शुक्रवार, 29 मई 2026

24 - हत्या के दृश्य की रनिंग कमेंट्री

इसे पढ़कर निश्चित ही आप दहल जाएंगे ,अगर कमज़ोर दिल वाले हों तो ना पढ़ें 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼


पूर्वकथा- रोम के उन गुलामों के जीवन का दुःख हमारे हर दुःख से बड़ा है शायद इसीलिए उनके दुःख के आगे हमारे दुःख छोटे लगते हैं । हाँ हम अपने दुखों को अभिव्यक्त कर सकते हैं लेकिन उन्हें तो अभिव्यक्ति का अधिकार भी नहीं था । इसी संसार में एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के साथ ऐसा बर्ताव कर सकता है ऐसा हम सोच भी नहीं सकते लेकिन इतिहास में इससे भी बुरा घटित हो चुका है यह बात अविश्वसनीय नहीं है । ..चलिए रोम के गुलामों की कथा का यह अंतिम भाग भी पढ़ लीजिये वर्णन थोड़ा वीभत्स है लेकिन इसे सहन तो करना पड़ेगा शायद उस दौर के गुलामों की कथा पढ़कर हम आज के दमित शोषित वर्ग का दुःख जान सकें । अगले भाग से प्रारंभ करेंगे अजंता एलोरा की यात्रा का वृतांत ।

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*भाग- चोवीस* 

*24 - हत्या के दृश्य की रनिंग कमेंट्री*  

दोपहर का भोजन संपन्न करने के उपरान्त हम लोग सीधे ट्रेंच पर आ गए । मजदूर अभी खाना खाकर नहीं आये थे और आर्य सर भी नहीं लौटे थे । हम लोग ट्रेंच के पास पसरकर बैठ गए । 

अशोक ने बात शुरू की "प्राचीन रोम के अभिजात्य वर्ग के मनोरंजन हेतु खेले जाने वाले ग्लेडिएटरों के इस ख़ूनी खेल का वर्णन रोमांचक तो है लेकिन इसका किस्सा सुनते हुए बहुत तकलीफ़ होती है ।"  “यार, तू जब इस खेल का  वर्णन कर रहा था तो मुझे लगा जैसे फ्रीगंज चौराहे पर दो दादाओं की लड़ाई का वर्णन सुना रहा हो  ।“ अजय ने कहा  । 

“नहीं ऐसा नहीं है ।“ मैंने कहा “ दादाओं की लड़ाई आपसी दुश्मनी, ज़मीन, धन या स्त्री को लेकर होती है, या अपने वर्चस्व को लेकर और आजकल तो धर्म को लेकर भी होती है लेकिन इन ग्लेडियेटर्स की तो आपस में कोई दुश्मनी नहीं है, ये विवश गुलाम केवल धनाढ्य लोगों के मनोरंजन के लिए एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं । गुंडों में और गुलामों में  बहुत फर्क होता है । हालाँकि आजकल गुण्डे भी आजकल अपने राजनैतिक आकाओं के गुलाम ही होते हैं ।" 

"हाँ चल आगे का हाल सुना ।" अशोक ने कहा " तो हम कहाँ थे ? मैंने अपने अंदाज़ में पूछा ।अजय ने कहा "पहले एक ग्लेडिएटर ने दूसरे को छुरा घोंप दिया फिर प्रत्युत्तर में दूसरे ने उस पर अपने भाले से वार किया ।

" "ओके ।" मैंने लड़ाई का पिछले वर्णन की स्मृतियों को संग्रहित करते हुए कहा  “ देखो, एरिना में लड़ते हुए उन दोनों ग्लेडिएटर में से जिसे अधिक चोट लगी है वह ज़मीन पर गिर गया है ..खून से दोनों के जिस्म तरबतर हैं .. उनकी लड़ाई देखने वाले रोम के ये रईस लोग उन्माद से पागल हो रहे हैं ...मार डालो काट डालो की आवाज़ें गूंज रही हैं .. 

इस शोर - शराबे में भी जाने कहाँ से खून पीकर जीने वाली एक चिड़िया उड़ती हुई आ गई है  और रेत पर गिरी खून की बूँदें चुग रही है । 

अब कुछ देर के लिए दोनों ठहर गए हैं,  शायद अपनी नियति के बारे में सोच रहे हैं । उन्हें पता है कि उन दोनों में से एक को अभी इसी वक़्त मरना है या क्या पता दोनों को ही  । 

"लेकिन दोनों कैसे मरेंगे मरना तो एक को ही होगा ?" अजय ने कहा । अशोक ने जवाब दिया "भाई एक को तो दूसरा अभी मार देगा लेकिन दूसरा इतना ज़ख़्मी है कि वह कभी भी मर सकता है ।" "बिलकुल ठीक ।" मैंने कहा "अब देखो ..उन्हें रुका हुआ देख कर चाबुक लिए एक उस्ताद वहाँ आ गया है और देखो उसने दोनों  की पीठ पर कोड़े बरसाना शुरू कर दिया  ..” लड़ों हरामजादों  रुक क्यों गए  ?” लड़ो,लड़ो,लड़ो,मार डालो ..काट डालो  ..”। लेकिन अगला क्या करे , उसमें तो उठने की ताकत ही नहीं है । उस्ताद अब उस खड़े हुए ग्लेडिएटर को ललकार रहा है .. मार दे इसे ..मार डाल, ख़त्म कर दे । 

वह ग्लेडिएटर ज़मीन पर पड़े ग्लेडिएटर के जिस्म पर खड़ा है, एक पांव उसके दाईं  ओर और दूसरा उसके बाईं ओर । उसकी निगाहें दर्शकों से होते हुए सबसे ऊँची कुर्सी पर बैठे हुए रोम के सम्राट पर जाकर ठहरती हैं । सम्राट एक नज़र  दर्शकों पर डालता है .. सब ओर से आवाजें आ रही हैं .. मारो, मारो, मार डालो .. 

अचानक सम्राट मुस्कुराता है और उसकी ओर से एक फरमान गूंजता है ..वह एक हाथ हवा में उठता है और अंगूठा नीचे की ओर झुका देता है .. यह संकेत है ..हत्या कर दो, मार डालो उसे । खड़ा हुआ ग्लेडियेटर दोनों  हाथों से अपना भाला हवा में ऊँचा उठाता है और ज़मीन पर पड़े हुए दूसरे ग्लेडियेटर के सीने में पूरी ताकत से भोंक देता है ।"

"भयानक उन्माद से भरी चीखें पूरे कोलोसियम में व्याप्त हैं । जनता हत्या के इस दृश्य को देखकर पागल हो गई है, उनका उन्माद चरम पर पहुँच चुका है जैसे वह उस हत्यारे ग्लेडिएटर में अपना रूप देख रही है । 

राजा का एक सिपाही उस मरे हुए गुलाम के पास पहुँचता है, वह उसके सर को हिला कर देखता है, वह गुलाम मर चुका है इस बात की तसल्ली करने के लिए वह अपनी कमर में बन्धा एक भारी हथौड़ा निकालता है और उसे उस ग्लेडियेटर की लाश की कनपटी पर जोर से मारता है  ..उफ़..इस प्रहार से मरे हुए उस गुलाम का सर फट गया है और पीला पीला भेजा निकलकर बाहर आ गया है, प्रहार इतना तेज़ था कि भेजा भी चूर चूर हो गया है और खून में लिथड़े हुए उसके कुछ टुकड़े हथौड़े पर चिपक गए हैं  । 

अब वह सिपाही बाकी अंगों को चूर चूर करने के लिए उन पर भी हथौड़ा चला रहा है,  अब वह सिपाही हथौड़ा उठाकर रोमनों का अभिवादन कर रहा है जैसे उसने बहुत बड़ा काम किया हो । इतने में अखाड़े का एक दूसरा उस्ताद एक गधा लेकर वहाँ आ गया है उसने लाश को एक ज़ंजीर द्वारा उस गधे से बांध  दिया है , चाबुक पड़ते ही वह गधा दौड़ पड़ा है और मैदान के गोल गोल चक्कर लगा रहा है ...पूरे मैदान में उस लाश से भेजे और शरीर के टुकड़े टूट टूट कर गिर रहे हैं । 

रोमन जनता आनन्द विभोर होकर हँस रही है, खिलखिला रही है, उन्माद में तालियाँ बजा रही है, सीटियाँ बजा रही है, नाच रही है । इधर कोलोसियम के कर्मचारियों द्वारा उस खूनी रेत को पलट दिया गया है और उस शेड में अब अगला जोड़ा फिर मौत के इस खूनी खेल के लिए  तैयार है । “

“बस कर ..बस कर यार …“ रवीन्द्र चीखा “बन्द कर तेरी यह रनिंग कमेंट्री ...बहुत हो गया, अब यह बर्दाश्त से बाहर है ।“ ग्लेडियेटर्स की कहानी सुनकर सभी का मन बहुत भारी हो गया था । 

मैं ख़ुद अपने आप को बहुत अपसेट महसूस कर रहा था । जाने कितने प्रश्न मेरे मन में जन्म ले रहे थे .. क्या इस तरह के ख़ूनी खेल अब भी हमारे यहाँ नहीं खेले जाते ? क्या युद्ध और दंगों में इस तरह की वीभत्स हत्याएँ नहीं होतीं ? क्या हमारे देश की जनता को धर्मयुद्धों, क्रुसेड या जिहाद के नाम पर सदियों पहले इस तरह संस्कारित नहीं कर दिया गया है कि वे दुश्मनों का बहता खून देखकर प्रसन्न होते हैं और भूल जाते हैं कि मरने वाला कोई भी हो है तो आखिर मनुष्य ही ? 

रोमन सम्राटों के इस क्रूर खेल के ज़माने से लेकर आज तक भीड़ का यह पागलपन बढ़ता ही तो गया है ? पहले यह हत्याएँ सिर्फ एक खेल के मैदान में होती थीं और अब युद्ध के मैदानों से लेकर गली, मोहल्लों और चौराहों पर होती हैं । आज भी धर्म के नाम पर, विरोध के नाम पर या अपने विचारों से सहमत न होने के कारण किसी को भी मौत के घाट उतार दिया जाता है । 

चलो अब टॉपिक चेंज किया जाए 

दंगवाड़ा की इस पुरातात्विक साईट पर हम लोगों की भूमिका केवल एक छात्र पुरातत्ववेत्ता की तरह ही है  सो हमें इन चिंताओं के अलावा भी ट्रेंच पर अपना रोज़ का खुदाई का काम तो पूरा करना ही था । ऐसी ही मनःस्थिति के साथ हम लोगों ने शेष दिवस का अपना काम पूरा किया कुछ अवशेष और ढूँढ निकाले । खैर दिन का काम निपटाया गया और शाम को फिर सिटी घूमने का प्लान बन गया । 

लौट कर आने के बाद महसूस हुआ कि ठंड बहुत बढ़ गई  है और भोजन के बाद सिवाय बिस्तर में घुसने के और कोई चारा नहीं है । “ यार यह ठंड के दिन भी कितने मज़ेदार होते हैं । 

रवीन्द्र ने अपनी मंकी कैप के भीतर से झाँकते हुए कहा । “ घंट मजेदार होते हैं । “ अजय ने खीझकर कहा ..” घर में रहते तो दिन भर रजाई में घुसे रहते, बीबी के हाथ का गर्मागर्म खाना खाते ..और ... “ 

“चुप रह यार, तेरी बीबी है तो इतरा रहा है, हम कुँवारों पर कुछ तो रहम कर ।“ रवीन्द्र ने कहा  । “ यहाँ तो ठंड में हमारी कुल्फी जमी जा रही है, ऊपर से इस तम्बू में भी छेद भी  हैं, जाने कहाँ से रात में यह आवारा हवा घुस आती है । ऊपर से सुबह जल्दी जागो , वाकणकर सर के आदेश का पालन करते हुए चम्बल में नहाने जाओ ।  अब संस्कार ही कुछ ऐसे है अपन तो अशोक के समान नहाने की टैबलेट खाने से रहे, ठण्ड हो या ओले गिरें नहाना तो पड़ेगा ही  । “

  "फिर भी हम लोगों की ज़िन्दगी उन गुलामों से बेहतर है उन्हें तो जीने की सुविधा ही इसलिए प्रदान की जाती थी कि एक दिन उन्हें एक दिन मार दिया जाये । ग़नीमत है अब यह दास प्रथा समाप्त हो चुकी है ।" रवीन्द्र के दिमाग़ में अब तक वह दृश्य किसी चलचित्र की भांति चल रहा था । 

