सोमवार, 1 जून 2026

37- न मैं राजा दुष्यंत था न वह शकुंतला थी


फिर भी हम दोनों के बीच कुछ तो था ।। आइए जंगल मे मिलते हैं एक प्रेमकथा से 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा - पिछले भाग में आपने मानव की कहानी में पढ़ा कि मनुष्य पहले शिकार के लिए पत्थरों का उपयोग करता था लेकिन वह उसके लिए नाकाफ़ी था। फिर उसने चकमक पत्थर से अपने छीलने और काटने के औज़ार बनाये और उनकी सहायता से भाले और तीर की अनी बनाकर भाले और तीर का आविष्कार किया। आपने यह भी पढ़ा कि वह आदिम मनुष्य किस तरह से सामूहिकता में विश्वास रखता था और सामूहिक रूप से शिकार करता था। अब आगे पढ़िए आदिम मनुष्य की कहानी इन युवा पुरातत्ववेत्ताओं की जबानी ।*

 📒📒📒📒📒

*भाग 37*

*न मैं राजा दुष्यंत न वह शकुंतला*  

आज टीले पर सूरज भी अपने प्रखर तेज के साथ उपस्थित था । हम लोगों की लेटलतीफ़ी पर सुबह उसके चेहरे पर जो व्यंग्यात्मक मुस्कान दिखाई दे रही थी वह अब नहीं थी । फिर भी उसके चेहरे पर हमें यह भाव तो नज़र आ रहा था मानो वह कह रहा हो कि 

" मेरा क्या मैं तो अपने अस्त होने का समय होते ही चला जाऊँगा , तुम्हारी तुम जानो , काम का हर्जा तुम्हारा ही होगा ।" हमने भी सूरज के चैलेन्ज को स्वीकार किया और अपनी अपनी पोजीशन संभाल ली । अब तक सारे पर मज़दूर काम पर आ चुके थे । डॉ आर्य उनसे हालचाल पूछ रहे थे और उन्हें  आवश्यक निर्देश दे रहे थे । 

आज के श्येडूल में कल के उत्खनन कार्य की जो स्थिति थी उसी को आगे बढ़ाना दर्ज था । पास ही बंद पड़ी एक और ट्रेंच चिन्हांकित की गई थी, उस पर भी काम की शुरुआत करनी थी । डॉ आर्य ने वहाँ पहुँचकर उस ज़मीन की जाँच की । यह ट्रेंच एक गढ्ढे में थी और पिछले दिनों हुई बरसात की वज़ह से उसमें पानी भर गया था जो अब सूख चुका था ।

“इस पर अब कार्य प्रारंभ किया जा सकता है ।“ एक लम्बी लकड़ी से ज़मीन की सतह की कठोरता का परीक्षण करते हुए उन्होंने मज़दूरों पर नज़र डाली और पूछा “ अरे, आज हमारी मागो बिटिया नहीं आई ?“ 

एक महिला मज़दूर ने जवाब दिया “ साहब, उसकी बड़ी बहन को बेटा हुआ है । “ “ वाह ! यह तो बहुत अच्छी बात है । “ डॉ आर्य ने कहा …” मतलब अब हमें भी सोंठ के लड्डू खाने को मिलेंगे । “ फिर वे हम लोगों की ओर मुखातिब होकर बोले “ लो भई, आधुनिक मानव की प्रजाति में धरती पर एक मनुष्य और पैदा हो गया ।

रवींद्र ने कहा "धरती पर पैदा होने वाले पहले मनुष्य की परम्परा लगातार बढ़ती ही जा रही है ।" अजय ने तपाक से सवाल किया “ लेकिन सर, धार्मिक कथाओं में बताया जाता है कि इस धरती पर पहला इंसान पृथ्वी पर नहीं बल्कि स्वर्ग में पैदा हुआ था और उसका नाम आदम  था ? “

सर हँसने लगे …”भाई, यह सब धार्मिक कथायें हैं और अलग अलग सभ्यताओं और धर्मों की कथाओं में यही बताया जाता है कि हम सभी मनुष्य एक आदम या एक मनु की संतान हैं लेकिन वास्तविकता यह नहीं है । पुरातत्ववेत्ताओं को जो प्रमाण मिले हैं उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि मनुष्य एक स्थान पर नहीं बल्कि एक साथ कई स्थानों पर पैदा हुआ और उसके माता-पिता का एक ही जोड़ा नहीं था । “ 

राममिलन भैया ने धीरे से चुटकी ली .."ई बहुतै नीक हुआ नाही तो सब खाबिन्द औ जोरू आपस में भाई बहिन हो जाते और ई अजयवा की लुगाई उसकी बहन हो जाती ।" अजय तत्परता से आगे बढ़ा और उसने राममिलन भैया के चरण स्पर्श कर लिए ।

"अच्छा अब मजाक-वजाक छोडो और सब काम में लगो " सर ने आदेश देते हुए कहा " बुधराम और कन्हैया तुम लोग इस ट्रेंच में खुदाई शुरू करो , शरद, रवींद्र और अशोक यहाँ ऑब्जरवेशन के लिए रहेंगे । यशोदा यहाँ से मिटटी उठाकर  छलनी तक ले जायेगी । 

शर्मा जी आपकी और किशोर त्रिवेदी जी की ड्यूटी छन्नी पर है । अशोक और अजय तुम लोग उस बंद पड़ी ट्रेंच पर काम शुरू करवाओ, दो लोग यहाँ से ले लो, पहले पुराने नाप से उसे मिलाओ , डायरी देख लो उसमें दर्ज है , कितना हिस्सा पानी के साथ बह गया है उसे मिलान करके बताओ और एक बार सतह को फिर से चेक करो अगर एक दो इंच नीचे भी गीली मिटटी है तो उसे फिर कल ओपन करेंगे ।"

हमें इस बात की प्रसन्नता थी कि हम लोगों को अलाट की हुई इस ट्रेंच पर हम लोग सर के साथ रहेंगे । वाकणकर सर की उपस्थिति तो मुख्य ट्रेंच पर थी इसके अलावा उनके पास और भी बहुत सारे काम थे इसलिए वे हम लोगों की ट्रेंच पर समय नहीं दे पा रहे थे सो उनकी अनुपस्थिति में हम डॉ. सुरेन्द्र कुमार आर्य सर से ही ज्ञान प्राप्त कर रहे थे । 

वैसे भी आर्य सर हमारा एक पीरियड लेते थे और उम्र में कम होने के कारण उनसे हमारी बहुत पटती थी । बुधराम ने निखात के भीतर उतरकर निखात की मिट्टी को माथे से लगाया और धीरे धीरे कुदाल चलानी प्रारम्भ कर दी । हम लोगों की निग़ाह कुदाल की नोक पर जमी हुई थी क्या पता कुदाल के किस प्रहार पर हमें कोई नई चीज़ मिल जाए ।


रवींद्र के दिमाग़ में अभी भी धरती पर पैदा होने वाले पहले मानव के बारे में प्रश्न कौंध रहा था  “सर, प्रागैतिहासिक मनुष्य के सबसे पहले अवशेष तो दक्षिण अफ्रिका में मिले हैं तो क्या इस आधार पर उसे पहले मनुष्य का जन्मस्थान नहीं माना जा सकता ?“ 

आर्य सर ने कहा “ हाँ ,अब तक तो ऐसा ही माना जाता है । पिथेकेंथ्रोपस और साइननथ्रोपस के अवशेष तो एशिया में भी मिले हैं लेकिन हाइडलबर्ग मानव का जबड़ा यूरोप में जर्मनी में मिला है । हालाँकि इतने प्रमाण पर्याप्त नहीं हैं इसलिए हम मानव के जन्मस्थान का अध्ययन उसके द्वारा निर्मित औज़ारों से करते हैं जो पूरी दुनिया में पाए जाते हैं ।“ 

“सर , लेकिन हम पिथेकेंथ्रोपस को पूर्ण मानव कहाँ मानते हैं ?“ रवींद्र ने आशंका प्रकट की । “हाँ ।“ सर ने कहा । “मानव की यह एक लम्बी यात्रा है । यही मानव आगे चलकर नियंडरथल मानव कहलाया, और अभी चालीस हज़ार साल पहले क्रोमैगनन या आधुनिक मानव कहलाया । हमारी आकृति इसी आधुनिक मानव से मिलती है ।

“मतलब कुल मिलाकर बड़ा कन्फ्यूज़िंग है ।“ अशोक अपनी ट्रेंच के लिए अभी रवाना नहीं हुआ था और हम लोगों की बात में शामिल हो गया था  “ लेकिन इतना तो हम जानते हैं कि ज्ञात मनुष्य जाति की आयु कुल मिलाकर दस लाख साल तो होगी ही । 

हम लोगों ने पढ़ा है, 

तीन करोड़ सत्तर लाख साल पहले प्लीओपिथेकस हुआ, 

फिर दो करोड़ साठ लाख साल पहले रेमापिथेकस हुआ, 

फिर तीस लाख साल पहले आस्ट्रेलोपिथेकस हुआ , 

फिर दस लाख साल पहले होमोइरेक्टस हुआ, 

फिर ढाई लाख साल पहले प्रारंभिक होमोसेपियन्स, सोलो नदी का मानव यानि पिथेकेंथ्रोपस हुआ , 

फिर डेढ़ लाख साल पहले नियेंडरथल  मानव हुआ और 

अभी चालीस हज़ार साल पहले आधुनिक होमोसेपियन्स क्रोमैंगनन या आधुनिक मानव यानि हम लोग पैदा हुए । “ 

हमने देखा राममिलन भैया एक हाथ से उंगलियों की पोरों पर कुछ गिन रहे हैं और दूसरे हाथ से सर खुजा रहे हैं । यह देखकर अशोक  बहुत ज़ोर से हँसा और बोला “ अरे पंडित जी, दिमाग़ पर ज़्यादा ज़ोर मत लगाओ , बस हमारी तरह रट लो, परीक्षा में पूछा जाए तो लिख देना, इससे ज़्यादा इसकी ज़रूरत नहीं है ।" 

"काहे भैया ..इसका भी कोई फार्मूला वार्मुला बनाये हो कि नहीं ? राममिलन भैया को मांडू वाली वंशावली की याद आ गई । "बिलकुल बनाये हैं रटने के लिए .." अशोक ने कहा .."प्ली रे आ .. हो हो पी ..नि  हो क्रो  ।" हमने देखा अबकी बार सर अपना सर खुजा रहे थे ।

 शाम को काम समाप्त होने के पश्चात तम्बुओं की और लौटते हुए रवींद्र ने मुझे छेड़ना शुरू कर दिया …”क्या बात है ? आज तेरा मन नहीं लग रहा था ट्रेंच पर ?“ मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से उसकी ओर देखा तो वह हँस पड़ा । “ओफ़्फोह …आज तेरी हाँटा वाली नहीं आई काम पर इसलिए क्या ? अब क्या करोगे मौसी जो बन गई है । लगी होगी जच्चा बच्चा की सेवा में । खैर तू फिक्र मत कर, आ जाएगी एक दो दिन में, और तेरे लिए सोंठ के लड्डू भी लाएगी । लेकिन तू कुछ भी कह यार, छोरी है बहुत समझदार और तुझे चाहती भी बहुत है ।“

रवींद्र लगातार बोले ही जा रहा था मुझे उसकी बात अच्छी तो लग रही थी लेकिन तनिक गुस्सा भी आ रहा था " तुझे कैसे पता कि मुझे चाहती है ?" मैंने रवीन्द्र से सवाल किया । "भाई, वह तो उसके बात करने के ढंग से ही समझ में आ जाता है, तुझे इतनी प्यार भरी नज़रों से देखती है, और जब तुझसे बात करती है तो लजाती रहती है ।"

रवींद्र बात तो बहुत सौम्य स्वर में कह रहा था लेकिन मेरा ही मूड उखड़ा हुआ था । “तो ?“ मैंने किंचित रोष के साथ कहा “उससे क्या होता है ? प्यार भरी नज़रो से देखती है तो इसका यह मतलब थोड़े ही हुआ कि मुझे चाहती है और चाहती भी है तो क्या करूँ ...ब्याह कर ले जाउँ क्या ? अपना खुद का अभी कोई ठिकाना नहीं ..बस आठ दस रोज़ में हम लोग चले जायेंगे फिर सब किस्सा खतम ।“ 

रवींद्र मेरा इतना अन्तरंग है कि वह मेरे एक एक मूड को समझता है लेकिन इस समय वह भी मज़ा लेने के मूड में था …” ब्याह कर ले जाने की क्या ज़रूरत है, जिस तरह राजा दुष्यंत शकुंतला को अँगूठी देकर चले गए थे तू भी उसे कोई पंचमार्क सिक्का विक्का देकर चले जाना । फिर जब तू कहीं पुरातत्व विभाग में डायरेक्टर बन जायेगा वह तुझसे मिलने आयेगी और तू उसे पहचान नहीं पायेगा तब वह सिक्का काम आएगा ...“ 

“चुप रह यार । फालतू की बात मत कर “ मैंने गुस्सा होते हुए कहा …”न मैं राजा दुष्यंत हूँ, न वह वन कन्या शकुंतला, और न ही मेरे पास कोई अँगूठी है ।" 

"अरे तो इतना नाराज़ क्यों हो रहा है भाई ?" रवींद्र ने कहा । "इस दुनिया में क्या नहीं हो सकता । तू उसे कितने प्रेम से ज्ञान विज्ञान की बातें समझाता है और वह समझती भी है । जीवन में ऐसे ही साथी की तो आवश्यकता होती है जो आपको ठीक से समझ सके वर्ना सिर्फ डिग्रियाँ हासिल करने या रूपवान होने से क्या होता है ।" 

रवींद्र की बड़े-बुजुर्गों टाइप की बात से मेरे तने हुए चेहरे की लकीरें कुछ ढीली हुईं । 

मैंने कहा "भाई, जीवन में सब कुछ तो अनिश्चित है ,प्यार-व्यार , शादी-वादी यह सब तो हम अभी सोच भी नहीं सकते, अभी तो हमारे सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे कैरियर का है । ऐसा सिर्फ फिल्मों में होता है वास्तविक जीवन में नहीं ।" 

फिर एक क्षण ठहरकर मैंने कहा .." वैसे यहाँ से अंतिम रूप से जाने से पहले एक बार उसके घर ज़रूर चलेंगे, घर आने का निमंत्रण दे चुकी है । “ 

“ वा बेटा, मतलब बात यहाँ तक पहुँच गई है, हम यूँ ही अंधेरे में तीर नहीं मार रहे थे ।“ रवींद्र ने तालियाँ बजाते हुए कहा ।

“ नहीं यार, ऐसी कोई बात नहीं है ।“ मैंने कहा । “सभी मज़दूर हम लोगों से प्रसन्न हैं और हम लोगों को बहुत चाहते हैं । जाने से पहले एक बार उन लोगों के घर जाना वैसे भी ज़रूरी है उनका दिल रखने के लिए । 

“ ठीक है ।“ रवींद्र वापस अपनी मस्ती में आ चुका था  “तुझे जिसका दिल रखना हो रख लेना, बाकी का हम रख लेंगे, लेकिन वे सारे लोग चम्बल के उस पार रहते हैं, उनके घर तक जाने के लिए कमर कमर पानी में चलकर जाना होगा ।“ 

“ तो क्या हुआ ? “ मैंने कहा “ चले जाएँगे, कमर कमर भर पानी पार कर जाना कौनसी बड़ी बात है । वे लोग भी तो रोज़ आना-जाना करते हैं ।“ “बिलकुल ।“ 

रवींद्र ने कहा “महिवाल के लिए सोहनी तो उफनती नदी  पार करके गई थी । अब हमारे महिवाल की बारी है ।“ 

“ चुप रह यार । “ मैंने कहा “ यह सोहनी महिवाल, हीर रांझा, लैला मजनू के यह सब किस्से झूठे हैं, गढ़े हुए । ऐसा कभी हुआ ही नहीं । जबरदस्ती लोगों ने कहानी को इतिहास बना दिया है और इन कहानियों ने जाने कितने लोगों को बिगाड़ दिया ।

रात भोजनोपरांत मैं रवीन्द्र और अजय बरगदों की ओर टहलने निकल गए । दूज का चाँद अपनी मुँह दिखाई कर वापस जा चुका था और बरगद के चिकने पत्तों पर फिर पहले की तरह अँधेरा पसर गया था । 

अँधेरा होने के बावजूद पिछले सत्रह दिनों में हमारे पाँव रास्तों के इतने अभ्यस्त हो गए थे कि हम आँखें बंद करके भी पगडंडियों को पहचान सकते थे । टहलकर कैम्प की ओर लौटते हुए देखा कि चम्बल के घाट की ओर से अशोक के साथ किशोर भैया और राममिलन भैया आ रहे हैं । उन्हें साथ देखकर हमें अच्छा लगा । 

मैंने रवीन्द्र से कहा "दोनों लड़ते भी हैं लेकिन साथ भी रहते हैं । यह अच्छी बात है । रवीन्द्र ने उनके करीब आते ही घोषणा की "भाइयों हम लोगों को मजदूरों ने अपने गाँव आने का निमंत्रण दिया है । बोलो कब चलना है ?" " 

अरे वा ! किशोर भैया ने खुश होते हुए कहा .."बोलो कब चलना है ?" राममिलन भैया अपने मूड में आ गए और किशोर की बात का विरोध करने लगे .."काहे जायेंगे मजदूरों-फजदूरों के गाँव, ऊ तो नदिया के उस पार है ।" हमें लगा कि अभी थोड़ी देर पहले उन्हें प्यार से बातें करते हुए हमने जो देखा था वह हमारा स्वप्न था । 

अशोक  ने उन्हें समझाया " अरे अभी कौन जा रहा है भाई , यहाँ से जाने के समय जायेंगे और चलना ज़रूर ,गाँव में बहुतै  मजा आता है ।"   

चम्बल के उस पार वाले मजदूरों के गाँव की बातें करते हुए हम लोग तंबू में आ गए । किशोर भैया आते ही बिस्तर पर पसर गए और कहने लगे "कुछ भी कहो यार, ज़िन्दगी का असली मज़ा तो  बिस्तर पर ही आता है ।“ 

अशोक हँसने लगा । “इसीलिए इतवार के दिन यह किशोर सुबह ग्यारह बजे तक सोता है । एक दिन तो ग्यारह बजे जागा और खा पीकर फिर सो गया और सोमवार सुबह तक सोता रहा । 

इसकी मजबूरी है कि सुबह डिपार्टमेंट आना पड़ता है वरना रोज ग्यारह बजे तक सोता ।“ किशोर भैया हँसने लगे  … “कोई मजबूरी फजबूरी नहीं है ...अपना क्या है ..जिस दिन सोने का मन हो गया डिपार्टमेंट नहीं गए ।“ 

“ शुक्र मनाओ ।“ मैंने कहा । “हमारे पूर्वजों ने आरामदेह घर और बिस्तर का अविष्कार नहीं किया होता तो हमें अभी तक गुफाओं में चट्टान के बिस्तर पर सोना पड़ता ।" 

“ हाँ यार, यह बात तैने सही कही ।“ किशोर भैया बोले  …”और बिना सुट्टा मारे सोना भी कितना कठिन होता ..लेकिन उस ज़माने में घर बनाना भी कितना कठिन काम होता होगा ना ।“ 

अजय जो अभी अभी अपने पिता का घर बनाना देख चुका था, कहने लगा “भैया कठिन काम तो यह आज भी है । एक कहावत है ना ‘शादी करके देखो और घर बनाके देखो ।" उसकी बात पर रवींद्र ज़ोर से हँसा …”अबे, शादी और घर का क्या सम्बन्ध ? शादी तो तूने कर ली बाप की कमाई से, अब अपनी कमाई से घर बनाना तब कहना ।“ 

अजय ने अपने माथे पर हाथ मारा और कहा “यार तुम लोग कहावत भी नहीं समझते हो, जबरदस्ती मेरे पीछे पड़ जाते हो ।“ मैंने दोनों  को शांत करते हुए कहा "अरे, लड़ो मत भाई, उस इंसान की तारीफ करो जिसने घर का यह कॉन्सेप्ट हमारे सामने रखा । अगर इंसान का घर न होता तो उसका परिवार भी नहीं होता और फिर हम लोग इतने अच्छे घरों के अच्छे परिवारों में कैसे रहते ।"

*शरद कोकास*



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें