सोमवार, 11 मई 2026

6-आँख के बदले आँख लेने के ज़माने में

यह सजा थी कि जो अपने से उच्च वर्ग के सभ्रांत पुरोहित आदि को थप्पड़ मारेगा उसे बैल के चमड़े से साठ  कोड़े लगाये जायेंगे, कर्जदार की पत्नी, पुत्र या पुत्री को तीन वर्ष तक दास बनकर रहना होगा । 

        *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी*

          ✍ *शरद कोकास* ✍

अब  तक आपने पढ़ा कि प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययन शाला विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के 6 छात्र शरद ,रविन्द्र, अशोक, किशोर ,राममिलन और अजय दंगवाडा नामक जगह पर पुरातात्विक उत्खनन के लिए गए हैं और उन लोगों के बीच रोज तंबू में बातचीत होती है । इस बातचीत में अब तक शामिल विषय है ग्रीक माइथोलॉजी के हरकुलिस और हमारे यहां के हनुमानजी, मिस्र के पिरामिड, स्पार्टा और ट्राई के बीच हेलन के लिए होने वाला युद्ध ,पुरातत्व की कुछ बातें, पंच मार्क सिक्के और उनका महत्व । छात्रों के गुरु हैं विश्व प्रसिद्ध भीमबेटका गुफाओं के खोजकर्ता डॉक्टर वी श्री वाकणकर और प्रोफेसर डॉ सुरेंद्र कुमार आर्य। इन छात्रों को इस उत्खनन शिविर में बहुत मजा आ रहा है और आज वे मेसोपोटामिया यानी सुमेरिया की यात्रा करने वाले हैं और पढ़ने वाले हैं वहां के राजा हम्मूराबी के बारे में । यह वही जगह है जहां बेबीलोन के प्रसिद्ध हैंगिंग गार्डन थे ।लीजिए आगे पढ़िए

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                 6⃣ *भाग छह* 6⃣

        *बैंक ने दिया बेबी को लोन*

  कुदाल की हुंकार थम चुकी थी , घमेलों का झनझनाना भी  रुक गया था ,मिटटी छानने वाली छन्नी भी अपनी खिसियानी हँसी बंद कर चुकी थी । मजदूर एक पांत  बनाकर चम्बल की और रवाना हो गए थे जिसे पारकर उन्हें अपने गाँव जाना था  । शाम होने लगी थी और अँधेरा अपने दूतों को इस दुनिया में भेजकर अपने आगमन के लिए उचित वातावरण की तलाश में था । इधर सूरज भी लौट जाने की बहुत जल्दी मचा रहा था  । ऐसा लग रहा था  जैसे उसे एक साईट पर अपना काम ख़त्म कर दूसरी साईट पर जाना हो । वैसे होता भी यही है, हमारे यहाँ सूरज डूब जाता है लेकिन कहीं न कहीं तो वह आसमान में अपने आसन पर विराजमान होता ही है । 

सूरज जब अपने औज़ार समेटकर चला गया अँधेरा अपनी ड्यूटी पर हाज़िर हो गया ।  हमेशा की तरह पंछी अपने घरौंदों में लौटने लगे  और जंगल के बीच स्थित दंगवाड़ा की इस पुरातात्विक साईट पर धीरे धीरे ख़ामोशी अपना बिस्तर बिछाकर नींद की राह तकने लगी । हम लोगों ने भी साईट से अपने औज़ार उठाये और कैम्प में लौट आये । हाथ-पाँव और चेहरे पर धूल की परत जमी हुई थी और उसे विदा करना ज़रूरी था सो तम्बू से तौलिया और साबुन लिया और चल दिए चम्बल के घाट पर । ठन्डे पानी से हाथ मुंह धोने के बाद हमने एक दूसरे के चेहरे को देखकर धूल साफ़ हो जाने की पुष्टि की और कैम्प में वापस आ गये । 


हम लोग जंगल में खुले आसमान के नीचे थे सो हमें कुछ ठण्ड सी महसूस हो रही थी । दिनभर मेहनत की थी इसलिए पेट भी खाली हो गया था । हम लोग भाटीजी की भोजनशाला में चूल्हे के पास आग तापते हुए बैठ गए और बातों के साथ साथ खुशबुओं से पेट भरने की कोशिश करने लगे । भाटी जी ने हम लोगों की हालत देखकर शीघ्र ही भोजन तैयार कर दिया, गोभी की रसेदार सब्ज़ी, दाल और रोटी । गरमागरम भोजन से पेट भरने के बाद जब सारा लहू भोजन को हज़म करने के लिए आमाशय की ओर दौड़ गया था तब ठण्ड और ज़्यादा तेज़ लगने लगी । हमें तम्बू में बिछे बिस्तर की याद आई जहाँ नर्म - गर्म रज़ाइयाँ हमारा इंतज़ार कर रही थीं । 

तम्बू के बाहर ठंडी हवाएँ थीं और भीतर हम हल्की हल्की सी कँपकँपाहट के बीच अपने आपको वर्तमान में सुरक्षित महसूस करते हुए अतीत की गलियों में भटकने की तैयारी में थे । आज की रात हम लोगों को मेसोपोटेमिया या प्राचीन सुमेरिया की सैर के लिए  जाना था । हम लोग रज़ाई ओढकर बैठ गए  । प्राचीन विश्व का एक नक्शा जिसे मैं उज्जैन से आते हुए अपने साथ लेता आया था मैंने अपने सामने फैला लिया । नक्शे के साथ इतिहास पढ़ना मुझे हमेशा से अच्छा लगता है ऐसा लगता है जैसे हम साथ साथ उस जगह की सैर कर रहे हों । इस तरह यह मेरे अभ्यास में शामिल है ।


नक़्शे में एक स्थान पर उँगली रखते हुए रवीन्द्र से मैंने कहा “यह पश्चिम एशिया का क्षेत्र है । पृथ्वी के जिन भूभागों में प्राचीन सभ्यता का अविर्भाव सबसे पहले हुआ उनमें पश्चिम एशिया भी है । इसके पूर्व में ईरान का पठार है और पश्चिम में भूमध्य सागर और काला सागर । यह सम्पूर्ण क्षेत्र रेगिस्तान और शुष्क मैदानी क्षेत्र है लेकिन बीच बीच में कई उपजाऊ क्षेत्र भी हैं, नदियाँ हैं, हरियाली है और घाटियाँ भी हैं  । वर्तमान में जहाँ इराक और कुवैत है यही क्षेत्र प्राचीन समय में मेसोपोटेमिया कहलाता था । यहीं दज़ला और फरात नदियाँ बहती हैं, दज़ला का  वर्तमान नाम टिग्रीस है और फरात का नाम यूफ्रेटिस है । इन नदियों का उद्गम काकेशिया के दक्षिण में स्थित पहाड़ों से हुआ है और अंत फारस की खाड़ी में होता है । इनके मध्य व निचले भागों में स्थित प्रदेश को प्राचीन निवासियों ने “ मेसोपोटेमिया “ अर्थात नदियों के बीच का प्रदेश या दोआब कहा ।


"आज लेकिन इराक और कुवैत तो तेल के लिए जाना जाता है ?" अशोक का प्रश्न जायज था । " हाँ "मैंने कहा । "लेकिन उस समय न तो तेल की खोज हुई थी न तेल से चलने वाले इंजन की । उस समय तो यह क्षेत्र अपनी हरियाली के लिए मशहूर था जो इन नदियों में बाढ़ की वज़ह से होती थी । यहाँ वसंत के मौसम में पहाड़ों पर बर्फ पिघलने की वज़ह से बाढ़ आती थी उसके बाद सब और हरियाली छा जाती थी । लेकिन यहाँ का तापमान फिर पचास डिग्री के आसपास हो जाता था इसलिए वह सूख भी जाती थी । यहाँ कोई भी खनिज नहीं पाया जाता था लेकिन अपनी मिटटी की वज़ह से यह प्रदेश काफी उपजाऊ था । 


"यहीं पर कहीं बेबीलोन शहर भी था ना जिसके हैंगिंग गार्डन बहुत प्रसिद्ध थे ?"रवींद्र ने सवाल किया । " हाँ " मैंने कहा "यहीं फरात नदी के किनारे जहाँ दज़ला फ़रात के बहुत क़रीब आ जाती है बेबीलोन नामक एक प्रसिद्ध शहर था जिसे बाबुल भी कहते हैं । बेबीलोन काफी समृद्ध शहर रहा है । नदियों के मार्ग से यहाँ बजरों और नावों पर व्यापारियों द्वारा अनेक तरह का माल लाया जाता था । यहाँ की भूमि बहुत उपजाऊ थी सो यहाँ खजूर गेहूँ,जौ आदि का काफी उत्पादन होता था जिनका अन्य सामानों से विनिमय किया जाता था । यहाँ की चिकनी मिटटी से घड़े, संदूक और ईटें भी बनाई जाती थीं । मेसोपोटामिया के सड़क मार्ग भी बेबीलोन से होकर गुजरते थे । यहाँ उन्नीसवीं शताब्दी में उत्खनन हुआ जिससे अनेक प्राचीन सभ्यताओं का पता चला ।"


भैया राममिलन काफी देर से चुप बैठे थे और नक़्शे पर नज़र गड़ाए भूगोल पर मेरा व्याख्यान  सुन रहे थे । अचानक मैंने उनकी ओर देखा तो वे बोल उठे “ का हो, ई  बेबीलोन नाम कहाँ से आया ? इहाँ  बैंक ने कौनो  बेबी- वेबी को लोन दिया था का ? मैंने हथेली से अपना माथा पीटते हुए कहा “ भैया इस बेबीलोन का अंग्रेजी के बेबी और लोन से कोई सम्बन्ध नहीं है । “ भैया राममिलनवा पर लेकिन कोई असर नहीं पड़ा वे अपनी रौ में बोले..” भैया ऐसा है कि ई बड़े लोग बहुत चालाक होवत हैं,  ई लोग बेबी क्या अपन कुत्ता बिल्ली के नाम से भी लोन ले लेवत हैं और फिर सब कुछ हजम कर के भागी जात हैं ।“  


राममिलन भैया ने बात तो बिलकुल सही कही थी लेकिन चर्चा बेबीलोन  पर चल रही थी इसलिए मैंने उन्हें उंगली से चुप रहने का इशारा किया और आगे बात बढाई ”भाईसाहब, बेबीलोन शब्द बेविल या बेविलिम से बना है जिसका अर्थ होता है देवताओं का द्वार, वैसे यह ग्रीक शब्द है । बेबीलोन शहर की स्थापना सरगोन  के राजा द्वारा तेईस सौ चौंतीस ईसापूर्व में की गई थी । उस समय प्राप्त मिटटी की एक मुद्रा से इसका पता चलता है लेकिन इसका वास्तविक इतिहास राजा हम्मुराबी के काल से प्रारंभ होता है जिसका काल सत्रह सौ ब्यानबे से सत्रह सौ पचास ईसा पूर्व माना जाता है  ।


 हम्मुराबी  काफी बलशाली राजा था और उसने एक उत्कृष्ट सेना का निर्माण किया था अपनी ताकत के बल पर उसने पूरे मेसोपोटामिया पर कब्ज़ा कर लिया था । लेकिन इतिहास में हम्मुराबी अपनी कानून संहिता के लिए प्रसिद्ध है । उसने शहर के बीचोबीच एक काले पत्थर पर अपनी प्रजा के लिए कुछ क़ानून खुदवाए थे जिनका पालन करना पूरी प्रजा के लिए अनिवार्य था । 


"क्या लिखा था भाई उसमें  ? " अजय नाक तक रज़ाई ओढ़े रज़ाई के भीतर घुसा हुआ था उसने तत्काल अपनी गर्दन बाहर निकाली और पूछा । " अरे इस विधि-संहिता में बहुत भयंकर बातें लिखी थीं जैसे कि किस अपराध के लिए क्या दण्ड दिया जाना चाहिए ।" मैंने कहा  । " रुको रुको मैं बताता हूँ " रवीन्द्र अचानक उठकर खड़ा हो गया अपने कानों पर लपेटा हुआ मफ़लर खोलकर उसे पगड़ी की तरह सर पर बांधा और नाटकीय अंदाज़ में कहने लगा " सुनो, सुनो, सुनो.. समस्त प्रजाजन ध्यान से सुनो..मैं हम्मुराबी देवताओं द्वारा नियुक्त शासक, सभी राजाओं में प्रथम और फरात के तटवर्ती सभी ग्रामों, नगरों का विजेता हूँ । मैंने समस्त देश को सत्य और न्याय की शिक्षा दी है और लोगों को समृद्धि प्रदान की है  । "इसमें भयंकर जैसी क्या बात क्या है ?" अजय ने ऊबकर कहा और वापस रजाई के भीतर गर्दन छुपा ली  । 


"तू ना यार एक्टिंग भी नहीं करने देता है ।" रवीन्द्र ने किंचित नाराज़ होते हुए कहा । " सुनो तो उस विधि संहिता में आगे क्या लिखा था मैं बताता हूँ । उसमें लिखा था, आज से मेरे राज्य में जो मंदिर अथवा राजा की संपत्ति चुराएगा उसे प्राणदंड मिलेगा, जो दास  अथवा दासी चुराएगा उसे भी प्राणदंड मिलेगा ,जो भागे हुए दास को शरण देगा उसे भी प्राणदंड मिलेगा । " मतलब  हर बात के लिए प्राणदंड ? " अजय ने पूछा । " नहीं ,कुछ हल्की सजायें  भी है भाई ।" रवींद्र कहने लगा " जैसे, जो शरीर पर गोदा हुआ दास का निशान मिटाएगा उसकी उँगलियाँ काट दी जाएँगी, जो पराये  दास  की हत्या करेगा उसे बदले में दास  देना पड़ेगा, बैल के बदले में बैल देना पड़ेगा, जो अपने से उच्च वर्ग के सभ्रांत पुरोहित आदि को थप्पड़ मारेगा उसे बैल के चमड़े से साठ  कोड़े लगाये जायेंगे, कर्जदार की पत्नी, पुत्र या पुत्री को तीन वर्ष तक दास बनकर रहना होगा । मैं हम्मुराबी ,न्यायप्रिय राजा हूँ और ये विधान मुझे सूर्यदेव शम्स ने प्रदान किये हैं । मेरे शब्द उदात्त हैं और मेरे कार्य अनुपम हैं ..."

अबकी बार अजय ने रवीन्द्र को एप्रिशिएट करते हुए ताली बजाई । "मगर यह बहुत बाद की बात है ।" मैंने कहा "उससे पहले यहाँ भीषण बारिश होती थी जिसकी वज़ह से नदियों में बाढ़ आती थी  यह बाढ़ अपने साथ मिटटी की गाद लेकर आती थी  जो बहुत उपजाऊ होती थी  । सातवीं- छठवीं सहस्त्राब्दी  ईसापूर्व तक यहाँ के निवासी कुदाल से खेती करने के अलावा भेड़ बकरियाँ व गाय पालने लग गए  थे । वे दलदल में उगने वाले सरकंडों से और मिट्टी से अपने घर बनाते थे ।“ “ और खाना खाकर आराम से सो जाते थे । “अजय जोशी ने एक लम्बी उबासी लेते हुए कहा और माथे तक रज़ाई खींचकर लम्बा हो गया ।

“नहीं भाई इतना सुख कहाँ था ।“ मैंने कहा “यहाँ की नदियों में हर साल भीषण बाढ़ आती थी और उनकी सारी मेहनत पर पानी फिर जाता था, झोपड़ियाँ बह जाती थीं, आदमी और मवेशी नष्ट हो जाते थे, दलदली बुखार, बिच्छू, कीड़े-मकोड़ों से लोग त्रस्त रहते थे, जंगली शेर और सुअर हमला कर देते थे ..” “ एक मिनट भाईसाहब,  शेर तो जंगली ही होते हैं ना ? ” राममिलन भैया ने बहुत देर बाद मुँह खोला था । “ हाँ भाई उस समय भी जंगली थे और आज भी जंगली ही हैं, सुअरों की बात मैं नहीं कर रहा हूँ ।” राममिलन भैया ने एक्सपर्ट कमेंट किया । “ सुअर तो सब शहर में बस गए  हैं और अब चुनाव भी लड़ने लगे हैं ।" 

मैंने बात आगे बढ़ाई “ लेकिन तीसरी सहस्त्राब्दि  ईसा पूर्व तक मेसोपोटेमिया के  इन लोगों ने अनेक कठिनाइयों पर विजय पा ली थी । दलदल सुखाने और सिंचाई के लिए  यहाँ नहरें खोदी गईं, खेतों में गेहूँ और जौ की फसलें उगाई जाने लगीं । कृषकों ने हल का अविष्कार भी कर लिया था । खजूर यहाँ बहुतायत में होता था जिसके फलों से आटा व गुड़ तैयार किया जाता था । पेड़ की छाल के रेशों से रस्सी बुनी जाती थी ,चरागाहों में घुंघराले बालों वाली भेड़ें नर्म नर्म घास चरती थीं । नगरों में शिल्पी, बढ़ई आदि कारीगर रहा करते थे और ऊन, खजूर, अनाज आदि का व्यापार भी अच्छा था । “


"यार अब समझ में आया कि अरब देशों के लोग खजूर को इतना पसंद क्यों करते हैं ।" अजय ने कहा "और यह भी समझ में आ गया कि मुसलमान लोग रमज़ान के महीने में रोजा खोलने के लिए खजूर का इस्तेमाल क्यों करते हैं । "हाँ यह सही है ।" मैंने कहा "जिस क्षेत्र में किसी धर्म का उदय होता है उस क्षेत्र का खान-पान, रीति रिवाज़, रहन - सहन सब कुछ उस धर्म में शामिल हो जाता है ,फिर उस धर्म के लोग दुनिया के किसी भी क्षेत्र में रहें वे उन्ही रीति -रिवाजों का पालन करते हैं । लेकिन यह बात जो मैं बता रहा हूँ यह इस्लाम के अविर्भाव से हजारों साल पहले की है ।"

“मतलब यह कि मेसोपोटेमिया वासियों को सुखी होने में तीन-चार हज़ार साल लग गए  ? ” रवीन्द्र ने मेरी बात को गिर से पटरी पर लाते हुए कहा । “हाँ” मैंने बताया, "लेकिन इस तरह सुखी होने की प्रक्रिया में कुछ लोग तो सम्पन्न हो गए और शेष वैसे ही विपन्न रहे । दरअसल अधिकता ही इस भेद को जन्म देती है । उस समय दक्षिण मेसोपोटामिया की उर्वर ज़मीन में एक दाने से सौ दाने पैदा होते थे और खजूर का एक पेड़ वर्ष में पचास  किलो से भी अधिक खजूर देता था । इसका अर्थ यह हुआ कि उन लोगों के पास आवश्यकता से अधिक अन्न हो गया लेकिन इसके मालिक सब नहीं हुए ।" 

"हमारे यहाँ भी तो यही हाल है भाई " अशोक ने कहा । "हमारे यहाँ भी किसान इतना अनाज पैदा करता है लेकिन सब बड़े बड़े लोगों के गोदामों में जमा हो जाता है किसान के पास तो बमुश्किल अपने खाने लायक अनाज बचा रहता है ।" " तुम ठीक कह रहे हो " मैंने कहा " लेकिन इसकी वज़ह से यह हुआ कि कुछ संभ्रांत और पुरोहित किस्म के लोगों ने ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लिया और शेष लोग जिनमें  युद्धबंदी भी थे उनके दास हो गए । गरीबों के पास अपनी भूमि नहीं थी वे ज़मींदारों के यहाँ काम करने लगे  । इस तरह दक्षिण मेसोपोटामिया में कृषि, पशुपालन और शिल्प का विकास तो हुआ ही साथ साथ  दासों , सामुदायिक किसानों और संपन्न दास स्वामियों के वर्ग भी बन गए । बहुत से शिल्पी और किसान धनी लोगों के कर्जदार बनते गए ।" 


"मतलब यह सिर्फ हमारे देश में ही नहीं हो रहा बल्कि पूरी दुनिया में सदियों से चला आ रहा है ।" अशोक ने कहा और रज़ाई के भीतर मुँह घुसा लिया । मैंने देखा कि सबको नींद सी आ रही है । अशोक की बात ख़त्म होते ही रवींद्र ने आज की रात्रिकालीन सभा की समाप्ति की घोषणा करते हुए पहला फरमान जारी किया .."अभी भी कहाँ कुछ बदला है न बदलने वाला है चलो अब सब लोग सो जाओ ।" 


*शरद कोकास*


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रविवार, 10 मई 2026

5 - जो चल गया वो खरा सिक्का

इसी सिक्के से उस काल का कोई पिता अपनी बेटी के लिए गुड़िया खरीद कर लाया होगा, हो सकता है किसी किसान ने खेती  के लिए  बैल खरीदे होंगे ?

📕 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📕

        ✍🏽 *शरद कोकास* ✍🏽

अब तक आपने पढ़ा कि प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययन शाला के छात्र शरद,रवीन्द्र,अजय,अशोक,किशोर और राममिलन उज्जैन के निकट दंगवाड़ा नमक पुरातात्विक स्थल पर उत्खनन हेतु पहुंचे हैं जहाँ सुप्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ.वाकणकर के निर्देशन में यह उत्खनन शिविर चल रहा है । एक दिन बीत चुका है और छात्रों की बातचीत में ग्रीक माइथोलॉजी के पात्र हरक्युलिस से लेकर भारतीय माइथोलॉजी के पात्र हनुमान तक शामिल हो चुके हैं वे ट्रॉय के युद्ध और मिस्त्र के पिरामिड्स पर भी बात कर चुके हैं आज उनका दूसरा दिन है और अब पुरातत्व के प्रशिक्षण कार्य हेतु वे टीले की और प्रस्थान कर रहे हैं आज की बातचीत में शामिल है एक पुरातत्ववेत्ता होने के लिए आवश्यक तैयारी, ट्रेंच के बारे में जानकारी साथ ही प्राचीन सिक्कों से परिचय लीजिये आगे पढ़िए   .... 

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            5⃣ भाग पांच 5 ⃣

  🥈जो चल गया वो खरा सिक्का🥈

कैंप से निकलकर टीले की ओर जाते हुए हमें अहसास हुआ जैसे हम अपने हॉस्टल से क्लासरूम की  ओर जा रहे हों । वैसे यह सच भी था । टीले पर खुदी निखात पर ही हमारी क्लास लगनी थी सो वह एक तरह से हमारी कक्षा ही थी । जैसे ही हम आगे बढ़े टीला हमारे सामने था । दिन की रौशनी में हम दंगवाड़ा का यह टीला पहली बार देख रहे थे । रात के अँधेरे में जो टीला डरावना और रहस्यमय लग रहा था वही दिन में शांत और सुन्दर प्रतीत हो रहा था । वहाँ न रात का अँधेरा था ,न पेड़ों के साये । यह इस टीले से हमारा नया परिचय था । 

    टीले की ओर देखते हुए मैं सोचने लगा ..रौशनी और अँधेरे का खेल भी कितना अजीब होता है ना । अँधेरे में जो कुछ छुपा छुपा होता है वह रौशनी में आते ही अनावृत हो जाता है । अँधेरा अगर रहस्य है तो रौशनी रहस्योद्घाटन । अँधेरा भय उत्पन्न करता है और प्रकाश उस भय से मुक्ति प्रदान करता है ।

    दिन के इस उजाले में कल रात के अँधेरे के बारे में सोचते हुए मुझे मुक्तिबोध की कविता 'अँधेरे में' याद आने लगी ..

ज़िन्दगी के  

कमरों में अँधेरे  

लगाता है चक्कर  

कोई एक लगातार  

आवाज़ पैरों की देती है सुनाई  

बार- बार ...बार-बार  

वह नहीं दीखता 

नहीं ही दीखता

किन्तु वह रहा घूम  

तिलिस्मी खोह में गिरफ़्तार  

कोई एक  

भीत- पार आती हुई पास से  

गहन रहस्यमय अंधकार - ध्वनि  सा  

अस्तित्व जनाता  

अनिवार कोई एक 

और, मेरे हृदय की धक -धक  

पूछती है - वह कौन  

सुनाई जो देता , पर नहीं देता दिखाई ..... 

    कितना डूबकर लिखा है मुक्तिबोध ने ..ऐसा लगता है जैसे एक कुदाल लेकर सदियों से निर्मित मनुष्य के अवचेतन को खोद डाला हो ।  

    सदियों से व्याप्त यह कैसी विडम्बना है कि बचपन में ही हमारे अवचेतन में अँधेरे और भय का यह सम्बन्ध स्थापित कर दिया जाता  है । हमें बताया जाता  है कि अँधेरे का अर्थ बुराई है, रहस्य है, अँधेरे में बुरे काम होते हैं, अँधेरे में बुरी आत्माएँ भटकती हैं आदि आदि और फिर हम जीवन भर अन्धेरे से डरते रहते हैं । 

    अक्सर रोते हुए बच्चे को चुप कराने के लिए हम कहते हैं  “ चुप ! रोना बुरी बात है, अब रोया तो अँधेरे में  फेंक देंगे ।‘’ इसकी मनोवैज्ञानिक परिणति अँधेरे और भय के सम्बन्ध में होती है । फिर वह वह बच्चा जीवन भर अँधेरे का सम्बन्ध  भय, पाप, बुराई, भूत-प्रेत और बुरी शक्तियों से जोड़ता है । वह यही समझता है कि सारे बुरे काम और अपराध अँधेरे में ही होते हैं । अफ़सोस उस बच्चे को यह नहीं बताया जाता कि अँधेरा सूर्य की अनुपस्थिति का दूसरा नाम है । 

रात का वह अँधेरा कबका समाप्त हो चुका था और सुबह की धूप टीले को अपना दुलार दे रही थी । रात में आसमान से टपकी हुई ओस किसी बादल का हिस्सा बन चुकी थी और बादल का एक टुकड़ा आसमान में खड़ा खड़ा अपने अतीत की ओर निहार रहा था । हम भी दुनिया के अतीत में कदम रखने के लिए तैयार हो चुके थे । हमने सोचा आज पहला दिन है सो कुदाल हाथ में लेकर मज़दूर की भूमिका निभाई जाए । आखिर हर पुरातत्ववेत्ता को शुरुआत तो यहीं से करनी पड़ती है । मैंने एक मज़दूर के हाथ से कुदाल ली और ज़मीन पर चलाने की मुद्रा में आया ही था कि आर्य सर ने मुझे रोक दिया 

    "ऐसे नहीं भाई, निखात में कुदाल किस तरह चलाना है और उसके लिए क्या क्या सावधानी बरतनी है पहले यह आपको सीखना होगा ।"  

“मतलब हम मज़दूर बनने के लायक भी नहीं हैं ?"  अजय ने आश्चर्य पूर्वक सवाल किया । “नहीं भाई, ऐसा नहीं है ।" आर्य सर समझ गए थे कि उनका इस तरह टोकना हमें खल गया है । उन्होंने समझाते हुए कहा "कुदाल चलाना बड़ी बात नहीं है ,हम सभी जीवन में कभी न कभी कुदाल पकड़ चुके हैं  लेकिन पुरातात्विक स्थल पर कुदाल चलाने के  लिए  और अधिक कार्य कुशलता की आवश्यकता होती है । आपकी ज़रा सी असावधानी से भी ज़मीन के भीतर दबी कोई महत्वपूर्ण वस्तु टूट सकती है, इसलिए गड्ढा खोदने और निखात के निर्माण हेतु  कुदाल चलाने में अंतर है ।और कुदाल चलाने से पहले आप लोगों को कुछ प्रारम्भिक बातें जानना भी आवश्यक है ।“ 

बात हमारे भेजे में ठीक तरह से प्रवेश कर गई थी सो हमने कुदाल चलाने का विचार त्याग दिया । कुदाल चलाने की बात पर मुझे फिर मुक्तिबोध याद आये कविता लिखना भी  मनुष्य जाति  के सामूहिक अवचेतन में कलम रूपी कुदाल चलाने की तरह ही है लेकिन उसके लिए भी प्रशिक्षण और अभ्यास की आवश्यकता तो होती ही है । मुक्तिबोध ऐसे ही बड़े कवि नहीं बन गए । 

वैसे भी उत्खनन का हमारा यह पहला दिन था और यह दिन हम लोगों की डायरी में ऑब्ज़रवेशन के लिए  तय था । इस दिन हमें सिर्फ यह देखना था कि ट्रेंच के लिए जगह कैसे तय की जाती है, किस तरह ट्रेंच का आकार तय किया जाता है, कैसे नाप लिया जाता है, मार्किंग कैसे की जाती है, टूल्स कैसे तैयार किये जाते है वगैरह वगैरह । आर्य सर हम लोगों को टीले के एक सिरे पर ले गए ,वहाँ एक चौकोर गड्ढा खुदा हुआ था । सर ने बताया कि यह टेस्ट पिट है । किसी भी पुरातात्विक स्थल का चयन करने के पश्चात सर्वप्रथम वहाँ पर एक टेस्ट पिट या टेस्ट ट्रेंच खोदी जाती है । इसे हम परीक्षण निखात भी कह सकते हैं । इस टेस्ट पिट द्वारा हमें ज्ञात होता है कि इस साईट पर अमूमन कितनी गहराई पर कितनी सतहें प्राप्त होंगी। इस आधार पर ही फिर उत्खनन प्रारंभ किया जाता है 

इसके बाद उन्होंने हमें निखात क्रमांक एक के पास बुलाया और कहा " देखिये यह निखात या ट्रेंच है । हम लोगों ने यहीं से उत्खनन कार्य प्रारंभ किया है ।  ट्रेंच एक प्रकार का वर्गाकार या आयताकार गड्ढा होता है जो सामान्यतः अपनी लम्बाई चौड़ाई के मुकाबले अधिक गहरा होता है । इसमें खुदाई करते हुए जो सबसे उपरी सतह होती है उसे फर्स्ट लेयर कहते हैं जिसमे सबसे बाद की सभ्यता के अवशेष मिलते हैं इसके नीचे जाने पर दूसरी लेयर या सतह मिलती हैं जहाँ उस समय से पूर्व के अवशेष प्राप्त होते हैं । दोनों सतहों के बीच का हिस्सा बहुत महत्वपूर्ण होता है जिसके अवलोकन से हमें पिछली सभ्यता के नष्ट होने के प्रमाण मिलते हैं । यह हिस्सा भूस्खलन ,बाढ़ आदि की वज़ह से निर्मित होता है ।"

अजय ने कहा "सर यह किसी खाली डिब्बे को भरने के सामान ही है । जैसे किसी गहरे डिब्बे में हम लोग एक के बाद एक चार तरह की वस्तुएँ डालते हैं लेकिन जब निकालते हैं तो सबसे पहले वह वस्तु बाहर आती है जो सबसे बाद में डाली जाती है जो ऊपर होती है और सबसे अंत में वह वस्तु निकलती है जो सबसे पहले डाली जाती है ।  ठीक उसी तरह जो सभ्यता सबसे अंत में बसी होती है उसके अवशेष सबसे पहले मिलते हैं और जो सबसे पहले बसी हुई सभ्यता होती है उसके अवशेष सबसे नीचे अंत में मिलते हैं । अजय ने इतने सरल ढंग से आर्य सर की बात समझा दी थी कि उसके लिए हमारा तालियाँ बजाना अनिवार्य हो गया था ।

डॉ.आर्य बहुत रूचि के साथ हमें निखात के उत्खनन सम्बन्धी तकनीकी जानकारी प्रदान कर रहे थे लेकिन पहले दिन स्कूल आये बच्चों की तरह हमारा मन भी क्लास में नहीं लग रहा था । सर समझ गए कि इन लोगों को एक जगह बिठाकर सारा तकनीकी ज्ञान एक दिन में इनके दिमागों में उंडेल  देना उचित नहीं है सो उन्होंने एक नया आइडिया लगाया । सर ने कहा " अच्छा यह बताओ तुम लोगों में से कितने लोगों ने ज़मीन पर पड़े पैसे इकठ्ठे किये हैं ?" 

    मैंने झट से हाथ उठाया " सर हमारे बचपन में बैतूल में हमारे घर के सामने इतवार और गुरूवार को बाज़ार लगता था । शाम को बाज़ार उठ जाने के बाद हम बच्चे निकलते थे और सिक्के ढूँढा करते थे ,हमें बहुत से सिक्के मिल जाया करते थे ।" मेरी बात खत्म होते ही अजय ने कहा .." सर हम लोगों के घर के सामने से जब शवयात्रा निकलती थी तो उसमे लाई के साथ चिल्लर पैसे भी लोग मुर्दे के ऊपर से फेंकते थे , उनके जाने के बाद हम लोग दौड़कर वे पैसे उठा लेते थे ।

अजय की बात सुनते ही राममिलन भैया ने अपने कानों पर हाथ रखे .." शिव शिव शिव .. कितना घ्रणित काम करते थे भाई तुम लोग ..मुर्दे पर फेके हुए पैसे नहीं उठाना चाहिए ..कहीं भूत-वूत पीछे लग जाता तो ?" अशोक ने हँस कर  कहा .." अरे ये लोग खुद ही इतने बड़े भूत हैं इनके पीछे क्योंकर भूत लगता ,सर हम लोग तो शादी में दुल्हे के ऊपर फेंके हुए सिक्के बीन लेते थे ,और पैसे बीनने से ज़्यादा मजा तो सत्यनारायण कि कथा में पंडित जी की आरती की थाली से पैसे चुराने में आता था ।" 

    "बस बस काफी है " आर्य सर ने कहा तुम लोगों के पास सिक्के बीनने का काफी अनुभव है सो आज यही काम करो देखो इस टीले के पास काफी सारे ताम्बे के पंचमार्क सिक्के हजारों साल से पड़े हुए हैं ,देखते हैं तुममे से कौन कितने सिक्के बीन कर लाता है ।"  

इस तरह हमें आज दिन भर के लिए काम मिल गया था । मिटटी के भीतर प्रवेश करने से पहले मिटटी की उपरी सतह से परिचय करना ज़्यादा ज़रूरी था सो हम लोग टीले के आसपास के क्षेत्र में घूम घूम कर ताम्बे के पंचमार्क या आहत सिक्के एकत्रित करने निकल पड़े  । लेकिन यहाँ हमें सिक्के बहुत मुश्किल से मिल रहे थे । 

    बरसों पहले ढाले गये यह सिक्के आंधी ,तूफ़ान,बाढ़, भूस्खलन जैसी प्राकृतिक विपदाओं से आँख मिचौली खेलते हुए कहीं किसी पत्ते, पेड़ की जड़ ,पत्थर या मिटटी की सतह के नीचे छुप गए थे । हमने देखा कि यह सिक्के ठीक उसी तरह के थे जैसे कभी ताम्बे का एक पैसे का सिक्का चला करता था । लेकिन यह  सिक्के उनसे भी  पुराने थे, ताम्बे के  हवा के संपर्क में आ जाने के कारण उन पर आक्साइड की परत चढ़ी हुई थी और वे कुछ हरे से रंग के हो गए  थे और इसी वज़ह से उन पर मार्क की हुई सील भी पढी नहीं जा रही थी । 

कुछ देर सिक्के इकठ्ठा करने के बाद हम लोग ट्रेंच पर लौट आये । अपने पास इकठ्ठा चार-छह सिक्के  सर को सौंपते हुए रवीन्द्र ने आर्य सर से सवाल किया " सर इन्हें पंचमार्क सिक्के क्यों कहा जाता है ? सर ने जवाब दिया 

    "भारत में सबसे पहले लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व में आहत करके, चोट करके या पंच  करके बनाये गए । यह सिक्के ईसा पूर्व छठी शताब्दी से चलन में आये जो ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी तक चलन में रहे । सबसे पहले यह सिक्के चांदी के बनते थे । इनके निर्माण के लिए एक पतली चांदी की चादर को बराबर बराबर टुकड़ों में काटा जाता, फिर इन टुकड़ों के  कोने काटकर इन्हें एक जैसे वज़न का बनाया जाता, फिर  एक वज़न के इन टुकड़ों पर कोई एक मुहर या ठप्पा रखा जाता और उस पर हथौड़े से प्रहार किया जाता या पंच किया जाता, इसीलिए अंग्रेजों ने इन्हें पंचमार्क सिक्के नाम दिया । इस तरह प्रहार करने की वज़ह से ही यह अलग अलग आकार के हो गए हालाँकि इनकी पहचान इन पर अंकित चिन्ह से ही होती थी ।" 

पंचमार्क सिक्के 

"लेकिन सर हमें तो जो सिक्के यहाँ मिल रहे हैं वे चांदी के नहीं बल्कि ताम्बे के हैं ?" अजय ने सवाल किया । आर्य सर ने जवाब दिया "हाँ पहले यह सिक्के चांदी के ही बनते थे, ताम्बे के सिक्कों का चलन मौर्यकाल में माना जाता है । चांदी के सिक्के ज़्यादातर गंगा किनारे के जनपदों में पाए जाते हैं, इन पर उस राज्य की मोहर अंकित होती थी । " तो क्या सर यह सिक्के अन्य जनपदों में नहीं चलते थे ? "अजय ने सवाल किया । 

"क्यों नहीं चलते थे ।" आर्य सर ने कहा । "जब व्यापार या अन्य माध्यमों से यह सिक्के अन्य जनपदों में पहुँचते थे तो उस राज्य की मुद्रा या चिन्ह उस पर अंकित कर दिया जाता, अधिकतर पीछे की  ओर । इसके अलावा कई छोटे छोटे जनपद थे जिनकी आर्थिक स्थिति कमज़ोर थी तो उन्होंने ताम्बे के सिक्के बनाये । इसलिए इन्हें जनपदीय सिक्के भी कहा जाता है । जैसे मालव, यौधेय आदि जनपदों ने अपने सिक्के बनाये । अनेक स्थानों पर चांदी और ताम्बे के सिक्के एक साथ भी पाए गए ।"


राममिलन भैया भी हम लोगों के साथ कुछ पंचमार्क सिक्के खोजकर लाये थे और अपना चश्मा उतारकर उसके मोटे से लेंस को मैग्निफाइंग ग्लास की तरह इस्तेमाल करते हुए उन सिक्कों पर अंकित आकृतियों को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे "सर हमें तो इन सिक्कन में कछु नाय दिख रहा है हाथी है कि घोड़ा है ?" सर हँसने लगे .." भाई, अब तक तो इतना क्षरण इन सिक्कों में हो चुका है कि ठीक से कुछ दिखना मुश्किल है लेकिन कई साइट्स में यह सिक्के अच्छी अवस्था में प्राप्त हुए हैं । अब तक पांच सौ से अधिक चिन्ह इनमें पहचाने जा चुके हैं जिनमे शेर, हाथी, घोड़े जैसी पशुओं की आकृतियाँ, विभिन्न मानव आकृतियाँ, रथ के चक्के, सूर्य, चन्द्रमा, तीर-कमान, पहाड़, नदियाँ और विभिन्न ज्यामितीय आकृतियाँ अंकित हैं ।

"सर, तो क्या हर राज्य अपना अलग सिक्का बनाता था और उस पर अपनी आकृतियाँ अंकित करता था ? रिजर्व बैंक टाइप कौनो बैंक, कौनो नियम फियम नहीं था क्या ? " राममिलन की बात सुनकर  सर हँसने लगे  "भाई कैसा बैंक और कैसा नियम, हर राज्य की अपनी टकसाल होती थी और ज़रूरत के अनुसार वे अपने लिए सिक्के बनाते थे, एक राज्य का सिक्का जब दूसरे राज्य में पहुँच जाता तो वे उस पर अपनी मुहर लगाकर उसे अपना सिक्का बना लेते, इसीलिए एक सिक्के पर कई कई छाप मिलती हैं । " सर, फिर तो बहुत अराजकता होती होगी, इतने शिथिल नियमों की वज़ह से तो लोग अपने अपने सिक्के बना लेते होंगे ?" अशोक ने पूछा । 

"नहीं ऐसा भी नहीं था ।" सर ने कहा "हालाँकि कई बड़े बड़े नगरों जैसे उज्जयिनी, तक्षशिला, कौशाम्बी आदि के वणिक संघों ने अपने अपने सिक्के भी बनाए थे ।" राममिलन से फिर सवाल किया "तो सर अभी जैसे गांधीजी हर नोट पर दिखाई देते हैं वैसा नहीं था, लेकिन उस समय भी आना, दो आना, जैसी कोई मुद्रा तो चलती होगी ? " " हाँ चलती थी ना " सर ने कहा "कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इनका उल्लेख है । उस समय एक आने को पण कहा जाता था, आधे आने को अर्ध पण, चौथाई आना पद कहलाता था और आने के आठवें हिस्से को अर्शपादिका कहते थे । सम्पूर्णता में सभी पंचमार्क सिक्कों के लिए कर्षपण शब्द प्रचलित था ।"  

मैंने ज़मीन पर पड़ा एक सिक्का उठाकर अपनी हथेली पर रखा और उसे देखते हुए सोचने लगा … आज यह सिक्का मेरी हथेली पर रखा है लेकिन हजारों साल पहले हो सकता है ऐसा हुआ हो कि इसी सिक्के से उस काल का कोई पिता अपनी बेटी के लिए  गुड़िया खरीद कर लाया होगा, हो सकता है किसी किसान ने खेती  के लिए  बैल खरीदे होंगे ? हो सकता है किसी गृहणी ने इस सिक्के से अपने परिवार के लिए दाल -आटा खरीदा होगा । जाने कितने हाथों में यह सिक्का गया होगा । 

    अशोक ने पता नहीं कैसे ताड़ लिया कि मैं ऐसा ही कुछ सोच रहा हूँ । उसने पूछा “ यार उस ज़माने में इस एक सिक्के में कितनी सिगरेट आती होंगी ? ” “चुप । “ मैंने कहा ” उस ज़माने के लोग सिगरेट नहीं पीते थे ।“ “तो फिर सुबह उनका मामला कैसे पिघलता था ?” अशोक बोला । अबकी बार मैंने उसे ऐसे घूरकर देखा कि वह बिलकुल चुप हो गया । 

इस तरह डॉ.आर्य के सान्निध्य में आज का यह दिन अच्छा बीता । हाँ सिक्के बीनने के अलावा वहाँ कार्यरत मज़दूरों से भी हमने दोस्ती कर ली क्योंकि वे निरक्षर ही सही कुदाल चलाना तो हमसे बेहतर जानते थे । हाँ हिंदी भाषा के अक्षर उनके लिए उसी तरह अनचीन्हे थे जिस तरह इतिहासकारों के लिए सिन्धु घाटी की लिपि, जिसे तमाम कोशिशों के बावज़ूद अब तक ठीक ठाक पढा नहीं जा सका था ।


🔲 शरद कोकास 🔲


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शनिवार, 9 मई 2026

4 - 💃🏼 वो हेलनवा का क्या हुआ 💃🏼


तीनों देवियाँ स्केमेंडर नदी में स्नान के पश्चात  पैरिस के सन्मुख पूर्णतया निर्वस्त्र स्थिति में प्रकट हुई । यह उस समय का ब्यूटी कांटेक्स्ट था । अपने  पक्ष में निर्णय देने के लिए हेरा ने उसे दुनिया पर शासन का ,एथिनी ने ज्ञान और विवेक का तथा एफ्रोडायटी ने उसे संसार की सबसे रूपवती स्त्री हेलेन को प्रदान करने का प्रलोभन दिया

 📕 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📕

       ✍🏽 *शरद कोकास* ✍🏽



HELEN OF TROY 

अब तक आपने पढ़ा यह अस्सी के दशक की बात है । प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के छात्र शरद,रवीन्द्र,अजय,अशोक,किशोर और राममिलन उज्जैन के निकट दंगवाड़ा नमक स्थान पर एक ताम्राश्म्युगीन साईट पर उत्खनन के लिए पहुँचे हैं । ठण्ड का मौसम है, चम्बल नदी के किनारे जंगल में उनका कैम्प लगा है । सुबह सुबह नहाने धोने वे लोग चम्बल के घाट पर जाते हैं । आज शिविर में उनका दूसरा दिन है और अभी काम शुरू नहीं हुआ है दो दिनों से उन लोगों की गपशप चल रही है जिसमे अब तक हरक्युलिस, हनुमान, और मिस्त्र के पिरामिडों पर वे चर्चा कर चुके हैं ।

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आप यह सब पढ़ ही चुके हैं । अगर यह रोचक भाग आप न पढ़ पायें हों तो भाग एक, दो, और तीन, ज़रूर पढ़ें । इस डायरी का मज़ा बिलकुल शुरू से ही पढ़ने में हैं ।

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चलिए, आगे बढ़ते हैं । आज आपका परिचय ग्रीक माइथोलॉजी से होगा । युवा पुरातत्ववेत्ताओं की यह सेना नहा धोकर एक तम्बू में बनी भोजनशाला में पहुँच गई है और अध्ययन शाला के प्रोफ़ेसर डॉ.सुरेन्द्र कुमार आर्य के साथ नाश्ता करते हुए गपशप चल रही है । आज की डायरी में आप लोगों के लिए कुछ नक़्शे और चित्र भी हैं इन्हें देखिये आनंद आएगा । आज होमर के महाकाव्य इलियड के पात्रों और ट्रॉय के युद्ध पर चर्चा है । 

           4⃣ *भाग -चार*  4⃣

  💃🏼 *वो हेलनवा का क्या हुआ* 💃🏼

शीघ्र ही तैयार होकर हम लोग भाटी जी की भोजनशाला में पहुँच गए । नाश्ते में मालवी स्टाइल में बना गर्मागर्म पोहा हमारा इंतजार कर रहा था । हमने अपनी अपनी प्लेट में पोहा लिया और लौंग की नमकीन, अमचूर के पाउडर, और हरे धनिये से उसकी गार्निशिंग करने लगे । राममिलन भैया को भूख ज़्यादा लगी थी और इससे ज़्यादा उत्सुकता हेलेन के बारे में जानने की थी ।उन्होंने सीधे चम्मच भर पोहा मुँह में डाला और आर्य साहब से सवाल किया "सर वो आप हेलनवा के बारे में कुछ कह रहे थे, हम तो सिर्फ एक सनीमा वाली हेलन को जानते हैं ..ऊ.. पिया तू अब तो आजा वाली ..ई कऊन सी हेलन है ?"

हिंदी फिल्मों की अभिनेत्री हेलेन 

आर्य साहब ने मुस्कुराते हुए कहा " नहीं भाई, हम जिस हेलेन के बारे में कह रहे थे वह प्राचीन ग्रीक की हेलेन है । अब इसके लिए मुझे आप लोगों को होमर के महाकाव्य इलियड की पूरी कथा ही सुनानी पड़ेगी । " बिलकुल सर बताइए ना । " अजय ने भी उत्सुकता दिखाते हुए कहा । डॉ.आर्य ने अपनी घड़ी देखी और ट्रेंच पर पहुँचने के समय का अंदाज़ लगते हुए कहना शुरू किया "हेलेन और ट्रॉय के युद्ध की यह कथा हमें यूनान के प्रसिद्ध कवि होमर के महाकाव्यों में मिलती है । प्रसिद्ध इतिहासकार हेरोडोटस ने होमर का काल आठ सौ पचास ईसा पूर्व के लगभग बताया है ।  महाकवि होमर ने दो प्रसिद्ध महाकाव्य ‘इलियड’ और ‘ओडीसी’ की रचना की है  । 




"सर ये वही होमर हैं ना जो हमारे यहाँ के सूरदास की भांति दृष्टिबाधित थे?" रवीन्द्र का सवाल था । सर ने प्रशंसा के भाव में सिर हिलाया " बिलकुल ! होमर के बारे में कहा जाता है कि वे एक निर्धन नेत्रहीन कवि थे और उन्होंने कुछ यथार्थ में अपनी कल्पना का सम्मिश्रण कर यह दो महाकाव्य रचे । वे अपनी रचनाओं का यूनान के विभिन्न राज्यों और नगरों में गायन भी किया करते थे । 

    मौखिक परंपरा से होती हुई लगभग ईसापूर्व छठी शताब्दी में उनकी यह साहित्यिक कृति लिखित रूप पा सकी जिसमे बाद में और परिवर्तन हुए । प्राचीन यूरोप में होमर की लोकप्रियता का अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि सिकंदर अपनी मंजूषा में 'इलियड' की एक प्रति हमेशा रखता था और समय समय पर राजनीति में उससे उद्धरण भी दिया करता था ।यह बाइबिल के बाद सबसे अधिक लोकप्रिय कृति थी । एक तरह से यह यूनानियों का धर्मग्रंथ ही था ।"

महाकवि होमर 

"सर आगे भी तो बताइये। " अजय की उत्सुकता बढती जा रही थी । आर्य साहब फिर मुस्कुराए और कहने लगे "भाई,तुम्हें बड़ी जल्दी है हेलेन के बारे में जानने की । पहले पूरी कथा और इसके पीछे का इतिहास तो जान लो । इतिहास के विद्यार्थियों को कोई भी साहित्यिक कृति पढ़ते हुए भी पूरे  इतिहास बोध से लैस होना चाहिए उसी तरह साहित्य के विद्यार्थियों को भी साहित्य पढ़ते हुए साहित्य के और देश दुनिया के इतिहास के बारे में जानना चाहिए ।" 

सर की बात सुनकर अजय थोड़ा सा झेंप गया । आर्य साहब ने उसकी ओर ध्यान न देते हुए आगे का बखान शुरू किया " दरअसल 'इलियड' की कथा ट्रॉय और स्पार्टा इन दो प्राचीन राज्यों के युद्ध की कहानी है इसलिए सबसे पहले थोडा बहुत मैं तुम लोगों को इन राज्यों के बारे में बताना चाहता हूँ । ट्रॉय जिसे प्राचीन यूनानी भाषा में इलियोस या इलियोन भी कहते हैं , यूनान से पश्चिम में इजियन सागर के तट पर बसा एक शहर था । 

    कहा जाता है कि यूनानियों के देवता डारडेनस ने आइडा पर्वत की तलहटी में सर्वप्रथम डारडेनिया नामक नगर बसाया था । इसी डारडेनस के वंशज राजा ट्रोस के तीन बेटे हुए इलस, एसरेकस और गेनिमिडिज़ । इनमें से इलस या इलियास ने इसी स्थान पर आइडा पर्वत कि ढलान पर ट्रॉय नगर की स्थापना की थी, इसलिए ट्रॉय नगर को  इलियम भी कहते हैं । होमर के महाकाव्य 'इलियड' का नाम इसी 'इलियम' के नाम पर है ।"

आर्य सर ने एक नज़र युवा चेहरों पर डाली । सब बहुत ध्यान से यह आख्यान सुन रहे थे । उन्होंने आगे कहना शुरू किया "ट्रॉय के निकट ही यूनान में स्पार्टा का राज्य था । ट्रॉय और स्पार्टा इन दोनों राज्यों के बीच एजियन सागर था और आज के हिसाब से इन दोनों के बीच की दूरी साढ़े छह सौ किलोमीटर थी । स्पार्टा में टेंटेलस का वंश चलता था । टेंटेलस के पौत्र एट्रियस के एगमेनन और मेनेलियस  यह दो पुत्र हुए  । 

    इसी स्पार्टा के राजा मेनेलियस की पत्नी थी हेलेन । वह अपूर्व सुंदरी थी । ट्रॉय के राजा इलस के प्रपौत्र राजकुमार पैरिस ने स्पार्टा की रानी हेलेन के अभूतपूर्व सौन्दर्य के बारे में सुन रखा था । वह सौन्दर्य की देवी एफ्रोडायटी की प्रेरणा से यूनान देश की यात्रा पर निकला और स्पार्टा पहुंचा । अब यहाँ एक उपकथा और  है ।  तुम लोग कहो तो वह कथा भी तुम्हें सुनाऊँ ? " " हाँ,हाँ सर, ज़रूर सुनाइये " हम सभीने एक साथ कहा । कहानी में हेलेन का प्रवेश हो चुका था और हम लोगों की उत्सुकता में वृद्धि हो गई थी ।

"तो सुनो" सर ने कहा " वैसे मैं तुम लोगों को बताना चाहता हूँ कि ग्रीक माइथोलॉजी की कथाओं में एक विशेषता यह है कि यहाँ भी देवी-देवता मनुष्यों के साथ युद्ध में भाग लेते हैं, उनसे विभिन्न कार्य करवाते हैं, उनके साथ उनके प्रणय सम्बन्ध और विवाह भी होते हैं ।" "मतलब देवी-देवताओं के मनुष्यों से प्रेम सम्बन्ध ?" अशोक ने अपनी जिज्ञासा प्रकट की । "हाँ" आर्य सर ने कहा ऐसा ग्रीक माइथोलॉजी में है । पेरिस मनुष्य था और एफ्रोडायटी देवी से उनके संबंधों के बारे में एक कथा है ।" 

राजकुमार पेरिस 

"एक बार समुद्रदेव नीरियस की बेटी थेटिस और यूनानी योद्धा पीलियस के विवाह के अवसर पर सब देवता इकठ्ठे हुए । लेकिन कलह की देवी एरिस को वहाँ आमंत्रित नहीं किया गया सो उसने वहाँ कलह फैलाने के उद्देश्य से सोने का एक सेब रख दिया जिस पर लिखा था 'सबसे रूपवती के लिए' । सो सबसे लावण्यमयी कहलाने के लिए देवियों में होड़ लग गई । इस प्रतियोगिता में तीन देवियाँ हेरा, एथिनी और एफ्रोडायटी  शामिल हुई ।"

हेरा, एथिनी और एफ्रोडायटी

"मतलब यह कि उस समय भी मिस यूनिवर्स टाइप की प्रतियोगिता होती थी ?" अजय ने सवाल किया । "हाँ बिलकुल" आर्य सर ने कहा । " ट्रॉय के राजा इलस के प्रपौत्र राजकुमार पैरिस को इस प्रतियोगिता का निर्णायक बनाया गया इसलिए कि उस समय पैरिस की ख्याति उदार और निष्पक्ष व्यक्ति के रूप में थी । तीनों देवियाँ स्केमेंडर नदी में स्नान के पश्चात  पैरिस के सन्मुख पूर्णतया निर्वस्त्र स्थिति में प्रकट हुई । अपने पक्ष में निर्णय देने के लिए हेरा ने उसे दुनिया पर शासन का ,एथिनी ने ज्ञान और विवेक का तथा एफ्रोडायटी ने उसे संसार की सबसे रूपवती स्त्री हेलेन को प्रदान करने का प्रलोभन दिया ।" 

"वैरी गुड मतलब उस समय भी भ्रष्टाचार चलता था ।" अशोक त्रिवेदी ने बीच में ही कहा  । "बिलकुल ! " आर्य सर ने कहा "अब पैरिस को न दुनिया पर शासन करने की इच्छा थी न उसे ज्ञान और विवेक की आवश्यकता थी मतलब न वह साम्राज्यवादी था न ज्ञानपिपासु था बल्कि रूप का लोभी था इसलिए उसके मन में हेलेन को पाने की इच्छा बलवती हो गई सो पैरिस ने एफ्रोडायटी  के पक्ष में सबसे रूपवती होने का निर्णय दे दिया । दरअसल यही निर्णय ट्रॉय के युद्ध का बीज साबित हुआ । हेरा और एथिनी यह दोनों देवियाँ पैरिस के इस निर्णय से क्रोधित हो गईं और ट्रॉय के युद्ध में उन्होंने पेरिस के विरुद्ध स्पार्टा का साथ दिया और ट्रॉय नगर को नष्ट कर दिया ।

"लेकिन सर यह युद्ध कैसे हुआ ?" अजय ने सवाल किया " हाँ वही बता रहा हूँ ।" सर ने कहा " फिर वह एक दिन ट्रॉय का राजकुमार पेरिस एफ्रोडायटी  की प्रेरणा से स्पार्टा पहुँच गया । उसका भव्य स्वागत किया गया, आखिर वह पड़ोसी देश का राजकुमार था । लेकिन जैसे ही उसने रानी हेलेन को देखा उस पर उसका दिल आ गया और वह अपनी सुध-बुध खो बैठा । इस बीच कुछ दिनों के लिए हेलेन का पति राजा मेनेलियस किसी काम से स्पार्टा से क्रीट द्वीप गया हुआ था सो मौका देखकर पैरिस उसकी पत्नी को लेकर भाग गया । अपने राज्य ट्रॉय में पहुँचाने पर उसका भव्य स्वागत किया गया जैसे दूसरे की पत्नी का अपहरण करके उसने कोई बड़ा काम किया हो ।“ 

पेरिस का स्वागत 

राममिलन भैया से रहा नहीं गया और उन्होंने आश्चर्य से अपनी आँखे फाड़कर कहा “ जो भी हो यह काम उसने बहुत ग़लत किया दूसरे की लुगाई को भगाकर ले जाने में कौनो शान की बात है भैया ? हमरे यहाँ रामायण में ओ ससुरा  रावण भी इही किया रहा जौन की सजा उसे मिली। रामजी ने उसका काम तमाम कर दिया ।अब समझे इसी कारण वहाँ ट्राई की लड़ाई हुई होगी । तो नई बात का है ..ई तो हमरे रामायण जैसी ही कथा है । “ रवीन्द्र ने कहा " हो सकता है भैया ,अलग अलग देशों के महाकाव्यों में भी कुछ कथाएं होती हैं जो एक जैसी लगती हैं ।" 

सीता हरण 

डॉ.आर्य ने अपनी बात जारी रखी ”राममिलन ठीक कह रहे हैं,  युद्ध का कारण यही था । मेलेनियस जब लौटकर आया  तो हेलेन को अपने महल में न पाकर दुखी हो गया और उसने उसे वापस पाने के लिए ट्रॉय पर आक्रमण की योजना बनाई । उसने यूनान के तमाम कबीलों से इसके लिए मदद मांगी । जब हेलेन और मेलेनियस का विवाह हुआ था उस समय आसपास के तमाम राजा उस अवसर पर पधारे थे और उन्होंने आश्वासन दिया था  कि कोई भी मुसीबत आने पर वे उसका साथ देंगे सो वे सब लोग उसके साथ हो गए । इस तरह अस्त्र शस्त्र से सुसज्जित होकर स्पार्टा की सेना ने ट्रॉय पर आक्रमण के लिए कूच किया ।"

"अब देखिये यहाँ यह होता है कि देवता भी परोक्ष रूप से इस युद्ध में कैसे हस्तक्षेप करते हैं ।" आर्य सर ने बात आगे बढ़ाई । "ट्रॉय जाते हुए रास्ते में उन्हें अनेक बाधाएँ भी मिलीं जैसे पवन देवता उनके प्रतिकूल हो गए । फिर उन्होंने उन्हें प्रसन्न करने के कुछ उपाय किये और अंततः वे लोग सागर के मार्ग से ट्रॉय  पहुंचे । ट्रॉय  नगर एक पहाड़ी पर स्थित था और उसके चारों ओर पत्थर की दीवार थी । मेलेनियस की सेना ने अपना शिविर सागर तट पर स्थापित किया और अपने सेना नायकों के नेतृत्व में ने ट्रॉय पर आक्रमण कर दिया । ट्रॉय वासियों ने जमकर उनका मुकाबला किया । 

    यूनानी दस वर्ष तक ट्रॉय को घेरे रहे । इस बीच उनके अनेक योद्धा भी मारे गए । स्पार्टा के यूनानियों का प्रमुख योद्धा एकीलीज था जिसका युद्ध ट्रॉय के योद्धा हेक्टर से हुआ । कहते है एकीलीज एड़ी में तीर लगने से मरा, उसकी माँ थेटिस ने जो एक देवी थी बचपन में उसे एड़ी पकड़कर पवित्र स्टिक्स नदी में नहलाया था जिसके कारण एड़ी के अलावा उसका सारा शरीर कठोर बन गया था। ” “ अरे ! “ राममिलन ने कहा “ ऐसी ही कथा हमारे यहाँ दुर्योधन की भी तो है महाभारत में । “ 

एकीलीस की माँ 

डॉ. आर्य ने अपनी कथा जारी रखी...“ हो सकता है ,पौराणिक कथायें एक सभ्यता से दूसरी सभ्यता में आती जाती रहती हैं । आगे सुनो .. इस बीच हेलेन का अपहरण करने वाला पेरिस भी मारा गया । क़ायदे से युद्ध बंद हो जाना चाहिए था और ट्रॉय वासियों को उन्हें हेलेन को सौंप देना चाहिए था लेकिन ट्रॉय के निवासी त्रोज़नो के हौसले तब भी बुलंद थे, वे स्पार्टा वासियों को ट्रॉय नगर में प्रवेश करने से रोकते रहे । जब स्पार्टा वासी यूनानी युद्ध में उन्हें नहीं हरा सके तो उन्होंने एक चाल चली ।" 

हम सब आर्य सर की बातें बहुत ध्यान से सुन रहे थे .."स्पार्टा के एक योद्धा ओडीसीयस की सहायता से  उन्होंने लकड़ी का एक विशालकाय घोड़ा बनाया जिसमें सबसे निचले भाग में एक खोखला स्थान रखा गया । इस भाग में यूनानी सैनिक अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर छुप गए । बाकी सभी वापस लौटने का दिखावा करते हुए पास के एक द्वीप पर चले गए  । घोड़ा उन्होंने नगर द्वार पर रख दिया । रात में ट्रायवासी अपने आप को जीता हुआ मानकर और यह सोचकर कि स्पार्टा के सैनिक वापस लौट गए हैं घोड़ा नगर के भीतर ले आए और राग-रंग और जीत के जश्न में डूब गए  । 

    मौका देखकर उसमें छुपे हुए सैनिक बाहर निकले, उन्होंने ट्राय के सारे पुरुषों को मार डाला और स्त्रियों को बन्दी बना लिया तथा पूरे नगर में आग लगा दी । उसके बाद वे विजयोल्लास के साथ वापस स्पार्टा लौट गए  । यह पूरी योजना ओडिसियस नामक वीर योद्धा ने बनाई थी । नेत्रहीन कवि होमर ने अपने महाकाव्य  ‘ओडीसी’ में इसी ओडिसियस के वापस लौटने का वर्णन किया है । ‘इलियड’ में युद्ध की उत्तर कथा और सेना के वापस लौटने का वर्णन है । “


अजय ने सवाल किया ” लेकिन सर, ऐसा क्या सचमुच में घटित हुआ था ?“ डॉ.आर्य ने बताया “ होमर के महाकाव्य में पौराणिक कथायें,दंतकथाएँ व लोककथायें इतनी  हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक तक लोग इन्हें पूरी तरह काल्पनिक ही मानते रहे लेकिन हेनरिख शिलेमान और आर्थर ईवान इन दो जर्मन पुरातत्ववेत्ताओं ने सन 1868 में  एशियाई कोचक में या वर्तमान टर्की में सागर तट के पास हिसारलिक नामक टीले की खुदाई की है । । यहाँ विभिन्न कालों की अनेक बस्तियों के साथ ट्राय के खन्डहर भी मिले हैं जिनके  अनुसार इतिहासकारों ने ट्राय पर यूनानी हमले की तिथी कोई 1200 ई.पू. तय की है । पर्याप्त प्रमाण न होने के कारण बहुत से इतिहासकार अभी भी इसे ऐतिहासिक घटना नहीं मानते हैं । हाँलाकि पुरावेत्ताओं का काम अभी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा है और इसमें अभी बहुत विवाद है ।“

हिसारलीक 

“लेकिन सर जी वो हेलनवा का क्या हुआ ? 

राम मिलन इलाहाबादी ने सवाल किया ।“ अरे यार ,तुम अभी हेलेन पर ही अटके हो ? “ अजय ने कहा ” अरे उसी की वज़ह से तो यह युद्ध हुआ था, बताया तो सर ने वे लोग वापस लौट आये, अब वापस लौटेंगे तो ख़ाली हाथ थोड़े आयेंगे, हेलेन को लेकर ही आयेंगे ना । अगर उसको वापस लाना न होता तो युद्ध काहे होता । “ मतलब हमारी सीता मैय्या जैसी ही कहानी है क्या ? ” राम मिलन ने पूछा । 

“और क्या” आर्य सर ने कहा “भाई पौराणिक कथाएँ  और महाकाव्यों की कथाएँ तो सभी देशों में लगभग एक जैसी ही हैं ,बस देवी देवताओं,राजाओं और स्थानों के नाम देश-काल के अनुसार अलग अलग हैं ।” “लेकिन सर, कथाओं में जो है वैसा क्या सचमुच में घटित हुआ है ?” अजय ने पूछा । “भाई यही सच और झूठ में अंतर  ढूंढने का काम ही तो हम पुरातत्ववेत्ताओं का है, लेकिन विडम्बना है कि लोग यहाँ भी पूर्वाग्रह से काम लेते हैं ।” आर्य सर ने लम्बी साँस लेते हुए कहा फिर उठने का इशारा करते हुए बोले ” खैर छोड़ो इस विषय पर बाद में बात करेंगे । अब यूनान से वापस अपने देश में आ जाओ और मालवा की ताम्राश्मयुगीन सभ्यता की खोज में टीले पर चलो । ” हम लोग उठे और अपनी नोटबुक्स उठाकर टीले की ओर चल पड़े ।


🔲 *शरद कोकास* 🔲


शुक्रवार, 8 मई 2026

दास को इसलिए जला दिया कि पृथ्वी पर वर्षा हो


प्राचीन ममी 

मेरा स्नान तो बस पाँच मिनट में संपन्न हो गया। बाहर आते हुए मैंने रवीन्द्र से कहा,“तुम भी जल्दी बाहर आ जाओ। हम लोग नहाने के बाद कुछ देर नदी के आस-पास एक्स्प्लोर करेंगे,अब यहाँ पिरामिड तो मिलेगा नहीं क्या पता चीन की पीली नदी व्हांगहो के तट पर मिली कब्रों की तरह कोई प्राचीन कब्र मिल जाए।”“वहाँ शायद दूसरी शताब्दी ईसापूर्व की कब्रें मिली हैं ना?” रवीन्द्र ने पानी से बाहर आते हुए पूछा। “हाँ।” मैंने कहा,“और उनमें जो शव मिले हैं वे चटाईयों में लिपटे हैं, आश्चर्य की बात कि इनके पास भी घडा, अन्य पात्र और खाने पीने की वस्तुएं रखी हैं। मतलब मरणोपरांत जीवन की मान्यता यहाँ भी थी। इसके अलावा भी बहुत सारी कब्रें मिली हैं जो ज़मीन के नीचे बने मकानों जैसी हैं, इनमें ताबूत के इर्द-गिर्द सोने के ज़ेवर,युद्ध के हथियार,पत्थर और कांसे के बर्तन भी मिले हैं। इसके अलावा उनके आसपास सैकड़ों कंकाल भी मिले हैं।”
रवीन्द्र ने टॉवेल लपेटते हुए कहा,“इसका कारण यह रहा होगा कि चीन में उस वक्त दास प्रथा थी, और वहाँ भी मिस्त्र के फराओं की तरह मृतक की आत्मा की सेवा करने के लिए मृतक के साथ कई दास दासियों को भी दफ़ना दिया जाता था। कहते हैं ऐसे दासों को दफनाने से पहले उनका सर काट दिया जाता था और हाथ पैर बांध दिए जाते थे। कभी कभी उन्हें जला भी दिया जाता था। पुरातत्त्ववेत्ताओं को उस काल की हड्डी से बनी एक पट्टिका मिली है जिस पर लिखा है कि “दास को इसलिए जला रहे हैं कि पृथ्वी पर वर्षा हो।”“ ठीक कह रहे हो।” मैंने कहा,“इस क्रूरता के पीछे कारण यही था कि हमारे देश की तरह वहाँभी अकाल और बाढ़ के भय से लोग भयभीत हो जाते थे। वे वायु, वर्षा और नदियों को अपना देवता मानते थे और वे रुष्ट न हों इसलिए या उन्हें प्रसन्न करने के लिए दासों की बलि चढ़ाया करते थे।”
चीन की दीवार 
“यार, चीन का ज़िक्र जब भी आता है तो उसकी दीवार की बात होती है। यह दीवार कब बनी?”अजय का ध्यान हमारी बातों के केन्द्रीय विषय पर नहीं था लेकिन संवाद में चीन शब्द सुनकर उसने यह सवाल किया। मैंने बताया,“यह भी उसी दौर की बात है। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में चीन में कई राज्य थे जिनमे चीन राज्य सबसे शक्तिशाली था। तत्कालीन राजा ने अन्य राजाओं की आपसी कलह का लाभ उठाकर समस्त चीन पर आधिपत्य कर लिया और स्वयं 'चिन शिह ह्वान्गति' की उपाधि धारण की। इस समय उत्तर से खानाबदोश 'हूँ' कबीले लगातार आक्रमण करते थे और गाँवो और नगरों को लूट लेते थे। इन कबीलों के आक्रमण से चीन की रक्षा करने के लिए उसने चार हजार किलो मीटर लम्बी दीवाल बनाई। इसकी चौड़ाई इतनी थी कि इस पर पांच घुड़सवार एक साथ दौड़ सकते थे।”

अशोक नदी के जल में कमर तक पानी में खड़ा था, उसने इतिहासकारों के पुरखे हेरोडोटस का नाम लिया और पानी में डुबकी लगा दी। “जय बाबा हेरोडोटस की।”वह एक मिनट में ही बाहर आ गया। देर हो रही थी इसलिए उसके बाहर आते ही हम लोगों ने अपने गीले अंतर्वस्त्र और अन्य प्रक्षालन सामग्री उठाई तथा नदी किनारे एक्सप्लोरेशन की योजना स्थगित करते हुए शिविर की ओर निकल पड़े।
हेरोडोट्स
भोजन स्थल और पाकशाला के निकट डॉ.सुरेन्द्र कुमार आर्य सूर्य की कोमल रश्मियों का आनंद लेते हुए खड़े थे। वे अलसुबह ही नहा धोकर आ चुके थे। उन्होंने हम लोगों के भीगे बदन और भीगे केश देखकर टिप्पणी की,“तुम लोगों को देखकर ऐसा लग रहा है जैसे यूनानी सेना समुद्र से निकलकर ट्राय के युद्ध में शामिल होने आ रही है।”“क्यों मज़ाक कर रहे हैं सर..” मैंने कहा,“बिना हेलेन के कैसी सेना और कैसा युद्ध?” रवीन्द्र ने चुटकी लेते हुए कहा “अबे, तुझे यहाँ जंगल में हेलेन कहाँ मिलने वाली है? चुपचाप वस्त्र धारण करो और शीघ्रता पूर्वक अल्पाहार हेतु भाटीजी की पाकशाला में उपस्थित हो जाओ।”“ठीक है जैसी पंचों की राय।” कहकर हम लोग कपडे बदलने के लिए तम्बू के भीतर घुस गए।

आपका 
शरद कोकास 

बुधवार, 6 मई 2026

मोहनजोदाड़ो के स्नानागार से नहाकर निकली थी वह

दंगवाड़ा पुरातात्विक उत्खनन कैम्प की यह हमारी पहली सुबह थी । रात का साम्राज्य समाप्त हो चुका था और वह दिवस के जनतंत्र में सूरज को पहला प्रधानमंत्री घोषित कर वापस अपने देश जाने के लिए तत्पर थी । हम लोग रजाई के भीतर सिमटे हुए पेट से लगाये अपने घुटनों को सीधा करते हुए हुए गहरी नींद से जागने की कोशिश में थे और दुष्यंत का वह मशहूर शेर झुठला रहे थे .."न हो कमीज़ तो पांवों से पेट ढँक लेंगे ,ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए " कमीज़ क्या हमारे पास तो रज़ाई भी थी । बावज़ूद इसके ठंड से बचने के लिए मनुष्य के द्वारा किये जाने वाले इस नैसर्गिक उपाय के हम अपवाद नहीं थे । सफ़र की तो अभी शुरुआत ही हुई थी ।

ऐसा ही कुछ घाट था चम्बल का 
यही कोई छह बज रहा होगा । सुबह का हल्का सा उजाला किसी झिर्री से हमारे तम्बू रूपी बेडरूम में ताकझाँक करने की कोशिश में था । मैंने समय देखने के लिए उस धुंधलके में घड़ी पर निगाह डाली ही थी कि अचानक डॉ.वाकणकर की गरजती हुई आवाज़ सुनाई दी..” उठो रे सज्जनों.. । ” रवीन्द्र की नींद आदतन पहले ही खुल चुकी थी और वह बिस्तर में पड़ा पड़ा कुनमुना रहा था । उसने

रज़ाई फेंकी और हम सब को हमारी कुम्भकर्णी नींद से हिला हिला कर जगाया । हम लोग मधुमक्खियों की तरह भुनभुनाते हुए अपनी छत्तेनुमा रज़ाईयों से बाहर निकले । अपने बैग से टुथपेस्ट, ब्रश, टॉवेल, अंडरवियर,बनियान प्रक्षालन के सारे ज़रूरी सामान निकाले और नदी की ओर चल पडे । अशोक त्रिवेदी का मामला तो बगैर सिगरेट सुलगाये पिघलता ही नहीं था सो उसके पास यह अतिरिक्त वस्तु । रही बेड टी की बात तो उतने सभ्य हम लोग हुए नहीं थे ।

    चम्बल के पास किसी ज़माने में निर्मित पत्थरों का एक घाट जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मौज़ूद था । मोहनजोदाड़ो के चर्चित स्नानागार के स्थापत्य की कल्पना करते हुए उसे ही हम लोगों ने स्नानागार के रूप में प्रयुक्त करना उचित समझा । शौच के लिए किसी सरकारी शौचालय की व्यवस्था तो थी नहीं, न ही आठ दस लोगों के लिए टेम्पररी शौचालय बनाने का कोई प्रावधान था सो इस प्राकृतिक कार्य को संपन्न करने के लिए हम लोग प्रकृति प्रदत्त शौचालय अर्थात मैदान की ओर निकल गए और वहाँ स्थित झाड़ियों के पीछे अपनी पोज़ीशन सम्भाल ली । 

    घाट पर जाते हुए अपना अपना लोटा ,मग्गा या टिन का डिब्बा साथ ले जाने की हिदायत हमें पहले ही मिल गई थी । घाट पर लौटकर ब्रश करते हुए झाग भरे मुँह से हम लोगों ने नदी के महात्म्य पर चर्चा प्रारंभ की । आज की प्रातःकालीन चर्चा का शीर्षक था बस्तियाँ नदी के पास ही सबसे पहले क्यों बसीं ।

    रवीन्द्र ने एक निगाह चम्बल नदी की अथाह जल राशि पर डाली और कहा " अहा .. कितना सारा जल है नदी में.. नहाने में मज़ा आ जायेगा । अजय ने नहाने की बात सुनते ही अपने शरीर में झुरझुरी पैदा करते हुए अपने बाह्य अंग सिकोड़े और कहा " बाप रे , इतनी सुबह ठंडे पानी से कौन नहायेगा "

     रवीन्द्र ने कहा " अरे डरपोक , पानी में उतरकर तो देख, सुबह सुबह नदी का जल गर्म रहता है । फिर बिना नहाये ज़िन्दगी का क्या आनंद । अजय ने कहा " यार , आनंद की छोड़ यह बता अगर पृथ्वी पर पानी नहीं होता तो हम लोग कैसे नहाते ?" 

    रवीन्द्र ने कहा " कैसी मूरख जैसी बात करता है ,अगर पृथ्वी पर जल नहीं होता तो यह जीवन भी नहीं होता । वैसे तो हम रोज़मर्रा की बातचीत में 'जल ही जीवन है ' इस वाक्य का हमेशा प्रयोग करते हैं लेकिन हमें यह ख्याल नहीं आता कि अगर पृथ्वी पर जल नहीं होता तो यहाँ जीवन संभव ही नहीं था ।" वो कैसे भाई ? " अजय ने सवाल किया ।

    रवीन्द्र ने जवाब दिया .." यह तो तुम जानते हो कि जीवन का अर्थ शरीर में प्रोटीन की अनिवार्य उपस्थिति है । हमारा शरीर कई प्रकार के एमिनो एसिड्स या प्रोटीन से बना है जो जीवन का एक प्रमुख कारण है और यह जीवन पूरे सौर परिवार में केवल पृथ्वी पर ही है । अन्य किसी ग्रह पर जीवन नहीं है । हमारे सौर परिवार में केवल पृथ्वी पर ही जीवन इसलिए संभव हो सका कि प्रोटीन की एंजाइमी किया के लिए मुक्तजल की उपस्थिति अनिवार्य थी और वह पृथ्वी पर पहले से ही मौजूद था । 

    इस तरह जल जीवन के निर्माण का पहला तत्व है । हमारी पृथ्वी सूर्य से न अधिक दूर है न अधिक पास, इस वज़ह से यहाँ वाष्पीकरण के पश्चात भी काफी जल शेष रह जाता है । यही कारण है कि वैज्ञानिक चन्द्रमा और मंगल पर जीवन की सम्भावनाओं से पहले पानी की तलाश कर रहे हैं ।"

    अजय सुबह सुबह इतना वैज्ञानिक प्रवचन सुनने के लिए तैयार नहीं था । उसने अपने दोनों कानों में उँगलियाँ ठूंस ली । मैं उसकी ओर देखकर मुस्कुराया । फिर मैंने रवीन्द्र की बात का समर्थन करते हुए कहा " तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो । प्रारम्भिक मनुष्य के जीवन का विस्तार भी इसी वज़ह से जल स्त्रोतों के निकट हुआ । इसका कारण यही था कि अन्य सुविधायें उपलब्ध होने के बावज़ूद जल के स्त्रोत का निकट होना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है क्योंकि जल जीवन के लिए सर्वाधिक आवश्यक वस्तु है । प्राचीन समय में प्रारंभिक बस्तियाँ जलस्त्रोत के निकट ही बसीं ।"

    "लेकिन भाई ,बस्तियाँ तो नदियों से दूर भी बसी हुई मिलती हैं ?" अजय हमारे वार्तालाप से उतना भी निर्लिप्त नहीं था जैसा कि मैं सोच रहा था । "हाँ ऐसा इसलिए हुआ ।" मैंने अजय से कहा " कि कालांतर में जब नदियों का प्रवाह दूर होता गया तो उसके अनुसार बस्तियाँ भी दूर होती गईं । आज भी उत्खनन में अनेक बस्तियों में प्राप्त वस्तुओं पर पानी के निशान मिलते हैं ,साथ ही चिकने गोल पत्थर या नौका जैसे अनेक प्रमाण भी मिलते है जिन्हें देखकर ज्ञात होता है कि पहले कभी यहाँ नदी रही होगी । यह बात ध्यान में रखने लायक है कि प्रारंभिक सभ्यताएं सिन्धु नदी या दज़ला फरात और नील नदी के कांठे में बसी हुई थीं । आज भी तुम देख सकते हो कि विश्व के तमाम बड़े शहर नदियों के किनारे ही बसे हुए हैं ।"

    बात चल ही रही थी कि राममिलन भैया आते हुए दिखाई दिए । “ अरे तुम कहाँ चले गए थे भाई ? ”अशोक त्रिवेदी ने उनसे प्रश्न किया । “यहाँ हम लोग नहाने की तैयारी में हैं और तुम्हारी लोटा परेड अभी तक चल रही है ?”

     “भाईसाहब, आप लोग तो बेशरम हो, कहीं भी निपट लेते हो ..मुझे तो आड़ के लिए कोई पिरामिड जैसी चट्टान चाहिये थी । ” राममिलन ने कहा । हम लोग हँसने लगे “ अच्छा तो अब पिरामिड का यही उपयोग बचा है ?” अजय ने पूछा । ”तो मिला कोई पिरामिड ?” मैंने हँसकर कहा ”भाई ,यहाँ कहाँ मिलेगा,सारे पिरामिड तो मिस्त्र में हैं यहाँ तो बस चम्बल की घाटियाँ मिलेंगीं । ”

    बात नदी से निकलकर अब पिरामिड पर आ गई थी । हम लोग भले ही प्राचीन भारतीय इतिहास के विद्यार्थी हैं लेकिन समकालीन वैश्विक इतिहास जानना भी हमारी अनिवार्यता है सो पिरामिड्स के बारे में भी हम लोग पढ़ ही चुके थे । अजय ने मिस्त्र के पिरामिडों का ज़िक्र करते हुए सवाल किया ”यार, यह खुफू का पिरामिड कबका है ?” सारे छात्रों में घटनाओं का काल सबसे अधिक मुझे ही याद रहता है,मैंने बताया..”लगभग छब्बीस सौ ईसा पूर्व का ।"
खुफू का पिरामिड 

"आश्चर्य है न..," अजय ने ऑंखें फाड़ते हुए कहा .." इतने वर्षों से यह पिरामिड जस का तस खड़ा है .. मतलब यह तो ताजमहल से भी काफी पहले का है ।" रवीन्द्र ने कहा .."अरे ताजमहल की और ख़ुफु के पिरामिड की कैसी तुलना, दोनों का काल और स्थापत्य बिलकुल अलग अलग हैं । ताजमहल तो अभी इसी सहस्त्राब्दी का है ।" 

    " तुलना की बात नहीं है भाई " अजय ने कहा " आख़िर है तो दोनों कब्र ही । लेकिन यह भी हैरानी की बात है कि पहले के राजा लोग अपनी कब्र के लिए इतनी विशाल इमारतें बनाते थे । मरने के बाद भी भला कोई देख पाता है कि उसकी कब्र कैसी है ।

मैंने कहा " हाँ मरने के बाद तो वाकई कोई नहीं देख पाता कि उसकी देह का क्या हुआ ,उसे कहाँ दफनाया गया इसीलिए प्राचीन मिस्त्र में वहाँ के राजाओं यानि फराओं द्वारा जीते जी अपनी कब्र का निर्माण किया जाता था । उस समय तक अंतिम संस्कार की विधियाँ तय हो चुकी थीं और मृत्यु के बाद जीवन जैसे विषयों पर भी विचार होने लगा था । 

    इन फराओं के बारे में कहा जाता है कि ये शासक बहुत ही क्रूर होते थे । वे स्वयं को देवताओं के समकक्ष मानते थे और मृत्यु के बाद भी समस्त सुखों की कामना करते थे । उनकी ऐसी मान्यता थी कि कब्र में दफनाने के बाद एक दिन ऐसा आएगा जब वे जीवित हो उठेंगे और समस्त सुखों का उपभोग करेंगे इसलिए उनकी कब्र में उनके साथ पानी, शराब, खाने पीने की वस्तुएं,फल,अनाज ,बिस्तर, अस्त्र-शस्त्र आदि रख दिया जाता था ।"

"अजीब पागल राजा थे भाई " अजय ने कहा " अरे यह सब खाने-पीने की वस्तुएं तो कुछ ही दिनों में ख़राब हो जाती होंगी और वस्तुयें क्या खुद उनके शव भी सड़ जाते होंगे और बदबू आने लगती होगी । सड़ी हुई लाश की बदबू की कल्पना करते हुए अजय ने बहुत अजीब सा मुँह बनाया ..'आक़' ..जैसे उल्टी आ रही हो । 

ममी 

    मैंने कहा " भाई, शव को सड़ने से बचाने के लिए तो वे उन पर विशेष प्रकार का लेप लगाते थे लेकिन खाद्य वस्तुओं का वे कुछ नहीं कर सकते थे ।" "और क्या," अजय ने कहा " आज का ज़माना होता तो वे पिरामिड के भीतर बड़ा सा फ्रिज भी रख देते ।" अजय की बात सुनकर रवीन्द्र पेट पकड़कर हँसने लगा .."तू भी यार जाने क्या क्या सोच लेता है ..अरे तब तो बिजली की खोज भी नहीं हुई थी फ्रिज क्या रेत से चलता ? "

मैंने बात को गंभीर मोड़ देते हुए कहा " दरअसल इसके पीछे मरणोपरांत जीवन की एक ऐसी कामना थी जिसे उनकी सम्पन्नता पोषित करती थी । वे राजा थे इसलिए ऐसा कर सकते थे, धर्म और सत्ता दोनों उनके साथ थे ।अपनी मान्यताओं के वे ही नियामक थे । पुरोहित वर्ग भी उनके साथ था । ग़रीब जनता के लिए तो ऐसी कल्पना करना भी मुश्किल था और यही नहीं, शासकों की मृत्यु पश्चात जीवन की यह मान्यता उनसे एक ऐसा क्रूर कर्म करवाती थी जिसके बारे में आज हम सोच भी नहीं सकते हैं ।

    "ऐसा क्या करते थे भाई वे ?" अजय ने सवाल किया । मैंने कहा " उनका मानना था कि मृत्यु के कुछ समय बाद जब वे फिर से जीवित हो उठेंगे तब समस्त राजसी सुविधाओं का उपभोग करने के लिए अर्थात खिलाने -पिलाने, नहलाने-धुलाने आदि के लिए और उनके मनोरंजन के लिए उन्हें सेवकों की भी आवश्यकता होगी अतः कई बार तो उनके साथ जीवित सेवकों को, नर्तकियों आदि को भी पिरामिड में बन्द कर दिया जाता था ताकि उनके पुनः जीवित होने पर वे उनकी सेवा कर सकें ।"

    "ओह , यह तो गज़ब की क्रूरता है " रवीन्द्र ने कहा " उन बेचारे ग़रीब सेवकों का क्या दोष, इस तरह ज़िन्दा दफ़नाकर तो उन्हें जीते जी मार दिया जाता था ।" मैंने कहा .." इनकी क्रूरता के और भी किस्से हैं । इन फराओं ने अपने साम्राज्य में अनेक सभ्रांत लोगों को विभिन्न प्रदेशों का शासक नियुक्त कर रखा था । ये अधिकारी लोग सम्पति छीनने व आम जनता को यंत्रणाएँ देने का कार्य किया करते थे तथा अपनी कठोरता व क्रूरता की डींगें हांका करते थे । उनके इस कार्य के बदले उन्हें बड़े बड़े पद, जागीर व ज़मीनें मिला करती थीं । पिरामिडों के बाहर खडी नारसिंही मूर्तियाँ 'स्फिंक्स' भी इन्ही फराओं की निरंकुश सत्ता का प्रतीक है । इन विशाल मूर्तियों में आधा भाग मनुष्य का और आधा सिंह का है जो यह बताता है कि उनकी ताकत इतनी है कि वे कुछ भी कर सकते हैं । “

अचानक मुझे महसूस हुआ कि नहाने हेतु तत्पर कपड़े उतारकर सिर्फ बनियान पहने हुए ठंड में ठिठुरते अपने मित्रों को इससे ज्यादा भाषण देना ठीक नहीं है सो मैं खामोश हो गया । मुझे चुप होता देख अजय ने चुटकी ली .."मुझे तो ऐसा लगता है हमारे आज के जो सरकारी अधिकारी हैं उनमें भी फराओं के उन अधिकारियों के संस्कार आ गए हैं ।" "नो कमेन्ट" मैंने मुंह पर उंगली रखकर अजय को चुप रहने का संकेत किया ।

    “चलो चलो जल्दी नहाओ नहीं तो हमारे ‘फराओ’ नाराज़ हो जाएँगे । “रवीन्द्र ने अंततः बातों को विराम देते हुए तुरंत अपना फर्मान ज़ारी किया । “ठीक है ।” मैंने कहा । फिर हम लोग नदी में उतर गए और अपने शरीर पर पानी का लेप लगाने लगे उसी तरह जैसे फराओं के मुर्दा शरीरों पर रसायन का लेप लगाया जाता था फर्क इतना था कि हमारे जीवित शरीर पर जीवन देने वाले जल का लेप था जो हमें कई साल जीवित रखने वाला था ।

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आपका

शरद कोकास