📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘
✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼
पिछले भाग में आपने पढ़ा झीलों के किनारे बस्ती कैसे बसी , वहाँ क्या क्या कठिनाइयाँ थीं , इस तरह से आग लग जाने पर सब कुछ नष्ट हो जाता था यह रोचक वर्णन आपको पसंद आएगा ।इस भाग में पढ़िए कि कपड़ों की खोज कैसे हुई , कपड़े पहनने का विचार मनुष्य के दिमाग़ में कैसे आया, उसके लिए उसने क्या क्या किया ,प्रारम्भिक वस्त्र कैसे थे किस कपड़े के बनाये जाते थे ।इसके अलावा यह भी जानिए कि पाखण्डी बाबा कैसे चमत्कार करते हैं , कैसे हवा से भभूत निकालते हैं , कैसे बिना माचिस के आग लगाते हैं आदि*
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*भाग 45*
*मेरा लाल दुपट्टा मलमल का हो जी*
स्नानादि के पश्चात घाट से लौटते हुए हम लोग अक्सर टावेल लपेट कर ही लौटते हैं और तम्बू में आकर कपड़े पहनकर फिर नाश्ते के लिए प्रस्थान करते हैं । मैले कपडे भी घाट पर ही धो लेते हैं और तम्बू के बाहर रस्सियों पर उन्हें सूखने के लिए डाल देते हैं ताकि दिन भर में वे सूख जायें । टेरीकॉट के कपड़े हैं सो जल्दी सूख भी जाते हैं और प्रेस करने की झंझट भी नहीं रहती । आज सुबह कपड़े पहनते हुए रवीन्द्र ने कहा " यार ,हम लोग देखो कितने अच्छे समय में पैदा हुए हैं, एक मिनट में प्रागैतिहासिक अवस्था से आधुनिक अवस्था में आ जाते हैं । कहाँ वो इंसान नंगा घूमता था कहाँ हम इतने अच्छे अच्छे कपडे पहनते हैं ।" अजय ने कहा "और हमें यह सुविधा भी है कि जब मर्ज़ी हो फिर उसी अवस्था में पहुँच जाते हैं ।"
"चुप रह यार । " रवीन्द्र ने कहा "जब देखो तब अश्लील बातें करता रहता है ।" "लो सुन लो इनकी ।" अजय ने मेरी और देखते हुए कहा "कपडे उतारने में क्या अश्लीलता है ? जब हमारे पूर्वज कपडे नहीं पहनते थे तो क्या वे अश्लील थे ?" "चुप रहो भाई दोनों ।" किशोर भैया ने कहा "अश्लीलता का कपडे पहनने न पहनने से कोई सम्बन्ध नहीं है, बल्कि विचारों से है, अश्लीलता दिमाग़ में होती है ।" अजय समझ गया अब किशोर भैया का श्लील- अश्लील पर व्याख्यान सुनने को मिलेगा । किशोर भैया ने जैसे उसके मन की बात ताड़ते हुए कहा "नहीं मैं फ़िलहाल कोई व्याख्यान देने के मूड में नहीं हूँ ।"
रवींद्र ने शर्ट की बटन लगाई और आईने में देखकर कंघी करते हुए कहा "मैं अक्सर सोचता हूँ इंसान ने जब पहली बार कपड़ा कब पहना होगा तो क्यों पहना होगा ?" अजय ने कहा " क्यों पहना होगा.. अरे जब उसे नंगा घूमता हुआ देखकर किसीने टोका होगा तब पहना होगा और क्या । " अशोक हम लोगों के कुछ देर बाद नहाकर आया था और जल्दी के चक्कर में अभी तक गीले बदन ही था । उसने कांपते हुए कहा "अरे..जब ठण्ड लगी होगी तब पहना होगा और क्या ।" "नहीं भाई ।" मैंने दोनों महानुभावों की बात को नकारते हुए कहा " उस समय नंगेपन को छुपाने के लिए कपड़ा पहनने का कोई कॉन्सेप्ट नहीं था न ही ठण्ड से बचने के लिए भालू की खाल या पेड़ की छाल पहनने का कोई सवाल था, यह काम तो वह शुरू से ही करता आ रहा था । यह सवाल बुने हुए कपड़े के बारे में हैं । यानि पहला कपड़ा तो तब ही पहना गया होगा जब बुना गया होगा ।"
"और बुना कब गया होगा ?" अजय ने सवाल किया । मैंने कहा "अभी मैंने तुम लोगों को स्वित्ज़रलैंड की उस झील के बारे में बताया था ना, उसी झील के तल से सन या जूट के कपडे का एक टुकड़ा मिला है । उस टुकड़े पर भी झुलस जाने के कारण हलकी सी एक कोयले की परत चढ़ गई थी जिसने उसे भविष्य के लिए संरक्षित कर दिया । इसके अलावा कुछ गुफाओं में भी सन के कपडे के अवशेष मिले हैं । जार्जिया की एक गुफा में तो रंगे हुए सन के कपडे का टुकड़ा मिला है जिसका काल छत्तीस हज़ार साल पहले का माना जा रहा है ।"
"इसका मतलब यह हुआ कि काफी साल पहले इंसान ने कपड़ा बनाना सीख लिया था ?" अजय ने कहा । "बनाना नहीं बे, बुनना ।" रवीन्द्र ने अजय की हिंदी सुधारते हुए कहा । "हाँ भैया बुनना सही, मुझे जो आसान लगा वह कह दिया । वैसे भी कपड़ा बनाना हो या बुनना एक ही बात है ।" अजय ने खीझते हुए कहा । "एक ही बात कैसे है ?" रवींद्र भाषा के अशुद्ध प्रयोग पर ज़रा आक्रामक हो उठा था । " सही शब्द का तो इस्तेमाल किया करो ..बुनना सही शब्द है । और सुनो.. बोलना आसान है लेकिन कपड़ा बुनना कोई आसान काम नहीं है । उसके लिए करघे की आवश्यकता होती है ।" "तो इसका मतलब यह हुआ कि इंसान ने पहले करघा बनाया उसके बाद कपड़ा बुनना सीखा ?" अजय ने रवींद्र की नसीहत को नज़रंदाज़ करते हुए तपाक से सवाल किया ।
"नहीं ऐसा नहीं है मेरे भाई ।" रवींद्र ने अपने माथे पर हथेली मारते हुए कहा । " करघे का आविष्कार तो बहुत बाद की बात है । सबसे पहले उसने लकड़ी की एक फ्रेम में तानाबाना डालकर हाथ से ही कपड़ा बुना होगा । जैसे पहले उसने लकड़ी की चार पट्टियाँ जोड़कर एक फ्रेम बनाई । फिर उस फ्रेम में उसने ऊपर से नीचे खड़े खड़े कपड़े की लम्बाई वाले धागे डाल दिए, यह ताना हो गया । फिर आड़े धागे को हाथ से उन लम्बाई के धागे के बीच से आगे पीछे करते हुए निकाला यह बाना हो गया ।" "वाह ताना- बाना , ताना- बाना ,ताना-बाना ताना-बाना ..कितना अच्छा शब्द है ऐसा लगता है कोई कविता गा रहे हों ।" अजय ने बच्चे की तरह खुश होते हुए कहा । रवींद्र का गुस्सा अब तक समाप्त हो चुका था " हाँ, इस तरह ताना-बना डालकर उसने उसी तरह कपड़ा बुना जैसे अभी जुलाहे कपड़ा बुनते हैं । हालाँकि वे अब करघे का इस्तेमाल करते हैं जो उसी प्राचीन चौखटे का आधुनिक वंशज है । हाथ से बुने इस कपड़े को ही हैंडलूम कहा जाता है ।"
इस बीच हम लोग तैयार होकर नाश्ता करने के लिए भोजनशाला तक आ चुके थे । "लेकिन असली सवाल तो यह है कि उसने धागा कैसे बनाया होगा?" अजय ने एक आलूबोंडा अपनी प्लेट में रखते हुए कहा । "हाँ यह भी सही सवाल है ।" मैंने कहा । "कल मैंने बताया था ना कि जब उस आदिम मनुष्य ने अपनी पशुपालक और कृषक अवस्था में धरती में बीज बोने शुरू किये तो उसने अनजाने में सन के भी कुछ बीज बो दिए । जब पौधे बड़े हुए तो उसमे से रेशे जैसे निकलने लगे । फिर उसने उन रेशों से कुछ प्रारंभिक प्रयोग किये और कपड़ा बुनने के लिए उनका उपयोग करना शुरू किया । इसके लिए वह सन के पौधों को जड़ सहित उखाड़ता था । फिर सन को सुखाया जाता, धोया जाता, फिर इस सन को कूटा जाता पीटा जाता, हड्डी की दांतेदार कंघी से सुलझाया जाता और इस तरह अंत में सन का धागा तैयार हो जाता बस फिर लकड़ी की फ्रेम पर उनका ताना बाना डालकर कुछ समय में कपड़ा तैयार कर लिए जाता ।
"लेकिन कपड़ा क्या ऐसे ही ओढ़ लिया जाता था ?" अजय ने पूछा । "उन्हें सिला नहीं जाता था क्या ?" "अरे बावले ।" रवीन्द्र ने कहा । " सीना तो वह पहले से ही जानता था , हड्डी की सुई तो उसके प्रारंभिक औजारों में थी ही जिससे वह पशुओं की खाल और पत्ते सीता था अब यही सुई कपड़ा सीने के काम में आने लगी ।" "लेकिन यार वह लम्बा कपड़ा कैसे बुनता होगा उसके लिए तो लम्बे धागे की ज़रूरत होती है ? "अजय के सवालों से ऐसा लग रहा था जैसे हम आर्क्यालोजी की नहीं बल्कि टेक्सटाइल की ट्रेनिंग में यहाँ आये हैं । मैंने धैर्यपूर्वक उसकी बात का जवाब दिया "भाई, शुरू में धागे की लम्बाई कम होती थी इसलिए उसने छोटे कपड़े बुने और उन्ही को जोड़ जोड़कर बड़ा कपडा बनाया बाद में फिर जब तकली नुमा किसी चीज का आविष्कार हुआ और उसने रेशे को धागे में बदलते हुए लम्बे लम्बे धागे भी कात लिए । इस तरह उसने एक जैसे बड़े बड़े कपड़े बनाने शुरू किये ।"
अजय ने अपनी प्लेट रखी और एक डकार लेते हुए कहा "भाई, एक जैसे कपड़ों से तो वह बोर हो जाता होगा और उस समय जब स्त्रियों को अलग अलग डिजाइन वाली साड़ियों की ज़रूरत होती होगी तो वे क्या करती होंगी ? इस विधि से तो एक ही डिज़ाइन और एक ही कलर की साड़ियाँ बनती होंगी ना ?" अजय के सवाल पर रवीन्द्र ठहाका मार कर हँस दिया "देख लो इस भाभी के भैये को, आटे -दाल का भाव पता चलने के साथ आखिर चोली और साड़ी का भाव भी पता चल ही गया । कितनी बार साड़ियाँ खरीदकर दी यार तैने भाभी को ?" "में कहाँ से दूंगा यार .. में कोई कमाता हूँ क्या ? अभी तो में स्टूडेंट हूँ वो सब पिताजी ही खरीदकर देते हैं ।" अजय ने भोली सी सूरत बनाते हुए कहा ।
मैंने गंभीरता से रवींद्र की ओर देखा और कहा "नहीं.. अजय का सवाल सही है । परिवर्तन की चाह तो सबको होती है । आज वस्त्र उद्योग में जो क्रांति हुई है,भांति भांति के वस्त्र आये हैं उसके पीछे उसी मनुष्य का श्रम ,आवश्यकता और परिवर्तन की आकांक्षा है । उस समय भी स्त्रियों को ही क्यों पुरुषों को भी रंगीन कपड़े पहनने और सजने संवारने की इच्छा होती होगी, सो उन्होंने फिर प्राकृतिक वस्तुओं, पेड़-पौधों, पत्तियों, जड़ों चट्टानों आदि से रंग बनाये होंगे और अपना बुना हुआ कपड़ा भी रंगा होगा । नील के पौधे की खोज भी इसी सिलसिले में हुई होगी । फिर जैसे कि वह चट्टानों पर चित्र उकेरता था वैसे ही उसने कपड़ों पर भी चित्र बनाए होंगे ।"
अजय खुश हो गया .." भाई आप बड़े अच्छे हो, मेरी प्राणरक्षा कर लेते हो । " फिर वह रवींद्र से मुख़ातिब हुआ "यार कितना अच्छा हो कि हमें आज ट्रेंच में कपडे का कोई टुकड़ा मिल जाए ।" "नहीं ।" मैंने कहा " ऐसा होना असम्भव तो नहीं लेकिन आसान भी नहीं है क्योंकि कपड़ा और लकड़ी ऐसी वस्तु हैं जिनका ज़मीन के भीतर या बाहर कई हज़ार साल टिके रहना मुश्किल है । यह उसी स्थिति में संभव है जब कपड़े पर कोयले की कोई परत चढ़ी हो अथवा लकड़ी जीवाश्म या फॉसिल में बदल कर चट्टान हो गई हो । यहाँ आगजनी हुई हो इस बात के भी कोई आसार नज़र नहीं आते हैं । हालाँकि सन या लिनेन के अवशेष मिल सकते हैं इसलिए कि यह काफी टिकाऊ होता है । विदेशों में बाद के समय में इसके बहुत सारे अवशेष मिले है । तुतेनखामन की कब्र में भी लिनेन के परदे मिले हैं ।"
इतने में बाहर से डॉ वाकणकर की आवाज़ सुनाई दी... "सज्जनों.. क्या बात है आज अभी तक निकले नहीं भोजनशाला से बाहर, चलो जल्दी ट्रेंच पर पहुँचो ।" हम लोगों ने जल्दी जल्दी हाथ धोये और लगभग दौड़ते हुए ट्रेंच पर पहुँच गए । रवीन्द्र सबसे आगे था । उसने दूर से देख लिया कि मजदूर आ गए हैं और ट्रेंच के आसपास सफाई के काम में लगे हैं । उसने मुड़कर मेरी ओर देखा और गाना गाना शुरू कर दिया .. "हवा में उड़ता जाए मोरा लाल दुपट्टा मलमल का जी मोरा लाल दुपट्टा मलमल का ओ जी ओ जी .. मैं समझ गया वह मुझे छेड़ने के लिए ऐसा कह रहा है .. मेरी निगाह ट्रेंच के पास खड़े मज़दूरों पर जा पड़ी । मागो काम पर लौट आई थी और लाल दुपट्टा ओढ़े हुए थी । सुबह की सुनहली धूप में उसमे जड़े सितारे छोटे छोटे सूरज होने का भान करते हुए दूर से ही चमक रहे थे ।
मैंने ट्रेंच पर पहुँचकर मागो को मौसी बनने की बधाई दी । रवीन्द्र ने कहा ' मागो सोंठ के लड्डू नहीं लाई ? मागो ने कहा "लाऊंगी ना साहब, अभी तो बने ही नहीं हैं ।" "ज़रूर लाना ।" रवींद्र ने कहा "हमारे शरद भैया को बड़े अच्छे लगते हैं ।" मैंने कहा "मेरा नाम क्यों ले रहा है भाई, तुझे भी तो अच्छे लगते हैं ।" मागो ने कहा "आप लोग हमारे घर आइयेगा तब खिलाऊँगी ।" मैंने रवीन्द्र से कहा "ले भाई अब तो तुझे भी मागो ने घर आने का निमंत्रण दे दिया है । अब मुझे मत कहना ।" रवीन्द्र ने कहा "हाँ आयेंगे ना.. लेकिन और क्या खिलाओगी ?" मागो ने मेरी ओर इशारा करते हुए कहा "जो ये साब कहेंगे वह खिलाऊँगी ।" रवीन्द्र ने मेरी ओर देखकर भौंहे उचकाईं और हँस पड़ा .. "देख ले मैं क्या गलत कह रहा था.. तेरा जादू चल पड़ा है ..।" मागो की कुछ समझ में नहीं आया, उसने घमेला उठाया, छन्नी के पास पड़ी मिटटी उसमे भरी, सिर पर पड़ा दुपट्टा ठीक किया, घमेला सिर पर रखा और मिट्टी फेंकने के लिए टीले के दूसरी ओर चली गई ।
रात उसी तरह आई जैसे कि रोज़ आती थी । बिस्तर में घुसने से पूर्व कुछ देर हम लोग तम्बू के बाहर पसरकर बैठ गए । अशोक ने लेटे हुए एक नज़र आसमान की और डाली । यह बढ़ते हुए चाँद के दिन हैं और आसमान में चाँद लगभग आधा हो चुका था । " यार आज तो चाँद आधी पूड़ी की तरह दिखाई दे रहा है उसने कहा । मैं समझ गया, भाटीजी ने आज डिनर में पूड़ी और आलू की रसेदार सब्ज़ी बनाई थी यह उसीका असर है । कुछ देर बाद हम लोग तम्बू में प्रवेश कर गए । बिस्तर पर अधलेटी मुद्रा में मैं दिन के काम के बारे में सोचने लगा । अजय की बात कहीं अवचेतन में विद्यमान थी । आज ट्रेंच पर उत्खनन करते हुए भी हम लोग सोच रहे थे काश .. लिनेन या सन से बुने कपडे का कोई अवशेष किसी हंडिया में रखा हुआ मिल जाए । लेकिन ऐसा तो केवल काल्पनिक कथाओं में होता है कि सोचने मात्र से कोई वस्तु मिल जाये । मैंने रवीन्द्र से कहा "यार यहाँ आभूषणों में प्रयुक्त किये जाने वाले मनके तो काफ़ी मिल रहे हैं लेकिन यह लोग वस्त्र किस तरह के पहनते थे इसका कोई संकेत अभी तक नहीं मिल पाया है । कहीं ऐसा तो नहीं कि शालभंजिकाओं की भांति आभूषणों से ही तन ढंकते हों ।"
रवीन्द्र मेरी बात सुनकर हँस दिया " तू तो पगला गया है कुषाण शिल्प की नारी प्रतिमाओं पर रिसर्च करते हुए । वैसे भी शालभंजिकाएं महीन सा वस्त्र तो पहनती ही थीं और वह तो बहुत बाद की बात है यहाँ का काल तो उससे भी पहले का है ।" अजय हम लोगों की अकादमिक बातों से बोर हो रहा था । वैसे भी आज उसने हम लोगों को बहुत बोर किया था और अभी भी कुछ कुछ ऐसे ही मूड में था । हमारी बात सुनकर उसने कहा "मुझे तो सपने में दिखाई दिया है कि यहाँ के लोग धोती पहने हुए हैं.. क्या पता कल कोई धोती किसी संदूक में रखी हुई मिल जाए " " रहने दे.. रहने दे । तेरा सपना सच नहीं होने वाला ।" रवींद्र ने कहा । "अरे नहीं यार, सपने सच होते हैं ..।" अजय बहुत उत्साहित था ।.."हमारे गाँव में ऐसा ही हुआ था । एक पान की दुकान वाले को सपना आया कि उसकी दुकान के पीछे ज़मीन में शंकर जी की पिंडी गड़ी हुई है फिर एक सप्ताह तक लोगों को वो बताता रहा और एक दिन ऐसा चमत्कार हुआ कि वह पिंडी अपने आप ऊपर आ गई ।
मैंने कहा "अरे यह कोई चमत्कार वमत्कार नहीं है । हमारे यहाँ भी लोग ऐसा ही करते हैं । कई पाखंडी और बदमाश लोग ज़मीन के ज़रा सा नीचे कोई मूर्ति दबा देते हैं फिर उस पर धनिया या मेथी बो देते है और रोज़ पानी छिड़कते हैं । कुछ दिनों बाद जब पौधे निकलते हैं तो उनके साथ मूर्ति भी बाहर निकल आती है, फिर उसका पूजा पाठ शुरू हो जाता है । इस तरह से अन्द्धविश्वास चलते रहते हैं । ज़रूर उस पान की दुकान वाले को अपनी दुकान के पीछे की ज़मीन हथियानी होगी इसलिए उसने ऐसा खेल खेला । आजकल नाजायज़ ज़मीन पर कब्ज़ा करने के लिए लोग ऐसे ही झूठ का सहारा ले रहे हैं ।"