"हाँ " मैंने कहा । "हम लोग भी अंग्रेज़ों की गुलामी से मुक्त हो चुके हैं ।""लेकिन रोमन सम्राटों की उस गुलामी और इस गुलामी में अंतर है भाई ।" 

अशोक ने मेरा प्रतिवाद किया । "कहाँ अंतर है ?" मैंने कहा "क्या अंग्रेज़ों की गुलामी के समय देश की जनता को नारकीय जीवन भोगना नहीं पड़ा ? क्या उस समय भी वे भारतीय लोगों की ऐसे ही क्रूर तरीके से हत्या नहीं करते थे ?" "सही कह रहे हो ।" 

रवीन्द्र ने कहा " लेकिन उनके जाने के बाद भी जनता की हालत में भी बहुत ज्यादा सुधार नहीं हुआ । लोग तो अब भी भूख और ग़रीबी की वज़ह से मरते हैं ।" 

मैंने कहा " बस इस बात का संतोष है कि अब हम आज़ाद हैं और एक जनतंत्र में रह रहे हैं, दिल बहलाने के लिए यह ख़याल अच्छा है । ठीक है बाक़ी चर्चा कल, अब सब लोग मुँह ढांककर सो जाओ , ठण्ड बहुत तेज़ है वर्ना कल हम सब गुलामों की ठण्ड की वज़ह से मौत घोषित कर दी जाएगी ।"


🔲 *शरद  कोकास* 🔲


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गुरुवार, 28 मई 2026

23-ये बकरे और मुर्गे नहीं.. इंसान हैं

कौन हैं यह लोग जिनकी जान की कीमत एक जानवर से भी कम  है ,पढ़िए इस एपिसोड में 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा-पिछले भाग में आपने पढ़ा रोम के गुलामों के बारे में कि कैसे जब  इन खदानों का पता जैसे ही अखाड़ों के मालिकों को पता चला, वे गुलामों को खरीदने के लिए इन खानों में पहुँचने लगे । ये लोग जैसे ही खानों में पहुँचते नग्न गुलाम इनके सामने प्रस्तुत किये जाते और ये लोग जिस तरह बैल या बकरे खरीदते है उस तरह इन्हें खरीदने वाले इनके शरीर के अंग टटोल टटोल कर इनका सौदा करते और इनकी कीमत लगाते । ज़िबह किये जाने वाले जानवर से भी कभी उसकी मर्ज़ी पूछी नहीं जाती । वैसे भी इन खदानों में इन  गुलामों की ज़िन्दगी साल या ज़्यादा से ज़्यादा दो साल होती थी । खदान के मालिकों को उनके मरने से पहले उनकी कीमत मिल जाती थी । “ इतना कहकर मैं चुप हो गया । मुझे नींद नहीं आ रही थी लेकिन मैं कुछ कहना भी नहीं चाहता था ।

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23  भाग तेईस 23 

*ये बकरे और मुर्गे नहीं.. इंसान हैं*  

मैं तम्बू की छत की ओर एकटक देख रहा था जैसे मुझे वहाँ रोम के उन गुलामों के यातना गृह दिखाई दे रहे थे । “ क्या हुआ शरद ? ” रवीन्द्र ने मुझे छत की ओर ताकते देख पूछा । 

    मैंने छत की ओर देखते हुए ही जवाब दिया ... “ देखो रवीन्द्र ..अखाड़ों के दलाल, नूबिया की उस खदान में स्पार्टाकस को और अन्य गुलामों को खरीदने आए हैं । स्पार्टाकस और उसका एक थ्रेशियन साथी चुपचाप उनके सामने खड़े है ..नंग-धड़ंग, दोनों की दाढ़ी बढ़ी हुई है, उनके शरीर पर अनगिनत ज़ख्म हैं जिनमें मवाद पड़ चुका है, देह पर चाबुकों की नीली धारियाँ हैं, शरीर से असहनीय बदबू उठ रही है, शरीर का मल और गन्दगी शरीर पर ही सूखी पपड़ियों के रूप में चिपकी हुई है । 

उनके शरीर से मांस गायब है और चमड़ी में मढ़ी हुई हड्डियाँ दिखाई दे रही हैं , आँखें मानो अपने पपोटों से बाहर आ चुकी हैं , दलाल उनके  निरीह, लटके हुए ,निरर्थक जननांगों को छूकर देख रहे हैं जैसे वे यह तय करना चाहते हों कि रोम के अखाड़ों में इन ग्लेडियेटर्स के नग्न शरीर लड़ते हुए कितनी उत्तेजना उत्पन्न करेंगे  और उनके प्रदर्शन से वे कितना धन कमा सकेंगे  .. । 

इन ग्लेडिएटरों का जीवन बस एक या दो माह का है इतने बस के लिए इन्हें खिला पिलाकर मर जाने के लिए  तैयार किया जाएगा, इन्हें मरता हुआ देख रोम की यह संपन्न अभिजात्यवर्गीय जनता खुश होगी ... । “ रवीन्द्र मुझे थपकियाँ देकर सुलाने की कोशिश करने लगा । उसने सिर्फ इतना कहा कि ..” मुझे भी बाज़ार में बिकते बकरों और मुर्गों को देख कर यही अनुभूति होती है ..। “

  “रवीन्द्र...“ मैं अचानक ज़ोरों से चीखा “ ये बकरे और मुर्गे नहीं हैं.. इंसान हैं .. मेरे - तुम्हारे जैसे इंसान, इनके पास भी वही सब कुछ है जो हमारे पास है ..हमारे जैसा मस्तिष्क और चेतना ..और इनका कत्ल करने के इरादे से इन्हें खरीदने वाले भी इन्हीं के जैसे इंसान है .. इंसान-इंसान में इतना भेद ? क्या इन्हें एक मनुष्य की तरह जीने का हक़ नहीं है ? ” इसके बाद रवीन्द्र ने कुछ नहीं कहा , वह तब तक मुझे थपकियाँ देता रहा ..जब तक मुझे नींद नहीं आ गई ।

सुबह नदी से लौटते हुए अशोक ने कहा “ सॉरी यार, कल बहुत ज़ोरों से नींद आ रही थी, आगे की कहानी सुन नहीं पाया अच्छा यह बता कि फिर स्पार्टकस अखाड़े तक कैसे आया ?" सुबह तक मैं रात की भावनाओं की गिरफ़्त से बाहर निकल चुका था । 

    मैंने कहा “बस, गुलामों का दलाल लेण्टुलस बाटियाटस अन्य गुलामों के साथ उसको भी खदान से खरीद लाया और लड़वाने के लिए तैयार करने लगा । “ अजय ने पूछा "तो उन्हें  ग्लेडियेटर बनने के लिए कोई ट्रेनिंग-वेनिंग दी जाती थी क्या ?” “ हाँ ।” मैंने कहा “ न केवल ट्रेनिंग दी जाती थी बल्कि अच्छी तरह से खिलाया पिलाया भी जाता था, गेहूँ, जौ, माँस और पनीर, और बाटियाटस तो उनके लिए  स्त्रियों का प्रबन्ध भी करता था ।“ “ अरे वा फिर तो ग्लेडियेटर के तो ऐश हो जाते होंगे । “ अजय ने खुश होते हुए कहा ।

“ नहीं ।“ मैंने कहा “उसका यह मानना था कि ग्लेडियेटर के भीतर दम खम पैदा करने के लिए उसे स्त्री का संग ज़रूरी है, तब वह अच्छी तरह खाता है और लड़ता है " "और अच्छी तरह मरता भी है ।“ अशोक ने बीच में  ही मेरी बात लोक कर कहा । “ हाँ सही है" मैंने कहा "मगर यह भी तो देखो कि वह बाटियाटस उन्हें किस तरह स्त्रियाँ परोसता था । यह उसी तरह था जैसे वह उन्हें  खाना और अन्य सुविधायें देता था  । उन्हें  स्वस्थ्य, पुष्ट और अक्षत कुमारी स्त्रियाँ देने से पहले वह ख़ुद उनकी आज़माइश करता था । यह दो हज़ार साल पहले का रोम का समाज था जहाँ स्त्रियों की स्थिति गुलामों से भी बदतर थी और उन्हें  मनुष्य न समझ कर एक जिंस समझा जाता था । जबकि सभ्यता के आरम्भ में ऐसा नहीं था । “

“उसने स्पार्टाकस भी को एक स्त्री दी थी ना ?” रवीन्द्र ने मेरे स्त्री विमर्श के भाषण को बीच में रोककर पूछा । “हाँ “ मैंने कहा “उसका नाम वारीनिया था । बाटियाटस उससे इसलिए चिढ़ता था क्योंकि पहली बार उसे हाथ लगाते ही उसने बाटियाटस को लात घूँसों से पीट डाला था, वह ख़ुद एक गुलाम थी और गुलामों के इस दलाल से घृणा करती थी । बाटियाटस ने उसे सज़ा के तौर पर स्पार्टाकस को सौंप दिया था इसलिए कि उसका मानना था कि वारीनिया को पुरुष की ज़रूरत नहीं है और स्पार्टाकस को स्त्री की  । लेकिन यह उसका भ्रम था, आगे जाकर उन दोनों में प्रेम हुआ और वारीनिया इतिहास में स्पार्टाकस की ऐसी प्रेमिका के रूप में प्रसिद्ध हुई जिसने स्पार्टाकस को रोम की इस क्रूर प्रथा और गुलामी के खिलाफ विद्रोह करने के लिए  प्रेरित किया ।“

“प्रेम इंसान को किन ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है ।“ रवींद्र ने कहा । “ हाँ यह सच है ।" मैंने कहा "प्रेम अपने आप में एक विद्रोह है, यह विद्रोह की मानसिकता को जन्म  देता है, सब कुछ बदल डालने की यह भावना जो अपनी स्थिति को बदलने से प्रारंभ होती है अपने परास में सम्पूर्ण समाज को शामिल कर लेती है । दुनिया में अनेक प्रेम कथाएँ मशहूर हैं जिनमे प्रेमियों ने अपने निज को विस्तार देने के लिए प्रेम किया लेकिन स्पार्टकस और वारीनिया का प्रेम उन हजारों हज़ार गुलामों की मुक्ति के लिए था जिन्हें रोम की राजसत्ता ने पशुओं से भी बदतर स्थिति में पहुँचा दिया था । " 

“ए भाई, ग्लेडियेटर्स की लड़ाई और रोमन सम्राटों के मनोरंजन के बारे में भी तो कुछ बता ।“ अजय ने कहा । इससे पहले कि मैं कुछ बोलता राममिलनवा बोल पड़े.. “ ऊ सब छोड़ो हियाँ हमरा पेट विद्रोह कर रहा है ..तनिक नास्ता वास्ता हुई जाए फिर सुनेंगे तोहार कहानी ।“ भूख तो हम सभी को लग रही थी और इससे पहले कि हम लोग अपने  ट्रेंच रूपी अखाड़े में कूद पड़ें पेट में कुछ डालना ज़रूरी था ..सो हम लोगों ने भोजनशाला की  ओर प्रस्थान किया ।

नाश्ते के बाद हम लोग टीले पर पहुँच गए  ..बहुत बड़ा टीला और बीच में ट्रेंच । अशोक ने कहा  “यह बिलकुल हमारे उज्जैन में जो पहलवानी के अखाड़े हैं उसकी तरह दिखाई दे रहा है, अगर इसमें  मिट्टी डाल दी जाए तो यह कुश्ती के काम आ सकता है ।“ रवीन्द्र के दिमाग़ में अभी तक रोम के एम्फिथियेटर अखाड़े घूम रहे थे । उसने पूछा .” शरद उन अखाड़ों में भी ऐसी ही मिट्टी होती थी क्या ?“ मैंने कहा “नहीं उनमें रेत होती थी क्योंकि सूर्य की रोशनी में रेत पर खून की चमकती हुई बूँदें अद्भुत दृश्य उपस्थित करती थीं जिन्हें  देख कर रोम के अय्याश लोगों को बहुत मज़ा आता था ।“

रवीन्द्र ने कहा “गज़ब का सौन्दर्यबोध था उनका, सच कहूँ तो बहुत विकृत । अच्छा ग्लेडियेटर्स की यह लड़ाई कैसे होती थी ?” मैंने कहा “ चलो तुम्हें  वहाँ का दृश्य दिखाता हूँ । जिस तरह हमारे यहाँ स्टेडियम होता है उस तरह का होता था यह एम्फिथियेटर । बीच में यह अखाड़ा जिसे एरीना कहते हैं । जिस तरह क्रिकेट देखने के लिए स्टेडियम में भीड़ इकठ्ठा होती है उस तरह की भीड़ यहाँ भी उपस्थित है । ठीक वैसा ही उन्माद, शोर, उत्तेजना । 

    साइड की दीवार के पास एक शेड है जहाँ ग्लेडियेटर के जोड़े लड़ने के लिए  प्रतीक्षारत हैं । शेड के दरवाजे से एरीना का दृश्य देखा जा सकता है । मैदान के एक ओर गाने - बजाने वालों का एक समूह बैठा है । जब तक लड़ाई शुरू नहीं हो जाती यह गायन से और वाद्ययंत्रों से लोगों का मनोरंजन करता रहेगा । लड़ने वाले हर जोड़े में एक थ्रेसियन है और एक यहूदी या अफ्रिका का रहने वाला हब्शी । जोड़े के दोनों ग्लेडियेटर आपस मंे घर परिवार की बातें कर रहे हैं , जबकि उन्हें  पता है कि उनमें से एक को थोड़ी देर बाद मर जाना है ।"

"पहला जोड़ा एरीना में दाखिल हुआ है । उन्होंने अपने हाथ व छुरे की मूठ को रेत से रगड़ा ताकि पकड़ मजबूत बनी रहे, अखाड़े के उस्ताद ने खेल के प्रारंभ होने की सूचना देते हुए अपनी चांदी की सीटी बजाई और दोनों ग्लेडियेटर आपस में भिड़ गए । वे लगातार पैंतरा बदलते हुए एक दूसरे पर वार करने की फ़िराक में हैं, लेकिन कोई दूसरे को मौका नहीं दे रहा है । शोर बढ़ता जा रहा है । 

    अचानक एक का छुरा चमका और दूसरे के सीने पर खून की एक लकीर खिंच गई । रोमन दर्शक तालियाँ बजा रहे हैं । फिर दोनों एक दूसरे से गुंथ गए हैं, जैसे उनमें बरसों पुरानी दुश्मनी हो, जैसे वे सचमुच एक दूजे के खून के प्यासे हों । फिर अचानक एक की बाँह में दूसरे का छुरा धँस गया है, रक्त  की एक धार निकली और रेत पर बिखर गई । वह धरती पर गिर पड़ा, फिर लड़खड़ाता हुआ उठ खड़ा हुआ, जनता उसके उठने पर ताली बजा रही है । उठते ही उसने  अपने भाले से पहले  ग्लेडियेटर पर वार किया । उसका चेहरा रक्त में डूब गया है । वह अपनी आँखों में भरा खून साफ़ कर रहा है ।"

"क्यों भाइयों ,आज काम-वाम नहीं शुरू करना है क्या ?" आर्य साहब ने टीले पर पहुँचते ही हम लोगों को बातों में मशगूल देखकर टोका ।"हाँ सर करते हैं न , यह शरद कल की अधूरी स्टोरी को पूरा कर रहा था । अजय ने कहा .. "भाई स्टोरी तो बाद में पूरी कर लेना पहले कल जो इस निखात में काम शुरू किया था उसे तो पूरा करो" आर्य सर ने कहा । इसके बाद हम लोगों ने कुदाल फावड़े उठा लिए और खुदाई के काम में लग गए काम करते हुए बात करना संभव नहीं था इसलिए ग्लेडिएटरों की लड़ाई के आख्यान को दोपहर के भोजन तक स्थगित कर हम लोग ताम्राश्मयुगीन सभ्यता की गुत्थियों से लड़ने में लग गए ।


⚫ *शरद कोकास* ⚫



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22 - जननांगों को ढँकने के लिए उनके पास एक चिन्दी तक नहीं थी

कौन थे वे लोग ? और कहाँ से आए थे ? क्यों उनके साथ ऐसा सलूक किया गया ,जानिए इस एपिसोड में 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

2⃣2⃣ *भाग बाईस* 2⃣2⃣

जननांगों को ढँकने के लिए एक चिन्दी तक नहीं

    पूर्व कथा - इससे पूर्व के भागों में आपने पुरातत्व संबंधी विभिन्न बातों के अलावा संसार के विभिन्न देशों में प्रचलित परम्पराओं वहाँ के मिथकों , प्रतिमा विज्ञान , आदि के बारे में पढ़ा अगले तीन भागों में हम पढेंगे रोम के गुलामों की कहानी । यह कथा आपके भीतर के समस्त आवेगों को उद्वेलित कर देगी । यह आपकी संवेदना की परीक्षा भी है ।

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  रात्रि भोजन के पश्चात रज़ाई में घुसते ही रवीन्द्र ने  कहा “ यार यह ठंड तो कम होने का नाम ही नहीं ले रही । “ ठण्ड तो मुझे भी लग रही थी लेकिन सुविधा की इस सांसद में मुझे विपक्ष की भूमिका अदा करनी थी  

    “रज़ाई में घुसे हो और ठंड से डर रहे हो .." मैंने आव्हान के अंदाज़ में कहा .." ज़रा रोम के उन गुलामों के बारे में सोचो जिन्हें भीषण ठंड में भी कपडे का एक टुकड़ा तक नसीब नहीं होता था । 

    “यार तू भी ना..." रवींद्र ने नाक चढ़ाते हुए तुरंत मेरी बात पर रिएक्ट किया" मिस्त्र मेसोपोटामिया, रोम, इटली से नीचे बात ही नहीं करता.. अपने इधर नई क्या ऐसा होता है ..बिहार में ही देख लो, रोज खबरें छपती हैं शीत लहर में इतने लोग मरे ।“ 

रवीन्द्र सीधे वार्तालाप का विषय अंतरराष्ट्रीय स्तर से उतारकर राष्ट्रीय स्तर पर ले आया । "भाई ।" मैंने अपनी प्रतिवादी की भूमिका जारी रखते हुए कहा " चलो भारत के बारे में ही बात की जाए । लेकिन तुम भारत जैसे स्वतन्त्र देश के वर्तमान की बात कर रहे हो । । हम इतिहास के विद्यार्थी हैं, एक नज़र उस दौर पर भी डाल लेते हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि वह स्वर्ण युग था । क्या उस समय लोग ठण्ड से नहीं मरते थे ?" 

    रवीन्द्र को इस तरह मेरा उसे वर्तमान से अतीत में ले जाना नागवार गुजरा .."अब क्या पता मरते थे या नहीं, इस बात का कोई प्रमाण भी तो नहीं है ।" "ज़रूर मरते होंगे..अकाल से मरने के तो प्रमाण मिलते ही हैं अब विज्ञान की प्रगति हो रही है हो सकता है आगे चलकर किसी कंकाल के परीक्षण से यह भी ज्ञात हो जाए कि फलां आदमी ठण्ड की वज़ह से मरा था ।"

    अजय ने मेरे पक्ष में अपनी बात रखते हुए कहा .."बिलकुल हो सकता है ग़रीबी तो उस समय भी रही होगी लेकिन स्वर्ण युग में शायद ही कोई मरता हो ।" 

    मुझे अजय की बात का उत्तर तो देना ही था .." स्वर्णयुग जैसी कोई चीज़ सच में हुई है या नहीं किसको पता । वह राजतन्त्र का दौर था, सारे राजा अपनी प्रजा के सुखी होने का दावा करते हुए अपने आप का नाम इतिहास में लिखाए जाने के लिए तत्पर थे । लेकिन वास्तविकता यह है कि ऐसे राजाओं के शासन में भी प्रजा की बहुत बुरी स्थिति थी । इतिहास में यह बात कहीं नहीं लिखी गई । गुलामों की स्थिति तो और भी बदतर थी । आज भी संपन्न देशों में कमोबेश यही स्थिति है ।" 

रवीन्द्र मेरी बात से कुछ कुछ सहमत होता प्रतीत हुआ  .." लेकिन विडम्बना यह है हमारे देश की ग़रीबी के बारे में तो सब जानते हैं, संपन्न देशों की ग़रीबी के बारे में कोई नहीं जानता । अमेरिका को ही देख लो ..क्या वहाँ भिखारी नहीं होते होंगे ? ब्रिटेन में क्या लोग ठण्ड से नहीं मरते होंगे ? और मरते तो साम्यवादी रूस में भी होंगे , लेकिन वहाँ से खबरें यहाँ कहाँ आ पाती हैं ।"

    "खबरें तो अमेरिका से भी नहीं आतीं ।" अशोक ने कहा  .."हमें सिर्फ वहाँ की सम्पन्नता का चित्र ही दिखाया जाता है, जबकि वे लोग जब भी यहाँ टूरिस्ट की तरह आते हैं तो हमारे यहाँ के भिखारियों की ,मदारियों की और साधुओं की फोटो खींचकर ले जाते हैं। हमारे यहाँ की छवि बिगाड़ने का काम इन्ही टूरिस्टों ने किया है ।"

"यार लेकिन इन पर रोक लगाने का कोई तरीका भी तो नहीं है ।" किशोर ने सरकारी अंदाज़ में कहा । 

अशोक जैसे उसकी बात का जवाब देने को तत्पर बैठा था  "मगर रोक लगाने की ज़रूरत भी क्या है ? टूरिस्ट तो आयेंगे ही और आयेंगे तो पुरातात्विक महत्व की इमारतों के साथ साथ यहाँ के जनजीवन की फोटो भी खींचकर ले जायेंगे । उनके पास अत्याधुनिक कैमरे होते हैं । उन पर रोक कैसे लगा सकते हैं ? ऐसा कोई कानून नहीं है । फिर अपने साथ वे विदेशी मुद्रा लेकर आते हैं और सरकार को उनके आने से आमदनी भी होती है । कश्मीर जैसी जगह में तो वहाँ के निवासियों का गुज़ारा ही इन टूरिस्टों की वज़ह से होता है । पर्यटन उद्योग को तो बढ़ावा मिलना ही चाहिए ।"

"अच्छा तुम रोम के गुलामों की बात कर रहे थे  ना जिन्होंने स्पार्टकस के नेतृत्व में विद्रोह किया था ? ” अजय हमारे पर्यटन मंत्रालय टाइप की बातचीत से बोर हो रहा था । 

    “ हाँ ।“  मैंने कहा । 

    अशोक बोला “ तो यार उसकी पूरी कहानी बताओ ना .. एक्चुअल में हुआ क्या था ? तुम तो बिना कैमरे के ही द्रश्य की फोटो खींचकर रख देते हो ।“ 

    “हाँ, यह हुई ना बात ।“ अपनी तारीफ़ से प्रसन्न होकर मैंने कहा .."लेकिन कहानी ज़रा लम्बी है ।" 

    "कोई बात नहीं ..जब तेरी इतनी लम्बी लम्बी कहानियाँ सुन ली तो यह भी सुन लेंगे । तेरी कहानी लम्बी ज़रूर होती है लेकिन उबाऊ नहीं । " अशोक ने किसी आलोचक के अंदाज़ में कहा। 

    किस्सा सुनाने को तो मैं आतुर था ही । मैंने रजाई के भीतर अपनी पोज़ीशन सम्भाल ली थी और किस्सागोई के मूड में आ गया था ।

“ यह आज से दो हज़ार साल पहले सन इकहत्तर ईसापूर्व से भी पहले की बात है । रोम उन दिनों अपने उत्कर्ष पर था । बड़े बड़े धनाढ्य  लोग, सम्पन्न लोग, सत्ता के सुख के साथ जीवन का सुख भोग रहे थे । ढेर सारे मनोरंजन के साधन थे, खेलकूद थे,  हम्माम थे, अय्याशी के लिए औरतें थीं और उनकी सेवा के लिए  हज़ारों गुलाम थे । मनोरंजन के लिए वहाँ के अखाड़ों में कुश्ती तो सामान्य बात थी लेकिन उन दिनों अचानक कुछ ऐसा हुआ था कि सब इस खेल के दीवाने हो गए थे । 

कई अखाड़ों का निर्माण किया गया । इन अखाड़ों को एम्फिथियेटर कहा जाता था और इनमें ग्लेडियेटर्स को आपस में या खूंख्वार जंगली जानवरों जैसे शेर आदि से लड़ाया जाता था । इन अखाडों के मालिकों ने खदानों में काम करने वाले गुलामों को खरीद लिया था और उन्हें  प्रशिक्षण देकर ग्लेडियेटर बना दिया था ।"                

