सोमवार, 25 मई 2026

17.पाँच हज़ार साल पहले के ब्यूटी पार्लर की तलाश

📓  *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📓

✍🏼 *शरद कोकास* ✍

*अब तक आपने पढ़ा* कि विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के छह छात्र उत्खंनन हेतु दंगवाड़ा  नामक स्थान पर पहुँचे हैं । सातवें दिन की सुबह हो चुकी है और वे ट्रेंच पर जाने के लिए  तैयार हो रहे हैं । रोज़ ही उनकी बातों में नए नए विषय शामिल हो रहे हैं । आज आप पढेंगे कि कैसे मूर्तियों की पहचान न होने के कारण लोग किसी भी देवता की मूर्ति को अन्य कोई मूर्ति मानकर पूजा करते हैं । ज़मीन के भीतर से निकली वस्तुओं के आधार पर कैसे अन्य बातें तय की जाती हैं आदि आदि । उम्मीद है इसे पढ़ते हुए इन युवाओं के साथ आपको भी मज़ा आ रहा होगा ..आ रहा है ना ? चलिए आगे पढ़ते हैं .... *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 

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1⃣7⃣ *भाग सत्रह* 1⃣7⃣

💄 *ताम्राश्मयुगीन ब्यूटी पार्लर की तलाश* 💄

"बस बस संवर गईं तेरी ज़ुल्फे ।" रवींद्र ने मुझे आईने के सामने से हटाते हुए कहा " अब मुझे भी थोड़ा सा कंघी-वंघी करने देगा या नहीं ? वैसे भी तुझे क्या ज़रूरत.. तेरे बाल बिखरे हों या संवरे वह तो तुझे ही देखती रहती है.."

 "ले भाई " हम लोगों के बीच उपस्थित एकमात्र आईने के सामने से हटते हुए मैंने कहा "तू भी कर ले, अब मुझे क्या पता था वर्ना मैं भी एक आइना ले आता ।" "तुझे लाने की क्या ज़रूरत , उसकी आँखों में झाँक कर कंघी कर लिया कर ..मैं संवारूंगी तुझे आइना हूँ मैं तेरा " रवींद्र की छेड़खानी चल ही रही थी और मैं उसके छेड़ने का मज़ा ले रहा था । " 

"या फिर उससे कह देना कल तेरे लिए एक आइना लेती आयेगी ।" " बस कर यार ।" मैंने कहा "हालत देखी है उसकी, उस के घर में बमुश्किल एकाध आईना होगा, मुझे दे देगी तो फिर खुद कंघी चोटी कैसे करेगी ?" 

"चलो ना यार ।"बाहर से अशोक की आवाज़ आई " नाश्ता नहीं करना क्या ,ज़ोरों की भूख लग रही है .. एक ठो छोरी है सब उसके चक्कर में लगे रहते हैं ।" "आ रहे हैं भाई, क्यों नाराज़ हो रहा है " मैंने तम्बू से बाहर निकलते हुए कहा । 

मुझे देखकर अशोक मुस्कुराया । उसके गुलाबी होंठ और ज़्यादा गुलाबी हो उठे "तेरे तो अलग ही जलवे हैं बाबू ..कईं लफड़ा -वफड़ा मत कर बैठना ..इस साल भी तुझे टॉप करना हे कि नई ?" 

"नहीं करूँगा भाई भरोसा रखो..दंगवाड़ा में कोई प्रेम कहानी जन्म नहीं लेगी .." "फिर ठीक है ।" अशोक ने गरम गरम भजिया मुँह में डालते हुए कहा "वर्ना गुरूजी तेरे साथ हम सबका भी कोर्ट मार्शल कर देंगे ।" 

नाश्ता करके हम लोग सीधे टीले पर पहुंचे । ट्रेंच क्रमांक चार हमारी राह देख रही थी । हमारी यह ट्रेंच मुख्य ट्रेंच से लगी हुई ही थी इसलिए हमें अलग से मज़दूर नहीं दिए गए थे आवश्यकतानुसार हम उन्हें बुला लेते थे । यह ट्रेंच हम लोगों के नाम से अलाट की गई थी और यहाँ प्राप्त वस्तुएँ हमारी उपलब्धि में शामिल होने वाली थीं इसलिए हमारी ज़िम्मेदारी और बढ़ गई थी । 

सुबह की खिली खिली धूप बहुत भली लग रही थी और हम लोग उसका मज़ा लेते हुए काम शुरू कर ही रहे थे कि देखा पास के शिव मंदिर तक आने वाले कुछ दर्शनार्थी हमारी ट्रेंच का दर्शन करने भी आ गए । 

"भैया कोई भगवान की मूर्ति नहीं मिली क्या ?" उनमें से एक ने सवाल किया । " मूर्ति तो नहीं मिली भाई ! " रवींद्र ने कहा " और मिल भी जाये तो तुम्हें थोड़े ही देंगे, तुम लोग तो दंगवाड़ा के चौक पर ले जाकर उसकी स्थापना कर दोगे और उसकी पूजा करने लगोगे ।  " भानपुरा की तरह ।" मैंने रवीन्द्र की ओर देखकर हँसते हुए कहा ।  

रवीन्द्र बोला ” हाँ ,इन लोगों का क्या भरोसा वैसे ही करने लगें जैसे कुबेर की पूजा हमारे यहाँ अन्नपूर्णा माता के रूप में करने लगे थे । “ 

“ ये क्या किस्सा है ? ” अजय ने सवाल किया । “अरे वो बड़ा मज़ेदार किस्सा है ।“ मैंने कहा “दीपावली अवकाश से पूर्व मैं रवीन्द्र के साथ उसके गाँव भानपुरा गया था, सुबह सुबह जब  हम लोग घूमने निकले तो देखा एक चौक पर बहुत भीड़ लगी है ,मैंने रवीन्द्र से पूछा यहाँ क्या हो रहा है तो उसने बताया कि यहाँ अन्नपूर्णा माता की पूजा हो रही है । 

करीब जाकर मैंने देखा तो अन्नपूर्णा माता जैसी कोई प्रतिमा नहीं थी बल्कि वहाँ कुबेर की मूर्ति रखी थी तुन्दिल काया, कानों में बड़े बड़े कुंडल, हाथ में धन की थैली और लोग उसी की पूजाकर रहे थे । मैंने कहा "कहाँ है अन्नपूर्णा? तो रवीन्द्र ने कहा " बस यही है ..इसीको लोग अन्नपूर्णा माता कहते हैं ।" 

मेरी हँसी रुक नहीं रही थी मैंने हँसते हुए रवीन्द्र से कहा “ रविंदर ..यह तो कुबेर है, इसकी पूजा अन्नपूर्णा के रूप में ?  ” तो रवीन्द्र ने मेरे मुँह पर हाथ रखा और कहा  “ धीरे बोल, अगर कोई सुन लेगा तो बहुत मार पड़ेगी ।" फिर हम लोग उसे नज़र अंदाज़ करते हुए आगे बढ़ गए । 

"लेकिन यार रवींद्र " अजय ने कहा " तू तो वहाँ बचपन से रह रिया है तूने कभी मना नहीं किया ?" रवीन्द्र ने ठंडी साँस भरते हुए कहा .."अब क्या करें लोगों ने कुबेर को अन्नपूर्णा माता मान लिया है तो मान लिया , उनको पूजा से मतलब । भले ही हम प्रतिमा शास्त्र के ज्ञाता हैं अगर इसे कुबेर बताकर पूजा करने से रोकेंगे तो फालतू का बवाल खड़ा हो जाएगा ।“ 

शिवजी के दर्शन करने आये ग्रामीण भी वहाँ खड़े हुए हमारी बात सुन रहे थे लेकिन उन्हें हमारी बात कुछ समझ में नहीं आई और वे चुपचाप वहाँ से खिसक लिए ।

हम लोगों ने धीरे धीरे ट्रेंच में उत्खनन शुरू ही किया था कि रवीन्द्र की ख़ुशी से भरी आवाज़ सुनाई दी ..“अरे यह तो सूरमा लगाने की सींक है । " उसके हाथों में ताम्बे की एक सींक थी और आँखों में चमक । वह हँसते हुए बोला “ ज़रूर उस ताम्राश्म युग में यहाँ कोई ब्यूटी पार्लर रहा होगा ।“ 

“चुप ।“ अजय ने उसे डाँटते हुए कहा “ यह किसी के घर में रही होगी , फिर तो यह पैर घिसने का पत्थर देख कर मैं भी कह सकता हूँ कि यहाँ उस ज़माने का हम्माम रहा होगा ।“ 

राममिलन भैया दूर बैठे हम लोगों की बातें सुन रहे थे । वहीं से चिल्लाकर बोले “भैया अभी से काहे आसमान सर पर उठाये हो जब कौनो चड्डी बनियान, साबुन-वाबुन मिल जाए तब बताना ।“ 

किशोर ने राम मिलन को छेड़ना शुरू किया “राममिलन तुम खुद तो कुछ करते नहीं हो बस बैठे - बैठे कमेंट करते रहते हो ।“ डॉ.आर्य हम लोगों की गूटर- गूँ सुन रहे थे, बोले “ ठीक तो कह रहा है राम मिलन ,इतनी जल्दी किसी परिणाम पर नहीं पहुँचना चाहिये, जब तक अन्य पूरक सामग्री न प्राप्त हो जाए  हम इतिहास विषयक कोई धारणा नहीं बना सकते । ऐसा बिलकुल ज़रूरी नहीं है कि नाल मिल गई है तो घोड़ा मिल ही जाएगा । वैसे भी यह धातु थी इसलिए बची रह गई, हो सकता है सुरमादानी लकड़ी-वकड़ी की बनी हो इसलिए नष्ट हो गई हो ..इसलिए कि उस काल के कपड़े लकड़ी इत्यादि तो पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं ।“

"हाँ सर सुरमादानी तो लकड़ी की ही होगी जैसे कि आजकल हमारे घरों में सिंदूरदान होता है ।" अजय ने सर की बात का समर्थन करते हुए कहा । फिर वह उछलकर बोला " मेने भी ना सर, अपनी शादी में अपनी पत्नी की माँग लकड़ी के सिंदूरदान  से भरी थी ।" 

"बेटा अपनी शादी में अपनी पत्नी की ही मांग भरते हैं .." रवीन्द्र ने हँसते हुए कहा .." ओर तेरे ससुर ने जो सोने की सींक दी थी मांग भरने के लिए वो नहीं बताएगा ..?" क्या रवींद्र भैया आप भी .." अजय ने थोड़ा शर्माते हुए कहा .." वो तो बाती मिलाई में दी थी , मांग तो चांदी की सलाई से भरी थी ।"

"बस बस " आर्य सर ने कहा " अब अपनी पोल खुद मत खोलो ।" इस थोड़े बहुत हँसी मज़ाक के बाद हम लोग फिर गंभीर हो गए अब अशोक की बारी थी .."सर ,मेरे मन में अक्सर एक सवाल आता है । " उसने  कहा । " आप कह रहे हैं कि आदिम मानव जो कपड़े पहनता था वे पूरी तरह नष्ट हो गए फिर हम अभी जो आदिम मानव के चित्र देखते हैं कि वह जानवरों की खाल के कपड़े पहने है या बाद के मनुष्य के रंगबिरंगे कपड़े देखते हैं वे तो उत्खनन में कहीं मिले नहीं फिर क्या यह सिर्फ कल्पना है ? " अशोक  ने बहुत सही सवाल किया था और हम प्रशंसा भरी निगाह से उसकी ओर देख रहे थे ।

सर ने कहा " तुम्हारा यह सवाल वाजिब है । कपड़े ज़मीन के भीतर नष्ट हो जाने वाली वस्तु है । हमारी चमड़ी और मांस की भांति  उन पर होने वाली अनेक रासायनिक क्रियाओं के कारण या कीड़े मकोड़े ,दीमक आदि की वज़ह से उनका नष्ट हो जाना स्वाभाविक है ।लेकिन पुरातत्ववेत्ताओं को कुछ ऐसी सामग्री मिली है जिनके आधार पर यह तय किया गया कि आदिम मनुष्य वस्त्र धारण करते होंगे, जैसे हड्डी की सुइयाँ और बाद के समय में कुछ ऐसी वनस्पतियाँ जिनसे कपड़े रंगे जाते होंगे । 

हिमयुग के बाद के नियेंडरथल मनुष्य के भीतर यद्यपि उस समय की शीत सहन करने की क्षमता थी लेकिन वह अपने आप को बचाने के लिए जानवरों की खाल पहनता था , शुरूआती दौर में भले उसे सीना न आता हो लेकिन बाद में हड्डी की सुई और पौधों के रेशों से उसने सीना सीख लिया । बाद के दौर में जब प्राकृतिक रेशों से उसने कपड़े का आविष्कार किया तब उसके जीवन में क्रांति हो गई ।"

खुदाई करते हुए दोपहर तक हम लोग पचपन सेंटीमीटर गहराई तक पहुँच गए । ट्रेंच की उपरी सतह में 'पेग क्र.दो' से 'पेग क्र. दो बी' के बीच 'दो मीटर बाय दो मीटर' के क्षेत्र में कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण ऑब्जेक्ट हमें प्राप्त हुए जिनमें पैर घिसने का एक पत्थर, सुरमा लगाने की एक ताम्र शलाका, मिट्टी का बना आग में पकाया हुआ एक पात्र तथा मनका शामिल है । 

लेकिन हमें सर की बात सिद्ध करनी थी अतः पूरक सामग्री ढूँढने के उद्देश्य से हम लोगों ने दोपहर के भोजन के बाद दक्षिण की ओर दो बाइ दो मीटर के हिस्से में भी चार सेंटीमीटर खुदाई कर डाली । पर अफ़सोस उसमें भी हमें कोई महत्वपूर्ण ऑब्जेक्ट नहीं मिला । 

राम मिलन भैया टेरीकॉट का टाइट पैंट पहने और धूप का काला चश्मा लगाए एक पत्थर पर बैठे हुए थे और हमारी मेहनत को अकारथ जाते देख प्रसन्न हो रहे थे, हँसकर कहने लगे  “ का हो अजयवा .. चड्डी बनियान मिला कि नहीं तुम्हारे पुरखों का ..ढूँढो ढूँढो, मोहनजोदाड़ो की तरह छोटा-मोटा नहाने का बाथरूम यहाँ भी मिलेगा । अभी एड़ी घिसने का पत्थर मिला है ना , कुछ देर में साबुन भी मिलेगा, टुथपेस्ट और ब्रश  भी मिलेगा और गाँव की गोरी के बालों को धोने वाला रीठा छाप शंपू भी मिलेगा ।“ किशोर भैया मन ही मन गुस्सा हो रहे थे , धीरे से बोले  “ ई पंडितवा बहुतै बकबक कर रहा है ..इसको मज़ा चखाना ही पड़ेगा । “   

हमारी असफलता के बावज़ूद डॉ.आर्य ने हम लोगों को दिलासा देते हुए कहा “ कोई बात नहीं अगर कुछ नहीं मिला । पुरातत्ववेत्ताओं के साथ अक्सर ऐसा होता है कि कई कई दिन मेहनत करने के बाद भी उनके हाथ कुछ नहीं लगता । यहीं उनके धैर्य की परीक्षा होती है । जो अधीर होते हैं वे आधी-अधूरी जानकारी के साथ गलत रिपोर्ट दे देते हैं और इस तरह गलत इतिहास रचने में अपना योगदान देते हैं  । कई बार उन पर गलत रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए  भी दबाव डाला जाता है । कई प्रकार के लोभ लालच भी दिये जाते हैं । यह कहने के लिए बाध्य किया जाता है कि बता दो यह यह मिला है , लेकिन जो सच्चे पुरातत्ववेत्ता होते हैं वे सच्चे देशभक्त की तरह होते हैं, वे किसी के भी आगे झुकते नहीं ।" 

शाम हो चुकी थी और हम लोग आज का कार्य समाप्त करने ही जा रहे थे कि डॉ.वाकणकर का आगमन हुआ । “ कैसा लग रहा है दुष्टों ?” उन्होंने हमारे मुरझाये चेहरों की ओर देखकर पूछा । हमने उन्हें अपनी उपलब्धियों और असफलताओं से अवगत कराया । 

सर अवशेषों के करीब बैठ गए और उनका निरीक्षण करते हुए बोले “असफलताओं को छोड़ो, हम उपलब्धियों पर बात करते हैं । यह जो अलग अलग कालखंड के मिश्रित रूप में अवशेष यहाँ मिल रहे हैं इनसे यह तो तय होता है कि यहाँ मिश्रित संस्कृति रही होगी । कई बार ऐसा होता है कि किसी एक सतह से किसी एक संस्कृति के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते । सो उतनी चिंता की बात नहीं ।" 

फिर उठते हुए उन्होंने कहा  "ठीक है, चलो,अब हम इन अवशेषों को लेकर शिविर में चलते हैं । अब हम सबसे पहले इन प्राप्त अवशेषों को तम्बू में ले जाकर साफ करेंगे फिर यह किस स्थिति में, किस लेयर में, कितनी गहराई में मिले, इनके साथ और कौन - कौन सी वस्तुएं मिलीं आदि जानकारी का टैग लगाकर इन्हें सावधानी पूर्वक सीलबन्द करेंगे । इसलिए तुम लोगों को भी यह नाप- वाप ध्यान में रखना है । यह सब कॉपी में नोट करते हो या नहीं ? “ “हाँ सर, आर्य सर ने बताया था सो हमने कॉपी में यह सब  विवरण दर्ज कर लिया है । ” रवीन्द्र ने कहा । " वेरी गुड ,अब चलो " सर ने कहा ।

हम लोग तमाम अवशेष ,अपनी वही और औज़ार उठाकर सर के तम्बू में आ गए । सर ने वहाँ रखे ब्रश उठाये और अवशेषों से धूल हटाने लगे  । एक मनके को फूँक से साफ़ करते हुए देख कर अजय ने सवाल किया “ सर इन्हें साफ़ कर सीलबंद कर और टैग लगाकर तो हम रख देंगे लेकिन इसके बाद इन अवशेषों का क्या होगा ? 

सर ने कहा “ अरे, इतनी सी बात तुम्हें नहीं मालूम, इसके बाद उत्खनन की रिपोर्ट लिखते समय इस सामग्री की और इस विवरण की ज़रूरत होती है ना ।" 

वैसे तो हम यह सब कोर्स में पढ चुके हैं , लेकिन डॉ.वाकणकर जैसे विद्वान के मुँह से यह सब सुनना हमें अच्छा लगता है । इसलिए उनकी डांट खाकर भी हम उनके सामने बार बार अपनी जिज्ञासा प्रस्तुत करते हैं । हमें ज्ञात है कि उनका ज्ञान अपार है और जहाँ वे विश्व इतिहास की पहेलियों  के उत्तर सरलता पूर्वक दे देते हैं वहीं 'जंगल में अगर आपकी साइकल पंक्चर हो जाए तो ट्यूब में बारीक धूल डालकर हवा भर देने से कैसे पंक्चर की दुकान तक साईकल चल सकती है', जैसे फार्मूले भी उनके पास हैं  । वे अच्छे चित्रकार भी हैं और नक्षत्र विज्ञान के अलावा जड़ी-बूटियों  की भी जानकारी रखते हैं । 

सर भी हमारे सवालों का मज़ा ले रहे थे । मैंने अगला सवाल किया “ लेकिन सर इतनी सामग्री भर से क्या इस जगह का इतिहास लिखा जाएगा ?” यह साधारण सा सवाल सुनकर किंचित रोश के साथ बोले “ अरे पागलों, दो साल से क्या पढ़ रहे हो ? इतिहास लिखने के लिए इसके सपोर्ट में और भी वस्तुएं चाहिये, यहाँ प्रचलित साहित्य,लोक मान्यताएं, निकटस्थ स्थानों पर प्राप्त सामग्री, आसपास हुए उत्खननों की रिपोर्ट आदि । सब मिलाकर इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता कई दिनों तक शोध करते हैं तब कहीं इतिहास तय होता है ।तुम लोग भी जब गाँव जाते हो तो यहाँ प्रचलित मान्यताओं के बारे में ग्रामवासियों से बात किया करो ।"

“लेकिन सर जी, ई सब इतिहास-फितिहास लिखा जाने के बाद ई सब कचरा का करेंगे ,वापस गाड़ देंगे का ? “ राममिलन के इस सवाल पर सर ज़ोर से हँस पड़े । जिस बात को हम लोग स्पष्ट पूछने से डर रहे थे राममिलन ने अपने अंदाज़ में पूछ ही लिया । सर उसका आशय समझकर मज़ाक में बोले “ क्या करेंगे पंडित , इन पर सिन्दूर लगाकर सब तुमरे यहाँ इलाहाबाद में गंगा मैया में विसर्जित कर देंगे और क्या । “ सर की विनोद बुद्धि पर हम लोग भी हँस पड़े । 

लेकिन किशोर कहाँ चुप रहने वाले थे । उन्हें  तो पंडित राममिलन को छेड़ने का मौका चाहिये था । बोले ” अरे पंडत, ई सब तोहरे इलाहाबाद के मूजियम में रख देंगे और तोहका म्यूजियम क्यूरेटर बना देंगे ।‘ हम लोग हँस पड़े लेकिन राम मिलन नाराज़ हो गए …“ किशोरवा, तुम तो चुपई रहो , हम तुमसे बात नाही कर रहे, हम तो सर से पूछ  रहे हैं ।“ लेकिन सर तो इतनी देर में हम लोगों को हँसता छोड़ तम्बू से बाहर निकल  चुके थे । हम समझ गए कि आज रात तक किशोर और राम मिलन के बीच ऐसी ही  नोक- झोंक चलती रहेगी ।

*शरद कोकास*

इस पोस्ट से संबंधित इंटरनेट द्वारा प्रदत्त तकनीकी जानकारी आप नीचे विवरण के साथ दिए लिंक [1] मे देख सकते हैं 

पुरातत्त्व में, प्राप्त अवशेषों और कलाकृतियों (artifacts) की वैज्ञानिक पहचान, प्रामाणिकता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन्हें एसिड-मुक्त (acid-free) बक्से या थैलियों में सीलबंद किया जाता है और एक अद्वितीय संदर्भ संख्या (accession number) के साथ टैग किया जाता है। [1]
खुदाई से प्राप्त इन वस्तुओं का दस्तावेजीकरण निम्नलिखित चरणों में व्यवस्थित किया जाता है:
1. वस्तुओं की सफाई और सुखाना

  • जैविक सामग्री: जैविक अवशेषों (जैसे- कार्बनिक पदार्थ या मिट्टी के बर्तन) को नम वातावरण से बाहर निकालने के बाद, फफूंद और रासायनिक प्रतिक्रियाओं को रोकने के लिए धीरे-धीरे सुखाया जाता है।
  • धातु और पत्थर: धातुओं को हवा या नमी के संपर्क में आने से बचाने के लिए विशेष नियंत्रित वातावरण में साफ किया जाता हैसुरक्षित पैकेजिंग और सीलिंग
    • एसिड-मुक्त सामग्री: अवशेषों को रखने के लिए एसिड-मुक्त टिश्यू पेपर और पॉलीथीन थैलियों का उपयोग किया जाता है ताकि वस्तु की सतह पर कोई रासायनिक प्रभाव न पड़े।
    • टेम्पर-एविडेंट सील: छेड़छाड़ से बचाने और वस्तुओं को उनकी मूल स्थिति में रखने के लिए सीलिंग की जाती है, ताकि बिना तोड़े इसे खोला न जा सके।
3. टैगिंग और लेबलिंग
टैग पर स्थायी (permanent) स्याही या वाटरप्रूफ पेन से निम्नलिखित विवरण स्पष्ट रूप से दर्ज किए जाते हैं: [1]
  • उत्खनन स्थल (Site Code): जहाँ से अवशेष प्राप्त हुआ है।
  • ट्रेन्च या ग्रिड नंबर (Trench/Grid): स्थल पर खुदाई का सटीक स्थान।
  • अवशेष संख्या (Accession/Object Number): कैटलॉग सूची के आधार पर विशिष्ट क्रमांक।
  • दिनांक (Date): खुदाई की तिथि।
  • संक्षिप्त विवरण (Description): जैसे- मृदभांड का टुकड़ा, हड्डी, या धातु का सिक्का। [1]
4. इन्वेंट्री और डिजिटल दस्तावेज़ीकरण
  • प्रत्येक सीलबंद अवशेष का भौतिक ब्यौरा एक लॉगबुक में दर्ज किया जाता है।
  • आधुनिक तकनीकों (जैसे डिजिटल अभिलेखागार) का उपयोग करते हुए, कलाकृतियों का 3D मॉडल और फोटोग्रामेट्री भी तैयार की जाती है। [1]

सोमवार, 18 मई 2026

16.बच्चों को पेग का स्वाद कहाँ मालूम


तो क्या सिर्फ बड़ों को पता होगा ?

📗 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📗

✍ *शरद कोकास* ✍


*आज छात्रों का छठवां दिन है* ,ट्रेंच पर उत्खनन कैसे किया जाता है वे सीख चुके हैं । फुलान के सर्वेक्षण से भी आ चुके हैं । आज ट्रेंच पर वे पुरातत्व और उत्खनन सम्बन्धी नई जानकारी से लैस हो रहे हैं । आज की बातचीत में शामिल है पृथ्वी पर जीवन कैसे आया और जीवों की उत्पत्ति कैसे हुई ।..आपको नई जानकारी देगा आज का यह भाग ..और हाँ पहले मुर्गी आई या अंडा इस सवाल का जवाब भी यहाँ है ...

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1⃣6⃣ *भाग-सोलह* 1⃣6⃣

🦆 *दो लेग पीस वाले मुर्गी के पूर्वज* 🦆


🦆शिविर में आज हमारा छठवाँ दिन था । सुबह काफी सुहावनी थी और स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व के दुःख को भुला देने वाली जनता की तरह वह अपना दुःख भुला चुकी थी । 

धूप भी बादलों की कैद से मुक्त होकर बाहर निकल आई थी । 

आसमान में बादल छोटे छोटे गुच्छों में बिखरे हुए थे । ऐसा लग रहा था जैसे किसी बच्चे ने मस्ती करते हुए तकिया की सीवन उधेड़ दी हो और उसे आसमान में उछाल दिया हो और बादलों की शक्ल में रुई के गाले हवा में फ़ैल गए हों । 

नदी किनारे घाट की सीढ़ियों पर धूप देखकर मैंने रवीन्द्र से कहा "इस धूप को देखकर मुझे फिर दुष्यंत याद आ रहे हैं ..

" धूप ये अठखेलियाँ हर रोज़ करती है ,
एक सीढ़ी चढ़ती है और उतरती है "

🦆रवीन्द्र ने कहा " लेकिन इस ग़ज़ल का सबसे अच्छा शेर है ..

" मैं तुम्हें छूकर ज़रा सा छेड़ देता हूँ 
और गीली पाँखुरी से ओस झरती है ।" 

मैंने कहा " लेकिन इतनी रोतली प्रेमिका होने से भी क्या फ़ायदा .. हरदम रोती ही रहेगी । " " लो अब तुम छेड़ोगे तो रोएगी नहीं ? " रवीन्द्र ने कहा । " 
अरे, तो कुछ कहने का मतलब छेड़ना होता है क्या ? " मैंने प्रतिवाद किया " और जब प्रेम हो ही गया है तो फिर छेड़ेंगे क्यों ?" इतने में अशोक वहाँ पहुँच गया .. "लो कर लो बात .. अभी प्रेमिका हईये नहीं और उस पर बहस चालू ..इसी को कहते हैं सूत न कपास जुलाहों में लट्ठम लट्ठा ।"

🦆आज सब मस्ती के मूड में थे इसका कारण यह था कि कल रात नींद बहुत अच्छी आई थी । इसीलिए सब के चेहरे भी ताज़ा खुदी निखात की तरह चमक रहे थे । वैसे भी कल थकान हम लोगों पर इस कदर हावी थी कि गीले बिस्तर और रज़ाइयों के बावजूद रात में अच्छी नींद आना अवश्यम्भावी था । आज भी सुबह मौसम साफ़ था और इस बात की पूरी पूरी सम्भावना थी कि काम शुरू किया जा सकता था ।

🦆नहा -धोकर नाश्ता करने के बाद हम लोग जैसे ही साईट पर पहुँचे हमें ज्ञात हुआ कि आज से हम लोगों को एक नई ट्रेंच यानि ट्रेंच क्रमांक चार पर कार्य प्रारंभ करना है । यह ट्रेंच मुख्य ट्रेंच से दक्षिण की ओर लगभग पचास फीट पर ओपन करनी थी । फिर तो सारा दिन उत्साहपूर्ण वातावरण में बीता । 
दिन भर में हम लोगों ने कई नई बातें सीखीं जैसे ट्रेंच के लिए उपयुक्त जगह का चयन किस प्रकार किया जाए, किस प्रकार नाप लिया जाए, खूंटियाँ किस प्रकार गाड़ी जाएँ आदि आदि । हमारी यह नई आयताकार ट्रेंच दस बाइ चार मीटर की है । सर्वप्रथम हमने चारों ओर पच्चीस सेंटीमीटर का मार्जिन छोड़ा तथा लम्बाई में एक एक मीटर के अंतर पर दस पेग लगाये । यहाँ पेग से तात्पर्य गाड़ी गई खूँटियों से है । सारी ट्रेंच का एक साथ निरीक्षण करने हेतु पेग नौ और दस के बीच एक कंट्रोल पिट बनाया ।
🦆अरे यह बताना तो मैं भूल ही गया ,आज सुबह पेग की इस बात पर हम लोगों ने बहुत आनंद लिया । डॉ.आर्य ने निखात की नाप -जोख के पश्चात जैसे ही हम लोगों से कहा कि " भाइयों नाप -जोख़ तो पूरी हो गई अब आपको पेग लगाना है ।" 

किशोर हँसने लगा .."सर इन बच्चों को तो पेग का स्वाद भी नहीं मालूम है लेकिन मैं लगा सकता हूँ, हालाँकि दिन में लगाना ठीक नहीं है , रात को देखेंगे ।" सर हँसने लगे । वे समझ गए थे कि किशोर भैया मस्ती के मूड में हैं । 
उन्होंने कहा "भाई मैं उस पेग की बात नहीं कर रहा हूँ .. पेग लगाना है मतलब यहाँ खूंटियां गाड़ना है ।" किशोर भैया ने कहा .." क्या सर, पहले तो आपने हमें खुश किया फिर बिलकुल ही निराश कर दिया ।" उसकी इस अदा पर हम लोग जोर से हँस पड़े ।

🦆आज हमने प्रारम्भिक रूप से पेग क्रमांक एक और दो के बीच दो बाई एक मीटर के क्षेत्र में अपना कार्य प्रारंभ किया । ट्रेंच के प्रथम सतह निरीक्षण में हमें स्वास्तिक चिन्ह युक्त एक सिक्का, एक टेराकोटा ऑब्जेक्ट तथा एक स्टोन बॉल प्राप्त हुआ । ऊपरी सतह से खुदाई प्रारम्भ करते हुए हम इकतीस सेंटीमीटर तक पहुँचे । इन प्रारम्भिक कार्यों को सीखने में डॉ.आर्य लगातार हमारा मार्ग दर्शन करते रहे ।

🦆हमें पता ही नहीं चला कि हमारा शाम तक का वक़्त कैसे बीत गया । शाम को कार्य समाप्त करने के बाद हमें यह भी बताया गया कि प्राप्त वस्तुओं को कैसे साफ़ किया जाए और कैसे उन्हें सम्भाल कर रखा जाए । आज उत्खनन करते हुए हम लोगों ने अपने आप को कुछ ख़ास महसूस किया । 

सदियों से ज़मीन के भीतर दफ्न अवशेष जैसे जैसे बाहर आते जा रहे थे हमें लगा जैसे वे हमसे बातें कर रहे हों और इस क़ैद से छुटकारा दिलवाने के लिए हमारा शुक्रिया अदा कर रहे हों । 

मेरे मन में विचार आया ...यह वस्तुएँ तीन - चार हज़ार वर्ष पूर्व ही इस ज़मीन के भीतर दफ़न हो गई थीं । कोई तो ऐसा इंसान होगा जिसने उस वक़्त इन्हें अंतिम बार देखा होगा । तब उसके मन में ग़लती से भी यह ख़याल नहीं आया होगा कि इतने सालों बाद उसीके जैसा कोई इंसान इन्हें ढूंढ निकालेगा ।

🦆मैं सोचने लगा ..कितने लम्बे अँधेरे में बीता होगा उनका यह कारावास , न हवा ,न पानी , चारों ओर फकत अँधेरा ही अँधेरा । बस धरती माँ का सख्त आलिंगन उन्हें दिलासा देता होगा कि कभी न कभी कोई ज़रूर आएगा सिकुड़ते हुए उनके फेफड़ों के लिए ऑक्सीजन लेकर । फिर इसी विश्वास में सदियाँ बीतती रहीं और उनके कान किसी इंसान के कदमों की आहट सुनने के लिए तरसते रहे । 

इस बीच चम्बल में जाने कितना पानी बह गया और जलवायु चक्र में बादल बनकर जाने कहाँ कहाँ बरस गया । लेकिन आखिर उनकी प्रतीक्षा पूरी हुई । अंततः एक खोजकर्ता यहाँ आया और उनके भीतर मुक्ति के स्वप्नों को जन्म दे गया । 

मैं काफी देर तक ज़मीन से निकले उन अवशेषों को देखता रहा जिन्हें हमने ज़मीन की इस कारा से मुक्त किया था । मुझे अचानक महसूस हुआ कि इन्हें इस तरह देखना विशेष है और यह अजायब घर में रखी किसी प्राचीन वस्तु को देखने से बिलकुल अलग है , यहाँ हम उसे देखने वाले प्रथम व्यक्ति हैं जबकि म्यूज़ियम में जाने कितने लोग देख चुके होते हैं ।

🦆खुदाई से निकला पकी हुई मिट्टी का चार सेंटीमीटर लम्बा और दो सेंटीमीटर चौड़ा का एक छोटा सा पात्र हाथ में लिए अशोक उसे बहुत देर तक निहारता रहा । वह उसे उल्टा-सीधा करते हुए कई कोणों से सूक्ष्मता पूर्वक देख रहा था । “ क्या देख रहा हो अशोक ?” मैंने अशोक से पूछा । “ 

वाह कितना सुन्दर पात्र है ।“ अशोक ने कहा । मुझे लगा वह ताम्राश्मयुगीन सभ्यता की किसी विशेषता पर हम लोगों का ध्यान आकर्षित करने वाला है । लेकिन अशोक ने मेरी आशाओं पर तुषारापात करते हुए अपनी नज़रें उस पर से हटाये बगैर धीरे से कहा “ अपने तम्बू में सिगरेट की राख झाड़ने के लिए ऐश ट्रे नहीं है, यह बढ़िया काम आएगा । 
फिर उसने धीरे से उसे अपनी पैंट की जेब में रख लिया । मैंने तुरंत चारों ओर अपनी नज़रें घुमाईं और इस बात पर आश्वस्ति महसूस की कि उसे ऐसा करते हुए किसीने नहीं देखा था ।

🦆तम्बुओं में लौटते हुए अन्धेरा घिर आया था । मौसम खुल गया था और ठंड अचानक बढ़ गई थी । हाथ मुँह धोकर आने के पश्चात किशोर की ओर से प्रस्ताव आया “ क्यों सिटी घूमने चलें ?“ मैंने कहा “नहीं यार, आज वैसे भी दिन भर काम करके बहुत थक गए हैं और दिन भी अब डूब चुका है । कल जल्दी काम खत्म करेंगे और शाम को चलेंगे दंगवाड़ा ।“ 

वैसे भी आज किसी निखात पर स्वतंत्र रूप से काम करने का अनुभव हमें प्रफुल्लित किये हुए था । ज़मीन के भीतर तो हम मात्र इकतीस सेंटीमीटर ही गए थे लेकिन इसके विलोम में हमारी उमंगें आसमान छू रही थीं ।

🦆भोजन ग्रहण करने तक का वक़्त बिताने और भट्टी की आग तापने के उद्देश्य से हमने भाटी जी की भोजन शाला पर धावा बोल दिया और लगे उनका दिमाग खाने । “ क्या भाटीजी ..” अशोक ने छेड़खानी शुरू की “ रोज़ रोज़ वही लौकी, बैंगन, गोभी ..कुछ चिकन विकन का इंतज़ाम नहीं है क्या ?..” "श..श...” भाटी जी ने डाँट लगाई “पंडित वाकणकर जी ने सुन लिया तो तुम्हारा कीमा बना देंगे ।“ 

अशोक बेचारा मायूस हो गया । भाटीजी ने पुचकारते हुए कहा “ कोई बात नहीं तुम मेरे एक सवाल का जवाब दे दोगे तो मैं तुम्हें चिकन खिला दूंगा ।“ अशोक की आंखों में चमक आ गई । भाटी जी ने कहा “यह बतलाओ कि दुनिया में पहले मुर्गी आई या अंडा ? “
🦆अशोक बोला “बड़ा कठिन सवाल है भाई, हमारे वैज्ञानिक डॉ.शरद ही इस पर रोशनी डाल सकते हैं ।“ मैंने कहा “कोई कठिन सवाल नहीं है । विज्ञान इसका उत्तर ढूंढ चुका है । हम जानते ही हैं हर सजीव का जन्म और विकास कैसे हुआ । सजीवों की उत्पत्ति से पूर्व रसायनों से लबाबब थी यह धरती । समुद्र के जल में मिश्रित रसायनों पर एक्स रेज़, बीटा रेज़, गामा रेज़ आदि के प्रभाव से समुद्र में उपस्थित शैल भित्तियों पर एक कोशिकीय अमीबा जैसे जीवों ने जन्म लिया, फिर धीरे धीरे अन्य बहु कोशिकीय जीव जन्म लेते गए और उनके आकार भी बदलते गए । आप क्या सोचते हैं .. यह मुर्गी जो हम देखते हैं क्या इसके पूर्वज भी ऐसे ही दो ‘ लेग पीस ‘ वाले रहे होंगे ?

🦆"लो सुन लो तो क्या चार लेग पीस वाली भी मुर्गी होती थी ?" अशोक ने कहा । "यह बिलकुल संभव है " मैंने कहा "इससे पूर्व इससे मिलते जुलते जीवों ने जाने कितने रूप धारण किये होंगे तब यह मुर्गी सदृश्य जीव बना होगा, फिर धीरे - धीरे इसकी प्रजनन क्षमता विकसित हुई होगी, फिर अंडा-वंडा बनना शुरू हुआ होगा, इसकी भी लम्बी प्रक्रिया रही होगी ।“ “ वो तो सब ठीक है “ अजय ने मेरे भाषण से ऊबकर कहा “ लेकिन इसे खाना कब शुरू हुआ ?“ मैंने कहा “ सॉरी यार, इस बारे में फिलहाल मेरे पास कोई जानकारी नहीं है । जैसे ही प्राप्त होगी तुम्हें बता दूंगा ।“

🦆रवीन्द्र इतनी देर तक हम लोगों की बातें सुन रहा था । उससे रहा नहीं गया । उसने कहा” क्या तुम लोग भी खाने के समय गन्दी बातें कर रहे हो ।“ “अच्छा अच्छा चुप हो जाओ भाई“ अशोक बोला “ पंडित भारद्वाज माँसाहार की बात से नाराज हो गए हैं ।“ भाटीजी हम लोगों की बातों का मज़ा लेते हुए अब तक अरहर की दाल में हींग, जीरे, लहसुन व लालमिर्च की छौंक लगा चुके थे 

पीले बल्ब की रोशनी में ऊपर उठता हुआ धुआँ किसी स्वप्नलोक में मायावी धुन्ध की तरह दिखाई दे रहा था । बाहर भी हल्का हल्का कोहरा छाया हुआ था लेकिन हमारे भीतर की धुंध धीरे धीरे छंटती जा रही थी । भोजनशाला के गर्म वातावरण में गहन होती हुई छौंक की यह गन्ध हमारी भूख के चरमोत्कर्ष में हमारे तंत्रिका तंत्र को शून्य कर रही थी और हमें दुनिया के सबसे स्वादिष्ट भोजन अर्थात घर में माँ के हाथों बने खाने की याद आने लगी थी ।

🦆खाना खाकर हम लोग बरगद के पेड़ों की बस्ती की ओर टहलने निकल गए । टीले पर तो आज पूरा दिन बीता था इसलिए उस ओर जाने का मन नहीं हुआ । बरगदों का घना साया और आसमान में बादलों के पीछे से झाँकती धूमिल चांद की शर्मीली रोशनी । शाल ओढ़े होने के बावज़ूद ठंडी हवाओं में बदन काँप रहा था । वैसे भी भोजन के बाद काफी रुधिर अमाशय की ओर पाचन तंत्र के सहायतार्थ दौड़ जाता है इसलिए ठंड ज्यादा लगती है ।

🦆वातावरण बड़ा रोमांटिक लग रहा था, मेरे मुँह से फिल्म ‘ तेरे घर के सामने ‘ में देवानंद पर फिल्माया और रफ़ी साहब का गाया हुआ मेरा प्रिय गीत फूट पड़ा.. 

“तू कहाँ है बता इस नशीली रात में, माने ना मेरा दिल दिवाना..। 
रवीन्द्र ने छेड़ दिया “ लगता है तुझे गाँव की वो मज़दूर लड़की भा गई है ।“ मैंने रवीन्द्र की ओर घूरकर देखा तो वो बोला “ और क्या, आज वो तेरे से कितने प्यार से पूछ रही थी ..बाबूजी हाँटा खाओगे ? “ मैंने कहा “देख यार प्यार मोहब्बत करने का यहाँ वक़्त नहीं है, हाँटा साँटा या गन्ना खाने के चक्कर में रहेंगे तो हाँटा की बजाय डॉ.वाकणकर का चाँटा मिलेगा और आर्कियालॉजी के प्रेक्टिकल में फेल हो जाएँगे सो अलग ।“

🦆“ठीक है भाई, “ रवीन्द्र ने कहा “थारी जैसी मर्ज़ी, लेकिन कुछ भी कहो यार छोरी है बहुत अच्छी । और काम भी कितनी फुर्ती से करती है ।“ मैं कुछ कहता इससे पहले हमारी भाभी के भैया अजय ने हमारे रोमांटिक मूड पर पानी फेरते हुए सवाल दागा “ यार ये बताओ, ये मालवी और ईरानी भाषा का क्या सम्बन्ध हो सकता है ? “ हमने चौंक कर उसकी ओर देखा , गुलाब की पंखुड़ियों से कोमल इस वार्तालाप में कैक्टस सा यह सवाल कैसे आ गया । अजय ने स्पष्ट किया “ तुम कह रहे थे ना उस लड़की ने साँटा को मालवी में हाँटा कहा, ईरानी भाषा में भी स को ह कहते हैं ।“ रवीन्द्र ने कहा “थारो प्रश्न म्हारी हमज में आ गियो यानी तेरा सवाल मेरी समझ में आ गया ।”

🦆मैंने कहा “ भाई मैं न तो मालवा का रहने वाला हूँ न ईरान का लेकिन इतना मुझे पता है कि हम हिन्दू हिन्दू कहकर जो अपने आप पर गर्व करते हैं यह हिन्दू शब्द पश्चिमोत्तर से आया है । वहाँ के लोग सिन्धु नदी के पार रहने वाले लोगों को सिन्धू कहते थे और ज़ाहिर है 'स 'को 'ह' कहने के कारण हम हिन्दू कहलाए । “और फिर हम हिन्दू अपनी भाषा, अपने धर्म अपने राष्ट्र पर गर्व करने लगे और विधर्मियों को अपने से नीचा बताकर उनका अपमान करने लगे “ अजय ने बात की निरंतरता ज़ारी रखी ।

🦆“चुप “ मैंने उसे डाँटा “ ज़्यादा बकबक मत कर वरना अभी डॉ. वाकणकर से हिन्दुत्व पर लेक्चर सुनने को मिल जाएगा ।“ “ नहीं नहीं, सर ऐसे कट्टर नहीं हैं ।“ रवीन्द्र ने तुरंत प्रतिवाद किया ।

“ वैसे भी जो असली पुरातत्ववेत्ता होता है वह न हिन्दू होता है न मुसलमान ना सिख ना ईसाई .. वह सबसे पहले पुरातत्ववेत्ता होता है । सच के मार्ग पर चलने वाला । वह किसी भी धर्म के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर काम नहीं करता । जो धर्म विशेष का पक्ष लेता है और सत्य को छुपाता है उसे पुरातत्ववेत्ता कहलाने का कोई अधिकार नहीं है ।“

🔲 *शरद कोकास* 🔲


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इस पोस्ट मे दी गई  जानकारी के साथ इंटरनेट द्वारा प्रदत्त तकनीकी जानकारी आप नीचे दिए गए विवरण के साथ के लिंक [ 1 2 3 ] मे देख सकते हैं 

पुरातत्व में 'ट्रेंच' (Trench) पर 'पेग' (Pegs/खूंटियां) लगाना खुदाई से पहले की जाने वाली एक अत्यंत महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया है। इसके जरिए पूरे उत्खनन क्षेत्र (Excavation site) को ग्रिड (Grid) में विभाजित कर उसे सुरक्षित और सटीक रूप से मापने के लिए खूंटियों से सीमांकित किया जाता है。 [1, 2, 3]
पुरातात्विक ट्रेंच और पेग का उपयोग
  • सटीक स्थान और गहराई दर्ज करना: पेग्स की मदद से पुरातात्विक स्थल को छोटे-छोटे वर्गाकार हिस्सों (Units) में बाँट दिया जाता है। खुदाई के दौरान जमीन से मिलने वाली किसी भी कलाकृति, बर्तन या संरचना का सटीक निर्देशांक (\(X\), \(Y\), और \(Z\) अक्ष) इन्हीं पेग्स से मापा जाता है।
  • दस्तावेज़ीकरण (Documentation): पेग्स से बँधे धागे (Datum strings) एक संदर्भ तल (Reference plane) बनाते हैं। खुदाई विनाशकारी होती है, इसलिए किस पेग वाले हिस्से से क्या मिला है, यह रिकॉर्ड करना इतिहास बनाने के लिए आवश्यक होता है।
  • स्तरीकरण (Stratigraphy) की समझ: जब दो ट्रेंचों के बीच मिट्टी की कुछ दीवारें छोड़ी जाती हैं (जिन्हें 'बॉक' कहते हैं), तो पेग्स उन्हीं की सीधी रेखा में गाड़े जाते हैं। इससे पुरातत्वविदों को समय-काल के अनुसार मिट्टी की परतों को chronologically (कालानुक्रमिक क्रम में) समझने में मदद मिलती है। [1, 2, 3, 4, 5]

15. नंगी पुंगी यक्षी का फोटुआ हमें भी दिखाओ भाई


अरे यह तो एडल्ट कंटेन्ट है 

📗*एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📗

*शरद कोकास*

1⃣5⃣ *भाग-पंद्रह* 1⃣5⃣

    पिछले भाग में आपने पढ़ा कि प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व  के यह छात्र सर्वेक्षण हेतु फुलान नामक गाँव गए थे । सारे छात्र फुलान के एक्सप्लोरेशन से थके मांदे लौटे हैं फुलान में प्रतिमाओं से उनका परिचय हुआ और उन्होंने जाना कि प्रतिमाओं को कैसे पहचानते हैं । यह प्रतिमा विज्ञान के अंतर्गत आता है । आज उनका शिविर में पांचवा दिन है । रात हो रही है और अब वे तम्बू में पहुंचकर सुस्ता रहे हैं लेकिन बातचीत यहाँ भी जारी है ..आज का विषय है यक्षी प्रतिमाएँ

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15 -🧜🏻‍♀ यक्षी का फोटुआ हमें भी दिखाओ भाई🧜🏻‍♀

फुलान से लौटकर शिविर में पहुँचते पहुँचते शाम अपनी वृद्धावस्था तक पहुँच चुकी थी । हवाओं में नमी अभी भी बाक़ी थी । 

सूरज ने कोशिश तो बहुत की थी दिनभर कि हवाओं का दिल बहला ले और उन्हें अपने अतीत की याद न आये लेकिन वह नाकाम ही रहा । 

हवाओं की ऑंखें भले नम थीं लेकिन आसमान के आँसू थम चुके थे और रोने के बाद धुले धुले से दिखाई देने वाले चेहरे ही तरह उसका चेहरा भी साफ़ दिखाई दे रहा था । 

फुलान की मिटटी हमारे जूतों के साथ उसी तरह चली आई थी जैसे कोई बच्चा अपने पिता के मना करने के बावज़ूद उसके पीछे पीछे चला आता है । 

हमने जूते उतारकर उस मिटटी को तम्बू के बाहर ही झाड़ा और लकड़ी से खुरच खुरचकर अतीत के दुखों की तरह उसे पूरी तरह हटा दिया । 

    फिर कपड़े बदलकर पांवों में चप्पलें अटकाकर चम्बल की ओर चले गए । मौसम कितना भी ठंडा हो लेकिन ठंडे पानी का स्पर्श देह में रक्त संचार को तीव्र कर देता है सो हाथ मुँह धोकर कुछ उर्जा का संचार हुआ ।

          दिनभर से कुछ खाया नहीं था । भूख बार बार क्लास के होशियार जिज्ञासु बच्चे की तरह हाथ खड़े कर रही थी । उसका समाधान करना हमारा कर्तव्य था । 

    लेकिन यह गोधूली बेला थी और शहरी सभ्यता के अनुसार न यह लंच का समय था ना डिनर का । हमारे भोजन मंत्री भाटीजी को भी पता था कि हम लोग देर से लौटेंगे सो हमारे लिए रोटियाँ भी नहीं बनी थीं, अतः बासी या बचा हुआ खाने का भी कुछ जुगाड़ नहीं था । दुष्यंत का यह शेर कि "हम ही खा लेते सुबह को भूख लगती है बहुत , तुमने बासी रोटियाँ नाहक उठाकर फेंक दीं ' हमारे किसी काम का नहीं था ।

          लेकिन भूख का इलाज तो करना ही था । हमने भाटीजी को मस्का मारा तो उन्होंने  हमारे लिए गरमा गरम पोहा बना दिया जिसे हमने बतौर लनरग्रहण कर लिया । वैसे उन्होंने सुबह भी हमें हैवी ब्रेकफास्ट करा दिया था । लंच और डिनर के बीच के भोजन को हम लोगों ने यह नया शब्द 'लनर' दिया था वैसे ही ब्रेकफास्ट और लंच के बीच के भोजन को हम लोग ब्रंचऔर डिनर व सुबह के ब्रेकफास्ट के बीच रात में भूख लगने पर खाये जाने वाले भोजन को हम लोग डिफास्टकहते थे ।

          लनर के बाद डिनर तक हम लोगों के पास पर्याप्त समय था । कल की बारिश और आज दिन भर फुलान एक्सप्लोरेशन में व्यस्त रहने की वज़ह से आज टीले पर जाना नहीं हुआ था और पिंजरे में कैद तोते में बसे राक्षस के प्राण की तरह हमारे प्राण भी वहीं अटके थे सो हमने सोचा चलो एक चक्कर लगा लिया जाए ताकि लनर भी हजम हो जाए  और रात्रि के  ओम सहना ववतुतक कड़ाके की भूख लग आए  । बारिश रूक गई थी और आसमान साफ हो चला था इसलिए  ठंड भी काफी बढ़ गई थी ।

          यद्यपि टीले की मिटटी थोड़ी थोड़ी गीली थी लेकिन अँधेरे में जैसे किसी के गाल पर बहते आँसू नज़र नहीं आते हमें भी उसका गीलापन ठीक से नज़र नहीं आ रहा था सो हमने अपने हिसाब से एक सूखा जैसा दिखने वाला हिस्सा खोजा और उस पर बैठ गए । बातों का सिलसिला कुछ शुरू नहीं हो रहा था.. लग रहा था जैसे हम किसी मातमपुर्सी में आये हों । हमेशा बकबक करने वाला अजय भी सर झुकाए गुमसुम सा बैठा था । 

    रवीन्द्र ने कुरेदा तो बोला क्या करूँ यार भाभी की याद आ रही है ।रवीन्द्र ने एक कहकहा लगाया .."थारी भाभी की म्हारी भाभी ?" हम लोगों की देखा-देखी वह भी अपनी पत्नी के लिए 'तुम्हारी' प्रत्यय के बगैर सिर्फ 'भाभी' शब्द का इस्तेमाल करने लगा था । इसीलिए रवीन्द्र कभी कभी उसे मज़ाक में भाभी का भैया कह देता था । थकान कुछ इस तरह हम पर हावी थी कि इस हँसी के बाद भी बातों का सिलसिला शुरू नहीं हुआ ।

          इतने में डॉ. सुरेन्द्र कुमार आर्य भी टहलते हुए हम लोगों के पीछे पीछे टीले तक आ गए  । हम लोगों को चुपचाप बैठा देख शोलेके हंगल साहब की तरह उन्होंने  पूछा इतनी खामोशी क्यों है भाई ?” 

    हमने सर झुकाए झुकाए कहा कुछ नहीं सर, आज थक गए है । “ “क्या मिला फुलान के टीले पर ?” उन्होंने  अगला सवाल किया । "अधिक कुछ नहीं सर .." रवीन्द्र ने कहा " दो घंटे के एक्स्प्लोरेशन में सिर्फ दो टेराकोटा बुल मिले, स्वास्तिक चिन्ह वाले कुछ सिक्के, कुछ आहत सिक्के, मिट्टी के दो बाँट,तथा कुषाण कालीन मिट्टी के दो मृद्भांड बस । हाँ उसके बाद फुलान में प्रतिमायें बहुत अच्छी देखने को मिलीं ।"

          सर ने कहा " हम भी कल भाटीजी के साथ फुलान गए थे और वहाँ से चौवन सिक्के, कुछ मणि और यक्ष की मृण्मूर्ति का एक साँचा लेकर आए थे ।" " लो हम अपने आप को ही तीसमारखां समझ रहे थे, और आप तो हमसे भी ज़्यादा अवशेष बटोर लाये । 

    रवीन्द्र ने आर्य सर से प्रशंसा के अंदाज़ में जैसे ही यह कहा, वे बोले " भाई उससे क्या होता है , यह तो संयोग की बात है सतह पर निरीक्षण करते हुए किसी को कम वस्तुएँ मिलती हैं किसी को अधिक मिल जाती हैं । लेकिन पुरातात्विक वस्तुओं और साइट्स की खोज में श्रेय सिर्फ उसी को मिलता है जो पहली बार उस साईट की या अवशेष की खोज करता है और उसे दर्ज करवाता है , उसके बाद जाने वाला हर पुरातत्ववेत्ता केवल उसका अनुगामी ही होता है फिर वह कितनी भी खोज कर ले । " 

          मैंने सर से कहा " हाँ सर, हम भी बचपन से पढ़ रहे हैं कोलम्बस डिस्कवर्ड अमेरिका जबकि अमेरिका में तो पहले से लोग रह रहे थे फिर कोलम्बस को उसे खोजने का श्रेय क्यों दिया जाता है ?" 

आर्य सर ने जवाब दिया "पृथ्वी के हर भूभाग में किसी भी साईट पर लोग पहले से निवास करते रहे हैं जिनका बाक़ी दुनिया को पता नहीं होता लेकिन बरसों बाद उनकी बस्ती को दोबारा खोजने पर उसका श्रेय तो खोजकर्ता को ही मिलेगा ना । 

    अमेरिका  की खोज यूरोप की उस सभ्यता द्वारा की गई जो उससे ज्यादा सभ्य  थी इसलिए श्रेय उन्होंने ले लिया,

और चौदह सौ अन्ठ्यानबे में कोलम्बस की खोज के बाद ही एक इटालियन एक्स्प्लोरर अमेरिगो के नाम पर उसका नाम अमेरिका रखा गया ।

          अब अजय की बारी थी " सर ऐसे ही कहते हैं कि भारत की खोज वास्कोडिगामा ने की ?

भारत तो कितना प्राचीन देश है । " बिलकुल " आर्य सर ने कहा " ऐसा इसलिए कहा जाता है कि वास्को द गामा ने अटलान्टिक महासागर के मार्ग से योरोप से भारत तक पहुँचने के मार्ग की खोज पहली बार की थी ।" 

    " लेकिन सर इसका श्रेय उसे क्यों दिया जाना चाहिए ?" " भाई ऐसा नहीं है " सर ने कहा " यह केवल नए मार्ग की खोज है ।" लेकिन सर .." अजय ने कहा " हमारी सरकार को फिर यह बात योरोप के रिकार्ड में दर्ज करवानी थी कि उसने भारत की खोज नहीं की बल्कि भारत तक आने के मार्ग की खोज की आख़िर भारत पहुँचने वाला वह पहला विदेशी तो नहीं था । हमारी प्राचीन संस्कृति के संरक्षण और तथ्यगत जानकारी को ठीक करने के लिए इस सरकार ने क्या किया ? "

          बात कुछ कुछ राजनीतिक हो रही थी सो अशोक ने विषय परिवर्तन करते हुए आर्य सर से पूछा सर कोलम्बस और वास्को द गामा के एक्सप्लोरेशन को मारिये गोली , अपने एक्सप्लोरेशन की बात करें । आज हमने फुलान में यक्ष प्रतिमाएँ भी देखीं लेकिन देखा कि उनकी पूजा नहीं होती है ,ऐसा क्यों है सर ?

    डॉ.आर्य मुस्कुराए भाई, जैसे जैसे हमारे यहाँ देवी- देवताओं की रचना होती गई और उनकी संख्या बढ़ती गई ,उनके काम और महत्ता के आधार पर उनकी स्थिति का निर्धारण हुआ । समय समय पर किन्ही देवताओं ने उच्च स्थान प्राप्त किया और किन्ही देवताओं को निम्न स्थान पर ही संतोष करना पड़ा । फिर उन्हीं में से कुछ को पूर्ण देव और कुछ को अर्ध देव की श्रेणि में विभाजित कर दिया गया ,यक्ष यक्षी, कुबेर आदि अर्धदेव बन गए  और उन्हें  पूजा के अधिकार से वंचित कर दिया गया ।

          मतलब देवताओं में भी मनुष्यों की तरह वर्ग विभाजन ? “ अशोक ने अपना एक्सपर्ट कमेंट दिया । मैंने कहा यार जब मनुष्य ने ही देवता बनाये हैं तो वह अपने सारे गुण दोष भी उन पर आरोपित करेगा ना और अपने जैसी व्यवस्था भी उनके लिए बनायेगा । सो कुछ देवी -देवता उच्च हो गये, कुछ निम्न हो गए । इसीलिए आदिवासी समाज के देवता जो उनके टोटेम हैं, अन्य देवी देवताओं से अलग होते हैं । विश्व की सभी सभ्यताओं में उनके अपने अपने देवी- देवता हैं ।

          रवीन्द्र ने मेरी ओर घूर कर देखा और कहा तू चुप रह यार, तैने तो अपने लिए  बढ़िया बढ़िया यक्षी चुन ली है, रात दिन उनकी फोटुएं देखता रहता है ।डॉ.आर्य ने कहा अच्छा शरद की  थीसिस की बात हो रही है क्या विषय है...हाँ ....कुषाण शिल्प में नारी प्रतिमाएँ ।” “हाँ सररवीन्द्र मुझे छेड़ने के मूड में था ये कि नई सर, मथुरा म्यूज़ियम से निर्वस्त्र यक्षी प्रतिमाओं की फोटो लेकर आया है, शोध-प्रबन्ध में लगाने के लिए, इसकी थीसिस पर तो ऑनली फॉर एडल्ट्स लिख देना चाहिये ।सर हँसने लगे ये शरद तो लेकिन अठारह का हो गया है ना ?” “क्या पता सर रवीन्द्र ने कहा मैं तो इसे मुन्ना ही कहता हूँ ।

       हँसी के इस आयोजन के उपरान्त डॉ.आर्य ने एक शिक्षक की तरह मुझसे सवाल किया  अच्छा शरद बताओ तुमने इन यक्षी प्रतिमाओं में क्या विशेषता देखी ?” मैंने कहा सर, उत्खनन में पहली दूसरी शताब्दी की ऐसी अनेक यक्षी प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं । ये यक्षियाँ स्तम्भों के बाहरी भाग पर उत्कीर्ण है और त्रिभंग मुद्रा में हैं । यह यक्षियाँ आम्र,साल या अशोक वृक्ष की शाखाओं को पकडे हुए हुए हैं । उत्कीर्ण होने की वज़ह से यह अपूर्ण दिखाई देती हैं लेकिन शिल्पी ने इनकी माँसलता और उभारों को इस तरह उकेरा है कि ये पूर्णता का आभास देती हैं ।

    यद्यपि ये पूर्णतया नग्न हैं लेकिन घुटने तक जाती एक महीन सी रेखा से ऐसा लगता है जैसे वे कोई पारदर्शी वस्त्र पहने हैं। इन्हें देखने से यह कामोद्दीपक अवस्था में प्रतीत होती हैं ।“ “ यही तो है कुषाण काल के शिल्प की विशेषता ।डॉ.आर्य ने कहा । 

    इतने में भैया राम मिलन का ध्यान हमारी बातों की ओर चला गया  बोले ए सरदवा, ये यक्षी-फक्षी नंगी पुंगी फोटुआ हमें भी दिखाओ भई ।हम समझ गए अब कोई गम्भीर बात होने से रही सो हमने शिविर की ओर लौटना बेहतर समझा ।

          खाना खाकर जब हम लोग अपने तम्बू में पहुँचे तो पता चला कि बिस्तर अभी तक नम हैं । हालाँकि फुलान जाने से पहले हम उन्हें  डंडा-वंडा लगाकर टांग गए थे ताकि रात में सोने तक वे सूख जाएँ  चलो कोई बात नहीं शरीर की गर्मी से सूख जाएँगे। मैंने कहा । लेकिन बिस्तर में घुसने पर पता चला कि नमी के अलावा यहाँ ठंड का भी सामना करना है । गनीमत की थकान हम पर हावी थी और ठण्ड मेहनत से थके हुए शरीर को नींद में जाने से रोक नहीं सकती थी ।

          सोने से पहले एक बार दिन भर की गतिविधियों की चर्चा भी ज़रूरी थी सो हमने आज प्राप्त प्रतिमाओं से अपनी बात शुरू की । 

    क्यों यार कुषाण पीरियड से पहले अपने यहाँ मूर्तिशिल्प का कोई कंसेप्ट नहीं था क्या ? “ अजय ने पूछा । रवीन्द्र ने बताया था तो लेकिन उसका कोई संगठित रूप नहीं था, वह अपने अनगढ़ रूप में ही था, अगर ऐसा होता तो बुद्ध के जीवन काल में ही उनकी मूर्तियाँ बन जाती, वह तो बुद्ध के दो-तीन सौ साल बाद पश्चिमोत्तर से कलाकार आए और उन्होंने  जनश्रुतियों के आधार पर मूर्तियाँ गढ़ीं ।

          श्रुति के आधार पर मतलब? ” अजय ने पूछा । मतलब उन्होंने बुद्ध को देखा तो नहीं था सो लोगों से पूछा, बुद्ध कैसे दिखते थे, तो लोगों ने भी अपने पूर्वजों से सुनी हुई बातों के आधार पर बताया कि बुद्ध का शरीर विशाल था , उनका रूप भव्य था, और ऐसा लगता था जैसे उनके पीछे कोई प्रभामंडल हो । बस वैसी ही मूर्तियाँ शिल्पकारों ने गढ़ीं जबकी वास्तव में बुद्ध तो तपस्या के कारण कृशकाय हो गए  थे । हालाँकि बाद में वैसी मूर्तियाँ भी बनीं जिनमे तपस्या के बाद बुद्ध की पसलियाँ भी दिखाई देती थीं । रवीन्द्र ने कहा ।

          "भाई हमारे देश में तो लोगों को पूजा से मतलब है, प्रतिमा का सौन्दर्य कौन गंभीरता से देखता है । सारे देवी -देवता केवल आस्था के कारण पूजे जाते हैं, न कि अन्य कारणों से, वह तो हम लोग हैं प्रतिमा विज्ञान के छात्र और थोड़ी बहुत कला की सेन्स हमें है सो हम मूर्ति की सुन्दरता भी देखते हैं । मैंने कहा । अजय ने कहा .."प्रतिमा के लक्षणों को और उसकी सुन्दरता को आस्तिक लोगों से ज़्यादा नास्तिक लोग देखते हैं । " मैंने कहा यहाँ आस्तिक- नास्तिक जैसी कोई बात नहीं है भाई..लोगों की आस्था है चाहे जिसे पूजें, पर लानत है हम प्रतिमा विज्ञान पढ़ने वाले छात्रों पर जो प्रतिमा के शिल्प सम्बन्धी यह ज्ञान लोगों तक पहुँचा नहीं सकें ।"

          रवीन्द्र ने कहा "अब जनता को ही मूर्तियों के लक्षण जानने में रूचि नहीं है तो हम क्या करें ? " " खैर ऐसा भी नहीं है, लेकिन इस देश की जनता के सौन्दर्यबोध के बारे में क्या  कहें .." मैंने रवीन्द्र के दर्द पर मरहम लगाते हुए कहा "  आस्था का यह आलम है कि लोग पत्थर पर सिन्दूर पोतकर भी उसे हनुमान जी बना देते हैं ।“ “ और फिर यही लोग इस बहाने सरकारी जमीन पर बेजा कब्जा कर लेते हैं । अशोक ने अपना एक्सपर्ट कमेंट दिया और तानकर सो गया । हम लोगों ने भी अपने रज़ाई कम्बल ताने और बजरंग बली की जय' कहकर उनके भीतर घुस गए  

 

🔲 *शरद कोकास* 🔲

कोलंबस द्वारा खोजा गया मार्ग 

क्रिस्टोफर कोलंबस मूल रूप से भारत (एशिया) के लिए एक नया समुद्री मार्ग खोजने निकले थे, लेकिन अनजाने में उन्होंने 1492 में अमेरिका महाद्वीप ("नई दुनिया") के समुद्री मार्ग की खोज कर दी。 [1, 2]
कोलंबस द्वारा अपनाई गई यात्रा और खोजे गए मार्ग के मुख्य विवरण इस प्रकार हैं:
  • यात्रा का उद्देश्य: कोलंबस अटलांटिक महासागर के पार पश्चिम की ओर यात्रा करके भारत और चीन तक पहुँचने का छोटा मार्ग खोजना चाहते थे。
  • प्रस्थान (3 अगस्त, 1492): वह स्पेन के पालोस (Palos) बंदरगाह से अपने तीन जहाजों (सांता मारिया, पिंटा और नीना) के साथ रवाना हुए。
  • मार्ग और खोज (12 अक्टूबर, 1492): अटलांटिक महासागर में लगभग 33 दिनों की लंबी यात्रा के बाद, उनका बेड़ा बहामास द्वीप समूह के एक द्वीप (गुआनाहानी) पर पहुँचा。 कोलंबस ने इसका नाम 'सैन साल्वाडोर' रखा。
  • अन्य क्षेत्र: इसके बाद उन्होंने कैरिबियन सागर में क्यूबा और हिस्पानियोला (वर्तमान हैती और डोमिनिकन गणराज्य) के तटों का अन्वेषण किया。 [1, 2, 3, 4]
अपनी बाद की यात्राओं (1493-1504) के दौरान, उन्होंने मध्य अमेरिका और दक्षिण अमेरिका के उत्तरी तटों के समुद्री मार्गों का भी पता लगाया。 हालाँकि, उन्हें लगता रहा कि वे भारत (इंडीज़) पहुँच गए हैं, जिसके कारण इस क्षेत्र को वेस्ट इंडीज़ कहा गया。 [1, 2, 3, 4]

कोलंबस की यात्राओं का विस्तृत इतिहास जानने के लिए History.com और Britannica पर उपलब्ध जानकारी देखें।

वास्कोडिगामा  द्वारा खोजा गया मार्ग 

वास्कोडिगामा द्वारा खोजा गया मार्ग यूरोप से भारत तक का पहला सीधा समुद्री मार्ग था। उन्होंने 1497 में पुर्तगाल से अपनी यात्रा शुरू की, अफ्रीका के दक्षिणी छोर 'केप ऑफ गुड होप' का चक्कर लगाया, और 20 मई 1498 को भारत के कालीकट (कोझिकोड) बंदरगाह पर पहुंचे। [1, 2, 3, 4, 5]
वास्कोडिगामा ने यूरोप से भारत आने के लिए निम्नलिखित मुख्य मार्ग और पड़ाव अपनाए थे: [1, 2]
  • प्रस्थान (लिस्बन, पुर्तगाल): 8 जुलाई 1497 को चार जहाजों और लगभग 170 साथियों के साथ यात्रा की शुरुआत की।
  • अटलांटिक महासागर की यात्रा: अटलांटिक महासागर को पार करते हुए वे केप वर्डे द्वीप समूह पहुंचे।
  • केप ऑफ गुड होप (दक्षिणी अफ्रीका): तूफानों और विपरीत हवाओं का सामना करते हुए वे नवंबर 1497 में अफ्रीका के सबसे दक्षिणी छोर, 'केप ऑफ गुड होप' से गुजरे।
  • पूर्वी अफ्रीकी तट: इसके बाद वे अफ्रीका के पूर्वी तट पर मोज़ाम्बिक और मोम्बासा होते हुए केन्या के मालिंदी शहर पहुंचे।
  • हिंद महासागर को पार करना: मालिंदी से एक अनुभवी स्थानीय नाविक (अब्दुल मजीद) की मदद से उन्होंने हिंद महासागर को पार किया।
  • भारत आगमन: 20 मई 1498 को वे वर्तमान केरल राज्य में स्थित कालीकट (कोझिकोड) के कपाडू तट पर पहुंचे। [1, 2, 3, 4, 5, 6, 7]
वास्कोडिगामा की इस ऐतिहासिक यात्रा ने यूरोप और एशिया के बीच सीधे व्यापार के रास्ते खोल दिए। इस मार्ग की विस्तृत और ऐतिहासिक जानकारी के लिए आप Britannica और Testbook की वेबसाइट्स देख सकते हैं। [1, 2, 3, 4]