सोमवार, 1 जून 2026

36-जलप्रपात तो आपने सुना होगा लेकिन घोड़ा प्रपात नहीं सुना होगा


📓 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📓

✍🏼 *शरद कोकास* ✍

पूर्वकथा- पिछले भाग में आपने पढ़ा कि मनुष्य इस पृथ्वी पर आने के पश्चात किस तरह पेड़ों पर रहता था ,उसे पेड़ों से उतरकर ज़मीन पर आने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई जमीन पर आने के बाद वह किस तरह अपने भोजन का प्रबंध करता है ,वह क्या क्या खाता है , किस तरह शिकार करता है । जावा मानव किसे कहते हैं । और यह भी कि किस तरह की मछलियाँ होती थीं जो पेड़ों पर भी रहती थी । आपने यह भी पढ़ा कि वह आदिम मानव किस तरह हाथों से जड़ें खोदता था और जब उसे एक डंडा मिल गया तो उसके जीवन में क्या क्रांति हुई ।अब इससे आगे*

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*भाग छत्तीस*
💄 *जलप्रपात नहीं भाई घोड़ा प्रपात* 💄


नाश्ते के उपरान्त शिविर से टीले की ओर जाते हुए हम लोगों हमेशा उत्साह से भरे हुए होते हैं । रास्ते में आनेवाले पेड़ों की छाँव से गुजरते हुए अक्सर नज़र ऊपर की ओर चली जाती है । सुबह नौ बजे के लगभग सारे पेड़ सुनसान होते हैं मानो सारे पंछी भी हमारी तरह अपने काम पर निकल गए हों । अचानक एक पेड़ के नीचे से गुजरते हुए एक कौवे की काँव काँव सुनाई दी । अजय ने कहा 'लगता है इस बदमाश कौवे ने आज गोल मार दिया । " उसने इतना कहा ही था कि उसकी कमीज़ पर पट से कौवे की बीट आ गिरी । अजय ने आज ही साफ़ सुथरी कमीज़ पहनी थी, उसका दिमाग़ ख़राब हो गया । उसने ज़मीन पर पड़ा एक पत्थर उठाया और कौवे को गाली देते हुए उसकी ओर निशाना साधकर चला दिया । कौवे को पत्थर तो क्या लगना था लेकिन आहट मात्र से वह काँव काँव करता हुआ उड़ गया ।

आर्य सर ने मुस्कुराते हुए कहा “ भाई तुम्हारा निशाना तो अभी भी आदिम मानव के निशाने जैसा नहीं बन पाया है । कुछ लाख साल पहले पैदा हुए होते तो अब तक तुम्हारा पत्थर खाकर कौवा ज़मीन पर आ गिरा होता । " अजय अपनी निशानेबाजी की निंदा सुनने को तैयार नहीं था " सर ,पत्थर से निशाना ठीक कहाँ लगता है , बन्दूक होती तो अच्छा मज़ा चखाता इस बदमाश कौवे को । वैसे बचपन में गुलेल से भी बढ़िया निशाना लगाना मुझे आता था ।" अजय की बात सुनते ही अशोक को छेड़खानी सूझने लगी .." होता है भाई होता है वीर अर्जुन, शादी के बाद निशाना थोड़ा बिगड़ ही जाता है और टारगेट भी बदल जाता है उसके बाद चिड़िया की आँख नहीं दिखाई देती सिर्फ ..। इससे पहले कि अशोक कुछ और कहता रवींद्र ने सर से सवाल किया ।" सर, लेकिन जब प्रारम्भिक मानव पत्थर चलाना सीख गया था और उससे बढ़िया निशाना भी लगा लेता था तो फिर उसे हथियार बनाने की ज़रूरत क्यों आन पड़ी ?" उसके मस्तिष्क में कुछ और ही चल रहा था ।

सर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया " शिकारी अवस्था का यह मनुष्य पत्थरों का उपयोग करना तो बेहतर सीख गया था और यह भी उसे पता था कि पत्थर उठाकर फेंकने से जानवर भाग जाते हैं लेकिन शिकार के लिए इतना नाकाफ़ी था । छोटे मोटे पंछियों का तो पत्थर मारकर शिकार किया जा सकता था लेकिन बड़े जानवरों के लिए तो बड़े हथियार चाहिए थे । अब तक वे लोग सामूहिक रूप से बड़े जानवरों को घेर कर उनका शिकार करना भी ठीक से नहीं सीख पाए थे । दरअसल पत्थरों से औजारों और हथियारों के निर्माण की भी एक कहानी है।"

"तो फिर सुनाइये न सर " रवींद्र ने आग्रह किया और हम लोगों को इशारा करते हुए अपनी चाल धीमी कर दी । सर भी हम लोगों के साथ धीमे धीमे चलने लगे .." पत्थरों को चलाते हुए उसके दिमाग़ में यह ख़याल आया कि इनका कुछ और बेहतर उपयोग भी किया जा सकता है । उसने पत्थर पर पत्थर पटककर उसकी खपच्चियाँ निकालनी शुरु कीं । गुफाओं में पुरातत्ववेत्ताओं को चकमक पत्थर से बने भद्दे टाइप के कुछ चाकू मिले हैं जिन्हें देखकर ज्ञात होता है कि प्रागैतिहासिक मनुष्य इन चाकुओं का उपयोग पशुओं को चीरने, उनकी हड्डियों से मांस अलग करने तथा हड्डी के भीतर का गूदा निकालने के लिए करता था । प्राचीन निक्षेपों में या तलछटों में पुरातत्ववेत्ताओं को मानव आवास के प्रमाण मिलते हैं इनमें कोयला, राख, चिटकी हुई हड्डियाँ तथा हड्डी और चकमक से बने औज़ार शामिल हैं ।"

"हाँ सर " अजय को अचानक कुछ याद आया "हमने इन्हें संग्रहालय में देखा है, काँच के शो केस में यह पत्थर के खपच्चियों जैसे टुकड़े रखे रहते हैं। लेकिन उन्हें देखकर लगता ही नहीं है कि यह आदिम मानव के औज़ार हो सकते हैं ?" "बिलकुल ठीक ।" आर्य सर ने कहा " देखने में यह औज़ार पत्थर की खपच्चियों जैसे ही लगते हैं किन्तु इन्हें ध्यान से देखने पर पता चलता है कि इनका एक हिस्सा चाकू जैसा धारदार है, वहीं किसी अन्य का तेज़ नोकदार । गुफाओं में वह निहाई भी मिली है जिस पर रखकर औज़ार बनाये जाते थे और वह पत्थर का हथौड़ा भी जिससे पत्थरों पर चोट की जाती थी । पुरानी परतों की अपेक्षा नई परतों में अपेक्षाकृत उन्नत औज़ार मिलते हैं । एक पुरातत्ववेत्ता इसका यह अर्थ निकालता है कि मानव की एक से अधिक पीढियां यहाँ रह चुकी हैं । जैसे पुराने बाशिंदे छीलने, खुरचने, काटने, या छेद करने के लिए एक ही प्रकार के औज़ार का इस्तेमाल करते थे जबकि नए बाशिंदे हर काम के लिए अलग - अलग औज़ार काम में लाते थे ।"

“ हाँ सर .. “ मैंने कहा जैसे बढ़ई के पास पहले छीलने के लिए सिर्फ बसूला होता था अब तो चौरसी, रुखानी,रंधा और अन्य औज़ार हैं ।“ “बिलकुल ठीक ।“ आर्य सर ने कहा ..” यह मनुष्य के बस की ही बात है कि वह अपने अंगों से अलग नए औजारों का आविष्कार करता है ।" "अपने अंगों से अलग माने ?" रवींद्र का सवाल था ।"भाई, अपने अंगों के औज़ार तो दांत और नाखून होते हैं ना जैसे कि पशुओं के पास होते हैं लेकिन मानव ने अपनी बुद्धि से इनके अलावा भी बाहरी औज़ार बनाये । इस तरह वह पशुओं से अलग हो गया । जैसे जैसे मौसम ठंडा होता गया उसे शरीर को बचाने के लिए बेहतर खाल की आवश्यकता महसूस हुई । फिर सर्दियों में वह बाहर शिकार नहीं कर सकता था इसलिए भोजन के भण्डार की आवश्यकता भी महसूस हुई इसके अलावा रहने के लिए भी उसे गर्म जगह तलाशनी होती थी । इस तरह अब उसके पास काम भी बढ़ गया था और परेशानियाँ भी । “

“ लेकिन सर वह ठण्ड से बचने के लिए खाल पहनता था इसके प्रमाण तो नहीं मिल पाए हैं ? “ अजय का सवाल वाजिब था । “ सही है ।" सर ने कहा “ यह समय बहुत बेरहम है, इसने केवल वही चीज़ें सुरक्षित रखीं जो पत्थर या हड्डी की बनी थीं, लकड़ी या जानवरों की ख़ाल से बनी वस्तुओं का क्षरण होता गया और वे समय के साथ नष्ट हो गईं, इसीलिए हमें चकमक पत्थर की बनी अनी तो प्राप्त होती है किन्तु उसका लकड़ी का बना वह दस्ता नहीं मिलता जिसमे उसे फिट किया जाता था ।"

"लेकिन सर" अजय ने अपना हाथ खड़ा किया " पत्थर मारकर वह जानवर तो भगा सकता था लेकिन इस छोटे छोटे पत्थरों से वह शिकार कैसे करता होगा ? क्या बहुत से लोग एक साथ बड़े जानवर पर पत्थर चलाते थे ? " सर मुस्कुराये " हाँ हो सकता है प्रारम्भिक दिनों में शिकार करने की यही विधि रही हो । फिर उसने सोचा काश कोई ऐसी वस्तु होती जो एक बार में ही शिकार का काम तमाम कर सके इसलिए उसने पत्थर को छीलकर छोटे चकमक पत्थर से धारदार अनी बनाई और उसे सूखी लकड़ी या टहनी पर लता, बेल या जूट के सहारे बांधकर भाले नुमा एक वस्तु बनाई । इसका उपयोग वह बड़े जानवरों के शिकार के लिए करने लगा । प्रारंभिक हथियारों और औजारों के आविष्कार की कहानी भी यही है ।“

“ लेकिन भाले से भी मैंमथ, बाइसन, गैन्डे या हिरन जैसे जानवर का शिकार करना तो मुश्किल होता होगा ना ? “ रवींद्र के दिमाग़ में उस आदिम मनुष्य द्वारा भाले से शिकार करने का दृश्य कौंध रहा था । “ आज का इंसान तो बगैर बंदूक के शिकार कर ही नहीं सकता । “ “ बंदूक ? “ आर्य सर ने कहा । “ अब तो शिकार पर ही प्रतिबंध है भाई । वैसे भी इंसान ने इतने जानवर मारे हैं कि कई प्रजातियाँ तो शिकार के कारण ही दुर्लभ हो गई हैं । लेकिन कृषि अवस्था से लाखों साल पहले के इस आदिम मनुष्य के ज़िन्दा रहने के लिए शिकार ज़रूरी था । कंदमूल फल आदि से उसका पेट कहाँ भर पाता था इसलिए जानवरों को मार कर खाना उसकी मज़बूरी थी । फिर छोटे छोटे शिकार से भी उसका काम नहीं चलता था वह तो एक दिन में ही समाप्त हो जाता था । हाँ एक मैमथ या हाथी जैसा बड़ा शिकार उसके लिए कई दिनों का भोजन होता था ।"

"लेकिन सर.." अजय ने फिर हाथ खड़ा किया " सही है कि आज का आदमी बिना बंदूक के शिकार नहीं कर सकता लेकिन वह बेचारा आदिम मानव सिर्फ भाले से और अकेले इतना बड़ा शिकार कैसे करता होगा ?" आर्य सर हम लोगों के मन में उभरते प्रश्नों को समझ रहे थे .."बिलकुल.. अकेले ही बड़े प्राणियों का शिकार करना उसके लिए असंभव था इसलिए वह समूह में शिकार करता था । इसकी भी एक ट्रिक थी । हाथी या मैमथ जैसे विशालकाय और शक्तिशाली जानवर को दलदल के निकट वे सब लोग मिलकर तीन ओर से घेर लेते थे , तत्पश्चात सूखी घास में आग लगा देते थे । मैमथ डर कर भागता था, जब आग से उसकी खाल झुलसने लगती तो वह उस दिशा में भागता जिधर कोई मनुष्य नहीं होता था लेकिन उस ओर दलदल होता था । अंततः वह दलदल में फँस जाता तब उस पर बल्लम और भालों से वार किया जाता । फिर उसे खींचकर किनारे पर लाया जाता और छोटे औजारों से उसकी खाल निकाल ली जाती और माँस के छोटे-छोटे टुकड़े किए जाते । “

“वाह, गज़ब की ट्रिक थी ..तब तो कई दिनों की दावत का इंतज़ाम हो जाता होगा ।“ अजय ने कहा । “हाँ ।“ सर ने कहा “लेकिन इतने विशालकाय प्राणी को डेरे तक ले जाना मुश्किल काम था । अब कोई क्रेन जैसी चीज़ तो थी नहीं उसके पास इसलिए मानव शिकार स्थल पर ही उसके कई टुकड़े कर देता था, ऐसे टुकड़ों- टुकड़ों में उसे अपने आवास तक ले जाना उसके लिए आसान होता था । उसी तरह तेजी से भागने वाले हिरण जैसे छोटे-मोटे प्राणियों का शिकार भी वह उन्हें समूह के साथ घेरकर ही करता था ।“ “ और वह घोड़े का शिकार भी अद्भुत तरीके से करता था ना सर ?" मैंने सर से सवाल किया । "मैंने कहीं पढ़ा है फ्रांस में किसी जगह एक खड़ी चट्टान के पास लगभग एक लाख घोड़ों के अवशेष मिले हैं ।"

“ अरे वह तो अद्भुत शिकार कथा है । “ सर ने कहा । “ उन दिनों जंगलों में घोड़े बड़े बड़े झुंड में रहा करते थे । घोड़ों का शिकार करने का इच्छुक यह मानव समूह अपने नेजों से लैस होकर चुपचाप उन तक पहुँचता था और उन्हें तीन ओर से घेर लेता था । यहाँ भी वही ट्रिक थी लेकिन चौथी ओर दलदल नहीं था । जब घोड़े तीन ओर से घिर जाते तो उन्हें सिर्फ एक ही रास्ता दिखाई देता जिस ओर मनुष्य नहीं होते थे । यह रास्ता एक ऊँची चट्टान की ओर जाता था जिसके बाद एक बड़ी सी खाई थी , घोड़े डर कर भागते और सीधे उस चट्टान पर जा पहुँचते । अब घोड़ों में इतनी सेन्स तो डेवलप हो गई ही थी कि खाई में नहीं कूदना है । पहला घोड़ा खाई देखकर रुकता लेकिन पीछे वाला उसे धक्का मारता और फिर एक के पीछे एक आने वाले तमाम घोड़े उस ऊँची चट्टान से नीचे गिरते जाते और मरते जाते ठीक उसी तरह जैसे की ऊँचाई से पानी की धार नीचे गिरती है । “

“वाह , घोड़ों का एक के बाद एक पहाड़ से खाई में गिरते जाने का क्या अद्भुत दृश्य होता होगा ना ?“ राममिलन भैया ने कहा । “ ऊ जगह का नाम तो घोड़ाप्रपात रखना चाहिए । “ हम लोग ठहाका मार कर हँस पड़े । सर ने मुस्कुराते हुए कहा “ भाई अपने देश में यह जगह होती तो हम ज़रूर उसका यह नाम रख देते लेकिन वह तो फ्रांस में है । बहरहाल औज़ारों के निर्माण की कहानी यही है कि इस तरह शिकार के लिए यह औज़ार ही उसके काम आए । इन प्रागैतिहासिक औज़ारों में दो प्रकार के औज़ार सबसे ज़्यादा मिलते हैं, चकमक पत्थर का एक तिकोना औज़ार जिसमें दो तरफ़ से धार होती है और एक अर्धचन्द्राकार औज़ार जिसमें आधे गोले के आकार में धार होती है । मतलब यह समझ लो जैसे आज के हमारे दो तरफ धार वाले चाकू और एक तरफ धार वाला हंसिया ।“

“ फिर उसने धनुष बाण का अविष्कार कब किया और उसे इसकी ज़रूरत कैसे महसूस हुई ? “ अजय आज प्रागैतिहासिक मानव की पूरी हथियार शाला के बारे में जान लेने के लिए उत्सुक दिखाई दे रहा था । आर्य सर फिर मुस्कुराने लगे …”तुमने अगर बचपन के खेल में बांस की किमची से धनुष बाण बनाया होगा और उसे चलाया होगा तो इस बात को शीघ्र समझ जाओगे । हुआ यह कि इस मानव ने भाले का अविष्कार तो कर लिया और रीछ या अन्य जानवरों का शिकार भी वह इनसे कर लेता था, जैसे रीछ सामने आता और जैसे ही हमला करने के लिए अपने पिछले दो पाँवो पर खड़ा होता मनुष्य उस के सीने पर भाले से वार करता अगर निशाना लग गया तो ठीक वरना उसका मारा जाना निश्चित हो जाता यानि भालू ही उसका काम तमाम कर देता ।"

"हा हा हा ..मतलब शिकार करने को आये थे और खुद शिकार हो के चले । "अजय की बात पर सर के ज़ोरदार ठहाके में हम लोगों के ठहाके भी शामिल हो गये । "हालाँकि ऐसा कम होता था ।" सर ने हँसी रुकने के बाद कहा " अनेक अनुभवों के बाद मनुष्य की समझ में यह बात आ गई कि छोटे मोटे अहिंसक प्राणियों के शिकार के लिए निकलते हुए भी भालू जैसे बड़े हिंसक प्राणी मिल सकते हैं इसलिए उन दिनों मनुष्य अकेले शिकार पर निकलने की बजाय अक्सर समूह में शिकार के लिए निकलता था और भालू के सामने आने पर एक व्यक्ति के असफल होने पर दूसरा उसे तुरंत भाले से मार देता था । “ " ऐसा है अजयवा ..मान लो अगर गब्बरसिंह से बच भी गया तो समझ लो साम्भा उसे मार देता था ।" किशोर भैया आज बहुत मस्त मूड में थे । "लो गब्बरसिंह से भी बचा है कोई ? कालिया ने तो उसका नमक खाया था फिर भी उसे बचने का कोई चांस नहीं मिला ।" अजय ने रियल स्टोरी बताई ।

हम लोग तम्बू से ट्रेंच तक का रास्ता तय कर चुके थे और निखात के पास ही खड़े थे । ऐसा लग रहा था आगे की स्टोरी का पाठ अब शाम को ही संभव होगा लेकिन मजदूर अभी पहुँचे नहीं थे और काम शुरू करने में कुछ विलम्ब था । “तो मतलब रीछ को मारने के लिए उसने धनुष बाण का अविष्कार नहीं किया ?“ अजय ने हथियारों की निर्माण कथा की बिछड़ी कड़ी को फिरसे जोड़ते हुए कहा । “ बता रहा हूँ भाई । इसके लिए भी आवश्यकता और आविष्कार का सिद्धांत लागू होता है ।“ सर ने कहा । “ कालांतर में रीछ जैसे भारी भरकम व सुस्त प्राणि संख्या में कम होते गए तथा तेज़ दौड़ने वाले घोड़े, हिरन जैसे प्राणियों में वृद्धि होती गई । इन द्रुतगामी प्राणियों हेतु भाले जैसा अस्त्र पर्याप्त नहीं था क्योंकि जब तक मनुष्य फेंकने के लिए भाला उठाता वे प्राणि भाग जाते और उसकी पहुँच से बाहर हो जाते अत: उसे एक ऐसे अस्त्र की आवश्यकता महसूस हुई जो इन प्राणियों का पीछा कर सके और इन्हें मार गिराए । “

“ और इसके लिए उसने बाँस पर रस्सी बांधकर धनुष्य बनाया । “ अजय ने कहानी पर द ऐन्ड लगा दिया । “ नहीं इतना भी आसान नहीं था यह । “ आर्य सर ने कहा । वह हज़ारों साल तक दिमाग़ लगाता रहा । उसे एक ऐसी वस्तु चाहिए थी जो हाथ की अपेक्षा अधिक गति से और अधिक दूर तक उसके भाले को फेंक सके । लचीली टहनी के मुड़ने और मुड़कर सीधे हो जाने की ताकत से वह वाकिफ़ था । इस ताकत का उपयोग उसने धनुष बनाने के लिए किया । एक पतली डाल के दोनों सिरों पर उसने रस्सी जैसी लता या बेल बांधी और उसे धनुष का आकार दिया और एक छोटी टहनी को उसमे फंसाकर उसे कुछ दूर तक फेंका । लेकिन भाले जैसी वज़नी वस्तु को फेकने के लिए वह नाकाफ़ी थी । सो उसे छोटे आकार के भाले बनाने का विचार आया , छोटे साइज़ का भाला बनाने के लिए उसे छोटी लकड़ी और छोटी अनी चाहिए थे इसलिए उसने चकमक पत्थर के औज़ार से छीलकर बारहसिंगे के सींग या मैमथ के दाँत से एक नोकदार वस्तु बनाई और उसे एक छोटी टहनी पर बांधकर तीर बनाया । “

“ हम लोग भी बचपन में ऐसे तीर कमान बनाते थे …” अजय को अचानक अपना बचपन याद आ गया । “ और बाँस की किमची को चाकू से छीलकर तीर की नोक बनाते थे या एक टीन के टुकड़े को मोड़ कर उसकी नोक बनाते थे फिर वह किसीको चुभे नहीं इसलिए उस पर डामर लगा देते थे । और यह सब हम दस मिनट में कर लेते थे । “ “ ठीक है भाई , “ सर ने कहा “ तुम दस मिनट में इसलिए कर लेते थे कि हमारे पूर्वजों ने यह तकनीक ईज़ाद की थी लेकिन इसके लिए उन्हें कई हज़ार साल लगे । “

"सर एक सवाल रह गया ।"अशोक को काफी देर बाद बोलने का अवसर मिला था ।"आप इन्हें कभी औज़ार कहते हैं कभी हथियार कहते हैं तो इन दोनों में क्या फ़र्क है ? "मैं सोच ही रहा था कि किसी के मन में यह सवाल क्यों नहीं आया ।"सर ने प्रशंसात्मक भाव से अशोक की ओर देखा । "वास्तव में आदिम मनुष्य के लिए यह एक जैसे ही थे, वह चकमक पत्थर का ही हथौड़ा बनाता था, यह उसका औज़ार हुआ । फिर उसे दूसरे पत्थर पर पटककर खपच्चियाँ निकालता था जिनसे वह छीलने काटने आदि का काम लेता था लेकिन फिर उन्ही खपच्चियों में से किसी धारदार खपच्ची का वह तीर की अनी की जगह उपयोग करता था तो वह उसका हथियार हुआ । इस तरह सब कुछ मिला जुला था , बाद में भाला या नेजा और तीर अपने आप में एक सम्पूर्ण हथियार बन गया ।"

“फिर आदिम मानव द्वारा बनाया गया वह तीर हज़ारों साल तक धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ता रहा और युगों युगों को पार करता रहा और बन्दूक की गोली में परिवर्तित होते हुए अंत में मिसाइल और परमाणु बम में परिवर्तित हो गया । “ रवींद्र ने अपना एक्सपर्ट कमेंट दिया । “लेकिन इनमें अंतर है भाई ।“ सर ने रवींद्र की इस बात पर हम लोगों के साथ ताली बजाते हुए कहा । “ वह आदिम मनुष्य इन हथियारों का उपयोग शिकार करने के लिए या अपना पेट भरने के लिए करता था और आज का यह मनुष्य इनका उपयोग मनुष्य की हत्या करने के लिए करता है ।"

विमर्श का नया विषय हम लोगों के सामने उपस्थित हो चुका था लेकिन इस बीच मजदूरों का आना भी प्रारम्भ हो चुका था । आज काम में वैसे ही देर हो गई थी इसलिए बतकही के बीच ही इस विमर्श का होना संभव प्रतीत हो रहा था । आर्य सर भी मजदूरों के पास पहुँचकर उनसे बातचीत में मशगूल हो गए थे ।



*शरद कोकास*

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