“ लेकिन इतने सारे गुलाम आते कहाँ से थे ?” राममिलन भैया का यह स्वाभाविक प्रश्न था । 

“ बिलकुल सही पूछा राममिलन भैया ।“ मैंने कहा “प्राचीन मिस्त्र में थीव्ज़ के पास नूबियन रेगिस्तान है वहीं रेत के बीच सोना उगलने वाली कई खदानें हैं । प्रारंभ में यह सारे मिस्त्र के फराओं के गुलाम थे और सोने की खदानों में काम करते थे । जहाँ इन गुलामों की कई पीढ़ियाँ गुजर चुकी थीं । फराओं के पास यह गुलाम इस तरह आये कि शुरूआत में जब युद्ध होते थे वे सिपाही गुलाम बना लिए जाते थे  जो लड़ाई में मारे जाने से बच जाते थे । यह युद्धबंदी गुलाम तीन पीढ़ियों बाद कोरू कहलाये । मिस्त्र के फराओं का वैभव समाप्त हो जाने के बाद इन खदानों को रोम के धनाढ्य व्यापारियों ने खरीद लिया ।"

"ये खदानें दरअसल नर्क से भी बदतर थीं । आओ मैं तुम्हें वहाँ का एक दृश्य दिखलाता हूँ . ..कल्पना करो ..  देखो.. वह देखो.. सौ से भी अधिक गुलाम एक कतार में चल रहे हैं .. एकदम नंगे.. गर्म रेत में घिसटते हुए पाँव लेकर ... उनकी गर्दन में एक पट्टा है जो काँसे का है और जो अगले गुलाम की गर्दन में बन्धे पट्टे के साथ एक ज़ंजीर से बन्धा हुआ है । बार बार उस पट्टे के गर्दन में टकराने की वज़ह से उसकी गर्दन में घाव हो गए  है और उनसे खून बह रहा है । अँधेरा गहराता जा रहा है और यह गुलाम दिन भर का काम ख़त्म करके अपनी बैरकों में लौट रहे हैं । एक बार भीतर घुस जाने के बाद उन्हें  बाहर आने की इज़ाज़त नहीं है । वे केवल मरकर ही बाहर आ सकते हैं । 

"उफ़ ..क्या बेबसी है " रवींद्र ने कहा । मेरी आँखें तम्बू की छत की और देख रही थीं और मुझे वहाँ उन बैरकों का दृश्य दिखाई दे रहा था .."वे बैरकों की फर्श पर ही गन्दगी कर रहे है वहीं कहीं पहले का मल पड़ा हुआ है जो सड़कर सूख गया है । अभी थोड़ी देर में उन्हें  खाना दिया जाएगा ..गेहूँ और टिड्डी का शोरबा और एक मशक में एक सेर पानी जो उनकी भूख और प्यास के हिसाब से नाकाफी है .. उनका पानी ख़त्म हो चुका है ..वे और पानी मांग रहे हैं लेकिन उन्हें पानी नहीं दिया जा रहा है ।"

"लेकिन पानी क्यों नहीं ?" अजय ने पूछा "खाना भले ही कम दें लेकिन पानी तो मिलना चाहिए !" 

"अरे मूरख " अशोक ने कहा " वह रेगिस्तान है ,वहाँ पानी तो भोजन से भी अधिक मूल्यवान है ।" 

"ठीक कह रहे हो तुम" मैंने कहा "जब पानी की कमी से उनका गुर्दा खराब हो जाएगा और वे श्रम करने लायक नहीं रहेंगे उन्हें बैरक से बाहर कर दिया जाएगा और रेगिस्तान में मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा । इन बैरकों में सड़ान्ध है, घुटन है, इतनी बदबू है कि खाया पिया सब बाहर आ जाए  ..लेकिन गुलाम इसे जज़्ब कर लेते है वे उल्टी आने के बावज़ूद भी उल्टी नहीं करते क्योंकि वे जानते हैं कि एक बार उल्टी कर देने के बाद उनका पेट ख़ाली हो जाएगा और फिर उन्हें दिन भर भूखे रहना पड़ेगा । खाना भी सिर्फ इतना ही मिलेगा कि ज़िन्दा रहा जा सके । वे यह सोचते हुए कि  ज़िन्दा क्यों है, यह सर्द अन्धेरी रात काट देंगे ...।"                             

मैंने एक नज़र अपने मित्रों के चेहरे पर डाली । मुझे कहीं भी उनके चेहरों पर जुगुप्सा का भाव नहीं दिखाई दिया । उनके चेहरे देखकर मुझे संतोष  हुआ और इस बात का अहसास हुआ कि किस तरह एक मनुष्य के दुःख की गाथा सुनकर दूसरा मनुष्य उस दुःख को महसूस कर सकता है । यह संवेदनशीलता ही उसे मनुष्य बनाती है । 


मैंने रोम के गुलामों के इस दुःख की गाथा को शब्द देने शुरू किये   "देखो अब नगाड़े बजने लगे हैं, यह उनके लिए अलार्म है..अब सबको ज़ंजीरों में बान्धकर खदानों की ओर ले जाया जाएगा । वे अपना प्याला और कटोरा साथ रखकर घिसटते कदमों से चल पड़े हैं ...ठंड से काँपते हुए अपने नंगे बदन को हाथों से ढाँपने की कोशिश करते हुए वे अपनी जानवरों से भी बदतर ज़िन्दगी के बारे में सोच रहे हैं । खदान तक पहुँचकर  वे उन चट्टानों पर कुदाल और हथौडे चलायेंगे जो उनके मालिकों को सोना देती हैं । 

"उफ़ , कितना कठिन है यह सुनना ।" अजय ने अपने कानों पर हाथ रखते हुए कहा  

    "हाँ । " मैंने कहा " गुलामों की जीवन गाथा सुनना कठिन तो है । सारे गुलाम पसीने से तरबतर हैं  महीनों से उन्हें नहाना नसीब नहीं हुआ है , अब वे चार घंटे बिना रुके काम करेंगे, जिसका हाथ क्षण भर के लिए भी रुकेगा उसे कोड़ों से पीटा जाएगा .. इस तरह  चार घंटे लगातार काम करने के बाद तक उनके शरीर का पानी पसीना बनकर निकल चुका होगा, फिर उन्हें  ज़िन्दा रहने लायक थोड़ा सा खाना और पानी दिया जाएगा, जो जल्दी में गट गट पानी पीने की गलती करेगा पछतायेगा क्योंकि पेशाब बनकर पानी निकल जाने के बाद काम खत्म होने तक दोबारा नहीं मिलेगा ..

    लेकिन इस प्यास का क्या करें ..कैसी मजबूरी है यह .. पानी पियें  तो भी मौत नहीं पियें तो भी मौत ...। जो युवा हैं वे तो सह लेंगे लेकिन बच्चों का क्या ..देखो अभी अभी सोलह साल के उस थके हारे बालक ने भूख-प्यास, ठंड और गर्मी के इस उतार-चढ़ाव से लड़ते हुए स्पार्टकस की गोद में दम तोड़ दिया  है । स्पार्टकस रोते हुए उसकी लाश को बेतहाशा चूम रहा है । ” 

"बस कर यार “ किशोर के चीखने से मैं होश में आया । “क्या सुना रहा है तू ... पूरी रात बरबाद कर दी..ऐसा भी होता है कभी ..इतना अत्याचार ..“ किशोर ने गांजे की सिगरेट जला ली थी और मेरी तरफ बढ़ाते हुए कह रहा था .."ले एक सुट्टा लगा ले और वापस इस दुनिया में आजा .. बाकी कहानी कल सुनेंगे ।" 

    मैंने कहा  “ रेन दे यार अपन तो वेसेई टनाटन्न रेते हें....।

मेरी ख़ामोशी के पर्दे पर अभी भी उन निरीह गुलामों के चित्र उभर रहे थे । मैं काफी देर तक चुपचाप बैठा उन मनुष्यों के बारे में सोचता रहा । किशोर, अशोक, अजय सब नींद  के आगोश में जा चुके थे । मैं जाग रहा था और एकटक तम्बू की छत की ओर देख रहा था । मेरे साथ जाग रहा था मेरा अंतरंग मित्र रवीन्द्र जो मेरी मनस्थिति समझने की कोशिश में था । 

    “यार रवीन्द्र, तूने पढ़ी है हावर्ड फास्ट की “ आदिविद्रोही ” ? अचानक मैंने रवीन्द्र से पूछा । रवीन्द्र ने कहा “ पढ़ी तो नहीं है लेकिन सुना जरूर है कि उसमें स्पार्टाकस के विद्रोह की कथा है ।“ मैंने कहा “ मैंने तो जिस दिन से पढ़ी है मेरी नींद ही उड़ गई है । कैसे एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के प्रति इतना क्रूर भी हो सकता है, अपने मनोरंजन के लिए  एक इंसान की दूसरे इंसान द्वारा हत्या करवाना ?"

रवीन्द्र जानता था जब तक मेरे  भीतर की वेदना बाहर नहीं निकलेगी मुझे नींद नहीं आएगी । उसने पूछा “फिर उस सोने की खान के गुलामों के बीच से स्पार्टाकस बाहर कैसे आया और ग्लेडिएटर कैसे बना ? “  मुझे लगा उसकी आवाज़ कहीं दूर से आ रही है । हम मनुष्य इसीलिए कहलाते हैं कि हमें अपने आप को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता प्राप्त है । लेकिन ऐसा क्यों होता है कि कई बार अपनी वेदना अभिव्यक्त करने से ज़्यादा छटपटाहट दूसरे की वेदना व्यक्त करते हुए  होती है  । 

    शायद इसीलिए कि अपने दुख दूसरों के दुख की तुलना में गौण हो जाते हैं ? कभी कभी दूसरों के दुःख देखो तो लगता है अपने दुःख सिर्फ ओढ़े हुए दुःख हैं । आज मुझे लग रहा था कि स्पार्टाकस कहीं मेरे भीतर जीवित हो गया है और अपने दर्द को प्रकट करने के लिए  छटपटा रहा है ।

मैंने कहना शुरू किया “ इन खदानों का पता जैसे ही अखाड़ों के मालिकों को पता चला, वे गुलामों को खरीदने के लिए इन खानों में पहुँचने लगे । ये लोग जैसे ही खानों में पहुँचते नग्न गुलाम इनके सामने प्रस्तुत किये जाते और ये लोग जिस तरह बैल या बकरे खरीदते है उस तरह इन्हें खरीदने वाले इनके शरीर के अंग टटोल टटोल कर इनका सौदा करते और इनकी कीमत लगाते । “ 

“ लेकिन ये गुलाम इस तरह बिकने के लिए  तैयार हो जाते थे ?" रवीन्द्र ने पूछा । “ तैयार..? “ मैंने कहा “ ज़िबह किये जाने वाले जानवर से भी कभी उसकी मर्ज़ी पूछी जाती है क्या । वैसे भी इन खदानों में इन  गुलामों की ज़िन्दगी साल या ज़्यादा से ज़्यादा दो साल होती थी । खदान के मालिकों को उनके मरने से पहले उनकी कीमत मिल जाती थी । “ इतना कहकर मैं चुप हो गया । मुझे नींद नहीं आ रही थी लेकिन मैं कुछ कहना भी नहीं चाहता था । 


शरद कोकास 


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मंगलवार, 26 मई 2026

21 - प्राचीन मूर्तियों पर तस्करों की नज़र


तस्करी कैसे होती थी , ज़मीन से निकली वस्तु घर क्यों नहीं ले जा सकते, पुरानी और प्राचीन मे क्या अंतर है पढिए इस एपिसोड मे 

🐴 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 🐴

शरद कोकास 

पूर्वकथा- पिछले भाग में आपने पढ़ा कि सारे छात्र शाम हो जाने के पास अलाव के पास बैठे हैं और आज की बातचीत में शामिल है प्राचीन समय में ग्रीस में होने वाले ओलम्पिक की बातें और पांच खुर वाले घोड़े की बातें .. लीजिये पढ़िए अब उससे आगे..*  

