधारते हुए कहा । "हाँ भैया बुनना सही, मुझे जो आसान लगा वह कह दिया । वैसे भी कपड़ा बनाना हो या बुनना एक ही बात है ।" अजय ने खीझते हुए कहा । "एक ही बात कैसे है ?" रवींद्र भाषा के अशुद्ध प्रयोग पर ज़रा आक्रामक हो उठा था । " सही शब्द का तो इस्तेमाल किया करो ..बुनना सही शब्द है ।  और सुनो.. बोलना आसान है लेकिन  कपड़ा बुनना कोई आसान काम नहीं है । उसके लिए करघे की आवश्यकता होती है ।" "तो इसका मतलब यह हुआ कि इंसान ने पहले करघा बनाया उसके बाद कपड़ा बुनना सीखा ?" अजय ने रवींद्र की नसीहत को नज़रंदाज़ करते हुए तपाक से सवाल किया । 


"नहीं ऐसा नहीं है मेरे भाई ।" रवींद्र ने अपने माथे पर हथेली मारते हुए कहा । " करघे का आविष्कार तो बहुत बाद की बात है । सबसे पहले उसने लकड़ी की एक फ्रेम में तानाबाना डालकर हाथ से ही कपड़ा बुना होगा । जैसे पहले उसने लकड़ी की चार पट्टियाँ जोड़कर एक फ्रेम बनाई । फिर उस फ्रेम में उसने ऊपर से नीचे खड़े खड़े कपड़े की लम्बाई वाले  धागे डाल दिए, यह ताना हो गया । फिर आड़े धागे को हाथ से उन लम्बाई के धागे के बीच से आगे पीछे करते हुए निकाला यह बाना हो गया ।" "वाह ताना- बाना , ताना- बाना ,ताना-बाना ताना-बाना ..कितना अच्छा शब्द है ऐसा लगता है कोई कविता गा रहे हों ।" अजय ने बच्चे की तरह खुश होते हुए कहा । रवींद्र का गुस्सा अब तक समाप्त हो चुका था  " हाँ, इस तरह ताना-बना डालकर उसने उसी तरह कपड़ा बुना जैसे अभी जुलाहे कपड़ा बुनते हैं  । हालाँकि वे अब करघे का इस्तेमाल करते हैं जो उसी प्राचीन चौखटे का आधुनिक वंशज है । हाथ से बुने इस कपड़े को ही  हैंडलूम कहा जाता है ।"


इस बीच हम लोग तैयार होकर नाश्ता करने के लिए भोजनशाला तक आ चुके थे । "लेकिन असली सवाल तो यह है कि उसने धागा कैसे बनाया होगा?" अजय ने एक आलूबोंडा अपनी प्लेट में रखते हुए कहा । "हाँ यह भी सही सवाल है ।" मैंने कहा । "कल मैंने बताया था ना कि जब उस आदिम मनुष्य ने अपनी पशुपालक और कृषक अवस्था में धरती में बीज बोने शुरू किये तो उसने अनजाने में सन के भी कुछ बीज बो दिए । जब पौधे बड़े हुए तो उसमे से रेशे जैसे निकलने लगे । फिर उसने उन रेशों से कुछ प्रारंभिक प्रयोग किये  और कपड़ा बुनने के लिए उनका उपयोग करना शुरू किया । इसके लिए वह सन के पौधों को जड़ सहित उखाड़ता था । फिर सन को सुखाया जाता, धोया जाता, फिर इस सन को कूटा जाता पीटा जाता, हड्डी की दांतेदार कंघी से सुलझाया जाता और इस तरह अंत में  सन का धागा तैयार हो जाता बस फिर लकड़ी की फ्रेम पर उनका ताना बाना डालकर कुछ समय में कपड़ा तैयार कर लिए जाता ।  


"लेकिन कपड़ा क्या ऐसे ही ओढ़ लिया जाता था ?" अजय ने पूछा । "उन्हें सिला नहीं जाता था क्या ?" "अरे बावले ।" रवीन्द्र ने कहा । " सीना तो वह पहले से ही जानता था , हड्डी की सुई तो उसके प्रारंभिक औजारों में थी ही जिससे वह पशुओं की खाल और पत्ते सीता था अब यही सुई कपड़ा सीने के काम में आने लगी ।" "लेकिन यार वह लम्बा कपड़ा कैसे बुनता होगा उसके लिए तो लम्बे धागे की ज़रूरत होती है ? "अजय के सवालों से ऐसा लग रहा था जैसे हम आर्क्यालोजी की नहीं बल्कि टेक्सटाइल की ट्रेनिंग में यहाँ आये हैं । मैंने धैर्यपूर्वक उसकी बात का जवाब दिया "भाई, शुरू में धागे की लम्बाई कम होती थी इसलिए उसने छोटे कपड़े बुने और उन्ही को जोड़ जोड़कर बड़ा कपडा बनाया बाद में फिर जब तकली नुमा किसी चीज का आविष्कार हुआ और उसने रेशे को धागे में बदलते हुए लम्बे लम्बे धागे भी कात लिए । इस तरह उसने एक जैसे बड़े बड़े कपड़े बनाने शुरू किये ।" 


अजय ने अपनी प्लेट रखी और एक डकार लेते हुए कहा "भाई, एक जैसे कपड़ों से तो वह बोर हो जाता होगा और उस समय जब स्त्रियों को अलग अलग डिजाइन वाली साड़ियों की ज़रूरत होती होगी तो वे क्या करती होंगी ? इस विधि से तो एक ही डिज़ाइन और एक ही कलर की साड़ियाँ बनती होंगी ना ?" अजय के सवाल पर रवीन्द्र ठहाका मार कर हँस दिया "देख लो इस भाभी के भैये को, आटे -दाल का भाव पता चलने के साथ आखिर चोली और साड़ी का भाव भी पता चल ही गया । कितनी बार साड़ियाँ खरीदकर दी यार तैने भाभी को ?" "में कहाँ से दूंगा यार .. में कोई कमाता हूँ क्या ? अभी तो में स्टूडेंट हूँ वो सब पिताजी ही खरीदकर देते हैं ।" अजय ने भोली सी सूरत बनाते हुए कहा । 


मैंने गंभीरता से रवींद्र की ओर देखा और कहा "नहीं.. अजय का सवाल सही है । परिवर्तन की चाह तो सबको होती है । आज वस्त्र उद्योग में जो क्रांति हुई है,भांति भांति के वस्त्र आये हैं  उसके पीछे उसी मनुष्य का श्रम ,आवश्यकता और परिवर्तन की आकांक्षा है । उस समय भी स्त्रियों को ही क्यों पुरुषों को भी रंगीन कपड़े पहनने और सजने संवारने की इच्छा होती होगी, सो उन्होंने फिर प्राकृतिक वस्तुओं, पेड़-पौधों, पत्तियों, जड़ों चट्टानों आदि से रंग बनाये होंगे और अपना बुना हुआ कपड़ा भी रंगा होगा । नील के पौधे की खोज भी इसी सिलसिले में हुई होगी । फिर जैसे कि वह चट्टानों पर चित्र उकेरता था वैसे ही उसने कपड़ों पर भी चित्र बनाए होंगे ।"


अजय खुश हो गया .." भाई आप बड़े अच्छे हो, मेरी प्राणरक्षा कर लेते हो । " फिर वह रवींद्र से मुख़ातिब हुआ "यार कितना अच्छा हो कि हमें आज ट्रेंच में कपडे का कोई टुकड़ा मिल जाए ।" "नहीं ।" मैंने कहा " ऐसा होना असम्भव तो नहीं लेकिन आसान भी नहीं है क्योंकि कपड़ा और लकड़ी ऐसी वस्तु हैं जिनका ज़मीन के भीतर या बाहर कई हज़ार साल टिके रहना मुश्किल है । यह उसी स्थिति में संभव है जब कपड़े पर कोयले की कोई परत चढ़ी हो अथवा लकड़ी जीवाश्म या फॉसिल में बदल कर चट्टान हो गई हो । यहाँ आगजनी हुई हो इस बात के भी कोई आसार नज़र नहीं आते हैं । हालाँकि सन या लिनेन के अवशेष मिल सकते हैं इसलिए कि यह काफी टिकाऊ होता है । विदेशों में बाद के समय में इसके बहुत सारे अवशेष मिले है । तुतेनखामन की कब्र में भी लिनेन के परदे मिले हैं ।"


