सोमवार, 1 जून 2026

47-इस हाथ दे उस हाथ ले


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼


*पिछले भाग में आपने पढ़ा कि आदिम मनुष्य के पास जब औजार बनाने वाले चकमक पत्थर के भण्डार ख़त्म होने लगे तो उसके सामने कैसा संकट आया, फिर उसे अचानक ताम्बा कैसे मिला, उस ताम्बे का उपयोग उसने औजार बनाने के लिए कैसे किया, क्या क्या कठिनाइयाँ आई । इस भाग में आप पढेंगे कि आदिम समय में विनिमय की क्या स्थिति थी , मनुष्य कैसे अपने उत्पादन का वितरण करता था इसी कड़ी में पढ़िए गाँव के हाट के बारे में आपको बहुत आनंद आएगा*

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*भाग 47*

इस हाथ दे उस हाथ ले  

कल शाम दंगवाड़ा में कुछ अलग ही नज़ारा था । कल वहाँ साप्ताहिक हाट का दिन था । गाँव का हाट अपने आप में अद्भुत होता है । सुबह से दुकानदार अपने रंगबिरंगे तिरपाल तान देते हैं । बैलगाड़ियाँ भर भर कर सामान आने लगता है । फिर दोपहर तक भीड़ होने लगती है । आसपास के गांवों से भी अनेक लोग वहाँ आते हैं । धोती बंडी पहने हुए किसान , बसंती रंग का साफा बांधे हुए किरानी , रंगीन लहंगों और चुनरियों में औरतें , फ्राक पहने हुए बच्चियाँ , सिर में तेल लगाकर करीने से मांग निकाल कर केश सजाये हुए बच्चे  । इस तरह हाट में घूमने का अलग ही आनंद है । कल हम लोग भी देर शाम तक हाट में घूमते रहे और सजी-धजी दुकानों और वहाँ आये लोगों को देखने का आनंद लेते रहे । 


जाने कितने तरह की वस्तुएँ गाँव के इस हाट में बिकने आई थीं, सामान्य उपयोग की वस्तुएँ जैसे बांस की टोकरी, सूपे,चारपाई, हंसिया, रसोई के बर्तन, कुल्हाड़ी जैसे औज़ार,लकड़ी की खाट, स्टूल, ब्रैकेट, महिलाओं के लिए सौन्दर्य प्रसाधन की चीज़ें, नकली चोटी, बिंदी की शीशी, झुमके, गले के हार, नथ, आलता, सिन्दूर, किसानों के लिए बैलों की झूल, गायों के गले में बांधने के लिए घंटियाँ, और बच्चों के लिए तरह तरह के खिलौने कागज़ की चकरी,लट्टू, पिटपिटी वाला बाजा, पतंग, किसिम किसिम  की मिठाइयाँ जैसे खाजा, जलेबी, शक्कर पारे, मैसूर पाक, मोटे वाले सेव, परमलयानि मुरमुरा, रेवड़ी और गज़क, रोज़मर्रा की सब्जियाँ, मौसमी फल इत्यादि ।  


गाँव की इस हाट का स्वरूप कुछ कुछ मेले की तरह ही था सो मनोरंजन के भी कुछ साधन थे । दो-तीन किस्म के झूले भी वहाँ लगे थे और एक बाइस्कोप वाला भी था । एक जगह रिंग फेंकने वाला खेल भी चल रहा था । हम लोगों का मन हुआ कि कुछ खाने की वस्तुएँ हम भी खरीदें सो हम लोगों ने एक दूकान पर खड़े होकर गर्म गर्म जलेबी खाई  । चीज़ें ख़रीदने के नाम पर मैंने दस दस पैसे में मिलने वाली फ़िल्मी गानों की दो-तीन फोल्डर नुमा किताबें खरीदीं । अब ज़्यादा पैसे तो हम लोगों की जेब में थे नहीं सो हम व्यर्थ का खर्चा कर नहीं सकते थे, और शाम की चाय के लिए भी पैसे बचाकर रखना ज़रूरी था । वैसे भी इन चीज़ों की ज़रूरत तो हमें है नहीं, हम तो इन वस्तुओं की पूर्वज उन पुरानी वस्तुओं की खोज में आये हैं ।


