📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘
✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼
*पिछले भाग में आपने पढ़ा कि कपड़ों की खोज कैसे हुई , कपड़े पहनने का विचार मनुष्य के दिमाग़ में कैसे आया, उसके लिए उसने क्या क्या किया ,प्रारम्भिक वस्त्र कैसे थे किस कपड़े के बनाये जाते थे ।इसके अलावा यह भी जाना कि पाखण्डी बाबा कैसे चमत्कार करते हैं , कैसे हवा से भभूत निकालते हैं , कैसे बिना माचिस के आग लगाते हैं आदि । इस भाग में पढ़िए कि आदिम मनुष्य के पास जब औजार बनाने वाले चकमक पत्थर के भण्डार ख़त्म होने लगे तो उसके सामने कैसा संकट आया, फिर उसे अचानक ताम्बा कैसे मिला, उस ताम्बे का उपयोग उसने औजार बनाने के लिए कैसे किया, क्या क्या कठिनाइयाँ आई ।*
📒📒📒📒📒
*भाग 46*
*ताम्बे की थाली में जेवना परोसा*
सुबह सुबह घाट पर रवीन्द्र ने मुझे याद दिलाई " यार हम लोगों को यहाँ आये आज तीन सप्ताह हो चुके हैं और आज हमारा बाइसवां दिन है । अब वापसी की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए ।" वापस जाने की बात सुनकर मैं थोड़ा सा उदास हो गया फिर भी उदासी के उस भाव को शब्दों से समायोजित करते हुए मैंने कहा " तैयारी क्या करना है ..जिस दिन डॉ. वाकणकर इज़ाज़त दे देंगे हम अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से रवाना हो जायेंगे ।" " हाँ यार..उज्जैन जाकर परीक्षा की तैयारी भी तो करना है ।" रवींद्र ने आनेवाली परीक्षा की याद दिला दी थी । "तो उसमे ऐसा परेशान होने की क्या बात है " मैंने रवीन्द्र के परीक्षा के भय को दूर करने के प्रयास में कहा । "साल भर से तो पढ़ ही रहे हैं ।" "तेरी बात अलग है ।" रवींद्र ने कहा । "तू तो साल भर से तैयारी में लगा है और टॉप भी तुझे ही करना है । लेकिन हमें तो पढना होगा । उसके बाद पता नही कब रिज़ल्ट आएगा फिर देखेंगे आगे क्या करना है । हम सब छात्र मध्यवर्गीय परिवारों से आये हैं । अब कोई बाप-दादा का धंधा तो नहीं है सो नौकरी तो ढूँढनी ही होगी ।"
"हाँ यार ।" भविष्य के चिंता ने हमें थोड़ा गंभीर कर दिया "सही है.. हमें लेकर हमारे माता-पिता के भी कुछ स्वप्न हैं । वे चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़ लिख कर कहीं ठीक ठाक जगह नौकरी पर लग जाएँ । हमारे लिए भी आनेवाले दिन एक समर की तरह हैं जब हम डिग्री लेकर विश्वविद्यालय से निकलेंगे और नौकरी के लिए भटकेंगे । हम नहीं जानते कि हमारा भविष्य क्या है । हमारे सामने उन लोगों का जीवन है जो अपनी ज़िंदगी में सेटल हो चुके हैं जिनके पास एक अच्छी नौकरी है, रहने के लिए एक अच्छा सा मकान है, घर -परिवार है, सुविधा पूर्ण जीवन जीने के लिए बहुत सारी वस्तुएँ हैं । हमारे पास तो इनमें से कुछ नहीं है बस देश के करोड़ों नौजवानों की तरह अच्छे भविष्य के स्वप्न है । हाँ, हम सबके भीतर कुछ करने की चाहत ज़रूर है, मन में ढेर सारी उमंगें भी हैं और उन्हें थपथपाती हुई कुछ उम्मीदें कि जीवन अच्छा ही बीतेगा।"
" सही कह रहा है तू ।" रवीन्द्र ने कहा "उम्मीद तो है कि हमें इस डिग्री के बाद अच्छी नौकरी मिल जायेगी या हो सकता है पहले पी एच डी करनी पड़े फिर नौकरी मिले । अच्छा बता नौकरी लग जाने के बाद तू सबसे पहले क्या खरीदेगा ?" मैंने तपाक से कहा "रेडियो !" " अरे वा !" रवीन्द्र ने खुश होकर कहा । " हाँ यार यहाँ सबसे ज्यादा कमी संगीत की महसूस होती है , अगर रेडियो होता तो शायद काम करने में और मज़ा आता । वैसे तू तो है ही हमारा रेडियो आल इण्डिया रेडियो, बी बी सी लन्दन सब कुछ ।" मैंने कहा " देख भाई शेखचिल्ली की तरह सपने देखना तो मुझे भी आता है । एक बार सेटल हो जाएँ फिर देखेंगे.. जैसे जैसे सुविधा होगी, स्कूटर, मकान सब हो जाएगा । फिर शादी के बाद आटे दाल के कनस्तर भी तो खरीदने पड़ेंगे ।"
"यार, ज़िन्दगी में जो ज़रूरी वस्तुएँ हैं वे तो लेनी ही पड़ेंगी । और न भी हो तो जीवन तो बीतेगा ही । बहुत अच्छा भले न हो एक सामान्य सा जीवन भी बीत जाए तो काफी है ।" रवींद्र के भीतर आशा का समंदर लहरा रहा था । "कभी कभी सोचता हूँ कि पहले के उस इंसान का जीवन कितना अच्छा था । न उसके पास अधिक इच्छाएँ थीं न उसे जीवन बिताने के लिए बहुत सारी वस्तुओं की आवश्यकता थी । अपनी अल्प सुविधाओं के बावजूद वह जीवित तो रहता ही था । और आज के मनुष्य को देखो उसने इतनी अधिक इच्छाएँ पैदा कर ली हैं कि उसी अनुपात में उसके पास अल्लम -गल्लम चीज़ों का ढेर भी बढ़ा गया है । कभी कभी लगता है यह अपनी इच्छाओं के बोझ तले दबकर ही न मर जाये । "
रवींद्र का स्वर कुछ निराशावादी हो रहा था । मुझे उसे निराशा से उबारना उचित लगा । " इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं है भाई । यह विकास की सहज स्वाभाविक गति है इसे हम मनुष्य की प्रगति के सन्दर्भ में देख सकते हैं । उसने अपने दिमाग की ताकत से इस प्रकृति का दोहन किया और पदार्थ पर नियंत्रण करते हुए प्रकृति में सहज प्राप्य वस्तुओं को अपनी मनचाही वस्तुओं में बदल दिया । यह सिसिला तब से जारी है जब वह भौतिक शास्त्र, रसायनशास्त्र जैसे विषयों को भी नहीं जानता था । आज मनुष्य ने अपने संचित ज्ञान के आधार पर कितनी सारी वस्तुएँ बना ली हैं कागज़, शीशा, प्लास्टिक, स्टील, कपड़ा, रबर और अभी इसका कोई अंत भी नहीं दिखाई देता ।"
रवीन्द्र ध्यान से मेरी बात सुन रहा था । उसके चेहरे पर जमी निराशा की धुंध धीरे धीरे छंट रही थी । मैंने अपनी बात जारी रखी "अशोक कह रहा था ना उस दिन कि यह तो कुम्हार की कहानी है । दरअसल सबसे पहली शुरुआत कच्ची मिटटी के बर्तनों को आग में पकाने से ही हुई । वह मिटटी, पानी और आग को अपनी इसी शक्ति से काबू में ला रहा था जबकि इसके पहले वह सिर्फ पत्थरों को अपने हाथों की शक्ति से अलग रूप देता था । अब उसने प्रकृति की शक्तियों का उपयोग करना शुरू किया । आग ऐसी ही एक शक्ति थी जो मिटटी को पका देती थी, रोटी और मांस को सुस्वादु बना देती थी । मनुष्य ने भी एक कुम्हार की तरह ही अपने जीवन को गढ़ा है उसे संघर्ष की आग में तपाकर मजबूत बनाया है फिर सुविधाओं से उसे सजाया है ।"
सुबह भले ही हम लोगों ने बहुत गंभीर बातें की हों दोपहर में ट्रेंच पर आज हम लोग बहुत हल्के-फुल्के मूड में थे । वाकणकर सर उज्जैन गए हुए हैं और आर्य सर भी ट्रेंच क्रमांक एक पर अधिक व्यस्त थे सो हम लोग पूरी तरह स्वतन्त्र थे । उत्खनन करते हुए हम लोग आपस में मज़ाक भी करने लगे । सुबह की गंभीर बातों का हैंगओवर अभी बाक़ी था जिसे हँसी मज़ाक के साथ हम लोग दूर करने की कोशिश कर रहे थे । अजय ने कहा .." काश ज़मीन के भीतर से सोने की मुहरों से भरा एक हंडा निकल आता तो सबकी लाइफ बन जाती । हम लोग आपस में बाँट लेते फिर न नौकरी की ज़रूरत होती न पढ़ने-लिखने की ।"
अशोक ने चौंककर अजय की और देखा कहा " अबे ओ शेख चिल्ली .. सपने देखना बंद कर । वैसे भी तेरी लाइफ तो पहले ही बन चुकी है , अब तू कुछ नहीं भी करेगा तो चलेगा । पिताजी जैसे तुझे पाल रहे हैं वैसे ही तेरे बाल बच्चों को भी पाल लेंगे ।" अजय ने खिसियानी हँसी हँसते हुए कहा .."नहीं भाई पिताजी के पैसे पर कब तक ऐश करेंगे ख़ुद भी तो कुछ न कुछ करना ही होगा ।" किशोर भैया ने थोड़ी सी गर्दन नीचे झुकाई और कहा ..हं ..अब पता चला न ज़िन्दगी जीने के लिए खुद मेहनत करनी पड़ती है इसलिए बिना मेहनत के धन कमाने के सपने देखना बंद कर । वैसे भी तू जानता ही होगा .. ज़मीन से जो कुछ भी निकलेगा वह सब राष्ट्र की संपत्ति ही होगा इसलिए कि वह हमने नहीं कमाया है बल्कि हमारे पुरखों ने कमाया है । और सोने के हंडे की बात तो बिलकुल भूल जा ..वैसे भी हम लोग जिस साईट पर हैं वहाँ ताम्बे से अधिक कुछ मिलने की उम्मीद नहीं है क्योंकि यह सोने के जन्म से बहुत पहले की घटना है ।"
आज वाकणकर सर दिन भर साईट पर उपस्थित नहीं थे । जिस तरह प्रिंसिपल के न होने पर स्कूल की छुट्टी जल्दी हो जाती है आर्य सर ने भी जल्दी ही काम समाप्ति की घोषणा कर दी । वैसे भी आज दंगवाड़ा में हाट था और मजदूरों को भी जाने की जल्दी थी । यद्यपि सूर्य के डूबने में अभी काफी समय था और मार्च के शुरुआती दिनों का आसमान धूप के सुनहले रंग में रंगा हुआ था । ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने सोने की अशर्फ़ियों से भरा हंडा पूर्व दिशा में उलट दिया हो । मजदूर जैसे ही कुदाल फावड़े,घमेले , खुरपियाँ और छन्नी टेंट में रखकर लौटे हम लोग भी शिविर की ओर चल दिए । लौटते हुए हम लोगों ने आर्य सर को अजय के शेखचिल्ली वाले ख़्वाब के विषय में बताया । सर ने भी एक ठहाका लगाया और कहा "भाई ऐसा हो तो बहुत अच्छी बात है हमारा राजकीय संग्रहालय कुछ समृद्ध हो जाएगा लेकिन सोना तो दूर यहाँ ताम्बा ही मिल जाए बहुत बड़ी बात है ।"
अजय का रंगीन ख़्वाब इतनी ठोकरों के बाद अब सोने की घाटी से लुढ़ककर ताम्बे की घाटी में आ चुका था उसने सोचा थोड़ा कोर्स की बात कर अपना इम्प्रेशन जमा लिया जाए । "सर, चाल्कोलिथिक पीरियड के बारे में कोर्स में पढ़ते हुए हमने पढ़ा था कि मनुष्य को मिलने वाली सबसे पहली धातु ताम्बा ही है लेकिन ताम्बे की खोज के बारे में विस्तार से हमें नहीं पता । यह खोज भी बहुत मुश्किल से हुई होगी न ?" अशोक ने अजय की और इस अंदाज़ से देखा मानो उसने प्रायमरी कक्षा का सवाल हाईस्कूल की कक्षा में पूछ लिया हो । फिर वह सर से मुखातिब हुआ "सर, पुरातत्ववेत्ताओं को सबसे पहले ताम्बे के अवशेष कहाँ मिले ?" उसका सवाल भी अजय के सवाल के तारतम्य में ही था लेकिन वह थोड़ा एडवांस्ड था ।
सर दोनों के सवाल सुन चुके थे । उन्हें अशोक का प्रश्न थोड़ा अधिक महत्वपूर्ण लगा इसलिए उसके सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा "भाई, पुरातत्ववेत्ताओं को ताम्बे के औज़ार सबसे पहले झीलों की सतह में मिले उसके अलावा भी कई अन्य साइट्स पर भी मिले हैं ।" अजय ने अशोक की और गुस्से से देखा ,सर ने उसके प्रश्न को सरपास करते हुए अशोक के सवाल का जवाब जो दिया था "लेकिन सर मनुष्य को यह पहली बार कैसे मिला होगा, मतलब ताम्बे की खोज कैसे हुई होगी ?" अबकी बार किसीने अजय की बात नहीं काटी । दरअसल अजय की तरह हम लोग भी इस बात को विस्तार से जानना चाहते थे । सर ने हमारी झोली में ज्ञान उंडेलना शुरू किया " यह बात तो तुम लोग जानते ही हो कि ताम्बा प्रकृति से मिलता है और यह भी कि लाखों वर्षों से मनुष्य चकमक पत्थर से अपने औज़ार बना रहा था । यह चकमक पत्थर भी उसे प्रकृति में यूँही पड़ा मिल जाता था । लेकिन कई हज़ार वर्षों के पश्चात धीरे धीरे उसके चकमक पत्थर के भंडार समाप्त होने लगे । ज़ाहिर है उसने अपने इस भण्डार का मितव्ययिता के साथ उपयोग नहीं किया था तो यह तो होना ही था ।"
"अच्छा उस समय तो उसे बताने वाला भी कोई नहीं रहा होगा कि भाई ज़रा कंजूसी से उपयोग करो ।" अजय ने कहा " जैसा कि आजकल पेट्रोल के लिए हल्ला मचाने लगे हैं कि भविष्य में पेट्रोल के भण्डार समाप्त हो जायेंगे । " ऐसा नहीं है ।" सर ने अजय की वर्तमान पर समीक्षा के उत्साह को कम करते हुए कहा " कंजूस तो तब कहलाता जब उपलब्ध होने पर भी वह इनका उपयोग नहीं करता । उसकी समस्या तो यह थी कि चकमक पत्थर उपलब्ध ही नहीं थे । वैसे वह मितव्ययिता के साथ तो सभी वस्तुओं का उपयोग करता था इसलिए नहीं कि उसे यह ज्ञात था कि यह सब वस्तुएँ शीघ्र समाप्त हो जायेंगी बल्कि इसलिए कि उसका दायरा ही इतना सीमित था कि उसे आसपास यह वस्तुएँ उपलब्ध ही नहीं होती थीं । तुम लोगों ने वेदों में पढ़ा होगा जाने कितने मन्त्र इस मितव्ययिता को लेकर ही लिखे गए हैं ।"
"मतलब यह हुआ सर कि चकमक पत्थर तो उपलब्ध था लेकिन उस जगह पर नहीं था जहाँ वह रहता था ..?" अजय ने कहा । "बिलकुल ठीक " आर्य सर ने कहा "अब उस समय कोई ट्रांसपोर्टेशन जैसा तो कुछ था नहीं जो वह आर्डर देकर दूसरी जगह से पत्थर मंगवा लेता । और ऐसा भी नहीं कि उसने इसके लिए कोशिशें नहीं कीं । पहले वह सतह पर पड़ा चकमक पत्थर इस्तेमाल कर लेता था लेकिन इस तरह जब उसे सतह पर चकमक मिलना बंद हो गया तो उसने ज़मीन खोदकर चकमक निकालना शुरू किया । इस तरह संसार की पहली खदानें बनीं ।"
"मतलब उसे यह मालूम था कि ज़मीन के भीतर चकमक पत्थर है ?" अशोक ने कहा । "बिलकुल । " सर ने कहा "वह खाइयों या गड्ढों में झांककर देखता ही था वहाँ उसे यह पत्थर दिखाई दिया तो उसने खोदना शुरू किया । यह चकमक अक्सर चाक मिटटी के साथ या खड़िया मिटटी के साथ मिलता था । प्राचीन निक्षेपों में ऐसी कई खदानें मिलती हैं जहाँ चकमक और खड़िया साथ साथ मिलता है । लेकिन उस समय भी पत्थर खोदने के लिए ज़मीन के नीचे उतरना बहुत कठिन काम था । अब उनके पास ऐसा कोई तकनीकी ज्ञान तो था नहीं सो अक्सर वे लोग जब भीतर उतरते थे उनकी खदानें ढह जातीं और वे उसीमें दब जाते । पुरातत्ववेत्ताओं को ऐसी कई खदानें मिली हैं जिनमें मनुष्यों के कंकाल भी पाये गये हैं । फिर भीतर अँधेरा भी होता था इसके लिए वे लकड़ियाँ जलाते थे या जानवरों की चर्बी के दिए लेकर भीतर जाते थे लेकिन उससे इतना धुआं होता था कि कई बार भीतर दम घुटने से या कई ज्वलनशील गैसों के आग पकड़ लेने से भी वे लोग मर जाते थे ।"
" यह सही है सर ।" अजय फिर अतीत से वर्तमान में लौट आया था "आज भी खदानों में उतनी सुरक्षा कहाँ हैं, धनबाद में चासनाला खदान में कितनी बड़ी दुर्घटना हुई थी पूरा पानी खदान के अन्दर भर गया था । फिल्म 'काला पत्थर' इसी समस्या पर बनी थी । "हाँ यह समस्या तो आज भी है ।" सर ने कहा "आज भी वहाँ पूरी की पूरी बस्ती खदानों के ऊपर बसी है, मकानों के नीचे खाली ज़मीन है, कौनसा मकान कब धंस जाए पता ही नहीं चलता । खैर..." सर अपनी बात के वर्तमान का खनन कर उसे फिर अतीत तक ले गए "इस तरह धीरे धीरे ज़मीन के भीतर का चकमक भी समाप्त होने लगा, या फिर कई बार भीतर जाने की असुविधा भी बढ़ती गई । अब उसे अपने चाकू, कुदाले, भाले बनाने के लिए चकमक की ज़रूरत तो थी ही क्योंकि बिना औजारों के उसका जीवन मुश्किल हो जाता । लेकिन अब समस्या चकमक पत्थर की थी ।"
" ओह यह तो बहुत ही बुरा हुआ ।" किशोर ने कहा । " हाँ ।" सर ने कहा " जब उसे अपने औजार बनाने के लिए अन्य किसी वस्तु की आवश्यकता महसूस होने लगी तब उसका ध्यान अन्य पत्थरों की ओर गया और इस प्रयास में उसे ज़मीन पर पड़ा यह हरा हरा सा पत्थर मिला । उसने सबसे पहले इस ताम्बे के खनिज को पत्थर समझ कर ही इस्तेमाल शुरू करना शुरू किया । उस समय आज जैसी स्थिति नहीं थी । ताम्बा खनिज के रूप में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था और वह सतह पर ही मिल जाता था सो उसने इस पत्थर से औजार बनाने शुरू किये । उसने अपने चकमक के हथौड़े से उस पर वार किया लेकिन जैसे ही ज्यादा जोर से चोट पड़ती तो यह ताम्बे का पत्थर चूर चूर हो जाता था । ऐसे ही एक दिन उसने तंग आकर उस पत्थर को आग में फेंक दिया और आश्चर्य कि उसे अगले दिन एक चमकदार धातु प्राप्त हुई जो ताम्बा कहलाई ।"
"मतलब उसके बाद उसने सारे औज़ार ताम्बे के ही बनाए ?" अजय ने पूछा । " नहीं सारे हथियार तो नहीं बनाये लेकिन वह चकमक के औजारों के साथ इनका भी इस्तेमाल करने लगा ।" सर ने अजय के फास्ट फॉरवर्ड बटन पर स्टॉप का बटन लगाते हुए कहा ।" यह ताम्बा पृथ्वी के सभी भू भागों में एक साथ मिला होगा ?" किशोर ने पूछा । "नहीं ऐसा भी नहीं है ।" सर ने कहा " ताम्बा मिलने के प्रमाण अलग अलग जगहों पर अलग अलग समय के मिलते हैं जैसे मध्य पूर्व में यह लगभग नौ हज़ार ईसा पूर्व में मिला । पुरातत्ववेत्ताओं को उत्तरी इराक के क्षेत्र में लगभग आठ हज़ार सात सौ साल पुराना एक पेंडेंट मिला है ।" अच्छा !" अजय ने कहा "पेंडेंट यानि झुमका .. वाह झुमका गिरा रे ईराक के बाज़ार में ।" अजय की बात सुनकर हँसी की एक लहर फैल गई । सर ने मुस्कुराते हुए कहा " हाँ, यह धातुओं की खोज के हिसाब से एक महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है, कांस्य युगीन सभ्यता का प्रारम्भ भी यहीं से माना जाता है ।"
"अच्छा तो फिर कांसा कहाँ से आया सर ?" अजय ने पूछा । सर ने जवाब दिया " कांसा ताम्बे और टीन का अलॉय है । इसी तरह जब ताम्बे के खनिज के साथ टीन के खनिज मिले दोनों के संयोग से कांसा बना । सुमेरिया और इजिप्त में यह लगभग तीन हज़ार ईसा पूर्व पाया गया और इसका उपयोग लगभग एक हज़ार ईसा पूर्व तक चलता रहा जब तक लोहे की खोज नहीं कर ली गई । इस तरह नियोलिथिक काल से लेकर कांस्य युग तक का काल चाल्कोलिथिक पीरियड या ताम्राश्म युग कहलाया अर्थात जिसमें ताम्बे और पत्थर दोनों का उपयोग होता था । आज देखिये ताम्बा किस तरह उपयोग में लाया जाता है । इसके उपयोग की शुरुआत औजार बनाने से हुई, फिर बर्तन और आभूषण बनाये गए । आज सबसे ज्यादा उपयोग बिजली के तारों और उपकरणों के लिए होता है क्योंकि यह बिजली का सबसे बढ़िया संवाहक है ।"
"सर जी इसका एक महत्वपूर्ण उपयोग तो आपने बताया ही नहीं ।" राममिलन ने कहा । "तो तुम्हीं बता दो भाई ।" सर ने मुस्कुराते हुए कहा । राममिलन भैया बोले "सर जी, इसका सबसे ज्यादा उपयोग तो पूजा पाठ के लिए होता है । पूजा के पात्र, थालियाँ, लोटे, ताम्बे के ही शुद्ध माने जाते हैं । और ताम्बे की ही थाली में भगवान को भोग लगाया जाता है ।" जय हो राममिलन भैया । " सर ने हाथ जोड़े और कहा " चलो भाई अब चाय पीने का मन हो रहा है भाटीजी की भोजनशाला में ताम्बे के पात्र नहीं बल्कि चीनी मिटटी के कप हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे ।" "बिलकुल सर ।" किशोर ने कहा "चाय की तलब हो रही है ..उसके बाद हमें सिटी भी तो जाना है ।"
*शरद कोकास*
*******************

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें