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शुक्रवार, 19 जून 2020

रूमानियत का किला उसके इस डायनामाईट से ध्वस्त हो चुका था


इस जंगल में हमारे लिए  यह पहला मुफ़्त का मनोरंजन कार्यक्रम था । बरगद के ढेर सारे पेड़ों के बीच में लगा था हमारा शिविर । पास ही चम्बल नदी बहती थी । हम लोगों ने अपना सामान तम्बू में रखा और नदी पर चल दिये हाथ मुँह धोने । हमने अब तक चम्बल के बीहड़ और उनमे रहने वाले डाकुओं के बारे में ही सुना था लेकिन यहाँ न बीहड़ थे न डाकू  । फिर भी हम हाथ मुंह धोते हुए अगल बगल देखते रहे ..कहीं किसी डाकू का घोड़ा न बंधा हो । लौटकर आए  तो रसोई प्रभारी भाटी जी ने गरमा गरम चाय पिलाई । चाय पीकर हम लोग टीले पर पहुँच गए  । यद्यपि हम लोगों का काम अगले दिन से प्रारम्भ होना था लेकिन उत्खनन स्थल देखने की उत्सुकता तो थी ही ।

अद्भुत दिखाई दे रहा था वह टीला..चांद के प्रकाश में । बीच में कहीं कहीं टेकडियों की छाँव जैसे पहली क्लास के किसी बच्चे ने अपनी ड्राइंग कॉपी में चित्र बनाये हों । शांत वेग से बह रही थी चम्बल जैसे कोई माँ अपने बच्चे को सुलाने के बाद आधी नींद में सो रही हो । हवा चलती तो चांद का अक्स पानी में लहराता हुआ नज़र आता । वातावरण इतना खामोश कि हम बहते हुए पानी की आवाज़ साफ साफ सुन सकते थे ।

डॉ.वाकणकर ने दो दिन पूर्व जिस आयताकार ट्रेंच की खुदाई शुरू की थी वह अभी नींद के आगोश में थी , उसे जगाना हमने उचित नहीं समझा और दूर खड़े चुपचाप उसे देखते रहे । उसके भीतर गहन अन्धकार था , सदियों से भीतर अवस्थित  अन्धकार । मैं उसे देखता रहा ..कविता कहीं भीतर से बाहर आने को आतुर थी ..मैंने कहा ..” ऐसा लगता है जैसे इस अतल गहराई में कोई रंगमंच है, जिस पर सैकडों सालों से कोई ड्रामा चल रहा है । जाने कितनी सभ्यताओं के पात्र आवागमन कर रहे हैं । कहीं युद्ध चल रहा है तो कहीं कोई चरवाहा किसी पेड़ के नीचे बैठकर बंसी बजा रहा है । कहीं कोई बच्चा पेड़ से लटके झूले पर बैठा झूला झूल रहा है ,कहीं कोई हरकारा दूर से अपने घोड़े पर बैठा आता हुआ दिखाई दे रहा है । “ “ सुनो सुनो  ...” अजय ने अचानक कहा “ मुझे तो घोडों की टापों की आवाज़ भी आ रही है...” “ बस कर यार ।” रवीन्द्र बोला ” जुकाम के कारण तेरे कान बन्द हैं , यह बलगम की आवाज़ होगी ।“ हम लोग रूमानियत से वास्तविकता के धरातल पर आ चुके थे ।

कल दिन में निखात के उस अंधेरे से साक्षात्कार करेंगे  यह सोच कर हम लोग टीले की ढलान पर बैठ गए  । मैंने कमर सीधी करनी चाही । 
पूरा आसमान मेरी आँखों के सामने था और उसमें चमक रहा था पूर्णिमा का पूरा चांद । चाँद की रौशनी की वज़ह से सितारे थोड़े मद्धम हो गए थे । मैंने उनमें  ध्रुव तारा ढूँढना चाहा ताकि मैं उत्तर दिशा का पता लगा सकूँ । चाँद को देखते हुए मुझे अचानक ऋतुओं का ख़याल आया और फिर ऋतुओं और चाँद सूरज के सम्बन्ध के बारे में । 

रवीन्द्र ने डॉ.वाकणकर के सान्निध्य में अपने खगोलीय ज्ञान का काफी विस्तार कर लिया था । मैंने रवीन्द्र से सवाल किया " यार यह बसंत का अयनांत तो नहीं है ? " रवींद्र ने जवाब दिया " भाई अभी अयनांत कहाँ, पिछला अयनांत 21 दिसंबर को हो चुका है और अगला इक्कीस जून को आएगा ।  मैंने फिर रवींद्र से सवाल किया ..यार लेकिन यह अयनांत और विषुव निर्धारित तिथि पर कैसे आते हैं ?"

रवींद्र ने कहा " चलो मैं तुम्हें एक सिरे से समझाता हूँ कि अयनांत यानी सोलिस्टीस और विषुव यानी इक्विनॉक्स क्या होता है । सबसे पहले विषुव यानि इक्विनॉक्स के बारे में बताता हूँ जब रात और दिन बराबर होते हैं । 
यह हमारे देश में 21 मार्च और 23 सितम्बर को होता है जब रात और दिन बराबर होते हैं । पहले कुछ बेसिक बातें समझ लो । 
तुमने ग्लोब में यह देखा होगा कि पृथ्वी अपनी धुरी पर साढ़े तेईस डिग्री झुकी हुई है और वह स्वयं इसी तरह घूमते हुए सूर्य के चक्कर भी लगाती है । उसका यह पथ गोलाकार अथवा लम्बवत नहीं होता बल्कि दीर्घ वृत्ताकार यानि इलेप्टिकल होता है । पृथ्वी के ठीक मध्य से अर्थात उसके पेट से एक काल्पनिक रेखा जाती है जिसे भूमध्य रेखा कहते हैं । 
पृथ्वी का उपरी हिस्सा जो नासपाती जैसा चपटा है उत्तर ध्रुव तथा दक्षिणी हिस्सा दक्षिण ध्रुव कहलाता है । इस तरह दो गोलार्ध बनते हैं उत्तरी व दक्षिणी ।

अब होता यह है कि सूर्य के चारों ओर घूमते  हुए पृथ्वी की  साल में एक बार ऐसी स्थिति आती है जब वह सूर्य की ओर अधिक झुकी होती है और एक बार ऐसी स्थिति आती है जब वह सूर्य के विपरीत झुकी रहती है । 

पहली स्थिति में दिन बड़ा होता है और दूसरी स्थिति में रात । लेकिन दो बार ऐसी स्थिति आती है जब पृथ्वी का झुकाव न सूर्य की ओर होता है न उसके विपरीत बल्कि वह मध्य में होती है । इन दोनों  स्थितियों में रात और दिन बराबर होते हैं और इन्हें विषुव अथवा इक्विनॉक्स  कहते हैं । अगर इक्विनोक्स के समय हम भूमध्य रेखा पर खड़े हों तो सूर्य ठीक हमारे सर के ऊपर होता है । वैसे दिन और रात बराबर होने कि स्थिति सैद्धांतिक है वास्तव में ऐसा होता नहीं है, फिर अलग अलग देशों में तिथियों में भी फर्क होता है ।

मैंने कहा " इसका अर्थ यह हुआ कि  पृथ्वी का एक गोलार्ध छह माह तक सूर्य की  ओर झुका रहता है और दूसरा गोलार्ध अगले छह माह तक । इसी वज़ह से उत्तर व दक्षिण ध्रुव पर छह माह का दिन और छह माह की रात होते हैं । और जब उत्तरी गोलार्ध में गर्मी होती है तो दक्षिणी गोलार्ध में ठण्ड पड़ती है उत्तरी ध्रुव पर रहने वाले लोगों के लिए इक्विनॉक्स  के अगले छह माह दिन वाले होते हैं जबकि दक्षिण ध्रुव पर रहने वालों के लिए अगले छह माह रात के । मतलब इस विशेष दिन दोनों ध्रुव के लोगों को सूर्य का प्रकाश एक जैसा देखने को मिलता है ।

" बिलकुल ठीक " रवींद्र ने कहा " अब अयनांत या सोलिस्टीस  के बारे में बताता हूँ यह भी साल में दो बार आता है 21 जून को जब दिन सबसे बड़ा होता है और 21 दिसंबर को जब दिन सबसे छोटा होता है । ग्रेगोरियन वर्ष आरम्भ होने के समय अर्थात जनवरी में सूरज दक्षिणी गोलार्ध में होता है फिर वह उत्तरी गोलार्ध में जाना शुरू करता है मकर संक्रांत से । 

लेकिन दिसंबर आते आते फिर दक्षिणी गोलार्ध में पहुँच जाता है । इस तरह आते जाते सूर्य वर्ष में दो बार भूमध्य रेखा पर होता है । असल में सूर्य कहीं नहीं जाता वस्तुतः यह भी पृथ्वी के घूमने के कारण ही होता है । अयनांत को कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि जून में यदि उत्तर ध्रुव से देखा जाए तो सूर्य  सर्वोच्च ऊंचाई पर होता है इसे ग्रीष्म अयनांत  कहते है उसी तरह दिसंबर में यह सूर्य  दक्षिण ध्रुव से देखा जाए तो यह वहाँ से सर्वोच्च ऊंचाई पर होता है ऐसा दिसम्बर में होता है इसलिए उसे शीत अयनांत कहते हैं । जो एक ध्रुव के लिए ग्रीष्म अयनांत होता है वह दुसरे ध्रुव के लिए शीत अयनांत होता है

" मतलब यह कि अभी फरवरी का महिना है और दिन बड़े होते जा रहे हैं " मैंने निष्कर्ष दिया । इस वक़्त चाँद हमारे सामने था और हमारी यह गुस्ताख़ी थी कि हम चाँद की बात न करके सूरज की बात कर रहे थे । चाँद हमसे नाराज़ न हो जाए इसलिए मैंने अपने भीतर के वैज्ञानिक ,खगोलज्ञ और पुरातत्ववेत्ता से कहा .." तुम अभी चुप रहो " और कवि से कहा .. " कोई कविता सुनाओ " मैंने गुनगुनाना शुरू किया ..और बेसाख्ता मेरे मुँह से एक गीत फूट पड़ा..”ये पीला बासंतिया चांद…संघर्षों का ये दिया चांद… .चंदा ने कभी रातें पी थीं… रातों ने कभी पी लिया चांद । “ कभी क्षेत्रीय शिक्षा महाविद्यालय भोपाल में अध्ययन के दौरान कवि रमेश यादव से यह गीत सुना था।


“ बस कर यार । ” इतनी ठण्ड में तुझे बासंतिया चांद कहाँ से दिखाई दे रहा है ? रवीन्द्र भारद्वाज ने मेरे भीतर के कवि और गायक से पुरातत्ववेत्ता की तरह सवाल किया । 

मेरा रूमानियत का किला उसके इस डायनामाईट से ध्वस्त हो चुका था ..मैं भौंचक होकर उसकी ओर देखता रहा कि अचानक मुझे चुप कर वह खुद शुरू हो गया ‘शरद रैन मदमात विकल भई , पिउ के टेरत भामिनी कैसी, कैसी निकसी चांदनी कैसी..चांदनी चांदनी चांदनी....। उसके बाद हम लोग बसंत और शीत ऋतु के कालखंड और अयनांत पर बहस करते हुए अपने तम्बू में वापस आ गये । 

🔲 शरद कोकास 🔲

बुधवार, 10 जून 2020

सर्दियाँ उस साल कुछ देर तक ठहर गई थीं


आज से पैंतीस साल पहले पांच हज़ार साल पुरानी उस ताम्राश्म युगीन सभ्यता में जाने का अवसर एक बार मुझे भी प्राप्त हुआ था । उन दिनों मैं विक्रम विश्वविद्यालय में ‘प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व’ में स्नातकोत्तर का छात्र था । इस संकाय के अंतर्गत हम लोग मुद्राशास्त्र, कला एवं स्थापत्य, प्रतिमाविज्ञान, अभिलेख शास्त्र आदि विषयों का अध्ययन कर रहे थे । इसके अतिरिक्त विभिन्न विषयों पर शोध, म्यूजियम्स का अध्ययन और शैक्षणिक यात्राएं भी हमारे पाठ्यक्रम के अंतर्गत थीं । अन्य सैद्धांतिक विषयों की भांति ‘पुरातत्व’ विषय केवल सैद्धांतिक नहीं था अपितु उसमें  प्रायोगिक परीक्षा भी होती थी और उसके लिए किसी उत्खनन में शामिल होना अनिवार्य था ।

उन दिनों विक्रम विश्वविद्यालय के तत्वावधान में उज्जैन के निकट ‘दंगवाड़ा’ नामक स्थान पर हमारे पुरातत्व विषय के गुरु डॉ. वि. श्री. वाकणकर के मार्गदर्शन में एक उत्खनन शिविर लगा हुआ था । ‘दंगवाड़ा’  की इस साईट की खोज सन 1966 -67 में डॉ. वाकणकर ने उज्जैन के श्री विष्णु नाइक की सहायता से की थी तत्पश्चात पासलोद के श्री मांगीलाल पंड्या की सहायता से यहाँ पर्याप्त मुद्राएँ खोजी गईं । उसके पश्चात आठ दस बार यहाँ सर्वेक्षण किया गया और वर्ष 1978 में मध्यप्रदेश शासन के पुरातत्व विभाग द्वारा ताम्राश्म युगीन अवशेषों की व्यापक खोज के उद्देश्य से यहाँ उत्खनन प्रारंभ किया गया ।  वहीं एक माह रहकर एक पुरातत्ववेत्ता की तरह हमें अपना प्रायोगिक कार्य संपन्न करना था । यह कालखंड मेरे जीवन का अविस्मरणीय कालखंड रहा और इस दौरान मैं पुरातत्व के व्यावहारिक ज्ञान से समृद्ध हुआ    उन दिनों कुछ दिनों के लिए ही सही हम लोग छात्र से पुरातत्ववेत्ता बन गए थे ।

इस डायरी में उन्हीं  दिनों की घटनाएँ दर्ज हैं, इसमें पुरातत्व की तकनीकी बातें है,इतिहास के अनछुए पन्नों का अध्ययन है, छात्र जीवन की शरारतें  हैं, यात्राओं के विवरण हैं, ज्ञान और विज्ञान की बातें हैं, साहित्य पर बहस है, मजदूरों के दुःख और शोषण की कहानियां हैं । उम्मीद है कि बतकही के अंदाज़ में लिखी यह डायरी आपको अवश्य पसंद आयेगी ।

फरवरी माह की बस शुरुआत ही हुई थी । सर्दियाँ उस साल कुछ देर तक ठहर गई थीं इसलिए बसंती हवाओं के लिए उन्होंने अपने दरवाज़े पर सख्त़ मुमानियत की तख्ती लगा दी थी । फिर भी सूर्य अपनी समय सारिणी के अनुसार ही चल रहा था । हमारे दंगवाड़ा पहुँचते पहुँचते दरख्तों के लम्बे सायों के पीछे से अँधेरा झांकने लगा था । दंगवाड़ा ग्राम की मुख्य सड़क पर एक चाय की टपरी वाले से पूछने पर पता चला कि वह टीला जिस पर विक्रम विश्वविद्यालय के तत्वावधान में खुदाई हो रही है , गाँव से दो किलोमीटर भीतर जंगल में है । हम लोग जिस वाहन में थे, वह युनिवर्सिटी की एक पुरानी जीप थी । हमने ड्राईवर से जानना चाहा कि गाडी वहाँ तक जाएगी या नहीं या फिर हमें अपना बिस्तरबन्द लादकर वहाँ तक पैदल ही जाना होगा ।

ड्राइवर खुशीलाल हंसने लगा “ भैया, मैं चार बार वहाँ तक जा चुका हूँ ,जंगल में भी मैंने अपनी गाडी जाने लायक रास्ता बना ही लिया है । आपको किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं है । चलो फिर ठीक है । ” रवीन्द्र भारद्वाज ने उछलकर कहा । हम लोगों ने चैन की साँस ली । उस दिन पूर्णिमा थी और फरवरी की उस धुंधलाती हुई शाम के विदा लेने की प्रतीक्षा करता हुआ बड़ा सा चांद बस निकलने ही वाला था । डूबते सूरज की मद्धम रोशनी में भी जंगल साफ दिखाई दे रहा था । खुशीलाल ने अपना बनाया रास्ता पहचानकर कैम्प तक गाडी पहुँचा दी ।

अद्भुत द्रश्य था वहां । जाने कितने बरगद अपना आंचल फैलाये खड़े थे और उनके नीचे सफ़ेद तम्बुओं की एक कतार थी । तम्बुओं के करीब कुछ भीड़ सी दिखाई दी । गाड़ी से उतरकर देखा तो एक मज़दूर औरत ज़मीन पर लेटी हुई है और लोग उसे घेरे खड़े हैं । पता चला कि शाम को वह काम खत्म होने के पश्चात अचानक बेहोश होकर गिर पड़ी थी और उसके साथी गाँव से किसी झाड़-फूँक वाले को लेकर आ गए थे। डॉ.वाकणकर भी वहीं खड़े-खड़े उनसे बातें  कर रहे थे । हम सभी छात्रों ने उन्हें प्रणाम किया । उन्होंने नमस्ते का जवाब देते हुए अपनी बात ज़ारी रखी..” कईं भूत- वूत नई लग्यो है..ईको उपवास थो, न ऊपर से इनने लंगन कर ल्यो, अणि लिए  अणे चक्कर अईया, अबार होश में अई जांगा..” “ नई बा साब ” ओझा अपनी इज़्ज़त बचाना चाहता था “ अणि टीला में..जणि टीला की खुदाई कर रेया हो,उणमें लोगाँ की आत्मा रेवे हे, अब खुदई से वे बाहर अईगी हे, ओर उणी में से कोई आत्मा लागी गी हे..आज तो पूर्णिमा हे ..टांका का दिन..”

डॉ.वाकणकर हँसने लगे “ यदि ऐसा होता तो सबसे पहले आत्मा को मुझे पकडना चाहिये था , मैं तो ऐसे कई टीलों की , कब्रस्तानों की खुदाई करवा चुका हूँ , और खोपडियाँ और कंकाल तो बिस्तर में भी मेरे साथ रहते हैं,कोई आत्मा - वात्मा नहीं होती  , सब फालतू बात है ...” वे कह ही रहे थे कि सबने देखा वह स्त्री होश में आ रही है । उन्होंने  कहा “ देखो , यह होश में आ गई है , इसे घर ले जाओ ठीक से खाना - वाना खिलाओ.. सब ठीक हो जाएगा । और आइन्दा से फालतू उपवास करने की कोई ज़रूरत नहीं । “ इसके बाद वे हम लोगों से मुखातिब हुए… “ चलो रे सज्जनों, तुम लोगों को तुम्हारे तम्बू दिखा दें ।”  मैं रवीन्द्र, अजय,अशोक और राममिलन  अपना अपना डेरा-डंडा उठाकर उनके साथ तम्बुओं की ओर चल दिये ।


शरद कोकास 

एक सभ्यता के पश्चात दूसरी सभ्यता का आगमन होता है

एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी

शरद कोकास
भूमिका

उत्खनन स्थल का एक दृश्य
उत्खनन स्थल का एक दृश्य 
  नुष्य का यह सहज स्वभाव है कि वह वर्तमान में   जीते हुए भी कभी कभी अतीत में अथवा भविष्य में  जीने की कल्पना करता है ।  कभी न कभी यह ख़याल   हर एक के मन में आता है कि वह कुछ बरस पहले के  समय में चला जाए ताकि वह एक नए सिरे से वहाँ से  अपना जीवन प्रारम्भ कर सके , जो उस समय अप्राप्य  था उसे   प्राप्त कर सके, अपनी गलतियाँ सुधार सके ,  दुखों को दूर कर सके   और उन सुखों को भोग सके जिन्हें वह भोग नहीं पाया था । ।   ऐसा केवल कल्पना में संभव है । आज तक कोई ऐसी टाइम मशीन  नहीं बनी है कि मनुष्य उसमे बैठ जाए और सुदूर अतीत में पहुँच जाए । विज्ञान के बढ़ते चरणों के बावज़ूद यह संभव नहीं है, इसलिए कि जो बीत चुका है वह ठीक उसी तरह दोबारा कभी घटित नहीं होता । समय की अपनी एक गति होती है और बीते हुए समय में शामिल होना किसी के लिए संभव नहीं है । जब हमें अपने व्यतीत किये गए जीवन में शामिल होना संभव नहीं है तो उस समय में शामिल होना तो बिलकुल ही असम्भव है जो समय हमने नहीं देखा है । हम केवल उपलब्ध विवरणों के आधार पर उस दृश्य का पुनर्निर्माण कर सकते हैं । पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकार इसमें हमारी सहायता करते हैं  । मनुष्य भौतिक रूप से भले ही उन दिनों में नहीं पहुँच सकता लेकिन उस कालखंड के ध्वस्त अवशेषों से उस सभ्यता का एक चित्र निर्माण कर सकता है  ज़मीन की परतों में दबी उस सभ्यता की साँसें  सुन सकता है ।

मनुष्य जाति के विकास की यह यात्रा उसके उद्भव से प्रारंभ हुई जो आज तक लगातार जारी है । इस बीच उसने बहुत कठिन समय देखा है । अपनी जैविक इच्छाओं को लेकर पैदा हुआ मनुष्य भूख के इशारे पर नित नई खोज करता रहा ।  आज के सुविधा संपन्न मनुष्य का जीवन देखते हुए मुझे अक्सर उस मनुष्य का ख़याल आता है जिसका जीवन प्रकृति की कृपा पर अवलंबित था जो कभी भी किसी जंगली जानवर का भोजन बन जाता था या किसी प्राकृतिक आपदा का शिकार हो जाता था । लेकिन इन तमाम कठिनाइयों के बावज़ूद उस मनुष्य ने हार नहीं मानी और प्रकृति से द्वंद्व करते हुए, हिमयुगों में समाप्त हो जाने के खतरों से बचते हुए अपनी विकास यात्रा जारी रखी इसलिए कि उसके पेट के साथ उसके आश्रितों का पेट जुड़ा था । यह वह दौर था जब व्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज नामक संस्था का निर्माण जारी था । यह पांच हज़ार साल पुरानी बात है जब मनुष्य के पास औज़ार बनाने के लिए उपयुक्त  पत्थरों का भण्डार समाप्त होने की कगार पर था उसने  ताम्बे की खोज कर ली थी और अब वह पत्थरों के युग से ताम्बे के युग में प्रवेश कर रहा था । लेकिन उसके सामने अब नई चुनौतियाँ थीं । वह यायावरी की ज़िंदगी से तंग आकर एक स्थायी जीवन बिताना चाहता था । प्रकृति ने उसे ऐसे अवसर प्रदान किये और उसकी बिखरी हुई ज़िन्दगी धीरे धीरे बसने लगी । पुरापाषाण युग से निकल कर आने वाले मनुष्य के जीवन के इस कालखंड को ताम्राश्म युगीन सभ्यता का नाम दिया गया ।


जीवन अपने संप्रत्यय में स्थायी होते हुए भी व्यक्तिगत रूप में स्थायी नहीं होता । जैसे मनुष्य की मृत्यु होती है वैसे ही सभ्यताओं का भी विनाश होता है । एक सभ्यता के पश्चात दूसरी सभ्यता का आगमन होता है । एक बस्ती मिट जाती है और उसके अवशेषों पर दूसरी बस्ती का निर्माण होता है । समय की चादर उन अवशेषों को मिटटी में गहरे दफ्न कर देती है । अगर हम उस सभ्यता तक जाना भी चाहें तो एकाएक उस तक नहीं पहुँच सकते । पहले हमारा सामना बाद की सभ्यताओं से होता है और उसके पश्चात हम उस प्राचीन सभ्यता तक पहुँच सकते हैं । एक पुरातत्ववेत्ता कालक्रमानुसार अतीत की खोज करते हुए यही काम करता है । वह परत दर परत ज़मीन के भीतर पहुँचते हुए अंततः उस सभ्यता तक पहुँच जाता है जिसके पास इस मनुष्य जाति के प्रारंभिक स्वप्न थे ।

शरद कोकास 


🔹🔹🔹🔹🔹





गुरुवार, 10 मार्च 2011

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – तेरहवां दिन – तीन

भूख मिटाने का कुछ इन्तज़ाम किया जाए
अजय ने अचानक बीच में सवाल किया  “  लेकिन यार इन गुफाओं का पता कैसे चला ? इन तक भी डॉ. वाकणकर जैसा कोई व्यक्ति पहुँचा था क्या ? “ हाँ बताता हूँ …” मैंने कहा “ आगे यही लिखा है मैंने । और मैंने आगे पढ़ना शुरू कर दिया ।
“ बाघोरी नदी के किनारे नाल के आकार में बनी इन गुफाओं की खोज की कहानी भी अत्यंत रोचक है । सन अठारह सौ उन्नीस में अंग्रेज़ों के समय की बात है । एक दिन एक अंग्रेज़ शिकारी शिकार के लिए निकला और जंगल में रास्ता भटक गया ।उसे एक किसान का लड़का मिला उसने शायद इनाम की लालच में शिकार प्राप्त होने की संभावित दिशा बताते हुए इन गुफाओं की ओर इशारा किया । उस समय यह गुफाएँ असंख्य पेड़ों और लताओं से घिरीं थीं । अंग्रेज़ शिकारी ने दूरबीन से इधर देखा। उसे पेड़ों के पीछे किसी गुफा में एक चित्र नज़र आ गया और वो खुशी से उछल पड़ा । इस तरह यह गुफाएँ सारे संसार में मशहूर हो गईं ।
इतना कह कर मैं चुप हो गया । मैंने देखा अजय , रवीन्द्र , अशोक सब इस तरह मुझे देख रहे थे जैसे यह बात मैं उन्हे पहली बार बता रहा हूँ । “ फिर क्या हुआ ? “ अशोक ने सवाल किया ।
“ बस अजंता की कला देखते हुए मैं उसमें खो गया । एक एक गुफा की दीवारों पर चित्रित जातक कथाएं , बुद्ध की विभिन्न मुद्राएँ , मुद्राओं में दुख की परिभाषा , चेहरे पर वैराग्य की अनिवार्यता और संसार को सही सही जान लेने का भाव । इसके अलावा भी बहुत कुछ था इन चित्रों में …ग्रहस्थ जीवन के प्रति पति की उदासीनता से आहत यशोधरा , भिक्षुओं के विभिन्न क्रियाकलाप , दान की गाथाएँ और जाने क्या क्या , इसका वर्णन शब्दों में संभव ही नही है । उन्नीस गुफाओं को पार करते हुए जैसे मैं एक युग पार कर चुका था । हम किस कला व संस्कृति की बात करते हैं , असली संस्कृति तो यहाँ छुपी हुई है । ऐसी संस्कृति जिसे किसी धर्म या जाति या देश काल की परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता ।
बस इस तरह गुफाएँ देखते हुए दोपहर के तीन बज गए । यह समय बहुत कम था इतना कुछ देखने के लिए लेकिन वापस लौटना भी था । यह सोचकर कि ठीक ठाक नौकरी मिल जाने के बाद एक बार फिर दो - चार दिनों के लिये यहाँ आयेंगे हम लोगों ने उस अल्प समय के अवलोकन पर संतोष कर लिया और  बाहर आ गए । हमसे बिछड़कर जैन सर जाने कब पत्थर की गुफाओं से निकल कर लोहे की गुफा यानि बस में आकर बैठ गए थे । वैसे भी वे पूर्व में अनेक बार यहाँ आ चुके थे और यह उनके लिए एक रूटीन वर्क की तरह था । हमें आता देख उन्होंने चिन्ता प्रकट की “ अरे भाई , भूख - वूख नहीं लगी क्या तुम लोगों को । खैर भूख तो एक सच्चाई की तरह हमारे सामने थी और उसे रोटी के चित्र से नहीं मिटाया जा सकता था । “ चलो महेश । “ मैंने कहा “ भूख मिटाने का कुछ इन्तज़ाम किया जाए ।“ और हम लोग किसी होटल की तलाश में निकल पड़े ।

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – तेरहवां दिन – दो - अजंता यात्रा


किस्सा यह है कि उज्जैन के पास दंगवाड़ा में विक्रम विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व के स्नातकोत्तर के छात्र उत्खनन शिविर में आए हुए हैं और कार्य समाप्ति के पश्चात तम्बू में बैठकर गपशप कर रहे हैं । शरद कोकास सुना रहे हैं अपने मित्रों को अपनी अजंता यात्रा का वर्णन । छात्रों से भरी बस अजंता की गुफाओं के द्वार तक पहुँच चुकी है । अब पढ़िये इससे आगे ... 

          मैंने चारों ओर नज़रें इस तरह घुमाकर फेंकीं जैसे कोई मछुआरा अपना जाल घुमाकर फेंकता है । मुझे उन गुफाओं की तलाश थी जिनके बारे में मैं बचपन से सुनता चला आया था । पूछने पर ज्ञात हुआ कि उन गुफाओं तक पहुँचने के लिए पहले सीढ़ियाँ चढ़नी होंगी । उसके बाद उन गुफाओं का संसार प्रारम्भ होगा जो आज पूरी दुनिया में मशहूर हैं । सीढ़ियों पर चढ़कर हम लोगों ने टिकट खरीदे और प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश किया ।
            मैं मन ही मन हँसा । कितना मूर्ख हूँ मैं ,जो सोच रहा था कि यह गुफायें अब भी ढाई हज़ार साल पहले की स्थिति में होंगी । इन गुफाओं की खोज हुए भी जाने कितना समय बीत चुका है और अब तो यह बाकायदा एक टूरिस्ट सेन्टर बन चुका है । इस बात का हमें भान था कि हम लोग यहाँ टूरिस्ट की तरह नहीं बल्कि अध्ययनकर्ता की तरह आए हैं और हमे उसी तन्मयता के साथ इन गुफाओं का अवलोकन करना है जिस तन्मयता के साथ कलाकारों ने इन गुफाओं में चित्र उकेरे होंगे ।
            सीढ़ियाँ चढ़ने के उपरांत हमें सबसे पहली गुफा जो मिली उसे पुरातत्व विभाग ने गुफा क्रमांक एक नाम दिया है । उसके बाद क्रम से गुफा क्रमांक दो , तीन ,चार आदि हैं । इस क्रम  का इन गुफाओं के निर्माण काल से कोई सम्बन्ध नहीं है । वास्तव में सबसे पहले जो गुफा बनी थी वह क्रमांक दस है । इसके बाद इस गुफा के दोनों ओर क्रमश: गुफाएँ कटती चली गईं हैं ।
            अजंता की यह गुफाएँ मनुष्य द्वारा निर्मित वे बेजोड़ गुफाएँ हैं जिन पर भारत को गर्व है । देश विदेश से आए सैलानी इन्हे देख आश्चर्य चकित हो उठते हैं । अहा ! इतना अद्भुत सौंदर्य ! इन गुफाओं में चित्रकला व शिल्प कला के बेजोड़ नमूने हैं । इनकी किसीसे तुलना नहीं हो सकती । बुद्धि व श्रम के संयोग से निर्मित इन गुफाओं को देख कर आधुनिक तकनीक भी हैरान है । प्राकृतिक रंगों के निर्माण व उपयोग के बारे में उस युग के मनुष्य की समझ व ज्ञान को देख कर ऐसा नहीं लगता कि वह मनुष्य कला के प्रति उस मनुष्य का सौन्दर्यबोध किसी भी तरह कम रहा होगा । इन गुफाओं के निर्माण का उद्देश्य भी स्पष्ट है । इक्कीस सौ वर्ष पूर्व जब बौद्ध धर्म अपने चरम पर था , लाखों की तादाद में बौद्ध भिक्षु दीक्षा ले रहे थे और उन्हे अपनी साधना के लिए किसी एकांत की आवश्यकता थी । इसी आवश्यकता ने इन गुफाओं को जन्म दिया ।
( सभी चित्र गूगल से साभार ) 

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – तेरहवां दिन – एक

अरे सब गुफायें कहाँ हैं ?
          सुबह आर्य साहब ने कहा “ क्या बात है कल तुम लोग काफी देर तक जागते रहे ? “ रवीन्द्र ने कहा “ हाँ सर , कल शरद अपनी टूर डायरी पढ़कर सुना रहा था … अजंता एलोरा वाले टूर की । “ “ अरे वा ! “ आर्य सर ने कहा “ यह तो बहुत अच्छी बात है , लेकिन तुम लोग भी तो गए थे ना अजंता ? “ हाँ “ रवीन्द्र बोला “ लेकिन शरद की ज़ुबानी उस यात्रा का वर्णन सुनना बहुत मज़ेदार है । यह लेखक है ना , जो चीज़ें हम नहीं देख पाते वह सब यह देख लेता है । “
            फिर रोज़ की तरह हम लोग उत्खनन कार्य में लग गए । ट्रेंच से कुछ न कुछ नए अवशेष रोज़ ही निकल रही थीं और हमारे ज्ञान में वृद्धि होती जा रही थी । आज का दिन कल की अपेक्षा कुछ गर्म था और हवाएँ कुछ इस तरह थमी हुई थीं मानो बहुत लम्बी यात्रा करके आई हों । ऐसा लग रहा है कि शीत ऋतु अब अपने दायित्व का निर्वाह कर प्रस्थान करने वाली है ।
            शाम देर तक काम करते रहे हम लोग । डॉ. वाकणकर ने आज हमें सिखाया कि किस तरह अवशेषों को साफ करके कपड़े की थैलियों में बन्द किया जाये और उन्हे टैग किया जाये । भोजन के पश्चात तम्बू में घुसे ही थे कि अजय ने फरमाइश की “ तो अब अजंता के लिए प्रस्थान किया जाए ? “ मैंने अपनी डायरी निकाल ली और जनता के बीच उसका वाचन प्रारम्भ कर दिया ।
            “ इस तरह नाश्ते के बाद हम लोगों ने अजंता के लिए कूच किया । जलगाँव से अजंता की दूरी 61 किलोमीटर है और इसमें लगभग एक घन्टा लगता है । मैं खिड़की के पास बैठा था और मील के पत्थरों को पढ़ता जा रहा था …अजंता की गुफाएँ 4 कि मी , अजंता केव्ह्स 3 कि मी , अजिंठ्या लेण्या 2 कि मी । मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं कुछ ही देर में बौद्धकालीन युग में प्रवेश करने वाला हूँ । चारों ओर विशालकाय पहाड़ियाँ थीं । आँखों को तृप्त करने वाली हरियाली से यात्रियों को आकर्षित करते हुए छोटे - बड़े पौधे बस की विपरीत दिशा में भागते प्रतीत हो रहे थे । मेरा मन उससे भी पीछे भाग रहा था । मुझे लगा कि बस कुछ ही देर बाद मेरी आँखों के सामने एक अद्भुत दृश्य होगा जिसमें गेरुए वस्त्रों में कलाकार से दिखाई देने वाले कुछ बौद्ध भिक्षु होंगे ,जिनके हाथों में कूचियाँ होंगी और वे किसी गुफा के भीतर चित्रकारी में रत होंगें ।
             मैं सोचने लगा समय के उस हिस्से के बारे में जब यहाँ यह पक्का रास्ता नहीं रहा होगा , यह मील के पत्थर भी नहीं रहे होंगे , यह बस, गाड़ियाँ और इस तरह के वाहन भी नहीं रहे होंगे । बस यहाँ रही होगी  यह निर्जन पहाड़ी , नाल के आकार में गुफाओं की लम्बी कतार , आकाश में विचरण करते ढेर सारे पक्षी । वातावरण  में गूंजते होंगे  ‘ बुद्धम शरणम गच्छामि ‘ के स्वर …।
            अचानक बस ने आखरी मोड़ लिया और अतीत के खुले आसमान में भटकता हुआ मेरा स्वप्न सैलानियों की कारों ,टूरिस्ट बसों , छोटी छोटी दुकानों और होटलों की भीड़ के बीच जा गिरा । मुझे लगा मैं जैसे किसी मेले में आ गया हूँ । ड्राइवर ने बस एक किनारे पर लगा दी । हम लोग उतर कर नीचे आए । कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि यह कौनसी जगह है । मैंने आश्चर्य व्यक्त किया …अरे सब गुफायें कहाँ हैं ? किसीने कुछ नहीं कहा । मैंने एक अंगड़ाई ली और हवा को ज़ोर से भीतर खींचकर फेफड़ों में भर लिया ।
(चित्र गूगल से साभार ) 

सोमवार, 24 जनवरी 2011

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – बारहवां दिन – चार

            उज्जैन के पास दंगवाडा में उत्खनन शिविर चल रहा है । ठंड के दिन हैं । हम सभी मित्र तम्बू में रज़ाई ओढ़े बैठे है और मैं अपनी डायरी से पढ़ रहा हूँ अजंता एलोरा की यात्रा का वृतांत ... 

 एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – दसवाँ दिन – छह
चने की गर्मागर्म मिसल के साथ पेट भर पोहा
इस तरह उदर की मांग पूर्ण होते ही मस्तिष्क ने अपनी माँग का प्रदर्शन प्रारंभ कर दिया । मैंने नींद लेने की कोशिश की लेकिन बस ड्राइवर के ‘ स्टियरिंग कन्ट्रोल ‘ और बस के ‘ रॉक एण्ड रोल ‘ के बीच नींद ने भी न आने की कसम खा ली थी । यदि कुछ आसार नज़र भी आते तो पिछली सीट हमें छत की ओर उछाल कर बार बार अपना विरोध दर्ज कराने लगती । सारी रात इसी उछल कूद में बीत गई । उस दिन हमे समझ में आया कि बस की लम्बी यात्रा में लोग क्यों आगे की सीटों की मांग करते हैं ।
             सुबह सुबह लगभग साढ़े तीन बजे हम लोगों की बस महाराष्ट्र के जलगाँव बस अड्डे पर जा पहुँची । जैन साहब ने एक अच्छे अभिभावक की तरह प्रस्ताव रखा कि होटल वगैरह ढूँढने में समय बरबाद करने से बेहतर है प्लेटफॉर्म पर ही बिस्तर लगा कर एक - दो घन्टे की नींद ले ली जाए । इस प्रस्ताव का विरोध करने की न किसीमें हिम्मत थी और न इच्छा । हालाँकि दबी ज़ुबान से कुछ लोगों ने होटल - लॉज जैसे शब्द भी कहे । वैसे यह बात सर्वविदित थी कि कुछ् देर पश्चात हमें अजन्ता के लिए प्रस्थान करना था । इस बीच महेश अपना बेडिंग बस से उतार लाया था और इससे पहले की अन्य लोगों किसी फैसले पर पहुँचें हम दोनों एक कोने में बिस्तर लगाकर नींद से दोस्ती कर चुके थे ।
            सुबह सुबह बसों की घरघराहट और खोमचे वालों की कर्कश आवाज़ों से हमारी नींद खुली । जिस तरह हिन्दी फिल्मों में लम्बी बेहोशी से जागने के बाद नायक सवाल करता है ...” मैं कहाँ हूँ ? “ कुछ इसी तरह का हाल हमारा भी था । देखा कि आसपास सफाई करने वाले कुछ भाई लोग हाथों में झाड़ू- पोछा लिए खड़े हैं । हमारे आसपास के क्षेत्र की सफाई हो चुकी थी बस हम दोनो वहाँ कचरे के साथ सहअस्तित्व बनाए पड़े हुए थे । नींद से बोझिल पलकें , सूखे होंठ , बिखरे बाल लिये मैंले कपड़ों में हम लोग , अपने घरों से फ्रेश होकर आए मुसाफिरों के बीच पिछली सदी के कोई पात्र लग रहे थे ।
            पता चला कि इस बीच अन्य लोग भी जाग चुके है और नाश्ते की दुकान पर पहुँच चुके हैं । हम लोगों ने तकाज़ा किया कि आप लोगों ने हमे क्यों नहीं जगाया तो एक मित्र ने टका सा जवाब दिया “ देर तक सोने की आदत वालों को सुबह सुबह नींद से जगाकर गाली खाने का किसे शौक है । “ बहरहाल हम लोग जल्दी जल्दी बस स्टैन्ड के साफ-सुथरे सुलभ शौचालय में जाकर प्रात:क्रियाओं से निवृत हुए और एक दुकान पर जाकर चने की गर्मागर्म मिसल के साथ पेट भर पोहा खाया । हमारा अगला पड़ाव था अजंता ।
            “ बस कर भाई अब अजंता की सैर के लिए कल जायेंगे । “ अजय ने जमुहाई लेते हुए कहा । “ आज के लिए इतना काफी है । “ रवीन्द्र को इस यात्रा वृतांत में मज़ा आ रहा था सो कहने लगा “ अभी कहाँ ज़्यादा रात हुई है यार । “ फिर उसने सबके चेहरों की ओर देखा और कहा ...” ठीक है , जैसी पंचों की राय । “ फिर धीरे से मुझसे कहा ...” लेकिन यार अब तू वो सुना जो तैने यहाँ नहीं लिखा है । “ मैंने कहा “ ठीक है ,चलो लेटे लेटे बात करते हैं ।“  
(चित्र गूगल से साभार ) 

शनिवार, 15 जनवरी 2011

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – बारहवां दिन – तीन


         " एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी " दसवें दिन के इस पाँचवें खंड में दृश्य कुछ इस तरह है कि उज्जैन के पास दंगवाड़ा नामक गाँव में चम्बल नदी के किनारे टीले पर हम लोगों का कैम्प लगा है । दिन भर का काम समाप्त हो चुका है और शाम को सिटी यानि दंगवाड़ा गाँव की सैर करने और भोजन के पश्चात हम लोग अपने तम्बुओं में घुस गये हैं और रज़ाई ओढ़े गपिया रहे हैं और मैं सुना रहा हूँ अपने मित्रों को अपनी अजंता एलोरा यात्रा की डायरी .. चलिये आप भी चलिये हमारे साथ
           

            उज्जैन की सीमा से बाहर निकल कर बस इंदौर की ओर चल पड़ी । न मैं बहुत खुश था न बहुत उदास लेकिन बसंती हवाओं ने मेरी उदासी कुछ और बढ़ा दी । अशोक समझ गया मुझे नॉस्टेल्जिया का दौरा पड़ा है ।“ क्या हो गया ? “ उसने पूछा ..” कोई बचपन की मुहब्बत याद आ रही है क्या ? “ मैंने घूरकर उसकी ओर देखा तो वह खिड़की से बाहर झाँकने लगा । बहुत देर तक खामोश बैठा रहा मैं । एक मन हुआ कि बैठे बैठे सो जाऊँ लेकिन पंडित राममिलन आज चुटकुले सुनाने के मूड में थे और बार बार मुझे सम्बोधित कर रहे थे .. सुनो भैया सरद.. अंत: मेरा मूड ठीक हो गया , उदासी का आवरण छिटक कर दूर हो गया और मैं भी सबके साथ कहकहों के समन्दर में गोते लगाने लगा ।
इन्दौर का प्रसिद्ध राजवाडा 
            हमारा पहला स्टॉप था इंदौर जहाँ डिनर लेकर हमें तत्काल जलगाँव के लिये रवाना होना था । शाम सात बजे लगभग इंदौर पहुँचते ही हम लोगों ने महसूस किया कि तीव्र भूख के कारण हम लोगों का पेट आंदोलन करने पर आमादा हो गया है । वैसे भी सुबह से कुछ खाया नहीं था । अशोक ने अपनी कमीज़ उठाई और पेट दिखाकर कहा .. लो ,देखो कान लगाकर .. खाना दो खाना दो की आवाज़ आ रही है कि नहीं । “ अरे.. कमीज़ नीचे कर ..” रवीन्द्र ने कहा ..” सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील प्रदर्शन करना उचित नहीं है । अशोक ने घबराकर कमीज़ नीचे कर ली और मासूमियत से कहा “ पेट ही तो दिखाया था ..। ” मैंने अशोक की प्राणरक्षा की .. “ प्यारे .. सब कुछ इस पेट का ही तो चक्कर है , इसकी आवाज़ से बड़े बड़े पूंजीपतियों के कलेजे दहल जाते हैं । इसके प्रदर्शन से अच्छे अच्छे घबरा जाते हैं । इसलिये उन लोगों ने भूख के प्रदर्शन को अश्लील और अनैतिक करार दे दिया है । जबकी असली अनैतिकता तो मजदूर की आवाज़ को दबाना है । “
हमने देखा इस बीच बहुत से छात्रों ने अपने बैग़ से पैकेट निकाल लिये थे । यह सभी हॉस्टल के छात्र थे जो मेस से पूड़ियाँ बन्धवा कर ले आये थे । उन्होंने हम शहरवासियों को पूड़ियाँ ऑफर भी कीं लेकिन हम ठहरे जन्मजात स्वाभिमानी । हमने इंकार कर दिया वैसे भी इन्दौर शहर में आयें और वहाँ के सुस्वादु भोजन और खाद्य सामग्री का आनन्द न लें ऐसा कैसे हो सकता था । फिर हमारी हालत तो जनम जनम के भूखों की तरह हो रही थी  सो हमने जैन सर से इज़ाज़त ली और एक पूड़ी भंडार पर धावा बोल दिया । किलो के भाव से पूड़ियाँ खरीदीं और आलू की गर्मागर्म रसेदार सब्ज़ी के साथ उन्हे आमाशय तक पहुँचने का मार्ग दिखाया और भूख के खिलाफ़ हो रही नारेबाज़ी बंद करवाई ।
            मैं बहुत तल्लीन होकर डायरी पढ़ रहा था कि अचानक अजय ने एक कहकहा लगाया । “ क्या हुआ ?” मैंने गुस्से से उसकी ओर देखा …” आमाशय ही लिखा है , गर्भाशय नहीं लिखा जो तुम इतनी अश्लील हँसी हँस रहे हो ।“ अजय हँसते हँसते बोला … “ वो तो बेटा तुम लोग उस दुकानवाली के चक्कर में थे , इसलिये बेहिसाब पूड़ियाँ उदरस्थ करते जा रहे थे  हमे सब पता चल गया था । “ ठीक है , ठीक है । “ मैंने झेंपते हुए कहा “ लो आगे भी तो सुनो । और मैंने आगे की डायरी पढ़ना शुरू कर दी ।

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – बारहवां दिन - एक

तो चलिये शुरू करते हैं " एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी " बराहवें  दिन के इस प्रथम खंड से । दृश्य कुछ इस तरह है कि उज्जैन के पास दंगवाड़ा नामक गाँव में चम्बल नदी के किनारे टीले पर हम लोगों का कैम्प लगा है । दिन भर का काम समाप्त हो चुका है और शाम को सिटी यानि दंगवाड़ा गाँव की सैर करने और भोजन के पश्चात हम लोग अपने तम्बुओं में घुस गये हैं और रज़ाई ओढ़े गपिया रहे हैं ..


एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – बारहवां दिन - एक 
ठंड के दिन भी कितने मज़ेदार होते हैं
          ग्लेडियेटर्स की कहानी सुनकर सभी का मन बहुत भारी हो गया था । उस दिन किसी तरह खुदाई का काम निपटाया गया और शाम को फिर सिटी घूमने का प्लान बन गया । लौट कर आने के बाद महसूस हुआ कि ठंड बहुत बढ़ गई  है और भोजन के बाद सिवाय बिस्तर में घुसने के और कोई चारा नहीं है ।
            “ यार यह ठंड के दिन भी कितने मज़ेदार होते हैं । रवीन्द्र ने अपनी मंकी कैप के भीतर से झाँकते हुए कहा । “ घंट मजेदार होते हैं । “ अजय ने खीझकर कहा ..” घर में रहते तो दिन भर रजाई में घुसे रहते , बीबी के हाथ का गर्मागर्म खाना खाते ..और ... “ “ चुप रह यार ,तेरी बीबी है तो इतरा रहा है क्या , हम कुँवारों पर कुछ तो रहम कर । “ रवीन्द्र ने अपनी मंकी कैप के भीतर से बन्दर की तरह बाहर झाँककर कहा । “ यहाँ तो ठंड में हमारी कुल्फी जमी जा रही है ,ऊपर से इस तम्बू में भी छेद हैं , जाने कहाँ से रात में हवा घुस जाती है । सुबह जल्दी जागो , वाकणकर सर के आदेश का पालन करते हुए चम्बल में नहाने जाओ ।  अब अशोक के समान नहाने की टैबलेट खा लो तो बात अलग है । “  
“ यार यह सिटी जाना नहीं होता तो अब तक इस जंगल में ऊब गए होते । “ अजय ने कहा । “ लेकिन हम लोगों का सिटी फ्रेन्ड तो आया ही नहीं इस बार “ रवीन्द्र बोला । “ कौन महेश ? “ अशोक ने सवाल किया । “ हाँ वही भीलवाड़ा का हीरो “ मैंने जवाब दिया । “ तुमने उसके साथ बहुत मस्ती की थी पिछले साल अजन्ता एलोरा के टूर में …क्यों ? रवीन्द्र ने मुझे छेड़ा । मैं मुस्कराने लगा । “ क्यों तैने तो डायरी में लिख रखा है ना उस टूर का किस्सा ? “ “ हाँ “ मैंने कहा । “ तो सुना ना यार , तू डायरी लेकर आया है ना ? “ रवीन्द्र ने कहा ।
मैंने बैग से डायरी निकाली और पन्ने पलटने लगा । इस बीच रवीन्द्र अपनी भूमिका प्रस्तुत करने लगा …” याद है ना होली के दिन गए थे , दो दिन तक तो इन लोगों की भंग ही नहीं उतरी थी ,ऐसी ऐसी हरकतें की इन लोगों ने कि पूछो मत । बस में सामने की ओर एक ही दरवाज़ा था और यह लोग बार-बार पीछे का दरवाज़ा ढूँढते थे । और इंदौर में उस पूड़ी की दुकान की मालकिन को इम्प्रेस करने के चक्कर में तीन किलो पूड़ी खा गए , आखिर रात में रास्ते में नदी किनारे बस रुकवानी पड़ी ।  “
            “ चुप रहो यार “ मुझे लगा रवीन्द्र अपने किस्से न सुनाने लगे । मैं डायरी खोलकर बैठ गया और कहा “ लो सुनो । हम लोग धुलैन्डी के अगले दिन शाम को निकले थे और हमारे साथ थे हमारे प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति पुरातत्व अध्य्यनशाला के एच.ओ.डी.डॉ .कैलाशचन्द्र जैन और इन्दौर से मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग के भूतपूर्व निदेशक डॉ. एच .वी. त्रिवेदी भी हमारे साथ थे । “
            “ तू किस्सा सुनाता है या नहीं , यह सब तो हमको भी मालूम है । “ रवीन्द्र ने अपनी उत्सुकता प्रकट करते हुए कहा । “ भाई सुन तो लो आखिर भूमिका बताना भी तो ज़रूरी है , और यह भी कि यह डायरी मैंने अजन्ता से लौटकर आने के बाद औरंगाबाद की उस टूटी- फूटी धर्म शाला में बैठकर लिखी थी ।“ “ हाहाहा “ अजय ज़ोर से हँस दिया …” अबे , टूटी फूटी नहीं जीर्ण - शीर्ण , हिन्दी का लेखक होकर ग़लत शब्द का प्रयोग करता है । जैसे हमारे कुछ लेखक लिखते हैं ‘ महिला लेखिकाएँ ‘… अबे लेखिका क्या पुरुष होते हैं… “
            “ ठीक है माई-बाप आइंदा से ध्यान रखूँगा । मैंने उस चुप कराने के लिए कहा और डायरी पाठ प्रारम्भ कर दिया ।

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

इस बार यह अमावस कुछ ज़्यादा ही लम्बी हो गई

बीच में डॉ. कैलाशचन्द्र जैन  पुरातत्व विभाग वि वि के विभागाध्यक्ष
                   " एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी " ब्लॉग पर लिखते हुए मैंने ऐसी कोई घोषणा तो नहीं की थी कि कुछ दिनों का ब्रेक लूंगा । लेकिन आज यह ब्लॉग देखा तो पता चला कि यह ब्रेक पूरे एक साल का हो गया है । अब इतना लम्बा ब्रेक तो होना नहीं चाहिये था , लेकिन हो गया ।फिल्म आंधी के संजीव कुमार के उस सम्वाद की तरह " इस बार यह अमावस कुछ ज़्यादा ही लम्बी हो गई । " इस तरह् पिछली सर्दियाँ समाप्त हो गईं ,उसके बाद ग्रीष्म और वर्षा ऋतु का भी समापन हो गया और फिरसे ठंड आ गई ।
उत्खनन परिसर बरगद की छाँव 
                    मुझे लगता है सर्दियों का और इस पुरातत्ववेत्ता की डायरी का कुछ सम्बन्ध है । हम लोग उज्जैन के निकट दंगवाडा के पुरातात्विक उत्खनन शिविर में ठंड के दिनों में ही गये थे और हम लोगों की ज़्यादातर गपशप रज़ाइयों में दुबककर ही होती रही थी ।  विक्रम विश्वविद्यालय के तत्वावधान में प्रख्यात पुरातत्ववेत्ता पद्मश्री डॉ. वि श्री वाकणकर के निर्देशन में आयोजित इस उत्खनन शिविर में स्नातकोत्तर कक्षा के हम छह- सात  विद्यार्थी थे  मैं , रवीन्द्र भारद्वाज , अशोक त्रिवेदी , किशोर त्रिवेदी , अजय  जोशी , महेश शर्मा और राममिलन शर्मा । हमारे साथ थे हमारे प्रोफेसर डॉ. सुरेन्द्र कुमार आर्य और प्रो. जे एन दुबे । भोजन शाला के प्रभारी भाटी जी और अन्य कई कर्मी ।
रविन्द्र ,डॉ.वाकणकर .डॉ.आर्य , शरद व अशोक
                       सर्दियों के दिन ठंडी हवाएँ , चम्बल का किनारा , बरगदों की छाँव में लगे तम्बू , और उत्खनन के लिये नदी किनारे का वह टीला । एक माह का वह समय कैसे बीत गया ,पता ही नहीं चला । मजदूर पास के गाँव से आते थे और शाम ढलने के बाद वापस चले जाते थे । इसके बाद प्रारम्भ होती थी हम लोगों की सायँकालीन कक्षा जिसमें विचारों के आदान प्रदान से लेकर किस्से कहानियाँ और मौज -मस्ती भी शामिल होती थी । पढना -लिखना भी ज़रूरी था इसलिये कि यह कैम्प हम लोगों के पाठ्यक्रम का ही एक हिस्सा था ।
                     अगर आपने पिछली पोस्ट पढी होंगी तो यह बात अवश्य जान  गये होंगे कि पढने लिखने के अलावा भी हम लोग बहुत सारा ज्ञान प्राप्त कर रहे थे । बस इसी ज्ञान को आप लोगों के साथ बाँटने का प्रयास है यह " एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी " ।
                     तो शीघ्र ही प्रारम्भ करते हैं " एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी - दसवें दिन के दूसरे भाग से आगे का किस्सा । निवेदन यह है कि यदि आपने पिछले भाग न पढें हों तो कृपया एक निगाह उस पर डाल लें , और न भी डाल सकें तो कोई बात नहीं इस शिविर में जिस दिन से शामिल हों उसी दिन से आपको आनन्द आयेगा  - आपका - शरद कोकास

सोमवार, 7 दिसंबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दसवाँ -दिन नौ

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22 -  जननांगों को ढँकने के लिए एक चिन्दी तक नहीं

            रात्रि भोजन के पश्चात रज़ाई में घुसते ही रवीन्द्र ने  कहा “ यार यह ठंड तो कम होने का नाम ही नहीं ले रही । “ ठण्ड तो मुझे भी लग रही थी लेकिन सुविधा की इस सांसद में मुझे विपक्ष की भूमिका अदा करनी थी  “ रज़ाई में घुसे हो और ठंड से डर रहे हो .." मैंने आव्हान के अंदाज़ में कहा .." ज़रा रोम के उन गुलामों के बारे में सोचो जिन्हें भीषण ठंड में भी कपडे का एक टुकड़ा तक नसीब नहीं होता था । “यार तू भी ना..." रवींद्र ने नाक चढ़ाते हुए तुरंत मेरी बात पर रिएक्ट किया" मिस्त्र मेसोपोटामिया, रोम, इटली से नीचे बात ही नहीं करता.. अपने इधर नई क्या ऐसा होता है ..बिहार में ही देख लो, रोज खबरें छपती हैं शीत लहर में इतने लोग मरे ।“

            रवीन्द्र सीधे वार्तालाप का विषय अंतरराष्ट्रीय स्तर से उतारकर राष्ट्रीय स्तर पर ले आया । "भाई ।" मैंने अपनी प्रतिवादी की भूमिका जारी रखते हुए कहा " चलो भारत के बारे में ही बात की जाए । लेकिन तुम भारत जैसे स्वतन्त्र देश के वर्तमान की बात कर रहे हो । । हम इतिहास के विद्यार्थी हैं, एक नज़र उस दौर पर भी डाल लेते हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि वह स्वर्ण युग था । क्या उस समय लोग ठण्ड से नहीं मरते थे ?" रवीन्द्र को इस तरह मेरा उसे वर्तमान से अतीत में ले जाना नागवार गुजरा .."अब क्या पता मरते थे या नहीं, इस बात का कोई प्रमाण भी तो नहीं है ।" "ज़रूर मरते होंगे..अकाल से मरने के तो प्रमाण मिलते ही हैं अब विज्ञान की प्रगति हो रही है हो सकता है आगे चलकर किसी कंकाल के परीक्षण से यह भी ज्ञात हो जाए कि फलां आदमी ठण्ड की वज़ह से मरा था ।"

अजय ने मेरे पक्ष में अपनी बात रखते हुए कहा .."बिलकुल हो सकता है ग़रीबी तो उस समय भी रही होगी लेकिन स्वर्ण युग में शायद ही कोई मरता हो ।" मुझे अजय की बात का उत्तर तो देना ही था .." स्वर्णयुग जैसी कोई चीज़ सच में हुई है या नहीं किसको पता । वह राजतन्त्र का दौर था, सारे राजा अपनी प्रजा के सुखी होने का दावा करते हुए अपने आप का नाम इतिहास में लिखाए जाने के लिए तत्पर थे । लेकिन वास्तविकता यह है कि ऐसे राजाओं के शासन में भी प्रजा की बहुत बुरी स्थिति थी । इतिहास में यह बात कहीं नहीं लिखी गई । गुलामों की स्थिति तो और भी बदतर थी । आज भी संपन्न देशों में कमोबेश यही स्थिति है ।"

            रवीन्द्र मेरी बात से कुछ कुछ सहमत होता प्रतीत हुआ  .." लेकिन विडम्बना यह है हमारे देश की ग़रीबी के बारे में तो सब जानते हैं, संपन्न देशों की ग़रीबी के बारे में कोई नहीं जानता । अमेरिका को ही देख लो ..क्या वहाँ भिखारी नहीं होते होंगे ? ब्रिटेन में क्या लोग ठण्ड से नहीं मरते होंगे ? और मरते तो साम्यवादी रूस में भी होंगे , लेकिन वहाँ से खबरें यहाँ कहाँ आ पाती हैं ।" "खबरें तो अमेरिका से भी नहीं आतीं ।" अशोक ने कहा  .."हमें सिर्फ वहाँ की सम्पन्नता का चित्र ही दिखाया जाता है, जबकि वे लोग जब भी यहाँ टूरिस्ट की तरह आते हैं तो हमारे यहाँ के भिखारियों की ,मदारियों की और साधुओं की फोटो खींचकर ले जाते हैं। हमारे यहाँ की छवि बिगाड़ने का काम इन्ही टूरिस्टों ने किया है ।"

            "यार लेकिन इन पर रोक लगाने का कोई तरीका भी तो नहीं है ।" किशोर ने सरकारी अंदाज़ में कहा । अशोक जैसे उसकी बात का जवाब देने को तत्पर बैठा था  "मगर रोक लगाने की ज़रूरत भी क्या है ? टूरिस्ट तो आयेंगे ही और आयेंगे तो पुरातात्विक महत्व की इमारतों के साथ साथ यहाँ के जनजीवन की फोटो भी खींचकर ले जायेंगे । उनके पास अत्याधुनिक कैमरे होते हैं । उन पर रोक कैसे लगा सकते हैं ? ऐसा कोई कानून नहीं है । फिर अपने साथ वे विदेशी मुद्रा लेकर आते हैं और सरकार को उनके आने से आमदनी भी होती है । कश्मीर जैसी जगह में तो वहाँ के निवासियों का गुज़ारा ही इन टूरिस्टों की वज़ह से होता है । पर्यटन उद्योग को तो बढ़ावा मिलना ही चाहिए ।"

            "अच्छा तुम रोम के गुलामों की बात कर रहे थे  ना जिन्होंने स्पार्टकस के नेतृत्व में विद्रोह किया था ? ” अजय हमारे पर्यटन मंत्रालय टाइप की बातचीत से बोर हो रहा था । “ हाँ ।“  मैंने कहा । अशोक बोला “ तो यार उसकी पूरी कहानी बताओ ना .. एक्चुअल में हुआ क्या था ? तुम तो बिना कैमरे के ही द्रश्य की फोटो खींचकर रख देते हो ।“ “हाँ, यह हुई ना बात ।“ अपनी तारीफ़ से प्रसन्न होकर मैंने कहा .."लेकिन कहानी ज़रा लम्बी है ।" "कोई बात नहीं ..जब तेरी इतनी लम्बी लम्बी कहानियाँ सुन ली तो यह भी सुन लेंगे । तेरी कहानी लम्बी ज़रूर होती है लेकिन उबाऊ नहीं । " अशोक ने किसी आलोचक के अंदाज़ में कहा। किस्सा सुनाने को तो मैं आतुर था ही । मैंने रजाई के भीतर अपनी पोज़ीशन सम्भाल ली थी और किस्सागोई के मूड में आ गया था ।

            “ यह आज से दो हज़ार साल पहले सन इकहत्तर ईसापूर्व से भी पहले की बात है । रोम उन दिनों अपने उत्कर्ष पर था । बड़े बड़े धनाढ्य  लोग, सम्पन्न लोग, सत्ता के सुख के साथ जीवन का सुख भोग रहे थे । ढेर सारे मनोरंजन के साधन थे, खेलकूद थे,  हम्माम थे, अय्याशी के लिए औरतें थीं और उनकी सेवा के लिए  हज़ारों गुलाम थे । मनोरंजन के लिए वहाँ के अखाड़ों में कुश्ती तो सामान्य बात थी लेकिन उन दिनों अचानक कुछ ऐसा हुआ था कि सब इस खेल के दीवाने हो गए थे । कई अखाड़ों का निर्माण किया गया । इन अखाड़ों को एम्फिथियेटर कहा जाता था और इनमें ग्लेडियेटर्स को आपस में या खूंख्वार जंगली जानवरों जैसे शेर आदि से लड़ाया जाता था । इन अखाडों के मालिकों ने खदानों में काम करने वाले गुलामों को खरीद लिया था और उन्हें  प्रशिक्षण देकर ग्लेडियेटर बना दिया था ।"
                         
            “ लेकिन इतने सारे गुलाम आते कहाँ से थे ?” राममिलन भैया का यह स्वाभाविक प्रश्न था । “ बिलकुल सही पूछा राममिलन भैया ।“ मैंने कहा “प्राचीन मिस्त्र में थीव्ज़ के पास नूबियन रेगिस्तान है वहीं रेत के बीच सोना उगलने वाली कई खदानें हैं । प्रारंभ में यह सारे मिस्त्र के फराओं के गुलाम थे और सोने की खदानों में काम करते थे । जहाँ इन गुलामों की कई पीढ़ियाँ गुजर चुकी थीं । फराओं के पास यह गुलाम इस तरह आये कि शुरूआत में जब युद्ध होते थे वे सिपाही गुलाम बना लिए जाते थे  जो लड़ाई में मारे जाने से बच जाते थे । यह युद्धबंदी गुलाम तीन पीढ़ियों बाद कोरू कहलाये । मिस्त्र के फराओं का वैभव समाप्त हो जाने के बाद इन खदानों को रोम के धनाढ्य व्यापारियों ने खरीद लिया ।"

            "ये खदानें दरअसल नर्क से भी बदतर थीं । आओ मैं तुम्हें वहाँ का एक दृश्य दिखलाता हूँ . ..कल्पना करो ..  देखो.. वह देखो.. सौ से भी अधिक गुलाम एक कतार में चल रहे हैं .. एकदम नंगे.. गर्म रेत में घिसटते हुए पाँव लेकर ... उनकी गर्दन में एक पट्टा है जो काँसे का है और जो अगले गुलाम की गर्दन में बन्धे पट्टे के साथ एक ज़ंजीर से बन्धा हुआ है । बार बार उस पट्टे के गर्दन में टकराने की वज़ह से उसकी गर्दन में घाव हो गए  है और उनसे खून बह रहा है । अँधेरा गहराता जा रहा है और यह गुलाम दिन भर का काम ख़त्म करके अपनी बैरकों में लौट रहे हैं । एक बार भीतर घुस जाने के बाद उन्हें  बाहर आने की इज़ाज़त नहीं है । वे केवल मरकर ही बाहर आ सकते हैं ।

            "उफ़ ..क्या बेबसी है " रवींद्र ने कहा । मेरी आँखें तम्बू की छत की और देख रही थीं और मुझे वहाँ उन बैरकों का दृश्य दिखाई दे रहा था .."वे बैरकों की फर्श पर ही गन्दगी कर रहे है वहीं कहीं पहले का मल पड़ा हुआ है जो सड़कर सूख गया है । अभी थोड़ी देर में उन्हें  खाना दिया जाएगा ..गेहूँ और टिड्डी का शोरबा और एक मशक में एक सेर पानी जो उनकी भूख और प्यास के हिसाब से नाकाफी है .. उनका पानी ख़त्म हो चुका है ..वे और पानी मांग रहे हैं लेकिन उन्हें पानी नहीं दिया जा रहा है ।"

            "लेकिन पानी क्यों नहीं ?" अजय ने पूछा "खाना भले ही कम दें लेकिन पानी तो मिलना चाहिए !" "अरे मूरख " अशोक ने कहा " वह रेगिस्तान है ,वहाँ पानी तो भोजन से भी अधिक मूल्यवान है ।" " ठीक कह रहे हो तुम " मैंने कहा "जब पानी की कमी से उनका गुर्दा खराब हो जाएगा और वे श्रम करने लायक नहीं रहेंगे उन्हें बैरक से बाहर कर दिया जाएगा और रेगिस्तान में मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा । इन बैरकों में सड़ान्ध है, घुटन है, इतनी बदबू है कि खाया पिया सब बाहर आ जाए  ..लेकिन गुलाम इसे जज़्ब कर लेते है वे उल्टी आने के बावज़ूद भी उल्टी नहीं करते क्योंकि वे जानते हैं कि एक बार उल्टी कर देने के बाद उनका पेट ख़ाली हो जाएगा और फिर उन्हें दिन भर भूखे रहना पड़ेगा । खाना भी सिर्फ इतना ही मिलेगा कि ज़िन्दा रहा जा सके । वे यह सोचते हुए कि  ज़िन्दा क्यों है, यह सर्द अन्धेरी रात काट देंगे ...।"
                                     
            मैंने एक नज़र अपने मित्रों के चेहरे पर डाली । मुझे कहीं भी उनके चेहरों पर जुगुप्सा का भाव नहीं दिखाई दिया । उनके चेहरे देखकर मुझे santosh हुआ और इस बात का अहसास हुआ कि किस तरह एक मनुष्य के दुःख की गाथा सुनकर दूसरा मनुष्य उस दुःख को महसूस कर सकता है । यह संवेदनशीलता ही उसे मनुष्य बनाती है । मैंने रोम के गुलामों के इस दुःख की गाथा को शब्द देने शुरू किये   "देखो अब नगाड़े बजने लगे हैं, यह उनके लिए अलार्म है..अब सबको ज़ंजीरों में बान्धकर खदानों की ओर ले जाया जाएगा । वे अपना प्याला और कटोरा साथ रखकर घिसटते कदमों से चल पड़े हैं ...ठंड से काँपते हुए अपने नंगे बदन को हाथों से ढाँपने की कोशिश करते हुए वे अपनी जानवरों से भी बदतर ज़िन्दगी के बारे में सोच रहे हैं । खदान तक पहुँचकर  वे उन चट्टानों पर कुदाल और हथौडे चलायेंगे जो उनके मालिकों को सोना देती हैं ।

            "उफ़ , कितना कठिन है यह सुनना ।" अजय ने अपने कानों पर हाथ रखते हुए कहा  "हाँ । " मैंने कहा " गुलामों की जीवन गाथा सुनना कठिन तो है । सारे गुलाम पसीने से तरबतर हैं  महीनों से उन्हें नहाना नसीब नहीं हुआ है , अब वे चार घंटे बिना रुके काम करेंगे, जिसका हाथ क्षण भर के लिए भी रुकेगा उसे कोड़ों से पीटा जाएगा .. इस तरह  चार घंटे लगातार काम करने के बाद तक उनके शरीर का पानी पसीना बनकर निकल चुका होगा, फिर उन्हें  ज़िन्दा रहने लायक थोड़ा सा खाना और पानी दिया जाएगा, जो जल्दी में गट गट पानी पीने की गलती करेगा पछतायेगा क्योंकि पेशाब बनकर पानी निकल जाने के बाद काम खत्म होने तक दोबारा नहीं मिलेगा ..लेकिन इस प्यास का क्या करें ..कैसी मजबूरी है यह .. पानी पियें  तो भी मौत नहीं पियें तो भी मौत ...। जो युवा हैं वे तो सह लेंगे लेकिन बच्चों का क्या ..देखो अभी अभी सोलह साल के उस थके हारे बालक ने भूख-प्यास, ठंड और गर्मी के इस उतार-चढ़ाव से लड़ते हुए स्पार्टकस की गोद में दम तोड़ दिया  है । स्पार्टकस रोते हुए उसकी लाश को बेतहाशा चूम रहा है । ”

            "बस कर यार “ किशोर के चीखने से मैं होश में आया । “क्या सुना रहा है तू ... पूरी रात बरबाद कर दी..ऐसा भी होता है कभी ..इतना अत्याचार ..“ किशोर ने गांजे की सिगरेट जला ली थी और मेरी तरफ बढ़ाते हुए कह रहा था .."ले एक सुट्टा लगा ले और वापस इस दुनिया में आजा .. बाकी कहानी कल सुनेंगे ।" मैंने कहा  “ रेन दे यार अपन तो वेसेई टनाटन्न रेते हें....।

            मेरी ख़ामोशी के पर्दे पर अभी भी उन निरीह गुलामों के चित्र उभर रहे थे । मैं काफी देर तक चुपचाप बैठा उन मनुष्यों के बारे में सोचता रहा । किशोर, अशोक, अजय सब नींद  के आगोश में जा चुके थे । मैं जाग रहा था और एकटक तम्बू की छत की ओर देख रहा था । मेरे साथ जाग रहा था मेरा अंतरंग मित्र रवीन्द्र जो मेरी मनस्थिति समझने की कोशिश में था । “यार रवीन्द्र, तूने पढ़ी है हावर्ड फास्ट की “ आदिविद्रोही ” ? अचानक मैंने रवीन्द्र से पूछा । रवीन्द्र ने कहा “ पढ़ी तो नहीं है लेकिन सुना जरूर है कि उसमें स्पार्टाकस के विद्रोह की कथा है ।“ मैंने कहा “ मैंने तो जिस दिन से पढ़ी है मेरी नींद ही उड़ गई है । कैसे एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के प्रति इतना क्रूर भी हो सकता है, अपने मनोरंजन के लिए  एक इंसान की दूसरे इंसान द्वारा हत्या करवाना ?"

            रवीन्द्र जानता था जब तक मेरे  भीतर की वेदना बाहर नहीं निकलेगी मुझे नींद नहीं आएगी । उसने पूछा “फिर उस सोने की खान के गुलामों के बीच से स्पार्टाकस बाहर कैसे आया और ग्लेडिएटर कैसे बना ? “  मुझे लगा उसकी आवाज़ कहीं दूर से आ रही है । हम मनुष्य इसीलिए कहलाते हैं कि हमें अपने आप को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता प्राप्त है । लेकिन ऐसा क्यों होता है कि कई बार अपनी वेदना अभिव्यक्त करने से ज़्यादा छटपटाहट दूसरे की वेदना व्यक्त करते हुए  होती है  । शायद इसीलिए कि अपने दुख दूसरों के दुख की तुलना में गौण हो जाते हैं ? कभी कभी दूसरों के दुःख देखो तो लगता है अपने दुःख सिर्फ ओढ़े हुए दुःख हैं । आज मुझे लग रहा था कि स्पार्टाकस कहीं मेरे भीतर जीवित हो गया है और अपने दर्द को प्रकट करने के लिए  छटपटा रहा है ।

            मैंने कहना शुरू किया “ इन खदानों का पता जैसे ही अखाड़ों के मालिकों को पता चला, वे गुलामों को खरीदने के लिए इन खानों में पहुँचने लगे । ये लोग जैसे ही खानों में पहुँचते नग्न गुलाम इनके सामने प्रस्तुत किये जाते और ये लोग जिस तरह बैल या बकरे खरीदते है उस तरह इन्हें खरीदने वाले इनके शरीर के अंग टटोल टटोल कर इनका सौदा करते और इनकी कीमत लगाते । “ “ लेकिन ये गुलाम इस तरह बिकने के लिए  तैयार हो जाते थे ?" रवीन्द्र ने पूछा । “ तैयार..? “ मैंने कहा “ ज़िबह किये जाने वाले जानवर से भी कभी उसकी मर्ज़ी पूछी जाती है क्या । वैसे भी इन खदानों में इन  गुलामों की ज़िन्दगी साल या ज़्यादा से ज़्यादा दो साल होती थी । खदान के मालिकों को उनके मरने से पहले उनकी कीमत मिल जाती थी । “ इतना कहकर मैं चुप हो गया । मुझे नींद नहीं आ रही थी लेकिन मैं कुछ कहना भी नहीं चाहता था ।