कल हाट में मटरगश्ती करते हुए समय का पता ही नहीं चला । लौटने के समय घड़ी देखी तो पता चला कि रात के लगभग नौ बज गए थे । देर तो हो गई थी लेकिन वाकणकर सर नहीं थे इसलिए डांट खाने का भय नहीं था । वैसे भी सर की अनुपस्थिति में पहली बार हम लोगों ने शिविर का अनुशासन तोड़ने का दुस्साहस किया था । इस बात का अपराध बोध भी कुछ देर सालता रहा लेकिन आर्य सर पर हमें पूरा ऐतबार था कि वे सर को नहीं बताएँगे.. हाँ भाटीजी ज़रूर कह सकते थे लेकिन उन्हें हमने पटा लिया । वे भी समझ गए कि बच्चे तीन हफ़्तों से एक ही रूटीन में बंधकर ऊब गए हैं, फिर हमारे उज्जैन वापस जाने का भी समय आ रहा है सो उन्होंने भी कुछ नहीं कहा । वे भी जानते हैं कि समय के इस टुकड़े में हम लोगों का साथ बस कुछ दिनों का है । यहाँ से जाने के बाद हम लोग परीक्षा देंगे फिर ज़िन्दगी के सफ़र में अपने अपने रास्ते चले जायेंगे । कौन कहाँ जाएगा, कहाँ सेटल होगा कुछ  पता नहीं।  फिर पता नहीं कौन कितने सालों बाद मिलें, मिले भी या न भी मिलें । 


कल रात गाँव से लौटकर हम लोगों ने देर से ही खाना खाया । भाटी जी की रसोई के लिए हम लोग नमक मिर्च रखने की दो प्लास्टिक की छेदवाली डिब्बियाँ ख़रीदकर लाये थे । उन्हें दीं तो वे बहुत खुश हो गए और हम लोगों को गर्म गर्म रोटियाँ सेंक कर खिलाईं । कुछ देर बरगदों के साये में टहलने के बाद हम लोग तम्बू में लौट आये काफी चलना हो गया था इसलिए थकान सी महसूस हो रही थी । भाटीजी से खाना खाते हुए हमने काफी देर तक अपने भविष्य के प्लान पर बातें की थीं तम्बू में लौटकर भी भविष्य के जीवन की कुछ ऐसी ही बातों पर चर्चा चलती रही । नींद ने कब हमें अपने आगोश में ले लिया पता ही नहीं चला ।


मौसम का मिजाज़ आजकल कुछ बदला बदला सा नज़र आ रहा है । सुबह घाट पर जाते हुए हमने आश्चर्य से हवाओं को देखा, यह वे हवाएँ तो कतई नहीं हैं जिन्होंने तेईस दिन पूर्व हमारा स्वागत किया था । सर्दियाँ अब समाप्त हो चली हैं और हवाओं ने मोटे कम्बलों और रज़ाइयों की कैद से मुक्त होकर खुबसूरत बसंती परिधान ओढ़ लिया है  । इठलाती युवतियों की तरह चल रही ठण्डी हवाओं के झुण्ड में अचानक किसी शरारती युवक सा गर्म हवा का एक झोंका कहीं से घुस जाता है और उन्हें छेड़ देता है । दिन भर धूप में मेहनत करने के बाद मन होता है कि शाम को भी चम्बल में एक डुबकी लगा ली जाये लेकिन वाकणकर सर की सख्त हिदायत है कि ऐसा कोई काम नहीं करना है जिसकी वज़ह से हम लोग बीमार पड़ें । सो हम लोग हाथ मुँह धोकर शीतल होने की रस्म अदायगी करने के पश्चात दंगवाड़ा  की ओर निकल जाया करते हैं ।


डॉ. वाकणकर आज सुबह ही उज्जैन से लौट आये थे और दिनभर काम में लगे रहे । कल जो हमने मस्ती की थी उसका खामियाज़ा हम लोगों को भुगतना पड़ा और अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक काम करना पड़ा । शाम को थककर चूर हो जाने के पश्चात वैसे भी सिटी जाने की कोई तमन्ना नहीं थी । फिर कल हम लोग ज़रूरत से ज़्यादा एन्जॉय कर ही चुके थे । रात को बिस्तर पर लेटे हुए हम लोग गाँव के हाट की चर्चा कर रहे थे कि अजय ने फिर वर्तमान से अतीत में छलांग लगाई  "यार आदिम मनुष्य के कबीलों में भी इस तरह के बाज़ार लगा करते थे क्या ?" 


मैंने अपने संचित ज्ञान के आधार पर उसकी बात का जवाब देते हुए कहा "उस वक़्त बाज़ार की कोई अवधारणा नहीं थी लेकिन मनुष्य वस्तुओं का आपसी विनिमय करना ज़रूर सीख गया था । इसलिए वे एक कबीले से दूसरे कबीले जाते थे और वस्तुओं का आदान-प्रदान करते थे । जब चकमक के औजारों का स्थान ताम्बे के औज़ारों ने ले लिया तो ऐसा भी हुआ कि किसी कबीले के पास आवश्यकता से अधिक औज़ार हो गए । अब उसे अपने आसपास के कबीलों से उसका विनिमय करने की ज़रूरत आन पड़ी । ऐसे ही किसी गाँव में पशुओं की संख्या अधिक थी तो कोई गाँव अनाज उत्पादन में अग्रणी था, किसी गाँव के कुम्हार बहुत कुशल होते थे और वे बहुतायत में मिटटी के बर्तन बनाते थे । इस बीच लोगों ने डोंगियाँ भी बना ली थीं सो वे लोग उन डोंगियों के सहारे नदियों को पार करके आसपास के गांवों में जाते और अपनी इन्हीं वस्तुओं के बदले अन्य वस्तुएँ ले आते । अब मुद्रा तो कोई उस समय थी नहीं सो आवश्यकता पूर्ति हेतु वितरण की यह  सार्वजानिक प्रणाली थी ।


"मतलब उस समय क्रय-विक्रय या ऐसा ही कोई अर्थ देने वाले शब्द प्रचलित नहीं थे ?" अशोक ने सवाल किया । "क्रय विक्रय तो क्या अनेक वस्तुओं के लिए भी शब्द नहीं थे ।" मैंने कहा । "विनिमय की इस पद्धति में सबसे बड़ी कठिनाई भाषा की ही थी सो यह लोग अपनी वस्तुओं के बारे में अन्य लोगों को ठीक से बता नहीं पाते थे । शुरू शुरू में लोग भी अनेक नई वस्तुओं और उनके उपयोग से अनभिज्ञ थे फिर भी जिन वस्तुओं के उपयोग से वे परिचित थे उनके बारे में  किसी तरह संकेतों के माध्यम से अथवा दुभाषिये के माध्यम से वे प्रचार भी करते थे ।" 


"अरे वाह ।" अजय ने खुश होकर कहा "मतलब विज्ञापन संस्था उस समय भी मौजूद थी ।" "हाँ कुछ ऐसा ही समझ लो ।" मैंने कहा  "लेकिन इससे यह लाभ हुआ कि वस्तुओं के विनिमय के साथ साथ भाषा का भी विनिमय होने लगा । यह लोग इस तरह के हाट में जब भी मिलते तो अपनी बोली के शब्दों के साथ नए लोगों की बोली के कुछ शब्द भी अपने साथ ले आते । यह वह समय था जब लोगों के धार्मिक विश्वास उनके टोटेम थे  और हर कबीले के अपने कुछ विशिष्ट देवी-देवता थे जो लकड़ी पत्थर आदि की सांकेतिक प्रतिमाओं के रूप में विद्यमान थे । कबीले के लोग जब इस तरह के हाट से लौटते तो कभी कभी उन प्रतिमाओं को लेकर भी आ जाते । इस तरह दैवी प्रतिमाओं का भी आदान प्रदान उनके बीच होता था ।"


"हाँ ।" अशोक ने कहा "मैंने पढ़ा है कि इस्लाम के अविर्भाव के पहले जब अरब के लोग मूर्तिपूजक थे हर कबीले के अपने अपने देवता और मूर्तियाँ होती थीं । जब एक कबीले के लोग व्यापार के लिए यात्रा पर जाते तब दूसरे कबीले से वे उनकी मूर्तियाँ भी ले आते । इस तरह इस तरह काबा में तीन सौ चौसठ मूर्तियाँ इकठ्ठी हो गईं ।" "लेकिन वे लोग तो मूर्तिपूजक नहीं थे और आज भी नहीं हैं ?" अजय ने सवाल किया ।  "हाँ ।"  अशोक ने कहा " यह इस्लाम के अविर्भाव से पूर्व की बात है । मोहम्मद साहब ने लिखा है कि तत्कालीन समाज में यह लोग किसी तरह की मेहनत में विश्वास नहीं करते थे, मिस्त्र की ओर से आने वाले काफ़िलों में लदा सामान वे लूट लेते और उसी से गुजर बसर करते थे । वे केवल मूर्तियों की आराधना करते और उनसे अपने दुःख दूर करने की प्रार्थना करते । मोहम्मद साहब ने जब देखा कि यह लोग इतने अकर्मण्य हो गए हैं तो सबसे पहले उनकी अकर्मण्यता दूर करने के लिए ही उन्हें मूर्तियाँ नष्ट करनी  पड़ीं । उन्होंने कहा कि इन मूर्तियों में अलग अलग तुम्हारा ईश्वर नहीं है वह केवल एक है जो निराकार है । इसलिए बेहतर होगा एक ईश्वर की आराधना करो और जीने के लिए ग़लत काम छोड़कर मेहनत के काम करो ।" 


"भैया, इसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत तो हमरे यहाँ है ।" किशोर ने कहा । "हमरे यहाँ के लोग भी तो भगवान भरोसे ही रहते हैं बल्कि हमारा देश ही भगवान भरोसे चलता है ।" राममिलन भैया ने कहा "तुम लोग नाहक भगवान की उपस्थिति पर संदेह करते हो देख लो यही तो इस बात का प्रमाण है कि भगवान हैं । अगर भगवान न होते तो हमरा देश कैसे चलता ?" उनकी बात का हमने लाक्षणिक अर्थ ग्रहण किया और एक ज़ोरदार ठहाका लगाया । राममिलन भैया हम लोगों को हँसता देखकर नाराज़ हो गए .." तुम लोग सब पापी हो, भगवान की बात पर हँसते हो, भगवान तुम्हारा कभी भला नहीं करेगा ।"


"नहीं भाई इसमें हँसने जैसी कोई बात नहीं है ।" मैंने मित्रों को शांत करते हुए कहा "उस समय तो देवी देवता भी इंसानों की तरह यात्रा करते थे, यहाँ से वहाँ जाते थे और धीरे से उस नए समाज में स्थपित हो जाते थे । यह सिलसिला तो अभी तक चल रहा है इसीलिए विश्व की अनेक सभ्यताओं में एक जैसे गुणों वाले देवी देवता मिलते हैं,  जैसे बाबुल के ताम्मुज ,मिस्त्र के मृत्यु के देवता ओसारिस और यूनान के एडोनिस में एक जैसे गुण पाए जाते हैं । हमारे यहाँ वे यमराज हैं । हमारे यहाँ भी जो इंद्र है उसके गुण ग्रीस के देवता ज्यूस से मिलते हैं । तात्पर्य यह कि वस्तुओं के साथ साथ नये संकेतों, नये शब्दों और देवी देवताओं का भी आदान प्रदान चलता रहा । आप देख सकते हैं कि विश्व की अनेक भाषाओं में अन्य भाषाओं के भी काफी शब्द मिलते हैं यह इसी विनिमय प्रणाली या सांस्कृतिक आदान -प्रदान के कारण संभव हुआ है । 


"कितना अच्छा समय रहा होगा ना वह जब किसी तरह का लड़ाई झगडा नहीं होता था ।" अजय ने कहा । "लोग एक दूसरे की भाषा सीखते थे, एक दूसरे के देवी देवता पूजते थे, जिसे जिस वस्तु की ज़रूरत होती थी वह अपनी वस्तुएँ देकर दूसरे से वह वस्तु ले लेता था ।" "नहीं ।" मैंने कहा " हम इस व्यवस्था का इस तरह सरलीकरण नहीं कर सकते । यह विनिमय इतने शांतिपूर्ण तरीके से भी नहीं होता था । कभी कभी किसी कबीले के पास देने के लिए कुछ नहीं होता था लेकिन उसे ताम्बे के औजारों की, कपड़ों की या अनाज की ज़रूरत होती थी तब वह अन्य कबीलों पर आक्रमण करके बल्कि सीधे सीधे हत्याएं करके उनसे अपनी ज़रूरत की वस्तुएँ छीनने में भी झिझकता नहीं था ।" 


"मतलब डकैती की शुरुआत यहीं से हुई ?" अजय ने सवाल किया । "हाँ ।" मैंने कहा "यह बात मनुष्य के स्वभाव में सदा से ही रही है, अप्राप्य को श्रम पूर्वक प्राप्त करने की बजाय वह अन्य लोगों से छीन लेना चाहता है । ऐसे लोग अपने हथियारों के साथ किसी गाँव पर हमला करते और वहाँ से अपनी ज़रूरत के सामान उठा लाते । इसी वजह से धीरे धीरे गांवों को अपनी सुरक्षा का खयाल आया और वे लोग गाँव के बाहर मिटटी और पत्थर से एक परकोटा तैयार करने लगे जिसमें प्रवेश द्वार बनाये जाते थे । हड़प्पा सभ्यता में तो लगभग हर गाँव इसी तरह परकोटे से घिरा हुआ मिलता है । 


"फिर तो कबीलों के सरदार भी हुआ करते होंगे गब्बर  सिंह की तरह और वे लोग भी इसी तरह गाँव में घुसकर अनाज लूट ले जाया करते रहे होंगे ?" अजय ने कहा । " हाँ " मैंने कहा । "डाकू तो अभी भी पाए जाते हैं । लेकिन इसका कारण आर्थिक से ज़्यादा सामाजिक है । तुमने चम्बल के डाकुओं के बारे में सुना होगा वे भी इसी तरह जातिगत शोषण की वज़ह से डाकू बने । दरअसल इसकी शुरुआत भी उस आदिम व्यवस्था में थी भले ही यह सामुदायिक व्यवस्था थी लेकिन हर कबीला अपने काम की वज़ह से अपने आप को श्रेष्ठ मानता था और दूसरे कबीलों को कमतर आंकता था ।"


"आज भी तो यही हो रहा है ।" किशोर भैया ने अपनी टिप्पणी दी ।" जानबूझकर ऊँच - नीच की भावना फैलाई जा रही है, धर्म और जाति को लेकर विद्वेष पैदा किया जा रहा है । जबकि देखा जाए तो संसार में कोई जाति न ऊँची है न नीची हालाँकि जाति भेद और वर्ग भेद मौजूद है । कहने को अमेरिका और सोवियत रूस जैसी महाशक्तियाँ हैं, योरोप के विकसित राष्ट्र हैं लेकिन वहाँ अभी भी ऐसी जातियाँ रह रही हैं जो अभी भी लकड़ी के हलों से खेती करती हैं, जिनके पास वही आदिम संस्कार हैं । इतिहास के अनुसार भले ही इन जातियों की आयु एक समान न हो लेकिन विकास अभी भी उन तक नहीं पहुँचा है । विकसित जातियाँ अभी भी ऐसी जातियों से घृणा करती हैं । हमारे ही देश के आदिवासी क्षेत्रों में जाकर देख लो, अब कंप्यूटर का युग आनेवाला है लेकिन अभी भी उनके पास वही औजार हैं जो आदिम युग में हुआ करते थे ।" 


बस इतना कहकर किशोर भैया ने चादर तानी और मुँह ढांक कर सो गए । किशोर भैया को इतना लम्बा भाषण देता हुआ देखकर ही हम समझ गए कि किशोर भैया आज पिनक में हैं । हाट में उन्होंने कहीं से बूटी का जुगाड़ कर लिया था जिसका उपयोग उन्होंने अभी कुछ देर पहले किया था । थोड़ी बहुत खुशबू तो हमें आ ही रही थी लेकिन उनके वक्तव्य से हम लोगों को कन्फर्म हो गया । उनके निद्रामग्न होते ही सब लोग अलसाने लगे । हमारे रात्रिकालीन सत्र का यह नियम है कि यदि एक व्यक्ति भी सो जाता है तो फिर बातचीत करने में किसी का मन नहीं लगता सो हम लोग सभा समाप्त कर देते हैं । राममिलन भैया ने एक नज़र किशोर भैया की ओर डाली और 'गया काम से' के मौद्रिक भाव के साथ कहा .."ई किसोरवा तो गया सिव जी की सरन में.. चलो हम भी चले .. जय बजरंग बली  ।"


*शरद कोकास*


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