रविवार, 31 मई 2026

28. आपको पता है औरंगजेब की बीबी ने उससे क्या फरमाइश की थी ?


जानने के लिए पढिए रोचक किस्सागोई के शिल्प मे लिखा यह एपिसोड 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

*छात्रों का यह दल अब अजंता से वापस औरंगाबाद लौटने की तैयारी में है आज का रात्रि विश्राम औरंगाबाद में ही है लेकिन उससे पहले यानी दिन ढलने के पहले औरंगाबाद शहर देखने में क्या हर्ज है यहाँ हैं ताजमहल की प्रतिकृति यानि औरंगज़ेब द्वारा बनाया गया बीबी का मकबरा ।चलिए इन छात्रों के साथ सैर करते हैं इस ऐतिहासिक धरोहर की*

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*भाग 28*

औरंगजेबवा की लुगाई की फरमाईस 

    चम्बल नदी के किनारे स्थित पुराने घाट के बेरंग पत्थर अब हमारे पांवों का स्पर्श भलीभांति जान चुके हैं ।दिन भर यह पत्थर धूप से उसकी गर्मी चुराते हैं और रात भर खुले आकाश के नीचे रहने के बावज़ूद वे कुछ गर्मी हमारे लिए सहेज कर रखते हैं । 

    हम लोग कुछ देर उन पत्थरों पर बैठकर आपस में बतियाने के साथ साथ नदी से भी बतियाते हैं । मंथर गति से बहती हुई चम्बल नदी कभी कभी हमारी बातें सुनकर पल भर के लिए ठहर जाती है और फिर किसी मज़ेदार बात पर खिलखिलाकर आगे बढ़ जाती है । 

    सुबह स्नान के पश्चात हम लोग एक सीढ़ी पर बैठ गए और बहती नदी को देखने लगे । रवीन्द्र को लगा नदी जैसे झील बन कर ठहर गई है । उसने इस भ्रामक ठहराव को तोड़ने के लिए एक कंकर नदी के जल में उछाला और कहा “यार, तू कुछ भी कह  तेरी यात्रा डायरी सुनने में बहुत मज़ा आ रहा है ।" 

    मैंने कहा " ऐसी मज़े की उसमें  क्या बात है, हम तो इस यात्रा में साथ ही थे । " वह तो है.. " रवीन्द्र ने कहा " लेकिन यही तो लेखन कला का कमाल है, कभी कभी किसी दृश्य से अधिक सुन्दर उसका वर्णन लगता है क्योंकि उसमें लेखक की अनुभूतियों के अलावा वे बिम्ब और रूपक भी शामिल होते हैं जो साधारण व्यक्ति को नहीं दिखाई देते, इसीलिए तो लेखन को कला कहा जाता है । मुझे नहीं पता था यात्रा वृतांत भी इतना सुंदर हो सकता है ।"  

    "हाँ सभी कलाओं की यही विशेषता होती है ।" मैंने कहा "स्थापत्य कला, चित्र कला, संगीत कला, नाटक, शिल्प, साहित्य सभी इस सुन्दरता का ही बखान करते हैं ।" " यार कला के छात्र तो हम भी हैं लेकिन तुझे देखकर अच्छा लगता है कि हमारे बीच एक कलाकार भी है जो इतनी सुन्दर कल्पनाएँ करता है । " रवीन्द्र ने कहा ।

    "लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता " मैंने कहा । "कभी कभी यथार्थ कल्पना से अधिक भयावह होता है । तब उसे किसी कलारूप में प्रदर्शित करना बहुत कठिन भी होता है हालाँकि कला के रूप में उसकी बहुत तारीफ़ होती है .. जैसे गन्दी झोपड़पट्टी में ऐसे कोई जाना पसंद नहीं करेगा लेकिन यदि कोई कलाकार उसकी पेंटिंग  बनाकर किसी आर्ट गैलरी में लटका दे तो सारे अभिजात्य वर्गीय उसे देखने चले जायेंगे ।" 

    "तू भी ना यार बात को कहाँ से कहाँ ले जाता है ।" रवींद्र ने कहा । "और कला के पारखी सारे लोग ऐसे ही होते हैं क्या ? कुछ लोग तो होते हैं जिनका मन चित्र देखकर या कविता पढ़कर द्रवित होता होगा और वे समाज को इस स्थिति से बाहर निकालने हेतु प्रयास भी करते होंगे । आख़िर कला का कुछ असर तो होता ही है ।" 

    "छोड़ ना यार ,इस पर बात फिर कभी। " मैंने कहा "अभी एलोरा और औरंगाबाद की यात्रा भी बाक़ी है ना ?“ रवीन्द्र प्रसन्न हो गया “ बिलकुल । आज रात चलते हैं ना आगे की सैर के लिए । फ़िलहाल तो भोजनशाला पहुँचा जाए ..भूख पेट की यात्रा कर रही है ।" 


    प्रतिदिन की भांति तैयार होकर हम लोग ट्रेंच पर पहुँच गए । आज हमारा उत्खनन शिविर में चौदहवां दिवस था । ट्रेंच पर पहुँचकर हम लोगों ने अपनी कापियों पर नज़र डाली और कल छोड़े हुए काम की तस्दीक की । अब हमें कल से आगे के उत्खनन कार्य में व्यस्त हो जाना था । फिर आज का दिन भी उसी तरह बीत गया जैसे कि पिछले तेरह दिन बीते थे । 

    कोर्स की और परीक्षा की ज़रूरत के अनुसार जितना ज्ञान हमें चाहिये था उतना हम अर्जित कर चुके हैं और अब यहाँ मन भी नहीं लग रहा है । वैसे तो श्येड्युल के अनुसार हमें यहाँ एक माह रहना था लेकिन हमें पहले ही आने में देर हो गई इसलिए एक माह से पहले ही प्रशिक्षण कार्य पूर्ण करना होगा । फिर हमें थ्योरी की तैयारी भी करनी है जिसके लिए बहुत कम समय बचा है । इसलिए हम लोग यहाँ से जल्दी जाने की फिराक में हैं । 

    फ़रवरी की समाप्ति के साथ साथ हमें वापस उज्जैन पहुँचना है । हमें पता है कि उत्खनन कार्य काफी समय तक चलेगा सो परीक्षा के बाद फिर कभी आ जाएँगे ऐसा विचार कर हम लोग यहाँ से जाने का मन बना रहे हैं । फिर लौटकर अन्य विषयों की तैयारी भी तो करनी है वरना परीक्षा में अच्छे नम्बर नहीं मिलेंगे और अच्छे नम्बर नहीं मिलेंगे तो अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी और अच्छी नौकरी नहीं मिली तो जीवन इसी तरह व्यर्थ बीत जाएगा । 

    शाम से ही जाने क्यों सभी का मन उखड़ा हुआ था । ऐसा अक्सर होता है कि एक उम्र और एक सी परिस्थितियों में रहने वालों की मन:स्थिति भी एक सी हो जाती है । कभी कभी भविष्य की चिंताओं के कारण भी मन उदास हो जाता है  । 

    शाम को कहीं जाने का मन नहीं था लेकिन समय तो बिताना ही था और फिर सिटी यानि दंगवाड़ा गाँव जाने का चस्का भी लग चुका है सो यह भ्रमण कार्य भी संपन्न हुआ । गाँव वालों से हमारी मित्रता हो चुकी है । हम लोग उनके बीच जाकर उन्हीं की तरह हो जाते थे । 

    हमने ठान रखा है कि अन्य शहरियों की तरह उन्हें कोई उपदेश नहीं देंगे न उन्हें किताबी ज्ञान की बातें बताएँगे हालाँकि पर्यावरण ,अन्द्धश्रद्धा निर्मूलन और स्वास्थ्य जागरूकता सम्बन्धी बातें तो हम उन्हें बताते ही हैं । वे अपनी स्थितियों से भले ही पूरी तरह खुश न हों लेकिन हम जानते हैं कि उन्हें उनकी स्थितियों से बाहर निकालने के लिए हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं । ज़्यादा से ज़्यादा व्यवस्था को गाली दे सकते हैं और उन्हें  उनकी ज़िल्लत का अहसास दिला सकते हैं । लेकिन इससे क्या हो जाएगा ? क्या इससे उनकी दशा बदल जाएगी ? हमें अपनी सीमायें पता हैं और हम उन्हीं  सीमाओं के भीतर रहकर उनकी बेहतरी के लिए भरसक प्रयास कर रहे हैं । 

मुक्तिबोध ने कहा भी है .."इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए ।"

    फिर भी कभी कभी मन ख़राब हो जाता है अपने देश के गाँवों की स्थिति देखकर । आज़ादी के इतने साल बाद भी शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित यह लोग आखिर देश के विकास में क्या योगदान दे सकते हैं ? सत्ताधीश इन्हें केवल वोट बैंक समझते हैं और इन्हें  ठीक ठीक मनुष्य का दर्ज़ा भी नही देते । रवीन्द्र जब भी मुझसे इस परेशानी को शेयर करना चाहता मैं उसे दुष्यंत का वह शेर सुना देता हूँ “ 

दोस्त अपने मुल्क की किस्मत पे रंजीदा न हो 

उनके हाथों में है पिन्जरा उनके पिंजरे में सुआ ।

    तो किस्सा कोताह यह कि आज भी  सूरज उसी तरह उगा जैसे कि रोज़ उगता है भाटी जी ने वैसे ही प्रेम से दोनों वक़्त का भोजन करवाया, शाम को सिटी का दौरा भी हुआ और फिर रात आई और हम लोग अपने तम्बू में रजाई ओढ़कर बैठ गए ।  “हाँ तो भाईजान आज क्या इरादा है, औरंगजेब की सल्तनत में चलें ? ” रजाई में पदस्थ हो जाने के बाद  रवीन्द्र ने मुझसे सवाल किया । “बिलकुल ।“ मैंने कहा “आज सुनाते हैं आगे की यात्रा की डायरी ।“  मैंने डायरी निकाली और पाठ शुरू कर दिया… 

अजंता से प्रस्थान के आगे की कथा 

“अजंता से हम लोगों ने शाम लगभग चार बजे प्रस्थान किया । लेकिन अब वापसी  जलगाँव की ओर नहीं थी बल्कि हमारा गन्तव्य औरंगाबाद था । वह दुनिया हम पीछे छोड़ आये थे जहाँ बुद्धम शरणम गच्छामि के स्वर गूंजा करते थे । शाम ढलने से पूर्व ही हमारी बस औरंगाबाद पहुँच गई । 

    बस की खिड़की से मार्च की धूप भीतर आ रही थी, मैं बाहर देखते हुए औरंगाबाद शहर का अक्स अपनी आँखों में बसाने की कोशिश कर रहा था । वातावरण में मग़रिब की अज़ान गूँज रही थी ..अल्ला हो अकबर ..। 

    मैं कुछ सोचकर मुस्कुराया...अच्छा हुआ कि उस दौर में अलग अलग धर्म अलग अलग समय में साँस लेते रहे वर्ना एक धर्म वालों द्वारा दूसरे धर्म वालों की सांसें रोक दी जाती । हालाँकि मेरा सोचना पूरी तरह सही भी नहीं था । बौद्ध धर्म के बाद यद्यपि इस्लाम सैकड़ों साल बाद आया लेकिन उस समय ब्राह्मण धर्म ने यह काम किया । मेरी आँखों के सामने अचानक पुष्यमित्र शुंग द्वारा अंतिम मौर्य सम्राट ब्रह्द्रथ की हत्या का दृश्य कौंध गया ।

    मैं बस की खिड़की से निरंतर बाहर की ओर देख रहा था । यह दो ऋतुओं के बीच का संक्रमण काल था और मौसम में बोरियत भरी उदासी छाई हुई थी । दिन अब लम्बी उबासी की तरह कुछ लम्बे होने लगे थे । 

    पंछी अभी आसमान में ही थे और पेड़ों के पास सन्नाटा छाया हुआ था । यह अजीब बात थी कि पंछियों के पास घर होने के बावजूद उन्हें भी घरौंदों में वापस लौटने की चिंता नहीं थी । 

    फिर सूरज तो ठहरा बेघर ..वह लौटता भी तो कहाँ लौटता सो लाल पीले नीले कपड़े पहने हुए मज़े में पश्चिम के फुटपाथ पर टहल रहा था । जल्दी तो खैर हमें भी नहीं थी । 

    हम सभी छात्र वैसे भी बेघर थे । अपना अपना घर छोड़कर कुछ बनने की इच्छा लेकर निकले थे, क्या बनेंगे, कहाँ रहेंगे किसी को नहीं पता था सो घर क्या और बाहर क्या, इस भाव के साथ इस यायावरी का आनंद ले रहे थे ।

चलो औरंगजेब की बीबी का मकबरा ही देख लें 

    दिन ढलने में अभी काफी समय था इसलिए तय किया गया कि धर्मशाला पहुँचने और अँधेरा होने से पहले बीबी का मक़बरा तो देख ही लिया जाए । हमारे बस ड्राइवर जमनालाल जी ने रास्ता पूछ पूछ कर आखिर बीबी का मक़बरा ढूँढ ही लिया । 

नहीं नहीं यह ताजमहल का डुप्लिकेट है 

    प्रवेश द्वार पर पहुँचते ही सामने थी मुगल काल की एक बेहतरीन इमारत  जिसे देखते ही बरबस मुँह से निकल गया …”अरे ! ताजमहल !“ ठीक ताजमहल की प्रतिकृति के रूप में उपस्थित थी वहाँ मुगल शासक औरंगज़ेब की बेग़म राबिया दौरानी की समाधि । लेकिन कहाँ ताजमहल और कहाँ बीबी का मक़बरा ! 

    ताजमहल बेहतरीन सफेद संगमरमर का बना है और बीबी के मक़बरे  में यह संगमरमर सिर्फ़ सामने वाले भाग में है और वह भी लगभग पाँच साढ़े पाँच फ़ीट बस । शेष इमारत बलुआ पत्थर की है और मीनारें ईटों की बनी हुई हैं । इन पर चूने का मसाला लगा है जिसमें सीपियों की भस्म मिली हुई है ।

    ताजमहल से इस इमारत की तुलना करते हुए एक प्रश्न मन में आया, दोनों ही इमारतें सम्पन्न मुगल शासकों द्वारा बनाई गई हैं फिर इनमें इतना अंतर क्यों है ? 

    जैन साहब ने हमारी शंका का समाधान किया …” प्रारंभिक मुग़ल शासकों के समय राज्य की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत थी, राजस्व की प्राप्ति भी अधिक होती थी और उनके खर्च भी अधिक नहीं थे इसलिए  इमारतें उच्च कोटि की सामग्री से बनाई जाती थीं, लेकिन बाद में साधनों के अभाव और धन की कमी के कारण उन्हें  सादा इमारतें बनानी पड़ीं, हालाँकि औरंगज़ेब ने भी सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में अपने शासनकाल के प्रारंभ में दिल्ली की मोती मस्जिद जैसी इमारत बनाई और लाहौर में बादशाही मस्जिद भी बनवाई परन्तु बाद में आर्थिक अभाव के कारण उसे बीबी के मक़बरे जैसी साधारण इमारत बनाने के लिए विवश होना पड़ा ।"

    " सर ,लेकिन यह औरंगज़ेब शुरू से औरंगाबाद में ही था क्या ? मुगलों का शासन तो उस समय आगरा में था ? " अजय ने सवाल किया । 

    सर ने बताना शुरू किया " औरंगज़ेब को उसके पिता शाहजहाँ ने सन सोलह सौ चौंतीस में दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया । उस वक्त उसकी उम्र सोलह वर्ष थी । उसने महाराष्ट्र  के गाँव किरकी को अपनी राजधानी बनाई और उसका नाम बदलकर औरंगाबाद कर दिया । 

    उसके बाद सोलह सौ सैंतीस में राबिया दुर्रानी से उसकी शादी हुई जिसका यह मकबरा उसने सोलह सौ अठहत्तर में बनवाया  । हालाँकि शादी के बाद सिर्फ सात साल वह यहाँ रहा और उसके बाद उसके पिता शाहजहाँ ने उसे गुजरात और फिर बदक्षां का सूबेदार बनाकर अफगानिस्तान भेज दिया । 

फिर उसने बाप को ही कैद मे डाल दिया 

    सोलह सौ अठ्ठावन में उसने अपने पिता को ताजमहल पर राजकीय खजाना खर्च करने का जुर्म लगाकर आगरे के किले में कैद कर दिया और खुद को बादशाह घोषित कर दिया । इसके बाद उसने सत्रह सौ सात तक यानि लगभग पचास वर्ष तक शासन किया ।"

    " सर, लेकिन इसका औरंगाबाद के बीबी के मकबरे की सादगी से क्या सम्बन्ध है ? मैंने पूछा ।

    " वही तो बता रहा हूँ ।" जैन सर ने कहा " चूँकि वह राजकीय कोश का व्यर्थ के कामों में खर्च करने के विरुद्ध था और खुद के लिए भी बहुत कम खर्च  करता था इसलिए उसने इस इमारत पर भी अधिक नहीं खर्च किया । हालाँकि उसने पैसा काफी कमाया जैसे उसने जजिया कर लगाया लेकिन वह सब राज्य के लिए खर्च किया ।" 

    बहरहाल, इस इमारत के ताजमहल के मुकाबले कम सुन्दर होने का कारण  हम लोगों की समझ में आ गया था ..बोले तो  जितना पैसा उतना काम । औरंगज़ेब के बारे में वास्तविक और गढ़े गए दोनों तरह के इतिहास को ताक पर रखकर हम लोगों ने उसके बसाये औरंगाबाद में जी भरकर ईरान, मध्य एशिया, दिल्ली और आगरा से आई वास्तुकला की मुगल शैली के इस स्थापत्य का आनंद लिया और आगे बढ़ गए ।“ 

चलो अब वापस तंबू मे 

    राम मिलन भैया जो हम लोगों से रूठकर पिछले दिनों अलग तम्बू में चले गए थे, उनका गुस्सा हमारे माफ़ीनामे के बाद शांत हो चुका है और एक सज्जन व्यक्ति की तरह वे हम दुर्जनों के बीच आकर बैठने लगे हैं । वे भी सब लोगों के साथ मेरा डायरी पाठ सुन रहे थे  । 

    सुनते हुए  हुए अचानक उन्होंने एक महत्वपूर्ण जिज्ञासा सबके सामने प्रस्तुत की... “ का हो, ई शाहजहाँ ने तो अपन लुगाई की फ़रमाइस पर ताजमहल बनवा दिया, औरंगज़ेबवा की लुगाई की भी कौनो फ़रमाइस रही थी क्या ? “ 

    राममिलन भैया की बात सुनकर पहले तो हम लोग बहुत हँसे  फिर अजय ने जवाब दिया “ अब क्या पता पंडित, हो सकता है कि बहू ने सोचा हो जब हमारी सास के लिए  इतना बड़ा मक़बरा  बना है तो छोटा-मोटा हमारे लिए  भी बन जाए । आखिर बड़े घर की सास है तो बहू भी कम बड़े घर की नहीं है । अब उसका आदमी कंजूस है तो क्या हुआ ।“ 

    मुगलकालीन इतिहास के इस विखंडन पर मैं क्या कहता, मैंने अपना सिर पीट लिया और कहा “ बस भैया , आज के लिए बहुत हो गया,  बाकी का यात्रा विवरण कल ।" 


*शरद कोकास* 


शनिवार, 30 मई 2026

27.घोड़े की नाल के आकार में क्यों बनी हैं अजंता की गुफ़ाएं

 📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

 🏼 *शरद कोकास* 🏼

*छात्रों का यह दल अजंता पहुँच गया है आज की डायरी में आप पढेंगे अजंता की गुफाओं की खोज कैसे हुई?, इनमे किन विषयों पर चित्र बने हैं ? यह चित्र कैसे बनाये गए ?इनमे किन रंगों का प्रयोग हुआ ?आदि आदि  *

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*भाग 27*

 जनता के साथ अजंता की सैर    

            भोजन के पश्चात पेट ही नहीं मन भी भरा भरा सा लगता है । भोजन शरीर में पहुँचकर उर्जा उत्पन्न करता है वह उर्जा कोशिकाओं में पहुँचकर रक्त प्रवाह को गति देती है और वह रक्त मस्तिष्क तक पहुँचकर समस्त क्रियाकलापों को गति देता है आखिर मन मस्तिष्क के इन्ही सब क्रियाकलापों का योग ही तो है । 

    भाटी जी ने आज हरे मटर की रसेदार सब्ज़ी बनाई थी जो उन्हें गाँव के मज़दूर दे गए थे ,साथ में टमाटर की चटनी भी । होटल के बेस्वाद भोजन से अलग इस भोजन के स्वाद की बात ही कुछ और थी सो हमारा मन प्रफुल्लित था इसलिए आज खाने के बाद टहलने का मन भी नहीं हुआ ।

            भोजनशाला से निकलकर हम लोग सीधे तम्बू में पहुँचे । जिस तरह घूमने जाने की इच्छा रखने वाला नन्हा शिशु अपने पिता का ध्यान आकर्षित कराने के लिए साइकल की ओर ऊँगली  से संकेत करता है उसी तरह अजय ने  मेरे बैग से मेरी डायरी निकाली और  मुझे थमा दी । 

    मैं समझ गया सबकी इच्छा  आगे का यात्रा वृतांत सुनने की है । मैंने डायरी खोली और सवाल किया " तो हम कहाँ थे ? " 

    अजय ने तपाक से कहा " सुलभ शौचालय में .. मेरा मतलब शौच आदि से निवृत होकर आप लोग जलगाँव के बस अड्डे पर गर्मागर्म चने की की मिसल वाला आलू पोहा खा रहे थे । " 

    "ओके ओके ।" मैंने कहा और फिर जनता के बीच अजंता यात्रा का वाचन प्रारम्भ कर दिया ।

            "तो इस तरह नाश्ते के बाद हम लोगों ने अजंता के लिए कूच किया । हमारी डॉज के ड्राईवर जमनालाल जी ने बताया कि जलगाँव से अजंता की दूरी इकसठ किलोमीटर है और इस यात्रा में लगभग एक घन्टा लगता है । आज किसी सीट पर किसी का रिज़र्वेशन नहीं था इसलिए मैंने खिड़की के पास की एक सीट चुनी और उस पर बैठ गया । 

    बचपन से ही यात्रा में खिड़की से बाहर के दृश्यों को देखना मुझे अच्छा लगता है । जिस ज़िंदगी को हम जी नहीं सकते उसकी एक झलक ही मिल जाए तो क्या कम है । 

    हिंदी साहित्य में आलोचना के अंतर्गत जब किसी के द्वारा ग्रामीण जीवन पर कुछ लिखा जाता है और उसमे गाँव के सुख दुःख शामिल नहीं होते अथवा गाँव का बहुत रूमानी वर्णन होता है तो अक्सर कहा जाता है कि उसकी कविता में गाँव बस या रेल की खिड़की से देखे हुए गाँव जैसा है ।"

            "इसीलिए तो भैया हम तेरे को दंगवाड़ा गाँव घुमाने ले जाते हैं ताकि तू आगे चलकर जब बड़ा कवि बने तो गाँव के जीवन का यथार्थ वर्णन कर सके ।" अजय ने तपाक से मेरी इस बात पर कमेन्ट किया ।

    " ठीक है ठीक है, आगे जब बड़े होंगे तब देखेंगे ..क्या पता इस पुरातत्व विभाग में ऐसी जगह नौकरी मिले जहाँ गाँव में ही रहना अनिवार्य हो .. तब भी यह इच्छा पूरी हो जाएगी और बड़े कवि की छोड़ कवि ही बन जाएँ इतना काफी है ।"  

    "ओके भाई .." रवीन्द्र ने कहा " तब की तब देखी जाएगी, चल आगे की डायरी सुना ।"

            " लो सुनो । " मैंने कहा । खिड़की के पास बैठकर बाहर के दृश्यों को देखते हुए कब अजंता आ गया पता ही नहीं चला । अजंता की दूरी दर्शाने वाले मील के पत्थर दिखाई देने लगे थे और मैं उन्हें पढ़ता जा रहा था …अजंता की गुफाएँ 4 कि मी, अजंता केव्ज़  3 कि मी, अजिंठ्या लेण्या 2 कि मी । बौद्धकालीन अजंता की गुफाओं के विषय में कोर्स में मैंने काफी कुछ पढ़ रखा था । 

    मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं कुछ ही देर में बौद्धकालीन युग में प्रवेश करने वाला हूँ । चारों ओर विशालकाय पहाड़ियाँ थीं । आँखों को तृप्त करने वाली हरियाली से यात्रियों को आकर्षित करते हुए दूर दिखाई देने वाले छोटे - बड़े पौधे बस की विपरीत दिशा में भागते प्रतीत हो रहे थे । 

    मेरा मन उससे भी पीछे भाग रहा था । मुझे लगा कि बस कुछ ही देर बाद मेरी आँखों के सामने एक अद्भुत दृश्य होगा जिसमें गेरुए वस्त्रों में कलाकार से दिखाई देने वाले कुछ बौद्ध भिक्षु होंगे, जिनके हाथों में कूचियाँ होंगी और वे किसी गुफा के भीतर चित्रकारी में रत होंगें ।

             मैं सोचने लगा उस कालखंड विशेष के बारे में जब यहाँ यह पक्का रास्ता नहीं रहा होगा, यह मील के पत्थर भी नहीं रहे होंगे,  न वाहनों की कर्कश आवाज़ होगी न धूल न धुआं । बस यहाँ रही होगी यह निर्जन पहाड़ी, नाल के आकार में गुफाओं की लम्बी कतार, आकाश में विचरण करते ढेर सारे पक्षी और वातावरण  में गूंजते  ‘ बुद्धम शरणम गच्छामि ‘ के स्वर । अचानक बस ने आख़िरी  मोड़ लिया और अतीत के खुले आसमान में विचरण करता हुआ मेरा स्वप्न सैलानियों की कारों, टूरिस्ट बसों, छोटी छोटी दुकानों और होटलों की दमघोटू भीड़ के बीच गिरकर चकनाचूर हो गया । वहाँ का शोर सुनकर मुझे लगा जैसे मैं किसी मेले में आ गया हूँ । ड्राइवर ने बस एक किनारे पर लगा दी । हम लोग उतर कर नीचे आए । मैंने एक अंगड़ाई ली और हवा को ज़ोर से भीतर खींचकर फेफड़ों में भर लिया ।

