📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘
✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼
*पिछले भाग में आपने पढ़ा आदिम मातृसत्तात्मक समाज , स्त्रियों की स्थिति कृषि और पशुपालन में उनकी भागीदारी आदि के बारे में । साथ ही पढ़ा कि प्राचीन समय में विवाह की क्या क्या पद्धतियाँ थीं और कितने तरह के विवाह हुआ करते थे। इनका रोचक वर्णन ।आज इन छात्रों का अंतिम दिन है और वे अपने प्रशिक्षण शिविर से वापस जा रहे हैं आज उन्हें मजदूरों से मिलने उनके गाँव भी जाना है सभी लोग भावुक हो गए हैं विदाई की इस बेला में।*
📒📒📒📒📒
*भाग 50*
उसकी आँखों मे चम्बल की उदासी थी
सुबह सुबह हाजिरी रजिस्टर पर अपने दस्तख़त कर हमारे सपनों के वापस जाने का समय हुआ ही था कि डॉ वाकणकर की आवाज़ सुनाई दी "उठो रे सज्जनों ।" सर भीतर आ गए थे । हमने मिचमिचाती आँखों से सर का स्वागत किया ।"आज तुम लोगों की परीक्षा होगी ।" सर के मुँह से निकला आज का यही पहला वाकया था । "क्यों सर ?" अशोक ने आँखें मिचमिचाते हुए पूछा । "बस हो गया, वापस नहीं जाना है क्या, या यहीं रहोगे ?" सर का जवाब था या सवाल हमें कुछ समझ में नहीं आया । बस इतना समझ गए कि हम लोगों की विदाई का दिन आ गया है । "सर लेकिन अभी तो एक महीना भी पूरा नहीं हुआ है । अजय ने झिझकते हुए कहा ।"क्यों कितने दिन हो गए ?" सर ने पूछा । सब ने मेरी ओर देखा । रवीन्द्र ने कहा "सर यह इसे ही मालूम है रोज डायरी लिखता है तो दिनों का हिसाब भी यही रखता है ।" मैंने सर से कहा "सर, आज छब्बीसवां दिन है ।" सर ने कहा "तो बस समझो हो गया पूरा महिना । आज की रात और यहाँ बिता लो.. कल जीप आयेगी उससे तुम लोग रवाना हो जाना ।" हम लोग क्या कह सकते थे.. सर का आदेश था ।
"अभी चलो फटाफट तैयार हो जाओ । आज मैं तुम लोगों की ट्रेंच पर आऊंगा देखते हैं इतने दिनों में तुम लोगों ने क्या क्या किया ।" सर ने हम लोगों को पसोपेश से उबारते हुए कहा । अशोक सर के कहने का आशय समझने में असमर्थ था "सर, वह रोज का तो विवरण आर्य सर लिख ही लेते हैं ।" सर ने मुस्कुराते हुए कहा "वह तो मुझे भी पता है । लेकिन कुछ दिमाग़ में भी तुम लोगों ने लिखा है या नहीं इसके लिए आज तुम लोगों की मौखिक परीक्षा होगी ।" सर को मुस्कुराते देख मेरा हौसला थोड़ा बढ़ा "सर मौखिक परीक्षा भी तो आप रोज ले ही लेते है फिर...।" सर ने अपनी बात स्पष्ट की "भाई वह तो मैं तुम लोगों से पूछ ही लेता हूँ और मुझे पता है कि तुम लोगों के ज्ञान में पर्याप्त वृद्धि हो चुकी है, लेकिन तुम लोगों को एक प्रमाणपत्र भी तो देना है मुझे कि तुम लोगों ने यहाँ एक माह तक मेरे निर्देशन में एक पुरातत्ववेत्ता की तरह काम किया है सो उसके लिए यह औपचारिकता तो पूरी करनी होगी ना ।" "ठीक है सर ।" मेरी उलझन दूर हो चुकी थी । हम लोग उठे और घाट की और चल दिए ।
सच तो यह था कि विदाई के बारे में सुनकर ही हम लोग बहुत उदास हो गए थे । शुरू शुरू में अवश्य यहाँ का वातावरण हमें रास नहीं आया था और हम लोगों को यहाँ अच्छा नहीं लगता था लेकिन अब धीरे धीरे इस काम में आनंद आने लगा था । ऐसा लग रहा था कि हम लोग आम लोगों से अलग एक विशिष्ट ज़िंदगी जी रहे हैं । एक ऐसी ज़िन्दगी जो बहुत कम लोगों को मिलती है । हम यही सोच रहे थे कि अगर हमारे जीवन में यह समय नहीं आता तो शायद हम लोगों का जीवन भी देश के उन तमाम युवाओं की तरह होता जो केवल पाठ्य पुस्तकों में लिखी बातें पढ़ते हैं और फिर जीवन भर उसी के अनुसार संसार में घटित होने वाली घटनाओं को देखते हैं । उनके भीतर न इतिहास बोध पैदा होता है न वैज्ञानिक दृष्टिकोण । न वे इंसान की कहानी जान पाते हैं न उसका अतीत सो अपने भविष्य को भी वे उसी तरह देखते हैं ।
ट्रेंच पर पहुँचकर जैसे ही हम लोगों ने घोषणा की कि आज हम लोगों का यहाँ अंतिम दिन है और कल हम लोग यहाँ से चले जायेंगे सारे मजदूर उदास हो गए । मागो मेरे पास आई और शिकायत के लहज़े में कहने लगी "साहब आप हमारे यहाँ नहीं आये न .." मुझे कुछ नहीं सूझा कि उससे क्या कहूँ वादा तो मैं कर चुका था और अपनी वादाखिलाफ़ी पर चुप्पी के अलावा मेरे पास कोई उत्तर न था । लेकिन मुझे इस चुप्पी से रवींद्र ने उबार लिया "अरे तो क्या हुआ अबकी बार नहीं आये तो क्या हुआ, परीक्षा के बाद यहाँ फिर से आ जायेंगे तब ज़रूर तुम्हारे यहाँ आ जायेंगे ।" मैंने रवीन्द्र की ओर देखा, उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी ।
इतने में एक मजदूर हमारे पास आया और कहने लगा "ऐसे नहीं चलेगा साहब, दोबारा पता नहीं आप लोग आओ या नहीं आओ । आज तो आप लोगों को शाम को हमारे साथ हमारे गाँव चलना ही पड़ेगा ।" मैंने उसे टालने के लिए कहा "और कोई दिन होता तो ज़रूर चलते और किसी गुरूवार को चलते तो तुम लोगों के गाँव का बाज़ार भी देख लेते । उस दिन तो तुम लोगों की छुट्टी भी रहती है ।" उस मजदूर ने कहा "लेकिन साहब गुरूवार में तो अभी बहुत टेम है । आप लोग तो कल ही चले जाओगे फिर कब आओगे ।" फिर उसने जिद करते हुए कहा "कुछ नहीं सर, आज ही चलेंगे हम डाक्टर साब से कह देंगे कि आज हम लोग साहब लोगों को अपने गाँव ले जाना चाहते हैं सो हमें जल्दी छुट्टी दे दें ।" "ठीक है भाई जैसी तुम लोगों की इच्छा ।" मैंने कहा । मैंने कनखियों से देखा मागो की आँखों में ख़ुशी की रंगत थी ।
दोपहर में सर जैसे ही ट्रेंच पर पहुँचे सबसे पहले मजदूर लोग उनके पास पहुँच गए । "डाक्टर साब आज हम लोगों को जल्दी छुट्टी चाहिए ।" "क्यों भाई आज ऐसी क्या बात है ?" सर ने पूछा । उसने कहा "सर आज हम सब लोगों को गाँव ले जाना चाहते है आप भी हम लोगों के साथ चलिए । यह लोग तो कल चले जायेंगे रवीन्द्र भैया लोग ।" सर हम लोगों की ओर मुख़ातिब हुए "क्यों भाई इन लोगों के गाँव जाना है क्या ?" अशोक ने कहा "हाँ सर, हम लोगों ने इनके गाँव जाने का वादा किया था सो जाना ही पड़ेगा ।" "ठीक है ।" सर ने कहा "आज खाना खाने के बाद तुम लोगों की छुट्टी ।" "लेकिन सर.." उस मजदूर ने कहा "इन्हें लेकर तो हमी लोग जायेंगे ?" "हाँ भाई तुम लोगों की भी छुट्टी ।" सर ने अनुमति देते हुए कहा । "हुर्रे..." अजय ख़ुशी से उछल पड़ा । उसके बाद सर ने हम लोगों से ट्रेंच और उत्खनन संबंधी अनेक प्रश्न पूछे । हम सभी ने बहुत तत्परता से उनके जवाब दिए । सर ने प्रसन्न होकर कहा "बिलकुल ठीक, तुम लोग परीक्षा में पास हुए । उज्जैन पहुँचते ही तुम लोगों को इस पुरातात्विक प्रशिक्षण शिविर का प्रमाणपत्र मिल जाएगा ।"
खाना खाकर हम लोग तुरंत ट्रेंच पर आ गए और मजदूरों को उस दिन का काम समाप्त करने और उपकरण आदि उठाकर रखने में मदद की । हम सब लोग जाने के लिए तैयार हो गए । हमें नदी पार करके उनके गाँव जाना था । यह बात तो हमें पहले से ही बता दी गई थी कि नदी के बीच में घुटने से अधिक पानी है । हम लोगों ने नदी में उतरने से पहले अपने जूते निकालकर हाथ में ले लिए और पैंट को घुटनों से ऊपर तक मोड़ लिया । सारे लोग नदी में उतर गए । सबके भीतर बहुत उत्साह भरा था । मागो सबसे पीछे रह गई थी और मैं सब लोगों को आगे जाते हुए देख रहा था । मैंने उससे पूछा "चलना नहीं है क्या ?" उसने कहा "मैं तो आपके लिए रुकी हूँ ।" "चलो ।" मैंने कहा । वह नदी में उतरी और उसने मेरी ओर हाथ बढ़ाया । मैं एक हाथ में जूते पकडे हुए था । उसने हाथ बढ़कर मेरे जूते थामने चाहे, मैंने मना कर दिया । फिर हम लोग नदी में उतरकर पार जाने लगे ।
"रोज इतनी बड़ी नदी पार कर आते थे तुम लोग ?" मैंने मागो से कहा । "हाँ साब, मज़बूरी है ।" उसकी आँखों में रोजी रोटी की विवशता का बिम्ब था । रास्ते में मैं जरा सा लडखडाया तो उसने झट से मेरा कन्धा थाम लिया । थोड़ी देर में ही हम लोग नदी के दूसरे किनारे जा पहुँचे । सभी लोग हमसे पहले पहुँच चुके थे और नदी के तट पर खड़े थे । रवीन्द्र मेरी ओर देख रहा था । जैसे ही मागो ने देखा कि सभी लोग मुस्कुराते हुए हमारी ओर देख रहे हैं उसने शरमाकर झट से मेरा हाथ छोड़ दिया । मजदूरों के आगे बढ़ते ही सारे मित्र उनके साथ गाँव के भीतर प्रवेश कर गए । रवीन्द्र ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा .. "यार हाथ तो ज़िंदगी भर के लिए थामा जाता है तूने काहे छोड़ दिया .." मैंने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा । मैं कहना चाहता था कि हाथ मैंने नहीं थामा था ,हाथ तो उसने थामा था, लेकिन मेरे मुँह से कोई बोल नहीं निकले ।
हम लोगों के गाँव के भीतर पहुँचते ही गाँव में उत्सव जैसा माहौल हो गया था । हम लोगों के निकलने से काफी पहले ही मजदूरों ने अपने एक साथी को गाँव भेज दिया था सो हम लोगों के स्वागत की तैयारियां पहले से ही शुरू हो गई थीं । अब हमें एक एक मजदूर के घर जाना था । हर घर में हमारे लिये कुछ न कुछ नाश्ते का इंतजाम था । हमारी शुरुआत भूषण के घर से हुई । फिर तो समझो खाने के लिए एक से एक पकवान हमें मिलने लगे । मागो हर घर में हमारे साथ जा रही थी । उसके घर सबसे अंत में था इसलिए वहाँ हमें सबसे बाद में जाना था । लेकिन उससे रहा नहीं जा रहा था इस बीच शाम ढलने लगी थी और हमें वापस भी लौटना था । उसे लगा कि हम लोग उसके घर तक शायद ही जा पाएंगे सो उसने बीच में ही मुझसे कहा "साहब आपको तो सबसे पहले मैंने न्योता दिया था आपको तो मेरे ही घर आना था ।" मैं समझ गया कि मुझसे कहीं चूक हो रही है । मैं ने उससे कहा "चलो.." और हम दोनों सबके बीच से चुपचाप निकल पड़े । जाते हुए मैंने रवीन्द्र से बस इतना कहा कि "आता हूँ.." रवीन्द्र मुस्कुराया और कहा "जा मुन्ना जा .."
गाँव की अँधेरी गलियों में मागो मेरा हाथ थामकर मुझे अपने घर ले जा रही थी । इस अल्हड़ युवती को इतना भी भय नहीं था कि कोई देखेगा तो क्या कहेगा । ऐसा लग रहा था कि उसके जीवन का बस यही एक ध्येय हो कि मुझे अपने घर ले जाना है । उसके घर में प्रवेश करते ही मैं चौंक गया । टिमटिमाती हुई ढिबरी के प्रकाश में भी उसके घर की विपन्नता साफ़ दिखाई दे रही थी । उसकी बूढ़ी माँ ज़मीन पर बैठी हुई थी और उसकी सद्यप्रसूता बहन खाट पर लेटी हुई थी । पास ही उसका नवजात शिशु सो रहा था । "बस इतने ही लोग हैं हम ।" उसने कहा । "और पिताजी ?" मैंने पूछा । "नहीं हैं.." उसकी आवाज़ से दुःख साफ़ झलक रहा था । "ओह सॉरी.." शहरी संवेदना के तहत मेरे मुँह से निकला ।
वह एक पल के लिए उदास हो गई । फिर उसने हँसते हुए पूछा "क्या खाओगे साब ? मैंने कहा "कुछ नहीं.. सब लोगों के घर कुछ न कुछ खाकर अब मेरे पेट में जगह ही नहीं बची है । "नहीं ऐसे नहीं चलेगा, कुछ तो लेना ही पड़ेगा ।" कहकर वह रसोई में गई और मेरे लिए घर की ही बनी कोई मिठाई लेकर आ गई । मैंने एक टुकड़ा मुँह में रखा .."बहुत अच्छी है .." "आप सच में चले जाओगे साहब ?" उसने कहा । मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था क्या जवाब दूँ । फिर भी मैंने कहा " हाँ जाना तो होगा " .. "मत जाओ.." कांपती हुई उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि उसमे आदेश था अनुरोध या असहायता कुछ स्पष्ट नहीं हो रहा था ।
इतने में तमाम मित्र मंडली वहाँ तक आ गई । मागो ने खुश होकर सबका स्वागत किया और माँ को बताया कि "साहब लोग हैं, हम लोग इन्ही के साथ साईट पर काम करते हैं ।" उसने सब लोगों को मिठाई खिलाई । "चलो भाई बहुत देर हो गई है, अब निकलें ।" राममिलन भैया की आवाज़ गूंजी । सब लोग घर से बाहर निकल गए । मैंने मागो की बहन के बच्चे के हाथ में दस का एक नोट पकड़ाया और मागो से कहा .."चलता हूँ .." उसने कुछ नहीं कहा । उसकी ऑंखें आंसुओं से डबडबा रही थीं । बाहर से रवीन्द्र की आवाज़ आई "शरद चलना नहीं है क्या, या यहीं रहना है..?" "आ रहा हूँ भाई । " मैंने कहा और घर से बाहर निकल गया । आगे चलकर मैंने पीछे पलटकर देखा मागो अपनी जगह पर खड़ी थी ।
मित्र लोग जाते हुए गाँव वालो से कह रहे थे .."भाइयों, हम लोग परीक्षा समाप्त होते ही फिर यहाँ आयेंगे । बहुत अच्छा लगा तुम लोगो के साथ । बहुत अच्छा समय गुजरा । हम लोग ज़रूर आयेंगे ...आदि आदि । लेकिन मैं जानता था कि सब झूठ कह रहे हैं... अब यहाँ कोई कभी नहीं आएगा । लौटते समय काफी अँधेरा हो चुका था । दो मजदूर हम लोगों के साथ हमें नदी पार करवाकर हमें शिविर तक छोड़ गए । लौटते समय चम्बल पहले से ज़्यादा उदास और दुखी लग रही थी ।
हम लोगों का पेट इतना भरा हुआ था कि भाटीजी के हाथों का भोजन चखने की कोई गुंजाईश नहीं थी फिर हम लोगों ने थोड़ा सा दाल चावल ग्रहण कर लिया ताकि रात में भूख न लगे । भोजन करने के बाद मैं सीधे आकर बिस्तर पर लेट गया । बाक़ी मित्र टहलने निकल गए थे । रवीन्द्र जल्दी ही लौट आया और आकर मेरे पास बैठ गया । उसने मेरा हाथ थामा और मुझसे कहा "यार मैं तो अब तक इसे मजाक में ही ले रहा था लेकिन मामला तो वाकई सीरियस है .. अब क्या करेगा तू ?" "क्या करना है .." मैंने कहा "भावनाएं अपनी जगह हैं और यथार्थ अपनी जगह .. बस कल वापस लौट जाना है ।
सुबह जब हम लोगों को ले जाने के लिए जीप आई हम लोग अपना बिस्तर बैग आदि लपेटकर पैकिंग करके तैयार थे । नाश्ता तो हमने भरपूर कर ही लिया था । भाटी जी ने लंच के लिए भी हम लोगों को आलू के पराठे पैक करके दे दिए थे इस हिदायत के साथ कि रात का इंतजाम तुम लोग खुद कर लेना । दस बज चुका था और ट्रेंच पर रोज की तरह काम की शुरुआत हो चुकी थी । मेरा मन हुआ एक बार ट्रेंच पर जाकर मागो से मिलकर आ जाऊं लेकिन मैंने अपने आप को रोक लिया । मुझे पता था आज वह काम पर नहीं आई होगी ।
कुछ ही देर में हम लोग उज्जैन पहुँच गए । अशोक, किशोर और राममिलन भैया घंटाघर पर उतर गए। मुझे रवींद्र और अजय को जीप ने हॉस्टल तक छोड़ दिया ।भर्तृहरि छात्रावास की सीढियाँ चढ़ते हुए मुझे दंगवाड़ा का वह टीला याद आने लगा । उस टीले पर रोज़ हम ट्रेंच में उतरते हुए अतीत की सीढ़ियों से नीचे उतरते थे लेकिन उसके विपरीत यह सीढियां मुझे मेरे भविष्य की ओर ले जा रही थीं, उस कमरे की ओर जहाँ रहकर मुझे पुरातत्व की पढाई करना है और भविष्य में एक इतिहासबोध से लैस और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सम्पन्न एक पुरातत्ववेत्ता बनना है ।
*शरद कोकास*
*******************

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें