इस नौटंकी में सुल्ताना डाकू की एक प्रेमिका भी है का नाम है उसका... हाँ नीलकमल...जिससे वह कहता है कि हम कंगाल नहीं है
पुरातत्त्ववेत्ता
शरद कोकास की लम्बी कविता 'पुरातत्त्ववेत्ता' पहल पुस्तिका के अंतर्गत सन 2005 में प्रकाशित हुई थी , इस कविता की काफी चर्चा हुई - ज्ञानरंजन ( संपादक 'पहल')
शनिवार, 16 मई 2026
12.👺 कोई मुझसा दबंगर न रश्के- क़मर 👺
इस नौटंकी में सुल्ताना डाकू की एक प्रेमिका भी है का नाम है उसका... हाँ नीलकमल...जिससे वह कहता है कि हम कंगाल नहीं है
11. तेरे बुलाने से आ भी गई तो यहाँ आकर करेगी क्या ..
10.मिटटी के बैल को अंग्रेजी में क्या कहते हैं
📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘
✍ *शरद कोकास* ✍
अब
तक आपने पढ़ा कि विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति
एवं पुरातत्व अध्ययनशाला के छात्र उत्खनन के लिए दंगवाड़ा नामक स्थल पर आये हैं ।
आने के बाद से वे विभिन्न चर्चाओं में लगे हैं और अब तक उनकी बातचीत में अयनांत की
चर्चा,
हरक्युलिस और हनुमान, मिस्त्र के पिरामिड,
ग्रीक माइथोलॉजी, ट्रॉय का युद्ध, सिक्कों के बारे में बातचीत आदि शामिल हो चुके हैं । आज उनका चौथा दिन है
और सुबह हो चुकी है । आज उन्हें ट्रेंच पर नहीं जाना है बल्कि एक्सप्लोरेशन के लिए
जाना है । आप जानेंगे कि यह सर्वेक्षण क्या होता है कैसे किया जाता है ? साथ ही यह
भी कि खुदाई के लिए स्थान का चयन कैसे किया जाता है । इसके अलावा आप जानेंगे कि टेराकोटा किसे कहते
हैं , टेराकोटा यानि वही मिटटी का बैल जिसे आप 'पोला' त्यौहार पर देखते हैं , और
प्राचीन समय से यह कला कैसे जीवित है .. *लीजिये पढ़िए आगे की डायरी* उम्मीद है यह
डायरी पढ़ना आपको अच्छा लग रहा होगा ।
🔟 *भाग दस* 🔟
🦍 *बैल नहीं भैया टेराकोटा* 🦍
सूरज की नींद ज़रा देर से खुली थी और वह अभी तक उबासियाँ ले रहा था । ऐसा लगता था जैसे वह भी कल रात देर तक जागा हो । हम लोग तो सूरज के जाग जाने के बाद जागने वालों की जमात में शामिल थे और अक्सर सपनों में ही सूर्योदय देखा करते थे सो सूरज के तकाज़े से बेखबर अपने तम्बू में तानकर सो रहे थे कि अचानक डॉ.वाकणकर की आवाज़ सुनाई दी ..
“सज्जनों जाग जाओ, आज अपने को नदी के उस पार वाले टीले पर एक्सप्लोरेशन के लिए चलना है ।" तम्बू के बाहर से ही उन्होंने आज का प्रोग्राम बताया और चले गए । “ अभी तो सात ही बजा है यार ।" अशोक ने खीझकर कहा । मैंने कहा .."कोई नहीं, सर का आदेश यानि आदेश, वे तो नहा-धोकर तैयार भी हो गए हैं । " मजबूरी में हम लोगों को भी उठना पड़ा । प्रतिदिन की भांति फिर हम लोगों ने चम्बल के किनारे जाकर प्रक्षालन किया और नाश्ता कर जल्दी से तैयार हो गए ।
नाश्ते के पश्चात शरीर में काफी उर्जा का संचार हो चुका था सो सर के साथ हम लोगों ने पैदल चलने में हमने कोई आलस्य नहीं महसूस किया । सर ने बताया कि नदी के उस किनारे वाला वह टीला यहाँ से लगभग दो-ढाई किलोमीटर पर ही स्थित है । हम लोग गपियाते हुए और टहलते हुए टीले पर पहुँच गए । हमारे साथ आज कुछ स्थानीय युवा भी आज शामिल हो गए । सर हमें एक ऐसे मार्ग से ले गए जहाँ पानी बहुत कम था और हमें नदी पार करने में कोई दिक्कत नहीं हुई । यह टीला अधिक ऊँचा नहीं था और पानी की धार के बहुत करीब था ।
सर ने हमें पहले तो एक्सप्लोरेशन का अर्थ और उद्देश्य बताया.. " एक्सप्लोरेशन एक तरह से सर्वे का काम होता है । कल मैंने तुम लोगों को बताया था कि सबसे पहले किसी भी पुरातात्विक साईट के बारे में सूचना प्राप्त होती है और उसे चिन्हित किया जाता है । तत्पश्चात इस चिन्हित साईट पर उत्खनन कार्य प्रारंभ करने से पूर्व वहाँ सर्वे किया जाता है । इस आधार पर यह तय किया जाता है कि वहाँ किस प्रकार के अवशेष प्राप्त हो सकते हैं तथा किस स्थान से खुदाई प्रारंभ करना उचित होगा ।
यह प्रारंभिक जानकारी देने के पश्चात सर ने आदेश दिया " अब तुम लोग नीचे झुक झुक कर ध्यान से देखो, यहाँ ज़मीन पर ताम्राश्म युगीन सभ्यता के बहुत सारे अवशेष बिखरे हुए हैं । " हमें समझ में नहीं आया कि सर हमें प्राचीन अवशेषों की खोज के लिए वहाँ क्यों लेकर आए हैं इसलिए कि पत्थरों और मिटटी के बीच बड़ी मुश्किल से वहाँ सतह पर कोई अवशेष दिखाई देता था । बहुत देर तक खोजने के बाद आखिर एक जगह ताम्राश्मयुगीन सभ्यता के कुछ चित्रित मृद्भांड, दो सिक्के और दो बीड मिले ।
अजय ने सर से कहा “ यहाँ ज़्यादा कुछ तो मिल नहीं रहा है सर, फिर…? दरअसल वह कहना चाहता था कि यहाँ कुछ ख़ास नहीं मिल रहा ही फिर सर हमें यहाँ लेकर क्यों आये हैं । “ सर उसका आशय समझ गए । “ क्यों , ज़्यादा कुछ मिलना ज़रूरी है क्या ? ऐसा कई बार होता है कि एक्सप्लोरेशन के दौरान दिन दिन भर कुछ नहीं मिलता, लेकिन क्या पता, ऊपर से कुछ न दिखाई दे लेकिन इस धरती के नीचे पूरी दुनिया बसी हो ।“
सर इस बात को समझ रहे थे कि यह काम हम लोगों के लिए बहुत उबाऊ है । उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा " देखो इसमें परेशान होने या बोर होने की ज़रूरत नहीं है, किसी भी पुरातत्ववेत्ता के लिए यह पहला लेसन है । इसे सम्पूर्ण रूचि और कंसेन्ट्रेशन के साथ करना आवश्यक है इसलिए कि एक्सप्लोरेशन से ही हमें पता चलता है कि उत्खनन की दृष्टि से यह साईट काम की है या नहीं । दुनिया में जितने भी पुरातात्विक महत्त्व के स्थान हैं वहाँ सबसे पहले एक्सप्लोरेशन ही किया गया था । तुम लोगों ने स्विटज़र लैंड के ज्यूरिख शहर का नाम सुना होगा वह शहर पूरा का पूरा झील में पानी की सतह कम हो जाने पर मिला था, और दूर क्यों जाते हो अपने मोहनजोदाड़ो की खोज भी इसी तरह अंग्रेजों द्वारा रेल की पटरियाँ बिछाने के लिए खुदाई करते हुए हुई थी । अब इसी जगह को देख लो, अगर यहाँ थोड़े बहुत भी अवशेष मिल रहे हैं तो इससे पता चलता है कि यहाँ आसपास कोई बस्ती रही होगी और यह अवशेष भी इसलिए मिल रहे हैं कि नदी के बहाव से यहाँ की बहुत सारी मिटटी बह गई और यह अवशेष ऊपर आ गए । ऐसा भी हो सकता है कि यह अवशेष आसपास से कहीं से बहकर आये हों तो इस बात का भी हमें पता लगाना होगा ।
"लेकिन सर, क्या अवशेष मिलने भर से यह तय हो जाता है कि इस जगह की खुदाई करनी है ? अजय ने अपनी कमर सीधी करते हुए कहा । " नहीं रे, " सर ने हँसकर कहा " खुदाई तो लास्ट स्टेप है इससे पहले अन्य माध्यमों से जगह के बारे में जानकारी लेना जरुरी होता है । एक्सप्लोरेशन में बहुत सारी चीज़ें आती हैं जैसे आसपास के ग्रामीणों से बात करना, वहाँ प्रचलित परम्पराओं, लोककथाओं और किंवदंतियों का अध्ययन करना, वहाँ के बारे में कोई साहित्यिक या पौराणिक स्त्रोत हो उसे देखना । आखिर हमारे पूर्वज बहुत कुछ लिख गए हैं । हमने विभिन्न स्थानों के उत्खनन के लिए ऐसी कई साहित्यिक सामग्री का सहारा लिया है जिनमे रामायण है, महाभारत है, कल्हण की राजतरंगिणी है, फाहियान मेगास्थनीज़ जैसे यात्रियों के लेख हैं । फिर स्थान विशेष से सम्बंधित भौगोलिक नक़्शे भी देखना होता है । स्थानों के नाम का भी महत्व होता है जैसे बुद्ध से सम्बन्धित स्थानों के नाम से उनके प्राचीन स्थान होने का पता चलता है । दक्षिण में ऐसी कई साइट्स पाई गई हैं जिनके नाम 'विभूतिपाडू' जैसे थे, यहाँ नव पाषाण युग के राख के ढेर पाए गए ।"
" हाँ सर, विभूति या भभूती राख को कहते हैं मेरे ख्याल से इस शब्द का अर्थ राख का ढेर ही होगा ।" अजय ने उछलते हुए कहा । सर हँसने लगे " लगता है इसकी समझ में आ गया ,इसको संस्कृत में अच्छे नंबर मिलते होंगे । अजय अपनी तारीफ़ सुनकर खुश हो गया । सर ने अपनी बात जारी रखी.." खैर एक्सप्लोरेशन के और भी तरीके हैं जैसे अब तो ताप,विद्युत और चुम्बक का प्रयोग भी होने लगा है, एरियल फोटोग्राफी भी होती है और रसायनों का प्रयोग भी होता है, खैर उसके बारे में मैं बाद में बताऊंगा अब दो बज रहे हैं वापस चलते हैं ।" इसके साथ ही सर ने अन्वेषण कार्य समाप्ति की घोषणा की । अपने हिस्से के ढूँढे हुए अवशेष लेकर सर से बाते करते हुए हम लोग कैम्प की ओर वापस लौटने लगे । यह एक पुरातत्ववेत्ता की प्रारम्भिक कक्षा थी और यहाँ धैर्य का पाठ भी पढ़ाया जाना ज़रूरी था ।
झुक झुक कर अवशेष ढूँढने की वज़ह से हम लोगों की पीठ दुखने लगी थी । सर ने सबकी फिज़िकल एक्सरसाइज करवा दी थी । अब सबका मूड था कि भोजन के पश्चात तम्बू में तानकर सोया जाए लेकिन सर ने आदेश दिया "भोजन के उपरांत सभी लोग ट्रेंच क्रमांक दो पर पहुँचें । " " दिन की नींद हमारी किस्मत में नहीं है ।" रवीन्द्र ने बुझे मन से कहा । "वैसे भी हम कहाँ रोज़ दिन में सोते हैं यार ,हमारी दोपहर तो लायब्रेरी में बीतती है ।" मैंने रवीन्द्र को दिलासा देते हुए कहा । वैसे भी सर की नज़रों से बचना बहुत मुश्किल था, हम कुल जमा छह लोग ही तो थे, एक भी अगर गायब होता तो पकड़ में आ जाता । भोजन के पश्चात बेमन से हम लोग साईट पर पहुँचे और सर के आदेशानुसार ट्रेंच क्रमांक दो पर अपना कार्य प्रारम्भ करने की तैयारी करने लगे । सर ने हमें कुदाल पकड़ना और चलाना सिखा ही दिया था सो आज कुदाल चलाने का पहला दिन था । हम सबने एक एक बार कुदाल पकड़कर देखी । चिकनी चिकनी लकड़ी का स्पर्श करते ही हमारा ध्यान मजदूरों के खुरदुरे हाथों की और गया । श्रम की इस भूमिका में कुदाल थामते ही हमारा मन प्रसन्न हो गया और आलस्य दूर हो गया ।
मैंने कुदाल पकड़ी ही थी कि सर ने कहा "ठहरो ।" । मुझे लगा शायद मेरे कुदाल ग़लत पकड़ने के तरीक़े पर वे कुछ कहने वाले हैं ..। मैंने अपने अहम में कहा " सर, कुदाल चलाना तो मुझे आता है ?" सर ने कहा " वो तो ठीक है लेकिन इसके अलावा अन्य सहयोगी टूल्स का भी उपयोग कैसे करते हैं वह भी तो तुम लोगों को पता होना चाहिए । फिर अभी सबसे पहले कुछ और सेफ्टी प्रिकाशंस तुम लोगों को बताना है । अब विदेशी हिसाब से तो मैं बता नहीं सकता लेकिन खुदाई शुरू करने से पहले एक पुरातत्ववेत्ता को अपनी सुरक्षा का ध्यान भी रखना पड़ता है । ट्रेंच में उतरने से पहले यह देखना ज़रूरी है कि वह कितनी गहरी है और उसके भीतर कहीं कोई गैस आदि का रिसाव तो नहीं हो रहा है ऐसी स्थिति में कोई मास्क पहनकर जाना होता है । उसके अलावा भीतर कोई कीड़े-मकोड़े, सांप,चूहे,छिपकली आदि तो नहीं हैं उसकी भी जाँच करनी पड़ती है ।
" सर , अगर सांप निकल आये तो क्या करना होगा ? अजय ने बीच में ही सवाल किया । " क्या करना होगा , अरे उसे भगाना होगा और क्या ।" सर ने कहा । " सर ये अजय को तो छिपकली से भी डर लगता है ।" अशोक ने हँसते हुए कहा । "अरे !" सर ने मज़ा लेते हुए कहा .." इसकी तो शादी हो गई है फिर भी डरता है ..और अगर इसकी बीबी भी छिपकली से डरती होगी तो फिर बहुत मुश्किल है ।"
"ठीक है , कोई बात नहीं इसकी छिपकली तुम लोग भगा देना । " सर ने कहा " आगे सुनो । इसके अलावा अपनी वेशभूषा का ध्यान भी रखना है ,उचित जूते और कपड़े पहनने हैं ,सर पर भी सुरक्षा के लिए कुछ होना चाहिए । ट्रेंच में उतरते समय यह भी ध्यान देना ज़रूरी है कि इतनी सावधानी से उतरें कि ट्रेंच ढह न जाये, विशेषकर रेतीली ज़मीन या भुरभुरी मिटटी वाली ट्रेंच पर यह ध्यान रखना ज़्यादा ज़रूरी है ।" सर हमें सुरक्षा के विषय में बता रहे थे और हम उनकी बातें बहुत ध्यान से सुन रहे थे .." ट्रेंच में उतरने से पहले ट्रेंच के बाहर फर्स्ट एड बॉक्स है या नहीं यह भी देखना ज़रूरी है और उसमे आवश्यक वस्तुएँ जैसे टिंचर,मलहम, चोट पर बांधने के लिए पट्टी आदि भी होनी चाहिए, पानी की बोतल भी रखें । इसके अलावा आग बुझाने का यंत्र भी होना चाहिए । हर एक की डायरी में पास के किसी अस्पताल का पता या डॉक्टर का फोन नम्बर भी होना चाहिए ।"
