सोमवार, 1 जून 2026

40- क्या आकाश से देवता आग लेकर आए थे ?


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पिछले भाग में आपने आदिम मनुष्य की कला,गुफाओं में चट्टानों पर उसकी चित्रकारी और उसके आदिम विश्वास  और आदिम धर्म के बारे में पढ़ा । इस भाग में पढ़िए मनुष्य के आवास के बारे में और यह भी कि जले हुए मकान के अवशेष से पुरातत्ववेत्ता कैसे उसका चित्र प्रस्तुत कर देते हैं*

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*भाग 40*

*संभालकर रखना अपनी आग* 

" अच्छा, सबका नाश्ता हो गया कि नहीं ?" वाकणकर सर इतनी देर में लौटकर आ गए थे । "हाँ सर ।" हम लोगों ने समवेत स्वर में जवाब दिया ।  "तो फिर बैठे क्यों हो.. चलो सब लोग ट्रेंच पर, आज का काम नहीं शुरू करना है क्या ?" काम तो हमें शुरू करना ही था लेकिन सर से बातें करने में भी बहुत आनंद आ रहा था l हम लोग सर से उनकी वैश्विक खोज भीमबैठका के बारे में बातें करना चाहते थे लेकिन हमारे सीनियर्स ने बताया था कि सर उस पर ज़्यादा बातें किसी से करते नहीं हैं  । भीमबैठका की खोज कैसे हुई यह  कथा वैसे तो हम सब लोगों को मालूम ही थी लेकिन उसे डॉ.साहब के मुँह से सुनने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ था । उनकी पी. एच. डी. भी भीमबैठका पर ही थी, वह हम लोगों ने लायब्रेरी में देख रखी थी । मात्र सौ पन्नों की वह थीसिस थी वह  जबकि लोग इससे बड़े शोध प्रबंध लिखते थे । सुनते हैं कि  पहले उनकी थीसिस कम पन्नों की होने के कारण स्वीकृत नहीं हुई थी लेकिन उनकी खोज इतनी महत्वपूर्ण थी कि अंततः उन्हें पी एच डी अवार्ड करनी ही पड़ी । मैंने और रवीन्द्र ने आँखों आँखों में ही इशारा किया कि यह बात से से न पूछी जाए उसीमे बेहतरी है ।


 “ सर एक सवाल और …। “ रवींद्र ने कहा । मैं समझ गया वह सर से किसी नए टॉपिक पर कुछ पूछना चाहता है और सर की उपस्थिति को भुनाने का आज उसका पूरा इरादा है । “सर, उत्खनन में किसी आवास के अवशेषों में जब राख मिलती है तो कैसे पता चलता है कि वह राख चूल्हे की है या अग्निकांड की ?“ “ यह बढ़िया सवाल पूछा तुमने ।“ सर ने हम लोगों को उठने का इशारा करते हुए कहा .."चलो ट्रेंच की ओर चलते हुए बताता हूँ ।" हम लोगों ने अपनी कापियाँ उठाईं और सर के साथ हो लिए । सर ने चलते चलते अपनी बात जारी रखी .." चलो, तुम लोगों से एक सवाल पूछता हूँ , ठीक से जवाब देना । मान लो एक पुरातत्ववेत्ता को किसी उत्खनन में एक जले हुए आवास के चिन्ह मिलते हैं । अब सीन कुछ ऐसा है कि फर्श पर एक से अधिक गढ्ढे हैं और वे गढ्ढे राख़ और जले हुए कोयलों से भरे हुए हैं , उनके साथ सरकंडे के जले हुए टुकड़े भी हैं । कोयले की अनेक लम्बी काली धारियाँ एक बिंदु पर मिलती हुई दिखाई दे रही हैं और आवास के ठीक बीचोबीच सफेद राख की एक परत है । सफ़ेद राख़ की इस परत के नीचे नीचे जली हुई रेत की एक लाल परत है ।" 


सर की बात हम लोग ध्यान से सुन रहे थे । हो सकता है आगे पुरातत्व विभाग की नौकरी के किसी इंटरव्यू में हमसे ऐसा ही सवाल पूछा जाये । सर आगे कहने लगे "इस तरह इस अग्निकांड में सब कुछ अस्तव्यस्त सा है । अब इतने अवशेष देखकर एक सामान्य आदमी अन्दाज़ नहीं लगा सकता कि वास्तव में यहाँ क्या हुआ होगा । चलो तुम लोग अपना दिमाग़ लगाओ कि इस अग्निकांड में जला हुआ आवास किस प्रकार का रहा होगा ?" इतना कहकर सर चुप हो गए । हम लोग तो सर का सवाल भी ठीक से समझ नहीं पाए थे लेकिन जवाब तो देना ही था । 


" सर, इतना तो तय है कि उस झोपडी की छत सरकंडों से बनी हुई होगी और राख़ और कोयले से भरे जो गढ्ढे हैं वे उस मनुष्य का खाना पकाने का स्थान होगा । " अशोक ने अपना दिमाग़ लगाकर जवाब दिया । सर मुस्कुराये " भाटीजी को देख लो वे इस छत के नीचे एक ही जगह पर चूल्हा जलाते हैं या अलग अलग जगह पर और हम सबके घर में भी एक ही रसोई होती है ।" फिर हम लोगों के मायूस चेहरे देखकर उन्होंने कहा .."कोई बात नहीं मैं बताता हूँ । इस दृश्य को देखकर पुरातत्ववेत्ताओं ने यह अनुमान लगाया कि राख व कोयले से भरे गढ्ढे जहाँ हैं वहाँ छत को थामने वाली बल्लियाँ रही होंगी । बल्लियाँ गिर गईं और उनके गिरने से बने गड्ढों  में राख़ और कोयला जमा हो गया । जले हुए सरकंडों के टुकड़े यह बताते हैं कि छत सरकंडों  की बनी थी यह अशोक ने सही बताया । और फर्श पर दिखाई देने वाली काली लम्बी धारियाँ जली हुई बल्लियों के नीचे गिरने से बनी हैं ।"


"सर, वो मकान के बीचोबीच जो सफ़ेद राख़ है उसका क्या चक्कर है?" अजय से रहा नहीं जा रहा था । सर ने हम लोगों की ओर देखा और कहा "देखो इसको बड़ी जल्दी है, थोड़ा खुद दिमाग़ लगा कर बताओ ?" अजय ने पलकें झपकाईं और कहा "सर, यदि राख़ और कोयले वाली जगह पर चूल्हा नहीं था तो फिर इस सफ़ेद राख़ वाली जगह पर ज़रूर चूल्हा रहा होगा ।" इतना कहकर वह दो कदम पीछे हो गया । सर ने कहा .."अरे, वह चूल्हा जैसा दिखता ज़रूर है लेकिन वहाँ खाना नहीं पकाया जाता था । मैंने बताया ना कि वहाँ एकदम साफ़ और सफ़ेद राख़ है इसका मतलब यह है कि वहाँ केवल आग सम्भाल कर रखी जाती थी । अब उन्हें आग जलाना तो आता नहीं था इसलिए पेड़ों के घर्षण से जंगल में जो आग लगती थी उसे वे ले आते थे और लकड़ियाँ वगैरह डाल कर उसे एक निश्चित स्थान पर जलाये  रखते थे । ऐसा कई पीढ़ियों तक चलता रहता था । और इस स्थान पर सफ़ेद राख़ के नीचे जो जली हुई रेत की मोटी परत मिली है वह एक तरह से आग प्रज्वलित रखने के उस स्थल का बेस है ।" 


"तो सर फिर खाना कहाँ बनाते थे वे लोग ?" हम लोगों के भीतर उमड़ते सवाल को किशोर ने स्वर दिया । सर ने कहा " हाँ , यह बात मैंने तुम्हे नहीं बताई कि इस काली राख़ और सफ़ेद राख़ की जगह के अलावा उन्हें एक जगह और मिली थी जहाँ की राख मैली थी, खाना उस स्थान पर बनता था । इसलिए कि हड्डियाँ भी उसके पास पाई गईं  । अगर एक आवास में एक से ज़्यादा चूल्हे पाए जाते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि वह एक समूह या संयुक्त परिवार होता है या बहुत सारे परिवार भी एक साथ वहाँ रह सकते हैं । इसके अलावा बीच में जो खाली जगह है उसका उपयोग किसी समारोह या संस्कार के लिए होता है ।“ हम लोगों ने महसूस किया कि ट्रेंच पर पहुँचने से पूर्व ही आज की हमारी क्लास शुरू हो चुकी है ।


दोपहर आज कुछ गर्म थी । धूप में भी तेज़ी थी । लेकिन एक पुरातत्ववेत्ता के लिए गर्मी या धूप क्या मायने रखती है । हम लोगों ने ट्रेंच क्रमांक चार पर अपना काम आगे बढाया और उस सतह पर प्राप्त फ्लोर को थोड़ा और विस्तार दिया । लेकिन कुछ देर बाद ही वह फ्लोर समाप्त हो गई ..आगे केवल मिटटी थी । हम सतह के नीचे जो पूरा मकान मिलने की आशा कर रहे थे वह सचमुच मिटटी में मिल गई । हम लोगों ने चूल्हा भी ढूँढने की कोशिश की लेकिन न चूल्हा मिला न राख । शाम काम ख़त्म करने तक  हम लोग पसीने से भीग चुके थे । मैंने रवीन्द्र से कहा " मेरा तो यार नहाने का मन कर रहा है ।" रवीन्द्र हँसने लगा .."बावला मत बन, अभी अभी सर्दी कम हुई है, कहीं ठण्ड लग गई और सन्निपात हो गया तो तू भी सन्निपात के रोगी सिकंदर की तरह बड़बड़ाने लगेगा ।" मैंने कहा "भाई , कहाँ सिकंदर कहाँ अपन कलंदर ..हटाओ, नहीं नहाते, हाथ मुँह धोकर ही काम चला लेंगे । सो हाथ मुँह धोकर हम लोग फिर सिटी यानि दंगवाड़ा गाँव की ओर घूमने निकल गए ।


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आज दंगवाड़ा की गलियों में घूमते हुए हम रुक रुक कर मकानों की ओर देख रहे थे और उनमें  उस मकान के शिल्प को ढूँढने का प्रयास कर रहे थे जिसके बारे में सर ने आज हमें बताया था । हालाँकि वैसा घर मिलना अब असम्भव ही था । आज मनुष्य इतना विकास कर चुका है कि जिस आग को उसे जलाना नहीं आता था और उसे सहेजने के लिए घर के बीचोबीच एक बड़ी सी जगह की ज़रूरत होती थी, आज वही आग माचिस की एक छोटी सी डिब्बी में कैद हो कर उसकी जेब में आ गई है । छत पर सरकंडों की जगह अब कवेलू हैं यदयपि कहीं कहीं घासफूस के छत वाली झोपड़ियाँ अब भी दिख जाती हैं । हाँ, छत को थामे बल्लियाँ अब भी मौज़ूद हैं लेकिन दीवारों के आगे उनकी भूमिका गौण है ।


  सिटी से लौटकर जब हम लोग अपने तम्बू में आए तो अजय अपना पेट पकड़कर अजीब सी हरकतें करने लगा । हम लोगों ने आज दंगवाड़ा में चाय वाले की दुकान पर समोसे  भी खाये थे । हमें लगा उसने ज़्यादा समोसे खा लिए हैं जिन्हें हज़म करने में उसे कष्ट हो रहा है । “क्या हुआ अजय ?“ किशोर भैया ने एक अभिभावक की तरह सवाल किया । “कुछ नहीं भ्राताश्री…” अजय पेट पकड़े पकड़े बताने लगा …”आज सायंकाल से मानस के स्मृति भंडार में संरक्षित भार्या की स्मृति अवचेतन की विभिन्न सतहों को विखंडित करती हुई चेतना में स्थानापन्न हो रही थी फलस्वरूप भान न रहा और मैंने आवश्यकता से अधिक तैलीय खाद्य उदरस्थ कर लिया अत: आमाशय में अनेकानेक रासायनिक परिवर्तनों के साथ साथ मानस में अजीब अजीब आकृतियाँ उभर रही हैं ।“ 


हम लोग अजय की बदमाशी समझ रहे थे सो उसकी यह बात सुनकर कहकहे लगाने लगे । लेकिन राममिलन भैया अचानक गम्भीर हो गए । वे पहले उसके थोड़ा क़रीब गए, फिर छिटक कर दूर खड़े हो गए और शिकायत के लहज़े में कहने लगे…”मना किया था.. हमने मना किया था । परसों अमावस थी, इसको  मना किया था कि बड़ के उस पुराने पेड़ के नीचे पेशाब न करे लेकिन यह माना ही नहीं, अभी गाँव से लौटते हुए यह उसी पेड़ के नीचे से होता हुआ आया है .. पकड़ लिया न उस बरगद वाले जिन्न ने …होना ही था यह तो । अब इसको फुंकवाने ले जाना पड़ेगा । ” 


राममिलन भैया की बात पूरी होने से पहले ही अजय जोर से हँस दिया …” ऐसा कुछ नहीं हुआ है पंडित जी, जिन्न मुझे क्या पकड़ेगा मैं तो खुद जिन्न हूँ । दरअसल मैं तो शुद्ध हिन्दी बोलने का प्रयास कर रहा था ।“ राममिलन कुछ नाराज़ से लगे …”तो नाटक कर रहे थे ऐसा बोलो न .. अब हमका का मालूम ..हम सोचे कौनो भूत-प्रेत पकड़ लिया है और तुम उसी की भाषा बोल रहे हो । अब इतनी दुरूह और क्लिष्ट हिन्दी बोलोगे तो हमें ऐसा ही लगेगा ना । अब ऐसी भाषा भी किस काम की जिसके लिए डिक्शनरी लेकर बैठना पड़े । “ “डिक्शनरी नहीं पंडित जी शब्दकोष कहिए शब्दकोष ।“ अजय फिर खिलखिलाकर हँस पड़ा ।


“यार, इंसान ने पहली डिक्शनरी कब बनाई होगी ?“ अचानक रवींद्र ने सवाल किया । अशोक ने घूरकर उसे देखा और कहा …” तू भी ना यार रविन्दर …थारे  भीतर किसी मरे हुए आर्कियालॉजिस्ट का भूत घुस गया है, जब देखो तब, इंसान ने यह कब किया होगा, इंसान ने वह कब किया होगा यही पूछता रहता है । और कोई बात नहीं आवै है रे थारे दिमाग में ? “ रवींद्र खिसियानी सी हँसी हँसकर चुप हो गया । मैंने उसका पक्ष लेते हुए कहा …” तो क्या हो गया यार, यह सहज स्वाभाविक जिज्ञासा है, आखिर दुनिया भर के पुरातत्ववेत्ता भी तो इसी काम में लगे हैं, यह जानने में कि मनुष्य का जन्म कैसे हुआ, उसने घर बनाना कैसे सीखा, बोलना कैसे सीखा,भाषा कैसे आई और इस खोज में तब तक लगे रहेंगे जब तक मनुष्य का इतिहास पूरा नहीं हो जाता । हम लोग भी तो आगे जाकर यही करने वाले हैं ।“

 

“ रेन दे रेन दे …” अशोक ने हाथ मटकाते हुए कहा । मैं ये सब नहीं करने वाला, घर से दूर जंगल में पड़े रहो भूखे प्यासे, अन भाटा से अपना सर फोड़ो । और मनुष्य का इतिहास, वह कभी पूरा होने वाला नहीं, इसलिए कि जैसे ही कोई क्षण बीतता है वह जाकर इतिहास में जमा हो जाता है, रक्तबीज की तरह है यह, एक जगह खोज पूरी हुई नहीं कि दूसरी जगह खोज के लिए तैयार । यह तो इंसान का अपना इतिहास है इसलिए वह जी जान से लगा है । अपनी ही खोज कर रहा है । हम भी एक दिन मर खप जायेंगे और  यह बात इतिहास में कहीं शामिल भी नहीं होगी कि उज्जैन से कुछ उधमी छात्रों का दल वाकणकर गुरूजी के निर्देशन में चम्बल के किनारे दंगवाड़ा के इस टीले पर अपना सर फोड़ने आया था ।"


“ काश यह बात इतिहास में शामिल होती !“ अशोक की साधारण सी बात के पीछे छुपे निहितार्थ को समझते हुए मैंने कहा । “इसलिए कि इतिहास तो अब तक बड़े बड़े लोगों का ही लिखा गया है, राजा महाराजाओं का लिखा गया है । हम जैसे आम लोगों का इतिहास न कभी लिखा गया न कभी लिखा जाएगा । लेकिन तू चिंता मत कर मेरे यार अशोक, एक दिन मैं लिखूंगा कि अशोक के साथ हम पांच दोस्त चम्बल नदी के किनारे दंगवाड़ा नामक एक जगह पर पुरातात्विक उत्खनन के लिए गये थे और हमारे गुरूजी थे पद्मश्री डॉ.वी. एस वाकणकर ।“ इतने में मेरा ध्यान रवींद्र की ओर गया । वह अब तक उदास था और शून्य में ताक रहा था । मैंने रवीन्द्र और अशोक के कंधे पर हाथ रखा और कहा " चलो यारों, टीले तक एक चक्कर लगा कर आते हैं, चम्बल के किनारे चतुर्थी के चाँद को ढूंढेंगे .. खाना आज देर से खायेंगे, पेट में अभी समोसा उछल-कूद मचा  रहा है ।


*शरद कोकास*


39-लेकिन पशु से मनुष्य की संतान कैसे हो सकती है ?


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा- पिछले भाग में आपने आदिम मनुष्य के आवास के बारे में पढ़ा ।आज वाकणकर सर उपलब्ध हैं उनका होना छात्रों के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है वे जिस तरह चीज़ों को आसान करके बताते हैं वैसा कोई नहीं बता सकता आज वे बता रहे हैं आदिम मनुष्य की कला,गुफाओं में चट्टानों पर उसकी चित्रकारी एवं उसके आदिम विश्वास और आदिम धर्म के बारे में यह महत्वपूर्ण जानकारी आपके काम आयेगी*

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*भाग 39*

*चट्टान की मुंडेर पर एक चिड़िया*

चम्बल के किनारे पीपल के पेड़ पर बने चिड़िया के उस घोंसले को मैं रोज़ ही देखता था और अपने घर को याद करता था । लेकिन न मुझे उस घोंसले में चिड़िया दिखाई देती थी न उसके बच्चे । मैं सोचता था शायद उसके बच्चे बड़े हो गए हों और दाने-पानी की खोज में कहीं उड़ गए हों और फिर वह चिड़िया भी खुद का पेट भरने के लिए कहीं चली गई हो । आज अचानक मुझे वह चिड़िया दिखाई दे गई । उसकी आँखों में उदासी थी । उसे देखकर मुझे माँ की याद आने लगी ।

मैंने रवीन्द्र से कहा "देखो वह चिड़िया कितनी उदास है ।" रवीन्द्र इतने दिनों तक मेरे साथ रहकर मेरी भाषा समझने लगा था । उसने कहा "हाँ, उदास तो होगी ही उसके बच्चे जो अपना घर छोड़कर चले गए हैं ।" "हम भी इसी तरह एक दिन नौकरी करने के लिए अपना घर छोड़कर चले जायेंगे तब हमारी माँ भी इसी तरह उदास रहा करेगी ।" 

मैंने कहा । रवीन्द्र बोला "हाँ यही जीवन का सच है । अब मुझे भी भानपुरा में तो नौकरी मिलने से रही.. क्या पता मुझे किस शहर में जाना पड़े ।" "ठीक है यार ।" मैंने कहा " हम कोशिश करेंगे कि एक ही शहर में रहें और अपने सुख दुःख बाँटें ।"

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घर परिवार की बातें करते हुए हम लोग घाट से कैम्प वापस आ गए । भाटी जी की भोजनशाला से मसालों की खुशबू आ रही थी । कपड़े बदलकर हम लोग तैयार हो गए और भोजनशाला में पहुँच गए । मालवा की विशेष शैली में सौंफ डालकर बनाया हुआ गरमा गरम पोहा एक बर्तन में रखा हुआ था । हम लोगों ने अपनी अपनी प्लेट में पोहा लिया और स्वाद का आनन्द लेने लगे ।

 इतने में वाकणकर सर का प्रवेश हुआ । हमने उन्हें अभिवादन किया । उन्होंने जवाब देते हुए कहा "क्या बात है दुष्टों ,तुम लोग आजकल रात में जल्दी सोते नहीं हो , क्या करते रहते हो ? “ 

“कुछ नहीं सर ।” मैंने कहा “ बस बातें करते रहते हैं ।" इससे पहले कि वे पूछें क्या बातें करते रहते हो, मैंने खुद ही बता दिया … “सर कल हम लोग गुफा में रहने वाले मानव के बारे में बातें कर रहे थे ।“ 

मेरे प्रश्न के तारतम्य में रवींद्र ने भी तपाक से पूछ लिया …” सर, यह प्रागैतिहासिक मानव गुफा में चित्र किसलिए बनाता था ? “ हम लोग यह अवसर खोना नहीं चाहते थे आख़िर हम विश्वप्रसिद्ध भीमबैठका की गुफाओं में शैलचित्रों के खोजकर्ता डॉ.वि.श्री.वाकणकर से मुखातिब थे l

डॉ वाकणकर ने अपने चश्मे के ऊपर से हमें देखा …"क्यों, यह सवाल तो तुम लोगों के कोर्स में है ना ? पढ़ा नहीं क्या ?“ हमें नहीं पता था कि इस तरह हम अपनी पोल खुद ही खोल देंगे । हम सभी चुप हो गए । मैंने धीमे स्वर में कहा .."सर पढ़ा तो है लेकिन आपसे थोड़ा और समझना चाहते हैं ।" सर मुस्कुराये फिर हँस कर कहा .."कोई बात नहीं.. परीक्षा देने लायक तो पढ़ ही लेना ।“ हमें लगा वे अब शायद ही कुछ बतायें । 

सर ने अपनी प्लेट में पोहा लिया और एक चम्मच पोहा मुँह में डालते हुए कहा …” मानव की गुफाओं में चित्रकारी वस्तुतः उसका प्रकृति के प्रति एक अनुष्ठान था । इन चित्रों में उसका जीवन दर्शन था । तुम लोगों ने देखा होगा प्राचीन गुफ़ाओं में बहुत से ऐसे चित्र मिले हैं, किसीमें कोई आदमी जानवर का मुखौटा पहने हुए है, दैत्य की तरह उसका सिर लगता है.. सींगवाला, किसी में उसकी दुम है, यह बाइसन की खाल ओढ़े आदमी का चित्र है ।"

पोहा चबाते हुए हम लोगों का मुँह चल रहा था लेकिन ध्यान सर की ओर ही था । उन्होंने कहना जारी रखा "उस समय होता यह था कि मनुष्य शिकार करता था और उसे ज़्यादा से ज़्यादा शिकार मिले इसके लिए इन चित्रों द्वारा अनुष्ठान करता था । जैसे शिकार पर जाने से पहले दीवार पर वे हिरण का चित्र बनाते थे और अपने भाले की नोक से उसका स्पर्श करते थे । इसका अर्थ यह होता था कि उनका शिकार सफल हो । 

कई बार वे उस जानवर का चित्र बनाकर उसे धन्यवाद भी देते थे कि वह उनका आहार बना । इसी तरह वे मारे गए बाइसन, हिरन या रीछ को लाकर उसके पास भोजन से भरा बर्तन रखते थे और सिर से पूँछ तक उसका स्पर्श करते थे । बस यही सब अनुष्ठान,उनकी शिकार कथा,उनके उत्सव आदि इन दीवारों पर चित्रित हैं । और ऐसा वे सहज रूप से करते थे, कहीं कोई नियम नहीं था । यह समझ लो कि उन्होंने अपना पूरा जीवन ही चित्रित कर दिया है गुफा की दीवारों पर । “

“सर, लेकिन इन सभी चित्रों के अर्थ तो अलग अलग होंगे और प्रयोजन भी ? “ मैंने सर से सवाल किया । 

“बिलकुल“ सर ने कहा “हर चित्र का प्रयोजन अलग अलग है । यह पूरी चित्रकला शिकार और उसकी संग्रहण वृति से ही सम्बंधित है । वह जिन जीव जंतुओं का शिकार करता था अथवा जिन फलों का भक्षण करता था उनके चित्र गुफाओं में बनाता था । यह पशु और पेड़ उसके टोटेम या गण चिन्ह थे, उसका जीवन इन्ही पर निर्भर था । जब तक यह प्रचुर मात्रा में मिलते थे यह उनका भक्षण करता था तथा उनकी कमी होने पर उनके भक्षण का निषेध करता था । अभी भी अनेक आदिवासियों में यह प्रथा चली आ रही है कि कुछ जीवों अथवा वनस्पतियों को खाना उनके यहाँ निषिद्ध है ।"

अचानक वाकणकर सर रुके और भाटीजी की ओर देखकर उन्होंने कहा "भाटीजी, पोहा तो कईं ज़ोरदार बन्यो हे ,थोड़ा नमकीन ओर देना ।" फ़िर वे हमसे मुख़ातिब हुए "कई आदिवासी अपने आप को उन पशुओं अथवा वनस्पतियों का वंशज भी मानते हैं । उनका यह अदम्य विश्वास है कि उनके पूर्वज किसी पेड़ से या किसी पशु से पैदा हुए हैं । यह पेड़ अथवा पशु ही उनके गणचिन्ह होते हैं । उन पेड़ों के फल खाना अथवा उन पशुओं का मांस खाना उनके यहाँ निषिद्ध है । 

इसके विपरीत कुछ आदिवासियों में उनके टोटेम पशु का मांस प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है । रूस के क्विचुआन कबीले में शिकारी मरने के बाद हिरन की टांगे पूर्व दिशा में रखते हैं, उसके सिर के पास कुछ भोजन रख देते हैं फिर उसके पास जाकर उसे धन्यवाद देते हैं, उसे सहलाते हैं इसलिए कि उसने उन्हें उसे शिकार के रूप में भोजन दिया ।"

"सर जी यह तो हमारे धरम में भी होता है " राममिलन भैया सर की यह बात सुनकर खुश हो गए हमारे यहाँ भी परसाद को पहले भगवान के पास रखा जाता है फिर उसे खाया जाता है ।" 

सर ने राममिलन की पीठ पर हाथ रखा "बिलकुल, यह आदिम परंपरा ही है । मैं तुम्हें रूस के साइबेरिया के आदिवासियों का उदाहरण देता हूँ ।" वाकणकर सर पानी पीने के लिए कुछ देर रुके .."वे लोग रीछ का शिकार करते हैं । रीछ को मारकर घर में लाया जाता है, फिर उसे एक ऊँचे स्थान पर रख दिया जाता है, फिर आटे या पेड़ की छाल से बनी बारहसिंघे की आकृतियाँ उसके पास रख दी जाती हैं उसकी आँखों पर वे सिक्के रख देते हैं । अपने यहाँ नहीं कैसे भगवान को प्रसाद चढ़ाते हैं, यह उनका अपने टोटेम देवता को चढ़ावा होता है । फिर हर शिकारी उस रीछ के पास जाता है और उसके थूथन को स्पर्श करता है । फिर उनका नृत्य उत्सव शुरू होता है और कई दिनों तक चलता है अंत में वे उसका मांस भक्षण करते हैं लेकिन आश्चर्य यह कि उसका सर और अगले पंजों को नहीं खाया जाता ।“

“हाँ सर, यह तो विचित्र बात है ..सर और पंजों को क्यों छोड़ दिया जाता है ? और यह भी समझ में नहीं आया कि इतने दिनों में मांस ख़राब नहीं होता था ?” अजय का मासूम सा सवाल । 

“ अरे मूरख, मैं सायबेरिया के ठन्डे प्रदेशों की आदिवासी परंपरा की बात कर रहा हूँ, अपने झाबुआ के आदिवासियों की नहीं , वैसे भी इतनी अक्ल तो होती ही है उनमें कि मांस ख़राब होने से पहले उसका भक्षण कर लें । रही बात सिर और अगले पंजे न खाने की तो पशु के यह अंग ही उनके टोटेम देवता होते हैं । 

कई आदिवासी कबीलों में जानवर की जीभ नहीं खाई जाती तो कहीं उनके कान नहीं खाए जाते हैं क्योंकि वे लोग अपने कबीले के लोगों को उनके टोटेम पशु के उसी अंग से उत्पन्न मानते हैं । अनेक स्थानों पर यह भी माना जाता है कि उनके क़बीले की किसी आदिम स्त्री का सम्बन्ध उस पशु से हुआ होगा और वे सब उसीकी संताने हैं । यह सब उसके बाद हुआ होगा जब मनुष्य ने स्त्री को उनकी संतान को जन्म देते हुए देखा होगा ।"

"सर, पशु से मनुष्य की संतान कैसे हो सकती है ?" मेरे भीतर के तर्कशील छात्र ने सवाल किया । सर थोड़ा सा मुस्कुराये .."भाई, उस समय विज्ञान की उन्नति आज के समान थोड़े ही हुई थी । उन्हें यह भी नहीं पता था कि किसी इंसान या प्राणी का जन्म कैसे होता है । 

वे यही समझते थे कि हवाओं के, पानी के या किसी पशु के संसर्ग से मनुष्य जन्म लेता है । इसलिए उन्हें लगता था कि उनके पूर्वज भी ऐसे ही पैदा हुए होंगे । सो वे ऐसे पशुओं को अपना पूर्वज मानते थे । अपने यहाँ नहीं पुराणों में कथा है किसी का जन्म फल खाने से हुआ किसी का नाग से हुआ बस ऐसे ही ।

“सर, लेकिन गुफाओं में जो बायसन या हिरन की खाल पहने मनुष्यों के चित्र पाए जाते हैं उसका क्या अर्थ है ?" अबकी बार सवाल पूछने की बारी अशोक की थी । 

“ बिलकुल सही सवाल है । “ सर ने कहा “ यह मनुष्य अपने उस टोटेम देवता या उस पशु के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करने के लिए उसकी खाल या उसके सींग पहनता था । हम आज भी विश्व के विभिन्न आदिवासी समूहों में प्रचलित नृत्यों में यह देखते हैं कि वे लोग जानवरों के मुखौटे, उनके सींग और उनसे सम्बंधित अन्य वस्तुएं पहनकर नृत्य करते हैं । 

“ हाँ सर मैंने कहीं पढ़ा था ।“ अशोक ने कहा “आदिवासी नृत्य में बाइसन की खाल पहनकर और सींग वाला उसका मुखौटा पहनकर नृत्य कर रहे हैं उनके हाथों में धनुष बाण और भाले हैं , एक आदिवासी बायसन बना है, वह नाचते हुए गिरने का अभिनय करता है , उस पर सब भाला तान देते हैं और बाण छोड़ते हैं । फिर सब उसे घसीटकर घेरे से बाहर कर दते हैं और नृत्य जारी रहता है । “

“हाँ ,सही कह रहे हो तुम ।“ सर ने कहा “ ठीक इसी दृश्य के चित्र गुफाओं में मिले हैं जिनमें लाल काले रंग से बायसन चित्रित है ,उसके शरीर पर तीर धसे हुए हैं ।" 

“सर, लेकिन मैंने सुना था इसका सम्बन्ध जादू - टोने से भी है ?" अशोक ने पूछा । 

“ हाँ ।“ सर ने कहा “वैसे पूरी तरह तो ऐसा नहीं है ..फिर भी उन दिनों मनुष्य चमत्कारिक शक्तियों में तो विश्वास करता ही था । गुफा में बने नृत्य के चित्रों से यह अनुमान लगाया गया है कि कोइ ओझा जैसा व्यक्ति होता था जो शिकार के लिए अनुष्ठान करता था । यह कुछ कुछ उस शिकार को वश में करने जैसा भी था, हो सकता है, ऐसा उनका सोचना हो कि इस तरह से शिकार उनके वश में होकर उनकी ओर खिंचा चला आएगा । आज हम इन बातों को बहुत ही बेतुका मानते हैं लेकिन उस मनुष्य की जीवन पद्धति में यह शामिल था । अभी भी अनेक आदिवासी समाजों में यह प्रथाएँ प्रचलित हैं l" इतना कहकर सर उठे और किसी काम से बाहर निकल गए ।

रवीन्द्र ने मुझसे कहा "कितना सुंदर दृश्य होता होगा आदिम मनुष्य की इस कलावीथिका में । कुछ लोग पेड़ की जड़ों और पत्तों से रंग तैयार कर रहे हैं, कुछ लोग रंग बिरंगी चट्टानों को पीसकर उनसे रंग तैयार कर रहे हैं ,हरी टहनियों की नोक कुचलकर उन्होंने अपनी कूचियाँ बनाई हैं फिर वे पूरी तल्लीनता से इन रंगों और अपनी कूचियों के माध्यम से अपने जीवन को इन चट्टानों पर उतार रहे हैं । 

एक चित्र में कमर में हाथ डाले कितने लोग नृत्य कर रहे हैं, एक कोई ढोल जैसा कुछ बजा रहा है । दूसरे चित्र में जंगल की ओर भागता यह हिरणों का झुण्ड है । तीसरे चित्र में आसमान में उड़ती चिड़िया एक चिड़िया चट्टान की मुंडेर पर आकर बैठ गई है और अपने ही चित्र को निहार रही है जैसे वह उसका आईना हो । इतने में एक हिरण वहाँ आकर ठहर गया है और अपने ही किसी भाई की देह में धंसे भाले का चित्र देखकर उसकी आँख की कोर में एक आँसू आकर ठहर गया है । "

"यार रवींद्र .. लगता है तुझ पर भी इस कवि का असर हो गया है और तू भी कविता करने लगा है ।" अजय ने आँखे फाड़कर रवींद्र की ओर देखते हुए कहा । रवींद्र ने भी उसी तरह आँखे फाड़ी और अजय से कहा " ऐसा क्या , मुझे तो मालूम ही नहीं था कि यह कविता है ।"


*शरद कोकास*



38-आदिम मानव का वन बी एच के कैसा रहा होगा


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा- अब तक आप लोगों ने पढ़ा कि छात्र सुबह सुबह ट्रेंच पर पहुँच गए हैं और मनुष्य की उत्पत्ति के बारे में बातें कर रहे हैं । बातचीत से पता चला कि ज्ञात मनुष्य जाति की आयु लगभग दस लाख साल है लेकिन उससे पहले तीन करोड़ सत्तर लाख साल पहले प्लीओपिथेकस हुआ, फिर दो करोड़ साठ लाख साल पहले रेमापिथेकस हुआ, फिर तीस लाख साल पहले आस्ट्रेलोपिथेकस हुआ , फिर दस लाख साल पहले होमोइरेक्टस हुआ, फिर ढाई लाख साल पहले प्रारंभिक होमोसेपियन्स, सोलो नदी का मानव यानि पिथेकेंथ्रोपस, फिर डेढ़ लाख साल पहले नियेंडरथल  मानव हुआ और अभी चालीस हज़ार साल पहले आधुनिक होमोसेपियन्स क्रोमैंगनन या आधुनिक मानव यानि हम लोग पैदा हुए । इस बातचीत के बाद वे तम्बू में लौट आते हैं । इंसान की इस कहानी में पढ़िए आगे की कहानी *

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*भाग 38*

*आदिम मानव का वन बी एच के* 

जैसे कि रात होते ही अँधेरा दुनिया की हर चीज़ पर पसर जाता है तम्बू के भीतर हम लोग भी अपने बिस्तरों पर पसर चुके थे । बिस्तर अब पहले की तरह गर्म और सूखे हुए थे और पिछले दिनों की बारिश से उपजे गीलेपन का कोई चिन्ह उनमे मौज़ूद नहीं था । वातावरण की नमी गायब होकर जैसे हम लोगों की आँखों में आ गई थी । 

घर की बातें करते हुए हम लोगों को भी घर की याद सताने लगी थी । मन की फिजाँ में एक धुन तैर रही थी ..आ अब लौट चलें ...। अशोक और किशोर हम लोगों की तरह होमसिक नहीं थे इसलिए कि वे लोग उज्जैन में ही रहते हैं अपने घर में लेकिन मैं, रवीन्द्र और अजय अपने घर से दूर हॉस्टल में रह रहे हैं । वे लोग तो यहाँ से जाने के बाद अपने ही घर में रहेंगे लेकिन हम लोगों के लिए तो फिर वही हॉस्टल की जिंदगी ।

घर से दूर रहकर हम लोगों को घर की याद कुछ अधिक ही सताती है । घर से आये हुए भी काफी दिन बीत गए हैं । अब तो परीक्षाओं के बाद ही घर जाना होगा । फ़िलहाल तो बस चिठ्ठियों का सहारा है । 

माँ हमेशा पूछती है ..'बेटा घर कब आओगे ?' मैं भी हमेशा की तरह जवाब देता हूँ ..'बस माँ जल्दी ही आऊंगा ।' 

हालाँकि मुझे पता है, घर से बाहर निकलने के बाद जल्दी लौटना कहाँ होता है ,पढाई पूरी करने के बाद जाने कहाँ नौकरी मिले किस अनजान प्रदेश के किस शहर में दाना-पानी लिखा हो पता नहीं । हालाँकि लौटना तो तब भी होगा लेकिन इसी तरह छुट्टियों में कभी कभार । 

फिर भी ग़नीमत है, लौटने के लिए हम लोगों के पास एक घर तो है । दुनिया में जाने कितने लोग हैं जो जीवन भर भटकते रहते हैं और कभी घर नहीं लौट पाते इसलिए कि उनका कोई घर ही नहीं होता  । हमारे आदिम पुरखे भी तो इसी तरह भटकते थे ।

 अजय के मानस में पेड़ पर रहने वाले उस बेघर इंसान का चित्र उमड़ -घुमड़ रहा था । उसने पूछा “हाँ यार, यह बात तो सही है कि पेड़ ही उस प्रारंभिक मनुष्य के घर थे, लेकिन पेड़ों पर रहने वाला इंसान आखिर घर बनाने की स्थिति तक कैसे आया होगा ।" 

मैं समझ गया ,मुझे अब अपने घर के बारे में सोचना छोड़कर अपने उस आदिम पुरखे के घर के बारे में सोचना था । “यह स्थिति एकाएक नहीं आई ।" मैं बरसों पहले के उस इंसान का एक चित्र मन में बना रहा था ।" पेड़ों से उतरने के बाद सबसे पहली समस्या उसके सामने थी कि ज़मीन पर रहने वाले हिंसक जानवरों से अपनी रक्षा कैसे की जाए ।“ 

“ लेकिन जब इतना डर था तो वह पेड़ से उतरा ही क्यों ?“ अजय ने फिर सवाल किया । 

“तू भी ना, रहेगा ज़िन्दगी भर भाभी का भैया ।“ रवींद्र ने कहा “तो क्या वह हमेशा पेड़ पर ही चढ़ा रहता, वहाँ क्या उसे जीवन भर फल मिलते रहते ? भाई, भोजन की निरंतर कठिन होती व्यवस्था के अलावा एक  प्रमुख कारण यह भी था कि पृथ्वी की जलवायु और तापमान में निरंतर परिवर्तन होता जा रहा था । ताड़, मैंग्नोलिआ, अन्जीर के पेड़ समाप्त होते जा रहे थे और शीतकाल में उगने वाले पेड़ों की संख्या बढ़ रही थी । जिन पेड़ों पर उसका आवास था उनकी संख्या कम होते जाने के कारण एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर जाने में उसे कठिनाई भी हो रही थी ।“

“यही तो मैं कह रहा हूँ ।“ अजय बोला । “बंदर तो अभी भी पेड़ों पर रहते हैं, उन्हें  कभी ज़रूरत नहीं पड़ी ज़मीन पर आने की । हाँ यह बात ज़रूर है कि जंगलों में पेड़ कट रहे हैं इसलिए आजकल वे अक्सर शहर में चले आते हैं ।

“ लेकिन बंदर और आदमी में फ़र्क है ना ।“ मुझे अंकल डार्विन याद आये । “अब यह तो मनुष्य था बंदरों की तरह एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक लम्बी छलांग भी नहीं लगा सकता था । उसकी शारीरिक बनावट भी इस तरह की नहीं थी । सो उसने निर्णय लिया कि अब पेड़ से उतरकर ज़मीन पर रहा जाए ।ठीक इसी जगह अपने रहन-सहन में मनुष्य बंदरों से अलग हो जाता है । पेड़ों से नीचे उतरकर वह दो पैरों पर चलना सीखता है, फिर ठंड से बचने और हिंसक जानवरों से अपनी रक्षा के लिए और कालांतर में शिकार का माँस संग्रहण करने के लिए गुफाओं में शरण लेता है । 

गुफाओं में आवास बनाने की स्थिति तक पहुँचने के लिए भी इस मनुष्य को लाखों वर्ष लगे । इस गुफावासी मनुष्य का चेहरा पहले से अलग था और उसका मस्तिष्क भी पूर्व की तुलना में अधिक बड़ा था ।"

"मतलब भीतर वाला मस्तिष्क ?" अजय ने भोंदू की तरह मुखाकृति बनाकर पूछा "तो क्या बाहर वाला भी कोई होता है क्या ? मस्तिष्क के बाहर तो सिर होता है । "रवींद्र ने चुटकी ली । 

"सॉरी, मैं वही समझा था ..मतलब मस्तिष्क उसका बड़ा कैसे हुआ ?" अजय ने उसकी चुटकी को नज़रंदाज़ करते हुए कहा । 

"भाई, सीधी सी बात है उसने मस्तिष्क से काम लेना शुरू किया तो मस्तिष्क की क्षमता और आकार में भी वृद्धि होती गई । अब तेरे समान दिमाग़ से काम न लेने वाला इंसान होता तो उसका भी छोटा का छोटा रह जाता ।" रवीन्द्र ने अजय के संभावित वार की आशंका से उसके और अपने बीच तकिये की दीवार बनाते हुए कहा । 

"अरे यार जब देखो तब तुम मेरे से तुलना क्यों करते हो ?´अजय ने गुस्सा दिखाते हुए कहा । 

"ठीक है.. ठीक है लड़ो मत ..आगे की कहानी सुनो ।" मैंने दोनों के बीच होने वाले युद्ध को टालने के दृष्टिकोण से कहा । "तो वह मनुष्य जब पेड़ से नीचे आया तो उसके सामने पहली समस्या यही थी कि अब कहाँ रहा जाए । अचानक उसे पहाड़ों में चट्टानों के बीच गुफाएँ दिखीं । यह गुफाएँ न केवल हिंसक जानवरों से सुरक्षित थीं बल्कि सर्दी और बारिश से भी उसका बचाव करती थीं । इस तरह वह गुफाओं में रहने लगा । " 

" लेकिन यह पुरातत्ववेत्ताओं को कैसे पता चला? " अजय ध्यान से मेरी बात सुन रहा था । " अरे ! यह भी कोई सवाल है ?" मैंने कहा " पुरातत्ववेत्ता खोज करते हुए उन गुफाओं तक गए और ढूंढ लिया । और जब उन पुरातत्ववेत्ताओं को प्राचीन गुफाओं में इस मनुष्य के रहने के प्रमाण मिले तो इस बात से तय हुआ कि वह मानव इनमे रहता था । 

ग़नीमत है कि लाखों साल बाद भी यह प्राचीन प्राकृतिक गुफाएँ जस की तस हैं, अगर मनुष्यों के बनाए मकान होते तो कब के नष्ट हो जाते ।“

"जई बात तो हम कहत हैं ।" अब राममिलन भैया ने हाथ पर हाथ मरते हुए कहा  .."कि भगवान ने जौन बनाये हैं धरती, नदिया, पहाड़, ई गुँफा सब जस के तस है और आदमी जौन बनाय रहा मकान उकान ऊ सब खतम हुई गवा ।" 

किशोर भैया तो जैसे तैयार ही बैठे थे कि राममिलन कुछ कहें और वे उसका जवाब दें .."ऐसा है पंडत ये आदमी भी तो भगवान ने बनाया है वो फिर कैसे ख़तम हो जाता है ? अगर तुमको भी भगवान ने बनाया है तो क्या तुम कभी ख़तम नहीं होगे ?" मैं जानता था अगर दोनों के बीच नोकझोंक शुरू हुई तो शीघ्र समाप्त नहीं होगी । एक युद्धविराम अभी अभी घोषित किया था मैंने अब दूसरे की बारी थी । 

मैंने क्रोध प्रकट करते हुए कहा "सुनो भाई, अगर इस तरह से मुझे डिस्टर्ब करोगे तो आगे की बात नहीं बताऊंगा फिर एग्जाम में इस पर कोई सवाल आये तो मुझसे मत कहना । अभी गुफा मानव की बात चल रही है, आधुनिक मानव की बात बाद में कर लेना ।" सबने तुरंत अपने मुँह पर ऊँगली रख ली । सबको खामोश देख मैंने आगे अपनी बात शुरू की । 

 “उन दिनों होता यह था कि पहले एक मानव समूह गुफा में आकर रहने लगता, लेकिन वह समूह हमेशा के लिए वहाँ नहीं रहता था बल्कि कुछ समय बाद गुफ़ा छोड़ देता था । उसके छोड़कर जाने के बाद वहाँ दूसरा समूह आ जाता ।  

पुरातत्ववेत्ताओं को विभिन्न परतों में प्राप्त हड्डियों,चकमक पत्थरों और कोयले की राख के अध्ययन से यह ज्ञात हुआ । “ " इसका मतलब यह हुआ कि वह अपना समान वहीं छोड़ जाता था ?" अजय का सवाल था ।"अब ऐसा भी कोई ख़ास सामान तो था नहीं उसके पास " मैंने कहा " बस यही कुछ औज़ार आदि अब राख़ और कचरा तो अपने साथ ले जाने से रहा ।" 

"लेकिन यह बताओ यार कि उसकी छोड़ी हुई गुफ़ा में सब कुछ तो मिलता है लेकिन उस मनुष्य के कपड़े यानि जानवर की खाल क्यों नहीं मिलती ?“ किशोर ने सवाल किया । “बताया तो था भैया आर्य सर ने ।“ मैंने उन्हें याद दिलाया “समय के साथ वही वस्तुएँ सुरक्षित रहती हैं जो टिकाऊ हैं । इसलिए पुरातत्ववेत्ताओं को अलग अलग स्तर पर अलग अलग समुदाय के चकमक पत्थर, हड्डियाँ और राख़ मिली । खाल वगैरह तो नष्ट हो गई इसलिए चकमक की  सुई के आधार पर ही हमें  यह तय करना होता है कि उस समय इससे वस्त्र सिले जाते रहे होंगे ।

“लेकिन वह गुफा छोड़कर क्यों चला जाता था ?“ फ़िल्म शोले में जिस तरह वीरू को टंकी पर ख़ुदकुशी करने के लिए चढ़ा देख रामगढ़ वासी ने अपने साथी से सवाल पूछा था ना कि 'भैया ये अंग्रेज लोग सुसाइड क्यों करते हैं', उसी अंदाज़ में भैया राममिलन ने सवाल किया  । 

“इसके भी अनेक कारण हो सकते हैं ।“ मैंने कहा “जैसे शिकार की अनुपलब्धता, कोई प्राकतिक आपदा आदि ।" "फिर यह प्रॉब्लम थी तो दूसरा आदमी वहाँ क्यों रहने आता था ?" अशोक का सवाल वाजिब था । 

मुझे लग रहा था कि मैंने सब लोगों को बात करने से रोका था इसलिए सब लोग अपने अपने सवाल लेकर मुझ पर पिल पड़े हैं । मैंने संयत स्वर में जवाब दिया  " दूसरा मनुष्य एकदम नहीं आता था ..अब वह कोई किराये का मकान थोड़े ही था जो एक गया और दूसरा आ गया । हाँ लेकिन जब वह गुफा छोड़कर चला जाता तो वहाँ रीछ, लकड़बग्घे जैसे जानवर आकर रहने लगते थे ।“ 

“और रहने का किराया भी नहीं देते थे ।“ अजय ने फिर बीच में दखल दिया ।

 “ हाहाहा… किराया देते भी किसको ?“ मैंने भी हास्यबोध के साथ उत्तर दिया “उसका न कोई मालिक था न ही उसका कोई मेन्टेनेन्स करता था । छत से लगातार पत्थर गिरते रहते थे, धूल और मिट्टी की परत जमा होती रहती थी । फिर किसी दिन रीछ आदि जानवर भी गुफ़ा छोड़कर चले जाते ..फिर बरसों बाद जब अगला कोई कबीला वहाँ रहने के लिए आता तब तक तो वे सारे चिन्ह धूल मिटटी आदि में दब जाते । “ 

 “लेकिन इस मनुष्य ने अपना खुद का मकान बनाना कब सीखा ?“ अजय ने फिर पूछा ।

 “बताता हूँ भाई, तुम लोग मुझे कुछ कहने ही नहीं दे रहे हो बार बार सवाल किये जा रहे हो ।“ मैंने किंचित रोष प्रकट करते हुए कहा …” पहले कारण तो जान लो कि उसे अपना खुद का मकान बनाने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई । दरअसल अपना मकान बनाने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि मनुष्य के लिए यह गुफाएँ बहुत असुविधाजनक थीं । अब प्रकृति ने इन्हें मनुष्यों के रहने के लिए तो नहीं बनाया था । किसी गुफा का मुँह सँकरा होता तो किसी की छत नीची होती । किसी किसी में तो रेंगकर भीतर जाना भी मुश्किल होता । किसी की दीवारें इतनी ऊबड़ खाबड़ होतीं कि इंसान उनसे टकरा टकरा कर घायल होता रहता ।“

अजय को याद आया .."अभी पिताजी ने मकान बनाया तो उन्होंने भी ऐसे ही बाहरी दीवारें चिकनी रखने की बजाय सीमेन्ट की छर्री लगवा दी, अब यह हाल है कि ज़रा सा देखकर नहीं चलो तो शरीर छिल जाए । “ अजय के यह कहने पर रवींद्र ने उसे घूर कर देखा । 

मैंने कहा “ठीक है यार,जब कोई अपना नया मकान बनाता है तो कुछ दिन सिर्फ़ उसी की बात करता है, यह मानव स्वभाव है । वह प्रागैतिहासिक मानव भी यही करता था । हालाँकि वह चकमक पत्थरों से रगड़ रगड़ कर, खुरच कर और वांछित तोड़ फोड़ कर गुफ़ा की दीवारों और फ़र्श को चिकना और रहने लायक बना ही लेता था । 

स्त्रियाँ गढ्ढा खोदकर और उसमें पत्थरों की तह बिछाकर चूल्हा बना लेती थीं और माताएँ गढ्ढों में गर्म राख बिछा कर अपने बच्चों को लिटाने के लिए झूले जैसा कुछ बना लेतीं । यहीं किसी कोने में उसका भण्डारण गृह भी होता था जहाँ वह मांस और खाने पीने का अन्य सामान रखता था । दक्षिणी फ़्रांस के पर्वतों में पुरातत्ववेत्ताओं को ऐसे ही प्रागैतिहासिक आवासों के अवशेष मिले हैं ,स्थानीय लोग उन्हें ‘ शैतान का चूल्हा ‘ कहते हैं ।"

"शैतान का चूल्हा क्यों ? क्या वह आदिम मनुष्य शैतान था ? अजय का सवाल वाजिब था । मैंने उसका जवाब दिया " वस्तुतः शैतान शब्द की अवधारणा धार्मिक है । आज का मनुष्य सभ्य हो गया है लेकिन असभ्य मनुष्य को वह अभी भी शैतान, असुर, राक्षस जैसी उपाधियों से विभूषित करता है । 

इसी धार्मिक अवधारणा को जो समस्त पौराणिक ग्रंथों में है आधुनिक मनुष्य ने भी अपना लिया और इतिहासकारों और पुरातत्ववेत्ताओं ने भी अपनी बुद्धि का प्रयोग न करते हुए उसे यही कहा जबकि उन्हें अपना पूर्वज मानकर उनके लिए अच्छे सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग करना चाहिए था ।" 

मुझे लगा कि विषयांतर हो रहा है सो मैं फिरसे आदिम मानव के आवास की कहानी पर लौट आया .." बहरहाल, अपना घर बनाने की इस प्रक्रिया के अंतर्गत गुफ़ा में होने वाली असुविधाओं की वज़ह से धीरे धीरे मनुष्य गुफा से बाहर रहने के लिए आ गया । फिर उसने गुफ़ा के बाहर लकड़ी की बल्लियों आदि का प्रयोग कर पत्थर की दीवारों पर छत डालना सीखा । 

इस तरह वह घर बनाने की कला में पारंगत हो गया । पुरातत्ववेत्ताओं को जो सबसे प्राचीन घर मिला है उसका आकार एक गोल खाई की तरह ही था । दीवारें जानवरों की खालों से मढ़े लकड़ी के खम्भों  की थीं और उन्हें  मजबूत करने के लिए पत्थर की सिल्लियाँ और मैमथ के जबड़े की हड्डियाँ लगाई गईं थीं । यह दीवारें ऊपर जाकर आपस में जुड़ जाती थीं और इस आवास का आकार कुछ कुछ हमारे तम्बू जैसा ही दिखाई देता था । “

जैसे ही मैंने यह कहा सभी लोग तम्बू की छत की ओर देखने लगे । अशोक ने पूछा “लेकिन उस घर के अन्दर क्या क्या मिला ?“ “ घर के बीचोबीच एक गढ्ढा था ।“ मैंने अपनी बात जारी रखी । “यह गढ्ढा  संग्रह करने के काम में आता था, इसमें हड्डी की बनी सुइयाँ, जानवरों के दाँतों से बने मनके आदि सामान मिले हैं ।

 “ अच्छा तो फिर यह उनका बेडरूम रहा होगा ।“ अजय ने कहा । हमने प्रश्नवाचक नज़रों से उसकी ओर देखा तो वह बोला …”अरे आलमारी और कीमती वस्तुएँ बेडरूम में ही रखी जाती हैं ना ।“ 

“चलो ठीक है मान लेते हैं ।“ मैंने कहा …”लेकिन घर में प्रवेश करने की शुरुआत तो हमें मेन गेट से करनी होगी ना ।“ 

बिलकुल सही है ।“ अशोक बोला …” नहीं तो क्या चिमनी से घर में घुसोगे ?“ “हाँ,यही सच है ।“ 

मैंने कहा “इस प्रागैतिहासिक घर में प्रवेश करने का रास्ता चिमनी से ही था । पुरातत्ववेत्ताओं को और कोई रास्ता मिला ही नहीं । हो सकता है हिंसक जानवरों से बचने के लिए उन्होंने यहीं से प्रवेश करने का निर्णय लिया हो ।“

“ और ड्राइंगरूम भी तो होता होगा ना उनके यहाँ ? “ अजय ने सवाल किया । “बिलकुल ।“ मैंने कहा । “ उनका ड्राइंगरूम भी था जिसमे मैंमथ के जबड़ों की हड्डियों का बना फर्नीचर था लेकिन सोते वे लोग ज़मीन पर ही थे क्योंकि पलंगनुमा कोई वस्तु उनके यहाँ नहीं मिली । ज़मीन पर बहुत सारी मिट्टी की ढेरियाँ थीं जिनका उपयोग संभवतः वे लोग तकिये की तरह करते थे । 

इसके अलावा घर में एक वर्कशॉप भी होता था उनका । पुरातत्ववेत्ताओं को यहाँ पत्थर की चिकनी सिल्लियों का ठीहा मिलता है जिसके आसपास बहुत सारे चकमक पत्थर बिखरे पड़े हैं । इनमें मनुष्य के बनाए औज़ार हैं, हड्डियों की खपच्चियाँ हैं और सुइयाँ हैं । इनमें कुछ रफ़ और कुछ चिकने किए हुए मनके भी हैं । बहुत सारी वस्तुएँ अधूरी बनी दिखाई देती हैं जिसका अर्थ यह हो सकता है कि किसी आपदा के आने के फलस्वरूप इन्हें  यह आवास बीच में ही छोड़कर जाना पड़ गया था ।“

“गज़ब है यार ।“ अशोक ने कहा …” पुरातत्त्ववेत्ता  भी किसी वैज्ञानिक की तरह अल्प प्रमाणों के बावज़ूद पूरा चित्र प्रस्तुत कर देते हैं । “हाँ ।“ मैंने कहा “लेकिन वे ऐसा केवल अभ्यास वश ही नहीं करते । एक लम्बी परम्परा का अध्ययन उन्होंने किया होता है और वैज्ञानिक दृष्टि के अलावा इन सब बातों के निर्धारण में विज्ञान भी उनका सहायक होता है ।" 

"चलो भाई अब सोया जाए , फिलहाल तो अपना घर यही तम्बू है , अपना ड्राइंग रूम ,लिविंग रूम और बेड रूम ।" अजय ने कहा । "बस बाथरूम का ख़याल रखना ,उसके लिए तम्बू के बाहर जाना पड़ेगा । " अशोक ने अजय को छेड़ते हुए कहा । 

अजय बोला " अपने को ज़रूरत ही नहीं है अब सुबह ही जायेंगे ।" अशोक ने कहा " भाई, सुबह तो जाओगे ही लेकिन नींद में ख़याल रखना । नहीं तो बिस्तर फिर से सुखाना पड़ेगा ।" अशोक की इस छेड़खानी पर अजय कुछ कहता इससे पहले ही अशोक मुँह ढांककर सो गया । 

*शरद कोकास*


37- न मैं राजा दुष्यंत था न वह शकुंतला थी


फिर भी हम दोनों के बीच कुछ तो था ।। आइए जंगल मे मिलते हैं एक प्रेमकथा से 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा - पिछले भाग में आपने मानव की कहानी में पढ़ा कि मनुष्य पहले शिकार के लिए पत्थरों का उपयोग करता था लेकिन वह उसके लिए नाकाफ़ी था। फिर उसने चकमक पत्थर से अपने छीलने और काटने के औज़ार बनाये और उनकी सहायता से भाले और तीर की अनी बनाकर भाले और तीर का आविष्कार किया। आपने यह भी पढ़ा कि वह आदिम मनुष्य किस तरह से सामूहिकता में विश्वास रखता था और सामूहिक रूप से शिकार करता था। अब आगे पढ़िए आदिम मनुष्य की कहानी इन युवा पुरातत्ववेत्ताओं की जबानी ।*

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*भाग 37*

*न मैं राजा दुष्यंत न वह शकुंतला*  

आज टीले पर सूरज भी अपने प्रखर तेज के साथ उपस्थित था । हम लोगों की लेटलतीफ़ी पर सुबह उसके चेहरे पर जो व्यंग्यात्मक मुस्कान दिखाई दे रही थी वह अब नहीं थी । फिर भी उसके चेहरे पर हमें यह भाव तो नज़र आ रहा था मानो वह कह रहा हो कि 

" मेरा क्या मैं तो अपने अस्त होने का समय होते ही चला जाऊँगा , तुम्हारी तुम जानो , काम का हर्जा तुम्हारा ही होगा ।" हमने भी सूरज के चैलेन्ज को स्वीकार किया और अपनी अपनी पोजीशन संभाल ली । अब तक सारे पर मज़दूर काम पर आ चुके थे । डॉ आर्य उनसे हालचाल पूछ रहे थे और उन्हें  आवश्यक निर्देश दे रहे थे । 

आज के श्येडूल में कल के उत्खनन कार्य की जो स्थिति थी उसी को आगे बढ़ाना दर्ज था । पास ही बंद पड़ी एक और ट्रेंच चिन्हांकित की गई थी, उस पर भी काम की शुरुआत करनी थी । डॉ आर्य ने वहाँ पहुँचकर उस ज़मीन की जाँच की । यह ट्रेंच एक गढ्ढे में थी और पिछले दिनों हुई बरसात की वज़ह से उसमें पानी भर गया था जो अब सूख चुका था ।

“इस पर अब कार्य प्रारंभ किया जा सकता है ।“ एक लम्बी लकड़ी से ज़मीन की सतह की कठोरता का परीक्षण करते हुए उन्होंने मज़दूरों पर नज़र डाली और पूछा “ अरे, आज हमारी मागो बिटिया नहीं आई ?“ 

एक महिला मज़दूर ने जवाब दिया “ साहब, उसकी बड़ी बहन को बेटा हुआ है । “ “ वाह ! यह तो बहुत अच्छी बात है । “ डॉ आर्य ने कहा …” मतलब अब हमें भी सोंठ के लड्डू खाने को मिलेंगे । “ फिर वे हम लोगों की ओर मुखातिब होकर बोले “ लो भई, आधुनिक मानव की प्रजाति में धरती पर एक मनुष्य और पैदा हो गया ।

रवींद्र ने कहा "धरती पर पैदा होने वाले पहले मनुष्य की परम्परा लगातार बढ़ती ही जा रही है ।" अजय ने तपाक से सवाल किया “ लेकिन सर, धार्मिक कथाओं में बताया जाता है कि इस धरती पर पहला इंसान पृथ्वी पर नहीं बल्कि स्वर्ग में पैदा हुआ था और उसका नाम आदम  था ? “

सर हँसने लगे …”भाई, यह सब धार्मिक कथायें हैं और अलग अलग सभ्यताओं और धर्मों की कथाओं में यही बताया जाता है कि हम सभी मनुष्य एक आदम या एक मनु की संतान हैं लेकिन वास्तविकता यह नहीं है । पुरातत्ववेत्ताओं को जो प्रमाण मिले हैं उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि मनुष्य एक स्थान पर नहीं बल्कि एक साथ कई स्थानों पर पैदा हुआ और उसके माता-पिता का एक ही जोड़ा नहीं था । “ 

राममिलन भैया ने धीरे से चुटकी ली .."ई बहुतै नीक हुआ नाही तो सब खाबिन्द औ जोरू आपस में भाई बहिन हो जाते और ई अजयवा की लुगाई उसकी बहन हो जाती ।" अजय तत्परता से आगे बढ़ा और उसने राममिलन भैया के चरण स्पर्श कर लिए ।

"अच्छा अब मजाक-वजाक छोडो और सब काम में लगो " सर ने आदेश देते हुए कहा " बुधराम और कन्हैया तुम लोग इस ट्रेंच में खुदाई शुरू करो , शरद, रवींद्र और अशोक यहाँ ऑब्जरवेशन के लिए रहेंगे । यशोदा यहाँ से मिटटी उठाकर  छलनी तक ले जायेगी । 

शर्मा जी आपकी और किशोर त्रिवेदी जी की ड्यूटी छन्नी पर है । अशोक और अजय तुम लोग उस बंद पड़ी ट्रेंच पर काम शुरू करवाओ, दो लोग यहाँ से ले लो, पहले पुराने नाप से उसे मिलाओ , डायरी देख लो उसमें दर्ज है , कितना हिस्सा पानी के साथ बह गया है उसे मिलान करके बताओ और एक बार सतह को फिर से चेक करो अगर एक दो इंच नीचे भी गीली मिटटी है तो उसे फिर कल ओपन करेंगे ।"

हमें इस बात की प्रसन्नता थी कि हम लोगों को अलाट की हुई इस ट्रेंच पर हम लोग सर के साथ रहेंगे । वाकणकर सर की उपस्थिति तो मुख्य ट्रेंच पर थी इसके अलावा उनके पास और भी बहुत सारे काम थे इसलिए वे हम लोगों की ट्रेंच पर समय नहीं दे पा रहे थे सो उनकी अनुपस्थिति में हम डॉ. सुरेन्द्र कुमार आर्य सर से ही ज्ञान प्राप्त कर रहे थे । 

वैसे भी आर्य सर हमारा एक पीरियड लेते थे और उम्र में कम होने के कारण उनसे हमारी बहुत पटती थी । बुधराम ने निखात के भीतर उतरकर निखात की मिट्टी को माथे से लगाया और धीरे धीरे कुदाल चलानी प्रारम्भ कर दी । हम लोगों की निग़ाह कुदाल की नोक पर जमी हुई थी क्या पता कुदाल के किस प्रहार पर हमें कोई नई चीज़ मिल जाए ।


रवींद्र के दिमाग़ में अभी भी धरती पर पैदा होने वाले पहले मानव के बारे में प्रश्न कौंध रहा था  “सर, प्रागैतिहासिक मनुष्य के सबसे पहले अवशेष तो दक्षिण अफ्रिका में मिले हैं तो क्या इस आधार पर उसे पहले मनुष्य का जन्मस्थान नहीं माना जा सकता ?“ 

आर्य सर ने कहा “ हाँ ,अब तक तो ऐसा ही माना जाता है । पिथेकेंथ्रोपस और साइननथ्रोपस के अवशेष तो एशिया में भी मिले हैं लेकिन हाइडलबर्ग मानव का जबड़ा यूरोप में जर्मनी में मिला है । हालाँकि इतने प्रमाण पर्याप्त नहीं हैं इसलिए हम मानव के जन्मस्थान का अध्ययन उसके द्वारा निर्मित औज़ारों से करते हैं जो पूरी दुनिया में पाए जाते हैं ।“ 

“सर , लेकिन हम पिथेकेंथ्रोपस को पूर्ण मानव कहाँ मानते हैं ?“ रवींद्र ने आशंका प्रकट की । “हाँ ।“ सर ने कहा । “मानव की यह एक लम्बी यात्रा है । यही मानव आगे चलकर नियंडरथल मानव कहलाया, और अभी चालीस हज़ार साल पहले क्रोमैगनन या आधुनिक मानव कहलाया । हमारी आकृति इसी आधुनिक मानव से मिलती है ।

“मतलब कुल मिलाकर बड़ा कन्फ्यूज़िंग है ।“ अशोक अपनी ट्रेंच के लिए अभी रवाना नहीं हुआ था और हम लोगों की बात में शामिल हो गया था  “ लेकिन इतना तो हम जानते हैं कि ज्ञात मनुष्य जाति की आयु कुल मिलाकर दस लाख साल तो होगी ही । 

हम लोगों ने पढ़ा है, 

तीन करोड़ सत्तर लाख साल पहले प्लीओपिथेकस हुआ, 

फिर दो करोड़ साठ लाख साल पहले रेमापिथेकस हुआ, 

फिर तीस लाख साल पहले आस्ट्रेलोपिथेकस हुआ , 

फिर दस लाख साल पहले होमोइरेक्टस हुआ, 

फिर ढाई लाख साल पहले प्रारंभिक होमोसेपियन्स, सोलो नदी का मानव यानि पिथेकेंथ्रोपस हुआ , 

फिर डेढ़ लाख साल पहले नियेंडरथल  मानव हुआ और 

अभी चालीस हज़ार साल पहले आधुनिक होमोसेपियन्स क्रोमैंगनन या आधुनिक मानव यानि हम लोग पैदा हुए । “ 

हमने देखा राममिलन भैया एक हाथ से उंगलियों की पोरों पर कुछ गिन रहे हैं और दूसरे हाथ से सर खुजा रहे हैं । यह देखकर अशोक  बहुत ज़ोर से हँसा और बोला “ अरे पंडित जी, दिमाग़ पर ज़्यादा ज़ोर मत लगाओ , बस हमारी तरह रट लो, परीक्षा में पूछा जाए तो लिख देना, इससे ज़्यादा इसकी ज़रूरत नहीं है ।" 

"काहे भैया ..इसका भी कोई फार्मूला वार्मुला बनाये हो कि नहीं ? राममिलन भैया को मांडू वाली वंशावली की याद आ गई । "बिलकुल बनाये हैं रटने के लिए .." अशोक ने कहा .."प्ली रे आ .. हो हो पी ..नि  हो क्रो  ।" हमने देखा अबकी बार सर अपना सर खुजा रहे थे ।

 शाम को काम समाप्त होने के पश्चात तम्बुओं की और लौटते हुए रवींद्र ने मुझे छेड़ना शुरू कर दिया …”क्या बात है ? आज तेरा मन नहीं लग रहा था ट्रेंच पर ?“ मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से उसकी ओर देखा तो वह हँस पड़ा । “ओफ़्फोह …आज तेरी हाँटा वाली नहीं आई काम पर इसलिए क्या ? अब क्या करोगे मौसी जो बन गई है । लगी होगी जच्चा बच्चा की सेवा में । खैर तू फिक्र मत कर, आ जाएगी एक दो दिन में, और तेरे लिए सोंठ के लड्डू भी लाएगी । लेकिन तू कुछ भी कह यार, छोरी है बहुत समझदार और तुझे चाहती भी बहुत है ।“

रवींद्र लगातार बोले ही जा रहा था मुझे उसकी बात अच्छी तो लग रही थी लेकिन तनिक गुस्सा भी आ रहा था " तुझे कैसे पता कि मुझे चाहती है ?" मैंने रवीन्द्र से सवाल किया । "भाई, वह तो उसके बात करने के ढंग से ही समझ में आ जाता है, तुझे इतनी प्यार भरी नज़रों से देखती है, और जब तुझसे बात करती है तो लजाती रहती है ।"

रवींद्र बात तो बहुत सौम्य स्वर में कह रहा था लेकिन मेरा ही मूड उखड़ा हुआ था । “तो ?“ मैंने किंचित रोष के साथ कहा “उससे क्या होता है ? प्यार भरी नज़रो से देखती है तो इसका यह मतलब थोड़े ही हुआ कि मुझे चाहती है और चाहती भी है तो क्या करूँ ...ब्याह कर ले जाउँ क्या ? अपना खुद का अभी कोई ठिकाना नहीं ..बस आठ दस रोज़ में हम लोग चले जायेंगे फिर सब किस्सा खतम ।“ 

रवींद्र मेरा इतना अन्तरंग है कि वह मेरे एक एक मूड को समझता है लेकिन इस समय वह भी मज़ा लेने के मूड में था …” ब्याह कर ले जाने की क्या ज़रूरत है, जिस तरह राजा दुष्यंत शकुंतला को अँगूठी देकर चले गए थे तू भी उसे कोई पंचमार्क सिक्का विक्का देकर चले जाना । फिर जब तू कहीं पुरातत्व विभाग में डायरेक्टर बन जायेगा वह तुझसे मिलने आयेगी और तू उसे पहचान नहीं पायेगा तब वह सिक्का काम आएगा ...“ 

“चुप रह यार । फालतू की बात मत कर “ मैंने गुस्सा होते हुए कहा …”न मैं राजा दुष्यंत हूँ, न वह वन कन्या शकुंतला, और न ही मेरे पास कोई अँगूठी है ।" 

"अरे तो इतना नाराज़ क्यों हो रहा है भाई ?" रवींद्र ने कहा । "इस दुनिया में क्या नहीं हो सकता । तू उसे कितने प्रेम से ज्ञान विज्ञान की बातें समझाता है और वह समझती भी है । जीवन में ऐसे ही साथी की तो आवश्यकता होती है जो आपको ठीक से समझ सके वर्ना सिर्फ डिग्रियाँ हासिल करने या रूपवान होने से क्या होता है ।" 

रवींद्र की बड़े-बुजुर्गों टाइप की बात से मेरे तने हुए चेहरे की लकीरें कुछ ढीली हुईं । 

मैंने कहा "भाई, जीवन में सब कुछ तो अनिश्चित है ,प्यार-व्यार , शादी-वादी यह सब तो हम अभी सोच भी नहीं सकते, अभी तो हमारे सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे कैरियर का है । ऐसा सिर्फ फिल्मों में होता है वास्तविक जीवन में नहीं ।" 

फिर एक क्षण ठहरकर मैंने कहा .." वैसे यहाँ से अंतिम रूप से जाने से पहले एक बार उसके घर ज़रूर चलेंगे, घर आने का निमंत्रण दे चुकी है । “ 

“ वा बेटा, मतलब बात यहाँ तक पहुँच गई है, हम यूँ ही अंधेरे में तीर नहीं मार रहे थे ।“ रवींद्र ने तालियाँ बजाते हुए कहा ।

“ नहीं यार, ऐसी कोई बात नहीं है ।“ मैंने कहा । “सभी मज़दूर हम लोगों से प्रसन्न हैं और हम लोगों को बहुत चाहते हैं । जाने से पहले एक बार उन लोगों के घर जाना वैसे भी ज़रूरी है उनका दिल रखने के लिए । 

“ ठीक है ।“ रवींद्र वापस अपनी मस्ती में आ चुका था  “तुझे जिसका दिल रखना हो रख लेना, बाकी का हम रख लेंगे, लेकिन वे सारे लोग चम्बल के उस पार रहते हैं, उनके घर तक जाने के लिए कमर कमर पानी में चलकर जाना होगा ।“ 

“ तो क्या हुआ ? “ मैंने कहा “ चले जाएँगे, कमर कमर भर पानी पार कर जाना कौनसी बड़ी बात है । वे लोग भी तो रोज़ आना-जाना करते हैं ।“ “बिलकुल ।“ 

रवींद्र ने कहा “महिवाल के लिए सोहनी तो उफनती नदी  पार करके गई थी । अब हमारे महिवाल की बारी है ।“ 

“ चुप रह यार । “ मैंने कहा “ यह सोहनी महिवाल, हीर रांझा, लैला मजनू के यह सब किस्से झूठे हैं, गढ़े हुए । ऐसा कभी हुआ ही नहीं । जबरदस्ती लोगों ने कहानी को इतिहास बना दिया है और इन कहानियों ने जाने कितने लोगों को बिगाड़ दिया ।

रात भोजनोपरांत मैं रवीन्द्र और अजय बरगदों की ओर टहलने निकल गए । दूज का चाँद अपनी मुँह दिखाई कर वापस जा चुका था और बरगद के चिकने पत्तों पर फिर पहले की तरह अँधेरा पसर गया था । 

अँधेरा होने के बावजूद पिछले सत्रह दिनों में हमारे पाँव रास्तों के इतने अभ्यस्त हो गए थे कि हम आँखें बंद करके भी पगडंडियों को पहचान सकते थे । टहलकर कैम्प की ओर लौटते हुए देखा कि चम्बल के घाट की ओर से अशोक के साथ किशोर भैया और राममिलन भैया आ रहे हैं । उन्हें साथ देखकर हमें अच्छा लगा । 

मैंने रवीन्द्र से कहा "दोनों लड़ते भी हैं लेकिन साथ भी रहते हैं । यह अच्छी बात है । रवीन्द्र ने उनके करीब आते ही घोषणा की "भाइयों हम लोगों को मजदूरों ने अपने गाँव आने का निमंत्रण दिया है । बोलो कब चलना है ?" " 

अरे वा ! किशोर भैया ने खुश होते हुए कहा .."बोलो कब चलना है ?" राममिलन भैया अपने मूड में आ गए और किशोर की बात का विरोध करने लगे .."काहे जायेंगे मजदूरों-फजदूरों के गाँव, ऊ तो नदिया के उस पार है ।" हमें लगा कि अभी थोड़ी देर पहले उन्हें प्यार से बातें करते हुए हमने जो देखा था वह हमारा स्वप्न था । 

अशोक  ने उन्हें समझाया " अरे अभी कौन जा रहा है भाई , यहाँ से जाने के समय जायेंगे और चलना ज़रूर ,गाँव में बहुतै  मजा आता है ।"   

चम्बल के उस पार वाले मजदूरों के गाँव की बातें करते हुए हम लोग तंबू में आ गए । किशोर भैया आते ही बिस्तर पर पसर गए और कहने लगे "कुछ भी कहो यार, ज़िन्दगी का असली मज़ा तो  बिस्तर पर ही आता है ।“ 

अशोक हँसने लगा । “इसीलिए इतवार के दिन यह किशोर सुबह ग्यारह बजे तक सोता है । एक दिन तो ग्यारह बजे जागा और खा पीकर फिर सो गया और सोमवार सुबह तक सोता रहा । 

इसकी मजबूरी है कि सुबह डिपार्टमेंट आना पड़ता है वरना रोज ग्यारह बजे तक सोता ।“ किशोर भैया हँसने लगे  … “कोई मजबूरी फजबूरी नहीं है ...अपना क्या है ..जिस दिन सोने का मन हो गया डिपार्टमेंट नहीं गए ।“ 

“ शुक्र मनाओ ।“ मैंने कहा । “हमारे पूर्वजों ने आरामदेह घर और बिस्तर का अविष्कार नहीं किया होता तो हमें अभी तक गुफाओं में चट्टान के बिस्तर पर सोना पड़ता ।" 

“ हाँ यार, यह बात तैने सही कही ।“ किशोर भैया बोले  …”और बिना सुट्टा मारे सोना भी कितना कठिन होता ..लेकिन उस ज़माने में घर बनाना भी कितना कठिन काम होता होगा ना ।“ 

अजय जो अभी अभी अपने पिता का घर बनाना देख चुका था, कहने लगा “भैया कठिन काम तो यह आज भी है । एक कहावत है ना ‘शादी करके देखो और घर बनाके देखो ।" उसकी बात पर रवींद्र ज़ोर से हँसा …”अबे, शादी और घर का क्या सम्बन्ध ? शादी तो तूने कर ली बाप की कमाई से, अब अपनी कमाई से घर बनाना तब कहना ।“ 

अजय ने अपने माथे पर हाथ मारा और कहा “यार तुम लोग कहावत भी नहीं समझते हो, जबरदस्ती मेरे पीछे पड़ जाते हो ।“ मैंने दोनों  को शांत करते हुए कहा "अरे, लड़ो मत भाई, उस इंसान की तारीफ करो जिसने घर का यह कॉन्सेप्ट हमारे सामने रखा । अगर इंसान का घर न होता तो उसका परिवार भी नहीं होता और फिर हम लोग इतने अच्छे घरों के अच्छे परिवारों में कैसे रहते ।"

*शरद कोकास*



36-जलप्रपात तो आपने सुना होगा लेकिन घोड़ा प्रपात नहीं सुना होगा


📓 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📓

✍🏼 *शरद कोकास* ✍

पूर्वकथा- पिछले भाग में आपने पढ़ा कि मनुष्य इस पृथ्वी पर आने के पश्चात किस तरह पेड़ों पर रहता था ,उसे पेड़ों से उतरकर ज़मीन पर आने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई जमीन पर आने के बाद वह किस तरह अपने भोजन का प्रबंध करता है ,वह क्या क्या खाता है , किस तरह शिकार करता है । जावा मानव किसे कहते हैं । और यह भी कि किस तरह की मछलियाँ होती थीं जो पेड़ों पर भी रहती थी । आपने यह भी पढ़ा कि वह आदिम मानव किस तरह हाथों से जड़ें खोदता था और जब उसे एक डंडा मिल गया तो उसके जीवन में क्या क्रांति हुई ।अब इससे आगे*

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*भाग छत्तीस*
💄 *जलप्रपात नहीं भाई घोड़ा प्रपात* 💄


नाश्ते के उपरान्त शिविर से टीले की ओर जाते हुए हम लोगों हमेशा उत्साह से भरे हुए होते हैं । रास्ते में आनेवाले पेड़ों की छाँव से गुजरते हुए अक्सर नज़र ऊपर की ओर चली जाती है । सुबह नौ बजे के लगभग सारे पेड़ सुनसान होते हैं मानो सारे पंछी भी हमारी तरह अपने काम पर निकल गए हों । अचानक एक पेड़ के नीचे से गुजरते हुए एक कौवे की काँव काँव सुनाई दी । अजय ने कहा 'लगता है इस बदमाश कौवे ने आज गोल मार दिया । " उसने इतना कहा ही था कि उसकी कमीज़ पर पट से कौवे की बीट आ गिरी । अजय ने आज ही साफ़ सुथरी कमीज़ पहनी थी, उसका दिमाग़ ख़राब हो गया । उसने ज़मीन पर पड़ा एक पत्थर उठाया और कौवे को गाली देते हुए उसकी ओर निशाना साधकर चला दिया । कौवे को पत्थर तो क्या लगना था लेकिन आहट मात्र से वह काँव काँव करता हुआ उड़ गया ।

आर्य सर ने मुस्कुराते हुए कहा “ भाई तुम्हारा निशाना तो अभी भी आदिम मानव के निशाने जैसा नहीं बन पाया है । कुछ लाख साल पहले पैदा हुए होते तो अब तक तुम्हारा पत्थर खाकर कौवा ज़मीन पर आ गिरा होता । " अजय अपनी निशानेबाजी की निंदा सुनने को तैयार नहीं था " सर ,पत्थर से निशाना ठीक कहाँ लगता है , बन्दूक होती तो अच्छा मज़ा चखाता इस बदमाश कौवे को । वैसे बचपन में गुलेल से भी बढ़िया निशाना लगाना मुझे आता था ।" अजय की बात सुनते ही अशोक को छेड़खानी सूझने लगी .." होता है भाई होता है वीर अर्जुन, शादी के बाद निशाना थोड़ा बिगड़ ही जाता है और टारगेट भी बदल जाता है उसके बाद चिड़िया की आँख नहीं दिखाई देती सिर्फ ..। इससे पहले कि अशोक कुछ और कहता रवींद्र ने सर से सवाल किया ।" सर, लेकिन जब प्रारम्भिक मानव पत्थर चलाना सीख गया था और उससे बढ़िया निशाना भी लगा लेता था तो फिर उसे हथियार बनाने की ज़रूरत क्यों आन पड़ी ?" उसके मस्तिष्क में कुछ और ही चल रहा था ।

सर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया " शिकारी अवस्था का यह मनुष्य पत्थरों का उपयोग करना तो बेहतर सीख गया था और यह भी उसे पता था कि पत्थर उठाकर फेंकने से जानवर भाग जाते हैं लेकिन शिकार के लिए इतना नाकाफ़ी था । छोटे मोटे पंछियों का तो पत्थर मारकर शिकार किया जा सकता था लेकिन बड़े जानवरों के लिए तो बड़े हथियार चाहिए थे । अब तक वे लोग सामूहिक रूप से बड़े जानवरों को घेर कर उनका शिकार करना भी ठीक से नहीं सीख पाए थे । दरअसल पत्थरों से औजारों और हथियारों के निर्माण की भी एक कहानी है।"

"तो फिर सुनाइये न सर " रवींद्र ने आग्रह किया और हम लोगों को इशारा करते हुए अपनी चाल धीमी कर दी । सर भी हम लोगों के साथ धीमे धीमे चलने लगे .." पत्थरों को चलाते हुए उसके दिमाग़ में यह ख़याल आया कि इनका कुछ और बेहतर उपयोग भी किया जा सकता है । उसने पत्थर पर पत्थर पटककर उसकी खपच्चियाँ निकालनी शुरु कीं । गुफाओं में पुरातत्ववेत्ताओं को चकमक पत्थर से बने भद्दे टाइप के कुछ चाकू मिले हैं जिन्हें देखकर ज्ञात होता है कि प्रागैतिहासिक मनुष्य इन चाकुओं का उपयोग पशुओं को चीरने, उनकी हड्डियों से मांस अलग करने तथा हड्डी के भीतर का गूदा निकालने के लिए करता था । प्राचीन निक्षेपों में या तलछटों में पुरातत्ववेत्ताओं को मानव आवास के प्रमाण मिलते हैं इनमें कोयला, राख, चिटकी हुई हड्डियाँ तथा हड्डी और चकमक से बने औज़ार शामिल हैं ।"

"हाँ सर " अजय को अचानक कुछ याद आया "हमने इन्हें संग्रहालय में देखा है, काँच के शो केस में यह पत्थर के खपच्चियों जैसे टुकड़े रखे रहते हैं। लेकिन उन्हें देखकर लगता ही नहीं है कि यह आदिम मानव के औज़ार हो सकते हैं ?" "बिलकुल ठीक ।" आर्य सर ने कहा " देखने में यह औज़ार पत्थर की खपच्चियों जैसे ही लगते हैं किन्तु इन्हें ध्यान से देखने पर पता चलता है कि इनका एक हिस्सा चाकू जैसा धारदार है, वहीं किसी अन्य का तेज़ नोकदार । गुफाओं में वह निहाई भी मिली है जिस पर रखकर औज़ार बनाये जाते थे और वह पत्थर का हथौड़ा भी जिससे पत्थरों पर चोट की जाती थी । पुरानी परतों की अपेक्षा नई परतों में अपेक्षाकृत उन्नत औज़ार मिलते हैं । एक पुरातत्ववेत्ता इसका यह अर्थ निकालता है कि मानव की एक से अधिक पीढियां यहाँ रह चुकी हैं । जैसे पुराने बाशिंदे छीलने, खुरचने, काटने, या छेद करने के लिए एक ही प्रकार के औज़ार का इस्तेमाल करते थे जबकि नए बाशिंदे हर काम के लिए अलग - अलग औज़ार काम में लाते थे ।"

“ हाँ सर .. “ मैंने कहा जैसे बढ़ई के पास पहले छीलने के लिए सिर्फ बसूला होता था अब तो चौरसी, रुखानी,रंधा और अन्य औज़ार हैं ।“ “बिलकुल ठीक ।“ आर्य सर ने कहा ..” यह मनुष्य के बस की ही बात है कि वह अपने अंगों से अलग नए औजारों का आविष्कार करता है ।" "अपने अंगों से अलग माने ?" रवींद्र का सवाल था ।"भाई, अपने अंगों के औज़ार तो दांत और नाखून होते हैं ना जैसे कि पशुओं के पास होते हैं लेकिन मानव ने अपनी बुद्धि से इनके अलावा भी बाहरी औज़ार बनाये । इस तरह वह पशुओं से अलग हो गया । जैसे जैसे मौसम ठंडा होता गया उसे शरीर को बचाने के लिए बेहतर खाल की आवश्यकता महसूस हुई । फिर सर्दियों में वह बाहर शिकार नहीं कर सकता था इसलिए भोजन के भण्डार की आवश्यकता भी महसूस हुई इसके अलावा रहने के लिए भी उसे गर्म जगह तलाशनी होती थी । इस तरह अब उसके पास काम भी बढ़ गया था और परेशानियाँ भी । “

“ लेकिन सर वह ठण्ड से बचने के लिए खाल पहनता था इसके प्रमाण तो नहीं मिल पाए हैं ? “ अजय का सवाल वाजिब था । “ सही है ।" सर ने कहा “ यह समय बहुत बेरहम है, इसने केवल वही चीज़ें सुरक्षित रखीं जो पत्थर या हड्डी की बनी थीं, लकड़ी या जानवरों की ख़ाल से बनी वस्तुओं का क्षरण होता गया और वे समय के साथ नष्ट हो गईं, इसीलिए हमें चकमक पत्थर की बनी अनी तो प्राप्त होती है किन्तु उसका लकड़ी का बना वह दस्ता नहीं मिलता जिसमे उसे फिट किया जाता था ।"

"लेकिन सर" अजय ने अपना हाथ खड़ा किया " पत्थर मारकर वह जानवर तो भगा सकता था लेकिन इस छोटे छोटे पत्थरों से वह शिकार कैसे करता होगा ? क्या बहुत से लोग एक साथ बड़े जानवर पर पत्थर चलाते थे ? " सर मुस्कुराये " हाँ हो सकता है प्रारम्भिक दिनों में शिकार करने की यही विधि रही हो । फिर उसने सोचा काश कोई ऐसी वस्तु होती जो एक बार में ही शिकार का काम तमाम कर सके इसलिए उसने पत्थर को छीलकर छोटे चकमक पत्थर से धारदार अनी बनाई और उसे सूखी लकड़ी या टहनी पर लता, बेल या जूट के सहारे बांधकर भाले नुमा एक वस्तु बनाई । इसका उपयोग वह बड़े जानवरों के शिकार के लिए करने लगा । प्रारंभिक हथियारों और औजारों के आविष्कार की कहानी भी यही है ।“

“ लेकिन भाले से भी मैंमथ, बाइसन, गैन्डे या हिरन जैसे जानवर का शिकार करना तो मुश्किल होता होगा ना ? “ रवींद्र के दिमाग़ में उस आदिम मनुष्य द्वारा भाले से शिकार करने का दृश्य कौंध रहा था । “ आज का इंसान तो बगैर बंदूक के शिकार कर ही नहीं सकता । “ “ बंदूक ? “ आर्य सर ने कहा । “ अब तो शिकार पर ही प्रतिबंध है भाई । वैसे भी इंसान ने इतने जानवर मारे हैं कि कई प्रजातियाँ तो शिकार के कारण ही दुर्लभ हो गई हैं । लेकिन कृषि अवस्था से लाखों साल पहले के इस आदिम मनुष्य के ज़िन्दा रहने के लिए शिकार ज़रूरी था । कंदमूल फल आदि से उसका पेट कहाँ भर पाता था इसलिए जानवरों को मार कर खाना उसकी मज़बूरी थी । फिर छोटे छोटे शिकार से भी उसका काम नहीं चलता था वह तो एक दिन में ही समाप्त हो जाता था । हाँ एक मैमथ या हाथी जैसा बड़ा शिकार उसके लिए कई दिनों का भोजन होता था ।"

"लेकिन सर.." अजय ने फिर हाथ खड़ा किया " सही है कि आज का आदमी बिना बंदूक के शिकार नहीं कर सकता लेकिन वह बेचारा आदिम मानव सिर्फ भाले से और अकेले इतना बड़ा शिकार कैसे करता होगा ?" आर्य सर हम लोगों के मन में उभरते प्रश्नों को समझ रहे थे .."बिलकुल.. अकेले ही बड़े प्राणियों का शिकार करना उसके लिए असंभव था इसलिए वह समूह में शिकार करता था । इसकी भी एक ट्रिक थी । हाथी या मैमथ जैसे विशालकाय और शक्तिशाली जानवर को दलदल के निकट वे सब लोग मिलकर तीन ओर से घेर लेते थे , तत्पश्चात सूखी घास में आग लगा देते थे । मैमथ डर कर भागता था, जब आग से उसकी खाल झुलसने लगती तो वह उस दिशा में भागता जिधर कोई मनुष्य नहीं होता था लेकिन उस ओर दलदल होता था । अंततः वह दलदल में फँस जाता तब उस पर बल्लम और भालों से वार किया जाता । फिर उसे खींचकर किनारे पर लाया जाता और छोटे औजारों से उसकी खाल निकाल ली जाती और माँस के छोटे-छोटे टुकड़े किए जाते । “

“वाह, गज़ब की ट्रिक थी ..तब तो कई दिनों की दावत का इंतज़ाम हो जाता होगा ।“ अजय ने कहा । “हाँ ।“ सर ने कहा “लेकिन इतने विशालकाय प्राणी को डेरे तक ले जाना मुश्किल काम था । अब कोई क्रेन जैसी चीज़ तो थी नहीं उसके पास इसलिए मानव शिकार स्थल पर ही उसके कई टुकड़े कर देता था, ऐसे टुकड़ों- टुकड़ों में उसे अपने आवास तक ले जाना उसके लिए आसान होता था । उसी तरह तेजी से भागने वाले हिरण जैसे छोटे-मोटे प्राणियों का शिकार भी वह उन्हें समूह के साथ घेरकर ही करता था ।“ “ और वह घोड़े का शिकार भी अद्भुत तरीके से करता था ना सर ?" मैंने सर से सवाल किया । "मैंने कहीं पढ़ा है फ्रांस में किसी जगह एक खड़ी चट्टान के पास लगभग एक लाख घोड़ों के अवशेष मिले हैं ।"

“ अरे वह तो अद्भुत शिकार कथा है । “ सर ने कहा । “ उन दिनों जंगलों में घोड़े बड़े बड़े झुंड में रहा करते थे । घोड़ों का शिकार करने का इच्छुक यह मानव समूह अपने नेजों से लैस होकर चुपचाप उन तक पहुँचता था और उन्हें तीन ओर से घेर लेता था । यहाँ भी वही ट्रिक थी लेकिन चौथी ओर दलदल नहीं था । जब घोड़े तीन ओर से घिर जाते तो उन्हें सिर्फ एक ही रास्ता दिखाई देता जिस ओर मनुष्य नहीं होते थे । यह रास्ता एक ऊँची चट्टान की ओर जाता था जिसके बाद एक बड़ी सी खाई थी , घोड़े डर कर भागते और सीधे उस चट्टान पर जा पहुँचते । अब घोड़ों में इतनी सेन्स तो डेवलप हो गई ही थी कि खाई में नहीं कूदना है । पहला घोड़ा खाई देखकर रुकता लेकिन पीछे वाला उसे धक्का मारता और फिर एक के पीछे एक आने वाले तमाम घोड़े उस ऊँची चट्टान से नीचे गिरते जाते और मरते जाते ठीक उसी तरह जैसे की ऊँचाई से पानी की धार नीचे गिरती है । “

“वाह , घोड़ों का एक के बाद एक पहाड़ से खाई में गिरते जाने का क्या अद्भुत दृश्य होता होगा ना ?“ राममिलन भैया ने कहा । “ ऊ जगह का नाम तो घोड़ाप्रपात रखना चाहिए । “ हम लोग ठहाका मार कर हँस पड़े । सर ने मुस्कुराते हुए कहा “ भाई अपने देश में यह जगह होती तो हम ज़रूर उसका यह नाम रख देते लेकिन वह तो फ्रांस में है । बहरहाल औज़ारों के निर्माण की कहानी यही है कि इस तरह शिकार के लिए यह औज़ार ही उसके काम आए । इन प्रागैतिहासिक औज़ारों में दो प्रकार के औज़ार सबसे ज़्यादा मिलते हैं, चकमक पत्थर का एक तिकोना औज़ार जिसमें दो तरफ़ से धार होती है और एक अर्धचन्द्राकार औज़ार जिसमें आधे गोले के आकार में धार होती है । मतलब यह समझ लो जैसे आज के हमारे दो तरफ धार वाले चाकू और एक तरफ धार वाला हंसिया ।“

“ फिर उसने धनुष बाण का अविष्कार कब किया और उसे इसकी ज़रूरत कैसे महसूस हुई ? “ अजय आज प्रागैतिहासिक मानव की पूरी हथियार शाला के बारे में जान लेने के लिए उत्सुक दिखाई दे रहा था । आर्य सर फिर मुस्कुराने लगे …”तुमने अगर बचपन के खेल में बांस की किमची से धनुष बाण बनाया होगा और उसे चलाया होगा तो इस बात को शीघ्र समझ जाओगे । हुआ यह कि इस मानव ने भाले का अविष्कार तो कर लिया और रीछ या अन्य जानवरों का शिकार भी वह इनसे कर लेता था, जैसे रीछ सामने आता और जैसे ही हमला करने के लिए अपने पिछले दो पाँवो पर खड़ा होता मनुष्य उस के सीने पर भाले से वार करता अगर निशाना लग गया तो ठीक वरना उसका मारा जाना निश्चित हो जाता यानि भालू ही उसका काम तमाम कर देता ।"

"हा हा हा ..मतलब शिकार करने को आये थे और खुद शिकार हो के चले । "अजय की बात पर सर के ज़ोरदार ठहाके में हम लोगों के ठहाके भी शामिल हो गये । "हालाँकि ऐसा कम होता था ।" सर ने हँसी रुकने के बाद कहा " अनेक अनुभवों के बाद मनुष्य की समझ में यह बात आ गई कि छोटे मोटे अहिंसक प्राणियों के शिकार के लिए निकलते हुए भी भालू जैसे बड़े हिंसक प्राणी मिल सकते हैं इसलिए उन दिनों मनुष्य अकेले शिकार पर निकलने की बजाय अक्सर समूह में शिकार के लिए निकलता था और भालू के सामने आने पर एक व्यक्ति के असफल होने पर दूसरा उसे तुरंत भाले से मार देता था । “ " ऐसा है अजयवा ..मान लो अगर गब्बरसिंह से बच भी गया तो समझ लो साम्भा उसे मार देता था ।" किशोर भैया आज बहुत मस्त मूड में थे । "लो गब्बरसिंह से भी बचा है कोई ? कालिया ने तो उसका नमक खाया था फिर भी उसे बचने का कोई चांस नहीं मिला ।" अजय ने रियल स्टोरी बताई ।

हम लोग तम्बू से ट्रेंच तक का रास्ता तय कर चुके थे और निखात के पास ही खड़े थे । ऐसा लग रहा था आगे की स्टोरी का पाठ अब शाम को ही संभव होगा लेकिन मजदूर अभी पहुँचे नहीं थे और काम शुरू करने में कुछ विलम्ब था । “तो मतलब रीछ को मारने के लिए उसने धनुष बाण का अविष्कार नहीं किया ?“ अजय ने हथियारों की निर्माण कथा की बिछड़ी कड़ी को फिरसे जोड़ते हुए कहा । “ बता रहा हूँ भाई । इसके लिए भी आवश्यकता और आविष्कार का सिद्धांत लागू होता है ।“ सर ने कहा । “ कालांतर में रीछ जैसे भारी भरकम व सुस्त प्राणि संख्या में कम होते गए तथा तेज़ दौड़ने वाले घोड़े, हिरन जैसे प्राणियों में वृद्धि होती गई । इन द्रुतगामी प्राणियों हेतु भाले जैसा अस्त्र पर्याप्त नहीं था क्योंकि जब तक मनुष्य फेंकने के लिए भाला उठाता वे प्राणि भाग जाते और उसकी पहुँच से बाहर हो जाते अत: उसे एक ऐसे अस्त्र की आवश्यकता महसूस हुई जो इन प्राणियों का पीछा कर सके और इन्हें मार गिराए । “

“ और इसके लिए उसने बाँस पर रस्सी बांधकर धनुष्य बनाया । “ अजय ने कहानी पर द ऐन्ड लगा दिया । “ नहीं इतना भी आसान नहीं था यह । “ आर्य सर ने कहा । वह हज़ारों साल तक दिमाग़ लगाता रहा । उसे एक ऐसी वस्तु चाहिए थी जो हाथ की अपेक्षा अधिक गति से और अधिक दूर तक उसके भाले को फेंक सके । लचीली टहनी के मुड़ने और मुड़कर सीधे हो जाने की ताकत से वह वाकिफ़ था । इस ताकत का उपयोग उसने धनुष बनाने के लिए किया । एक पतली डाल के दोनों सिरों पर उसने रस्सी जैसी लता या बेल बांधी और उसे धनुष का आकार दिया और एक छोटी टहनी को उसमे फंसाकर उसे कुछ दूर तक फेंका । लेकिन भाले जैसी वज़नी वस्तु को फेकने के लिए वह नाकाफ़ी थी । सो उसे छोटे आकार के भाले बनाने का विचार आया , छोटे साइज़ का भाला बनाने के लिए उसे छोटी लकड़ी और छोटी अनी चाहिए थे इसलिए उसने चकमक पत्थर के औज़ार से छीलकर बारहसिंगे के सींग या मैमथ के दाँत से एक नोकदार वस्तु बनाई और उसे एक छोटी टहनी पर बांधकर तीर बनाया । “

“ हम लोग भी बचपन में ऐसे तीर कमान बनाते थे …” अजय को अचानक अपना बचपन याद आ गया । “ और बाँस की किमची को चाकू से छीलकर तीर की नोक बनाते थे या एक टीन के टुकड़े को मोड़ कर उसकी नोक बनाते थे फिर वह किसीको चुभे नहीं इसलिए उस पर डामर लगा देते थे । और यह सब हम दस मिनट में कर लेते थे । “ “ ठीक है भाई , “ सर ने कहा “ तुम दस मिनट में इसलिए कर लेते थे कि हमारे पूर्वजों ने यह तकनीक ईज़ाद की थी लेकिन इसके लिए उन्हें कई हज़ार साल लगे । “

"सर एक सवाल रह गया ।"अशोक को काफी देर बाद बोलने का अवसर मिला था ।"आप इन्हें कभी औज़ार कहते हैं कभी हथियार कहते हैं तो इन दोनों में क्या फ़र्क है ? "मैं सोच ही रहा था कि किसी के मन में यह सवाल क्यों नहीं आया ।"सर ने प्रशंसात्मक भाव से अशोक की ओर देखा । "वास्तव में आदिम मनुष्य के लिए यह एक जैसे ही थे, वह चकमक पत्थर का ही हथौड़ा बनाता था, यह उसका औज़ार हुआ । फिर उसे दूसरे पत्थर पर पटककर खपच्चियाँ निकालता था जिनसे वह छीलने काटने आदि का काम लेता था लेकिन फिर उन्ही खपच्चियों में से किसी धारदार खपच्ची का वह तीर की अनी की जगह उपयोग करता था तो वह उसका हथियार हुआ । इस तरह सब कुछ मिला जुला था , बाद में भाला या नेजा और तीर अपने आप में एक सम्पूर्ण हथियार बन गया ।"

“फिर आदिम मानव द्वारा बनाया गया वह तीर हज़ारों साल तक धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ता रहा और युगों युगों को पार करता रहा और बन्दूक की गोली में परिवर्तित होते हुए अंत में मिसाइल और परमाणु बम में परिवर्तित हो गया । “ रवींद्र ने अपना एक्सपर्ट कमेंट दिया । “लेकिन इनमें अंतर है भाई ।“ सर ने रवींद्र की इस बात पर हम लोगों के साथ ताली बजाते हुए कहा । “ वह आदिम मनुष्य इन हथियारों का उपयोग शिकार करने के लिए या अपना पेट भरने के लिए करता था और आज का यह मनुष्य इनका उपयोग मनुष्य की हत्या करने के लिए करता है ।"

विमर्श का नया विषय हम लोगों के सामने उपस्थित हो चुका था लेकिन इस बीच मजदूरों का आना भी प्रारम्भ हो चुका था । आज काम में वैसे ही देर हो गई थी इसलिए बतकही के बीच ही इस विमर्श का होना संभव प्रतीत हो रहा था । आर्य सर भी मजदूरों के पास पहुँचकर उनसे बातचीत में मशगूल हो गए थे ।



*शरद कोकास*

35-मेरे पास यह डंडा है मेरे भाई

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼



पूर्वकथा- पिछले भाग में आपने पढ़ा कि 'डायरी भीतर डायरी' अर्थात अजंता,एलोरा,दौलताबाद,घ्रश्नेश्वर,मांडू और धार की यात्रा का विवरण समाप्त हो चुका है । छात्रों को यह यात्रा वृतांत सुनने में बहुत आनंद आया, उम्मीद करता हूँ कि आपको भी आया होगा । दंगवाड़ा स्थित इस पुरातात्विक उत्खनन शिविर में इन छात्रों का आज सत्रहवां दिन है । राममिलन,किशोर,अशोक,रवींद्र,अजय और शरद इन युवा पुरातत्ववेत्ताओं से आपका परिचय तो हो ही चुका है और आपको इनका साथ अच्छा भी लग रहा होगा । इस भाग से हम शुरू करने जा रहे हैं 'मानव की कहानी' हो सकता है यह कहानी आपने पढ़ी हो लेकिन कुछ तकनीकी डिटेल्स के साथ फिरसे यह पढ़ना अच्छा लगेगा और न भी लगे तो इन छात्रों की बातचीत में आपको आनंद तो आएगा ही । आपके हस्तक्षेप की प्रतीक्षा रहेगी ।

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*भाग 35*

*मेरे पास यह डंडा है मेरे भाई* 

मुझे लगता है कल रात भी हैरान हो रही होगी हम लोगों के देर रात तक जागने पर । हमारे तम्बू की झिर्रियों से झाँककर चुपचाप हमारी बातें सुनते हुए शायद उसे भी याद आ रहा होगा रानी रूपमती के महल का वह झरोखा जिसमे चुपके से वह प्रवेश करती थी और सुनती थी बाजबहादुर और रूपमती के प्यार में पगे हुए बोल । 

उसके कानों में भी गूँज रहे  होंगे वे शब्द जो रूपमती के गले से निकली स्वर लहरियों पर सवार होकर मांडू की वादियों में गूंजते थे । उसकी आँखों में बसे होंगे वे प्रणय दृश्य जिन्हें वह अँधेरे की ओट प्रदान करती होगी और कनखियों से निहारती होगी । 

समय पलों के रूप में जन्म लेता है और सदियों तक उसका विस्तार हो जाता है, बीतते हुए वह अतीत की यात्रा भी करता है और भविष्य की आहट उसके कानों में होती है । इसी द्वंद्वात्मकता में उसका जीवन  व्यतीत होता है

हम लोग दंगवाड़ा के इस पुरातात्विक उत्खनन स्थल पर अपने प्रशिक्षण के सोलह दिन पूर्ण कर चुके हैं । प्रशिक्षण कार्य भी अब समाप्ति की ओर है । हमारी डायरी में निखात की जाँच ,आवश्यक सावधानियाँ ,अवशेषों की पहचान ,उनकी साफ सफाई और संरक्षण सम्बन्धी विभिन्न बातें दर्ज हो चुकी हैं । फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ छूट गया है । 

शायद हमें कुछ दिन और अभी यहाँ ठहरना पड़े  या फिर जैसा भी वाकणकर सर का आदेश हो । हमें जो निखात अलाट की गई है वह हर सुबह हमारी राह देखती है । हम उसे सीढ़ी बनाकर रोज़ थोड़ा थोड़ा अतीत की गहराइयों में उतरते जाते हैं । 

हम नियम से प्रतिदिन प्राप्त होने वाले अवशेषों की पहचान, उनकी स्थिति आदि डायरी में दर्ज करते हैं और उन्हें सर को सौंप देते हैं । अतीत की ओर हमारी यह यात्रा निरंतर जारी है लेकिन इसका अंत कहाँ है यह हमें भी नहीं पता । 

एक दिन तो ऐसा आएगा जब वह निखात हमसे कहेगी बस ..अब नहीं.. मेरे गर्भ में अतीत के जितने रहस्य थे वे सब आप लोगों ने जान लिए हैं .. सारे अवशेष तो आप निकाल कर ले जा चुके हैं ,अब मेरे पास बचा ही क्या है ..अब अगर इससे पहले की कहानी आपको जानना है तो आपको कहीं और जाना पड़ेगा  । 

हम जानते हैं कि निखात की इस बात का हम लोगों के पास कोई जवाब नहीं होगा । भले ही हमें बीच में ही यह काम छोड़कर जाना पड़े लेकिन जैसे कि हर चीज़ का अंत होता है इस काम का भी कभी न कभी अंत होगा । अंत को देखने के लिए हम नहीं होंगे तो कोई और होगा । काम भी चलता ही रहेगा ..आखिर किसी के न रहने से दुनिया का कोई काम रुकता थोड़े ही है । संसार की तमाम वस्तुएँ एक दिन अवशेष में तब्दील हो जाती हैं । वस्तुओं की तरह हमें भी एक दिन अवशेष होकर मिटटी में समा जाना है । 

हम बेहतर जानते हैं कि न हम इस धरती के पहले मनुष्य हैं न अंतिम, उसी तरह  न हम इस दुनिया के पहले पुरातत्ववेत्ता हैं न अंतिम .. कल और लोग आयेंगे अपनी अपनी कुदाल लेकर और इस बूढ़ी धरती की छाती से कान लगाकर उसमें अटकी खाँसी की आवाज़ सुनने की कोशिश करेंगे । 

हम युवा पुरातत्ववेत्ता अपने निजी जीवन में वर्तमान से भविष्य की ओर यात्रा करेंगे और अपने प्रोफेशन में वर्तमान से अतीत की ओर । समय की तरह इसी द्वंद्वात्मकता में बीतेगा हमारा भी जीवन । अगर इस प्रोफेशन में आये तो ठीक वर्ना कहीं और कुछ काम करेंगे ..यहाँ नहीं तो कहीं और सही ..जीवन के इस सफ़र में औरों की तरह हम भी तो मुसाफ़िर ही हैं .. अपना डेरा-डंडा उठाकर फ़िर कहीं और चल देंगे ।

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सुबह जब नींद खुली तो अजीब सा अवसाद मन पर छाया हुआ था । ऐसा लग रहा था कि लम्बी यात्रा की थकान के बाद जागा हूँ लेकिन थकान अभी दूर नहीं हुई है । यह अवसाद देर तक जागने की वज़ह से था या मनुष्य के अतीत का वैभव धूमिल  होते जाने की पीड़ा से परिचय होने की वज़ह से.. पता नहीं  । 

हम लोग जब चम्बल के घाट पर पहुँचे सूर्य आसमान में कुछ इस तरह मुस्कुरा रहा था मानो वह हमारे देरी से जागने पर व्यंग्य कर रहा हो । राममिलन भैया नहा धोकर जा चुके थे, अशोक अभी बिस्तर में ही घुसा हुआ था, हालाँकि हम लोग उसे जगाकर आ गए थे । किशोर भैया भी जल्दी जाग गए थे और शायद कहीं आसपास टहलने  निकल गए थे । घाट पर हम तीन ही पहुँचे मैं, रवीन्द्र और अजय । 

नहाते हुए रवीन्द्र ने आश्चर्य व्यक्त किया "अरे आज तो मछलियाँ भी नहीं दिखाई दे रही हैं ।" अजय ने उबासी लेते हुए कहा "वे हमारे समान लेट लतीफ थोड़े ही हैं, नहा धोकर अपने काम पर चली गई होंगी ।" मैंने कहा "हो सकता है सुबह सुबह तट पर आई हों और हम लोगों को न देख कर अपने गलफड़ों में ऑक्सीजन के साथ निराशा भरकर वापस चली गईं हों । "

गोया मछलियाँ न हों हमारी प्रेमिकाएँ हों 

 रवींद्र की मुस्कराहट में एक अर्थ था “तेरी बात अलग है यार, तू तो कवियों की तरह कल्पना करता है, गोया मछलियाँ न हों हमारी प्रेमिकाएँ हों ..लेकिन तेरी बात से याद आया ,मैंने कहीं पढ़ा था कि कई लाख वर्ष पूर्व कुछ मछलियाँ पानी से बाहर निकलकर सचमुच तट पर आ गई थीं और वहीं रहने लगी थीं । 

हम लोगों ने देखा तो है कि कई बार मछलियाँ नदी की मुख्य धारा से अलग किनारों के गड्ढों में भी जीवित रहती हैं । हमारे यहाँ शायद वह प्रजाति न हो लेकिन अभी भी अफ़्रीका, दक्षिण अमेरिका और आस्ट्रेलिया में मछलियों की कुछ प्रजातियाँ ऐसी हैं जो हल्की सी नमी या गीली गाद में भी ज़िन्दा रह सकती हैं । इनके गलफ़ड़ों के अलावा फेफड़े भी होते हैं । कुछ मछलियाँ कीचड़ से छलांग लगाकर पेड़ों पर भी चढ़ सकती हैं । “

“बस यार, बहुत हो गया, सुबह सुबह इतनी गप्प हज़म नहीं होती ।“ अजय ने हँसते हुए कहा । “अरे नहीं भाई, रवींद्र सच कह रहा है ।“ मैंने कहा “पुरातत्ववेत्ताओं को ऐसे जानवरों की हड्डियाँ मिली हैं जो पूरी तरह मछली भले न हो लेकिन बहुत कुछ मछली जैसे थे । स्कूल में विज्ञान की किताबों में हमने पढ़ा ही है कि आगे चलकर मछली से ही उभयचरों का अर्थात जल थल दोनों स्थानों पर रह सकने वाले प्राणियों का विकास हुआ था जो सरिसृपों अर्थात रेंगने वाले जीवों के पूर्वज थे और यह सरिसृप हम जैसे स्तनधारियों और पक्षियों के पूर्वज थे । 

आखिर सजीव प्राणि भी तो वातावरण के अनुसार हमेशा बदलते ही रहे हैं । यह बात तो सब जानते हैं कि बदलते हुए वातावरण के साथ जो प्राणि सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाए वे लुप्त हो गए, जैसे डायनोसर और अन्य कई प्रजातियाँ लुप्त हो गईं ।“

“लेकिन आदमी लुप्त नहीं हुआ ।“ अजय ने अपनी बाँहों की मछलियों पर हाथ फेरते हुए कहा “वाकई ,बड़ा ही दमदार जीव है आदमी ।“ 

“बिलकुल सही कह रहे हो तुम ।“ मैंने कहा “ आदमी जहाँ रहना चाहता है अपने आवास के अनुकूल वातावरण तैयार कर लेता है । वह हर हाल में प्रकृति से मुकाबला करता है । मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो जंगल में भी रह सकता है और दलदल में भी, सूखी ज़मीन पर तो खैर उसे कोई कठिनाई ही नहीं है । जंगलों और पहाड़ों पर तो वह अब भी रहता है लेकिन बहुसंख्य आबादी अब मैदानी इलाकों में रहती है । 

हालाँकि जंगलों से निकल कर मैदानी ज़मीन पर आने में ही इस इंसान को लाखों साल लग गए । क्या क्या नहीं सहा उसने इस बीच । और फिर मौसम भी उसके अनुकूल कहाँ था, जलवायु लगातार बदल रही थी, ठंड बढ़ती जा रही थी, भोजन भी मिलना इतना आसान नहीं था । हम अपने कठिन जीवन के बारे में सोच सोच कर दुखी होते हैं, ज़रा उस इंसान के बारे में सोचो जिसके लिए जीवन वाकई में एक सज़ा थी । फिर भी ज़मीन पर रहना पेड़ों पर रहने  से तो बेहतर था ही ।"

अजय ने सवाल किया “लेकिन इंसान को पेड़ से उतरकर ज़मीन पर आने की ज़रूरत क्यों पड़ी  ?“ 

रवींद्र ने चम्बल में एक डुबकी लगाई और कहा "अरे बापड़े, वो कोई बन्दर थोड़े ही था जो जीवन भर पेड़ पर रहता, आदमी अपने लिए बेहतर आवास की तलाश में रहता है या नहीं .. तेरे पप्पा ने कैसे बरसों किराये के मकान में रहने के बाद खुद का मकान बनाया ।" 

अजय ने हमेशा की तरह अपने दांत दिखा दिए । मैंने रवींद्र की बात  का समर्थन करते हुए कहा “ हाँ, इसका मुख्य कारण तो यही था कि वह बंदरों से अलग था और ज़मीन पर शिकार की खोज करते हुए उसने दो पैरों पर चलना सीख लिया था ।“  

“ तो फिर इस मानव की हड्डियाँ भी मिली होंगी पुरातत्ववेत्ताओं को ?“ अजय ने पानी में तैरते हुए सवाल किया । 

“हाँ ।“ मैंने कहा । “सन अठारह सौ इन्क्यान्बे में एमस्टर्डैम के पुरातत्ववेत्ता प्राध्यापक डॉ दुयुबुआ को इंडोनेशिया के जावा नामक स्थान में सोलो नदी के किनारे रेत में इस मानव के अवशेष मिले और उन्होंने इसे नाम दिया 'पिथेकेंथ्रोपस इरेक्टस' । 

यह जावा नामक स्थान पर मिला था इसीलिए इसे 'जावा मानव' भी कहते हैं । हालाँकि प्रारंभ में डॉ दुयुबुआ का भी बहुत विरोध हुआ लेकिन बाद में अन्य स्थानों पर भी इस तरह के मानव के अवशेष मिले । इस  मानव के खोपड़ी  के उपरी भाग, दाँत और जांघ की हड्डियों के आधार पर उसकी एक छवि का निर्माण किया गया । 

“ मतलब .. यह बताया गया कि हमारा यह पूर्वज दिखता कैसा था..हाँ यार कैसा दिखता होगा ?" अजय अब पानी से बाहर आ चुका था और तौलिया से अपना बदन पोछ रहा था । 

रवींद्र हँसने लगा …” बस तू अभी जैसा दिख रहा है वैसा ही दिखता होगा, नंग धड़ंग ।“ 

अजय ने फुर्ती से टॉवेल अपनी कमर के इर्द-गिर्द लपेटा .." कहाँ ..में तो जांघिया पहने हूँ यार ।" 

अजय की इस हरकत पर मुझे भी हँसी आ गई …”नहीं भाई ।“ मैंने हँसी दबाते हुए कहा “अजय तो दोनों पांवों पर सीधा खड़ा होने वाला सुन्दर दिखाई देने वाला मनुष्य है और आधुनिक मानव प्रजाति का है जो ज़्यादा नहीं बस चालीस हज़ार साल पुरानी है । यह आदिम मानव या जावा मानव हम लोगों से बिलकुल अलग दिखाई देता था । उसका ललाट हमसे बिलकुल अलग था, माथा चपटा था और कुछ नीचे की ओर था और दोनों आँखों के बीच हड्डी का एक पुल था । 

चेहरा अवश्य वानर जैसा था लेकिन मस्तक कुछ बड़ा था । विशेष बात यह कि वह पत्थर के औज़ार भी बनाना जानता था, भले ही उसे आग जलाना नहीं आता था लेकिन जंगल में पेड़ों के टकराने से प्राप्त आग को संरक्षित करना वह जान चुका था । पुरातत्ववेत्ताओं  को चीन की चोउ कोउ तियेन गुफा में इसके प्रमाण भी मिले हैं । “

 “ लेकिन वह खाता क्या था ?“ अजय ने अपने पिचके हुए पेट पर हाथ घुमाते हुए अगला सवाल किया  । मैं समझ गया कि नाश्ते का समय हो गया है और अजय को भूख लग रही है । 

मैंने कहा “ वही खाता था भाई जो उस समय उपलब्ध था जैसे कंदमूल, गिरीफल, मांस ,मछली और क्या.. लेकिन सबसे बड़ी विडम्बना तो यह थी कि वह ख़ुद भी कभी कभी शेर या बाघ जैसे हिंसक प्राणियों का भोजन बन जाता था । " 

"अरे ..यह तो हद है यार " अजय ने चौंकते हुए कहा " इतना बलिष्ठ था उस समय मनुष्य, अपनी आत्मरक्षा का उपाय तो उसे आता ही होगा ? कुछ तो करता ही होगा वह शेर से बचने के लिए ? “ 

"बिलकुल ठीक बोला भाई, तू तो ऐसे कह रहा है जैसे शेर सामने आते ही वह बन्दूक निकाल लेता होगा ।“ रवींद्र ने हँसते हुए कहा “ अच्छा बता शेर तेरे सामने आ जाये तो तू क्या करेगा ?" 

"में डेढ़ पसली का बेचारा आदमी, में क्या करूँगा भाईजान ।" अजय ने अपने दांत दिखाते हुए कहा " जो करना है शेर ही करेगा ।" 

" बरोब्बर बोला भाई " मैंने कहा " हमारे सामने भी शेर आ जाये तो हम कुछ नहीं कर सकते । हाँ लेकिन इस बीच एक क्रांति हो गई । एक दिन अचानक कोई लम्बी सी हड्डी, पेड़ की सूखी लकड़ी का एक टुकड़ा या एक डंडा उसके हाथ लग गया और..." 

" इसका उपयोग उसने शेर को भगाने के लिए किया ।" अजय ने तुरंत लपककर मेरी बात को कैच किया और उसे स्टंप की ओर उछाल दिया । "

 अरे बेवकूफ़.. " मैंने अपने माथे पर हाथ मारा " मामूली से डंडे से भी कहीं शेर भागेगा.. हाँ छोटे -मोटे सियार, कुत्ते, सांप आदि ज़रूर भाग जाते थे । प्रमुख रूप से इस डंडे का उपयोग उसने अपने भोजन हेतु कंद मूल प्राप्त करने अथवा पेड़ों की जड़े खोदने के लिए किया । वह उन लोगों की अपेक्षा अधिक सुविधाजनक स्थिति में था जो हाथ से खोदकर कंद-मूल निकालते थे । “

“ स्वाभाविक है, हाथ से कंद मूल खोदने या जड़ें खोदने के चक्कर में उसके हाथ लहुलुहान हो जाते होंगे ऐसे में यह डंडा उसकी बहुत मदद करता होगा । मतलब उन दिनों जिस आदमी के पास यह डंडा होता था वह सबसे अमीर आदमी होता होगा ।" 

रवींद्र ने बालों को सुखाते हुए कहा । "बिलकुल " मैंने रवींद्र की बात का समर्थन किया " आख़िर सिर्फ हाथ से जड़ें खोदने या कंदमूल खोदने वालों की तुलना में डंडे वाले इंसान की स्थिति तो बेहतर थी ही । " 

अजय ने अपने गीले वस्त्र उठाये और ऊपर की ओर जाने वाली घाट की सीढ़ी चढ़ते हुए कहा  “भाई , तुम्हारी अमीर आदमी वाली बात से मेरे दिमाग़ में एक ख़याल आ रहा है ..अपन ने वह दीवार पिक्चर देखी थी ना जिस में अमिताभ कहता है 

आज मेरे पास बिल्डिंग है, प्रॉपर्टी है, बैंक बैलेंस है, बंगला है, गाड़ी है तुम्हारे पास क्या है ..

इस पर शशिकपूर का डायलाग था ..मेरे पास माँ है । 

मान लो उन दिनों दीवार फिलीम बनती तो उसमें ऐसा डॉयलाग होता.. अमिताभ बच्चन  कहता, मेरे पास जंगल है, ज़मीन है, नदियाँ हैं, पहाड़ हैं, आसमान है, चांद सितारे हैं, क्या है तुम्हारे पास ? 

और इस पर शशि कपूर कहता … मेरे पास कंदमूल खोदने के लिए यह डंडा है मेरे भाई…।” पेट पकड़कर हँसने से भूख और ज़्यादा तेज़ हो गई थी ..मैं समझ गया अब हमें नाश्ते के लिए चल देना चाहिये ।


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आज नाश्ते में भाटी जी ने इडली सांभार बनाया था । “वाह ।“ राममिलन भैया ने कहा “हमरे इलाहाबाद में इसका स्वाद कोई नहीं जानता ।“ मैंने कहा “ऐसा नहीं है , इडली सांभार तो अब पूरी दुनिया में खाया जाने लगा है । “पूरी दुनिया में ?“ रवींद्र ने अविश्वास के साथ आश्चर्य व्यक्त किया । 

“अगर ऐसा है तो यह अच्छी बात है । मैं अक्सर सोचता हूँ कि इसकी खोज सबसे पहले किसने की होगी ?“ हम लोग आजकल इतने जिज्ञासु हो गए हैं कि हर वस्तु को देखकर उसके उद्भव और विकास के बारे में जानने की कोशिश करते हैं । 

“अब क्या पता ?“ मैंने कंधे उचकाते हुए कहा “दक्षिण में चावल अधिक होता है सो चावल के विविध व्यंजन बनाने की शुरुआत भी वहीं हुई होगी । किसने की यह तो मित्र बी मुरलीधर रेड्डी या सुब्बाराव से पूछना पड़ेगा । वैसे भी यह मनुष्य का स्वभाव है कि स्थानीय रूप से उपलब्ध वस्तुओं में वह अपना आहार ढूँढ लेता है । प्रारंभिक आहार तो गेहूँ, जौ और चावल जैसे अनाज ही हैं इन्हीसे फिर उसने विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाये होंगे ।" 

रवींद्र ने भोज्य पदार्थों के अतीत में छलांग लगाई । “आज हमें भोजन के लिए इतनी विविध वस्तुएँ उपलब्ध हैं लेकिन उस आदिम मनुष्य के बारे में सोचिये जिसके पास खाने के लिए बहुत कम वस्तुएँ उपलब्ध थीं और उसका पूरा समय अपने आहार की व्यवस्था में ही बीतता था ।“ 

“बिलकुल ।“ मैंने कहा । "हम आज ‘टाइम नहीं है’ इस जुमले का बार बार प्रयोग करते हैं, लेकिन सच पूछा जाए तो टाइम उस आदिम मनुष्य के पास नहीं था । प्रागैतिहासिक मानव सुबह से रात तक जंगलों में घूमा करता था और अपने व बच्चों के लिए भोजन जुटाता था । बहुत मुश्किलों और अनेक जानलेवा प्रयोगों के बाद उसने खाद्य व अखाद्य वस्तुओं में भेद करना सीखा । पता नहीं भोजन की तलाश में कितने मनुष्यों को अपनी जान गंवानी पड़ी होगी ।"

“लेकिन वह सब कुछ कच्चा कैसे खाता होगा भाई ?“ अजय ने चम्मच से गरम गरम सांभर मुँह में डालते हुए सवाल किया । “भई बताया तो था, उसे इस तरह पका पकाया खाना तो मिलता नहीं था, वह अपना पेट जंगल की बेर, गिरीफल, हरी टहनियाँ, पत्ते, कंदमूल, चूहे, घोंघे, कीड़े - मकोड़े, इल्लियाँ, चीटियाँ, मछलियाँ, छोटे मोटे जानवर और ऐसी ही जाने कितनी अल्लम-गल्लम चीज़ें खाकर भरता था ।“ 

" छी छी छी ..क्या गन्दी गन्दी चीज़ें खाता था यार ।" अजय ने कहा । मैंने अजय की प्लेट में इडली रखते हुए कहा “ और क्या कर सकता था वह ..भूख लगती तो जो भी सामने आता उसे खाने की कोशिश करता । इस चक्कर में कई बार ज़हरीली वस्तुएँ वनस्पति या कीट खाकर उसने प्राण भी गँवाए होंगे । 

हालाँकि खाने योग्य यह वस्तुएँ बहुत पोषक नहीं थीं और कई बार इनसे उसका पेट भी नहीं भरता था लेकिन मजबूरी में उसे यही सब खाना पड़ता था । 

"सही तो है ।" अजय ने इडली को साम्भर में डुबाया और नन्हे काक्रोच सी दिखाई देने वाली हरी धनिया की  एक पत्ती को सांभर से निकालकर बाहर फेंकते हुए कहा  "हम दिन भर में चाहे कितना कुछ अटर-सटर खा लें पेट तो दाल, चावल, सब्जी, रोटी से ही भरता है ।"  

“ फिर उसने खाद्य -अखाद्य में फर्क करना कैसे सीखा और बड़े पैमाने पर शिकार करना कब प्रारंभ किया ?“  अशोक ने सवाल किया । 

इस बीच आर्य सर वहाँ प्रवेश कर चुके थे और हमारी बातें सुन रहे थे । उन्होंने कहा “मनुष्य ने बड़े पैमाने पर शिकार तब प्रारंभ किया जब उसने शिकार हेतु उचित एवं पर्याप्त पत्थर के औज़ार और हथियार बना लिए । किसी भी बड़े जानवर के शिकार के लिए वह डंडा या हड्डी का टुकड़ा नाकाफ़ी था जिसका उपयोग वह पेड़ की जड़ें खोदने या कंदमूल खोदने के लिए करता था ।“ 

“लेकिन यह हथियार बनाने का ख्याल उसे कैसे आया और उसने यह हथियार कैसे बनाए ? “ अजय ने मेरी ओर इस अंदाज़ से देखा कि देखो डंडे वाली बात तो सर को भी मालूम है । 

“बताते हैं ।" आर्य सर ने कहा …” पहले ट्रेंच पर चलो, आज वैसे भी तुम लोगों के चक्कर में बहुत देर हो गई है । पता नहीं आजकल रात रात भर जागकर तुम लोग क्या करते रहते हो ,फिर देर से जागते हो और देर से ट्रेंच पर पहुंचते हो .." 

"कहाँ सर.." अशोक ने बचाव पक्ष के वकील की तरह ज़िरह शुरू की .." आज ही तो देर हुई है, रोज़ तो जल्दी ही सो जाते हैं ..कल तो शरद की अजंता एलोरा और मांडू की यात्रा कथा का अंतिम पाठ था ना इसलिए देर हो गई .. कल से बराबर समय पर जायेंगे ।" ठीक है ठीक है अभी तो चलो .." आर्य सर ने कहा "बाक़ी बातें चलते हुए .. वर्ना वाकणकर जी की डांट पड़ेगी ।"

*शरद कोकास*