             मैंने चारों ओर नज़रें इस तरह घुमाकर फेंकी जैसे कोई मछुआरा अपना जाल घुमाकर फेंकता है । मुझे उन गुफाओं की तलाश थी जिनके बारे में मैं बचपन से सुनता चला आया था । पूछने पर ज्ञात हुआ कि उन गुफाओं की श्रंखला के प्रवेश द्वार तक पहुँचने के लिए पहले सीढ़ियाँ चढ़नी होंगी । उसके बाद उन गुफाओं का संसार प्रारम्भ होगा जो आज पूरी दुनिया में मशहूर हैं । 

    सीढ़ियों पर चढ़कर हम लोगों ने टिकट खरीदे और प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश किया । मैं अपनी मूर्खता पर मन ही मन हँस रहा था । जाने क्यों मुझे इस बात का गुमान था कि गुफायें अब भी ढाई हज़ार साल पहले की स्थिति में होंगी । 

    इन गुफाओं की खोज हुए भी जाने कितना समय बीत चुका है और अब तो यह बाकायदा एक टूरिस्ट सेन्टर बन चुका है । इस बात का हमें भान था कि हम लोग यहाँ टूरिस्ट की तरह नहीं बल्कि अध्ययनकर्ता की तरह आए हैं और हमें उसी तन्मयता के साथ इन गुफाओं का अवलोकन करना है जिस तन्मयता के साथ कलाकारों ने इन गुफाओं में चित्र उकेरे होंगे ।

गुफा क्रमांक 1 

सीढ़ियाँ चढ़ने के उपरांत हमें जो सबसे पहली गुफा मिली उसे पुरातत्व विभाग ने गुफा क्रमांक एक नाम दिया है । उसके बाद क्रम से गुफा क्रमांक दो, तीन,चार आदि हैं । इस क्रम  का इन गुफाओं के निर्माण काल से कोई सम्बन्ध नहीं है । वास्तव में सबसे पहले जिस गुफा में चित्र उकेरे गए वह गुफा क्रमांक दस है । 

गुफा क्रमांक 2 

इसके बाद इस गुफा के दोनों ओर क्रमश: गुफाएँ कटती चली गईं हैं । अजंता की यह गुफाएँ मनुष्य द्वारा निर्मित वे बेजोड़ गुफाएँ हैं जिन पर भारत को गर्व है । देश विदेश से आए सैलानी इन्हें  देख आश्चर्य चकित हो उठते हैं । अहा ! इतना अद्भुत सौंदर्य ! इन गुफाओं में चित्रकला व शिल्प कला के बेजोड़ नमूने हैं । इनकी किसीसे तुलना नहीं हो सकती । 

गुफा क्रमांक 6 

बुद्धि व श्रम के संयोग से निर्मित इन गुफाओं को देख कर आधुनिक तकनीक भी हैरान है । प्राकृतिक रंगों के निर्माण व उपयोग के बारे में उस युग के मनुष्य की समझ व ज्ञान को देख कर ऐसा नहीं लगता कि कला के प्रति उस मनुष्य का सौन्दर्यबोध किसी भी तरह कम रहा होगा । 

गुफा क्रमांक 10 

इन गुफाओं के निर्माण का उद्देश्य भी स्पष्ट है । इक्कीस सौ वर्ष पूर्व जब बौद्ध धर्म अपने चरम पर था, लाखों की तादाद में बौद्ध भिक्षु दीक्षा ले रहे थे और उन्हें अपनी साधना के लिए किसी एकांत की आवश्यकता थी । इसी आवश्यकता ने इन गुफाओं को जन्म दिया ।

गुफा क्रमांक 19 

मेरे डायरी वाचन के बीच अचानक अजय का एक सवाल कूद पड़ा “ लेकिन यार इन गुफाओं का पता कैसे चला ? इन तक भी डॉ. वाकणकर जैसा कोई व्यक्ति पहुँचा था क्या ? 

गुफा क्रमांक 23 

“हाँ बताता हूँ …” मैंने कहा “आगे यही लिखा है मैंने । बाघोरी नदी के किनारे नाल के आकार में बनी इन गुफाओं की खोज की कहानी भी अत्यंत रोचक है ।


सन अठारह सौ उन्नीस , अंग्रेज़ों के समय की बात है । एक दिन एक अंग्रेज़ शिकारी शिकार के लिए निकला और जंगल में रास्ता भटक गया । उसे एक किसान का लड़का मिला उसने शायद इनाम की लालच में शिकार प्राप्त होने की संभावित दिशा बताते हुए इन गुफाओं की ओर इशारा किया । उस समय यह गुफाएँ असंख्य पेड़ों और लताओं से घिरीं थीं । अंग्रेज़ शिकारी ने दूरबीन से इधर देखा। उसे पेड़ों के पीछे किसी गुफा में एक चित्र नज़र आ गया और वो खुशी से उछल पड़ा । इस तरह यह गुफाएँ सारे संसार में मशहूर हो गईं ।"
गुफा क्रमांक 24 अधूरी है 

इतना कह कर मैं चुप हो गया । मैंने देखा अजय, रवीन्द्र, अशोक सब इस तरह मुझे देख रहे थे जैसे यह बात मैं उन्हें  पहली बार बता रहा हूँ । “फिर क्या हुआ ?“ अशोक ने सवाल किया । “बस अजंता की कला देखते हुए मैं उसमें खो गया । एक एक गुफा की दीवारों पर चित्रित जातक कथाएं, बुद्ध की विभिन्न मुद्राएँ, मुद्राओं में दुख की परिभाषा, चेहरे पर वैराग्य की अनिवार्यता और संसार को सही सही जान लेने का भाव ।

इसके अलावा भी बहुत कुछ था इन चित्रों में …गृहस्थ जीवन के प्रति पति की उदासीनता से आहत यशोधरा, भिक्षुओं के भिक्षाटन ,उपदेश श्रवण,संगीति जैसे विभिन्न क्रियाकलाप, दान की गाथाएँ और जाने क्या क्या, इसका वर्णन शब्दों में संभव ही नही है । 

उन्नीस गुफाओं को पार करते हुए जैसे मैं एक युग पार कर चुका था । हम जिस कला व संस्कृति की बात करते हैं, वह संस्कृति तो यहाँ छुपी हुई है । ऐसी संस्कृति जिसे किसी धर्म या जाति या देश काल की परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता ।


"लेकिन अँधेरी गुफाओं के भीतर कलाकारों ने यह चित्र बनाये कैसे होंगे ?" अजय ने मुझसे सवाल किया । 

"आसान था ।" मैंने कहा । फिल्म की शूटिंग के लिए कैमरामैन जिस तरह रिफ्लेक्टर का उपयोग करते हैं उसी तरह इन कलाकारों ने भी सूर्य की रौशनी को भीतर तक लाने के लिए चमकीली सतह वाले रिफ्लेक्टर्स का उपयोग किया होगा और रंग भी फूल, पत्तों, रंगीन पत्थर  और प्राकृतिक वस्तुओं जैसे चर्बी , पौधों का अर्क आदि की सहायता से बनाये होंगे इसीलिए अब तक यह चित्र जस के तस हैं ।"


"लेकिन मैंने देखा है बहुत सारे चित्रों में अब रंगों का क्षरण हो रहा है ।" अशोक ने कहा । 

" हाँ यह तो है," मैंने कहा  "इतने सारे लोगों का आना, कृत्रिम रौशनी और प्रदूषण कुछ न कुछ असर तो होगा ही, इसीलिए अब कुछ चित्रों को संरक्षित करने के लिए उन पर टचिंग की जा रही है ।" 


"लेकिन इससे तो मूल पेंटिंग्स ख़राब हो जाएँगी " अशोक ने कहा । "हाँ हो सकता है लेकिन किया भी क्या जा सकता है, अजंता अब एक बहुत बड़ा पर्यटन उद्योग है । खैर आगे सुनो " इतना कहकर मैंने फिर डायरी वाचन प्रारंभ कर दिया । 

"गुफाएँ देखते हुए दोपहर के तीन बज चुके थे लेकिन हमें वापस भी लौटना भी था । हम जैसे अध्ययनकर्ताओं के लिए चार -पांच घंटों का यह समय बहुत कम था । यह सोचकर कि ठीक ठाक नौकरी मिल जाने के बाद एक बार फिर दो - चार दिनों के लिए  यहाँ आएँगे हम लोगों ने संतोष कर लिया । हमसे बिछड़कर जैन सर जाने कब पत्थर की गुफाओं से निकल कर लोहे की गुफा यानि बस में आकर बैठ गए थे । 

वैसे भी वे पूर्व में अनेक बार यहाँ आ चुके थे, यह उनके लिए एक रूटीन वर्क की तरह था । हमें आता देख उन्होंने चिन्ता प्रकट की “अरे भाई , भूख- वूख नहीं लगी क्या तुम लोगों को ?” 

भूख एक सच्चाई की तरह हमारे सामने थी और उसे रोटी के चित्र से नहीं मिटाया जा सकता था चाहे वह कितना भी रंगीन और आकर्षक हो । “चलो महेश ।“ मैंने कहा “ भूख मिटाने का कुछ इन्तज़ाम किया जाए ।“ और हम लोग किसी होटल की तलाश में निकल पड़े ।"

" हा आ आ आ " बड़ा सा मुँह फाड़ते हुए अजय ने कहा " बस कर यार इसके आगे की डायरी अब कल सुनेंगे, अभी तो बहुत ज़ोरों की नींद आ रही है ।" 

" ठीक है ।" मैंने कहा । "बाक़ी कल ।" वैसे भी हम लोगों का यह सामूहिक अनुशासन है कि यदि एक व्यक्ति सोने की इच्छा प्रकट करता है तो सभी के लिए वार्तालाप स्थगित करना अनिवार्य होता है । 


मैंने रज़ाई सर तक ओढ़ ली और अपनी आँखें बंद कर लीं । मेरा मन बुद्धकाल में पहुँच गया था । देह को यात्रा के लिए साधनों की आवश्यकता होती है लेकिन मन तो जाने कहाँ कहाँ भटकता रहता है मन की यह यात्रा जारी थी ..बोधगया, सारनाथ, लुम्बिनी, कुशीनगर ..। फिर जैसे तन की यात्रा में नींद आती है मन की यात्रा में भी आना स्वाभाविक था ।

*शरद कोकास*

 

 

26.ताज़ा जन्मे बच्चे की तरह होते हैं ज़मीन से निकले अवशेष


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼


पूर्वकथा-अब यात्रा आगे बढ़ती है । छात्र इंदौर पहुँच चुके हैं ।आपने पढ़ा कि विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययन शाला के स्नातकोत्तर कक्षा के कुछ छात्र दंगवाड़ा नामक स्थान पर उत्खनन हेतु पहुंचे हैं । शिविर में आये उन्हें ग्यारह दिन हो चुके हैं । इन दिनों में उन्होंने उत्खनन सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करने के अलावा अपने सर डॉ वि श्री वाकणकर और डॉ आर्य से और भी बहुत सारी जानकारी प्राप्त की है । 

इन छात्रों के रोचक किस्सों के साथ साथ विश्व इतिहास की कुछ प्रमुख घटनाओं के बारे में और मिस्त्र ,यूनान के किस्से तो आप पढ़ ही चुके हैं। पिछले भाग से शुरू हो चुका है डायरी के भीतर डायरी के शिल्प में एक यात्रा वृतांत जो इन छात्रों के शैक्षणिक टूर से सम्बंधित है । इस यात्रा वृतांत में आपको बहुत रोचक अंदाज़ में भारत के कुछ ऐतिहासिक स्थलों के बारे में जानकारी मिलेगी और आप इन छात्रों के साथ साथ यात्रा का आनंद भी ले सकेंगे ।*

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भाग 26

पूड़ी भंडार का किस्सा 

    प्राचीन भारतीय इतिहास,संस्कृति एवं पुरातत्व के छात्रों के इस शैक्षणिक टूर में हमारी क्लास के कुछ दक्षिण भारतीय मित्र भी हमारे साथ थे जो हॉस्टल में रहते थे  । हमने देखा इस बीच बहुत से छात्रों ने अपने बैग़ से खाने के पैकेट निकाल लिए हैं  । यह सभी छात्र मेस से पूड़ियाँ बन्धवा कर ले आए  थे । उन्होंने हम शहरवासियों को पूड़ियाँ ऑफर भी की लेकिन हम ठहरे जन्मजात स्वाभिमानी । हमने इंकार कर दिया । 

    वैसे भी इन्दौर शहर में आएँ  और वहाँ के सुस्वादु भोजन और खाद्य सामग्री का आनन्द न लें ऐसा कैसे हो सकता था । फिर हमारी हालत तो जनम जनम के भूखों की तरह हो रही थी  सो हमने जैन सर से इज़ाज़त ली और एक पूड़ी भंडार पर धावा बोल दिया । 

    पूड़ी भण्डार के काउंटर पर एक सुन्दर सी लड़की थी । उससे हमने पूछा " पूड़ियाँ क्या भाव हैं ? " उसने कहा छह रुपये किलो साथ में सब्ज़ी फ्री । हमने किलो के भाव से पूड़ियाँ खरीदीं और आलू की गर्मागर्म रसेदार सब्ज़ी के साथ उन्हें  आमाशय तक पहुँचने का मार्ग दिखाया और भूख के खिलाफ़ हो रही नारेबाज़ी बंद करवाई ।

मैं बहुत तल्लीन होकर डायरी पढ़ रहा था कि अचानक अजय ने एक कहकहा लगाया । “ क्या हुआ ?” मैंने गुस्से से उसकी ओर देखा …” इसमें हँसने की क्या बात है ? आमाशय ही तो लिखा है ।“ अजय हँसते हँसते बोला .. “ वो तो बेटा तुम लोग उस दुकानवाली के चक्कर में थे, और उसे इम्प्रेस करने के लिए बेहिसाब पूड़ियाँ उदरस्थ करते जा रहे थे हमें सब पता चल गया था । 

“ ठीक है, ठीक है । “ मैंने झेंपते हुए कहा “दुकानवाली के चक्कर की क्या बात है अब भूख ही इतनी तेज़ थी तो क्या करते ..लो आगे भी तो सुनो ।" और मैंने आगे की डायरी पढ़ना शुरू कर दी । इंदौर पहुँचने पर हमें ज्ञात हुआ कि इस बार टूर में मध्यप्रदेश के भूतपूर्व पुरातत्व निदेशक डॉ. एच.वी. त्रिवेदी भी हम लोगों के साथ यात्रा पर चलेंगे  सो उन्हें लेने के लिए हम लोग उनके घर पहुंचे  । 

बहुत खूबसूरत घर था डॉ.त्रिवेदी का । वैसे भी एक पुरातत्ववेत्ता का घर देखने का अपना अलग आनंद होता है । ड्राइंग रूम में कुछ बेहतरीन पेंटिंग्स और प्राचीन प्रतिमाओं के इमिटेशन शिल्प सजावट को एक नया आयाम दे रहे थे । हम लोग जब पहुँचे सर भोजन कर रहे थे । उन्हें साथ लेकर रात लगभग दस बजे हमारी बस इंदौर से रवाना हुई । 

    इंदौर के बाद हमारा अगला गंतव्य जलगाँव था । सबके पेट भरे हुए थे  । उदर की मांग पूर्ण हो चुकी थी और  मस्तिष्क ने अपनी माँग का प्रदर्शन प्रारंभ कर दिया था । मैंने नींद लेने की कोशिश की लेकिन बस ड्राइवर के ‘ स्टियरिंग कन्ट्रोल ‘ और बस के ‘ रॉक एण्ड रोल ‘ के बीच नींद ने भी न आने की कसम खा ली थी । यदि कुछ आसार नज़र भी आते तो पिछली सीट हमें छत की ओर उछाल कर बार बार अपना विरोध दर्ज कराने लगती । इस तरह थोड़ी बहुत झपकी के साथ सारी रात इसी उछल कूद में बीत गई । 

    उस दिन हमें  समझ में आया कि बस की लम्बी यात्रा में लोग आगे की सीटों की मांग क्यों करते हैं ।

सुबह सुबह लगभग साढ़े तीन बजे हम लोगों की बस महाराष्ट्र के जलगाँव बस अड्डे पर जा पहुँची । जैन साहब ने एक अच्छे अभिभावक की तरह प्रस्ताव रखा कि होटल वगैरह ढूँढने में समय बरबाद करने से बेहतर है प्लेटफॉर्म पर ही बिस्तर लगा कर एक - दो घन्टे की नींद ले ली जाए । इस प्रस्ताव का विरोध करने की न किसी में हिम्मत थी और न इच्छा । हालाँकि दबी ज़ुबान से कुछ लोगों ने होटल - लॉज जैसे शब्द भी कहे । 

    वैसे यह बात सर्वविदित थी कि कुछ देर पश्चात हमें अजन्ता के लिए प्रस्थान करना था और वापसी में औरंगाबाद लौटना था जहाँ पहले से हमारा निवास तय था सो लॉज में कमरा लेने का कोई औचित्य भी  नहीं था । इस बीच महेश अपना बेडिंग बस से उतार लाया था और इससे पहले कि  अन्य लोग किसी फैसले पर पहुँचें हम दोनों एक कोने में बिस्तर लगाकर नींद से दोस्ती करने की ठान चुके थे । प्लेटफ़ॉर्म भी हमारे मध्यप्रदेश के बस स्थानकों के प्लेटफ़ॉर्म की तुलना में काफी साफ सुथरा नज़र आ रहा था हालाँकि इतना ध्यान देने लायक धैर्य और शक्ति हम में नहीं थी । 

सुबह सुबह बसों की घरघराहट और खोमचे वालों की कर्कश आवाज़ों से हमारी नींद खुली । जिस तरह हिन्दी फिल्मों में लम्बी बेहोशी से जागने के बाद नायक सवाल करता है ...” मैं कहाँ हूँ ? “ 

    कुछ इसी तरह का हाल हमारा भी था । देखा कि आसपास सफाई करने वाले कुछ भाई लोग हाथों में झाड़ू- पोछा लिए खड़े हैं । हमारे आसपास के क्षेत्र की सफाई हो चुकी थी, बस हम दोनों वहाँ हमारे बिस्तर से चिपके हुए ख़ाली रैपरों और बीड़ी सिगरेट के ख़ाली खोकों के साथ सहअस्तित्व बनाए पड़े हुए थे । 

    नींद से बोझिल पलकें, सूखे होंठ, बिखरे बाल लिए मैले कपड़ों में हम लोग, सुबह सुबह अपने घरों से फ्रेश होकर आए मुसाफिरों के बीच भिखमंगों  की तरह लग रहे थे  । हमने तुरंत उन लोगों का संकेत समझा और फटाफट उठकर अपना बिस्तर लपेटकर एक बेंच पर रख दिया । 

पता चला कि इस बीच अन्य लोग भी जाग चुके है और नाश्ते की दुकान पर पहुँच चुके हैं । हम लोगों ने तकाज़ा किया कि आप लोगों ने हमें  क्यों नहीं जगाया तो हमारे मित्र मुरलीधर रेड्डी ने ने टका सा जवाब दिया “ देर तक सोने की आदत वालों को सुबह सुबह नींद से जगाकर गाली खाने का किसे शौक है ।“ 


    बहरहाल हम लोग जल्दी जल्दी बस स्टैन्ड के साफ-सुथरे सुलभ शौचालय में जाकर प्रात:क्रियाओं से निवृत हुए और एक दुकान पर जाकर महाराष्ट्र का विशेष नाश्ता आलू पोहा चने की गर्मागर्म मिसल के साथ भर पेट  खाया । हमारा अगला पड़ाव था अजंता ।“ 


“ बस कर भाई अब अजंता की सैर के लिए कल जाएँगे । “ अजय ने जमुहाई लेते हुए कहा । “ आज के लिए इतना काफी है । “ रवीन्द्र को इस यात्रा वृतांत में मज़ा आ रहा था सो कहने लगा “ अभी कहाँ ज़्यादा रात हुई है यार । “ फिर उसने सबके उनींदे चेहरों की ओर देखा और कहा ...” ठीक है , जैसी पंचों की राय । “ फिर धीरे से मुझसे कहा ...” लेकिन यार अब तू वो सुना जो तैने यहाँ नहीं लिखा है । “ मैंने कहा “ ठीक है ,चलो लेटे लेटे बात करते हैं ।“  

अगली सुबह 

सुबह आर्य साहब ने पूछा  “ क्या बात है कल तुम लोग काफी देर तक जागते रहे ? “ रवीन्द्र ने कहा “ हाँ सर, कल शरद अपनी टूर डायरी पढ़कर सुना रहा था … अजंता एलोरा वाले टूर की । “ “ अरे वा ! “ आर्य सर ने कहा “ यह तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन तुम लोग भी तो गए थे ना अजन्ता ? “ हाँ “ रवीन्द्र बोला “ लेकिन शरद की ज़ुबानी उस यात्रा का वर्णन सुनना बहुत मज़ेदार है । हम लोग तो केवल पुरातत्व के छात्र हैं लेकिन यह कवि भी है ना, जो चीज़ें हम नहीं देख पाते वह सब यह देख लेता है । जहाँ न पहुँचे रवि ... “ 

    “ बस बस ..बहुत पुराना हो गया । “ मैंने उसे चुप कराते हुए कहा । फिर रोज़ की तरह हम लोग उत्खनन कार्य में लग गए । ट्रेंच से कुछ न कुछ नए अवशेष रोज़ ही निकल रहे थे  और हमारे ज्ञान में निरंतर वृद्धि होती जा रही थी । आज का दिन कल की अपेक्षा कुछ गर्म था और हवाएँ कुछ इस तरह थमी हुई थीं मानो किसी ने उन्हें बाँहों में थाम लिया हो । ऐसा लग रहा है कि शीत ऋतु अब अपने दायित्व का निर्वाह कर प्रस्थान करने वाली है । 

शाम काफी देर तक काम करते रहे हम लोग । अवशेषों को साफ़ कर उन्हें सीलबंद कर संरक्षित करने का कार्य उस दिन हम ठीक से नहीं सीख पाये थे । डॉ.वाकणकर ने आज हम सब लोगों को अलग अलग मनके,सिक्के, पॉटरी आदि दिए और उन्हें साफ़ करना सिखाया । 

    अवशेष को साफ़ करना बहुत महत्वपूर्ण काम है । इसके लिए छोटे बड़े अनेक प्रकार के ब्रशों, ब्लोअर और सुइयों का उपयोग किया जाता है । हम आम वस्तुओं की तरह साबुन या पानी से उनकी सफाई नहीं कर सकते इसलिए कि इनकी रासायनिक क्रियाओं द्वारा उनके स्वरूप में परिवर्तन हो सकता है । पानी से धोने में भी इस बात का ख़तरा रहता है कि इनमे यदि कोई हिस्सा पानी में घुलनशील हो तो वह नष्ट हो जाता है ।

सर ने बताया कि "सफाई करते समय इस बात का ध्यान रखना सबसे अधिक ज़रूरी होता है कि किसी प्रकार के आघात से उनके किसी हिस्से की टूट-फूट न हो । सफाई करने वाले ब्रश का दबाव कितना हो उसे किस एंगल से घुमाया जाए इसका भी ध्यान रखना होता है । हालाँकि इस तरह से सफ़ाई में बहुत समय लगता है कभी कभी तो एक मुहर को साफ़ करने में दो-तीन दिन तक लग जाते हैं ।" जब हम पॉटरीज़ को साफ़ कर रहे थे तो हमने देखा कि उनमे कुछ ऐसी भी हैं जो साबुत नहीं हैं । 

मेरे मन में एक सवाल उठ रहा था जो मैंने सर के सामने रखा "सर, यदि कोई मिटटी का बर्तन अथवा उसका कोई हिस्सा जो पहले से ही टूटा हुआ है सफाई करते हुए अगर थोड़ा और टूट भी गया तो क्या हो जायेगा ?" सर ने कहा " भाई पहले की टूट-फूट और अभी की टूट-फूट में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है । किसी भी पॉटरी में  जो टूट-फूट हुई है वह तो हज़ारों साल पहले की है और उससे यह पता लगाना होता है कि वह कब टूटा था किस वज़ह से टूटा था आदि ।  

    लेकिन सफाई करते हुए यदि वह टूटता है तो उससे भ्रम उत्पन्न होता है और उसका कालक्रम निर्धारित करने में कठिनाई होती है ।इसलिए उसके साथ विशेष नोट लगाकर वह टूटा हुआ हिस्सा भी रखना होता है ।"

सर ने हमें सफाई के उपरांत की प्रक्रिया भी समझाई । सर ने बताया कि "सफ़ाई के बाद प्रत्येक अवशेष को एक सफ़ेद कपडे की थैली में सुरक्षित रख दिया जाता है और उस पर एक टैग लगा दिया जाता है जिसमें यह जानकारी होती है कि वह अवशेष किस साईट से, किस तारीख को, किस ट्रेंच से, उत्खनन के किस स्तर पर प्राप्त हुआ है तथा यह उत्खनन किसके मार्गदर्शन में हुआ है आदि आदि । इसके पश्चात उसे राजकीय संरक्षण में भेज दिया जाता है  । यह सब इसलिए ज़रूरी होता है कि जब उनके बारे में लिखा जाए तो उससे सम्बंधित सारे सन्दर्भ एक साथ मिल सकें ।"


*शरद कोकास*

 

Dr. H.V. Trivedi (Dr. Harihar V. Trivedi) was an eminent Indian epigraphist, numismatist, and historian who served as the Deputy Director of Archaeology, Archives, and Museums for the Government of Madhya Pradesh. He is widely celebrated as one of the country's foremost scholars of ancient Indian scripts and history. [1, 2, 3, 4, 5]
Key Contributions and Works
  • Epigraphy: He authored the definitive Epigraphs of Madhya Pradesh and edited volumes of the Corpus Inscriptionum Indicarum (Volume VII), which focused on the inscriptions of the Paramaras, Chandellas, and Kachchhapaghatas. [1, 2]
  • Numismatics: He penned the authoritative Catalogue of the Coins of Naga Kings of Padmavati. [1]
  • Excavations: He directed significant state excavations, including the excavation of an early 8th-century Shiva temple at Indragarh in the Mandasor district and assisted in digs at the Chalcolithic site of Manoti. [1, 2]

शुक्रवार, 29 मई 2026

25-चलो नीली डॉज मे बैठकर घूमने चलते हैं

इस एपिसोड मे पढ़ेंगे आप घुमक्कड़ी का किस्सा 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा- अब तक आपने पढ़ा कि विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययन शाला के स्नातकोत्तर कक्षा के कुछ छात्र दंगवाड़ा नामक स्थान पर उत्खनन हेतु पहुंचे हैं ।शिविर में आये उन्हें ग्यारह दिन हो चुके हैं । इन दिनों में उन्होंने उत्खनन सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करने के अलावा अपने सर डॉ वि श्री वाकणकर और डॉ आर्य से और भी बहुत सारी जानकारी प्राप्त की है । इन छात्रों के रोचक किस्सों के साथ साथ विश्व इतिहास की कुछ प्रमुख घटनाओं के बारे में और मिस्त्र ,यूनान के किस्से तो आप पढ़ ही चुके हैं।इस भाग से शुरू हो रहा है डायरी के भीतर डायरी के शिल्प में एक यात्रा वृतांत जो इन छात्रों के शैक्षणिक टूर से सम्बंधित है । इस यात्रा वृतांत में आपको बहुत रोचक अंदाज़ में भारत के कुछ ऐतिहासिक स्थलों के बारे में जानकारी मिलेगी और आप इन छात्रों के साथ साथ यात्रा का आनंद भी ले सकेंगे ।

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*भाग 25* 

25 - डायरी भीतर डायरी , नीली डॉज में सैर  

आज शिविर में हम लोगों का बारहवाँ दिन है । शाम को दंगवाड़ा गाँव से लौटते हुए अँधेरे की तरह ऊब अजय के चेहरे पर पसरी हुई थी । “यार यह सिटी जाना नहीं होता तो अब तक इस जंगल में ऊब गए होते ।“ “ लेकिन हम लोगों का सिटी फ्रेन्ड तो आया ही नहीं इस बार । “ रवीन्द्र ने महेश को याद करते हुए कहा  । “ अच्छा तुम अपने भीलवाड़ा के हीरो महेश चन्द्र शर्मा  की याद कर रहे हो  ? “ अशोक रवींद्र का संकेत समझ गया था  । “ हाँ यार, अपना यह  हीरो तो आया ही नहीं , उसने सर से कहा था कि घर से लौटते ही वह कैम्प में आएगा ..पता नहीं क्या हुआ ..अभी तक आया कैसे नहीं ? “ मुझे भी महेश की चिंता होने लगी थी  । 

“ आ जाएगा यार , वह मस्त मौला है .. वैसे तैने उसके साथ बहुत मस्ती की थी ना पिछले साल अजन्ता एलोरा के टूर में …क्यों ?" रवीन्द्र ने मुझे छेड़ा । "अच्छा तो तुझे सब पता है ।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा  । “ वाह पता कैसे नहीं है ..हमने आँखें बंद थोड़े ही कर रखी थीं ।" रवीन्द्र की आँखों में शरारत थी । " अच्छा ,तैने तो डायरी में भी लिख रखा है ना उस टूर का किस्सा ? “ “ हाँ “ मैंने कहा । “ तो सुना ना यार, तेरी डायरी बड़ी मज़ेदार होती है, वैसे तू डायरी लेकर आया है ना ?

“ रवीन्द्र उस टूर का किस्सा जानने हो बेताब दिखाई दे रहा था  । रवींद्र की बात सुनकर अजय उछल पड़ा " तो सुना ना यार ..अब में तो गया नहीं था तुम लोगों के साथ इस बहाने मैं भी तुम लोगों के साथ यात्रा कर लूँगा । " मैंने अशोक की ओर देखते हुए कहा "अशोक भाई कहेंगे तो ज़रूर सुनाऊंगा ।" अशोक ने कुछ कहा नहीं बस अपने दाहिने हाथ का अंगूठा ऊपर उठा दिया ।" तो बात डन.." मैंने सबकी सहमति पाकर कहा .." आज भोजन के पश्चात यात्रा डायरी का पाठ करेंगे ।"

रात्रि भोजन के पश्चात रजाइयों के बीच हम लोगों की महफ़िल जम गई । तम्बू में सौ वाट का बल्ब जल रहा था जिसकी उपस्थिति हमें अँधेरे में सूरज की तरह लग रही थी । इस उत्खनन कैम्प में प्रकाश व्यवस्था के लिए काफी दूर से बिजली की लाइन खींचकर लाई गई है  और भोजनशाला के अलावा सभी तम्बुओं में एक एक बल्ब की व्यवस्था की गई है  । सभी बल्बों का स्विच एक ही जगह है  और रात्रि का भोजनादि समाप्त हो जाने के बाद ग्यारह बजे के लगभग स्विच ऑफ़ कर दिया जाता है । पिछले दिनों हुई बारिश और ठण्ड के मद्देनज़र हमने सर से अनुरोध किया कि रात में भी बिजली चालू रखें ताकि थोड़ी गर्मी मिलती रहे । रोशनी में नींद न आने जैसी समस्या से बढ़कर आजकल ठण्ड की समस्या है सो उन्होंने हमारा कहना मान लिया । वैसे भी रात में सांप-बिच्छू का अंदेशा रहता है  सो उसके लिए भी पर्याप्त रौशनी का रहना आवश्यक है । रौशनी में नींद न आने जैसी समस्या हम लोगों के साथ नहीं है । वैसे भी दिन भर काम करते हुए हम लोग इतना थक जाते हैं कि अगर बल्ब की जगह सूरज भी जलता रहे तो नींद आ जायेगी ।

रजाइयों में घुसकर सभी के व्यवस्थित हो जाने के उपरान्त मैंने बैग से डायरी निकाली और पन्ने पलटने लगा । इस बीच रवीन्द्र अपनी भूमिका प्रस्तुत करने लगा …” याद है ना होली के दिन गए थे अपन लोग, अरे ..दो दिन तक तो इन लोगों की भंग ही नहीं उतरी थी, ऐसी ऐसी हरकतें की इन लोगों ने कि पूछो मत । हमारी बस में सामने की ओर एक ही दरवाज़ा था और यह लोग भांग के नशे में बार-बार पीछे जाकर दरवाज़ा ढूँढते थे और इंदौर में उस पूड़ी की दुकान की ख़ूबसूरत मालकिन को इम्प्रेस करने के चक्कर में तीन किलो पूड़ी खा गए, आखिर रात में रास्ते में नाले के किनारे बस रुकवानी पड़ी ।“ “चुप रहो यार“ मैंने गुस्से का अभिनय करते हुए कहा "जब देखो तब तुम लोगों को मस्ती सूझती है।"  " ऐसा नहीं है यार " रवीन्द्र ने सफाई दी " मैं तो तेरा बटन स्टार्ट कर रहा था " "ठीक है ठीक है अपने भीतर कोई स्टार्टिंग ट्रबल नहीं है .." मैंने  डायरी के पृष्ठ पलटते हुए  कहा “ अगर तू ही  बता देगा पूरा किस्सा तो मेरे लिए क्या बाक़ी रहेगा ?" " ठीक है भाई तू ही सुना ..अब पढ़ना शुरू भी कर  " रवींद्र ने वाचन के सम्पूर्ण अधिकार मुझे सौंपते हुए कहा ।

मैंने डायरी वाचन से पहले कुछ भूमिका बांधनी चाही  .. " तुम लोगों को याद होगा वह धुलैंडी का दिन था । न रंग का नशा ठीक से उतरा था न भंग का।   उस दिन शाम को हम लोग बस से निकले थे और हमारे साथ हमारे प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति पुरातत्व अध्ययन शाला के एच.ओ.डी.डॉ .कैलाशचन्द्र जैन और इन्दौर से मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग के भूतपूर्व निदेशक डॉ. एच .वी. त्रिवेदी भी थे । “ “ तू किस्सा सुनाता है या नहीं , यह सब तो हमको भी मालूम है । “ अब मुझे कोंचने की बारी रवीन्द्र की थी । “ भाई सुन तो लो" मैंने उसे शांत करते हुए कहा " आखिर भूमिका बताना भी तो ज़रूरी है ना , और यह भी कि यह डायरी मैंने अजन्ता से लौटकर आने के बाद औरंगाबाद की उस टूटी- फूटी धर्म शाला में बैठकर लिखी थी ।“ “हाहाहा “ अजय ज़ोर से हँस दिया …” अबे, टूटी फूटी नहीं जीर्ण - शीर्ण, हिन्दी का लेखक होकर भी ग़लत शब्द का प्रयोग करता है । जैसे हमारे कुछ लेखक लिखते हैं ‘ महिला लेखिकाएँ ‘… बताओ, लेखिका क्या पुरुष भी होते हैं… “  “ ठीक है माई-बाप आइंदा से ध्यान रखूँगा । मैंने उस चुप कराने के उद्देश्य से कहा और डायरी पाठ प्रारम्भ कर दिया ।

26 मार्च, रविवार । प्रस्थान के लिए कल 25 मार्च का दिन तय हो चुका था । हालाँकि कल धुलैंडी थी लेकिन सब को पता था कि दोपहर तक होली के सारे रंग फीके पड़ जाएँगे । महेश और राममिलन जब विश्राम लॉज स्थित मेरे रूम पर पहुँचे चार बज चुके थे और मैं मल्होत्रा के कमरे में उसके आईने के सामने खड़ा शेव कर रहा था । 

मेरे कमरे का आईना पिछले ही दिन  टूट गया था । “क्यों चलना नहीं है क्या ?“ महेश ने कमरे में प्रवेश करते ही मेरी हालत देखकर कहा । मैंने उत्तर में धीरे से उसकी ओर देखा और मुस्कुराते हुए स्लो मोशन में अपनी गर्दन हाँ में हिलाई  । महेश ने मेरी ओर देखा और मुस्कुराकर कहा “ तो लगता है मेरी तरह तुमने भी ठंडाई जम कर ली है आज । “ मैं भी यह सुनकर उसी की तरह मुस्कुराने लगा । हम दोनों का एक दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुराने का यह सिलसिला कुछ देर चलता रहा, फिर महेश राममिलन भैया की ओर मुखातिब हुआ और उनसे कहा... “ राममिलन भैया ,भाईजान को तो तैयार होने में अभी कुछ विलम्ब है ,तुम यहीं रुको, मैं रूम से अभी अपना सामान लेकर आता हूँ । “ इतना कह कर वह लक्ष्मीनगर स्थित अपने रूम के लिए  प्रस्थान कर गया  ।

मैं कुछ ही देर में नहा - धोकर तैयार हो गया । नहाने के बाद काफी ताज़गी सी महसूस हो रही थी । देह और मन दोनों सफ़र के लिए तैयार थे । “क्यों राममिलन भैया, नीचे चले ? “ मैंने राममिलन से पूछा । “और क्या । “ उन्होंने  जवाब दिया ..”बस तो नीचे ही आएगी ना ।“ हम लोग अपने बैग लेकर विश्राम लॉज की सीढ़ियों से नीचे उतरे और उज्जैन के फ्रीगंज इलाके में स्थित शहीद पार्क के एक कोने में चौरसिया के पान ठेले के सामने खड़े रहकर बस की प्रतीक्षा करने लगे ।

अभी गर्मियों की शुरुआत नहीं हुई थी लेकिन हवाओं में वाष्प की कुछ गर्म गर्म सी गंध थी । पेड़ों के साये पार्क से बाहर निकलकर सड़क तक पहुँच चुके थे और आती जाती गाड़ियाँ उन्हें  रौंद रहीं थीं । मैं देखने लगा , गाड़ियाँ गुजर जाने के बाद भी वे साये ज्यों के त्यों दिखाई देते थे और वे उनका बाल बाँका नहीं कर पा रही थीं । इससे पहले कि कोई भाववादी टाइप का विचार मेरे मन में आता, मुझे बाबा नागार्जुन की कविता याद आ गई और मैंने नारे के अन्दाज़ में उसका पाठ करते हुए कहा ... “ जले ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक, बाल न बाँका कर सकी शासन की बन्दूक ।“ 

“ का हो सरदवा ? का हुई गवा ? बड़े खुस हो ?“ राममिलन भैया ने मुझे कविता का सस्वर पाठ करते देखा तो पूछा ।  मैंने उनकी बात के जवाब में उनकी ओर देखकर दो बार आँखें मिचकाईं  और होली की इस ढलती दोपहर में मादक गंध अपने भीतर समाये धीमे धीमे बहती हवाओं की भांति मंद मंद मुस्कुराने लगा । यह बसन्त का मौसम था और विदा लेती हुई धूप मन में पुलक पैदा कर रही थी । हवा के झोंके अजीब तरह से गुदगुदा रहे थे । वहाँ खड़े खड़े हम लोग काफी देर तक विक्रम विश्वविद्यालय के जियालॉजी डिपार्टमेंट की मिनी बस की प्रतीक्षा करते रहे, लेकिन बस थी कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी । रेल की बजाय बस से जाने का उद्देश्य यही था कि अपनी गाड़ी रहने से सुविधा रहेगी और साइट सीइंग का खर्चा भी बच जाएगा । ऐसा हमारे एच. ओ. डी. जैन साहब का विचार था । 

आखिर प्रतीक्षा समाप्त हुई । कुछ ही देर में दूर से नीले रंग की वह ‘ डॉज ‘ आती दिखाई दी । महेश भी इस बीच पहुँच चुका था । उसने हाथ बढ़ाकर गाड़ी रोकी और पीछे से घुसने की कोशिश करने लगा । खिड़की से झाँकते मित्रों ने हँसते हुए कहा … "भैया दरवाज़ा पीछे नहीं सामने है …। ” हमें तो बस महेश का अनुसरण करना था । देखा तो बस में हमारे एच.ओ.डी.डॉ .कैलाशचन्द्र जैन सबसे आगे की सीट पर बैठे थे । हम लोगों ने उन्हें नमस्कार किया । हमारे प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति व पुरातत्व के हॉस्टल में रहने वाले छात्रों ने पहले ही सामने की जगह कैप्चर कर ली थी । हम लोगों के हिस्से में आईं पीछे की सीटें ।

बस ने टावर चौक से बाईं ओर एक टर्न लिया और उज्जैन की सीमा से बाहर निकल कर इंदौर की ओर चल पड़ी । न मैं बहुत खुश था न बहुत उदास लेकिन बसंती हवाओं ने मेरी उदासी कुछ और बढ़ा दी थी । अशोक समझ गया कि मुझे नॉस्टेल्जिया का दौरा पड़ा है ।“ क्या हो गया ? “ उसने पूछा ..” कोई बचपन की मुहब्बत याद आ रही है क्या ? “ मैंने घूरकर उसकी ओर देखा तो वह खिड़की से बाहर झाँकने लगा । ख़ामोशी दिखाई नहीं दे रही थी लेकिन वह मेरे साथ बस की सीट पर आकर बैठ गई थी  । एक मन हुआ कि बैठे बैठे सो जाऊँ लेकिन पंडित राममिलन आज चुटकुले सुनाने के मूड में थे और बार बार मुझे सम्बोधित कर रहे थे .. “चुटकुला सुनो भैया सरद..” अब ऐसे माहौल में कोई कितनी देर उदास रह सकता है । अंतत: मेरा मूड ठीक हो गया, ओढ़ी हुई उदासी का आवरण छिटक कर दूर हो गया और मैं भी सबके साथ कहकहों के समन्दर में गोते लगाने लगा । 

हमारा पहला स्टॉप था इंदौर जहाँ डिनर लेकर हमें तत्काल जलगाँव के लिए  रवाना होना था । शाम सात बजे लगभग हम लोग इंदौर पहुँच गये । बस से नीचे उतरते ही हम लोगों ने महसूस किया कि भूख की तीव्रता के कारण हम लोगों का पेट आंदोलन करने पर आमादा हो गया है । वैसे भी हमारे दिन फ़ाकामस्ती में कट रहे थे और सुबह से कुछ खाया भी नहीं था । अशोक ने अपनी कमीज़ ऊपर उठाई और भीतर घुसा हुआ अपना पेट दिखाकर कहा .. लो, देख लो और चाहो तो कान लगाकर सुन लो  .. भीतर से भी खाना दो, खाना दो की आवाज़ आ रही है या नहीं । 

“ अरे.. कमीज़ नीचे कर ..” रवीन्द्र ने ऑंखें फाड़ते हुए कहा ..” सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील प्रदर्शन करना उचित नहीं है । अशोक ने घबराकर कमीज़ नीचे कर ली और बड़ी मासूमियत से कहा “ पेट ही तो दिखाया था यार ....। ” मैंने अशोक की प्राणरक्षा की .. “ प्यारे .. सब कुछ इस पेट का ही तो चक्कर है, ज़बान भले ही एक बार खामोश हो जाए यह खामोश नहीं रहता , शोषण और उत्पीड़न के ख़िलाफ़ विद्रोह की आवाज़ यहीं से उठती है । इसकी आवाज़ से बड़े बड़े पूंजीपतियों के कलेजे दहल जाते हैं । इसके प्रदर्शन से अच्छे अच्छे घबरा जाते हैं । इसलिए उन लोगों ने भूख के प्रदर्शन को अश्लील और अनैतिक करार दे दिया है । जबकी असली अनैतिकता तो मजदूर की आवाज़ को दबाना है ।“ " बस बस कॉमरेड .. रवीन्द्र ने होंठों पर ऊँगली रखकर चुप रहने का इशारा करते हुए कहा  "भाषण बाद में देना पहले खाने का प्रबंध करो । " 


🔲 *शरद  कोकास* 🔲


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