सर की बात सुनकर हम लोगों ने आसपास नज़र डाली लेकिन वहाँ हेलमेट जैसी कोई चीज़ नहीं दिखाई दी न कोई फर्स्ट एड बॉक्स न आग बुझाने का यंत्र । यद्यपि यह सारी वस्तुएँ सामानों के टेंट में थी अब सर से कुछ कहते तो वे यही कहते ..तो जाओ लेकर आ जाओ । बहरहाल उनकी बात ख़त्म होते ही हम लोगों ने ट्रेंच पर अपना ध्यान केन्द्रित किया । इस ट्रेंच क्रमांक दो पर पिछले कुछ दिनों से उत्खनन चल रहा है । यह ट्रेंच 1. 9 मीटर पहले से ही खुदी हुई थी सो उसके आगे हमने सर के मार्गदर्शन में लगभग एक घंटे में 20 सेंटीमीटर खुदाई और की । खुदाई प्रारंभ करने से पूर्व हम लोग एक अद्भुत कल्पना कर रहे थे । हमें लग रहा था कि जैसे ही हम खुदाई प्रारंभ करेंगे अवशेषों के ढेर मिलना शुरू हो जाएँगे । हम लोग बार बार आँखें फाड़कर ट्रेंच के भीतर झाँकते और कोशिश करते कोई दीवार नज़र आ जाए, या कोई मटका या कोई और महत्वपूर्ण वस्तु मिल जाए लेकिन कोई विशेष उपलब्धि नहीं हुई । हाँ, ट्रेंच की दक्षिण दिशा, जिसे तकनीकी भाषा में साउथ एक्सटेन्शन कहा जाता है की ओर विस्तृत ट्रेंच में एक टूटा हुआ टेराकोटा ऑब्जेक्ट यानि पकी मिट्टी का टूटा हुआ एक बैल प्राप्त हुआ ।
" सर यह बैल मिला है " अजय ने खुश होकर चिल्लाते हुए कहा । सर आये उसे हाथ में लिया और कहा "बढ़िया टेराकोटा है ।" "नहीं सर यह बैल है । " राममिलन ने कहा । सर ने कहा " हाँ भाई यह बैल ही है लेकिन मिटटी को पकाकर जो शिल्प अथवा बर्तन बनाते हैं उसे 'टेराकोटा' ही कहते हैं । " अजय के चेहरे पर ख़ुशी झलक रही थी इसलिए कि साउथ एक्सटेंशन की ओर वही काम कर रहा था ।
"सर यह टेराकोटा बनाना मनुष्य ने कब सीखा ? उसने मौका देखकर सवाल पूछा । सर ने जवाब दिया "भाई, शिल्प तो पहले भी मिटटी के ही बनते थे लेकिन जब मनुष्य ने आग की खोज की और उसमें मिटटी को पकते हुए देखा तो उसने सायास मिटटी से शिल्प बनाकर उन्हें पकाना शुरू किया । टेराकोटा यह शब्द बहुत बाद का है और अंग्रेज़ों का दिया हुआ है । यह शब्द इटालियन भाषा से आया है जिसका अर्थ होता है पकी हुई मिटटी । ऐसे कई टेराकोटा मोहनजोदड़ो की खुदाई में मिले हैं, प्राचीन मिस्त्र, मेसोपोटामिया ,यूनान और चीन में भी प्राप्त हुए हैं । इसमें बिना चमक वाले और चमकदार दोनों तरह के टेराकोटा हैं ।"
" सर हम लोग आजकल मिटटी को पकाकर जो शिल्प बनाते हैं वे भी तो टेराकोटा ही कहलायेंगे न ?" अजय ने पूछा । " बिलकुल ठीक कह रहे हो तुम ।" सर ने कहा । " आज भी इनका प्रयोग बहुतायत में होता है । पोले के त्यौहार में तुम लोग जो मिटटी का बैल देखते हो वह भी टेराकोटा ही है । बल्कि प्राचीन काल से ही इसके विविध उपयोग हो रहे हैं, नक्काशीदार कवेलू और छतों को सजाने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है बंगाल में तो बहुत से मंदिरों की छत भी टेराकोटा की ही है ।"
हमें अपनी इस उपलब्धि यानि उस टेराकोटा बैल को देख देखकर बहुत मज़ा आ रहा था । किशोर ने उसे देखकर कहा "इसकी सूरत तो राममिलनवा से मिलती है ।" सो उसने मज़ाक मज़ाक में उसका नाम ' राममिलनवा ’ रख दिया । राममिलन ने भी बुरा नहीं माना आखिर यह हमारे छात्र दल की पहली सफलता थी । हम लोग खुशी के मारे फूले नहीं समा रहे थे, हमें ऐसा लग रहा था कि अब हमारा भविष्य तय हो गया है और आगे जाकर हमें इसी तरह देश भर में उत्खनन करना है, दबे हुए इतिहास को खोज निकालना है । सुखद भविष्य की कपोल कल्पना करते हुए हम इस यथार्थ को क्षण भर के लिए भूल गए कि एम. ए. करने के बाद हमें भी अन्य लोगों की तरह नौकरी के लिए परीक्षाएँ देनी होंगी, इन्टरव्यू देने होंगे और हिन्दी के मुहावरे में कहें तो चप्पलें घिसनी होंगी ।
🔲
*शरद कोकास* 🔲
शुक्रवार, 15 मई 2026
9.यह वो जगह नहीं है जो हमने पहले देखी थी
📗 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📗
✍🏽 *शरद कोकास* ✍🏽
*इससे
पहले के भागों में आपने पढ़ा* कि विक्रम
विश्वविद्यालय उज्जैन की प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययन शाला
के छात्र शरद कोकास ,
रवीन्द्र भारद्वाज, अशोक त्रिवेदी, अजय जोशी और राममिलन शर्मा उज्जैन के निकट दंगवाड़ा नामक स्थान पर डॉ.वि
श्री वाकणकर के निर्देशन में चल रहे पुरातात्विक उत्खनन शिविर में पहुँचे हैं । आज
उनका तीसरा दिन है । पहली शाम चम्बल नदी के किनारे स्थित टीले पर चाँद की रोशनी
में बिताने के बाद रोज सुबह शाम शुरू हुई उनकी यह गपशप देर रात तक चलती है जिसमे
वे ग्रीक और रोम की सभ्यता के विभिन्न पात्रों के विषय में बात करते हैं । उनकी
बातचीत में ग्रीक के हेराक्लीज़ या हरक्युलिस शामिल हैं सो वहीँ पंडित राममिलन
उन्हें हमारे यहाँ के हनुमान जी के बारे में बताते हैं । उसके बाद वे ग्रीक की
हेलेन , मिस्त्र के पिरामिड , और
हम्मुराबी के बारे में भी बात करते हैं नोकझोंक के बाद नींद के आगोश में जाने के
बाद होती है कैंप की सुबह .. लीजिये पढ़िए अब तीसरे दिन की दोपहर से रात तक की
डायरी । इस भाग में बहुत महत्वपूर्ण सूचनाएँ हैं जिनसे आप जानेंगे कि किसी
पुरातात्विक स्थल के बारे में कैसे पता चलता है और पुरातत्ववेत्ता वहाँ तक कैसे
पहुंचते हैं...
*वो सपनों का गाँव*
हम लोग जब अपने शहर के किसी स्थान को देखते हैं तो अक्सर सोचते हैं कि आज से बरसों पहले वह स्थान कैसा रहा होगा । हमारे बचपन में यह शहर ऐसा नहीं था, न इतनी इमारतें थीं न इतनी गाड़ियाँ, न इतनी पक्की सड़कें थीं न ही इतने लोग थे । वर्तमान के अतीत की कल्पना करना वहीं तक संभव है जहाँ तक वह अतीत हमारा देखा हुआ होता है लेकिन हम उससे पहले की कल्पना नहीं कर पाते हैं इसलिए कि हमारे जन्म से पूर्व के दृश्य हमारे देखे हुए नहीं होते l फिर भी हम किताबों में पढ़कर और उस समय के चित्र देखकर कल्पना कर सकते हैं कि उस समय वहाँ का जीवन कैसा रहा होगा l
दंगवाड़ा के इस टीले पर बैठकर मैं भी उस समय की कल्पना करने लगा जब यहाँ सचमुच की कोई बस्ती रही होगी हालाँकि मेरे पास न उस समय का कोई चित्र था न ही कोई किताब थी जिसमें मैं उस ताम्राश्म युगीन ग्राम्य जीवन की कोई झलक देख सकूँ । मेरे पास कल्पना करने के लिए बस यही कुछ टूटे -फूटे अवशेष थे जो सदियों पहले किसी बाढ़ या किसी आपदा के कारण मिटटी की इन सतहों के नीचे दब गए थे ।
टीले पर खुदी हुई निखात की ओर देखते हुए अचानक मैं उस अतीत की कल्पना में खो गया और सोचने लगा ..यहाँ भी कभी कोई खूबसूरत बस्ती रही होगी जहाँ पेड़ों की घनी छाँव के नीचे खूबसूरत झोपड़ियाँ रही होंगी जिनमे गाँव के सीधे-सादे लोग रहा करते होंगे । गाँव की स्त्रियाँ चम्बल नदी से अपने मटकों में पानी भरकर लाया करती होंगी, किसान दिन भर अपने खेतों में हल चलाने के बाद शाम को जब थके-मांदे घर लौटते होंगे तो उनकी स्त्रियाँ ताम्बे की थाली में उन्हें खाना परोसती होंगी ..। सोचते हुए अचानक मेरे मुंह से बोल फूट पड़े .."वो अमुआ का झूलना वो पीपल की छाँव, घूँघट में जब चाँद था मेहंदी लगे थे पाँव .. आज उजड़ के रह गया वो सपनों का गाँव .. ।"
गीत गुनगुनाते हुए भी मेरे मन में कुछ और सवाल कौंध रहे थे ..लेकिन अच्छी खासी पनपती हुई यह सभ्यतायें अचानक लुप्त कैसे हो जाती थीं ? ठीक है एक पीढ़ी ख़त्म हो जाती होगी लेकिन उसका स्थान दूसरी पीढ़ी को ले लेना चाहिए ,जीवन का तो निरंतर विकास होता है ना, जीवन तो यहाँ फलना -फूलना चाहिए था जैसे कि हम आजकल देखते हैं ,कुछ दिन पहले जहाँ ख़ाली ज़मीन होती है कुछ दिनों बाद वहाँ इमारतें खड़ी हो जाती है, फिर वहाँ बस्ती बढ़ती ही जाती है ..लेकिन यहाँ ऐसा क्या हुआ होगा कि सब कुछ ख़त्म हो गया ..?”
वाकणकर सर मजदूरों को उस दिन के कार्य के लिए आवश्यक निर्देश देकर हम लोगों के पास आ गए थे । मैंने अपने मन में उठते सवाल को आख़िर उनसे पूछ ही लिया। सर ने कहना शुरू किया “ तुमने हाल-फिलहाल किसी सभ्यता को लुप्त होते नहीं देखा है ना इसलिए ऐसा कह रहे हो । लेकिन पिछले हजारों बरसों में ऐसा कई बार हुआ है। जीवन अपनी गति से चलता रहता है लेकिन कभी अचानक उस पर विराम भी लग जाता है । सभ्यताओं के समाप्त हो जाने के एक नहीं अनेक कारण हैं । अक्सर नदियों के किनारे बसी बस्तियाँ भीषण बाढ़ में डूब जाती हैं । भूकम्प, ज्वालामुखी, तूफान, अकाल, बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं की वज़ह से भी लोग वहाँ से पलायन कर जाते हैं या समाप्त हो जाते हैं । फिर नदियाँ भी कालांतर में अपना मार्ग बदलती हैं तो उनके किनारे बसे लोगों को बस्ती छोड़ कर जाना पड़ता है । समुद्र के भीतर भी भूकम्प आते हैं तो उनके किनारे की बस्तियाँ नष्ट हो जाती हैं । इसके अलावा बस्तियों के नष्ट होने के पीछे आगजनी, दुश्मनों के आक्रमण, हिंसक प्राणियों के हमले, भोजन या जल की अनुपलब्धता जैसे अनेक कारण हैं ।
"तो सर हमें पता कैसे चलता है कि
कौनसी बस्ती का विनाश किस कारण से हुआ ?" अजय ने सवाल
किया । सर ने कहा " किसी भी साइट पर उत्खनन करते हुए उसकी विभिन्न परतों में
हर स्तर पर हमें विनाश के कारण मिल जाते हैं । जैसे यदि वस्तुओं पर आग से जलने के
चिन्ह मिलते हैं तो हम अनुमान लगाते हैं कि वह बस्ती किसी अग्निकांड में नष्ट हुई
होगी । बाढ़ से नष्ट हुई बस्तियों में घर के भीतर की वस्तुओं पर सूखी हुई गाद दिखाई
देती है, समुद्र के किनारे पर यदि किसी ऊंची दीवार पर रेत
दिखाई दे तो समझो वहाँ सुनामी की वज़ह से विनाश हुआ होगा । भूकंप और ज्वालामुखी की
वज़ह से नष्ट होने वाली बस्तियों में भी खुदाई में ऐसे ही सम्बंधित प्रमाण मिलते
हैं ।“
मेरे मन में उत्खनन के तकनीकी पक्ष का ज्ञान प्राप्त करने के साथ साथ उत्खनन के कारणों को जानने की जिज्ञासा अधिक थी । दंगवाडा की इस साईट पर विगत एक माह से उत्खनन चल रहा था । हम लोग उत्खनन प्रारंभ होने के कुछ समय बाद दंगवाड़ा पहुँचे थे इसलिए पूर्व में हो चुके काम से खुद को अपडेट करना ज़रूरी था । हालाँकि हम लोग प्रशिक्षणार्थी थे और हमारी कोई प्रत्यक्ष भूमिका उत्खनन में नहीं थी फिर भी भविष्य में पुरातत्ववेत्ता बनने के लिए प्रारंभिक आवश्यक जानकारी से लैस होने की अनिवार्यता तो थी ही । विद्यार्थी थे सो प्रश्न करने की भी हमें छूट थी । हम भी ज्ञान प्राप्ति का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहते थे । बचपन से सुनते आ रहे थे कि पुरातत्ववेत्ताओं को जैसे ही पता चलता है कहीं कोई सभ्यता ज़मीन की परतों के नीचे दबी हुई है वे वहाँ पहुँच जाते हैं और खुदाई शुरू कर देते हैं । प्रश्न यह था कि उन्हें पता कैसे चलता है ? अब उन्हें सपना तो नहीं आता होगा ।
मैंने रवीन्द्र के सामने अपनी जिज्ञासा रखी तो रवीन्द्र ने कहा "चलो सर से ही पूछ लेते हैं । " फिर वह सर से मुखातिब हुआ .." अच्छा सर, यह बताइये , पुरातत्ववेत्ता को यह कैसे पता चलता है कि उसे कहाँ खुदाई करना है ? ” “ तुम्हारा तात्पर्य इस बात से तो नहीं है कि हमें यह कैसे पता चलता कि कौनसी सभ्यता कहाँ दबी हुई है ? “ डॉ.वाकणकर ने प्रतिप्रश्न किया । “ जी । “ रवीन्द्र ने गर्दन हिलाई ।
"चलो तुम्हारी बात को यहाँ से समझने का प्रयास करते हैं ।“ डॉ. वाकणकर ने बात जारी रखी “ दरअसल पुरातत्ववेत्ता विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त सूचना के आधार पर यह तय करते हैं कि उन्हें उत्खनन का कार्य कहाँ से प्रारम्भ करना है । अब हम देखते हैं कि उन्हें यह सूचनाएँ कहाँ से व कैसे प्राप्त होती हैं । यह तो हम देखते ही आ रहे हैं कि अधिकांश सभ्यताएँ बसाहट से दूर पाई जाती हैं । अक्सर जंगलों में या किसी नदी के किनारे किसी टीले पर इन बस्तियों के या सभ्यताओं के अवशेष ज़मीन के भीतर दबे होते हैं । लेकिन कभी कभी ऐसा होता है कि तेज़ वर्षा के कारण, भूस्खलन से या किसी उथल - पुथल की वज़ह से कुछ चीज़ें सतह पर आ जाती हैं । कुछ अवशेष जंगलों के भीतर यूँ ही बिखरे हुए होते हैं जहाँ वर्षों से कोई गया नहीं होता है सो इसकी जानकारी किसी को नहीं होती ।
"लेकिन सर इनकी जानकारी सरकार तक कैसे पहुँचती है ?" अजय ने सवाल किया । सर ने कहा "पुरातत्व विभाग या प्रशासन तक प्रारंभिक सूचना पहुँचाने वाले होते हैं ज्यादातर ग्रामीण लोग, किसान या उस जगह पर घूमने जाने वाले या काम करने वाले लोग , जैसे कभी कभी चरवाहे भी बताते हैं कि फलाँ जगह पर उन्हें कोई प्रतिमा मिली है या कोई सिक्का या बर्तन, पॉटरी या कोई स्क्रेपर मिला है । कभी किसी किसान को खेत में हल चलाते हुए ज़मीन के नीचे भी कुछ मिल जाता है । कभी मकान बनाने के लिए नींव खोदते हुए कुछ वस्तुएँ या कोई संरचना दिख जाती है । कभी जंगल में लकड़ी काटने वाले लकड़हारे या शिकारी जो बहुत भीतर तक जाते हैं सतह पर पड़े किसी अवशेष को देखकर ऐसी सूचना देते हैं ।"
"लेकिन सर क्या लोग इमानदारी से ऐसी सूचना देते हैं ? " रवीन्द्र ने प्रश्न किया । सर ने कहा .." अरे नहीं.. उन लोगों को यह पता थोड़े ही होता है कि सरकार का कोई पुरातत्व विभाग है । वे लोग अक्सर अपने ग्रामीण साथियों को यह बात बताते हैं । फिर भी अगर हम तक सीधे सूचना न भी पहुँचे तो कहीं कुछ मिला है यह बात धीरे धीरे फैलती ही है । हालाँकि हमारे यहाँ छुपाने की प्रवृत्ति ज्यादा है, सिक्के वगैरह मिलते हैं तो लोग बताते ही नहीं, मूर्तियाँ मिलती हैं तो लोग घरों में रख लेते हैं या गाँव के बीच कहीं स्थापित कर पूजा शुरू कर देते हैं । तस्कर या चोर लोग तो वैसे भी बात गुप्त रखते हैं । लेकिन ग्राम सहायक, पटवारी, पुलिस या पत्रकारों के माध्यम से बात हम तक यानि पुरातत्व विभाग तक पहुँच ही जाती है । फिर हम प्राप्त सूचनाओं के आधार पर सर्वे करते हैं और उन सूचनाओं की प्रामाणिकता की जाँच करते हैं, फिर प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा जाता है, मंजूरी मिलने के बाद पूरी कार्य योजना बनाई जाती है, खर्च की राशि तय की जाती है । कार्य प्रारंभ करने से पूर्व कार्यस्थल पर जाकर यह तय करते हैं कि खुदाई की शुरुआत कहाँ से करनी होगी, कहाँ ट्रेंच बनानी होगी, किस लेयर से शुरूआत करना है, कहाँ तक खुदाई करना है आदि आदि ..।
"हाँ, एक बात बताना तो मैं भूल ही गया ।" सर ने कहा । "आजकल किसी साईट के बारे में हवाई जहाज के माध्यम से भी सूचना प्राप्त होती है इस हवाई सर्वेक्षण को एरोग्राफ़ी कहते हैं एक बार सेकण्ड वर्ल्ड वार के समय ऐसा ही हुआ था । युद्ध के दौरान जब सैनिक हवा में उड़ान भर रहे थे फिलिस्तीन और इज़राइल के पास सैनिकों को एक लुप्त बस्ती होने का आभास हुआ ।" "लेकिन सर इतनी ऊपर से कोई अवशेष कैसे दिखाई देता होगा?" रवीन्द्र ने सवाल किया ।
" ऐसे डायरेक्ट थोड़े ही दिखता है भाई ।" सर ने कहा " उन्हें तो जंगल और वहाँ के पेड़-पौधे ही दिखाई दिए लेकिन सब ओर जहाँ हरे भरे जंगल थे बीच में एक हिस्सा ऐसा था जो अविकसित था और जहाँ के पेड़ पौधे स्वस्थ्य नहीं थे, उनके पत्ते अन्य पेड़ों के पत्तों की तुलना में कुछ पीले थे सो उन्हें संदेह हुआ कि यहाँ नीचे कोई बस्ती दबी होगी तभी पेड़ पौधों को ठीक से ख़ुराक नहीं मिल पाई है । उसके बाद उनकी सूचना के आधार पर वहाँ खुदाई की गई, और वहाँ पूरा एक शहर निकल आया तुम लोगों ने शायद जेरोम शहर का नाम सुना होगा यह वही शहर है । इसके अलावा अब मरीन आर्क्यालोजी नाम की एक ब्रांच भी है जिसमे समुद्र के भीतर डूबी हुई सभ्यताओं की खोज गोताखोरों द्वारा की जाती है । पुरातत्ववेत्ताओं को बाक़ायदा इसके लिए प्रशिक्षण भी दिया जाता है । "
सर ने एक बार में ही हमें संक्षेप में पुरातात्विक साइट्स सम्बन्धी सूचनाएँ प्राप्त होने से लेकर उन पर क्रियान्वयन की पूरी प्रक्रिया बता दी थी । हालाँकि यह प्रारंभिक जानकारी थी और यह हम क्लास में भी पढ़ चुके थे लेकिन किसी साईट पर पहुँचकर प्रत्यक्ष रूप से यह जानकारी प्राप्त करने का यह पहला अवसर था । आखिर थ्योरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क तो होता ही है ।
सर जैसे ही खामोश हुए मेरे भीतर के कवि ने दर्शन बखानना शुरू कर दिया “ लेकिन कितना अजीब है ना, ऐसे जीवन के बारे में सोचना जो अचानक लुप्त हो गया हो । जैसे आज यहाँ चूल्हा जल रहा है, माताएँ खाना पका रही हैं, बच्चे खेल रहे है, लड़कियाँ पेड़ों पर झूला डालकर झूल रही हैं, कोई चरवाहा जंगल में किसी पेड़ के नीचे बैठा बंसी बजा रहा है , खेतों में किसान हल चला रहे हैं, रात में चौपाल पर गाना-बजाना चल रहा है, शादी-ब्याह में नाच-गाना चल रहा है, मंदिर में भजन चल रहे हैं और अचानक रात में भूकम्प आ जाए या नदी में बाढ़ आ जाए या बस्ती में आग लग जाए और सुबह सब खल्लास ।“
डॉ. वाकणकर मेरी बात ध्यान से सुन रहे थे उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा " लेकिन सभ्यता के विनाश से पूर्व का चित्र इतना भी रूमानी नहीं है भाई । मनुष्य के जीवन में दुखों की कोई कमी तो है नहीं, सामान्य मनुष्य सदा से शोषित ही रहा है, कभी प्राकृतिक विपदा की वज़ह से तो कभी खुद की वज़ह से उसका विनाश हुआ है । चारागाह या खेतों के लिए, धन -संपत्ति के लिए मनुष्य ही मनुष्य पर आक्रमण करता रहा है । कई बार रोजी-रोटी की कशमकश भी उसे बस्ती छोड़ने को विवश कर देती है, गाँव के गाँव खाली हो जाते हैं ऐसा तो अब भी होता है । लेकिन मनुष्य फिर भी हिम्मत नहीं हारता, वह नई जगह पर अपनी बस्ती बसाता है, हालाँकि अगली बार वह इतना सावधान तो रहता है कि फिर हादसे की पुनरावृत्ति न हो ।
"सचमुच यह मनुष्य महान है सर ।" मैंने कहा । "हाँ यह मनुष्य ही है.." सर ने कहा "जिसने प्रकृति से युद्ध करके जीना सीखा है और जीवन को बेहतर बनाया है । जैसे कि आजकल आपदा प्रबंधन शब्द तुमने सुना होगा बाढ़, सुनामी, अकाल इन सब स्थितियों से निपटना अब मनुष्य पहले की अपेक्षा बेहतर जानता है और यह उसने पिछले अनुभवों से ही सीखा है । इसीलिए जीवन के भविष्य के बारे में जानने के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है जीवन का अतीत जानना इसलिए कि अतीत ही जीवन के भविष्य का मार्ग प्रशस्त करता है । इस पर हमारे भविष्य की नीव टिकी है, हर नया आविष्कार या खोज पहले की गई खोज के आधार पर ही आगे बढ़ाया जाता है ।“ सर ने बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी ..अब सर खुजाने की बारी मेरी थी ।
हमारा आज का दिन भी ऐसे ही अपनी
जिज्ञासाओं को सर के सामने रखकर उनका समाधान पाने में बीत गया । हम लोग मजदूरों को
खुदाई करते हुए देखते रहे और सोचते रहे क्या इस सभ्यता में निवास करने वाले इन्ही
मजदूरों के पूर्वज रहे होंगे या वे कोई और थे जो कहीं और से आये थे और न जाने कहाँ
चले गए । शाम तक आज का हमारा प्रशिक्षण समाप्त हो चुका था और हम लोग अपने तम्बुओं
में लौट आये थे । भाटीजी के हाथों की गर्मागर्म चाय पीने के बाद हम लोग टहलने निकल
गए और लगभग एक घंटे में लौट आये । सच कहें तो हम लोगों में से किसी का मन यहाँ नहीं
लग रहा था ऐसा लग रहा था कि जल्द से जल्द यह प्रशिक्षण समाप्त हो और हम लोग अपने
हॉस्टल लौट जाएँ हालाँकि हम लोग अपने मन को यह कहकर दिलासा दे रहे थे कि इससे क्या
फ़र्क पड़ता है वहाँ रहें या यहाँ रहें घर से तो दूर हैं ही । देर रात तक हम लोग बात
करते रहे । हम लोगों की बातों में घर की याद , माँ के हाथों का बना
खाना ,अपने बचपन की शरारतें जैसे विषय शामिल रहे ।
🔲
*शरद कोकास* 🔲
गुरुवार, 14 मई 2026
8-भीमबैठका के आलू वाले बाबा
📕 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📕
✍🏽 *शरद कोकास* ✍🏽











.jpg)
.jpg)
.jpg)
.jpg)

.jpg)

.jpg)
.jpg)