अजय ने कहा " हो सकता है आज के लोग बेईमान हों लेकिन पहले के लोगों के पास कुछ चमत्कारिक शक्ति अवश्य थी । ऐसे ही हमारे गाँव में हिमालय से एक साधू आये थे उन्होंने मन्त्र की शक्ति से यज्ञ कुंड में आग लगाकर बताई थी ।" मैं जोर से हँसा .."अरे यह भी कोई चमत्कार नहीं है । ऐसे पाखंडी लोग यज्ञ में लकड़ी या हवन सामग्री के ऊपर पोटेशियम परमैन्ग्नेट रख देते हैं । फिर कहते हैं देखो हमारे पास कामधेनु गाय का घी है जो वास्तव में घी जैसा दिखाई देने वाला ग्लीसरीन होता है । जैसे ही वे लकड़ी पर उस ग्लीसरीन रूपी घी को डालते है पोटेशियम परमैन्ग्नेट पर ग्लीसरीन की रासायनिक क्रिया होती है और आग पकड़ लेती है । इस बीच वे मंत्र भी पढ़ते रहते हैं तो लोगों को लगता है यह मंत्रशक्ति से हुआ है । ऐसे ही सोडियम पर जल छिड़कने से भी आग उत्पन्न होती है। तुम्हे ख्याल होगा स्कूल में विज्ञान प्रयोगशाला में इसीलिए सोडियम को मिटटी के तेल में डुबाकर रखा जाता था । "
अजय ने कहा " अच्छा ऐसी बात है क्या ? और हाँ मुझे याद आया ऐसे ही एक बाबा और आये थे उन्होंने हवा से भभूत निकाली थी और साईं बाबा की फोटो से भभूत निकाली थी ।" मैंने कहा " यह भी कोई चमत्कार नहीं है । हवा से भभूत निकलने के लिए वे अपनी हथेली में अंगूठे और तर्जनी के बीच भभूत की टिकिया बनाकर रख लेते हैं जो किसी को दिखाई नहीं देती । फिर हवा में हाथ उठाकर सफाई से उसे मसलकर राख़ कर लेते हैं और सबको बाँट देते हैं । वैसे ही फोटो से भभूत निकालने के लिए वे उसकी एल्युमिनियम की फ्रेम पर सिल्वर क्लोराइड का सफ़ेद पाउडर लगा देते हैं इन दोनों की रासायनिक क्रिया से भभूत जैसा पदार्थ निकलता रहता है ।"
"मतलब इसमें कोई चमत्कार नहीं है ?" अजय ने पूछा । "हाँ ।" मैंने कहा "जो भी चमत्कार जैसा दिखाई देता है उसके पीछे हाथ की सफ़ाई ,उपकरण की बनावट या किसी रासायनिक वस्तु का प्रयोग ही होता है । जादूगर भी ऐसे ही जादू दिखाते हैं लेकिन वे इसे कला कहते हैं, चमत्कार कहकर लोगों का शोषण नहीं करते ।" लेकिन हमारे यहाँ धर्मग्रंथो में भी तो कितनी चमत्कारिक बातें लिखी हैं उनमें कुछ तो सच होगा ?" अजय ने सवाल किया ।
अशोक काफी देर से हम लोगों की बातें सुन रहा था । उसने कहा .." क्या यार अजय तू भी .. अरे उसमें इतनी सारी बातें काल्पनिक हैं कि उन पर विश्वास हो ही नहीं सकता । उस ज़माने में लोगों की धर्म और ईश्वर पर आस्था उत्पन्न करने के लिए कुछ चालाक और लम्पट किस्म के लोगों द्वारा ऐसी बहुत सी कथाएँ गढ़ी गई थीं । उनके अनेक सामाजिक कारण हो सकते हैं किन्तु वे सब बातें सच हों यह बिलकुल ज़रूरी नहीं है । हमें इन धर्मग्रंथों से उतना ही ग्रहण करना चाहिए जितना हमारे काम का है । चलो अब सो जाओ आज बहुत थक गए हैं ।"
मैंने एक नज़र राममिलन भैया पर डाली। वे और किशोर दा काफी पहले ही तम्बू में आकर नींद के आगोश में जा चुके थे। मैं सोच रहा था कि वे अगर जागते रहते तो उन्हें अन्द्धश्रद्धा निर्मूलन वाली इन बातों में बहुत आनंद आता और उन्हें छेड़कर थोड़ा बहुत आनंद हमें भी मिलता । मगर ये न थी हमारी किस्मत .. खैर फिर तो कोई चारा नहीं था सोने के सिवाय ।
*शरद कोकास*
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