इतने में बाहर से डॉ वाकणकर की आवाज़ सुनाई दी... "सज्जनों.. क्या बात है आज अभी तक निकले नहीं भोजनशाला से बाहर, चलो जल्दी ट्रेंच पर पहुँचो ।" हम लोगों ने जल्दी जल्दी हाथ धोये और लगभग दौड़ते हुए ट्रेंच पर पहुँच गए । रवीन्द्र सबसे आगे था । उसने दूर से देख लिया कि मजदूर आ गए हैं और ट्रेंच के आसपास सफाई के काम में लगे हैं । उसने मुड़कर मेरी ओर देखा और गाना गाना शुरू कर दिया .. "हवा में उड़ता जाए मोरा लाल दुपट्टा मलमल का जी मोरा  लाल दुपट्टा मलमल का ओ जी ओ जी .. मैं समझ गया वह मुझे छेड़ने के लिए ऐसा कह रहा है .. मेरी निगाह ट्रेंच के पास खड़े मज़दूरों पर जा  पड़ी । मागो काम पर लौट आई थी और लाल दुपट्टा ओढ़े हुए थी । सुबह की सुनहली धूप में उसमे जड़े सितारे छोटे छोटे सूरज होने का भान करते हुए दूर से ही चमक रहे थे ।


मैंने ट्रेंच पर पहुँचकर मागो को मौसी बनने की बधाई दी । रवीन्द्र ने कहा ' मागो सोंठ के लड्डू नहीं लाई ? मागो ने कहा "लाऊंगी ना साहब, अभी तो बने ही नहीं हैं ।" "ज़रूर लाना ।" रवींद्र ने कहा "हमारे शरद भैया को बड़े अच्छे लगते हैं ।" मैंने कहा "मेरा नाम क्यों ले रहा है भाई, तुझे  भी तो अच्छे लगते हैं ।" मागो ने कहा "आप लोग हमारे घर आइयेगा तब खिलाऊँगी ।" मैंने रवीन्द्र से कहा  "ले भाई अब तो तुझे भी मागो ने घर आने का निमंत्रण दे दिया है । अब मुझे मत कहना ।" रवीन्द्र ने कहा "हाँ आयेंगे ना.. लेकिन और क्या खिलाओगी ?" मागो ने मेरी ओर इशारा करते हुए कहा "जो ये साब कहेंगे वह खिलाऊँगी ।" रवीन्द्र ने मेरी ओर देखकर भौंहे उचकाईं और हँस पड़ा .. "देख ले मैं क्या गलत कह रहा था.. तेरा जादू चल पड़ा है ..।" मागो की कुछ समझ में नहीं आया, उसने घमेला उठाया, छन्नी के पास पड़ी मिटटी उसमे भरी, सिर पर पड़ा दुपट्टा ठीक किया, घमेला सिर पर रखा और मिट्टी फेंकने के लिए टीले के दूसरी ओर चली गई ।


रात उसी तरह आई जैसे कि रोज़ आती थी । बिस्तर में घुसने से पूर्व कुछ देर हम लोग तम्बू के बाहर पसरकर बैठ गए । अशोक ने लेटे हुए एक नज़र आसमान की और डाली । यह बढ़ते हुए चाँद के दिन हैं और आसमान में चाँद लगभग आधा हो चुका था । " यार आज तो चाँद आधी पूड़ी की तरह दिखाई दे रहा है उसने कहा । मैं समझ गया, भाटीजी ने आज डिनर में पूड़ी और आलू की रसेदार सब्ज़ी बनाई थी यह उसीका असर है । कुछ देर बाद हम लोग तम्बू में प्रवेश कर गए । बिस्तर पर अधलेटी मुद्रा में मैं दिन के काम के बारे में सोचने लगा  । अजय की बात कहीं अवचेतन में विद्यमान थी । आज ट्रेंच पर उत्खनन करते हुए भी हम लोग सोच रहे थे काश .. लिनेन या सन से बुने कपडे का कोई अवशेष किसी हंडिया में रखा हुआ मिल जाए । लेकिन ऐसा तो केवल काल्पनिक कथाओं में होता है कि सोचने मात्र से कोई वस्तु मिल जाये । मैंने रवीन्द्र से कहा "यार यहाँ आभूषणों में प्रयुक्त किये जाने वाले मनके तो काफ़ी मिल रहे हैं लेकिन यह लोग वस्त्र किस तरह के पहनते थे इसका कोई संकेत अभी तक नहीं मिल पाया है । कहीं ऐसा तो नहीं कि शालभंजिकाओं की भांति आभूषणों से ही तन ढंकते हों ।" 


रवीन्द्र मेरी बात सुनकर हँस दिया " तू तो पगला गया है कुषाण शिल्प की नारी प्रतिमाओं पर रिसर्च करते हुए । वैसे भी शालभंजिकाएं महीन सा वस्त्र तो पहनती ही थीं और वह  तो बहुत बाद की बात है यहाँ का काल तो उससे भी पहले का है ।" अजय हम लोगों की अकादमिक बातों से बोर हो रहा था । वैसे भी आज उसने हम लोगों को बहुत बोर किया था और अभी भी कुछ कुछ ऐसे ही मूड में था । हमारी बात सुनकर उसने कहा  "मुझे तो सपने में दिखाई दिया है कि यहाँ के लोग धोती पहने हुए हैं.. क्या पता कल कोई धोती किसी संदूक में रखी हुई मिल जाए " " रहने दे.. रहने दे । तेरा सपना सच नहीं होने वाला ।" रवींद्र ने कहा । "अरे नहीं यार, सपने सच होते हैं ..।" अजय बहुत उत्साहित था ।.."हमारे गाँव में ऐसा ही हुआ था । एक पान की दुकान वाले को सपना आया कि उसकी दुकान के पीछे ज़मीन में शंकर जी की पिंडी गड़ी हुई है फिर एक सप्ताह तक लोगों को वो बताता रहा और एक दिन ऐसा चमत्कार हुआ कि वह पिंडी अपने आप ऊपर आ गई ।


मैंने कहा "अरे यह कोई चमत्कार वमत्कार नहीं है । हमारे यहाँ भी लोग ऐसा ही करते हैं । कई पाखंडी और बदमाश लोग ज़मीन के ज़रा सा नीचे कोई मूर्ति दबा देते हैं फिर उस पर धनिया या मेथी बो देते है और रोज़ पानी छिड़कते हैं । कुछ दिनों बाद जब पौधे निकलते हैं तो उनके साथ मूर्ति भी बाहर निकल आती है, फिर उसका पूजा पाठ शुरू हो जाता है । इस तरह से अन्द्धविश्वास चलते रहते हैं । ज़रूर उस पान की दुकान वाले को अपनी दुकान के पीछे की ज़मीन हथियानी होगी इसलिए उसने ऐसा खेल खेला । आजकल नाजायज़ ज़मीन पर कब्ज़ा करने के लिए लोग ऐसे ही झूठ का सहारा ले रहे हैं ।"


अजय ने कहा " हो सकता है आज के लोग बेईमान हों लेकिन पहले के लोगों के पास कुछ चमत्कारिक शक्ति अवश्य थी । ऐसे ही हमारे गाँव में हिमालय से एक साधू आये थे उन्होंने मन्त्र की शक्ति से यज्ञ कुंड में आग लगाकर बताई थी ।" मैं जोर से हँसा  .."अरे यह भी कोई चमत्कार नहीं है । ऐसे पाखंडी लोग यज्ञ में लकड़ी या हवन सामग्री के ऊपर पोटेशियम परमैन्ग्नेट रख देते हैं । फिर कहते हैं देखो हमारे पास कामधेनु गाय का घी है जो वास्तव में घी जैसा दिखाई देने वाला ग्लीसरीन होता है । जैसे ही वे लकड़ी पर उस ग्लीसरीन रूपी घी को डालते है पोटेशियम परमैन्ग्नेट पर ग्लीसरीन की रासायनिक क्रिया होती है और आग पकड़ लेती है । इस बीच वे मंत्र भी पढ़ते रहते हैं तो लोगों को लगता है यह मंत्रशक्ति से हुआ है  । ऐसे ही सोडियम पर जल छिड़कने से भी आग उत्पन्न होती है। तुम्हे ख्याल होगा स्कूल में विज्ञान प्रयोगशाला में इसीलिए सोडियम को मिटटी के तेल में डुबाकर रखा जाता था । "


अजय ने कहा " अच्छा ऐसी बात है क्या ? और हाँ मुझे याद आया ऐसे ही एक बाबा और आये थे उन्होंने हवा से भभूत निकाली थी और साईं बाबा की फोटो से भभूत निकाली थी ।" मैंने कहा " यह भी कोई चमत्कार नहीं है । हवा से भभूत निकलने के लिए वे अपनी हथेली में अंगूठे और तर्जनी के बीच भभूत की टिकिया बनाकर रख लेते हैं जो किसी को दिखाई नहीं देती । फिर हवा में हाथ उठाकर सफाई से उसे मसलकर राख़ कर लेते हैं और सबको बाँट देते हैं । वैसे ही फोटो से भभूत निकालने के लिए वे उसकी एल्युमिनियम की फ्रेम पर सिल्वर क्लोराइड का सफ़ेद पाउडर लगा देते हैं इन दोनों की रासायनिक क्रिया से भभूत जैसा पदार्थ निकलता रहता है ।"


"मतलब इसमें कोई चमत्कार नहीं है ?" अजय ने पूछा । "हाँ ।" मैंने कहा "जो भी चमत्कार जैसा दिखाई देता है उसके पीछे हाथ की  सफ़ाई ,उपकरण की बनावट या किसी रासायनिक वस्तु का प्रयोग ही होता है । जादूगर भी ऐसे ही जादू दिखाते हैं लेकिन वे इसे कला कहते हैं, चमत्कार कहकर लोगों का शोषण नहीं करते ।" लेकिन हमारे यहाँ धर्मग्रंथो में भी तो कितनी चमत्कारिक बातें लिखी हैं उनमें कुछ तो सच होगा ?" अजय ने सवाल किया ।


अशोक काफी देर से हम लोगों की बातें सुन रहा था । उसने कहा .." क्या यार अजय तू भी .. अरे उसमें इतनी सारी बातें काल्पनिक हैं कि उन पर विश्वास हो ही नहीं सकता । उस ज़माने में लोगों की धर्म और ईश्वर पर आस्था उत्पन्न करने के लिए कुछ चालाक और लम्पट किस्म के लोगों द्वारा ऐसी बहुत सी कथाएँ गढ़ी गई थीं । उनके अनेक सामाजिक कारण हो सकते हैं किन्तु वे सब बातें सच हों यह बिलकुल ज़रूरी नहीं है । हमें इन धर्मग्रंथों से उतना ही ग्रहण करना चाहिए जितना हमारे काम का है । चलो अब सो जाओ आज बहुत थक गए हैं ।" 


मैंने एक नज़र राममिलन भैया पर डाली। वे और किशोर दा काफी पहले ही तम्बू में आकर नींद के आगोश में जा चुके थे। मैं सोच रहा था कि वे अगर जागते रहते तो उन्हें अन्द्धश्रद्धा निर्मूलन वाली इन बातों में बहुत आनंद आता और उन्हें छेड़कर थोड़ा बहुत आनंद हमें भी मिलता । मगर ये न थी हमारी किस्मत .. खैर फिर तो कोई चारा नहीं था सोने के सिवाय ।


*शरद कोकास*