शुक्रवार, 15 मई 2026

9.यह वो जगह नहीं है जो हमने पहले देखी थी



📗 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📗

✍🏽 *शरद कोकास* ✍🏽

*इससे पहले के भागों में आपने पढ़ा*  कि विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययन शाला के छात्र शरद कोकास , रवीन्द्र भारद्वाज, अशोक त्रिवेदी, अजय जोशी और राममिलन शर्मा उज्जैन के निकट दंगवाड़ा नामक स्थान पर डॉ.वि श्री वाकणकर के निर्देशन में चल रहे पुरातात्विक उत्खनन शिविर में पहुँचे हैं । आज उनका तीसरा दिन है । पहली शाम चम्बल नदी के किनारे स्थित टीले पर चाँद की रोशनी में बिताने के बाद रोज सुबह शाम शुरू हुई उनकी यह गपशप देर रात तक चलती है जिसमे वे ग्रीक और रोम की सभ्यता के विभिन्न पात्रों के विषय में बात करते हैं । उनकी बातचीत में ग्रीक के हेराक्लीज़ या हरक्युलिस शामिल हैं सो वहीँ पंडित राममिलन उन्हें हमारे यहाँ के हनुमान जी के बारे में बताते हैं । उसके बाद वे ग्रीक की हेलेन , मिस्त्र के पिरामिड , और हम्मुराबी के बारे में भी बात करते हैं नोकझोंक के बाद नींद के आगोश में जाने के बाद होती है कैंप की सुबह .. लीजिये पढ़िए अब तीसरे दिन की दोपहर से रात तक की डायरी । इस भाग में बहुत महत्वपूर्ण सूचनाएँ हैं जिनसे आप जानेंगे कि किसी पुरातात्विक स्थल के बारे में कैसे पता चलता है और पुरातत्ववेत्ता वहाँ तक कैसे पहुंचते हैं...

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 9⃣ *भाग नौ*  9⃣

*वो सपनों का गाँव* 

          हम लोग जब अपने शहर के किसी स्थान को देखते हैं तो अक्सर सोचते हैं कि आज से बरसों पहले वह स्थान कैसा रहा होगा ।  हमारे बचपन में यह शहर ऐसा नहीं था, न इतनी इमारतें थीं न इतनी गाड़ियाँ, न इतनी पक्की सड़कें थीं न ही इतने लोग थे । वर्तमान के अतीत की कल्पना करना वहीं तक संभव है जहाँ तक वह अतीत हमारा देखा हुआ होता है लेकिन हम उससे पहले की कल्पना नहीं कर पाते हैं इसलिए कि हमारे जन्म से पूर्व के दृश्य हमारे देखे हुए नहीं होते l फिर भी हम किताबों में पढ़कर और उस समय के चित्र देखकर कल्पना कर सकते हैं कि उस समय वहाँ का जीवन कैसा रहा होगा l

          दंगवाड़ा के इस टीले पर बैठकर मैं भी उस समय की कल्पना करने लगा जब यहाँ सचमुच की कोई बस्ती रही होगी हालाँकि मेरे पास न उस समय का कोई चित्र था न ही कोई किताब थी जिसमें मैं उस ताम्राश्म युगीन ग्राम्य जीवन की कोई झलक देख सकूँ । मेरे पास कल्पना करने के लिए बस यही कुछ टूटे -फूटे अवशेष थे जो सदियों पहले किसी बाढ़ या किसी आपदा के कारण मिटटी की इन सतहों के नीचे दब गए थे ।

          टीले पर खुदी हुई निखात की ओर देखते हुए अचानक मैं उस अतीत की कल्पना में खो गया और सोचने लगा ..यहाँ भी कभी कोई खूबसूरत बस्ती रही होगी जहाँ पेड़ों की घनी छाँव के नीचे खूबसूरत झोपड़ियाँ रही होंगी जिनमे गाँव के सीधे-सादे लोग रहा करते होंगे । गाँव की स्त्रियाँ चम्बल नदी से अपने मटकों में पानी भरकर लाया करती होंगी, किसान दिन भर अपने खेतों में हल चलाने के बाद शाम को जब थके-मांदे घर लौटते होंगे तो उनकी स्त्रियाँ ताम्बे की थाली में उन्हें खाना परोसती होंगी ..। सोचते हुए अचानक मेरे मुंह से बोल फूट पड़े .."वो अमुआ का झूलना वो पीपल की छाँव, घूँघट में जब चाँद था मेहंदी लगे थे पाँव .. आज उजड़ के रह गया वो सपनों का गाँव .. ।" 


          गीत गुनगुनाते हुए भी मेरे मन में कुछ और सवाल कौंध रहे थे ..लेकिन अच्छी खासी पनपती हुई यह सभ्यतायें अचानक लुप्त कैसे हो जाती थीं ? ठीक है एक पीढ़ी ख़त्म हो जाती होगी लेकिन उसका स्थान दूसरी पीढ़ी को ले लेना चाहिए ,जीवन का तो निरंतर विकास होता है ना, जीवन तो यहाँ फलना -फूलना चाहिए था जैसे कि हम आजकल देखते हैं ,कुछ दिन पहले जहाँ ख़ाली ज़मीन होती है कुछ दिनों बाद वहाँ इमारतें खड़ी हो जाती है, फिर वहाँ बस्ती बढ़ती ही जाती है ..लेकिन यहाँ ऐसा क्या हुआ होगा कि सब कुछ ख़त्म हो गया ..?”

          वाकणकर सर मजदूरों को उस दिन के कार्य के लिए आवश्यक निर्देश देकर हम लोगों के पास आ गए थे । मैंने अपने मन में उठते सवाल को आख़िर उनसे पूछ ही लिया। सर ने कहना शुरू किया तुमने हाल-फिलहाल किसी सभ्यता को लुप्त होते नहीं देखा है ना इसलिए  ऐसा कह रहे हो । लेकिन पिछले हजारों बरसों में ऐसा कई बार हुआ है। जीवन अपनी गति से चलता रहता है लेकिन कभी अचानक उस पर विराम भी लग जाता है । सभ्यताओं के समाप्त हो जाने के एक नहीं अनेक कारण हैं । अक्सर नदियों के किनारे बसी बस्तियाँ भीषण बाढ़ में डूब जाती हैं । भूकम्प, ज्वालामुखी, तूफान, अकाल, बाढ़  जैसी प्राकृतिक आपदाओं की वज़ह से भी लोग वहाँ से पलायन कर जाते हैं या समाप्त हो जाते हैं । फिर नदियाँ भी कालांतर में अपना मार्ग बदलती हैं तो उनके किनारे बसे लोगों को बस्ती छोड़ कर जाना पड़ता है । समुद्र के भीतर भी भूकम्प आते हैं तो उनके किनारे की बस्तियाँ नष्ट हो जाती हैं । इसके अलावा बस्तियों के नष्ट होने के पीछे आगजनी, दुश्मनों के आक्रमण, हिंसक प्राणियों के हमले, भोजन या जल की अनुपलब्धता जैसे अनेक कारण हैं ।


          "तो सर हमें पता कैसे चलता है कि कौनसी बस्ती का विनाश किस कारण से हुआ ?" अजय ने सवाल किया । सर ने कहा " किसी भी साइट पर उत्खनन करते हुए उसकी विभिन्न परतों में हर स्तर पर हमें विनाश के कारण मिल जाते हैं । जैसे यदि वस्तुओं पर आग से जलने के चिन्ह मिलते हैं तो हम अनुमान लगाते हैं कि वह बस्ती किसी अग्निकांड में नष्ट हुई होगी । बाढ़ से नष्ट हुई बस्तियों में घर के भीतर की वस्तुओं पर सूखी हुई गाद दिखाई देती है, समुद्र के किनारे पर यदि किसी ऊंची दीवार पर रेत दिखाई दे तो समझो वहाँ सुनामी की वज़ह से विनाश हुआ होगा । भूकंप और ज्वालामुखी की वज़ह से नष्ट होने वाली बस्तियों में भी खुदाई में ऐसे ही सम्बंधित प्रमाण मिलते हैं ।

          मेरे मन में उत्खनन के तकनीकी पक्ष का ज्ञान प्राप्त करने के साथ साथ उत्खनन के कारणों को जानने की जिज्ञासा अधिक थी । दंगवाडा की इस साईट पर विगत एक माह से उत्खनन चल रहा था । हम लोग उत्खनन प्रारंभ होने के कुछ समय बाद दंगवाड़ा पहुँचे थे इसलिए  पूर्व में हो चुके काम से खुद को अपडेट करना ज़रूरी था । हालाँकि  हम लोग प्रशिक्षणार्थी थे और हमारी  कोई प्रत्यक्ष भूमिका उत्खनन में नहीं थी फिर भी भविष्य में पुरातत्ववेत्ता बनने के लिए प्रारंभिक आवश्यक जानकारी से लैस होने की अनिवार्यता तो थी ही । विद्यार्थी थे सो प्रश्न करने की भी हमें छूट थी । हम भी ज्ञान प्राप्ति का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहते थे । बचपन से सुनते आ रहे थे कि पुरातत्ववेत्ताओं को जैसे ही पता चलता है कहीं कोई सभ्यता ज़मीन की परतों के नीचे दबी हुई है वे वहाँ पहुँच जाते हैं और खुदाई शुरू कर देते हैं । प्रश्न यह था कि उन्हें पता कैसे चलता है ? अब उन्हें सपना  तो नहीं आता होगा ।


          मैंने रवीन्द्र के सामने अपनी जिज्ञासा रखी तो रवीन्द्र ने कहा "चलो सर से ही पूछ लेते हैं  । "  फिर वह सर से मुखातिब हुआ .." अच्छा सर, यह बताइये , पुरातत्ववेत्ता को यह कैसे पता चलता है कि उसे कहाँ खुदाई करना है ? ”  तुम्हारा तात्पर्य इस बात से तो नहीं है कि हमें यह कैसे पता चलता कि कौनसी सभ्यता कहाँ दबी हुई है ? “ डॉ.वाकणकर ने प्रतिप्रश्न किया । जी । रवीन्द्र ने गर्दन हिलाई ।

          "चलो तुम्हारी बात को यहाँ से समझने का प्रयास करते हैं ।डॉ. वाकणकर ने बात जारी रखी दरअसल पुरातत्ववेत्ता विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त सूचना के आधार पर यह तय करते हैं कि उन्हें उत्खनन का कार्य कहाँ से प्रारम्भ करना है । अब हम देखते हैं कि उन्हें यह सूचनाएँ कहाँ से व कैसे प्राप्त होती हैं । यह तो हम देखते ही आ रहे हैं कि अधिकांश सभ्यताएँ बसाहट से दूर पाई जाती हैं । अक्सर जंगलों में या किसी नदी के किनारे किसी टीले पर इन बस्तियों के या सभ्यताओं के अवशेष ज़मीन के भीतर दबे होते हैं । लेकिन कभी कभी ऐसा होता है कि  तेज़ वर्षा के कारण, भूस्खलन से या किसी उथल - पुथल की वज़ह से कुछ चीज़ें सतह पर आ जाती हैं । कुछ अवशेष जंगलों के भीतर यूँ ही बिखरे हुए होते हैं जहाँ वर्षों से कोई गया नहीं होता है सो इसकी जानकारी किसी को नहीं होती ।

          "लेकिन सर इनकी जानकारी सरकार तक कैसे पहुँचती है ?" अजय ने सवाल किया । सर ने कहा "पुरातत्व विभाग या प्रशासन तक प्रारंभिक सूचना पहुँचाने वाले होते हैं ज्यादातर ग्रामीण लोग, किसान या उस जगह पर घूमने जाने वाले या काम करने वाले लोग , जैसे कभी कभी चरवाहे भी बताते हैं कि फलाँ जगह पर उन्हें कोई प्रतिमा मिली है या कोई सिक्का या बर्तन, पॉटरी या कोई स्क्रेपर मिला है । कभी किसी किसान को खेत में हल चलाते हुए ज़मीन के नीचे भी कुछ मिल जाता है । कभी मकान बनाने के लिए नींव खोदते हुए कुछ वस्तुएँ या कोई संरचना दिख जाती है ।  कभी जंगल में लकड़ी काटने वाले लकड़हारे या शिकारी जो बहुत भीतर तक जाते हैं सतह पर पड़े किसी अवशेष को देखकर ऐसी सूचना देते हैं ।"

          "लेकिन सर क्या लोग इमानदारी से ऐसी सूचना देते हैं ? " रवीन्द्र ने प्रश्न किया । सर ने कहा .." अरे नहीं.. उन लोगों को यह पता थोड़े ही होता है कि सरकार का कोई पुरातत्व विभाग है । वे लोग अक्सर अपने ग्रामीण साथियों को यह बात बताते हैं । फिर भी अगर हम तक सीधे सूचना न भी पहुँचे  तो कहीं कुछ मिला है यह बात धीरे धीरे फैलती ही है ।  हालाँकि  हमारे यहाँ छुपाने की प्रवृत्ति ज्यादा है, सिक्के वगैरह मिलते हैं तो लोग बताते ही नहीं, मूर्तियाँ मिलती हैं तो लोग घरों में रख लेते हैं या गाँव के बीच कहीं स्थापित कर पूजा शुरू कर देते हैं । तस्कर या चोर लोग तो वैसे भी बात गुप्त रखते हैं । लेकिन ग्राम सहायक, पटवारी, पुलिस या पत्रकारों  के माध्यम से बात हम तक यानि पुरातत्व विभाग तक पहुँच ही जाती है । फिर हम प्राप्त सूचनाओं के आधार पर सर्वे करते हैं और उन सूचनाओं की प्रामाणिकता की जाँच करते हैं, फिर प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा जाता है, मंजूरी मिलने के बाद पूरी कार्य योजना बनाई जाती है, खर्च की राशि  तय की जाती है । कार्य प्रारंभ करने से पूर्व कार्यस्थल पर जाकर यह  तय करते हैं कि खुदाई की शुरुआत कहाँ से करनी होगी, कहाँ ट्रेंच बनानी होगी, किस लेयर से शुरूआत  करना है, कहाँ तक खुदाई करना है आदि आदि  ..।

          "हाँ, एक बात बताना तो मैं भूल ही गया ।" सर ने कहा । "आजकल किसी साईट के बारे में हवाई जहाज के माध्यम से भी सूचना प्राप्त होती है इस हवाई सर्वेक्षण को एरोग्राफ़ी कहते हैं एक बार सेकण्ड वर्ल्ड वार के समय ऐसा ही हुआ था । युद्ध के दौरान जब सैनिक हवा में उड़ान भर रहे थे फिलिस्तीन और इज़राइल के पास सैनिकों को एक लुप्त बस्ती होने का आभास हुआ ।" "लेकिन सर इतनी ऊपर से कोई अवशेष कैसे दिखाई देता होगा?" रवीन्द्र ने सवाल किया ।

          " ऐसे डायरेक्ट थोड़े ही दिखता है भाई ।" सर ने कहा " उन्हें तो जंगल और वहाँ के पेड़-पौधे ही दिखाई दिए लेकिन सब ओर जहाँ हरे भरे जंगल थे बीच में एक हिस्सा ऐसा था जो अविकसित था और जहाँ के पेड़ पौधे स्वस्थ्य नहीं थे, उनके पत्ते अन्य पेड़ों के पत्तों की तुलना में कुछ पीले थे सो उन्हें संदेह हुआ कि यहाँ नीचे कोई बस्ती दबी होगी तभी पेड़ पौधों को ठीक से ख़ुराक नहीं मिल पाई है । उसके बाद उनकी सूचना के आधार पर वहाँ खुदाई की गई, और वहाँ पूरा एक शहर निकल आया तुम लोगों ने शायद जेरोम शहर का नाम सुना होगा यह वही शहर है । इसके अलावा अब मरीन आर्क्यालोजी नाम की एक ब्रांच भी है जिसमे समुद्र के भीतर डूबी हुई सभ्यताओं की खोज गोताखोरों द्वारा की जाती है । पुरातत्ववेत्ताओं को बाक़ायदा इसके लिए प्रशिक्षण भी दिया जाता है । "

          सर ने एक बार में ही हमें संक्षेप में पुरातात्विक साइट्स सम्बन्धी सूचनाएँ प्राप्त होने से लेकर उन पर क्रियान्वयन की पूरी प्रक्रिया बता दी थी । हालाँकि यह प्रारंभिक जानकारी थी और यह हम क्लास में भी पढ़ चुके थे लेकिन किसी साईट पर पहुँचकर प्रत्यक्ष रूप से यह जानकारी प्राप्त करने का यह पहला अवसर था । आखिर थ्योरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क तो होता ही है ।

          सर जैसे ही खामोश हुए मेरे  भीतर के कवि ने दर्शन बखानना शुरू कर दिया लेकिन कितना अजीब है ना, ऐसे जीवन के बारे में सोचना जो अचानक  लुप्त हो गया हो । जैसे आज यहाँ चूल्हा जल रहा है, माताएँ  खाना पका रही हैं, बच्चे खेल रहे है, लड़कियाँ पेड़ों पर झूला डालकर झूल रही हैं, कोई चरवाहा जंगल में किसी पेड़ के नीचे बैठा बंसी बजा रहा है , खेतों में किसान हल चला रहे हैं, रात में चौपाल पर गाना-बजाना चल रहा है, शादी-ब्याह में नाच-गाना चल रहा है, मंदिर में भजन चल रहे हैं और अचानक रात में भूकम्प आ जाए  या नदी में बाढ़ आ जाए या बस्ती में आग लग जाए और सुबह सब खल्लास 

          डॉ. वाकणकर मेरी बात ध्यान से सुन रहे थे उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा " लेकिन सभ्यता के विनाश से पूर्व का चित्र इतना भी रूमानी नहीं है भाई । मनुष्य के  जीवन में दुखों की कोई कमी तो है नहीं, सामान्य मनुष्य सदा से शोषित ही रहा है, कभी प्राकृतिक विपदा की वज़ह से तो कभी खुद की वज़ह से उसका विनाश हुआ है । चारागाह या खेतों के लिए, धन -संपत्ति के लिए मनुष्य ही मनुष्य पर आक्रमण करता रहा है । कई बार रोजी-रोटी की कशमकश भी उसे बस्ती छोड़ने को विवश कर देती है, गाँव के गाँव खाली हो जाते हैं  ऐसा तो अब भी होता है । लेकिन मनुष्य फिर भी हिम्मत नहीं हारता, वह नई जगह पर अपनी बस्ती बसाता है, हालाँकि अगली बार वह इतना सावधान तो रहता है कि फिर हादसे की पुनरावृत्ति न हो ।

          "सचमुच यह मनुष्य महान है सर ।" मैंने कहा । "हाँ यह मनुष्य ही है.." सर ने कहा "जिसने प्रकृति से युद्ध करके जीना सीखा है और जीवन को बेहतर बनाया है । जैसे कि आजकल आपदा प्रबंधन शब्द तुमने सुना होगा बाढ़, सुनामी, अकाल इन सब स्थितियों से निपटना अब मनुष्य पहले की अपेक्षा बेहतर जानता है और यह उसने पिछले अनुभवों से ही सीखा है । इसीलिए  जीवन के भविष्य के बारे में जानने के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है जीवन का अतीत जानना इसलिए कि अतीत ही जीवन के भविष्य का मार्ग प्रशस्त करता है । इस पर हमारे भविष्य की नीव टिकी है, हर नया आविष्कार या खोज पहले की गई खोज के आधार पर ही आगे बढ़ाया जाता है ।सर ने बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी ..अब सर खुजाने की बारी मेरी थी ।

          हमारा आज का दिन भी ऐसे ही अपनी जिज्ञासाओं को सर के सामने रखकर उनका समाधान पाने में बीत गया । हम लोग मजदूरों को खुदाई करते हुए देखते रहे और सोचते रहे क्या इस सभ्यता में निवास करने वाले इन्ही मजदूरों के पूर्वज रहे होंगे या वे कोई और थे जो कहीं और से आये थे और न जाने कहाँ चले गए । शाम तक आज का हमारा प्रशिक्षण समाप्त हो चुका था और हम लोग अपने तम्बुओं में लौट आये थे । भाटीजी के हाथों की गर्मागर्म चाय पीने के बाद हम लोग टहलने निकल गए और लगभग एक घंटे में लौट आये । सच कहें तो हम लोगों में से किसी का मन यहाँ नहीं लग रहा था ऐसा लग रहा था कि जल्द से जल्द यह प्रशिक्षण समाप्त हो और हम लोग अपने हॉस्टल लौट जाएँ हालाँकि हम लोग अपने मन को यह कहकर दिलासा दे रहे थे कि इससे क्या फ़र्क पड़ता है वहाँ रहें या यहाँ रहें घर से तो दूर हैं ही । देर रात तक हम लोग बात करते रहे । हम लोगों की बातों में घर की याद , माँ के हाथों का बना खाना ,अपने बचपन की शरारतें जैसे विषय शामिल रहे ।

 

🔲 *शरद कोकास*  🔲

गुरुवार, 14 मई 2026

8-भीमबैठका के आलू वाले बाबा


यानी हम सबके प्रिय डॉ वि श्री वाकणकर जिन्होंने 1957 मे भीमबैठका मे चट्टानों पर बनाए गए चित्रों की खोज की थी

📕 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📕

✍🏽 *शरद कोकास* ✍🏽

उज्जैन से बड़नगर जाने के मार्ग पर इंगुरिया है जहां से भीतर की ओर एक गाँव है दंगवाड़ा यहाँ चम्बल नदी के किनारे एक ताम्रशमयुगीन साइट मिली थी जहाँ सन 1979- 80 मे विक्रम यूनिवर्सिटी और मध्यप्रदेश शासन द्वारा उत्खनन करवाया गया था । विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला के छात्रों के लिए इस उत्खनन मे शामिल होना उनके कोर्स या प्रेक्टिकल के अंतर्गत शामिल था ।

तो अब हम अतीत मे वर्तमान का प्रक्षेपण करते हुए चलते हैं उन दिनों मे जब यह छात्र उत्खनन के लिए 'दंगवाड़ा' नामक स्थल पर आये हुए हैं । आने के बाद से वे विभिन्न चर्चाओं में लगे हैं और अब तक उनकी बातचीत में अयनांत की चर्चा, हरक्युलिस और हनुमान, मिस्त्र के पिरामिड, ग्रीक माइथोलॉजी, ट्रॉय का युद्ध, सिक्कों के बारे में बातचीत आदि शामिल हो चुके हैं । आज उनका तीसरा दिन है और सुबह हो चुकी है । चम्बल के घाट पर स्नानादि से निवृत होकर और भाटीजी की भोजनशाला में नाश्ता करने के उपरान्त अब सभी छात्र ट्रेंच पर पहुँच चुके हैं ..अब आगे पढ़िए

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8⃣ *भाग -आठ* 8⃣

भाग 8 - *भीमबैठका के आलू वाले बाबा*

उज्जैन के निकट दंगवाड़ा के इस पुरातात्विक उत्खनन शिविर में हम लोगों का यह तीसरा दिन है । हालाँकि सही ढंग से काम की शुरुआत का यह पहला ही दिन था । परसों हम लोग पहुँचे थे और कल का दिन तो केवल निरीक्षण में ही बीत गया था ।

आज हम लोग बिलकुल ठीक टाइम पर साईट पर पहुँच गये । डॉ.वाकणकर अपना चोगे नुमा काले रंग का लम्बा सा कोट पहने ट्रेंच पर उपस्थित थे और मजदूरों से पिछले दिन के काम की रपट लेते हुए उनके हालचाल पूछ रहे थे । 

यह फरवरी की एक सुहानी सुबह थी और बरगद के घने पत्तों से झाँकती हुई नर्म धूप हम तक पहुँच रही थी हालाँकि वातावरण में उपस्थित ठण्ड से वह खौफ़ खा रही थी और कुछ सहमी सी थी । हमने धूप को सलाम किया और उससे कहा ..डरो मत ठण्ड तुम्हें खा नहीं जायेगी ।
वाकणकर सर अपने दोनों हाथ किसी क्रिकेट अम्पायर के कोट की तरह दिखाई देने वाले अपने कोट की लम्बी जेबों के भीतर डाले हुए थोड़ा झुककर ट्रेंच की गहराई देख रहे थे । कार्य प्रारंभ करने से पूर्व यह परीक्षण आवश्यक होता है । मेरी इच्छा उनके हाथों को देखने की हो रही थी । मैं जानता था यही वे हाथ हैं जो इतिहास में गहराई तक उतरने का हौसला रखते हैं । 

रवीन्द्र ने देखा कि मैं सर के कोट को बहुत ध्यान से देख रहा हूँ तो जाने कैसे उसने मेरे मन की बात समझ ली । "पता है शरद " उसने कहा ... " सर हमेशा ऐसे ही लम्बी लम्बी जेबों वाले कोट पहनते हैं, ऐसे ही इनके एक कोट का किस्सा भीमबैठका गुफ़ाओं में शैलचित्रों की खोज से भी जुड़ा है । 

"अच्छा !" मुझे वह किस्सा जानने की उत्सुकता हो रही थी.. " कोट का भीमबैठका से क्या सम्बन्ध है ? ऐसा क्या हुआ था, बताओ तो .." मैंने उससे पूछा ।

रवीन्द्र ने धीमी आवाज़ में बताना शुरू किया .." यह सन सत्तावन की बात है । वाकणकर सर एक बार भोपाल होशंगाबाद मार्ग से कहीं जा रहे थे । अचानक बातों बातों में उनके एक सहयात्री ग्रामीण ने बताया कि साहब यहाँ जंगल के अन्दर भूत -प्रेतों के फोटो बने हुए हैं । वाकणकर साहब भूत-प्रेत में तो विश्वास करते नहीं हैं लेकिन उन्हें कुछ खटका हुआ, हो सकता है कोई प्राचीन धरोहर इन जंगलों में हो ।" 
"अरे हाँ.." मैंने बीच में रवीन्द्र को टोकते हुए कहा "अजंता की गुफाओं की खोज भी तो ऐसे ही हुई थी ना, एक अंग्रेज़ को किसी चरवाहे ने बताया था कि जंगल में कोई भूत का फोटो है फिर उसने दूरबीन से देखकर गुफाओं में चित्र ढूँढे थे ।" 

"हाँ ऐसा ही कुछ समझ लो ।" रवीन्द्र ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा " बस फिर क्या था, वे वहीं बस से उतर गए और जंगल के भीतर चले गए । वहाँ उन्हें एक बाबा की कुटिया मिली उन्होंने बाबा से वहाँ आने का अपना उद्देश्य बताया और उसी कुटिया में वे ठहर गए ।"
"फिर क्या हुआ ?" अब मुझे कहानी में मज़ा आ रहा था । "फिर.." रवीन्द्र ने मुझे उत्सुक जानकर मुस्कुराते हुए कहा । " अगले दिन वाकणकर सर जंगल के भीतर चले गए । वहाँ अभी जैसा कोई रास्ता तो था नहीं, बस जंगल ही जंगल था । फिर उन्हें बड़ी बड़ी चट्टानें मिलीं जिन पर चढ़ते - उतरते हुए वे पहली गुफ़ा तक पहुँच गए । 

उस पहली गुफ़ा में उन्हें जब आदिम मानव द्वारा बनाया गया पहला शैल चित्र मिला तो वे खुशी से उछल गए । फिर तो उन्होंने ठान लिया कि वे सुबह सुबह ही जंगल के भीतर निकल जाया करेंगे और गुफ़ाओं की खोज करेंगे ।
"यार, लेकिन गुफाओं की खोज से इस कोट का क्या ताल्लुक़ है? " मेरे दिमाग़ में अब भी वह कोट लहरा रहा था । " बता रहा हूँ ना भाई, इतने उतावले काहे हो रहे हो ।" रवीन्द्र ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और धीरे से कहा "अब वहाँ तो घना जंगल था । कुछ खाने पीने की व्यवस्था तो जंगल में थी नहीं । बाबाजी की कुटिया में भी कुछ नहीं था लेकिन कोई उनका भक्त उन्हें बोरा भर आलू दे गया था सो वे इसी चोगे नुमा कोट की जेब में बाबाजी की कुटिया से कुछ कच्चे आलू और माचिस रखकर जंगल के भीतर निकल जाते थे । 

वे दिन भर जंगल में भटककर लताओं और वृक्षों के झुरमुट के पीछे छुपी गुफाओं में हज़ारों साल पहले के मनुष्य द्वारा बनाई हुई रॉक पेंटिंग्स खोजते थे और शाम होते ही साधु बाबा की कुटिया में लौट आते । दिन में जब भी उन्हें भूख लगती वे आलू भूनकर खा लिया करते थे । । उनकी दाढ़ी बढ़ गई थी और हुलिया भी अजीब सा साधू सन्यासियों जैसा बन गया था ।
वे हमेशा जेब में आलू रखते थे और उन्हें भूनकर खाते थे इसलिए जंगल के पास के गाँव वासी उन्हें ‘आलू वाले बाबा‘ कहकर पुकारने लगे थे । आख़िर एक एक कर उन्होंने जंगल की गुफाओं में छिपे वे तमाम शैल चित्र ढूंढ निकाले जो उस आदिम मनुष्य ने बनाये थे । उनकी इस खोज के लिए उन्हें पद्मश्री अवार्ड हुई और सम्पूर्ण विश्व में उनका नाम हुआ । ऐसी होती है काम की लगन ।“

"लेकिन कुछ भी कहो, भीमबैठका की गुफाओं में शैलचित्रों की खोज बहुत महत्वपूर्ण काम है ।" मैंने कहा " अगर सर इन्हें नहीं खोजते तो न जाने और कितने साल यह चित्र जंगलों में लताओं और पेड़ों के बीच छुपे रहते । लेकिन उस आदिम मनुष्य के बारे में भी सोच कर देखो जिसने यहाँ ये चित्र बनाये होंगे । वैसे यहाँ कितने शैलाश्रय होंगे रवीन्द्र ? " रवीन्द्र ने बताया " यहाँ लगभग साढ़े सात सौ शैलाश्रय हैं जिनमें पाँच सौ शैलाश्रयों में चित्र बने हुए हैं जिनका काल चालीस हज़ार वर्ष से एक लाख वर्ष पूर्व तक का माना जाता है । इन आदिम गुफाओं में पूर्व पाषाण काल से मध्य पाषाण काल तक का मनुष्य रहता था ।
"भीमबैठका के इस पुरातात्विक क्षेत्र में इनके अलावा शिलाओं पर लिखी अनेक जानकारियाँ भी मिलती हैं । इन शैलचित्रों में उस आदिम मनुष्य के जीवन के अनेक क्षण चित्रित हैं जिनमें सामूहिक नृत्य, शिकार के दृश्य, पशु -पक्षी और वन्य प्राणियों के चित्र, युद्ध और मनुष्य के दैनिक क्रियाकलापों से जुड़े चित्र हैं । यह सारे चित्र विभिन्न खनिज और वानस्पतिक रंगों से बनाए गए हैं जिनमें गेरुआ, लाल, सफ़ेद रंग प्रमुख हैं कहीं कहीं पीले व हरे रंग का प्रयोग भी हुआ है ।" रवीन्द्र धीमी आवाज़ में वैश्विक महत्व के इन शैल चित्रों के बारे में बता रहा था ।
"बस कर भाई, तेरा तो पूरा निबंध रटा हुआ है ।" मैंने रवीन्द्र को रोकते हुए कहा " अब यह अपने कोर्स में भी नहीं है वर्ना मैं भी रट लेता ।" "तो मुन्ना, क्या जो चीज़ कोर्स में होगी वही रटेगा क्या और तुझे तो इस साल भी टॉप करना है फिर आगे चलकर कवि और कथाकार बनना है तुझे तो मनुष्य की इस कहानी में रूचि होना चाहिए ।" 
रवींद्र की बात सुनकर मुझे थोड़ी झेंप सी महसूस हुई " नहीं यार, मनुष्य की कहानी तो मुझे अच्छी तरह पता है ,दरअसल जब से तूने आलू का ज़िक्र किया है मुझे भूख सी लगने लगी है और मेरा आलूबोंडा खाने का मन हो रहा है ।" " धत तेरे की ..भुक्खड़ कहीं का । " रवींद्र ने कहा ।" कोई बात नहीं ,भाटी जी से कहेंगे कल नाश्ते में आलुबोंडा ही बनवायेंगे ।

रवींद्र कुछ देर तक चुप रहा फिर उसने गंभीर होकर कहा "अब तुझमें और उस आदिम इंसान में फ़र्क ही क्या है वह भी इसी तरह रात दिन सिर्फ़ खाने के बारे में ही सोचता रहता था । शिकार के लिए सुबह सुबह निकलता और देर रात घर लौटता फिर अगले दिन वही काम । 
हाँ याद आया, भीमबैठका के इन गुफ़ा चित्रों में उस आदिम मनुष्य के जीवन की दैनिक घटनाओं के अलावा उस मनुष्य के आदिम धर्म तथा उससे सम्बंधित अनुष्ठानों के चित्र भी हैं, जैसे मनुष्य जब शिकार करने जाता था तो वह हिरन की आकृति बनाकर उस पर भाले से वार करता था, उसकी मान्यता थी कि इससे शिकार अवश्य ही प्राप्त होगा । कुछ गुफाओं में शहद जमा करने के चित्र हैं , कुछ में हाथी घोड़ों की सवारी के चित्र हैं , कुछ में सूअर, कुत्तों,साँप बिच्छू और घडियालों के चित्र भी हैं । कार्बन डेटिंग से पता चला है कि प्याले नुमा कुछ निशान तो एक लाख वर्ष से भी पुराने हैं ।"
रवीन्द्र भीमबैठका के बारे में बताते हुए जैसे उन गुफाओं में ही पहुँच गया था । हम लोग पुरातत्व के छात्र है सो हमारी रूचि कुछ टेक्नीकल बातों में अधिक होती है सो उसका बताने का तरीका भी कुछ ऐसा ही था । "लेकिन यार उसने वे रंग बनाये कैसे होंगे जिनसे बनाए चित्र आज तक कायम हैं ? मेरे मन में यह सवाल शुरू से ही उमड़ रहा था । 

"भाई ,वह आदिम मानव इस तकनीक में तो वाकई बहुत आगे था ।" रवींद्र ने कहा " उसने यह चित्र प्राकृतिक रंगों से बनाये । प्रारंभिक चित्र तो उसने सफ़ेद और लाल रंग से बनाये जिसके लिए उसने मैंगनीज़, हैमेटाईट जैसे खनिजों और लाल पत्थरों का उपयोग किया । मध्यकाल के कुछ चित्र हरे व पीले रंगों से बने हैं इसके लिए उसने वनस्पतियों का उपयोग किया । इसके अलावा लकड़ी के कोयले से बने रंगों का भी प्रयोग है ।"
"लेकिन यह रंग अब तक टिके कैसे हैं?" मेरा अगला सवाल था ।रवीन्द्र ने बताया " हाँ यह बात थोड़ी आश्चर्यजनक लगती है लेकिन केमिकल प्रोसेस से यह पता लगा है कि इसके लिए उसने रंगों में पत्तियों का अर्क और जानवरों की चर्बी जैसी वस्तुएँ मिलाईं ।" 
"अरे वा !" मैंने कहा " इस तरह तो यह ऑइल पेंटिंग जैसी स्थाई वस्तु हो गई ।" " बिलकुल " रवीन्द्र ने कहा " इसके अलावा इनके बचे रहने का एक कारण और भी है जैसे अधिकांश चित्र गुफाओं की भीतरी दीवारों और छतों पर बने हैं इसलिए भी ये मौसम की मार से सुरक्षित रहे ।"

" अच्छा अब इतना बताया है तो यह भी बता दो कि इसका नाम भीमबैठका कैसे पड़ा ? किंवदंती तो यह है कि महाभारत के भीम से इसका सम्बन्ध है ।" मैंने रवीन्द्र को थोड़ा और कुरेदा । 

"तू भी ना यार.." रवीन्द्र ने कहा " किंवदंती तो किंवदंती होती है कोई भीम हुआ होता तब न उसकी बैठक होती । अब यहाँ सामने वाली जो विशालकाय चट्टान है उसे देखो तो लगता है कोई विशालकाय व्यक्ति उकडू बैठा हुआ है । अब विशालकाय के नाम से या तो पौराणिक पात्र भीम याद आता है या फिर कुम्भकरण । अब कुम्भकरण का नाम तो दिया नहीं जा सकता था क्योंकि वो दक्षिण में रहता था सो गुरुदेव ने इसे भीम का नाम दे दिया ।"
“क्या खुसुर-पुसुर चल रही है रे दुष्टों ?“ अचानक डॉ.वाकणकर का ध्यान हम लोगों की ओर गया । ‘सज्जनों’ और ‘दुष्टों’ उनके प्रिय सम्बोधन थे, जिनका अभिप्राय हम उनके बुलाने के तरीके से समझ जाते थे । जब उन्हें हम लोगों को कहीं ले जाना होता या किसी विषय पर जानकारी देनी होती वे हम लोगों को 'सज्जनों' कहते थे लेकिन हमारी बदमाशियों पर हमें डांटने के लहजे में 'दुष्टों' कहकर बुलाते थे, हालाँकि यह भी उनका प्यार भरा संबोधन ही होता था । हमें खुसुर-पुसुर करते देख उन्हें लगा कि हमारे दिमाग में कोई शरारत कुलबुला रही है सो उन्होंने हमें 'दुष्टों' कहकर सम्बोधित किया था । 

“ कुछ नहीं सर । ” रवीन्द्र ने मुस्कुराते हुए कहा “ हम लोग आपका कोट देख रहे थे ।”

“ऐसा क्या हे रे इस कोट में ?“ सर अपने कोट की दोनों जेबों में हाथ डाले हुए थे ,उन्होंने हाथों को थोड़ा सा फैलाया और भीतर की ओर झाँकते हुए कहा ।" सर, आप यही कोट पहनकर भीमबैठका के शैलचित्रों की खोज करने गए थे ना ?" मैंने उत्सुकतावश उनसे पूछ ही लिया । 

सर ज़ोर से हँसे .." अरे पगले वह उन्नीस सौ सत्तावन था .. इत्ते साल चलता है क्या कोई कोट ।" मैं थोड़ा झेंप गया फिर भी मैंने अपनी ओर से कहा " मतलब सर वह ऐसा ही मतलब इसी टाइप का लंबा सा कोट रहा होगा ना ।" सर को पता ही नहीं चला कि इस कोट के बहाने अभी अभी हम लोग भीमबैठका की सैर कर आये हैं । दरअसल वे ट्रेंच पर अपने काम में इतना डूबे हुए थे कि इन सब बातों के लिए उनके पास वक्त भी नहीं था ।

भीमबैठका की बात खतम औज़ारों की बात शुरू 

सर ने चश्मे के ऊपर से मेरी ओर देखा और कहा " ठीक ठीक है ..वो सब बातें बाद में ..अभी चलो आज तुम लोगों का परिचय उत्खनन में काम आनेवाले औज़ारों से करवाते हैं । किताबों में इनके चित्र तो तुम लोग देख ही चुके हो । देखो यह कुदाल है, खुदाई की शुरुआत इसी से होती है और यह खुरपी, प्रारम्भिक खुदाई के पश्चात इसका प्रयोग समय समय पर किया जाता है ताकि कुदाल के आघात से कोई वस्तु टूट ना जाए । 
फावड़ों से मिट्टी हटाई जाती है घमेलों में भरकर और यह ब्रश है, यह छोटे-बड़े कई प्रकार के होते हैं ,उत्खनन में प्राप्त वस्तुओं को इनसे साफ किया जाता है । किसी परत में किसी अवशेष का ऊपरी हिस्सा दिखाई देने पर उसे बाहर निकालने के लिए भी ब्रश का उपयोग किया जाता है ।
यह ब्लोअर है गाड़ी के भोंपू जैसा, इसे दबाने से हवा निकलती है, जहाँ ब्रश से भी नुकसान की सम्भावना हो वहाँ इसका उपयोग करते हैं । और भी बहुत से टूल्स हैं नापने के लिए टेप, कपड़े की थैलियाँ, मार्क करने के लिए पेन, बड़ा करके देखने के लिए यह मैग्निफाइंग ग्लास और प्रत्येक अवशेष का चित्र लेने के लिए यह कैमरा ।“
हमारे मन की तरलता में कुछ प्रश्न तैर रहे थे ...इतने महत्वपूर्ण कार्य के लिए इतने साधारण से औज़ार ? पुरातत्ववेत्ता क्या इन्ही की सहायता से ज़मीन के नीचे दबा इतिहास खोज कर निकालते हैं ? विज्ञान के बढ़ते चरणों के साथ तकनीक भी कितनी आगे बढ़ चुकी है लेकिन एक पुरातत्ववेत्ता के पास साईट पर कितने कम औज़ार होते हैं । 

सर ने हमारे मन की बात समझते हुए कहा “ इनके अलावा बाकी और भी टूल्स होते है जैसे माइक्रोस्कोप, फिर आगे काल निर्धारण के लिए उपयोग में आने वाले या कार्बन डेटिंग की मेथड में काम आने वाले भी बहुत से टूल्स होते हैं लेकिन वे यहाँ नहीं होते बल्कि लैब में होते है । बाक़ी सब टूल्स का उपयोग तो तुम लोग देख देख कर समझ जाओगे ।“ सर ने जैसे हम लोगों के दिमाग़ में चलने वाले सवाल पढ़ लिए थे । फिर जालियों की ओर इशारा करते हुए कहा “जैसे वो देखो अलग अलग मोटी - पतली जालियों वाली छन्नियाँ । निखात से निकली मिट्टी फेंकने से पहले इनमें छानना ज़रूरी होता है ।“
“और सर अगर बगैर छाने फैंक दे तो ?” राममिलन ने अपनी सहजता में सवाल किया । “अरे दुष्ट ! और कहीं उसके साथ नूरजहाँ की अंगूठी का हीरा भी फिका गया तो ?" डॉ. वाकणकर ने हँसते हुए कहा । 

हम लोगों ने सर के इस हास्य बोध पर ज़ोरदार ठहाका लगाया । राममिलन ने अपने कान पकड़ते हुए कहा “ तब तो साहब ऊ शाहजहाँ की आत्मा हमें कभी माफ नहीं करेगी ।“ ”अरे पंडित जी.. शाहजहाँ की नहीं जहाँगीर की , शाहजहाँ की बेगम का नाम तो मुमताज महल था ...इसकी बेगम का नाम उसके साथ जोड़ोगे तो नहीं चलेगा । “ किशोर त्रिवेदी ने राममिलन के स्टेटमेंट को सुधारते हुए कहा ।

किशोर आज सुबह सुबह ही दंगवाड़ा पहुँचा था । राममिलन किशोर का इशारा समझ गया और ज़ोर का अट्टहास करते हुए कहा “ ऐसन है भैया, ऊ जमाने में नहीं चलता होगा । ई जमाने में तो सबै चलता है किसीकी लुगाई का नाम किसी के भी साथ जोड़ दो क्या फरक पड़ता है ।“ हम लोगों ने देखा सर मज़दूरों के साथ बातचीत में मशगूल थे और हमारी बकवास पर उनका ध्यान नहीं था ।

🔲 *शरद कोकास* 🔲

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बुधवार, 13 मई 2026

7 - प्रलय की कथा भारत की नहीं है

हमारे यहाँ प्रलय की कथा में जो मनु की नाव है वह मेसोपोटामिया मे ज़िउसुद्दू  की नाव है इस्लाम और इसाइयत मे वही नूह और नोहा की नाव है , अजीब बात है ना 

        📕 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📕

         ✍🏽 *शरद कोकास* 🏽

               7⃣ *भाग -सात* 7⃣

अब तक आपने पढ़ा कि विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला के छात्र उत्खनन के लिए दंगवाड़ा नामक स्थल पर आये हैं । आने के बाद से वे विभिन्न चर्चाओं में लगे हैं और अब तक उनकी बातचीत में ग्रीक माइथोलॉजी, ट्रॉय का युद्ध, सिक्कों के बारे में बातचीत आदि शामिल हो चुके हैं । आज उनका दूसरा दिन है और रात भोजन के पश्चात वे लोग अपने तम्बू में गपशप कर रहे हैं ठण्ड के दिन हैं लेकिन नींद किसी को नहीं आ रही है.. आज पढ़िए प्रलय की मूल कथा ..

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|| भाग 7 ||   

जल से ढँकी हुई थी पृथ्वी

रवींद्र के फ़रमान के बावज़ूद किसीको नींद नहीं आ रही थी । दरअसल ठण्ड कुछ बढ़ गई थी और हम लोग हल्की हल्की कंपकंपाहट महसूस कर रहे थे । हर कोई थोड़ी थोड़ी देर में रजाई से मुँह बाहर निकालता था और देखता था कि कौन कौन हिल-डुल रहा है ।

"कितना अच्छा हो खजूर के गुड़ और अदरक वाली एक कप गरमागरम चाय मिल जाए ।" अजय ने एक असंभव सी इच्छा प्रकट की । 

"चुप रह ।" रवीन्द्र ने उसे डाँटते हुए कहा "चाय की कल्पना भी नहीं करना, भाटी जी चूल्हा बुझाकर कबके सो चुके होंगे और अब भगवान भी आ जाएँ तो वे नहीं जागने वाले ।" "ठीक है यार, हम भी ठण्ड भगाने के लिए अशोक की चुंगी से एक सुट्टा मार लेंगे ।" अजय ने कहा ।

अचानक अशोक को ख़याल आया कि उसने बहुत देर से सिगरेट नहीं पी है ।"सुलगाऊं क्या ?" उसने अजय से पूछा  और बिना उसके जवाब की राह देखे अपने बिस्तर के नीचे छुपाकर रखे पैकेट से एक सिगरेट निकाल कर जला ली । 

सिगरेट जलाकर उसने ढेर सारा धुआं तम्बू की छत की ओर फेंका और दाहिने हाथ को ऊपर उठाकर डमरू की तरह एक विशिष्ट स्टाइल में मटकाते हुए  कहा " जोसी .. ठण्ड वंड कुछ पास न आवै जब हम अपनी सिगरेट सुलगावें।"  

अजय ने अपनी नाक के सामने आया धुआँ हटाने का अभिनय करते हुए कहा "ठीक है भैया, तुम्हारे द्वारा फैलाये हुए प्रदूषण से ही ठण्ड भाग जाए और नींद आ जाये तो कितना अच्छा हो ।"

     नींद न आने तक बातचीत करना हमारी विवशता ही नहीं ज़रूरत भी थी इसलिए कि ठण्ड की दुश्मनी नींद से थी और वह इस कदर हावी थी कि अपने अलावा कुछ सोचने ही नहीं दे रही थी । अजय ने मेरी ओर मुखातिब होकर कहा  कामरेड, तुम यह जो वर्ग - संघर्ष की कथा सुना रहे थे इसे बाद में सुनाना पहले यह बताओ कि क्या प्रलय की मूल कथा भी यहीं की है ? ऐसा मैंने सुना है ।" 

हाँ मैंने कहा यह बात सही है । उस समय मेसोपोटामिया के इस क्षेत्र में बार बार बाढ़ आया करती थी, कभी कभी तो बाढ़ की वज़ह से यहाँ की दोनों नदियाँ दज़ला और फ़रात आपस में मिल जाती थीं और प्रलय जैसी स्थिति हो जाती थी, शायद उसी के चलते यहाँ इस कथा ने जन्म लिया हो । कथा कुछ ऐसी है कि..." 

मैंने देखा अचानक अजय की रज़ाई में एक जलजला सा आ रहा है l

"अरे सुनो, सुनो " अजय ने रजाई फेंकी और सीधा होकर बैठ गया .. "भाई कहानी सुना रहा है ।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा .." सुनाता हूँ, लेकिन वादा करो कि बीच में टोकोगे नहीं । और ढंग से रज़ाई ओढ़कर बैठो नहीं तो वाकणकर सर को बता दूँगा कि यह जानबूझकर आत्महत्या का प्रयास कर रहा था ।" 

अजय ने अपने चारों और ठीक से रज़ाई लपेट ली और मुँह पर उंगली रख कर अच्छे बच्चे की तरह चुपचाप बैठ गया 

 मैंने प्रलय की कथा शुरू की .."माइथोलॉजी में ऐसी मान्यता है कि शुरुआत में यह समूची पृथ्वी जल से ढँकी हुई थी और सब ओर सिर्फ जल ही जल था । आसमान से भी ऊपर एक देवलोक था जहाँ देवता रहते थे और पृथ्वी को जल में डूबा हुआ देखकर बहुत अफ़सोस किया करते थे । देवताओं का प्रयास था कि पृथ्वी को किसी तरह जल से अलग किया जाए ताकि इस पर मनुष्यों को बसाया जा सके, लेकिन एक दैत्य उन्हें ऐसा करने से रोक रहा था । 

उसे समाप्त किये बगैर कोई चारा नहीं था । सो देवताओं ने उससे युद्ध किया जिसमें देवाधिपति द्वारा वह दैत्य  मार दिया गया l फिर देवताओं ने उस दैत्य के मृत शरीर के दो टुकड़े कर दिए,  फिर देह के ऊपरी  भाग से आकाश व तारों का निर्माण किया और निचले भाग से ज़मीन का । फिर उन्होंने ज़मीन पर पेड़ पौधे उगाए , मटटी से इंसान और जानवर बनाये और उन्हें इस धरती पर बसाया 

      लेकिन यह तो कोरी कल्पना है भाई, बृह्मांड,तारे, पृथ्वी और मनुष्य इस तरह तो नहीं बने थे ।अजय ने कहा । 

लो तुमने टोक दिया न, अरे भाई मैंने कब कहा कि ऐसा सचमुच में घटित हुआ था । मैंने पहले ही कहा था कि यह कहानी है, पृथ्वी और मनुष्य के जन्म को लेकर हमारे यहाँ भी इस तरह की कितनी ही कहानियाँ हैं । उस समय मनुष्य के पास जितना ज्ञान था उस आधार पर उसने यह कथायें रचीं । कुछ कल्पनायें आगे जाकर सत्य साबित हो गईं और कुछ कल्पनाएँ ही रह गईं । जैसे कि आज से चार सौ साल पहले तक यही सत्य था कि पृथ्वी स्थिर है और सूर्य उसकी परिक्रमा करता है । अगर गेलेलियो और ब्रूनो जैसे वैज्ञानिक नहीं होते तो आज भी यही सत्य माना जाता ।

  रवीन्द्र ने कहा नहीं, ये लोग नहीं होते तो कोई और होता लेकिन सच तो एक न एक दिन सामने आता ही है । खैर, तुम आगे की कहानी सुनाओ ।"

      ज़रूर..मैंने कहा ।अब देवताओं की बसाई पृथ्वी पर सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था, मनुष्य झोपड़ियाँ बनाकर रह रहे थे और अपना भरण-पोषण कर रहे थे कि अचानक किसी बात पर देवता मनुष्य से नाराज़ हो गए, उन्होंने तय किया कि मनुष्यों की इस पृथ्वी को फिर से पानी में डुबो दिया जाए ।" 

"भैया हमें पता है, देवता किस बात से नाराज़ हुए होंगे ।" राममिलन भैया ने तुरंत हमारी कहानी में ब्रेक लगाते हुए कहा " ई इंसान तो सुरु से ही पापी रहा है, जैसे तुम लोग देवी-देवताओं को नहीं पूजते वैसे ही उसने भी देवी देवताओं को पूजना बंद कर दिया होगा, अब नाराज़ नहीं होंगे तो क्या ।"

      " ठीक कह रहे हो भैया" मैंने कहा " सारी ग़लती तो मनुष्यों से ही होती है देवता भी कभी कोई ग़लती करते हैं, मेसोपोटामिया में भी ऐसा ही हुआ ।  असीरियों के देवता एंलिल ने मनुष्यों के पाप की वज़ह से ही ऐसा किया था, खैर, देवताओं की नाराज़गी के कारणों पर हम बाद में शोध करेंगे, आगे सुनो कि क्या हुआ ।" मैंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा " हुआ यह कि अन्य देवताओं की नाराज़गी के बावजूद  जल देवता इया मनुष्यों पर प्रसन्न थे सो उन्होंने यह खबर लीक कर दी ।

      "पक्की बात है " राममिलन भैया ने कहा " बे लोग जल देवता को ही जल चढाते होंगे।" "भाई कहानी सुनना है कि नहीं ?" मैंने किंचित रोष के साथ कहा .. "हाँ हाँ सुनाओ सुनाओ .." राममिलन भैया ने कहा ।

मैंने कहानी आगे बढ़ाई  " तो हुआ यह कि उन्होंने यह बात सरकंडों को बता दी कि देवता फिर से इस पृथ्वी को पानी में डुबोने वाले हैं । उस समय झोपड़ियाँ सरकंडों की बनी होती थीं सो  सरकंडों ने यह बात झोपडी के मालिक ज़िउसुद्दू को बता दी । फिर क्या था, इससे पहले कि प्रलय हो झोपड़ी के मालिक यानि उस मनुष्य ने एक बड़ी सी नाव बनाई, उसमें अपने परिवार को, कुछ शिल्पकारों को व पशु पक्षियों के जोड़ों को बिठा लिया । 

फिर तयशुदा दिन खूब बरसात हुई, नाव में बैठे लोगों के अलावा सारे लोग डूब गए । फिर एक दिन बारिश थम गई । बारिश थमने पर सबसे पहले नाव से कौवे को भेजा गया कि वह पता लगाये कहाँ पर सूखी ज़मीन है सो कौवा उड़ा, उसने सूखी ज़मीन का पता लगाया वहाँ सारे लोग उतर गए और धरती पर बस गए । फिर उनकी संतानें हुईं और इस तरह दुनिया आगे बढ़ी ।

यार यह कहानी तो हर धर्म में है जैसे हमारे यहाँ मनु की नाव है, मनु ने एक विशाल नाव (नोहास आर्क के समान) बनाई जिसमें उन्होंने ऋषियों, सप्तऋषियों, विभिन्न प्रजातियों के बीजों और पशु-पक्षियों को सुरक्षित रखा।पौराणिक कथाओं के अनुसार वैवस्वत मनु को ऐसी ही चेतावनी विष्णु द्वारा दी गई थी । इस्लाम और क्रिश्चेनिटी में नूह  या नोहा की नाव है ? “ अजय ने कहा ।

बिलकुल । मैंने जवाब दिया । ऐसा माना जाता है कि मेसोपोटामिया से ही यह कथा पूरी दुनिया में पहुँची । 

दज़ला फ़रात के दोआब में स्थित निनेवे नगर में ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता लेयार्ड ने उत्खनन किया था वहाँ लगभग साढ़े चार हज़ार साल पहले की ईटों पर कीलाक्षरी लिपि में लिखी यह कहानी मिली बाद में गिलगमेश नामक महाकाव्य भी मिला जो लगभग तीन सौ पट्टिकाओं पर लिखा हुआ था जिसमे यह पूरी कहानी थी । 


फिर सन सत्ताईस अठ्ठाइस में ब्रिटेन और अमेरिका के तत्वावधान में पुराविद लियोनार्ड वूली ने सुमेर सभ्यता के अनेक नगर खोज निकाले जिनसे इस कहानी की ऐतिहासिकता की पुष्टि हुई । बाद में अन्य धर्मों में यह कथा आई । 

इसी से प्रेरित होकर, देवी-देवताओं का भय दिखाकर पुरोहितों ने लोगों को डराया धमकाया, यदि वे देवताओं की बात नहीं मानेंगे तो फिर एक दिन प्रलय होगा । इसके अलावा भी देवी देवताओं के नाम पर,पूजा-पाठ के नाम पर, व्रत-उपवास के नाम पर, दान- दक्षिणा के नाम पर  मनुष्य को डराने के लिए बहुत सी कथाएं रची गईं ।

लेकिन मैं फिर कह रहा हूँ यह इतिहास नहीं है ऐसा कभी हुआ ही नहीं ।अजय तर्क के मूड में था । हाँ ठीक है तुम्हारा कहना ।मैंने कहा यह इतिहास नहीं है, मैंने कहा तो कि उस दौरान वहाँ भीषण बाढ़ आई थी जिसका प्रमाण खुदाई में मिली मिटटी और गाद है जिसकी वज़ह से ऐसी कहानियाँ रची गई । और ऐसा केवल मेसोपोटामिया में नहीं हुआ बल्कि पूरी दुनिया में हुआ ।

लेकिन अफसोस यही है कि पढ़े-लिखे लोग भी पुराणकथाओं को इतिहास मान लेते हैं । वे जीवन भर इस बात को सिद्ध करने में लगे रहते हैं कि किसी काल में ऐसा ऐसा हुआ होगा । वे जानना ही नहीं चाहते कि यह कथाएँ देवताओं पर मनुष्य का विश्वास जगाने या इस आधार पर कुछ मनुष्यों द्वारा शेष मनुष्यों पर शासन करने के लिए रची गईं थीं । 

इसीलिए  इतिहासकारों का काम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि वे आम लोगों को इतिहास की वास्तविकता बतायें और बतायें कि इतिहास और कहानी में क्या फर्क है । वरना लोग झूठ को ही हमेशा सच समझते रहेंगे । 

गोयबल्स की मशहूर उक्ति है, झूठ को सौ बार दोहराओ तो वह सच हो जाता है ।

इतिहास भी यार बड़ी मज़ेदार चीज़ है । अशोक त्रिवेदी ने एक और सिगरेट सुलगाते हुए कहा । बचपन में, स्कूल में गुरूजी कहा करते थे, ’हिस्ट्री जाग्रफी बड़ी बेवफा, रात को रटो और दिन को सफा '  

हाँ, इसलिए तो लोग मज़बूरी में इतिहास पढ़ते हैं । क्या हम लोग भी प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति और पुरातत्व में एम.ए. इसलिए  नहीं कर रहे हैं कि इस डिग्री के बाद कहीं ठीक ठाक नौकरी मिल जाए ? ” अजय ने प्रतिक्रिया व्यक्त की । 

और नहीं तो क्या ?” रवीन्द्र कहने लगा सही तो हे यार ..कितना मुश्किल है लम्बी लम्बी वंशावलियाँ रटना, वही राजा-महाराजाओं के किस्से, युद्धों की कहानियाँ, राजनैतिक षड़यंत्र, नाच-गाने की महफिलें, हरम की ऐयाशियाँ, भूत-प्रेतों की तिलिस्मी कथायें..पुत्र द्वारा पिता की हत्या ..

नहीं नहींऐसा भी नहीं है । मैंने उसे बीच में टोका । इतिहास का अर्थ केवल यही नहीं है ..इतिहास तो हमारा अपना ही अतीत है । जैसे हम रोज़मर्रा के जीवन में अपनी पिछली सफलताओं और असफलताओं से सबक लेते हैं इतिहास से सबक लेने का अर्थ भी यही है ।

 अपनी ग़लती  से सबक लेना जैसे व्यक्तिगत हित में है वैसे ही मनुष्य जाति के इतिहास से सबक लेना सम्पूर्ण मनुष्यता के हित में है । “ 

ठीक है ,मान लेते हैं अजय ने कहा लेकिन इतिहास सही है या गलत यह कौन बतायेगा ? हम तो वही इतिहास जानेंगे ना जो हमें पढ़ाया जाएगा ? कुछ इतिहास हमें अंग्रेजों ने पढ़ाया कुछ उनके वंशज पढ़ा रहे हैं । बचपन से अपनी किताबों में यही सब ऊल-जलूल चीजें तो पढ़ रहे हैं हम लोग इतिहास के नाम पर ।

 नहीं, पूरी तरह ऐसा भी नहीं है ।रवींद्र ने दलील प्रस्तुत करते हुए कहा । गुलामी के दौर में अंग्रेजों ने यहाँ का अधिकांश इतिहास लिखा । ज़ाहिर है उसमें उन्होंने अपनी प्रशंसा ही लिखी होगी । उनके विरोध में हमारे यहाँ के लोगों द्वारा जो इतिहास लिखा गया उसमें अपनी संस्कृति का गौरव गान था जो कुछ अतिशयोक्ति लिए  हुए था । 

उस दौर में ऐसा करना उन्हें ज़रूरी लगा होगा क्योंकि उस समय अंग्रेजों से अपने आप को श्रेष्ठ साबित करना ही यहाँ के आम जन का उद्देश्य था और अपनी आज़ादी व अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए  यह अनुचित भी नहीं था । यह उस दौर का राष्ट्रवाद था । ज़ाहिर है उस समय के इतिहासकार इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए  लेखन कर रहे थे और केवल इतिहास में ही नहीं साहित्य में भी इसी तरह का लेखन हो रहा था । स्वतंत्रता की चेतना के लिए  आव्हान गीत लिखे जा रहे थे । अपने कुलपति शिवमंगल सिंह 'सुमन' जी का ही गीत ले लो..

 युगों की सड़ी रूढ़ियों को कुचलती

ज़हर की लहर सी लहरती मचलती

अन्धेरी निशा में मशालों सी जलती

चली जा रही है बढ़ी लाल सेना

अब इसे सुनकर तो ऐसा ही लगेगा जैसे आज़ादी की लड़ाई सिर्फ साम्यवादियों ने लड़ी हो जबकि उसमें और भी लोग शामिल थे ।

 लेकिन पूर्वाग्रह के साथ लिखे गए  इतिहास में झूठ तो शामिल हो गया ना इस तरह । अजय ने कहा । 

हाँ यह बात तो है ।मैंने कहा न उनका लिखा इतिहास सही था न इनका लिखा । पूर्वाग्रह तो दोनों ही में शामिल थे ..लेकिन फिर भी इसे पूरी तरह नकारा तो नहीं जा सकता और फिर इसके अलावा फिलहाल कुछ है भी तो नहीं हमारे पास ।" 

ठीक है, तुम ही लिखना नया इतिहास, डॉ.वाकणकर के सही वारिस तो तुम ही हो..। अपुन को तो कहीं मास्टर-वास्टर की नौकरी मिल जाए अपने लिए  बहुत है ।अजय उबासी लेते हुए बोला ।

 अशोक ने उसकी बात पर चुटकी ली ..फिर अपन एम ए करके प्रायमरी स्कूल में मास्टर की नौकरी करेंगें और बच्चों को वही इतिहास पढ़ाएंगे जो हमारे बाप-दादा पढ़ाते रहे एक था राजा एक थी रानी दोनों मर गए खतम कहानी “ 

ठीक है, ठीक है, हेरोडोटस, थूसीदीदस, इब्त खल्दून, मैंकियावेली, ट्वायनबी, इवेल्यान, और कार्ल मार्क्स के वंशजों रात बहुत हो गई है अब सो जाओ बाक़ी की बातें कल करेंगे ।रवीन्द्र ने अपना अंतिम फरमान ज़ारी करते हुए कहा ।

 

🔲 *शरद कोकास* 🔲

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सोमवार, 11 मई 2026

6-आँख के बदले आँख लेने के ज़माने में

यह सजा थी कि जो अपने से उच्च वर्ग के सभ्रांत पुरोहित आदि को थप्पड़ मारेगा उसे बैल के चमड़े से साठ  कोड़े लगाये जायेंगे, कर्जदार की पत्नी, पुत्र या पुत्री को तीन वर्ष तक दास बनकर रहना होगा । 

        *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी*

          ✍ *शरद कोकास* ✍

अब  तक आपने पढ़ा कि प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययन शाला विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के 6 छात्र शरद ,रविन्द्र, अशोक, किशोर ,राममिलन और अजय दंगवाडा नामक जगह पर पुरातात्विक उत्खनन के लिए गए हैं और उन लोगों के बीच रोज तंबू में बातचीत होती है । इस बातचीत में अब तक शामिल विषय है ग्रीक माइथोलॉजी के हरकुलिस और हमारे यहां के हनुमानजी, मिस्र के पिरामिड, स्पार्टा और ट्राई के बीच हेलन के लिए होने वाला युद्ध ,पुरातत्व की कुछ बातें, पंच मार्क सिक्के और उनका महत्व । छात्रों के गुरु हैं विश्व प्रसिद्ध भीमबेटका गुफाओं के खोजकर्ता डॉक्टर वी श्री वाकणकर और प्रोफेसर डॉ सुरेंद्र कुमार आर्य। इन छात्रों को इस उत्खनन शिविर में बहुत मजा आ रहा है और आज वे मेसोपोटामिया यानी सुमेरिया की यात्रा करने वाले हैं और पढ़ने वाले हैं वहां के राजा हम्मूराबी के बारे में । यह वही जगह है जहां बेबीलोन के प्रसिद्ध हैंगिंग गार्डन थे ।लीजिए आगे पढ़िए

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                 6⃣ *भाग छह* 6⃣

        *बैंक ने दिया बेबी को लोन*

  कुदाल की हुंकार थम चुकी थी , घमेलों का झनझनाना भी  रुक गया था ,मिटटी छानने वाली छन्नी भी अपनी खिसियानी हँसी बंद कर चुकी थी । मजदूर एक पांत  बनाकर चम्बल की और रवाना हो गए थे जिसे पारकर उन्हें अपने गाँव जाना था  । शाम होने लगी थी और अँधेरा अपने दूतों को इस दुनिया में भेजकर अपने आगमन के लिए उचित वातावरण की तलाश में था । इधर सूरज भी लौट जाने की बहुत जल्दी मचा रहा था  । ऐसा लग रहा था  जैसे उसे एक साईट पर अपना काम ख़त्म कर दूसरी साईट पर जाना हो । वैसे होता भी यही है, हमारे यहाँ सूरज डूब जाता है लेकिन कहीं न कहीं तो वह आसमान में अपने आसन पर विराजमान होता ही है । 

सूरज जब अपने औज़ार समेटकर चला गया अँधेरा अपनी ड्यूटी पर हाज़िर हो गया ।  हमेशा की तरह पंछी अपने घरौंदों में लौटने लगे  और जंगल के बीच स्थित दंगवाड़ा की इस पुरातात्विक साईट पर धीरे धीरे ख़ामोशी अपना बिस्तर बिछाकर नींद की राह तकने लगी । हम लोगों ने भी साईट से अपने औज़ार उठाये और कैम्प में लौट आये । हाथ-पाँव और चेहरे पर धूल की परत जमी हुई थी और उसे विदा करना ज़रूरी था सो तम्बू से तौलिया और साबुन लिया और चल दिए चम्बल के घाट पर । ठन्डे पानी से हाथ मुंह धोने के बाद हमने एक दूसरे के चेहरे को देखकर धूल साफ़ हो जाने की पुष्टि की और कैम्प में वापस आ गये । 


हम लोग जंगल में खुले आसमान के नीचे थे सो हमें कुछ ठण्ड सी महसूस हो रही थी । दिनभर मेहनत की थी इसलिए पेट भी खाली हो गया था । हम लोग भाटीजी की भोजनशाला में चूल्हे के पास आग तापते हुए बैठ गए और बातों के साथ साथ खुशबुओं से पेट भरने की कोशिश करने लगे । भाटी जी ने हम लोगों की हालत देखकर शीघ्र ही भोजन तैयार कर दिया, गोभी की रसेदार सब्ज़ी, दाल और रोटी । गरमागरम भोजन से पेट भरने के बाद जब सारा लहू भोजन को हज़म करने के लिए आमाशय की ओर दौड़ गया था तब ठण्ड और ज़्यादा तेज़ लगने लगी । हमें तम्बू में बिछे बिस्तर की याद आई जहाँ नर्म - गर्म रज़ाइयाँ हमारा इंतज़ार कर रही थीं । 

तम्बू के बाहर ठंडी हवाएँ थीं और भीतर हम हल्की हल्की सी कँपकँपाहट के बीच अपने आपको वर्तमान में सुरक्षित महसूस करते हुए अतीत की गलियों में भटकने की तैयारी में थे । आज की रात हम लोगों को मेसोपोटेमिया या प्राचीन सुमेरिया की सैर के लिए  जाना था । हम लोग रज़ाई ओढकर बैठ गए  । प्राचीन विश्व का एक नक्शा जिसे मैं उज्जैन से आते हुए अपने साथ लेता आया था मैंने अपने सामने फैला लिया । नक्शे के साथ इतिहास पढ़ना मुझे हमेशा से अच्छा लगता है ऐसा लगता है जैसे हम साथ साथ उस जगह की सैर कर रहे हों । इस तरह यह मेरे अभ्यास में शामिल है ।


नक़्शे में एक स्थान पर उँगली रखते हुए रवीन्द्र से मैंने कहा “यह पश्चिम एशिया का क्षेत्र है । पृथ्वी के जिन भूभागों में प्राचीन सभ्यता का अविर्भाव सबसे पहले हुआ उनमें पश्चिम एशिया भी है । इसके पूर्व में ईरान का पठार है और पश्चिम में भूमध्य सागर और काला सागर । यह सम्पूर्ण क्षेत्र रेगिस्तान और शुष्क मैदानी क्षेत्र है लेकिन बीच बीच में कई उपजाऊ क्षेत्र भी हैं, नदियाँ हैं, हरियाली है और घाटियाँ भी हैं  । वर्तमान में जहाँ इराक और कुवैत है यही क्षेत्र प्राचीन समय में मेसोपोटेमिया कहलाता था । यहीं दज़ला और फरात नदियाँ बहती हैं, दज़ला का  वर्तमान नाम टिग्रीस है और फरात का नाम यूफ्रेटिस है । इन नदियों का उद्गम काकेशिया के दक्षिण में स्थित पहाड़ों से हुआ है और अंत फारस की खाड़ी में होता है । इनके मध्य व निचले भागों में स्थित प्रदेश को प्राचीन निवासियों ने “ मेसोपोटेमिया “ अर्थात नदियों के बीच का प्रदेश या दोआब कहा ।


"आज लेकिन इराक और कुवैत तो तेल के लिए जाना जाता है ?" अशोक का प्रश्न जायज था । " हाँ "मैंने कहा । "लेकिन उस समय न तो तेल की खोज हुई थी न तेल से चलने वाले इंजन की । उस समय तो यह क्षेत्र अपनी हरियाली के लिए मशहूर था जो इन नदियों में बाढ़ की वज़ह से होती थी । यहाँ वसंत के मौसम में पहाड़ों पर बर्फ पिघलने की वज़ह से बाढ़ आती थी उसके बाद सब और हरियाली छा जाती थी । लेकिन यहाँ का तापमान फिर पचास डिग्री के आसपास हो जाता था इसलिए वह सूख भी जाती थी । यहाँ कोई भी खनिज नहीं पाया जाता था लेकिन अपनी मिटटी की वज़ह से यह प्रदेश काफी उपजाऊ था । 


"यहीं पर कहीं बेबीलोन शहर भी था ना जिसके हैंगिंग गार्डन बहुत प्रसिद्ध थे ?"रवींद्र ने सवाल किया । " हाँ " मैंने कहा "यहीं फरात नदी के किनारे जहाँ दज़ला फ़रात के बहुत क़रीब आ जाती है बेबीलोन नामक एक प्रसिद्ध शहर था जिसे बाबुल भी कहते हैं । बेबीलोन काफी समृद्ध शहर रहा है । नदियों के मार्ग से यहाँ बजरों और नावों पर व्यापारियों द्वारा अनेक तरह का माल लाया जाता था । यहाँ की भूमि बहुत उपजाऊ थी सो यहाँ खजूर गेहूँ,जौ आदि का काफी उत्पादन होता था जिनका अन्य सामानों से विनिमय किया जाता था । यहाँ की चिकनी मिटटी से घड़े, संदूक और ईटें भी बनाई जाती थीं । मेसोपोटामिया के सड़क मार्ग भी बेबीलोन से होकर गुजरते थे । यहाँ उन्नीसवीं शताब्दी में उत्खनन हुआ जिससे अनेक प्राचीन सभ्यताओं का पता चला ।"


भैया राममिलन काफी देर से चुप बैठे थे और नक़्शे पर नज़र गड़ाए भूगोल पर मेरा व्याख्यान  सुन रहे थे । अचानक मैंने उनकी ओर देखा तो वे बोल उठे “ का हो, ई  बेबीलोन नाम कहाँ से आया ? इहाँ  बैंक ने कौनो  बेबी- वेबी को लोन दिया था का ? मैंने हथेली से अपना माथा पीटते हुए कहा “ भैया इस बेबीलोन का अंग्रेजी के बेबी और लोन से कोई सम्बन्ध नहीं है । “ भैया राममिलनवा पर लेकिन कोई असर नहीं पड़ा वे अपनी रौ में बोले..” भैया ऐसा है कि ई बड़े लोग बहुत चालाक होवत हैं,  ई लोग बेबी क्या अपन कुत्ता बिल्ली के नाम से भी लोन ले लेवत हैं और फिर सब कुछ हजम कर के भागी जात हैं ।“  


राममिलन भैया ने बात तो बिलकुल सही कही थी लेकिन चर्चा बेबीलोन  पर चल रही थी इसलिए मैंने उन्हें उंगली से चुप रहने का इशारा किया और आगे बात बढाई ”भाईसाहब, बेबीलोन शब्द बेविल या बेविलिम से बना है जिसका अर्थ होता है देवताओं का द्वार, वैसे यह ग्रीक शब्द है । बेबीलोन शहर की स्थापना सरगोन  के राजा द्वारा तेईस सौ चौंतीस ईसापूर्व में की गई थी । उस समय प्राप्त मिटटी की एक मुद्रा से इसका पता चलता है लेकिन इसका वास्तविक इतिहास राजा हम्मुराबी के काल से प्रारंभ होता है जिसका काल सत्रह सौ ब्यानबे से सत्रह सौ पचास ईसा पूर्व माना जाता है  ।


 हम्मुराबी  काफी बलशाली राजा था और उसने एक उत्कृष्ट सेना का निर्माण किया था अपनी ताकत के बल पर उसने पूरे मेसोपोटामिया पर कब्ज़ा कर लिया था । लेकिन इतिहास में हम्मुराबी अपनी कानून संहिता के लिए प्रसिद्ध है । उसने शहर के बीचोबीच एक काले पत्थर पर अपनी प्रजा के लिए कुछ क़ानून खुदवाए थे जिनका पालन करना पूरी प्रजा के लिए अनिवार्य था । 


"क्या लिखा था भाई उसमें  ? " अजय नाक तक रज़ाई ओढ़े रज़ाई के भीतर घुसा हुआ था उसने तत्काल अपनी गर्दन बाहर निकाली और पूछा । " अरे इस विधि-संहिता में बहुत भयंकर बातें लिखी थीं जैसे कि किस अपराध के लिए क्या दण्ड दिया जाना चाहिए ।" मैंने कहा  । " रुको रुको मैं बताता हूँ " रवीन्द्र अचानक उठकर खड़ा हो गया अपने कानों पर लपेटा हुआ मफ़लर खोलकर उसे पगड़ी की तरह सर पर बांधा और नाटकीय अंदाज़ में कहने लगा " सुनो, सुनो, सुनो.. समस्त प्रजाजन ध्यान से सुनो..मैं हम्मुराबी देवताओं द्वारा नियुक्त शासक, सभी राजाओं में प्रथम और फरात के तटवर्ती सभी ग्रामों, नगरों का विजेता हूँ । मैंने समस्त देश को सत्य और न्याय की शिक्षा दी है और लोगों को समृद्धि प्रदान की है  । "इसमें भयंकर जैसी क्या बात क्या है ?" अजय ने ऊबकर कहा और वापस रजाई के भीतर गर्दन छुपा ली  । 


"तू ना यार एक्टिंग भी नहीं करने देता है ।" रवीन्द्र ने किंचित नाराज़ होते हुए कहा । " सुनो तो उस विधि संहिता में आगे क्या लिखा था मैं बताता हूँ । उसमें लिखा था, आज से मेरे राज्य में जो मंदिर अथवा राजा की संपत्ति चुराएगा उसे प्राणदंड मिलेगा, जो दास  अथवा दासी चुराएगा उसे भी प्राणदंड मिलेगा ,जो भागे हुए दास को शरण देगा उसे भी प्राणदंड मिलेगा । " मतलब  हर बात के लिए प्राणदंड ? " अजय ने पूछा । " नहीं ,कुछ हल्की सजायें  भी है भाई ।" रवींद्र कहने लगा " जैसे, जो शरीर पर गोदा हुआ दास का निशान मिटाएगा उसकी उँगलियाँ काट दी जाएँगी, जो पराये  दास  की हत्या करेगा उसे बदले में दास  देना पड़ेगा, बैल के बदले में बैल देना पड़ेगा, जो अपने से उच्च वर्ग के सभ्रांत पुरोहित आदि को थप्पड़ मारेगा उसे बैल के चमड़े से साठ  कोड़े लगाये जायेंगे, कर्जदार की पत्नी, पुत्र या पुत्री को तीन वर्ष तक दास बनकर रहना होगा । मैं हम्मुराबी ,न्यायप्रिय राजा हूँ और ये विधान मुझे सूर्यदेव शम्स ने प्रदान किये हैं । मेरे शब्द उदात्त हैं और मेरे कार्य अनुपम हैं ..."

अबकी बार अजय ने रवीन्द्र को एप्रिशिएट करते हुए ताली बजाई । "मगर यह बहुत बाद की बात है ।" मैंने कहा "उससे पहले यहाँ भीषण बारिश होती थी जिसकी वज़ह से नदियों में बाढ़ आती थी  यह बाढ़ अपने साथ मिटटी की गाद लेकर आती थी  जो बहुत उपजाऊ होती थी  । सातवीं- छठवीं सहस्त्राब्दी  ईसापूर्व तक यहाँ के निवासी कुदाल से खेती करने के अलावा भेड़ बकरियाँ व गाय पालने लग गए  थे । वे दलदल में उगने वाले सरकंडों से और मिट्टी से अपने घर बनाते थे ।“ “ और खाना खाकर आराम से सो जाते थे । “अजय जोशी ने एक लम्बी उबासी लेते हुए कहा और माथे तक रज़ाई खींचकर लम्बा हो गया ।

“नहीं भाई इतना सुख कहाँ था ।“ मैंने कहा “यहाँ की नदियों में हर साल भीषण बाढ़ आती थी और उनकी सारी मेहनत पर पानी फिर जाता था, झोपड़ियाँ बह जाती थीं, आदमी और मवेशी नष्ट हो जाते थे, दलदली बुखार, बिच्छू, कीड़े-मकोड़ों से लोग त्रस्त रहते थे, जंगली शेर और सुअर हमला कर देते थे ..” “ एक मिनट भाईसाहब,  शेर तो जंगली ही होते हैं ना ? ” राममिलन भैया ने बहुत देर बाद मुँह खोला था । “ हाँ भाई उस समय भी जंगली थे और आज भी जंगली ही हैं, सुअरों की बात मैं नहीं कर रहा हूँ ।” राममिलन भैया ने एक्सपर्ट कमेंट किया । “ सुअर तो सब शहर में बस गए  हैं और अब चुनाव भी लड़ने लगे हैं ।" 

मैंने बात आगे बढ़ाई “ लेकिन तीसरी सहस्त्राब्दि  ईसा पूर्व तक मेसोपोटेमिया के  इन लोगों ने अनेक कठिनाइयों पर विजय पा ली थी । दलदल सुखाने और सिंचाई के लिए  यहाँ नहरें खोदी गईं, खेतों में गेहूँ और जौ की फसलें उगाई जाने लगीं । कृषकों ने हल का अविष्कार भी कर लिया था । खजूर यहाँ बहुतायत में होता था जिसके फलों से आटा व गुड़ तैयार किया जाता था । पेड़ की छाल के रेशों से रस्सी बुनी जाती थी ,चरागाहों में घुंघराले बालों वाली भेड़ें नर्म नर्म घास चरती थीं । नगरों में शिल्पी, बढ़ई आदि कारीगर रहा करते थे और ऊन, खजूर, अनाज आदि का व्यापार भी अच्छा था । “


"यार अब समझ में आया कि अरब देशों के लोग खजूर को इतना पसंद क्यों करते हैं ।" अजय ने कहा "और यह भी समझ में आ गया कि मुसलमान लोग रमज़ान के महीने में रोजा खोलने के लिए खजूर का इस्तेमाल क्यों करते हैं । "हाँ यह सही है ।" मैंने कहा "जिस क्षेत्र में किसी धर्म का उदय होता है उस क्षेत्र का खान-पान, रीति रिवाज़, रहन - सहन सब कुछ उस धर्म में शामिल हो जाता है ,फिर उस धर्म के लोग दुनिया के किसी भी क्षेत्र में रहें वे उन्ही रीति -रिवाजों का पालन करते हैं । लेकिन यह बात जो मैं बता रहा हूँ यह इस्लाम के अविर्भाव से हजारों साल पहले की है ।"

“मतलब यह कि मेसोपोटेमिया वासियों को सुखी होने में तीन-चार हज़ार साल लग गए  ? ” रवीन्द्र ने मेरी बात को गिर से पटरी पर लाते हुए कहा । “हाँ” मैंने बताया, "लेकिन इस तरह सुखी होने की प्रक्रिया में कुछ लोग तो सम्पन्न हो गए और शेष वैसे ही विपन्न रहे । दरअसल अधिकता ही इस भेद को जन्म देती है । उस समय दक्षिण मेसोपोटामिया की उर्वर ज़मीन में एक दाने से सौ दाने पैदा होते थे और खजूर का एक पेड़ वर्ष में पचास  किलो से भी अधिक खजूर देता था । इसका अर्थ यह हुआ कि उन लोगों के पास आवश्यकता से अधिक अन्न हो गया लेकिन इसके मालिक सब नहीं हुए ।" 

"हमारे यहाँ भी तो यही हाल है भाई " अशोक ने कहा । "हमारे यहाँ भी किसान इतना अनाज पैदा करता है लेकिन सब बड़े बड़े लोगों के गोदामों में जमा हो जाता है किसान के पास तो बमुश्किल अपने खाने लायक अनाज बचा रहता है ।" " तुम ठीक कह रहे हो " मैंने कहा " लेकिन इसकी वज़ह से यह हुआ कि कुछ संभ्रांत और पुरोहित किस्म के लोगों ने ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लिया और शेष लोग जिनमें  युद्धबंदी भी थे उनके दास हो गए । गरीबों के पास अपनी भूमि नहीं थी वे ज़मींदारों के यहाँ काम करने लगे  । इस तरह दक्षिण मेसोपोटामिया में कृषि, पशुपालन और शिल्प का विकास तो हुआ ही साथ साथ  दासों , सामुदायिक किसानों और संपन्न दास स्वामियों के वर्ग भी बन गए । बहुत से शिल्पी और किसान धनी लोगों के कर्जदार बनते गए ।" 


"मतलब यह सिर्फ हमारे देश में ही नहीं हो रहा बल्कि पूरी दुनिया में सदियों से चला आ रहा है ।" अशोक ने कहा और रज़ाई के भीतर मुँह घुसा लिया । मैंने देखा कि सबको नींद सी आ रही है । अशोक की बात ख़त्म होते ही रवींद्र ने आज की रात्रिकालीन सभा की समाप्ति की घोषणा करते हुए पहला फरमान जारी किया .."अभी भी कहाँ कुछ बदला है न बदलने वाला है चलो अब सब लोग सो जाओ ।" 


*शरद कोकास*


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