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सोमवार, 25 मई 2026

18. माचिस तो अगिया बेताल ले गया

अगिया बेताल
(या अग्नि बेताल) मुख्य रूप से पौराणिक कथाओं, लोककथाओं और हिंदी मुहावरों में इस्तेमाल होने वाला एक शब्द है। इसे अलग-अलग संदर्भों में अलग तरह से समझा जाता है: [1, 2]
1. पौराणिक और लोककथाओं में (एक शक्ति या भूत)
लोक मान्यताओं के अनुसार, 'अगिया बेताल' एक प्रकार की अलौकिक या भूत-प्रेत योनि है जिसके मुख से आग निकलती है। ऐसा माना जाता है कि यह रात के समय श्मशान या मरघट में दिखाई देती है।
📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼


पूर्वकथा - छात्रों का यह दल उत्खनन शिविर में दंगवाडा नामक स्थान पर पहुँचा है ।छात्रों को इस शिविर में आये काफी दिन हो गए हैं और वे थोड़ा थोड़ा ऊबने भी लगे हैं इसलिए कुछ मस्ती तो चाहिए ।राममिलन भैया इन छात्रों में सबसे बड़े हैं और ईश्वर और धर्म कर्म को मानने वाले भी सो यह छात्र उनके साथ थोड़ी बहुत शरारत करते रहते हैं ।आज के इस भाग में भी ऐसी ही एक शरारत का किस्सा है पढ़िए आपको मज़ा आएगा *

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*भाग 18*

*माचिस कौन ले गया , अगिया बेताल*



वाकणकर सर के साथ अवशेषों को संरक्षित करने की प्रक्रिया पूर्ण करते ही हम लोगों के अध्ययन का एक आवश्यक अध्याय पूर्ण हो चुका था सो शाम को हम लोग थोड़ा मनोरंजन चाहते थे और उसके लिए सिटी अर्थात दंगवाड़ा जाने से बेहतर और क्या हो सकता था । 

किशोर हमेशा की तरह मुखर था और बार बार राममिलन को छेड़े जा रहा था । नदी के पास बरगद का एक बड़ा पेड़ देखकर किशोर ने कहा “ जानते हो पंडत , इस बरगद पर एक भूत रहता है ।“ राममिलन ने गुस्से में कहा “वो हमें भूत - वूत से डर नाही लगता हमरे बजरंग बली सब भूतों की छुट्टी कर देते हैं । भूत पिसाच निकट नहीं आवै महावीर जब नाम सुनावै ।"
हमें नहीं पता था पंडित राममिलन शर्मा की यह बात सुनकर किशोर त्रिवेदी के दिमाग़ में कोई शरारत जन्म ले चुकी है । खैर, ऐसे ही हँसी मज़ाक करते हुए हम लोगों ने नाला पार किया और दंगवाड़ा गाँव पहुंचे । चौक में पहुँच कर उसी दुकान के पटिये पर बैठकर चाय पी, अखबार पढ़ा और थोड़ी देर गाँव वालों के साथ गपशप करने के बाद वापस कैम्प में जाने के लिए निकल पड़े । 

इतने दिनों में गाँव वालों पर हम लोग ऐसा रोब जमा चुके हैं जैसे हम उन्हीं के बाप-दादों का इतिहास लिखने के लिए यहाँ आये हैं, सो हम लोगों की ख़ातिरदारी भी बढ़िया होने लगी है । गाँव की यह सैर हम लोगों के लिए बहुत रोमांचक होती है । हमें गाँव के लोगों की ज़िन्दगी को करीब से जानने का अवसर भी मिल रहा है और हमारी सामाजिकता की भूख भी इससे शांत हो रही है ।

" गाँव की ज़िंदगी भी कितनी अच्छी होती है ।" अजय ने ज़मीन पर पड़ा एक पत्थर उठाया और काल्पनिक आम की कैरी तोड़ने के अंदाज़ में उसे पेड़ की ओर घुमाकर फेंक दिया । 

"ख़ाक अच्छी होती है ! " रवीन्द्र ने तपाक से कहा "हम लोग एक पर्यटक की तरह यहाँ आये हैं इसलिए यह जीवन हमें अच्छा लग रहा है, अगर कुछ दिन गाँव में बिताना पड़े तो समझ में आ जायेगा, इसलिए कि जिन बुनियादी सुविधाओं की हमें आदत है वे यहाँ नहीं हैं ,सुबह सुबह लोटा लेकर कितने दिन जाओगे भाई ।"

" हाँ यह तुम ठीक कह रहे हो ।" अशोक ने कहा "यह गाँव भी भारत के अस्सी के दशक के अन्य गांवों जैसा ही है । यहाँ न ढंग का स्कूल है न ढंग का अस्पताल । सड़कें भी देखो कितनी ख़राब हैं, पीने का पानी भी अभी मिल रहा है लेकिन जैसे ही गर्मियाँ शुरू होंगी उसकी भी किल्लत हो जाएगी । देश के विकास के लिए कितनी पंचवर्षीय योजनायें बन चुकी हैं लेकिन विकास की रौशनी अभी तक यहाँ नहीं आई है ।" 
" फिर भी यार गाँव का जीवन शहर से तो अच्छा है, शुद्ध प्रदूषण रहित वायु, शुद्ध सुस्वादु भोजन और निश्चिन्तता की ज़िन्दगी अहाहा ..। " अजय जैसे किसी वादविवाद प्रतियोगिता में ग्राम्य जीवन के पक्ष में बोल रहा था ।

किशोर भैया हमारी बातें सुनकर ज़रा चिंतित हो उठे " भाई, यह सही है कि हमारी कल्पना के गांवों में बहुत सुन्दर जीवन है, कल कल करती बहती हुई नदियाँ, तितलियों के पीछे भागते बच्चे, गाँव की अमराइयों में ठंडी ठंडी हवा, पेड़ों से आम की खट्टी मीठी कैरियां तोड़कर खाती हुई अल्हड़ युवतियां, मक्के की रोटी सरसों का साग, हरी मिर्च की चटनी ..दूध ,दही,घी, गुड़ शहद आदि की बहुलता । 

लेकिन यह सब होते हुए भी ग्रामवासियों का जीवन दुखद तो है । किसान की फ़सल जब ख़राब हो जाती है वह कर्ज में डूब जाता है, वैसे भी कृषि कार्य से होने वाली आमदनी अब पूरे परिवार की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाती । अन्य रोजगार और कुटीर शिल्प आदि की स्थिति भी ठीक नहीं है । अर्थाभाव के कारण बच्चों को भी काम पर जाना पड़ता है, उनकी शिक्षा पूरी नहीं हो पाती, बीमार पड़ने पर कोई अस्पताल नहीं मिलता, फिर भूत -प्रेत, जादू -टोने जैसे अन्द्धविश्वास के चक्कर में वे आ जाते हैं ।" किशोर ने ग्राम्य जीवन के वास्तविक चेहरे पर पड़ा रूमानियत का पर्दा खींचकर उसे बेनक़ाब कर दिया था ।

अशोक ने किशोर भैया की बात का समर्थन करते हुए कहा "यह सच है कि भारत के गांवों की दशा अब दयनीय होती जा रही है । सिंचाई आदि की उचित व्यवस्था न होने के कारण किसान सूखे की चपेट में आ जाते हैं या बाढ़ उनकी फ़सल लील जाती है फिर उन्हें महाजनों और साहूकारों के चक्कर काटना पड़ता है । इसके अलावा उनके आपसी झगड़े भी हैं जिनकी वज़ह से उन्हें अदालतों के चक्कर काटना पड़ता है । गांवों की बनिस्बत शहरों की स्थिति अभी काफी अच्छी है । यही कारण है कि शहरों की चकाचौंध गाँव के युवकों को आकर्षित कर रही है ..वह पान ठेले पर कुछ युवक हमसे नहीं कह रहे थे ,भैया हम लोगों को भी शहर में कुछ काम -वाम दिलवा दो ।"

बातें करते हुए हम लोग नाले तक पहुँच गए । हम लोग शिविर की ओर लौट रहे थे और अन्धेरा हो चुका था । गाँव की ओर जाते समय हमने इस बात पर ध्यान नहीं दिया था कि पिछले दिनों हुई वर्षा के कारण नाले में पानी कुछ बढ़ गया है और वे पत्थर जिन पर पाँव रखकर हम लोग पहले नाला पार करते थे पानी में डूब गए हैं । जाते समय काफी रौशनी थी और वे पत्थर साफ़ साफ़ दिखाई दे रहे थे लेकिन गपशप के बीच हमें ध्यान ही नहीं रहा कि इस बार जिन पत्थरों पर हमने पाँव रखकर नाला पार किया था उन पत्थरों को चिन्हित कर लें । 

हालाँकि इससे भी कोई फायदा नहीं होता, अँधेरा गहन होता जा रहा था और हम रौशनी के आदी शहर वासियों को गांववालों की तरह अँधेरे में भी वस्तुएँ पहचान लेने का अभ्यास नहीं था अतः ठीक से कुछ दिखाई देना मुश्किल था ।

राम मिलन उन्हें छेड़े जाने की वज़ह से गुस्से में थे और अपनी खामख्याली में हम लोगों से अलग-थलग और आगे आगे चल रहे थे । नाले तक पहुँचने से पहले ही किशोर ने हम लोगों को धीरे से एक टीले की ओट में छुप जाने का इशारा किया और ख़ुद राममिलन के पीछे चलते हुए उनसे कुछ दूरी बना ली । हम समझ गए किशोर अपनी शरारत को अंजाम देने जा रहे हैं । राममिलन नाले पर पहुँचकर कुछ पल ठहरे, हम लोगों की राह देखी फिर यह सोचकर कि हम लोग बहुत पीछे रह गए हैं नाला पार करने के लिए अकेले ही आगे बढ़ गए । 
पत्थरों पर सम्भल कर पाँव रखते हुए जैसे ही वे बीच नाले तक पहुँचे किशोर तेज़ी से दबे पाँव आगे बढ़े और धीरे से उन्हें धक्का दे दिया । राम मिलन धड़ाम से पानी में गिर पड़े और हाय-तौबा मचाने लगे “ अरे कौन है ससुरा हमका गिराय दिया ..। “ और वे जोरों से राम राम कहने लगे । किशोर ने कुछ कदम पीछे हटकर इस तरह अभिनय किया जैसे वे उनकी आवाज़ सुनकर दूर से दौड़े चले आए हों ।

“क्या हुआ पंडत कौनो भूत वूत धक्का दे दिया का ? “ किशोर भैया ने हाँफने का अभिनय करते हुए कहा । 

भूत का नाम सुनते ही पंडित जी की घिग्गी बन्ध गई और वे ज़ोर ज़ोर से रटने लगे “जय हनुमान ज्ञान गुन सागर जय कपीस तिहूँ लोक उजागर ..राम दूत अतुलित बल घामा अंजनी पुत्र पवनसुत नामा ..संकट तें हनुमान छुड़ावै मन क्रम बचन ध्यान जो लावै .. ।“ 

हम लोग चट्टानों की ओट से बाहर निकलकर जब तक उनके करीब पहुँचे तब तक वे उठकर खड़े हो चुके थे । लेकिन फिर उन्हें ध्यान आया कि उनका एक जूता पानी के भीतर रेत - वेत में कहीं दब गया है । वे झुक कर पानी में हाथ डालकर अपना जूता तलाशने लगे ।

किशोर ने चिल्लाकर कहा “ अरे अशोक जरा माचिस तो देना… पंडत का जूता अन्धेरे में दिख नहीं रहा है ।“ अशोक ने दूर से हाथ बढ़ाकर कहा “लो“ । कुछ सेकंड रुककर किशोर ने फिर कहा “ तुमसे कहा ना ..माचिस तो दे यार अशोक, अन्धेरे में कुछ सूझ नहीं रहा है ।“ 

अशोक बोला “ अभी तो यार तुम्हारे हाथ में पकड़ाई है माचिस ..तुमने हाथ बढ़ाया था ना या किसने हाथ बढ़ाया था ? “ किशोर सहित हम सब ने एक स्वर में कहा “ हमने तो हाथ नहीं बढ़ाया । “ “ किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया तो ससुरी माचिस कहाँ गई ..कौनो अगिया बेताल ले गया क्या ? “ किशोर बोला ।

अगिया बेताल का नाम सुनते ही राममिलन भैया की तो हवा बन्द हो गई । गनीमत इस समय तक उनका जूता मिल गया था । लेकिन वे जूते पहन ही नहीं पाए और उन्हें हाथ में लिए लिए गीले कपड़ों में ठण्ड से काँपते हुए, डर के मारे हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए और लगभग दौड़ते हुए कैम्प की ओर बढ़ गए । 

हम लोग भी उनके साथ ही थे और बमुश्किल अपनी हँसी दबाते हुए उनका साथ दे रहे थे । हाँलाकि कैम्प तक पहुँचते हुए हँसी रोकना मुश्किल हो गया । पंडित राममिलन तो कपड़े बदलने के लिए तम्बू में घुस गए और हम लोग बाहर ही रुककर पेट पकड़ पकड़ कर हँसने लगे । यह हमने सोचा ही नहीं कि राममिलन भैया हमारे इस तरह हँसने से हमारी शरारत समझ गए होंगे ।

इस घटना से राममिलन भैया अत्यंत दुखी हो गए और उन्होंने घोषणा कर दी कि अब वे एक पल भी इस कैम्प में नहीं रहना चाहते । डॉ. आर्य के आगे जैसे ही हमने अपने उद्दंडता पुराण का पाठ किया उन्होंने बहुत गम्भीरता से कहा “ देखो भाई ,लगता है पंडित बहुत डर गया है, अब उसे और ज़्यादा परेशान मत करो वरना वह कैम्प छोड़कर चल देगा और बात सर तक पहँच जाएगी तो बहुत मुश्किल हो जाएगी ।“ 

डॉ.वाकणकर कुछ देर पूर्व ही किसी कार्यवश उज्जैन के लिए निकल गए थे । हमने सोचा जब तक वे वापस आएँ तब तक तो मज़ा लिया ही जा सकता है, उसके बाद हम लोग राममिलन भैया से माफ़ी-वाफी मांग लेंगे और उन्हें प्रसन्न कर लेंगे, वैसे भी इतने सह्रदय हैं कि बुरा नहीं मानेंगे । सो हमने डॉ. आर्य को भी मनाकर अपनी शरारत कम्पनी में शामिल कर लिया ।

राममिलन भैया चूँकि हम लोगों से सख्त नाराज़ हो गये थे इसलिए उन्होंने बाहर आकर घोषणा की कि वे हम लोगों के साथ टेंट में रात नहीं बिताएंगे सो वे तुरंत अपना बिस्तर हम लोगों के टेंट से उठाकर ले गए और अवशेषों वाले तम्बू में शिफ्ट हो गए । भोजन करते वक़्त भी राममिलन भैया हम लोगों से रूठे रूठे रहे और चुपचाप अपना भोजन ग्रहण करने के उपरान्त बिना कुछ बोले जाने लगे । 

किशोर भैया ने उन्हें छेड़ते हुए कहा " देखना भैया, अच्छे से सोना, उस तम्बू के ठीक ऊपर एक बरगद का पेड़ है कोई कह रहा था कि उस पर भी एक हज़ार साल से कोई जिन्न रहता है ।"

भोजन के बाद हम लोग धीरे से दबे पांव राममिलन भैया के टेंट की और गए लेकिन उन्होंने पर्दे की डोरियाँ बाँध रखी थीं और भीतर का कुछ नहीं दिखाई दे रहा था । किशोर भैया ने धीरे से एक दरार से झांककर देखा राममिलन भैया एक निवार वाले पलंग पर बैठे हुए थे और कुछ पढ़ रहे थे । 
वे हमारे पास आये और कहा "क्या ख्याल है जिन्न की आवाज़ निकाली जाए ?" मैंने उन्हें टालने के हिसाब से कहा " किशोर भाई अभी तो वो जाग रहे हैं सब समझ जायेंगे , जब सो जायें तब डराना ।" मुझे इस बात का आभास था कि अगर बात हद से बाहर चली गई तो मुश्किल हो जायेगी ।

फिर हम लोग अपने तम्बू में आ गए । रात के किस्सों में बस राममिलन भैया के ही किस्से शामिल थे । अशोक ने कहा " पता है अपने राममिलनवा एक बार पुलिस के सिपाही को धौंस देकर आ गए थे । " अरे.. अरे क्या हुआ था ?" अजय ने अपनी गर्दन सामने की ओर बढ़ाते हुए कहा । 

" हुआ यह कि .." अशोक ने बताना शुरू किया " अपना वह जूनियर नहीं है ..क्या नाम है उसका पटेल ,उसे अपनी साइकिल के पीछे बिठाकर राममिलन भाई कंठाल के पास से कहीं गुजर रहे थे । ग़लती से वे रांग साइड कहीं घुस गए । सामने ही ट्रेफिक का सिपाही था उसने इनकी साइकिल का हैंडल पकड़ लिया और कहा " रांग साइड कहाँ घुसते हो ?" राममिलन भैया का रौब तो उनके कपड़ों से ही जाहिर होता है , चुस्त पैंट वह भी कड़क क्रीज वाली, करीने से इन की हुई शर्ट ,चमचमाता हुआ चमड़े का जूता और आँखों पर गोगल्स । वे सीधे खड़े हो गए और कहा " हमका चीन्हे नहीं हो लगता । फिर डांटने के अंदाज़ में कड़कती हुई आवाज़ में उस सिपाही से कहा ..

 ए यू पुलिस मैन ..आई ऑफिसर ..टू द हेड मास्टर आई बेग टू से दैट आई ऍम सफरिंग फ्रॉम फीवर सिंस लास्ट नाईट काइंडली ग्रैंट मी थ्री डेज़ लीव ,अंडरस्टैंड यू ट्रेफिक मैन रोड साइड ... बस पुलिसवाले ने उनकी यह भयानक अंग्रेज़ी सुनकर उन्हें सलूट मारा और कहा .. ठीक है सर.. जाइए ।" उसके बाद हँसते हँसते ही हम लोग सो गए ।

बहरहाल आज की सुबह अन्य दिनों की भांति ही हुई । आज हमारा यहाँ आठवां दिन है । डॉ.वाकणकर कल शाम ही उज्जैन निकल गए थे और आज शाम तक लौटने वाले थे । उनकी अनुपस्थिति में आर्य सर के मार्गदर्शन में हम लोगों ने हमें स्वतन्त्र रूप से सौंपी हुई ट्रेंच क्रमांक चार पर स्वतंत्र रूप से कार्य प्रारंभ किया । 

आज हमने पुन: 'पेग क्रमांक दो' से प्रारम्भ कर दक्षिण की ओर दो मीटर के वर्गाकार टुकड़े में खुदाई की । डॉ.वाकणकर की अनुपस्थिति और आर्य साहब की हमारी ट्रेंच पर निरंतर उपस्थिति की वज़ह से आज मुख्य ट्रेंच पर काम बंद था । वहाँ के सारे मज़दूर भी आदेशानुसार हमारी ट्रेंच पर पहुँच चुके थे इसलिए काम बहुत तेज़ी से हुआ । दोपहर तक हम लोग उत्खनन करते हुए 1.35 मीटर तक पहुँच चुके थे । हम लोगों के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि थी ।

आज हमने सबसे ऊपरी सतह से अर्थात पहले स्तर से कार्य प्रारंभ किया था । आधे मीटर नीचे उतरने के बाद दूसरे स्तर पर हमें दस सेंटीमीटर मोटी रेत की एक परत मिली । हमने डॉ.वाकणकर को दिखाने के उद्देश्य से रेत की उस परत को यथावत रखकर उसके साइड में खोदना प्रारंभ किया । 

इसके पश्चात और गहराई में उतरने पर तीसरे स्तर पर ईट का बना एक फ्लोर प्राप्त हुआ । इस तरह अब हमारे सामने सीढ़ीनुमा तीन सतह थीं सबसे ऊपरी सतह पर मिट्टी, फिर दूसरी सतह पर भी मिटटी लेकिन उसके नीचे रेत और तीसरी सतह पर ईटों का बना फ्लोर ।

इस फ्लोर को स्पष्ट रूप से प्राप्त करने के लिए हमने बाईं ओर इसका विस्तार किया अर्थात बाईं ओर थोड़ी खुदाई और की । ज़मीन के इतने नीचे रेत की परत देखकर हम लोगों को आश्चर्य हुआ क्योंकि उसके ऊपर के दो स्तरों में सिर्फ मिटटी थी । हम सोच में पड़ गए कि इतने नीचे रेत कैसे पहुँची होगी ?
रेत की परत के विषय में बताते हुए डॉ.आर्य ने कहा " तीसरे स्तर पर जो ईटों का फ्लोर है वह किसी बस्ती का प्रतीक है । हो सकता है उस समय नदी की बाढ़ यहाँ तक आई हो और उसमें यह बस्ती डूब गई हो ,यह रेत की सतह उसी वज़ह से है, लेकिन अगर यह इसी स्तर पर काफी दूर तक मिलेगी तभी यह कन्फर्म होगा अन्यथा यह किसी के द्वारा इकठ्ठा की गई रेत भी हो सकती है । उसके ऊपर की सतह पर मिटटी होने का अर्थ है कि बाढ़ के बाद जब कई बरस बीत गए और यह ज़मीन गाद मिटटी आदि से पट गई उस पर फिर से नई बस्ती बस गई ।"

शाम का काम समाप्त होने से पूर्व डॉ.वाकणकर शिविर पहुँच चुके थे । मुख्य ट्रेंच देखने के बाद वे हमारी प्रशिक्षण ट्रेंच पर आये । सबसे पहले उन्होंने तीसरे स्तर पर प्राप्त ईटों की इस फ्लोर का अवलोकन किया। हम लोगों ने उनसे रेत की उस सतह के विषय में भी पूछा । 

काफी देर तक अवलोकन करने के पश्चात उन्होंने कहा " यह ईटों का फ्लोर किसी ताम्राश्मयुगीन मकान का हिस्सा लगता है जो किसी आक्रमण, अग्निकांड अथवा बाढ़ के फलस्वरूप नष्ट हुआ है । केवल रेत के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता है कि यह सभ्यता बाढ़ की वज़ह से नष्ट हुई होगी । यह भी केवल अभी अनुमान है । अभी हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच रहे हैं । उत्खनन के विस्तार में जाने पर ही यह तय हो सकेगा कि वास्तविक कारण क्या था ।"

सर द्वारा प्रदत्त इस जानकारी ने हमें उत्साह से भर दिया । हमें याद आया कि हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो में भी खुदाई के दौरान इसी तरह पूरा का पूरा शहर निकला था । वहाँ उन अवशेषों के बीच खड़े पुरातत्ववेत्ताओं के छाया चित्र हम लोगों ने किताबों में छपे हुए देखे थे । 

हम लोग कल्पना करने लगे कि बस दो-तीन दिनों में हम भी यहाँ पूरा शहर ढूँढ निकालेंगे और फिर इन अवशेषों के बीच खड़े रहकर फोटो खिचवायेंगे । ग़नीमत कि डॉ वाकणकर से हम लोगों ने अपने इस शेखचिल्ली वाले ख़्वाब के बारे में कुछ नहीं कहा वर्ना वे उसी क्षण हमें डंटियाते हुए हमारा स्वप्न भंग कर देते ।

यह बात तो हमें बहुत बाद में समझ आई कि किसी भी अवशेष की प्रारम्भिक अवस्था को देखकर उसके भविष्य के बारे में अटकलें नहीं लगाना चाहिये क्योंकि अनुमान गलत भी हो सकते हैं । बिना सम्पूर्ण प्रमाणों के केवल पूर्वाग्रहों के आधार पर लिखा गया इतिहास हमेशा हमेशा के लिए गलत मान्यताओं को स्थापित कर देता है । हमारे देश के इतिहास लेखन में कई बार ऐसा हुआ है जब यथार्थ से अधिक अनुमान या कल्पना को स्थान दिया गया ।

शिविर में वापस लौटते हुए हमने सर से सवाल किया "सर, लेकिन केवल अनुमान या कल्पना के आधार पर लोग इतिहास कैसे लिख देते हैं ? ' सर ने कहा "इसके अनेक कारण हो सकते हैं जैसे काम की जल्दबाज़ी, आधा अधूरा ज्ञान, पूर्वाग्रह, पुरस्कार या नाम हासिल कर लेने का लोभ या सत्ता का दबाव आदि । हालाँकि कई बार पूरे प्रमाण मिलते ही नहीं हैं । इतिहासकारों में इस बात पर विवाद अब तक जारी है कि ऐसी स्थिति में निष्कर्ष पर मुहर लगानी चाहिए या नहीं ।" 

जो भी हो आज साईट से लौटते समय हम लोग बहुत उत्साह में थे । ऐसा लग रहा था जैसे हमारा आना सार्थक हो गया है । इस खुशी में आज हम लोग फिर एक बार सिटी का चक्कर लगा आए । हाँ ..आज राम मिलन भैया हमारे साथ नहीं गए ।

*शरद कोकास*

बुधवार, 6 मई 2026

गौशाला गोबर से भर गई थी गनीमत कि हरक्युलिस वहाँ था

विक्रम और बेताल 
दंगवाड़ा के पुरातात्विक उत्खनन कैंप में आज हमारा यह पहला ही दिन था । हम लोग अपने तंबू मे सोने का प्रयास कर रहे थे ।


लेकिन सोने की हमारी कोशिश असफल रही। मैंने कहा, “चलो समय काटने के लिए मैं तुम लोगों को एक कहानी सुनाता हूँ उसी तरह जिस तरह ‘वेताल पच्चीसी’ में राजा विक्रमादित्य को उसके कंधे पर लदे हुए बेताल ने कहानियाँ सुनाई थीं।”


रवीन्द्र बोला, “भैया बेताल, पहले तय कर ले हम में से विक्रमादित्य कौन है जो तेरी कहानी ढंग से सुनेगा क्योंकि बाद में तो तू उसीसे सवाल पूछेगा।”

प्राचीन ग्रीस का नक्शा 

मैंने रवींद्र की ओर मुस्कुराकर देखा और कहा, “भाई, यह बाद में तय कर लेना फिलहाल तो यह कहानी सुनो। चलो, मैं तुम्हें यूनान ले चलता हूँ। योरोप और बाल्कन प्राय:द्वीप के दक्षिण में इजियन सागर से लगा प्रदेश है यूनान,वही प्रदेश जिसे वर्तमान में ग्रीस कहते हैं। यहाँ दक्षिण यूनान के पेलोपोनेसस क्षेत्र में उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उत्खनन किया गया जिससे माइसीनी नगर में प्राचीन सभ्यता का पता चला। इस तरह हमें यूनान के इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त हुई।

 पुरातात्विक सामग्री के अलावा यूनान के प्राचीन इतिहास के बारे में जानने का स्त्रोत वहाँ की पौराणिक कथायें भी हैं। यद्यपि विश्व की अधिकांश पौराणिक कथाओं की भांति इन कथाओं के नायक व घटनायें भी काल्पनिक हैं, लेकिन इन कथाओं में प्राचीन यूनानियों के काम धन्धे,औज़ारों, रीति -रिवाज़ों आदि के बारे में बहुत सारी जानकारियाँ मिलती हैं। यह यूनानी किन देशों की यात्रायें करते थे और किन किन देवी-देवताओं में विश्वास करते थे यह जानकारी भी इनमें है।”

“तू कहानी सुना रहा है या यूनान का इतिहास?” अजय जोशी ने ऊबकर पूछा। रवीन्द्र ने उसे छेड़ते हुए कहा,“अबे गधे, इतना भी नहीं जानता कि कहानी और इतिहास में फर्क होता है।” “जानता हूँ यार, इसीलिए तो कहा, लेकिन यह इतनी देर से बोर कर रहा है, ठीक है, चल आगे सुना।” अजय बोला। 

“चलो ठीक है।” मैंने सकुचाते हुए कहा,“भाई हम लोग पुरातत्त्व के छात्र हैं अब हिंदी के कथाकारों की तरह किस्सागोई में कहानी थोड़े ही सुना सकते हैं। चलो, फिर भी कोशिश करता हूँ,तुम्हें हर्क्यूलिस या हेराक्लीज़ की कहानी सुनाता हूँ।”मेरे भीतर का बेताल जाग गया था।

“प्राचीन यूनान में हेराक्लीज़ नामक एक प्रसिद्ध देवता था जो रोम में हरक्युलिस कहलाता था। हरक्युलिस के बारे में कहा जाता है कि वह आधा देवता और आधा मनुष्य था और उसके पास अद्भुत शक्तियाँ थीं। 

हरक्युलिस 


    यूनान और रोम के लोग पराक्रमी हर्क्यूलिस के कारनामों को बहुत पसन्द करते थे। यूनान में ऑजियस नामक एक राजा था जिसका राज्य बहुत विशाल था। उसकी गौशाला में पाँच हज़ार से अधिक गाय और बैल थे। लेकिन उसने सारे गौसेवकों को युद्ध और राजस्व वसूली जैसे दूसरे कामों में लगा दिया। स्वाभाविक था कि गौशाला की व्यवस्था बिगड़ गई और सफाई व्यवस्था ठप्प हो जाने के कारण गौशाला गोबर से भर गई। तब राजा ऑजियस को हरक्युलिस की याद आई। हरक्युलिस ने अपनी शक्ति से सबसे पहले पास की दो नदियों पर चट्टानों से एक बांध बना दिया, जब वे नदियाँ ऊपर तक भर गईं उसने एक झटके में वह बांध तोड़ दिया, बस पानी की तेज़ धार छूटी और सारा गोबर अपने साथ बहा ले गई।”

“तू भी यार, सोते समय क्या गन्दी गन्दी कहानी सुना रहा है। तेरे दिमाग में भी लगता है यही भरा है।” अजय ने हँसते हुए कहा। 

“सुनो तो।” मैं अपने प्रवाह में था,“इसी तरह एक बार ऐसा हुआ कि यूनान के राजा यूरीस्थेयस ने हरक्युलिस से कहा कि मैं तुम्हें शक्तिमान तब मानूंगा जब तुम मेरे लिए सोने का सेब लेकर आओगे। यह सेब यूनान से पश्चिम में इजियन महासागर के किनारे या पृथ्वी के सुदूर उत्तर में किसी बाग में किसी पेड़ पर लगे थे जो देवताओं की संपत्ति थे। ये तो हरक्युलिस के लिए चैलेंज था, तो वह सेब लाने के लिए चल पड़ा । 

हरक्युलिस को रास्ते में किक्नोस नामक दैत्य और जल देवता नीरियस से लड़ना पड़ा। नीरियस के बारे में यह मशहूर था कि वह अपने शरीर को चाहे जितना बड़ा या छोटा कर सकता था।”“मतलब सुरसा राक्षसी की तरह?” राममिलन भैया बहुत ध्यान से कहानी सुन रहे थे।

 “बिलकुल।” मैंने कहा,“लेकिन हरक्युलिस ने उसे भी परास्त कर दिया। आगे बढ़ने पर उसे समुद्र के देवता पोसायडान का बेटा एन्तेयस मिला जिसके बारे में मशहूर था कि धरती पर पाँव रखते ही उसके शक्ति दुगनी हो जाती थी। सो हरक्युलिस ने युक्ति लगाईं और उसे हवा में उछाल उछाल कर ही मार डाला।”

“फिर क्या हुआ?” रवींद्र ने पूछा। मैंने कहा, “उसके बाद वह काकेशस पर्वत पर आया जहाँ प्रोमेथ्युस बंदी था। यह वही प्रोमेथ्युस था जो मनुष्यों के लिए देवताओं से अग्नि चुराकर लाया था और उसे ज्यूस देवता ने इस बात की सजा देते हुए एक चट्टान से बांध दिया था। 

वहाँ एक गरुड़ रोज आता था और उसके जिगर को थोड़ा थोड़ा खाता था। हरक्युलिस ने प्रोमेथ्यूस को उस दैत्य से भी मुक्ति दिलाई। इसके बदले में प्रोमेथ्युस ने उसे सेब के बाग़ तक पहुँचने का रास्ता भी बताया और यह भी बताया कि एटलास तुम्हें धोखा देगा अतः सावधान रहना।

 

सोने का सेब 


    हरक्युलिस जब बाग़ में पहुँचा तो उसने देखा कि वहाँ वीर अटलांटिस या एटलास उस बाग़ में सोने के सेब की रक्षा कर रहा था। वह अपने काँधे पर आकाश को थामे हुए था और पृथ्वी पर खड़ा था। अब उस समय यूनानियों को आकाश की वास्तविकता तो मालूम नहीं थी। वे सोचते थे कि आकाश पृथ्वी पर गिर रहा है और वीर अटलांटिस उसे अपनी पीठ पर थामे हुए है जिसकी वज़ह से पृथ्वी बची हुई है।”

“इसी के नाम पर अटलांटिक महासागर का नाम पड़ा है ना?” अशोक ने पूछा।“हाँ।” मैंने कहा,“अब आगे सुनो। हरक्यूलिस ने वीर अटलांटिस से सेब की मांग की। उसने हरक्युलिस से कहा, 'मैं सेब तोड़ता हूँ तब तक तुम अपने कंधे पर यह आकाश थामे रखो।' 

सेब तोड़कर वह जाने लगा। हरक्युलिस समझ गया कि उसके साथ धोखा हुआ है। उसने कहा, 'भाई, मेरे कन्धों में बहुत दर्द हो रहा है एक मिनट के लिए तुम यह भारी भरकम आकाश थाम लो।’एटलास उसकी बातों में आ गया और उसने फिरसे आकाश अपने कंधे पर ले लिया। बस हरक्युलिस को मौका मिला गया और वह सोने के सेब लेकर भाग गया।”

“वाह ! वाह ! अच्छी कहानी है, लेकिन सारे वीर यूनान में ही पैदा नहीं हुए हैं।” हमारे हनुमान भक्त मित्र पंडित राममिलन शर्मा इलाहाबादी बहुत देर से हरक्युलिस का किस्सा सुन रहे थे और मन ही मन नाराज़ हो रहे थे। उन्होंने गुस्से से कहा,“होगा हरक्युलिस फर्क्युलिस बहुत बड़ा वीर, लेकिन हमरे यहाँ के वीर हनुमान जी भी उससे कुछ कम नहीं हैं, उन्होंने तो सूरज को निगल जाने और संजीवनी बूटी का पहाड़ उठा लाने जैसे बड़े बड़े कारनामे किये हैं उनको भी ऐसे ही राक्षस रास्ते में मिलते हैं और लंका जाते समय ऊ सुरसा भी मिलती है.. ई हर्क्यूलिसवा भी तो उन्हीं का यूनानी अवतारहै। ये सब कथाएँ हमरे यहाँ से ही ओ लोग चोरी किये हैं।”

मैंने कहा,“हाँ राममिलन भैया,यूनानियों की तरह पुराणकथायें तो हमारे यहाँ भी हैं और उनमें भी अनेक किस्से हैं जो दुनिया की अनेक सभ्यताओं के किस्सों जैसे ही हैं। अनेक पात्र तो हमारे मिथकीय पात्रों से मिलते जुलते भी हैं जैसे उनका हरक्युलिस तो हमारे हनुमान, उनका ज्यूस और हमारा इंद्र। जैसे हमारे यहाँ गांधारी के आँख की पट्टी खोलकर देख लेने पर दुर्योधन के शरीर के वज्र के हो जाने की कथा है वैसे ही उनके यहाँ एकिलिस की माँ द्वारा उसके शरीर को वज्र करने के लिए उसे स्टिक नामक नदी में डुबोये जाने की कथा है।”

“भाई अब तेरी कथा बाद में सुनेंगे।” रवींद्र ने कहा,“अब नींद आ रही है ..लेकिन यार यह योरोप,बाल्कन द्वीप, पेलोपोनेस,लगता है अगली बार तेरी बातें समझने के लिए प्राचीन विश्व का नक्शा लेकर बैठना पड़ेगा”। “बिलकुल।” मैंने कहा। वैसे भी रात काफी हो चुकी थी और नींद से सबकी ऑंखें बोझिल हो रही थीं। बिजली के बल्ब से निकलने वाली रोशनी के ड्यूटी आवर्स भी समाप्त हो चुके थे। जंगल की ठंडी हवा तम्बू के छेदों से भीतर प्रवेश कर रही थी।  

जाने क्यों मुझे इस ठण्ड में इन काल्पनिक कहानियों के बरक्स यथार्थ के धरातल पर लिखी प्रेमचंद की कहानी ‘पूस की रात’ याद आ रही थी। इससे पहले कि हम लोगों की हालत ठण्ड में कांपते किसान हल्कू की तरह हो जाए हम लोगों ने सो जाना उचित समझा। अंततः मैं उस हवा में पृथ्वी के पहले मनुष्य की देहगन्ध महसूस करता हुआ जाने कब नींद के आगोश में चला गया।

आज की यह कहानी आप को कैसी लगी टिप्पणी मे अवश्य बताएं 

आपका 

शरद कोकास 

शनिवार, 23 जून 2018

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी - चौदहवां दिन - दो


दोस्त अपने मुल्क की किस्मत पे रंजीदा न हो 


प्रतिदिन की भांति तैयार होकर हम लोग ट्रेंच पर पहुँच गए । आज हमारा उत्खनन शिविर में चौदहवां दिवस था । ट्रेंच पर पहुँचकर हम लोगों ने अपनी कापियों पर नज़र डाली और कल छोड़े हुए काम की तस्दीक की । अब हमें कल से आगे के उत्खनन कार्य में व्यस्त हो जाना था । फिर आज का दिन भी उसी तरह बीत गया जैसे कि पिछले तेरह दिन बीते थे । कोर्स की और परीक्षा की ज़रूरत के अनुसार जितना ज्ञान हमें चाहिये था उतना हम अर्जित कर चुके हैं और अब यहाँ मन भी नहीं लग रहा है । वैसे तो श्येड्युल के अनुसार हमें यहाँ एक माह रहना था लेकिन हमें पहले ही आने में देर हो गई इसलिए एक माह से पहले ही प्रशिक्षण कार्य पूर्ण करना होगा । फिर हमें थ्योरी की तैयारी भी करनी है जिसके लिए बहुत कम समय बचा है । इसलिए हम लोग यहाँ से जल्दी जाने की फिराक में हैं । फ़रवरी की समाप्ति के साथ साथ हमें वापस उज्जैन पहुँचना है । हमें पता है कि उत्खनन कार्य काफी समय तक चलेगा सो परीक्षा के बाद फिर कभी आ जाएँगे ऐसा विचार कर हम लोग यहाँ से जाने का मन बना रहे हैं । फिर लौटकर अन्य विषयों की तैयारी भी तो करनी है वरना परीक्षा में अच्छे नम्बर नहीं मिलेंगे और अच्छे नम्बर नहीं मिलेंगे तो अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी और अच्छी नौकरी नहीं मिली तो जीवन इसी तरह व्यर्थ बीत जाएगा ।

शाम से ही जाने क्यों सभी का मन उखड़ा हुआ था । ऐसा अक्सर होता है कि एक उम्र और एक सी परिस्थितियों में रहने वालों की मन:स्थिति भी एक सी हो जाती है । कभी कभी भविष्य की चिंताओं के कारण भी मन उदास हो जाता है  । शाम को कहीं जाने का मन नहीं था लेकिन समय तो बिताना ही था और फिर सिटी यानि दंगवाड़ा गाँव जाने का चस्का भी लग चुका है सो यह भ्रमण कार्य भी संपन्न हुआ । गाँव वालों से हमारी मित्रता हो चुकी है । हम लोग उनके बीच जाकर उन्हीं की तरह हो जाते थे । हमने ठान रखा है कि अन्य शहरियों की तरह उन्हें कोई उपदेश नहीं देंगे न उन्हें किताबी ज्ञान की बातें बताएँगे हालाँकि पर्यावरण ,अन्द्धश्रद्धा निर्मूलन और स्वास्थ्य जागरूकता सम्बन्धी बातें तो हम उन्हें बताते ही हैं । वे अपनी स्थितियों से भले ही पूरी तरह खुश न हों लेकिन हम जानते हैं कि उन्हें उनकी स्थितियों से बाहर निकालने के लिए हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं । ज़्यादा से ज़्यादा व्यवस्था को गाली दे सकते हैं और उन्हें  उनकी ज़िल्लत का अहसास दिला सकते हैं । लेकिन इससे क्या हो जाएगा ? क्या इससे उनकी दशा बदल जाएगी ? हमें अपनी सीमायें पता हैं और हम उन्हीं  सीमाओं के भीतर रहकर उनकी बेहतरी के लिए भरसक प्रयास कर रहे हैं । मुक्तिबोध ने कहा भी है .."इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए ।"

फिर भी कभी कभी मन ख़राब हो जाता है अपने देश के गाँवों की स्थिति देखकर । आज़ादी के इतने साल बाद भी शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित यह लोग आखिर देश के विकास में क्या योगदान दे सकते हैं ? सत्ताधीश इन्हें केवल वोट बैंक समझते हैं और इन्हें  ठीक ठीक मनुष्य का दर्ज़ा भी नही देते । रवीन्द्र जब भी मुझसे इस परेशानी को शेयर करना चाहता मैं उसे दुष्यंत का वह शेर सुना देता हूँ “

दोस्त अपने मुल्क की किस्मत पे रंजीदा न हो
उनके हाथों में है पिन्जरा उनके पिंजरे में सुआ ।


एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी - चौदहवां दिन - एक


लेखन कला दरअसल क्या है 

चम्बल नदी के किनारे स्थित पुराने घाट के बेरंग पत्थर अब हमारे पांवों का स्पर्श भलीभांति जान चुके हैं ।दिन भर यह पत्थर धूप से उसकी गर्मी चुराते हैं और रात भर खुले आकाश के नीचे रहने के बावज़ूद वे कुछ गर्मी हमारे लिए सहेज कर रखते हैं । हम लोग कुछ देर उन पत्थरों पर बैठकर आपस में बतियाने के साथ साथ नदी से भी बतियाते हैं । मंथर गति से बहती हुई चम्बल नदी कभी कभी हमारी बातें सुनकर पल भर के लिए ठहर जाती है और फिर किसी मज़ेदार बात पर खिलखिलाकर आगे बढ़ जाती है । नदी सुबह स्नान के पश्चात हम लोग एक सीढ़ी पर बैठ गए और बहती नदी को देखने लगे । रवीन्द्र को लगा नदी जैसे झील बन कर ठहर गई है । उसने इस भ्रामक ठहराव को तोड़ने के लिए एक कंकर नदी के जल में उछाला और कहा “यार, तू कुछ भी केह  तेरी यात्रा डायरी सुनने में बहुत मज़ा आ रहा है ।"

मैंने कहा " ऐसी मज़े की उसमें  क्या बात है, हम तो इस यात्रा में साथ ही थे । " वह तो है.. " रवीन्द्र ने कहा " लेकिन यही तो लेखन कला का कमाल है, कभी कभी किसी दृश्य से अधिक सुन्दर उसका वर्णन लगता है क्योंकि उसमें लेखक की अनुभूतियों के अलावा वे बिम्ब और रूपक भी शामिल होते हैं जो साधारण व्यक्ति को नहीं दिखाई देते, इसीलिए तो लेखन को कला कहा जाता है । मुझे नहीं पता था यात्रा वृतांत भी इतना सुंदर हो सकता है ।"  "हाँ सभी कलाओं की यही विशेषता होती है ।" मैंने कहा "स्थापत्य कला, चित्र कला, संगीत कला, नाटक, शिल्प, साहित्य सभी इस सुन्दरता का ही बखान करते हैं ।" " यार कला के छात्र तो हम भी हैं लेकिन तुझे देखकर अच्छा लगता है कि हमारे बीच एक कलाकार भी है जो इतनी सुन्दर कल्पनाएँ करता है । " रवीन्द्र ने कहा ।

"लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता " मैंने कहा । "कभी कभी यथार्थ कल्पना से अधिक भयावह होता है । तब उसे किसी कलारूप में प्रदर्शित करना बहुत कठिन भी होता है हालाँकि कला के रूप में उसकी बहुत तारीफ़ होती है .. जैसे गन्दी झोपड़पट्टी में ऐसे कोई जाना पसंद नहीं करेगा लेकिन यदि कोई कलाकार उसकी पेंटिंग  बनाकर किसी आर्ट गैलरी में लटका दे तो सारे अभिजात्य वर्गीय उसे देखने चले जायेंगे ।" "तू भी ना यार बात को कहाँ से कहाँ ले जाता है ।" रवींद्र ने कहा । "और कला के पारखी सारे लोग ऐसे ही होते हैं क्या ? कुछ लोग तो होते हैं जिनका मन चित्र देखकर या कविता पढ़कर द्रवित होता होगा और वे समाज को इस स्थिति से बाहर निकालने हेतु प्रयास भी करते होंगे । आख़िर कला का कुछ असर तो होता ही है ।" " छोड़ ना यार ,इस पर बात फिर कभी। " मैंने कहा "अभी एलोरा और औरंगाबाद की यात्रा भी बाक़ी है ना ?“ रवीन्द्र प्रसन्न हो गया “ बिलकुल । आज रात चलते हैं ना आगे की सैर के लिए । फ़िलहाल तो भोजनशाला पहुँचा जाए ..भूख पेट की यात्रा कर रही है ।"


आपका शरद कोकास 

गुरुवार, 10 मार्च 2011

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – तेरहवां दिन – तीन

भूख मिटाने का कुछ इन्तज़ाम किया जाए
अजय ने अचानक बीच में सवाल किया  “  लेकिन यार इन गुफाओं का पता कैसे चला ? इन तक भी डॉ. वाकणकर जैसा कोई व्यक्ति पहुँचा था क्या ? “ हाँ बताता हूँ …” मैंने कहा “ आगे यही लिखा है मैंने । और मैंने आगे पढ़ना शुरू कर दिया ।
“ बाघोरी नदी के किनारे नाल के आकार में बनी इन गुफाओं की खोज की कहानी भी अत्यंत रोचक है । सन अठारह सौ उन्नीस में अंग्रेज़ों के समय की बात है । एक दिन एक अंग्रेज़ शिकारी शिकार के लिए निकला और जंगल में रास्ता भटक गया ।उसे एक किसान का लड़का मिला उसने शायद इनाम की लालच में शिकार प्राप्त होने की संभावित दिशा बताते हुए इन गुफाओं की ओर इशारा किया । उस समय यह गुफाएँ असंख्य पेड़ों और लताओं से घिरीं थीं । अंग्रेज़ शिकारी ने दूरबीन से इधर देखा। उसे पेड़ों के पीछे किसी गुफा में एक चित्र नज़र आ गया और वो खुशी से उछल पड़ा । इस तरह यह गुफाएँ सारे संसार में मशहूर हो गईं ।
इतना कह कर मैं चुप हो गया । मैंने देखा अजय , रवीन्द्र , अशोक सब इस तरह मुझे देख रहे थे जैसे यह बात मैं उन्हे पहली बार बता रहा हूँ । “ फिर क्या हुआ ? “ अशोक ने सवाल किया ।
“ बस अजंता की कला देखते हुए मैं उसमें खो गया । एक एक गुफा की दीवारों पर चित्रित जातक कथाएं , बुद्ध की विभिन्न मुद्राएँ , मुद्राओं में दुख की परिभाषा , चेहरे पर वैराग्य की अनिवार्यता और संसार को सही सही जान लेने का भाव । इसके अलावा भी बहुत कुछ था इन चित्रों में …ग्रहस्थ जीवन के प्रति पति की उदासीनता से आहत यशोधरा , भिक्षुओं के विभिन्न क्रियाकलाप , दान की गाथाएँ और जाने क्या क्या , इसका वर्णन शब्दों में संभव ही नही है । उन्नीस गुफाओं को पार करते हुए जैसे मैं एक युग पार कर चुका था । हम किस कला व संस्कृति की बात करते हैं , असली संस्कृति तो यहाँ छुपी हुई है । ऐसी संस्कृति जिसे किसी धर्म या जाति या देश काल की परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता ।
बस इस तरह गुफाएँ देखते हुए दोपहर के तीन बज गए । यह समय बहुत कम था इतना कुछ देखने के लिए लेकिन वापस लौटना भी था । यह सोचकर कि ठीक ठाक नौकरी मिल जाने के बाद एक बार फिर दो - चार दिनों के लिये यहाँ आयेंगे हम लोगों ने उस अल्प समय के अवलोकन पर संतोष कर लिया और  बाहर आ गए । हमसे बिछड़कर जैन सर जाने कब पत्थर की गुफाओं से निकल कर लोहे की गुफा यानि बस में आकर बैठ गए थे । वैसे भी वे पूर्व में अनेक बार यहाँ आ चुके थे और यह उनके लिए एक रूटीन वर्क की तरह था । हमें आता देख उन्होंने चिन्ता प्रकट की “ अरे भाई , भूख - वूख नहीं लगी क्या तुम लोगों को । खैर भूख तो एक सच्चाई की तरह हमारे सामने थी और उसे रोटी के चित्र से नहीं मिटाया जा सकता था । “ चलो महेश । “ मैंने कहा “ भूख मिटाने का कुछ इन्तज़ाम किया जाए ।“ और हम लोग किसी होटल की तलाश में निकल पड़े ।