📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘
✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼
पिछले भाग में आपने आदिम मनुष्य की कला,गुफाओं में चट्टानों पर उसकी चित्रकारी और उसके आदिम विश्वास और आदिम धर्म के बारे में पढ़ा । इस भाग में पढ़िए मनुष्य के आवास के बारे में और यह भी कि जले हुए मकान के अवशेष से पुरातत्ववेत्ता कैसे उसका चित्र प्रस्तुत कर देते हैं*
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*भाग 40*
*संभालकर रखना अपनी आग*
" अच्छा, सबका नाश्ता हो गया कि नहीं ?" वाकणकर सर इतनी देर में लौटकर आ गए थे । "हाँ सर ।" हम लोगों ने समवेत स्वर में जवाब दिया । "तो फिर बैठे क्यों हो.. चलो सब लोग ट्रेंच पर, आज का काम नहीं शुरू करना है क्या ?" काम तो हमें शुरू करना ही था लेकिन सर से बातें करने में भी बहुत आनंद आ रहा था l हम लोग सर से उनकी वैश्विक खोज भीमबैठका के बारे में बातें करना चाहते थे लेकिन हमारे सीनियर्स ने बताया था कि सर उस पर ज़्यादा बातें किसी से करते नहीं हैं । भीमबैठका की खोज कैसे हुई यह कथा वैसे तो हम सब लोगों को मालूम ही थी लेकिन उसे डॉ.साहब के मुँह से सुनने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ था । उनकी पी. एच. डी. भी भीमबैठका पर ही थी, वह हम लोगों ने लायब्रेरी में देख रखी थी । मात्र सौ पन्नों की वह थीसिस थी वह जबकि लोग इससे बड़े शोध प्रबंध लिखते थे । सुनते हैं कि पहले उनकी थीसिस कम पन्नों की होने के कारण स्वीकृत नहीं हुई थी लेकिन उनकी खोज इतनी महत्वपूर्ण थी कि अंततः उन्हें पी एच डी अवार्ड करनी ही पड़ी । मैंने और रवीन्द्र ने आँखों आँखों में ही इशारा किया कि यह बात से से न पूछी जाए उसीमे बेहतरी है ।
“ सर एक सवाल और …। “ रवींद्र ने कहा । मैं समझ गया वह सर से किसी नए टॉपिक पर कुछ पूछना चाहता है और सर की उपस्थिति को भुनाने का आज उसका पूरा इरादा है । “सर, उत्खनन में किसी आवास के अवशेषों में जब राख मिलती है तो कैसे पता चलता है कि वह राख चूल्हे की है या अग्निकांड की ?“ “ यह बढ़िया सवाल पूछा तुमने ।“ सर ने हम लोगों को उठने का इशारा करते हुए कहा .."चलो ट्रेंच की ओर चलते हुए बताता हूँ ।" हम लोगों ने अपनी कापियाँ उठाईं और सर के साथ हो लिए । सर ने चलते चलते अपनी बात जारी रखी .." चलो, तुम लोगों से एक सवाल पूछता हूँ , ठीक से जवाब देना । मान लो एक पुरातत्ववेत्ता को किसी उत्खनन में एक जले हुए आवास के चिन्ह मिलते हैं । अब सीन कुछ ऐसा है कि फर्श पर एक से अधिक गढ्ढे हैं और वे गढ्ढे राख़ और जले हुए कोयलों से भरे हुए हैं , उनके साथ सरकंडे के जले हुए टुकड़े भी हैं । कोयले की अनेक लम्बी काली धारियाँ एक बिंदु पर मिलती हुई दिखाई दे रही हैं और आवास के ठीक बीचोबीच सफेद राख की एक परत है । सफ़ेद राख़ की इस परत के नीचे नीचे जली हुई रेत की एक लाल परत है ।"
सर की बात हम लोग ध्यान से सुन रहे थे । हो सकता है आगे पुरातत्व विभाग की नौकरी के किसी इंटरव्यू में हमसे ऐसा ही सवाल पूछा जाये । सर आगे कहने लगे "इस तरह इस अग्निकांड में सब कुछ अस्तव्यस्त सा है । अब इतने अवशेष देखकर एक सामान्य आदमी अन्दाज़ नहीं लगा सकता कि वास्तव में यहाँ क्या हुआ होगा । चलो तुम लोग अपना दिमाग़ लगाओ कि इस अग्निकांड में जला हुआ आवास किस प्रकार का रहा होगा ?" इतना कहकर सर चुप हो गए । हम लोग तो सर का सवाल भी ठीक से समझ नहीं पाए थे लेकिन जवाब तो देना ही था ।
" सर, इतना तो तय है कि उस झोपडी की छत सरकंडों से बनी हुई होगी और राख़ और कोयले से भरे जो गढ्ढे हैं वे उस मनुष्य का खाना पकाने का स्थान होगा । " अशोक ने अपना दिमाग़ लगाकर जवाब दिया । सर मुस्कुराये " भाटीजी को देख लो वे इस छत के नीचे एक ही जगह पर चूल्हा जलाते हैं या अलग अलग जगह पर और हम सबके घर में भी एक ही रसोई होती है ।" फिर हम लोगों के मायूस चेहरे देखकर उन्होंने कहा .."कोई बात नहीं मैं बताता हूँ । इस दृश्य को देखकर पुरातत्ववेत्ताओं ने यह अनुमान लगाया कि राख व कोयले से भरे गढ्ढे जहाँ हैं वहाँ छत को थामने वाली बल्लियाँ रही होंगी । बल्लियाँ गिर गईं और उनके गिरने से बने गड्ढों में राख़ और कोयला जमा हो गया । जले हुए सरकंडों के टुकड़े यह बताते हैं कि छत सरकंडों की बनी थी यह अशोक ने सही बताया । और फर्श पर दिखाई देने वाली काली लम्बी धारियाँ जली हुई बल्लियों के नीचे गिरने से बनी हैं ।"
"सर, वो मकान के बीचोबीच जो सफ़ेद राख़ है उसका क्या चक्कर है?" अजय से रहा नहीं जा रहा था । सर ने हम लोगों की ओर देखा और कहा "देखो इसको बड़ी जल्दी है, थोड़ा खुद दिमाग़ लगा कर बताओ ?" अजय ने पलकें झपकाईं और कहा "सर, यदि राख़ और कोयले वाली जगह पर चूल्हा नहीं था तो फिर इस सफ़ेद राख़ वाली जगह पर ज़रूर चूल्हा रहा होगा ।" इतना कहकर वह दो कदम पीछे हो गया । सर ने कहा .."अरे, वह चूल्हा जैसा दिखता ज़रूर है लेकिन वहाँ खाना नहीं पकाया जाता था । मैंने बताया ना कि वहाँ एकदम साफ़ और सफ़ेद राख़ है इसका मतलब यह है कि वहाँ केवल आग सम्भाल कर रखी जाती थी । अब उन्हें आग जलाना तो आता नहीं था इसलिए पेड़ों के घर्षण से जंगल में जो आग लगती थी उसे वे ले आते थे और लकड़ियाँ वगैरह डाल कर उसे एक निश्चित स्थान पर जलाये रखते थे । ऐसा कई पीढ़ियों तक चलता रहता था । और इस स्थान पर सफ़ेद राख़ के नीचे जो जली हुई रेत की मोटी परत मिली है वह एक तरह से आग प्रज्वलित रखने के उस स्थल का बेस है ।"
"तो सर फिर खाना कहाँ बनाते थे वे लोग ?" हम लोगों के भीतर उमड़ते सवाल को किशोर ने स्वर दिया । सर ने कहा " हाँ , यह बात मैंने तुम्हे नहीं बताई कि इस काली राख़ और सफ़ेद राख़ की जगह के अलावा उन्हें एक जगह और मिली थी जहाँ की राख मैली थी, खाना उस स्थान पर बनता था । इसलिए कि हड्डियाँ भी उसके पास पाई गईं । अगर एक आवास में एक से ज़्यादा चूल्हे पाए जाते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि वह एक समूह या संयुक्त परिवार होता है या बहुत सारे परिवार भी एक साथ वहाँ रह सकते हैं । इसके अलावा बीच में जो खाली जगह है उसका उपयोग किसी समारोह या संस्कार के लिए होता है ।“ हम लोगों ने महसूस किया कि ट्रेंच पर पहुँचने से पूर्व ही आज की हमारी क्लास शुरू हो चुकी है ।
दोपहर आज कुछ गर्म थी । धूप में भी तेज़ी थी । लेकिन एक पुरातत्ववेत्ता के लिए गर्मी या धूप क्या मायने रखती है । हम लोगों ने ट्रेंच क्रमांक चार पर अपना काम आगे बढाया और उस सतह पर प्राप्त फ्लोर को थोड़ा और विस्तार दिया । लेकिन कुछ देर बाद ही वह फ्लोर समाप्त हो गई ..आगे केवल मिटटी थी । हम सतह के नीचे जो पूरा मकान मिलने की आशा कर रहे थे वह सचमुच मिटटी में मिल गई । हम लोगों ने चूल्हा भी ढूँढने की कोशिश की लेकिन न चूल्हा मिला न राख । शाम काम ख़त्म करने तक हम लोग पसीने से भीग चुके थे । मैंने रवीन्द्र से कहा " मेरा तो यार नहाने का मन कर रहा है ।" रवीन्द्र हँसने लगा .."बावला मत बन, अभी अभी सर्दी कम हुई है, कहीं ठण्ड लग गई और सन्निपात हो गया तो तू भी सन्निपात के रोगी सिकंदर की तरह बड़बड़ाने लगेगा ।" मैंने कहा "भाई , कहाँ सिकंदर कहाँ अपन कलंदर ..हटाओ, नहीं नहाते, हाथ मुँह धोकर ही काम चला लेंगे । सो हाथ मुँह धोकर हम लोग फिर सिटी यानि दंगवाड़ा गाँव की ओर घूमने निकल गए ।
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आज दंगवाड़ा की गलियों में घूमते हुए हम रुक रुक कर मकानों की ओर देख रहे थे और उनमें उस मकान के शिल्प को ढूँढने का प्रयास कर रहे थे जिसके बारे में सर ने आज हमें बताया था । हालाँकि वैसा घर मिलना अब असम्भव ही था । आज मनुष्य इतना विकास कर चुका है कि जिस आग को उसे जलाना नहीं आता था और उसे सहेजने के लिए घर के बीचोबीच एक बड़ी सी जगह की ज़रूरत होती थी, आज वही आग माचिस की एक छोटी सी डिब्बी में कैद हो कर उसकी जेब में आ गई है । छत पर सरकंडों की जगह अब कवेलू हैं यदयपि कहीं कहीं घासफूस के छत वाली झोपड़ियाँ अब भी दिख जाती हैं । हाँ, छत को थामे बल्लियाँ अब भी मौज़ूद हैं लेकिन दीवारों के आगे उनकी भूमिका गौण है ।
सिटी से लौटकर जब हम लोग अपने तम्बू में आए तो अजय अपना पेट पकड़कर अजीब सी हरकतें करने लगा । हम लोगों ने आज दंगवाड़ा में चाय वाले की दुकान पर समोसे भी खाये थे । हमें लगा उसने ज़्यादा समोसे खा लिए हैं जिन्हें हज़म करने में उसे कष्ट हो रहा है । “क्या हुआ अजय ?“ किशोर भैया ने एक अभिभावक की तरह सवाल किया । “कुछ नहीं भ्राताश्री…” अजय पेट पकड़े पकड़े बताने लगा …”आज सायंकाल से मानस के स्मृति भंडार में संरक्षित भार्या की स्मृति अवचेतन की विभिन्न सतहों को विखंडित करती हुई चेतना में स्थानापन्न हो रही थी फलस्वरूप भान न रहा और मैंने आवश्यकता से अधिक तैलीय खाद्य उदरस्थ कर लिया अत: आमाशय में अनेकानेक रासायनिक परिवर्तनों के साथ साथ मानस में अजीब अजीब आकृतियाँ उभर रही हैं ।“
हम लोग अजय की बदमाशी समझ रहे थे सो उसकी यह बात सुनकर कहकहे लगाने लगे । लेकिन राममिलन भैया अचानक गम्भीर हो गए । वे पहले उसके थोड़ा क़रीब गए, फिर छिटक कर दूर खड़े हो गए और शिकायत के लहज़े में कहने लगे…”मना किया था.. हमने मना किया था । परसों अमावस थी, इसको मना किया था कि बड़ के उस पुराने पेड़ के नीचे पेशाब न करे लेकिन यह माना ही नहीं, अभी गाँव से लौटते हुए यह उसी पेड़ के नीचे से होता हुआ आया है .. पकड़ लिया न उस बरगद वाले जिन्न ने …होना ही था यह तो । अब इसको फुंकवाने ले जाना पड़ेगा । ”
राममिलन भैया की बात पूरी होने से पहले ही अजय जोर से हँस दिया …” ऐसा कुछ नहीं हुआ है पंडित जी, जिन्न मुझे क्या पकड़ेगा मैं तो खुद जिन्न हूँ । दरअसल मैं तो शुद्ध हिन्दी बोलने का प्रयास कर रहा था ।“ राममिलन कुछ नाराज़ से लगे …”तो नाटक कर रहे थे ऐसा बोलो न .. अब हमका का मालूम ..हम सोचे कौनो भूत-प्रेत पकड़ लिया है और तुम उसी की भाषा बोल रहे हो । अब इतनी दुरूह और क्लिष्ट हिन्दी बोलोगे तो हमें ऐसा ही लगेगा ना । अब ऐसी भाषा भी किस काम की जिसके लिए डिक्शनरी लेकर बैठना पड़े । “ “डिक्शनरी नहीं पंडित जी शब्दकोष कहिए शब्दकोष ।“ अजय फिर खिलखिलाकर हँस पड़ा ।
“यार, इंसान ने पहली डिक्शनरी कब बनाई होगी ?“ अचानक रवींद्र ने सवाल किया । अशोक ने घूरकर उसे देखा और कहा …” तू भी ना यार रविन्दर …थारे भीतर किसी मरे हुए आर्कियालॉजिस्ट का भूत घुस गया है, जब देखो तब, इंसान ने यह कब किया होगा, इंसान ने वह कब किया होगा यही पूछता रहता है । और कोई बात नहीं आवै है रे थारे दिमाग में ? “ रवींद्र खिसियानी सी हँसी हँसकर चुप हो गया । मैंने उसका पक्ष लेते हुए कहा …” तो क्या हो गया यार, यह सहज स्वाभाविक जिज्ञासा है, आखिर दुनिया भर के पुरातत्ववेत्ता भी तो इसी काम में लगे हैं, यह जानने में कि मनुष्य का जन्म कैसे हुआ, उसने घर बनाना कैसे सीखा, बोलना कैसे सीखा,भाषा कैसे आई और इस खोज में तब तक लगे रहेंगे जब तक मनुष्य का इतिहास पूरा नहीं हो जाता । हम लोग भी तो आगे जाकर यही करने वाले हैं ।“
“ रेन दे रेन दे …” अशोक ने हाथ मटकाते हुए कहा । मैं ये सब नहीं करने वाला, घर से दूर जंगल में पड़े रहो भूखे प्यासे, अन भाटा से अपना सर फोड़ो । और मनुष्य का इतिहास, वह कभी पूरा होने वाला नहीं, इसलिए कि जैसे ही कोई क्षण बीतता है वह जाकर इतिहास में जमा हो जाता है, रक्तबीज की तरह है यह, एक जगह खोज पूरी हुई नहीं कि दूसरी जगह खोज के लिए तैयार । यह तो इंसान का अपना इतिहास है इसलिए वह जी जान से लगा है । अपनी ही खोज कर रहा है । हम भी एक दिन मर खप जायेंगे और यह बात इतिहास में कहीं शामिल भी नहीं होगी कि उज्जैन से कुछ उधमी छात्रों का दल वाकणकर गुरूजी के निर्देशन में चम्बल के किनारे दंगवाड़ा के इस टीले पर अपना सर फोड़ने आया था ।"
“ काश यह बात इतिहास में शामिल होती !“ अशोक की साधारण सी बात के पीछे छुपे निहितार्थ को समझते हुए मैंने कहा । “इसलिए कि इतिहास तो अब तक बड़े बड़े लोगों का ही लिखा गया है, राजा महाराजाओं का लिखा गया है । हम जैसे आम लोगों का इतिहास न कभी लिखा गया न कभी लिखा जाएगा । लेकिन तू चिंता मत कर मेरे यार अशोक, एक दिन मैं लिखूंगा कि अशोक के साथ हम पांच दोस्त चम्बल नदी के किनारे दंगवाड़ा नामक एक जगह पर पुरातात्विक उत्खनन के लिए गये थे और हमारे गुरूजी थे पद्मश्री डॉ.वी. एस वाकणकर ।“ इतने में मेरा ध्यान रवींद्र की ओर गया । वह अब तक उदास था और शून्य में ताक रहा था । मैंने रवीन्द्र और अशोक के कंधे पर हाथ रखा और कहा " चलो यारों, टीले तक एक चक्कर लगा कर आते हैं, चम्बल के किनारे चतुर्थी के चाँद को ढूंढेंगे .. खाना आज देर से खायेंगे, पेट में अभी समोसा उछल-कूद मचा रहा है ।
*शरद कोकास*
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