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🦄 *भाग - इक्कीस* 🐴

21 -  *प्राचीन मूर्तियों पर तस्करों की नज़र*

अलाव की आग बुझ चुकी थी और अंगारों के स्थान पर अब राख़ नज़र आ रही थी । मुझे यकीन था कि राख़ के नीचे कोई चिंगारी अवश्य दबी हुई होगी जिसे उम्मीद होगी कि किसी दिन आग की तलाश में भटकता हुआ कोई मुसाफ़िर शायद फिर यहाँ आएगा । 

मुझे दुष्यंत जी की ग़ज़ल का वह शेर याद आया 

"थोड़ी आँच बची रहने दो थोड़ा धुआं निकलने दो ,

तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफ़िर आयेंगे ।"  

हम लोग भी मुसाफ़िर की तरह ही तो यहाँ आये हैं ..कुछ दिन बाद यहाँ से चले जायेंगे । तब तक न आग बची होगी न चिंगारी ।  क्या पता इस साईट में भी आगे कुछ न निकले और फिर पुरातत्व विभाग इसे अन्य साइट्स की तरह विस्मृत कर किसी नई साईट पर काम की तलाश में जुट जाए । 

इस अनदेखे भविष्य के बारे में सोचते हुए मुझे जाने क्या क्या ख़याल आने लगे । मैंने सोचा हो सकता है फिर बरसों बाद यहाँ कोई बस्ती बसे और फिर एक दिन चम्बल की बाढ़ के बाद वह बस्ती भी उजड़ जाए । फिर बरसों बाद कोई पुरातत्ववेत्ता किसी प्राचीन सभ्यता की तलाश में यहाँ तक पहुँचे और उसे उपरी सतह पर राख का यह ढेर मिले ।

क्या उसे इस बात का ख़याल भी आएगा कि विक्रम विश्वविद्यालय के कुछ छात्र पुरातत्ववेत्ता यहाँ आये थे और सर्दियों की किसी रात में यहाँ बैठकर उन्होंने अपने पुरखों के साथ साथ ग्रीक के ओलिम्पिस पर्वत पर रहने वाले देवताओं को याद किया था ?

रात गहराने लगी थी । सारे मित्र नींद में दिनभर की स्मृतियों के साथ किसी दौड़ में शामिल हो चुके थे । मुझे नींद नहीं आ रही थी .. मैं चुपचाप लेटा हुआ और अपने घर के नर्म बिछौने के बारे में सोच रहा था । तम्बू में बीत  रही इस ज़िंदगी के बारे में सोचते हुए मुझे अपने आदिम पुरखों के बारे में कुछ ख़याल आने लगे  । 

मैं सोचने लगा .. उनका जीवन कितनी कठिनाइयों से भरा हुआ था । उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ भी ज्ञान अर्जित किया वे उसे किस तरह अपनी आने वाली पीढ़ी को सौंपते गए । आज एक बच्चा जन्म लेने के बाद अपनी उम्र के प्रारंभिक वर्षों में ही इतना कुछ सीख जाता है जिसे सीखने में हमारे पूर्वजों को हजारों साल लग गए । मुझे यह सोचकर अच्छा लगा कि हमारे आदिम पूर्वजों ने अपने स्वयं के प्रयासों से जो कुछ सीखा उसे अगली पीढ़ी को सौंपने की यह परंपरा अभी भी जारी है। 

मुझे अपनी सुविधाओं के बारे में सोचते हुए यह ख़याल भी आया कि यदि मैं अपने घर से बाहर नहीं निकलता तो शायद इतना कुछ ज्ञान अर्जित नहीं कर पाता । आज भी मैं इस बात में विश्वास रखता हूँ कि एक बच्चा अपने घर में रहकर जितना कुछ नहीं सीख पाता जितना वह घर से बाहर निकलकर अकेले ही कठिनाइयों से जूझते हुए सीख जाता है  । 

हम लोग अपने अपने घरों में माता-पिता के सान्निध्य में अनेक बातें सीख नहीं पाते हैं । यह शिविर हमारे लिए केवल पाठ्यक्रम से सम्बंधित ही नहीं है  बल्कि यहाँ रहकर हम विपरीत परिस्थितियों में कैसे जिया जाए इस बात का भी प्रशिक्षण ले रहे हैं । 

शिविर के अनुशासन का पालन करना हमारे लिए अनिवार्य ही नहीं है बल्कि घर में जिस तरह की सुविधाओं के साथ हम जीते हैं बगैर उनके भी जीना सीखना हमारे इस शिविर के प्रशिक्षण का एक भाग है । इसीलिए डॉ वाकणकर हमें रोज़ हिदायतें दिया करते हैं  और कभी -कभार हमारे तम्बू में निरीक्षण के लिए आया करते हैं ।

अगली सुबह की बात है 

सुबह हम नींद से भारी अपनी पलकों को खोलने के प्रयास में ही थे कि अचानक तम्बू के बाहर सर की आहट सुनाई दी " आता हूँ थोड़ी देर में, सब व्यवस्थित कर लो ।" उन्होंने बाहर से ही कहा । 

हम फुर्ती से उठे और बिस्तर वगैरह तह करके करीने से लगा दिए । सारी चीजें कपड़े, बैग आदि भी व्यवस्थित रख कर उनका इंतज़ार करने लगे । कुछ ही देर वे वापस लौटे और तम्बू में प्रवेश कर उन्होंने चारों ओर अपनी नज़र घुमाई । 

तम्बू में सुव्यवस्था देख कर वे खुश हो गए "बहुत बढ़िया ..सब सामान तो अच्छी तरह जमाकर रखा है तुम लोगों ने , इसे आदत में शामिल कर लेना .. शादी के बाद पत्नी बहुत खुश रहेगी। " उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा ।

निरीक्षण करते हुए अचानक उनकी निगाह उस चाल्कोलिथिक पात्र पर पड़ गई जिसे पाँच दिन पहले अशोक ट्रेंच से उठाकर ले आया था और बतौर ऐश ट्रे उसका बखूबी इस्तेमाल कर रहा था । “व्वा बेटा.. तो यह पात्र यहाँ रखा है ।“ उन्होंने  कटाक्ष करते हुए कहा  “शौक तो तुम्हारे रईसों के हैं ।“ 

इससे पहले कि अशोक अपने धूम्रपान की चोरी पकड़ी जाने पर शर्मिन्दा होता उन्होंने  कहा “ जानते हो तुम्हारी इस ऐश ट्रे की कीमत क्या है ? ये एक लाख से कम की नहीं है ।“ अशोक ने तुरंत माफी माँगी, बाहर जाकर ऐश ट्रे खाली की और डॉ. साब को देने लगा तो उन्होंने  कहा “ ऐसे नहीं इसे अच्छी तरह धोकर साफ करो, सुखाओ और फिर आर्काईव में जमा करो .. नहीं तो  तुम्हारा कोई जूनियर ‘चाल्कोलिथिक पीरियड में विल्स या पनामा का उद्भव’ जैसे विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत कर देगा । ऐसी ग़लती दोबारा नहीं होनी चाहिए ।“

डांट यद्यपि अशोक को पड़ी थी लेकिन हम सभी लोग अपने आप को अपराधी महसूस कर रहे थे । डांट का यह असर ट्रेंच पर पहुँचने तक भी कम नहीं हुआ था । हाँलाकि अशोक को इस बात पर संतोष था कि सिगरेट पीने के लिए उसे डाँट नहीं पड़ी । 

लेकिन बिना अनुमति उत्खनन में निकली किसी भी वस्तु को निजी उपयोग में लाना अपराध तो था ही ।  

इसी अपराध बोध के कारण हम सभी असहज थे यद्यपि सर ने इसे सहज बनाने का प्रयास किया था  । 

क्या ज़मीन  से नीचे कोई वस्तु निकले तो हम उसका उपयोग कर सकते हैं ?

हम सबके उतरे हुए चेहरे देखकर उन्होंने कहा " देखो भाई, हम सब इस बात को जानते हैं कि हम उन्हीं वस्तुओं का उपयोग कर सकते हैं जिन्हें हमने ख़रीदा है अथवा श्रम से प्राप्त किया है । पुरातत्व की खुदाई जिन साइट्स पर होती है वहाँ पहले से ही ऐसी वस्तुएँ मिलती रही हैं । अब कई बार यह वस्तुएँ लोगों की निजी ज़मीन में भी मिलती हैं लेकिन ग्रामीण लोग इन महत्वपूर्ण अवशेषों का महत्व नहीं जानते इसलिए इन्हें साधारण वस्तुएँ समझकर अपने घर ले जाते हैं । 

यह काम बिल्कुल नहीं करना है 

कई बार पुराने स्थापत्य की ईंटे मिलती हैं जिनका उपयोग वे अपने घर की दीवार बनाने में कर लेते हैं । ग़नीमत की मूर्तियों को वे देव प्रतिमा समझते हैं वर्ना उनका उपयोग भी सीढ़ियों की तरह कर लेते, हालाँकि प्रस्तर स्तंभों को लेकर उनकी यह समझ नहीं है इसलिए कई बार ऐसा करते भी हैं ।" 

ग्रामीणों द्वारा पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं के निजी उपयोग के ऐसे उदाहरण देकर सर ने हमें अपराध बोध से उबार लिया था । हालाँकि हम इस बात को जान रहे थे कि ग्रामीणों में और हम में फ़र्क है वे यह काम इसलिए करते हैं कि वे वस्तुओं के पुरातात्विक महत्व को नहीं जानते और हम...। 

बात फिर से अशोक के इस चौर्यकर्म पर न पहुँचे इसलिए अजय ने उनकी बात के तारतम्य में सवाल किया "लेकिन सर पुरातत्व विभाग ग्रामीणों को पुरातात्विक महत्व की सामग्री घर ले जाने से मना क्यों नहीं करता ?" 

सर ने कहा " जब तक पुरातत्व विभाग को इसकी खबर मिलती है तब तक बहुत सारी सामग्री गाँव वाले ले जा चुके होते हैं । कई बार खेत जोतते हुए सोने चांदी के सिक्के, नक्काशीदार बर्तन, मिटटी के खिलौने आदि मिलते हैं, गाँव वाले उन्हें घर ले जाते हैं । 

यह सिर्फ इसलिए नहीं है कि वे इसका महत्व नहीं जानते बल्कि मनुष्य की प्रवृत्ति ही ऐसी होती है कि जो वस्तु उसे लावारिस पड़ी मिल जाए उस पर वह कब्ज़ा कर लेता है ।"

"सर लेकिन मूर्तियाँ वगैरह तो जंगलों में पड़ी रहती हैं, उन्हें तो कुछ नहीं होता ।" रवीन्द्र ने कहा । 

"नहीं ऐसा नहीं है ।" सर ने कहा  " जंगलों में पड़ी मूर्तियों का पुरातात्विक महत्व वे नहीं जानते । उन्हें वे देव मूर्तियाँ समझते हैं और उन्हें हाथ लगाने से डरते हैं । या फिर किसी पेड़ आदि के नीचे रख देते हैं और हाथ जोड़ने लगते हैं या पूजा-पाठ करने लगते हैं । उनसे कोई ख़तरा भी नहीं है लेकिन मुश्किल तब होती है जब जंगलों में लावारिस पड़ी इन मूर्तियों की ख़बर फैलती है और यह ख़बर मूर्ति चोरों या तस्करों तक पहुँच जाती  है । 

कभी कभी किसी अन्य तरीक़े से भी उन पर तस्करों की नज़र पड़ जाती है । उनके मुखबीर घूमते रहते हैं ना । उनका सूचना तंत्र कुछ ऐसा होता है कि सरकारी अमले से पहले उन्हें सूचना मिल जाती है और वे रातों रात ट्रकों में भरकर मूर्तियाँ ले जाते हैं इसलिए कि वे अच्छी तरह जानते हैं प्राचीन भारतीय शिल्पकला की इन प्रस्तर प्रतिमाओं की अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बहुत कीमत है ।"

पुरानी और प्राचीन मे क्या अंतर होता है ?

"सर, लेकिन यह प्रतिमाएँ और उत्खनन में निकली वस्तुएँ तो कितनी पुरानी होती हैं ।अर्थशास्त्र का नियम है कि जो वस्तु जितनी पुरानी होती है उसकी कीमत उतनी ही कम हो जाती है फिर इनकी कीमतें इतनी ज़्यादा क्यों होती है ?" अजय ने सवाल किया । 

" यह तुमने बहुत सही सवाल किया है " सर ने कहा ।" लेकिन पुरानी और प्राचीन में फ़र्क होता है कार पुरानी हो सकती है और प्रतिमा प्राचीन । प्राचीनता का सन्दर्भ धर्म,संस्कृति, इतिहास और परंपरा  से होता है उसीके अनुसार उसकी कीमत तय होती है । 

"अजय ने पूछा " सर यह निर्धारित करने के लिए कि कोई वस्तु कितनी प्राचीन है और उसकी क्या कीमत है कोई नियम तो होता होगा ?" अजय बहुत सूझ-बूझ भरे सवाल कर रहा था ।

"हाँ, है ना ।" सर ने कहा " यह एन्शिएंट मान्युमेंट्स एंड अर्क्यालोजिकल साइट्स एंड रिमेन्स एक्ट 1958  द्वारा तय होता है । इसमें प्राचीन अवशेषों की परिभाषा के अंतर्गत सौ वर्ष से अधिक के सभी प्राचीन सिक्के , अभिलेख,इमारतें,प्रतिमाएँ इत्यादि आते हैं । वस्तुओं की प्राचीनता और महत्व के अनुसार उनकी कीमत निर्धारित होती है  । 

इस एक्ट में पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं की परिभाषा , उत्खनन के नियम और परमिशन की प्रक्रिया, किसी निजी स्थान के अधिग्रहण का मुआवजा, प्राचीन अवशेषों की देखभाल , उनकी सुरक्षा के नियम और चोरी या उन्हें अपने स्थान से हटाये जाने या नुकसान पहुँचाये जाने पर सज़ा के प्रावधान आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है ।"

  अशोक काफी देर से हम लोगों की बातचीत सुन रहा था । वह जान गया था कि इन बड़े बड़े चोरों के आगे उसकी चोरी तो बहुत मामूली सी है । अचानक उसके भीतर देशभक्ति का जज़्बा जाग गया .." सर ,सबसे ज़्यादा नुकसान तो हमारा अंग्रेज़ों ने किया है । जाने कितनी बेशकीमती पुरातात्विक धरोहर वे अपने साथ ले गए । उनके म्युज़ीयम्स हमारे यहाँ की वस्तुओं से भरे हुए हैं ।" 

सर ने कहा " हाँ यह बात तो है, इसलिए कि पुरातत्व का महत्व  हमारे देश में सबसे पहले उन्हीं ने जाना । उन्नीस सौ इक्कीस में जब जॉन मार्शल पुरातत्व के निदेशक थे उन्होंने दयाराम साहनी के साथ हड़प्पा में खुदाई करवाई । यह साईट भी अंग्रेज़ों द्वारा वहाँ रेल लाइन बिछाने के दौरान प्राप्त हुई थी । बहुत सारे अवशेष तो रेल लाइन में ही दब गए । उसके बाद अन्य स्थानों पर खुदाई हुई इसलिए इस बात की संभावना अधिक थी कि वे बहुत सारी सम्पदा अपने साथ ले गए ।" 

" सर, लेकिन यह भी तो हो सकता है कि हमारे यहाँ के लोगों ने इस चोरी में उनकी मदद की हो, जानते हुए या अनजाने में भी ? " अशोक की बात पर सर केवल मुस्कुराते रहे । 

अब किशोर की बारी थी " लेकिन सर हमारे यहाँ की सरकार क्या करती रही ? उस वक्त की बात छोडिये आज भी इतनी सारी मूर्तियाँ बाहर भेज दी जाती हैं इनका संरक्षण नहीं हो पाता ऐसा क्यों है ? " 

सर ने कहा " इसका सीधा सा कारण है हमारी सरकार में इतिहास बोध और चेतना का अभाव है । सरकारी लोग न अपनी संस्कृति के बारे में जानते हैं न अपनी विरासत के बारे में, जैसे गोरी और गजनी को देश लूटकर जाते समय उस समय के लोगों ने उनकी मदद की थी ना ,वैसी ही मदद यहाँ के भ्रष्टाचारी लोग भी चोरों और तस्करों की कर रहे हैं ।" 

उसके बाद वे हम लोगों की ओर मुखातिब हुए और कहा .." मेरे ख़याल से तुम लोग अब समझ गए होगे कि इन अवशेषों का निजी उपयोग करना ग़लत है ।" " हाँ सर, हम लोग समझ गए ।  " हमने कहा  । 

हालाँकि इतने बड़े बड़े चोरों के किस्से सुनकर हमारा अपराध बोध कुछ कम हो गया था ।  "तो चलो, अब खुदाई का काम शुरू करो ..बाक़ी गपशप रात में ।" सर ने काम की शुरुआत करने की घोषणा कर दी थी ।  

हम लोगों ने अपना अपना मोर्चा संभाल लिया ,अपनी कापियाँ निकालीं और पिछले दिन की खुदाई की प्रक्रिया और प्राप्त अवशेषों की सूची का अध्ययन किया । “ क्या यार इतने दिनों से खुदाई कर रहे हैं बस इतना ही खोद पाये ।“ अजय अभी भी वातावरण को सहज बनाने की कोशिश कर रहा था । 

जाने कैसे डॉ. वाकणकर ने उसकी बात सुन ली और कहा “ धीरज रखो बेटा, पुरातत्व की खुदाई इतनी आसान नहीं है । यह गढ्ढा खोदने का काम नहीं  है, रोज़ थोड़ा थोड़ा खोदते हुए आगे बढ़ना होता है, किसी वैज्ञानिक की तरह, किसी खोजी की तरह, किसी चिकित्सक की तरह ।  इसे हलके में बिलकुल नहीं लिया जाना चाहिए, गंभीर होकर काम करोगे तो परिणाम निकलेगा ।"

हम लोग पहले से ही मायूस थे, उनकी बात सुनकर और मायूस हो गए  । सर हम लोगों की उदासी भाँप गए  । मुस्कुराते हुए उन्होंने  कहा “ अरे दुष्टों, इसमें उदास होने की क्या बात है , तुम लोग तो इतिहास बोध से लैस नौजवान हो और इस देश के बहुत सारे पढ़े लिखे और बड़े बड़े लोगों से बेहतर हो । चलो तुमको एक बढ़िया किस्सा सुनाता हूँ ।" किस्सा सुनने के तो हम लोग शौक़ीन थे ही सो सर की बात सुनने के लिए फिर उनके पास आ गए ।

एक और मजेदार किस्सा 

"एक बार कि नई क्या हुआ " सर ने किस्सा बताना शुरू किया .." हम लोग एक साइट पर खुदाई कर रहे थे । एक दिन वहाँ एक नेताजी घूमते हुए आ गए । ट्रेंच को देखते हुए उन्होंने  अपने अन्दाज़ में पूछा “हूँ... कितने दिनों से खुदाई चल रही है ?“ 

हमने बताया “ साब, एक माह से । “ 

इतना सुनते ही वे आग बबूला हो गए  और ट्रेंच की ओर इशारा करके चिल्लाने लगे “एक महीने से खुदाई चल रही है और बस इतना ही खोदा है आप लोगों ने ? कितने आदमी लगा रखे हैं .. सरकार का पैसा क्या फालतू समझ रखा है जो इस तरह बरबाद कर रहे हो । मैं ये सब खुदाई-वुदाई बंद करवा दूंगा ।" 

इससे पहले कि हम उन्हें  कुछ समझा पाते कि नेताजी गड्ढा खोदने और पुरातत्व की खुदाई में बहुत फर्क होता है, वे आगबबूला होकर चल दिए और जाते जाते कह गए  ..” अभी तीन दिन बाद मैं फिर इधर आउंगा, मुझे ठीक- ठाक काम दिखना चाहिये ।“

"फिर आपने क्या किया सर?" अशोक अब पूरी तरह सहज हो चुका था "और वो नेताजी दोबारा वहाँ वापिस आये क्या ?" “अरे, नेता जी भी कहीं पांच साल से पहले सूरत दिखाते हैं क्या ..उनको कहाँ आना था वापस ..वो सब ऐसे ही कह दिया था ।“ सर ने कहा । “मगर मुझे लगा क्या पता वापिस आ जायें तो मैंने दो मज़दूरों को बुलाया और साइट से बाहर दूर की एक ज़मीन बताकर कहा, वहाँ खोद डालो रे जितना खोद सको, बस ऊंडे जाओ ऊंडे जाओ  । तो ऐसा है भाइयों अपने सत्ताधीशों का पुरातत्व ज्ञान ।" 

डॉ. वाकणकर द्वारा कहे गए शब्द ' ऊंडे जाओ ' मतलब खोदे जाओ , सुनकर हम लोग हँस हँस कर लोट पोट हो गए । "सर, ऐसे बेवकूफ नेता कौन थे और किस पार्टी के थे ?" अशोक ने हँसी रुकने के बाद उनसे पूछा । सर ने मुँह पर ऊँगली रखकर कहा "चुप । नाम नहीं बताऊंगा ।" । फिर कुछ देर बाद गम्भीर होकर कहने लगे  “ ऐसा नहीं है कि वे कुछ नहीं जानते थे या यह केवल तकनीकी ज्ञान के अभाव के वज़ह से हुआ । दरअसल समाज में व्याप्त यह मनोवृति इतिहास को और पुरातत्ववेत्ताओं के कार्य को गैरज़रूरी समझने के कारण है । इतिहास बोध की कमी तो समाज में है ही लेकिन इसके तकनीकी पक्ष को भी वे गौण मानते हैं इसलिए यह उनकी समझ से परे है ।"


*शरद कोकास*

दस्तावेज़ पढ़ने के लिए लिंक [1 2 3 4] पर क्लिक करें 

एन्शिएंट मान्युमेंट्स एंड अर्क्यालोजिकल साइट्स एंड रिमेन्स एक्ट, 1958 (The Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains Act, 1958) की मूल गजट (राजपत्र) प्रति का कानूनी प्रारूप कुछ इस प्रकार दिखाई देता है: [1]
यह एक आधिकारिक 'असाधारण राजपत्र' (Extraordinary Gazette) है, जो भारत के राजपत्र (The Gazette of India) का हिस्सा है और विधायी विभाग (Ministry of Law) द्वारा प्रकाशित होता है। इसके शीर्ष पर द्विभाषी (हिंदी-अंग्रेजी) प्रकाशन विवरण, अधिनियम संख्या (No. 24 of 1958) और राष्ट्रपति की सहमति (28 अगस्त, 1958) की तिथि अंकित होती है। दस्तावेज़ में प्रस्तावना, मुख्य विषय और उसके बाद अध्यायों (Chapters) तथा धाराओं (Sections) का संरचित विवरण शामिल है। [1, 2, 3, 4]
सरकारी दस्तावेज़ प्रारूप की मुख्य विशेषताएं: [1, 2]
  • शीर्षक: भारत का राजपत्र (The Gazette of India) - असाधारण (Extraordinary)।
  • विशिष्ट पहचान: अधिनियम संख्या, वर्ष और राष्ट्रपति की सहमति की तिथि।
  • संरचना: प्रस्तावना के बाद अनुभाग (Sections) और अध्याय (Chapters)।

विस्तृत जानकारी के लिए आप भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की आधिकारिक वेबसाइट देख सकते हैं।
[1]

20. क्या आपने पाँच खुर वाला घोडा देखा है ?

 


अरे, यह झूठ नहीं है एक ज़माने  मे सचमुच ऐसा घोड़ा होता था । विश्वास नहीं होता ना ? तो आगे पढिए इससे जुड़ी रोचक कहानी 
 

🐴 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 🐴

              शरद कोकास 

पूर्वकथा- अब तक आपने पढ़ा कि विक्रम यूनिवर्सिटी उज्जैन के कुछ छात्र एक ताम्राश्म्युगीन साईट पर उत्खनन के लिए पहुँचे  हैं । आज यहाँ पहुँचे उन्हें नौ दिन हो गए । आज सुबह साईट पर सांप निकल आया था सो काम कुछ देर के लिए रुक गया था लेकिन इस बहाने सांप के बारे में पूरी जानकारी उन्हें वाकणकर सर से मिल गई और उन्होंने कद्रू और विनता की पौराणिक कथा भी जान ली  । दिन का काम समाप्त करके वे अपने तम्बू में लौट आये हैं । फरवरी का महीना है लेकिन ठण्ड समाप्त नहीं हुई है इसलिए आज अलाव जलाकर आग के इर्द गिर्द बैठकर गपशप हो रही है । छात्रों में सब कुछ जान लेने की इतनी उत्सुकता है कि वे कोई भी अवसर छोड़ना नहीं चाहते ।चलिए देखते हैं आज क्या हुआ । आज का विषय है घोड़ा और ओलम्पिक*  ... 

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🦄 *भाग - बीस* 🐴

🦄 20 - *पाँच खुर वाला घोड़ा* 🦄

 

🐴ठण्डी हवाओं ने आज अपने बक्से से कुछ तेज़ सुइयाँ निकाल ली हैं और हमें चुभो रही है  । ठण्ड से डरने का एक कारण यह भी है कि हम लोग शहर के रहने वाले हैं और इतनी ठण्ड की हमें आदत नहीं है । राममिलन भैया का बिस्तर अपने तम्बू में स्थापित करने के उपरांत हम लोग भोजन करने के लिए भोजनशाला में चले गए ।

अधिक रात नहीं हुई थी सो इतनी जल्दी बिस्तर में घुसने का मन भी नहीं था । ठण्ड की वज़ह से कहीं  टहलने जाने की इच्छा भी नहीं हो रही थी । लेकिन किसी न किसी तरह समय तो बिताना ही था और हम किसी उपाय की तलाश में थे । कभी कभी ऐसा होता है कि हम समय बिताने के समस्त विकल्पों के बावज़ूद संतुष्ट नहीं होते हैं और किसी नवीनता की तलाश में रहते हैं ।

🐴ठण्ड भगाने के उपायों के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है । सामान्य ठण्ड होती है तो हम हल्का फुल्का कोई स्वेटर पहन लेते हैं ,फिर ठण्ड बढ़ी तो कानों को ढँक लेते हैं । कोट, ओवरकोट,ऊनी पैंट , मफलर , इनर ,टोपी,शाल जाने कितने विकल्प होते हैं हमारे पास । 

लेकिन दुनिया में ऐसे करोड़ों लोग हैं जिनके पास यह सब कुछ नहीं होता । मुझे उस हिमयुग में जीवित रहने वाले उस आदिम मनुष्य की याद आई जिसके पास तन ढंकने के लिए भी कुछ न था उसके बाद भी वह भीषण ठण्ड में बचा रहा । ऐसा क्या था उसके पास मैं सोचने लगा और मुझे याद आया ...हाँ उसके पास आग थी ।

🐴सो हमने भी आज भोजनोपरांत कहीं टहलने जाने की बजाय तम्बू के सामने आग जलाकर ठण्ड से मुकाबला करते हुए गपशप करने का प्लान बनाया । कुछ लकडियाँ हम भोजनशाला से ले आए कुछ आसपास से इकठ्ठा कर लीं । 

आर्य साहब ने हम लोगों को लकड़ियाँ चुनते देखा तो खुश हो गए .." अच्छा तो आज कैंप फायर का प्रोग्राम है ?" मैंने कहा " सर, पहले लकड़ियाँ तो इकठ्ठी हो जायें , फायर तो बाद की बात है ।" 

उन्होंने हमारा उत्साह वर्धन करने के लिए घोषणा कर दी  “ जो सबसे ज़्यादा लकड़ियाँ इकठ्ठा करेगा उसे मेडल प्रदान किया जाएगा ।" इतने में डॉ. वाकणकर आते हुए दिखाई दिए उन्होंने आर्य साहब की यह घोषणा सुन ली थी । 

“ क्यों यहाँ कोई ओलम्पिक हो रहा है क्या ? “ उन्होंने सवाल किया । " हाँ सर , आग जलाने के लिए लकड़ी चुन कर लाने की स्पर्धा हो रही है । " अजय ने कहा ।

🐴अजय दौड़कर सर के तम्बू से एक मोढ़ा लेकर आ गया और उनके लिए बैठने की व्यवस्था कर दी । अब तक पर्याप्त लकड़ियाँ इकठ्ठा हो चुकी थीं । सर ने कहा "भाई आग तो जलाओ ।" अशोक की जेब में माचिस थी लेकिन पोल खुल जाने के भय से उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि जेब से माचिस निकाल कर आग लगाए । 

" अभी आया " कहकर वह उठा और भोजनशाला तक गया फिर तुरंत वहाँ से लौटकर आया और जेब से माचिस निकालकर आग जलाने लगा । सर मुस्कुराए और धीरे से कहा .. " अरे जेब में थी तो यहीं निकाल लेना था ना  ...इतना नाटक करने की क्या ज़रूरत थी ।" अशोक ने कुछ नहीं कहा और शर्म की वज़ह से लकड़ियों के परदे में अपना मुँह छुपा लिया ।

🐴हम लोग भी आग सुलगाने में अपनी अपनी तरह से अशोक की मदद करने लगे  । जैसे ही लकड़ियों ने आग पकड़ी और लपटें  कुछ तेज़ हुई  हम लोग उसके इर्द -गिर्द पालथी मारकर बैठ गए और सर से कुछ ज्ञानवर्धक बात सुनने की आशा में अपने कान खड़े कर दिए ।  

हमें पता था, सर से जब तक कोई सवाल नहीं करेंगे उनके मुखारविंद से कोई ज्ञानवर्धक बात नहीं निकलेगी । 

अजय ने इसका ज़िम्मा लिया और तुरंत उनकी पिछली बात के तारतम्य में प्रश्न उछाल दिया “ सर ये ओलम्पिक खेलों की शुरुआत कैसे  हुई ? 

🐴सर ने कहा “ यूनान या ग्रीस के बारे में तो तुम लोग जानते ही हो । ग्रीक माइथोलॉजी के अनुसार सबसे पहले खेल की यह प्रतियोगिताएँ ओलिम्पस पर्वत पर रहने वाले यूनानी देवी देवताओं के बीच प्रारंभ हुईं । 

एक दंतकथा के अनुसार एक प्रतियोगिता में सर्वोच्च देवता का पद प्राप्त करने के लिए उनके देवता ज्यूस या जीयस ने अन्य देवताओं को हराया । कुछ लोग कहते हैं हेराक्लीज़ नाम के एक देवता ने इसकी शुरुआत की । वैसे ओलम्पिक की शुरुआत के बारे में कुछ और दंतकथाएँ भी हैं । एक कथा तुम लोगों को सुनाता हूँ ।"

🐴सर की बात सुनकर हम लोग आग के और करीब आ गए । सर ने कहानी शुरू की । 

" प्राचीन यूनान में ओयेनामस नामका एक राजा था । उसकी हिप्पोडामिया नामक एक सुन्दर कन्या थी । एक श्राप के अनुसार यह तय था कि राजा की मृत्यु उसके ही दामाद के हाथों होगी इसलिए वह अपनी बेटी का विवाह ही नहीं होने देता था । लेकिन जब ज़रूरत हुई और रिश्ते आने लगे तो उसने यह शर्त रखी कि विवाह का इच्छुक जो भी युवक होगा उसे सर्वप्रथम राजा को रथ दौड़ में हराना होगा तभी वह उसकी कन्या से विवाह कर सकेगा । राजा ओयेनामस के पास समुद्र के देवता पोसाईडान द्वारा दिया गया एक दिव्य रथ था जिसके घोड़े हवा से भी तेज़ दौड़ते थे, इसलिए वह जानता था कि उसे हराना असम्भव है ।"

🐴कहानी में हम लोगों को मज़ा आने लगा था । सर ने कहानी आगे बढ़ाई "अब जो भी युवक राजा की  बेटी से विवाह करने आता था वह रथ दौड़ में राजा से हार जाता था और उसके हाथों मारा जाता । इस तरह अठारह युवकों को रथ दौड़ में हार जाने की वज़ह से अपनी जान गंवानी पड़ी ।

 अंततः पोलेप्स नामक एक राजकुमार हिप्पोडामिया से विवाह करने आया । वह इतना सुन्दर था कि उसे देखते ही राजकुमारी उसे अपना दिल दे बैठी । इधर राजकुमार पोलेप्स ने इस दौड़ में जीतने के लिए एक चाल चली । 

उसने राजा के इस दिव्य रथ के सारथी मार्तिलस को पटा लिया । उसने उसे प्रलोभन दिया कि वह अगर जीतेगा तो वह राजा को मार डालेगा और उसके राज्य का स्वामी बनने के बाद उसे आधा राज्य भी दे देगा । यही नहीं बल्कि विवाह के बाद उसे पहली रात भी राजकुमारी के साथ बिताने को मिलेगी ।"

🐴"बाप रे ।" अजय ने कहा । " यह तो बड़ा भारी प्रलोभन था ।" 

"आगे सुनो.." सर ने कहा । "मार्तिलस ने पोलेप्स की बातों में आकर राजा के रथ के पहिये से कांसे की पिन निकालकर उसकी जगह मोम की पिन लगा दी । अब जैसे ही रथ दौड़ प्रतियोगिता प्रारंभ हुई कुछ ही देर में राजा के रथ की मोम की पिन पिघल गई और वह अपने ही रथ के नीचे आ गया इस तरह उसकी मृत्यु हो गई  । हाँ उसका सारथी इसमें बच गया लेकिन राजकुमार ने उसे पकड़कर उसकी हत्या कर दी । "

🐴" बिलकुल ठीक किया सर उसने " अजय ने कहा । " लेकिन अपनी बीबी का सौदा किया यह अच्छा नहीं किया ।" "अरे यह कहानी है भाई ।" रवींद्र ने कहा "कहानियों में ऐसा ही होता है, हमारे यहाँ नहीं धर्मराज युधिष्ठिर ने अपनी पत्नी को ही दांव पर लगा दिया था । ' फिर वह सर की ओर मुख़ातिब होकर बोला .." हाँ सर, फिर क्या हुआ ? 

🐴"फिर क्या होना था ।" सर ने कहा " उसकी राजकुमारी से शादी हो गई । कहते हैं कि इसी जीत की स्मृति में और राजा को श्रद्धांजलि स्वरूप पोलेप्स द्वारा ओलम्पिक खेलों की शुरुआत की गई । इस तरह प्राचीन यूनान में उत्सव-पर्व आदि पर खेलकूद प्रतियोगिताएं  आयोजित होने लगीं । 

ओलिम्पस पर्वत

कहते हैं यह मशहूर प्रतियोगिता यूनान के पेलोपोनेसस प्रांत में ओलम्पिया नामक स्थान पर होती थी । इसीलिए इसका नाम ओलम्पिक पड़ा । यहाँ ओलिम्पस पर्वत पर रहने वाले ग्रीक देवता ओलिम्पी जियस का मन्दिर था जिसमें यूनानी मूर्तिकार फीडियस द्वारा निर्मित जियस की मूर्ति थी । साथ ही इस मन्दिर के आसपास अन्य देवी देवताओं, वीर पुरुषों और ओलम्पिक विजेताओं की भी अनेक मूर्तियाँ थी । यहाँ व्यायामशालायें भी थीं । एक दंतकथा के अनुसार हेराक्लीज़ ने यह ओलिम्पी जीयस का मंदिर बनवाया था । हालाँकि पुरातत्ववेत्ता जानते हैं कि सारे मंदिर और मूर्तियाँ मनुष्यों ने ही बनाई थीं ।"

🐴“सर जी, उनका देवता तो जियस था फिर ये ओलिम्पी जियस नामक देवता उससे कोई अलग देवता था क्या ?“ अजय ने बीच में ही सवाल किया ।

 “अरे नहीं रे बावड़े ।“ सर ने कहा “अपने यहाँ कैसे एक ही देवता के अलग अलग नाम होते हैं जैसे … “ वे आगे उदाहरण देने ही वाले थे कि राममिलन ने तपाक से कहा …” जैसे बजरंग बली के नाम पवनसुत, अंजनीपुत्र, महावीर, केसरी नंदन ,फिर दक्षिणमुखी हनुमान, उत्तरमुखी हनुमान, मनोकामना हनुमान आदि । 

“ वाह भाई वाह ।“ आर्य सर ने कहा …” देखो इस बजरंग बली के भक्त ने बिलकुल सही बताया । अपने यहाँ उज्जैन में जैसे कालभैरव हैं और उन्हें लोकभाषा में भेरू बाबा कहा जाता है उनके नाम से भेरू बाबा के कितने मंदिर बन गए हैं । 

"हाँ सर“  मैंने कहा “मैंने भी देवास गेट पर एक उखाड़ पछाड़ भेरू बाबा का मंदिर देखा है । ऐसा कहते हैं कि जब भेरू बाबा नाराज़ हो जाते हैं तो तबाही मचा देते हैं ।“ वाकणकर सर को पता नही यह सुनकर क्या याद आया , वे उठे और अभी आता हूँ कहकर अपने तम्बू की ओर चले गए ।

 🐴अशोक ने उनके जाते ही कहा “भाई अपने यहाँ तो भेरू बाबा ने अभी तक कोई तबाही नहीं मचाई है, लेकिन यह सही है कि एक भगवान से लोगों का मन नहीं भरता इसलिए सभी ने अपने अपने भगवान बना लिए हैं, उनके नाम पर अलग अलग धर्म बना लिए हैं और अब अपने अपने भगवानों को लेकर आपस में लड़ रहे हैं । एक कहता है मेरा भगवान बड़ा है दूसरा अपने भगवान को बड़ा बताता है, और तो और एक धर्म के भीतर भी कई उपधर्म हो गए हैं और उनके भी अपने अलग अलग भगवान हैं । जिनके भगवान एक हैं उनके अनुयायियों  में भी इस बात के लिए लड़ाई हो रही है कि मैं बड़ा भक्त हूँ । और जिनके अनुयायी एक हैं, उनके भगवानों में लड़ाई हो रही है । कहीं मनुष्य ने अपने आप को भगवान घोषित कर दिया है और दूसरे मनुष्य के भगवान को खारिज कर दिया है । सबके अपने अपने नियम हैं और वे अपने नियमों से अन्य को संचालित करना चाहते हैं । “

🐴“ यहाँ तक तो ठीक है …” किशोर ने कहा । “ लेकिन अपने धर्म को बड़ा और अपने भगवान को बड़ा और अन्य के धर्म और भगवान को छोटा बताकर जो वैमनस्यता फैलाई जाती है और दंगे किए जाते हैं वह तो बिलकुल ग़लत है । “ 

“ इसका केवल एक कारण है …” मैंने अपना ज्ञान बघारना शुरू किया । “ वास्तव में लोगों ने इतिहास को ठीक ढंग से पढ़ा ही नहीं है । इतिहास बोध के अभाव में केवल सतही ज्ञान व अपने ग्रंथों के आधार पर डींग हाँकना कहाँ तक उचित है । “ 

“ बिलकुल सही …” अशोक ने कहा “ कुछ ग्रंथ तो लिखे भी इसी उद्देश्य से गए जैसे बौद्ध धर्म की महत्ता समाप्त करने के लिए मनुस्मृति रची गई । फिर ग्रंथ लिखे जाने के बाद अपने ढंग से उनकी व्याख्या की गई । फिर किताबों को लेकर भी लोग लड़ने लगे । कुल मिलाकर यह धर्म है ही झगड़े की चीज ।“

🐴आर्य सर समझ गए कि अब बहस गम्भीर मोड़ की ओर जा रही है सो उन्होंने  इन्टरप्ट किया …”भाई यह भेरू बाबा से तुम लोग कहाँ पहुँच गए ?" फिर वे ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे और बोले …” सुनो,सुनो ..भेरू से याद आया, तुम लोगों से दो बैच पहले एक स्टूडेंट था भेरू मालवी नाम था उसका । एक दिन वो मेरे पास आया और कहने लगा, सर मेरा नाम बहुत खराब है मैं इसे बदलना चाहता हूँ । मैंने कहा, अरे तुम्हारा नाम तो बहुत बढ़िया है भेरू यानि भैरव, कालभैरव, शिव का नाम है यह । तुम अपने नाम का उच्चारण भैरव मालवी करो देखो कितना अच्छा लगता है । बस नाम को लेकर उसकी ग्लानि समाप्त हो गई ।“ हम लोग समझ गए कि धर्म  पर अब कोई गम्भीर चर्चा नहीं हो सकती ।     

🐴वाकणकर सर इस बीच अपने तम्बू से एक चक्कर लगाकर वापस आ चुके थे और मोढ़े पर विराजमान हो गए थे । “सर वो ओलम्पिक के बारे में बता रहे थे आप ।“ अजय ने सर को वापस आया देखकर मूल विषय पर वापसी के लिए संकेत दिया । 

“हाँ ।“ सर बोले “मैं कह रहा था कि उस दौर में ओलम्पिक देखने हज़ारों की संख्या में लोग आते थे । तम्बुओं में उनके रहने की व्यवस्था  की जाती थी लेकिन स्त्रियों के लिए इस ओलम्पिक में प्रवेश निषेध था । इस नियम का उल्लंघन करने वाली स्त्री को मौत की सज़ा तक दी जा सकती थी ।“ 

🐴“यह तो बड़ा अन्याय है सर ।“ रवीन्द्र ने कहा । “हाँ ।“ सर ने कहा “ हो सकता है देशकालानुसार ऐसा नियम रहा हो, यह तो बहुत बाद में स्त्रियों ने खेल में भाग लेना शुरू किया । हमारे देश में भी स्त्रियों के लिए बहुत से खेल वर्जित थे और आज देखो लड़कियाँ ही सर्वाधिक पदक जीतती हैं ।“  “ सर अपने यहाँ तो बचपन से ही लड़कियों को लड़कों के खेल खेलने से मना किया जाता है अपने यहाँ की लड़कियाँ कहाँ पदक जीतती हैं । “ अशोक बोला । 

🐴“ सर वो ओलम्पिक..” अजय ने फिर गाड़ी पटरी पर लाने के लिए इशारा किया । “ हाँ तो मैं बता रहा था... “ सर ने कहा “ इन प्राचीन ओलम्पिक खेलों में कुश्ती, चक्रफेंक, भालाफेंक, घुड़दौड़, रथदौड़ आदि प्रमुख खेल थे । रथदौड़ के मैदान को हिप्पोड्रोम कहते थे । एक ईवेंट में एक रथ को मैदान के बारह चक्कर लगाने होते थे । कई बार आपस में टकराकर भीषण दुर्घटनायें भी होती थीं ।" 

🐴“सर लेकिन इसमें तो केवल सम्पन्न लोग ही भाग ले पाते होंगे आखिर रथ और चार घोड़े जुटाना आसान नहीं है ।“ मैंने कहा । “हाँ ।“ सर बोले “सम्पन्न लोग ही विजेता होते थे । लेकिन वे रथ नहीं दौड़ाते थे बल्कि उनके सारथी दौड़ाते थे और विजेता भी रथ का सारथी नहीं बल्कि मालिक ही होता था । भले ही दुर्घटना में सारथी मारा जाये इनाम मालिक को ही मिलता था । क्योंकि सारथी तो दास होता था और उसकी कोई हैसियत नहीं थी । “

🐴"यह तो बहुत ही ग़लत बात है सर ।“ रवींद्र ने कहा " मतलब सारथी को मनुष्य ही नहीं समझा जाता था ।" " यार, तुम लोगों को मालिक और दास की पड़ी है और बेचारे घोड़े का कोई रोल नहीं ? इनाम तो घोड़े को भी मिलना चाहिए । “ मैंने कहा । 

मेरी बात सुनकर सारे लोग हँसने लगे " लो सुन लो इनकी बात ।" रवीन्द्र ने कहा यहाँ इंसान की बात हो रही है और इन्हें घोड़े की चिंता है । मैंने कहा " क्यों नहीं होगी भाई आख़िर है तो वह इंसान के बराबर का ही साथी आख़िर जंगल के घोड़े ने उंगलियाँ  गँवाकर खुर क्या प्राप्त किया इंसान का वाहन बन गया ।

“ ये क्या कहानी है भाई ? “ रवीन्द्र ने सवाल किया ।“ तुम्हें  नहीं पता ? “ मैंने कहा । “ चलो बताता हूँ ।"

🐴अब सब लोगों का ध्यान मेरी ओर था । मैंने अपनी बात शुरू की "लाखों साल जब इस धरती पर जंगल ही जंगल थे  घोड़े की पाँच उंगलियाँ हुआ करती थीं । इसका कारण यह था कि जंगलों में ज़मीन पर सूखे पत्ते बिछे होते थे और उन पर दौड़ने के लिए अधिक उंगलियाँ ही काम आती थीं । इनकी वज़ह से उसे ज़मीन पर पैर अच्छी  तरह टिकाने में मदद मिलती थी । 

कालांतर में जब महावन कम होते गए और मैदानों की संख्या में वृद्धि होने लगी तब घोड़े के उन पूर्वजों को भी खुले मैदान में आना पड़ा । जंगल में छुपने की जगह नहीं बची थी और केवल वही जानवर बच सके जिनकी लम्बी टांगें थीं जिनसे वे तेज़ दौड़ सकते थे । उस वक़्त सबसे ज्यादा तेज़ दौड़ने वाले जानवर घोड़े ही थे । 

🐴"लेकिन उसे मैदानी इलाके में आने की ऐसी क्या ज़रूरत पद गई ?" अजय ने सवाल किया ।मैंने कहा " अरे भाई ,उसे भी तो चारा चाहिए था ना और पहले जंगल में वह हिंसक प्राणियों से अपनी रक्षा कर लेता था जब जंगल कम हुए तो उसे भी मैदान में आना पड़ा । अब मैदान में दौड़ने के लिए  अधिक उंगलियों की ज़रूरत ही नहीं बची सो घोड़े की अगली नस्लों में पाँच से घटकर तीन उंगलियाँ हुईं और अंतत: हजारों साल बाद केवल दो उँगलियाँ रह गईं जिन्हें आज हम खुर कहते हैं  । 

इसके अलावा घोड़े भी पहले आज जैसे कद्दावर नहीं थे बल्कि बौने थे इधर उनकी उँगलियाँ कम होती गईं और कद बढ़ता गया । यह सब उनके जींस में परिवर्तन के कारण हुआ । 

पुरातत्ववेत्ताओं को सभी काल के घोड़ों की हड्डियाँ मिल चुकी हैं जिनके आधार पर घोड़े की इन प्रजातियों के नाम क्रमश: हिप्पस, मेसोहिप्पस ,प्लियोहिप्पस और इक्वस रखे गए हैं ।"

🐴सभी ने मेरी बात पर ताली बजाई । रवींद्र ने कहा “अच्छा इसलिए  ओलम्पिक में घुड़दौड़ के मैंदान को घोड़े के जैविक नाम हिप्पो की वज़ह से हिप्पोड्रोम कहते हैं ।“अजय का अभी ओलम्पिक की बात से मन नहीं भरा था उसने सर से कहा " सर यह तो हो गई प्राचीन काल के ओलम्पिक खेलों की बात लेकिन आधुनिक काल में यह खेल कैसे शुरू हुए ?" 

सर ने कहा "भाई, आधुनिक ओलम्पिक खेलों के बारे में तो कोई खिलाड़ी ही अच्छी तरह से बता पायेगा । लेकिन मेरी जानकारी में  तीन सौ तिरानबे ईसवी में यह खेल बंद हो गए थे । दोबारा इनकी शुरुआत 1896 में हुई । उसके बाद हर चार साल के अंतराल पर यह खेल होते रहे । 

बीच में शायद युद्ध के समय यह खेल बंद भी हुए थे ।" अजय ने फिर पूछा " सर भारत ने कब इन खेलों में भाग लिया ?" सर ने ऊब कर कहा.." अब सब मुझ से ही पूछोगे क्या .. वैसे मेरी जानकारी के अनुसार भारत ने उन्नीस सौ में इन खेलों में भाग लिया था और एथलेटिक्स में दो रजत पदक भी जीते थे ।

🐴हम सब लोगों को अब नींद आने लगी थी । रवीन्द्र ने कहा "आज ओलम्पिक  के बारे में बढ़िया कहानी सुनने को मिली, लेकिन यह बात तो है कि कहानियों का कोई ओलम्पिक होगा तो शरद को गोल्डमेडल ज़रूर मिलेगा । “ठीक है ठीक है । चलो अब सो जाकर …सुबह जल्दी सोकर नहीं उठे तो खैर नहीं । 

और सुनो ..ओलम्पिक की शुरुआत करने वाली उस राजकुमारी का नाम याद है न ..हिप्पोडामिया  ..इसका अर्थ होता है घोड़ों को काबू में रखने वाली, सो वह राजकुमारी भी कई घोड़ों की मालकिन थी । चलो अब सभा समाप्त ।“ सर ने हमारी अलाव सभा बर्खास्त करते हुए फरमान जारी किया ।


🔲 *शरद  कोकास* 🔲


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