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गुरुवार, 10 सितंबर 2020

मनुष्य जब पहली बार मरा तब क्या हुआ होगा

मनुष्य जब पहली बार मरा तब क्या हुआ होगा 

📕 मित्रों, 'एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी' के पहले भाग ' चम्बल के पानी में चाँदमें आपने पढ़ा कि 'प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व' अध्ययनशाला विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के छात्र शरद कोकास,रवींद्र भारद्वाज,अशोक त्रिवेदी,अजय जोशी और राममिलन शर्मा उज्जैन के निकट चम्बल नदी के किनारे 'दंगवाड़ा' नामक पुरातात्विक स्थल पर प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता , विश्वप्रसिद्ध भीमबैठका गुफाओं के खोजकर्ता ,पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के निर्देशन में चल रहे उत्खनन शिविर में पहुँचे हैं । सभी छात्र युवा हैं ,उर्जा से भरे हुए हैं और कुछ कर गुजरने की आकांक्षा लिए हुए हैं । शिविर में पहुँचते ही उनका सामना एक ऐसे दृश्य से होता है जिसमें भूख की वज़ह से एक मजदूर स्त्री को चक्कर आ जाते हैं और उस पर  प्रेत बाधा का असर माना जाता है । डॉ.वाकणकर सबके मन से यह अन्द्धविश्वास  दूर करते हैं । इसके बाद छात्र टीले की ओर घूमने निकल जाते हैं और चाँद के सान्निध्य में शाम बिताते हैं । लीजिये अब पढ़िए आगे की दास्तान ।

शरद कोकास

दंगवाड़ा की पुरातात्विक साईट पर चल रहे उत्खनन शिविर में आगमन के पश्चात सर्द मौसम की यह पहली रात हमारी प्रतीक्षा कर रही थी । उसकी काली आँखों में धीरे धीरे हमारा अक्स उभर रहा था ।अभी उसे बहुत सारा वक़्त हमारे साथ बतकहियों में बिताना था । आसमान साफ़ था और हमारे और तारों के बीच सीधे संवाद की पूरी पूरी संभावना थी लेकिन सर्द रात में अधिक देर तक बाहर रहना एक मूर्खतापूर्ण ख़याल था  । रात तो हमें  अपने तम्बू के भीतर ही बितानी थी । शिविर के व्यवस्थापकों ने यहाँ आवास हेतु चार तम्बुओं की व्यवस्था की है इसके अलावा अवशेष और उपकरण रखने हेतु एक तम्बू तथा भोजन तैयार करने हेतु एक तम्बू और है ।

 तम्बू में स्थित इस भोजनशाला के प्रभारी भाटी जी हैं जिनका कार्य सभी शिविरार्थियों को सुबह का नाश्ता,शाम की चाय और दो समय का भोजन करवाना है ।  ज्यों ज्यों अँधेरा बढ़ता जा रहा था हमारी भूख भी अपना आकार बढ़ाती जा रही थी । दोपहर का भोजन हम लोग उज्जैन से लेकर निकले थे जो जीप के उबड़-खाबड़ रास्ते पर चलने की वज़ह से और हमारे बेहतरीन हाजमे की वज़ह से समय से पूर्व ही हज़म हो चुका था । इधर भूख रोज़ पाठशाला आने वाले पढ़ाकू बालक की तरह लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी । हमने भूख के आग्रह पर भाटी जी को नमस्कार किया । उन्होंने ज़मीन पर पड़ी भोजन पट्टिकाओं की ओर इशारा किया । हमने तुरंत ज़मीन पर पट्टिकाएं बिछाई और पालथी मारकर बैठ गए । भाटी जी ने फिर थालियों की ओर इशारा किया । हम समझ गए, शिविर का यही अनुशासन होता है अपनी थालियाँ खुद उठानी होती हैं सो हम फिर उठे और थालियाँ और गिलास लेकर बैठ गए ।


भाटीजी ने उसके बाद भोजन परोसना शुरू किया । इतने में वाकणकर सर भी अपनी थाली और गिलास लेकर पंगत में शामिल हो गए ।भाटी जी ने आलू बैंगन की सुस्वादु सब्ज़ी बनाई थी,साथ में दाल चावल और रोटी । हम लोगों ने रोटी का कौर तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि वाकणकर सर ने इशारा किया .. रुको दुष्टों पहले मन्त्र पढ़ना है । उन्होंने आँखें  बंद कीं ,थाली के सामने हाथ जोड़े और मंत्रोच्चारण शुरू किया ..ओम सहना ववतु.. सहनौ भुनक्तु .. हम लोग अपनी बेचारगी में उनके साथ साथ यह मन्त्र बुदबुदाते रहे और सर की आँख खुलने से पहले ही भोजन पर टूट पड़े । हम लोगों ने कुछ इस तरह भोजन किया जैसे कई बरसों के भूखे हों ।

भोजन के पश्चात हम लोग अपने तम्बू में आ गए । तम्बू के बीचोबीच बांस के सहारे लटकते बिजली के लट्टू पर हमारी नज़र पड़ी । वह लगातार बाहर के अँधेरे से लड़ने की कोशिश कर रहा था । मैंने रवीन्द्र से कहा " यहाँ जंगल में बिजली कहाँ से आ गई ?" रवीन्द्र ने कहा ..' तूने देखा नहीं गाँव के पास गुजरने वाली बिजली की लाइन से यहाँ तक तार खींचकर बिजली लाई गई है ।" " ग़नीमत है " मैंने कहा वर्ना हमें लालटेन युग में जीने का एक मौका मिल जाता । तम्बू में बल्ब होने के बावज़ूद बाहर का अँधेरा भीतर घुसने का भरसक प्रयास कर रहा था .. मैंने इसका कारण ढूँढने के लिए एक नज़र बाहर की ओर डाली और महसूस किया कि बल्ब की रोशनी और जंगल के अँधेरे के बीच सिर्फ कपड़े की दीवारें हैं । उन पर पड़ती हमारी परछाइयाँ भी अँधेरे का ही साथ दे रही थीं । 


भोजन के बाद तुरंत सोने की आदत किसी की नहीं है । वैसे भी हॉस्टल में रहकर हम लोग इतने तो बिगड़ ही चुके हैं  कि जब तक कमरों के दरवाज़े खटखटाकर मित्रों से उनका हालचाल न पूछ लें और थोड़ी मस्ती न कर लें नींद आती ही नहीं है । सो यहाँ भी किसीको नींद नहीं आ रही थी । लेकिन बाहर ठण्ड थी और जिनके हाल जानना था वे सारे मित्र भी एक ही तम्बू में थे सो बिस्तर में घुसने के अलावा कोई चारा नहीं था । हम सब चुपचाप लेट गए और तार्पोलीन की बनी तम्बू की छत की ओर ध्यान लगाकर देखने लगे, शायद देश की शासन व्यवस्था की तरह उसमें भी कोई छेद दिख जाए ताकि हम ठण्ड का दोष उस पर मढ़ सकें । लेकिन ऐसी कोई गुंजाइश हमें दिखाई नहीं दी । 


वैसे यह फरवरी का दूसरा सप्ताह था । लम्बे समय के लिए मायके आई बेटी जिस तरह ससुराल वापस जाने की तैयारी में होती है ठण्ड भी उसी तरह अब विदाई की तैयारी कर रही थी । हालाँकि  हम शहर में रहने वाले लोग इस बात की कल्पना नहीं कर पाए थे कि जंगल में ठण्ड शहर से ज़्यादा होगी । मुझे लगा था जैसे शहर में अब ठण्ड समाप्त हो गई है वैसे ही गाँव में भी हो गई होगी सो मैं अपनी बदमस्ती में रज़ाई लेकर नहीं आया था । रवीन्द्र की ठण्ड से बहुत पुरानी दुश्मनी थी  सो उसका मुक़ाबला करने के लिए  ज़िरह बख्तर की तरह रज़ाई उसके साथ थी  । मैं किसी  घुसपैठिये की तरह रवीन्द्र की रज़ाई में घुसने की कोशिश करने लगा ।  रवीन्द्र अकेला सोने का आदी था और रज़ाई शेयर करने में उसे कोई दिलचस्पी नहीं थी ...

मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी   की तर्ज़ पर उसने कहा मैं अपनी रज़ाई नहीं दूँगा  । मैंने उससे निवेदन किया..भाई मेरे , यहाँ बहुत कड़ाके की ठण्ड होगी ऐसा मुझे पता नहीं था सो मुझसे ग़लती हो गई , मैं तो खैर कम्बल ओढ़कर सो जाऊंगा लेकिन इस अच्छे खासे उत्खनन कैम्प में तुम लोगों का एक दिन मेरे अंतिम संस्कार के लिए बर्बाद हो जायेगा  मेरी बात  सुनकर रवीन्द्र जोर से हँसा और उसे मुझ पर दया आ गई, वैसे भी वह मेरा प्यारा दोस्त है । अंततः एक ही रजाई में एक दूसरे की ओर पीठ करके सोने की बात पर समझौता हो गया ।

लेकिन रज़ाई में घुसने के बावज़ूद नींद का कुछ अता-पता नहीं था । वैसे भी नींद  का समय अभी कहाँ हुआ था । सर्दियों में अँधेरा जल्दी हो जाता है लेकिन घड़ी तो अपने हिसाब से चलती है ? अचानक डॉ.वाकणकर की शाम को कही गई एक  बात मुझे याद आ गई और मेरी हँसी फूट पड़ी  । लगता है ठण्ड तेरे दिमाग़ में चढ़ गई है जो अकेला अकेला हँस रहा है  ? ” मुझे हँसता देख रवीन्द्र ने पूछा । मैंने रवीन्द्र से कहा  कुछ नहीं यार ,सर की वह कंकाल के साथ सोने वाली बात याद आ गई ..कि खोपडियाँ और कंकाल तो बिस्तर में भी मेरे साथ रहते हैं.. अच्छा बताओ, तुम कभी किसी कंकाल के साथ सोये हो ? “रवीन्द्र हँसने लगा..कंकाल के साथ सोने के लिए दक्षिण अफ्रीका जाना पडेगा माय डिअर, क्योंकि हमारे यहाँ तो कंकाल मिलने से रहा, इसलिए फ़िलहाल तो तेरे साथ सो रहा हूँ ।


मैंने कहा मज़ाक मत उडाओ ..इतना भी दुबला पतला नहीं हूँ यार । वैसे यह बात तुम सही कह रहे हो कि कंकाल तो दक्षिण अफ्रीका में ही मिलेगा , हमारे यहाँ के डरपोक अन्द्धविश्वासी  लोग कंकाल तो क्या खोपडी या कहीं पड़ी हुई हड्डी देखकर ही डर जाते हैं..लेकिन एक बात है ....।अंतिम संस्कार यह शब्द मेरे अवचेतन में अब भी विद्यमान था और मैं पहले मनुष्य के अंतिम संस्कार के विषय में सोच रहा था । मेरी बात सुनकर रवीन्द्र ने शतुर्मुर्ग की तरह रज़ाई से बाहर गर्दन निकाल कर पूछा .. क्या ? ”

मैंने कहा हमने शव जलाने की प्रथा शुरू कर इतिहास का बडा भारी नुकसान किया है । ” “ वो कैसे ? ” रवीन्द्र ने पूछा । मैंने बताया कंकाल ही तो मनुष्य का इतिहास तय करते हैं यार, वे कितने पुराने हैं यह विज्ञान से पता चलता है उसीसे मानव सभ्यता की प्राचीनता तय होती है । गनीमत सभी जगह शव को नष्ट कर देने की यह प्रथा नहीं है , अगर दक्षिण अफ्रीका और योरोप में गाड़ने की बजाय शव जलाने की प्रथा होती  तो हमें लाखों साल पहले के पृथ्वी के पहले पहले मनुष्य के दर्शन ही नहीं होते ।


           
पत्थर की कब्र 
अशोक अब तक चुपचाप था और सिगरेट का आनन्द ले रहा था । उसने एक लम्बा कश लेकर छत की ओर धुआँ फेंका और धुएँ के केंद्र में अपनी निगाहें स्थिर करते हुए कहा मैं सोच रहा हूँ ...पहली बार जब कोई इंसान मरा होगा तो उसे गाड़ा गया होगा या जलाया गया होगा..। मैंने कहा ना गाडा गया था , ना जलाया गया था । पहली बार जब मनुष्य ने मनुष्य की मृत देह देखी होगी तो उसकी  समझ में आया ही नहीं होगा कि उसके जैसे दिखने वाले इस जीव को आखिर हुआ क्या है । वह बहुत देर तक उसके पास चुपचाप बैठा रहा होगा फिर उसकी आँख खोलकर देखी होगी, उसे हिलाया-डुलाया होगा ,यह सोचकर कि शायद इस तरह यह फिर से चलने लगे या बोलने लगे , फिर उसका मुँह खोलकर देखा होगा ,शायद वह फिर से बोलने लगे । लेकिन इन प्रयासों के बाद भी जब कुछ नहीं हुआ होगा तो उसे उसके हाल पर छोड़कर वह अपनी भूख का इंतज़ाम करने निकल गया होगा । 

"हद है.." अशोक ने कहा " उसके भीतर क्या उस समय तक संवेदना जैसी कोई चीज़ नहीं थी?" मैंने कहा " थी ना.. आखिर था तो वह उसके जैसा ही मनुष्य, जो उसके साथ रहता था, उसके साथ खाता-पीता था ,शिकार पर जाता था ,उसके हर सुख दुःख में उसका साथी था । इसीलिए फिर कुछ समय बाद वह फिर उसके पास लौटा होगा यह सोचकर कि शायद उसके भीतर पूर्ववत कोई हलचल हो रही हो ..लेकिन तब तक तो जंगली जानवर मृत देह को खा चुके थे । हो सकता है उसे देह की यह दुर्दशा देख कर अच्छा नहीं लगा होगा । यहीं पर पहली बार मनुष्य को आत्मा का ख्याल भी आया होगा । उसे लगा होगा कि उसके भीतर कोई चीज़ थी जिसकी वज़ह से वह चलता-फिरता था, हँसता- बोलता था जो अब उसकी देह से निकलकर बाहर चली गई है । यही उसकी अवधारणा भविष्य में उसके धर्म की नींव बनी ।"

"लेकिन फिलहाल तो सवाल उस मृत देह के सम्मान का था ।" मैंने अपनी बात जारी रखी " सो अगली बार जब उसके मित्र या परिजन की मृत्यु हुई उसने मृत देह को जानवरों से बचाने के लिए  उसके चारों ओर, और उसके मृत शरीर के ऊपर बड़े- बड़े पत्थर रख दिये । इस तरह यह मनुष्य की पहली कब्र बनी  और इसी तरह मनुष्य का पहला अंतिम संस्कार हुआ । ज़मीन में गाड़ना , शव को बहाना या जलाना जैसे काम तो जल और लकड़ी  की उपलब्धता और भौगोलिक आधार पर बाद में शुरू हुए ।” “वाह वाह ..'पहला अंतिम संस्कार' .. तेरे 'पहला' और 'अंतिम' का जवाब नहीं भाई । रवीन्द्र ने उबासी लेकर कहा लेकिन अब सो जाओ भाई .. नहीं तो सपने में कंकाल ही कंकाल दिखेंगे । ठीक है ।   मैंने कहा  चलो सोने की कोशिश करते हैं ।

शुक्रवार, 19 जून 2020

रूमानियत का किला उसके इस डायनामाईट से ध्वस्त हो चुका था


इस जंगल में हमारे लिए  यह पहला मुफ़्त का मनोरंजन कार्यक्रम था । बरगद के ढेर सारे पेड़ों के बीच में लगा था हमारा शिविर । पास ही चम्बल नदी बहती थी । हम लोगों ने अपना सामान तम्बू में रखा और नदी पर चल दिये हाथ मुँह धोने । हमने अब तक चम्बल के बीहड़ और उनमे रहने वाले डाकुओं के बारे में ही सुना था लेकिन यहाँ न बीहड़ थे न डाकू  । फिर भी हम हाथ मुंह धोते हुए अगल बगल देखते रहे ..कहीं किसी डाकू का घोड़ा न बंधा हो । लौटकर आए  तो रसोई प्रभारी भाटी जी ने गरमा गरम चाय पिलाई । चाय पीकर हम लोग टीले पर पहुँच गए  । यद्यपि हम लोगों का काम अगले दिन से प्रारम्भ होना था लेकिन उत्खनन स्थल देखने की उत्सुकता तो थी ही ।

अद्भुत दिखाई दे रहा था वह टीला..चांद के प्रकाश में । बीच में कहीं कहीं टेकडियों की छाँव जैसे पहली क्लास के किसी बच्चे ने अपनी ड्राइंग कॉपी में चित्र बनाये हों । शांत वेग से बह रही थी चम्बल जैसे कोई माँ अपने बच्चे को सुलाने के बाद आधी नींद में सो रही हो । हवा चलती तो चांद का अक्स पानी में लहराता हुआ नज़र आता । वातावरण इतना खामोश कि हम बहते हुए पानी की आवाज़ साफ साफ सुन सकते थे ।

डॉ.वाकणकर ने दो दिन पूर्व जिस आयताकार ट्रेंच की खुदाई शुरू की थी वह अभी नींद के आगोश में थी , उसे जगाना हमने उचित नहीं समझा और दूर खड़े चुपचाप उसे देखते रहे । उसके भीतर गहन अन्धकार था , सदियों से भीतर अवस्थित  अन्धकार । मैं उसे देखता रहा ..कविता कहीं भीतर से बाहर आने को आतुर थी ..मैंने कहा ..” ऐसा लगता है जैसे इस अतल गहराई में कोई रंगमंच है, जिस पर सैकडों सालों से कोई ड्रामा चल रहा है । जाने कितनी सभ्यताओं के पात्र आवागमन कर रहे हैं । कहीं युद्ध चल रहा है तो कहीं कोई चरवाहा किसी पेड़ के नीचे बैठकर बंसी बजा रहा है । कहीं कोई बच्चा पेड़ से लटके झूले पर बैठा झूला झूल रहा है ,कहीं कोई हरकारा दूर से अपने घोड़े पर बैठा आता हुआ दिखाई दे रहा है । “ “ सुनो सुनो  ...” अजय ने अचानक कहा “ मुझे तो घोडों की टापों की आवाज़ भी आ रही है...” “ बस कर यार ।” रवीन्द्र बोला ” जुकाम के कारण तेरे कान बन्द हैं , यह बलगम की आवाज़ होगी ।“ हम लोग रूमानियत से वास्तविकता के धरातल पर आ चुके थे ।

कल दिन में निखात के उस अंधेरे से साक्षात्कार करेंगे  यह सोच कर हम लोग टीले की ढलान पर बैठ गए  । मैंने कमर सीधी करनी चाही । 
पूरा आसमान मेरी आँखों के सामने था और उसमें चमक रहा था पूर्णिमा का पूरा चांद । चाँद की रौशनी की वज़ह से सितारे थोड़े मद्धम हो गए थे । मैंने उनमें  ध्रुव तारा ढूँढना चाहा ताकि मैं उत्तर दिशा का पता लगा सकूँ । चाँद को देखते हुए मुझे अचानक ऋतुओं का ख़याल आया और फिर ऋतुओं और चाँद सूरज के सम्बन्ध के बारे में । 

रवीन्द्र ने डॉ.वाकणकर के सान्निध्य में अपने खगोलीय ज्ञान का काफी विस्तार कर लिया था । मैंने रवीन्द्र से सवाल किया " यार यह बसंत का अयनांत तो नहीं है ? " रवींद्र ने जवाब दिया " भाई अभी अयनांत कहाँ, पिछला अयनांत 21 दिसंबर को हो चुका है और अगला इक्कीस जून को आएगा ।  मैंने फिर रवींद्र से सवाल किया ..यार लेकिन यह अयनांत और विषुव निर्धारित तिथि पर कैसे आते हैं ?"

रवींद्र ने कहा " चलो मैं तुम्हें एक सिरे से समझाता हूँ कि अयनांत यानी सोलिस्टीस और विषुव यानी इक्विनॉक्स क्या होता है । सबसे पहले विषुव यानि इक्विनॉक्स के बारे में बताता हूँ जब रात और दिन बराबर होते हैं । 
यह हमारे देश में 21 मार्च और 23 सितम्बर को होता है जब रात और दिन बराबर होते हैं । पहले कुछ बेसिक बातें समझ लो । 
तुमने ग्लोब में यह देखा होगा कि पृथ्वी अपनी धुरी पर साढ़े तेईस डिग्री झुकी हुई है और वह स्वयं इसी तरह घूमते हुए सूर्य के चक्कर भी लगाती है । उसका यह पथ गोलाकार अथवा लम्बवत नहीं होता बल्कि दीर्घ वृत्ताकार यानि इलेप्टिकल होता है । पृथ्वी के ठीक मध्य से अर्थात उसके पेट से एक काल्पनिक रेखा जाती है जिसे भूमध्य रेखा कहते हैं । 
पृथ्वी का उपरी हिस्सा जो नासपाती जैसा चपटा है उत्तर ध्रुव तथा दक्षिणी हिस्सा दक्षिण ध्रुव कहलाता है । इस तरह दो गोलार्ध बनते हैं उत्तरी व दक्षिणी ।

अब होता यह है कि सूर्य के चारों ओर घूमते  हुए पृथ्वी की  साल में एक बार ऐसी स्थिति आती है जब वह सूर्य की ओर अधिक झुकी होती है और एक बार ऐसी स्थिति आती है जब वह सूर्य के विपरीत झुकी रहती है । 

पहली स्थिति में दिन बड़ा होता है और दूसरी स्थिति में रात । लेकिन दो बार ऐसी स्थिति आती है जब पृथ्वी का झुकाव न सूर्य की ओर होता है न उसके विपरीत बल्कि वह मध्य में होती है । इन दोनों  स्थितियों में रात और दिन बराबर होते हैं और इन्हें विषुव अथवा इक्विनॉक्स  कहते हैं । अगर इक्विनोक्स के समय हम भूमध्य रेखा पर खड़े हों तो सूर्य ठीक हमारे सर के ऊपर होता है । वैसे दिन और रात बराबर होने कि स्थिति सैद्धांतिक है वास्तव में ऐसा होता नहीं है, फिर अलग अलग देशों में तिथियों में भी फर्क होता है ।

मैंने कहा " इसका अर्थ यह हुआ कि  पृथ्वी का एक गोलार्ध छह माह तक सूर्य की  ओर झुका रहता है और दूसरा गोलार्ध अगले छह माह तक । इसी वज़ह से उत्तर व दक्षिण ध्रुव पर छह माह का दिन और छह माह की रात होते हैं । और जब उत्तरी गोलार्ध में गर्मी होती है तो दक्षिणी गोलार्ध में ठण्ड पड़ती है उत्तरी ध्रुव पर रहने वाले लोगों के लिए इक्विनॉक्स  के अगले छह माह दिन वाले होते हैं जबकि दक्षिण ध्रुव पर रहने वालों के लिए अगले छह माह रात के । मतलब इस विशेष दिन दोनों ध्रुव के लोगों को सूर्य का प्रकाश एक जैसा देखने को मिलता है ।

" बिलकुल ठीक " रवींद्र ने कहा " अब अयनांत या सोलिस्टीस  के बारे में बताता हूँ यह भी साल में दो बार आता है 21 जून को जब दिन सबसे बड़ा होता है और 21 दिसंबर को जब दिन सबसे छोटा होता है । ग्रेगोरियन वर्ष आरम्भ होने के समय अर्थात जनवरी में सूरज दक्षिणी गोलार्ध में होता है फिर वह उत्तरी गोलार्ध में जाना शुरू करता है मकर संक्रांत से । 

लेकिन दिसंबर आते आते फिर दक्षिणी गोलार्ध में पहुँच जाता है । इस तरह आते जाते सूर्य वर्ष में दो बार भूमध्य रेखा पर होता है । असल में सूर्य कहीं नहीं जाता वस्तुतः यह भी पृथ्वी के घूमने के कारण ही होता है । अयनांत को कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि जून में यदि उत्तर ध्रुव से देखा जाए तो सूर्य  सर्वोच्च ऊंचाई पर होता है इसे ग्रीष्म अयनांत  कहते है उसी तरह दिसंबर में यह सूर्य  दक्षिण ध्रुव से देखा जाए तो यह वहाँ से सर्वोच्च ऊंचाई पर होता है ऐसा दिसम्बर में होता है इसलिए उसे शीत अयनांत कहते हैं । जो एक ध्रुव के लिए ग्रीष्म अयनांत होता है वह दुसरे ध्रुव के लिए शीत अयनांत होता है

" मतलब यह कि अभी फरवरी का महिना है और दिन बड़े होते जा रहे हैं " मैंने निष्कर्ष दिया । इस वक़्त चाँद हमारे सामने था और हमारी यह गुस्ताख़ी थी कि हम चाँद की बात न करके सूरज की बात कर रहे थे । चाँद हमसे नाराज़ न हो जाए इसलिए मैंने अपने भीतर के वैज्ञानिक ,खगोलज्ञ और पुरातत्ववेत्ता से कहा .." तुम अभी चुप रहो " और कवि से कहा .. " कोई कविता सुनाओ " मैंने गुनगुनाना शुरू किया ..और बेसाख्ता मेरे मुँह से एक गीत फूट पड़ा..”ये पीला बासंतिया चांद…संघर्षों का ये दिया चांद… .चंदा ने कभी रातें पी थीं… रातों ने कभी पी लिया चांद । “ कभी क्षेत्रीय शिक्षा महाविद्यालय भोपाल में अध्ययन के दौरान कवि रमेश यादव से यह गीत सुना था।


“ बस कर यार । ” इतनी ठण्ड में तुझे बासंतिया चांद कहाँ से दिखाई दे रहा है ? रवीन्द्र भारद्वाज ने मेरे भीतर के कवि और गायक से पुरातत्ववेत्ता की तरह सवाल किया । 

मेरा रूमानियत का किला उसके इस डायनामाईट से ध्वस्त हो चुका था ..मैं भौंचक होकर उसकी ओर देखता रहा कि अचानक मुझे चुप कर वह खुद शुरू हो गया ‘शरद रैन मदमात विकल भई , पिउ के टेरत भामिनी कैसी, कैसी निकसी चांदनी कैसी..चांदनी चांदनी चांदनी....। उसके बाद हम लोग बसंत और शीत ऋतु के कालखंड और अयनांत पर बहस करते हुए अपने तम्बू में वापस आ गये । 

🔲 शरद कोकास 🔲

बुधवार, 10 जून 2020

एक सभ्यता के पश्चात दूसरी सभ्यता का आगमन होता है

एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी

शरद कोकास
भूमिका

उत्खनन स्थल का एक दृश्य
उत्खनन स्थल का एक दृश्य 
  नुष्य का यह सहज स्वभाव है कि वह वर्तमान में   जीते हुए भी कभी कभी अतीत में अथवा भविष्य में  जीने की कल्पना करता है ।  कभी न कभी यह ख़याल   हर एक के मन में आता है कि वह कुछ बरस पहले के  समय में चला जाए ताकि वह एक नए सिरे से वहाँ से  अपना जीवन प्रारम्भ कर सके , जो उस समय अप्राप्य  था उसे   प्राप्त कर सके, अपनी गलतियाँ सुधार सके ,  दुखों को दूर कर सके   और उन सुखों को भोग सके जिन्हें वह भोग नहीं पाया था । ।   ऐसा केवल कल्पना में संभव है । आज तक कोई ऐसी टाइम मशीन  नहीं बनी है कि मनुष्य उसमे बैठ जाए और सुदूर अतीत में पहुँच जाए । विज्ञान के बढ़ते चरणों के बावज़ूद यह संभव नहीं है, इसलिए कि जो बीत चुका है वह ठीक उसी तरह दोबारा कभी घटित नहीं होता । समय की अपनी एक गति होती है और बीते हुए समय में शामिल होना किसी के लिए संभव नहीं है । जब हमें अपने व्यतीत किये गए जीवन में शामिल होना संभव नहीं है तो उस समय में शामिल होना तो बिलकुल ही असम्भव है जो समय हमने नहीं देखा है । हम केवल उपलब्ध विवरणों के आधार पर उस दृश्य का पुनर्निर्माण कर सकते हैं । पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकार इसमें हमारी सहायता करते हैं  । मनुष्य भौतिक रूप से भले ही उन दिनों में नहीं पहुँच सकता लेकिन उस कालखंड के ध्वस्त अवशेषों से उस सभ्यता का एक चित्र निर्माण कर सकता है  ज़मीन की परतों में दबी उस सभ्यता की साँसें  सुन सकता है ।

मनुष्य जाति के विकास की यह यात्रा उसके उद्भव से प्रारंभ हुई जो आज तक लगातार जारी है । इस बीच उसने बहुत कठिन समय देखा है । अपनी जैविक इच्छाओं को लेकर पैदा हुआ मनुष्य भूख के इशारे पर नित नई खोज करता रहा ।  आज के सुविधा संपन्न मनुष्य का जीवन देखते हुए मुझे अक्सर उस मनुष्य का ख़याल आता है जिसका जीवन प्रकृति की कृपा पर अवलंबित था जो कभी भी किसी जंगली जानवर का भोजन बन जाता था या किसी प्राकृतिक आपदा का शिकार हो जाता था । लेकिन इन तमाम कठिनाइयों के बावज़ूद उस मनुष्य ने हार नहीं मानी और प्रकृति से द्वंद्व करते हुए, हिमयुगों में समाप्त हो जाने के खतरों से बचते हुए अपनी विकास यात्रा जारी रखी इसलिए कि उसके पेट के साथ उसके आश्रितों का पेट जुड़ा था । यह वह दौर था जब व्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज नामक संस्था का निर्माण जारी था । यह पांच हज़ार साल पुरानी बात है जब मनुष्य के पास औज़ार बनाने के लिए उपयुक्त  पत्थरों का भण्डार समाप्त होने की कगार पर था उसने  ताम्बे की खोज कर ली थी और अब वह पत्थरों के युग से ताम्बे के युग में प्रवेश कर रहा था । लेकिन उसके सामने अब नई चुनौतियाँ थीं । वह यायावरी की ज़िंदगी से तंग आकर एक स्थायी जीवन बिताना चाहता था । प्रकृति ने उसे ऐसे अवसर प्रदान किये और उसकी बिखरी हुई ज़िन्दगी धीरे धीरे बसने लगी । पुरापाषाण युग से निकल कर आने वाले मनुष्य के जीवन के इस कालखंड को ताम्राश्म युगीन सभ्यता का नाम दिया गया ।


जीवन अपने संप्रत्यय में स्थायी होते हुए भी व्यक्तिगत रूप में स्थायी नहीं होता । जैसे मनुष्य की मृत्यु होती है वैसे ही सभ्यताओं का भी विनाश होता है । एक सभ्यता के पश्चात दूसरी सभ्यता का आगमन होता है । एक बस्ती मिट जाती है और उसके अवशेषों पर दूसरी बस्ती का निर्माण होता है । समय की चादर उन अवशेषों को मिटटी में गहरे दफ्न कर देती है । अगर हम उस सभ्यता तक जाना भी चाहें तो एकाएक उस तक नहीं पहुँच सकते । पहले हमारा सामना बाद की सभ्यताओं से होता है और उसके पश्चात हम उस प्राचीन सभ्यता तक पहुँच सकते हैं । एक पुरातत्ववेत्ता कालक्रमानुसार अतीत की खोज करते हुए यही काम करता है । वह परत दर परत ज़मीन के भीतर पहुँचते हुए अंततः उस सभ्यता तक पहुँच जाता है जिसके पास इस मनुष्य जाति के प्रारंभिक स्वप्न थे ।

शरद कोकास 


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रविवार, 27 सितंबर 2015

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – तेरहवाँ दिन – पाँच



जनता के साथ अजंता की सैर    

            भोजन के पश्चात पेट ही नहीं मन भी भरा भरा सा लगता है । भोजन शरीर में पहुँचकर उर्जा उत्पन्न करता है वह उर्जा कोशिकाओं में पहुँचकर रक्त प्रवाह को गति देती है और वह रक्त मस्तिष्क तक पहुँचकर समस्त क्रियाकलापों को गति देता है आखिर मन मस्तिष्क के इन्ही सब क्रियाकलापों का योग ही तो है । भाटी जी ने आज हरे मटर की रसेदार सब्ज़ी बनाई थी जो उन्हें गाँव के मज़दूर दे गए थे ,साथ में टमाटर की चटनी भी । होटल के बेस्वाद भोजन से अलग इस भोजन के स्वाद की बात ही कुछ और थी सो हमारा मन प्रफुल्लित था इसलिए आज खाने के बाद टहलने का मन भी नहीं हुआ ।

            भोजनशाला से निकलकर हम लोग सीधे तम्बू में पहुँचे । जिस तरह घूमने जाने की इच्छा रखने वाला नन्हा शिशु अपने पिता का ध्यान आकर्षित कराने के लिए साइकल की ओर ऊँगली  से संकेत करता है उसी तरह अजय ने  मेरे बैग से मेरी डायरी निकाली और  मुझे थमा दी । मैं समझ गया सबकी इच्छा  आगे का यात्रा वृतांत सुनने की है । मैंने डायरी खोली और सवाल किया " तो हम कहाँ थे ? " अजय ने तपाक से कहा " सुलभ शौचालय में .. मेरा मतलब शौच आदि से निवृत होकर आप लोग जलगाँव के बस अड्डे पर गर्मागर्म चने की की मिसल वाला आलू पोहा खा रहे थे । " " ओके ओके ।" मैंने कहा और फिर जनता के बीच अजंता यात्रा का वाचन प्रारम्भ कर दिया ।

            "तो इस तरह नाश्ते के बाद हम लोगों ने अजंता के लिए कूच किया । हमारी डॉज के ड्राईवर जमनालाल जी ने बताया कि जलगाँव से अजंता की दूरी इकसठ किलोमीटर है और इस यात्रा में लगभग एक घन्टा लगता है । आज किसी सीट पर किसी का रिज़र्वेशन नहीं था इसलिए मैंने खिड़की के पास की एक सीट चुनी और उस पर बैठ गया । बचपन से ही यात्रा में खिड़की से बाहर के दृश्यों को देखना मुझे अच्छा लगता है । जिस ज़िंदगी को हम जी नहीं सकते उसकी एक झलक ही मिल जाए तो क्या कम है । हिंदी साहित्य में आलोचना के अंतर्गत जब किसी के द्वारा ग्रामीण जीवन पर कुछ लिखा जाता है और उसमे गाँव के सुख दुःख शामिल नहीं होते अथवा गाँव का बहुत रूमानी वर्णन होता है तो अक्सर कहा जाता है कि उसकी कविता में गाँव बस या रेल की खिड़की से देखे हुए गाँव जैसा है ।"

            "इसीलिए तो भैया हम तेरे को दंगवाड़ा गाँव घुमाने ले जाते हैं ताकि तू आगे चलकर जब बड़ा कवि बने तो गाँव के जीवन का यथार्थ वर्णन कर सके ।" अजय ने तपाक से मेरी इस बात पर कमेन्ट किया ।" ठीक है ठीक है, आगे जब बड़े होंगे तब देखेंगे ..क्या पता इस पुरातत्व विभाग में ऐसी जगह नौकरी मिले जहाँ गाँव में ही रहना अनिवार्य हो .. तब भी यह इच्छा पूरी हो जाएगी और बड़े कवि की छोड़ कवि ही बन जाएँ इतना काफी है ।"  "ओके भाई .." रवीन्द्र ने कहा " तब की तब देखी जाएगी, चल आगे की डायरी सुना ।"

            " लो सुनो । " मैंने कहा । खिड़की के पास बैठकर बाहर के दृश्यों को देखते हुए कब अजंता आ गया पता ही नहीं चला । अजंता की दूरी दर्शाने वाले मील के पत्थर दिखाई देने लगे थे और मैं उन्हें पढ़ता जा रहा था …अजंता की गुफाएँ 4 कि मी, अजंता केव्ज़  3 कि मी, अजिंठ्या लेण्या 2 कि मी । बौद्धकालीन अजंता की गुफाओं के विषय में कोर्स में मैंने काफी कुछ पढ़ रखा था । मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं कुछ ही देर में बौद्धकालीन युग में प्रवेश करने वाला हूँ । चारों ओर विशालकाय पहाड़ियाँ थीं । आँखों को तृप्त करने वाली हरियाली से यात्रियों को आकर्षित करते हुए दूर दिखाई देने वाले छोटे - बड़े पौधे बस की विपरीत दिशा में भागते प्रतीत हो रहे थे । मेरा मन उससे भी पीछे भाग रहा था । मुझे लगा कि बस कुछ ही देर बाद मेरी आँखों के सामने एक अद्भुत दृश्य होगा जिसमें गेरुए वस्त्रों में कलाकार से दिखाई देने वाले कुछ बौद्ध भिक्षु होंगे, जिनके हाथों में कूचियाँ होंगी और वे किसी गुफा के भीतर चित्रकारी में रत होंगें ।

             मैं सोचने लगा उस कालखंड विशेष के बारे में जब यहाँ यह पक्का रास्ता नहीं रहा होगा, यह मील के पत्थर भी नहीं रहे होंगे,  न वाहनों की कर्कश आवाज़ होगी न धूल न धुआं । बस यहाँ रही होगी यह निर्जन पहाड़ी, नाल के आकार में गुफाओं की लम्बी कतार, आकाश में विचरण करते ढेर सारे पक्षी और वातावरण  में गूंजते  ‘ बुद्धम शरणम गच्छामि ‘ के स्वर । अचानक बस ने आख़िरी  मोड़ लिया और अतीत के खुले आसमान में विचरण करता हुआ मेरा स्वप्न सैलानियों की कारों, टूरिस्ट बसों, छोटी छोटी दुकानों और होटलों की दमघोटू भीड़ के बीच गिरकर चकनाचूर हो गया । वहाँ का शोर सुनकर मुझे लगा जैसे मैं किसी मेले में आ गया हूँ । ड्राइवर ने बस एक किनारे पर लगा दी । हम लोग उतर कर नीचे आए । मैंने एक अंगड़ाई ली और हवा को ज़ोर से भीतर खींचकर फेफड़ों में भर लिया ।

             मैंने चारों ओर नज़रें इस तरह घुमाकर फेंकी जैसे कोई मछुआरा अपना जाल घुमाकर फेंकता है । मुझे उन गुफाओं की तलाश थी जिनके बारे में मैं बचपन से सुनता चला आया था । पूछने पर ज्ञात हुआ कि उन गुफाओं की श्रंखला के प्रवेश द्वार तक पहुँचने के लिए पहले सीढ़ियाँ चढ़नी होंगी । उसके बाद उन गुफाओं का संसार प्रारम्भ होगा जो आज पूरी दुनिया में मशहूर हैं । सीढ़ियों पर चढ़कर हम लोगों ने टिकट खरीदे और प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश किया । मैं अपनी मूर्खता पर मन ही मन हँस रहा था । जाने क्यों मुझे इस बात का गुमान था कि गुफायें अब भी ढाई हज़ार साल पहले की स्थिति में होंगी । इन गुफाओं की खोज हुए भी जाने कितना समय बीत चुका है और अब तो यह बाकायदा एक टूरिस्ट सेन्टर बन चुका है । इस बात का हमें भान था कि हम लोग यहाँ टूरिस्ट की तरह नहीं बल्कि अध्ययनकर्ता की तरह आए हैं और हमें उसी तन्मयता के साथ इन गुफाओं का अवलोकन करना है जिस तन्मयता के साथ कलाकारों ने इन गुफाओं में चित्र उकेरे होंगे ।

            सीढ़ियाँ चढ़ने के उपरांत हमें जो सबसे पहली गुफा मिली उसे पुरातत्व विभाग ने गुफा क्रमांक एक नाम दिया है । उसके बाद क्रम से गुफा क्रमांक दो, तीन,चार आदि हैं । इस क्रम  का इन गुफाओं के निर्माण काल से कोई सम्बन्ध नहीं है । वास्तव में सबसे पहले जिस गुफा में चित्र उकेरे गए वह गुफा क्रमांक दस है । इसके बाद इस गुफा के दोनों ओर क्रमश: गुफाएँ कटती चली गईं हैं । अजंता की यह गुफाएँ मनुष्य द्वारा निर्मित वे बेजोड़ गुफाएँ हैं जिन पर भारत को गर्व है । देश विदेश से आए सैलानी इन्हें  देख आश्चर्य चकित हो उठते हैं । अहा ! इतना अद्भुत सौंदर्य ! इन गुफाओं में चित्रकला व शिल्प कला के बेजोड़ नमूने हैं । इनकी किसीसे तुलना नहीं हो सकती । बुद्धि व श्रम के संयोग से निर्मित इन गुफाओं को देख कर आधुनिक तकनीक भी हैरान है । प्राकृतिक रंगों के निर्माण व उपयोग के बारे में उस युग के मनुष्य की समझ व ज्ञान को देख कर ऐसा नहीं लगता कि कला के प्रति उस मनुष्य का सौन्दर्यबोध किसी भी तरह कम रहा होगा । इन गुफाओं के निर्माण का उद्देश्य भी स्पष्ट है । इक्कीस सौ वर्ष पूर्व जब बौद्ध धर्म अपने चरम पर था, लाखों की तादाद में बौद्ध भिक्षु दीक्षा ले रहे थे और उन्हें अपनी साधना के लिए किसी एकांत की आवश्यकता थी । इसी आवश्यकता ने इन गुफाओं को जन्म दिया ।

मेरे डायरी वाचन के बीच अचानक अजय का एक सवाल कूद पड़ा “ लेकिन यार इन गुफाओं का पता कैसे चला ? इन तक भी डॉ. वाकणकर जैसा कोई व्यक्ति पहुँचा था क्या ? “हाँ बताता हूँ …” मैंने कहा “आगे यही लिखा है मैंने । बाघोरी नदी के किनारे नाल के आकार में बनी इन गुफाओं की खोज की कहानी भी अत्यंत रोचक है । सन अठारह सौ उन्नीस , अंग्रेज़ों के समय की बात है । एक दिन एक अंग्रेज़ शिकारी शिकार के लिए निकला और जंगल में रास्ता भटक गया । उसे एक किसान का लड़का मिला उसने शायद इनाम की लालच में शिकार प्राप्त होने की संभावित दिशा बताते हुए इन गुफाओं की ओर इशारा किया । उस समय यह गुफाएँ असंख्य पेड़ों और लताओं से घिरीं थीं । अंग्रेज़ शिकारी ने दूरबीन से इधर देखा। उसे पेड़ों के पीछे किसी गुफा में एक चित्र नज़र आ गया और वो खुशी से उछल पड़ा । इस तरह यह गुफाएँ सारे संसार में मशहूर हो गईं ।"

इतना कह कर मैं चुप हो गया । मैंने देखा अजय, रवीन्द्र, अशोक सब इस तरह मुझे देख रहे थे जैसे यह बात मैं उन्हें  पहली बार बता रहा हूँ । “फिर क्या हुआ ?“ अशोक ने सवाल किया । “बस अजंता की कला देखते हुए मैं उसमें खो गया । एक एक गुफा की दीवारों पर चित्रित जातक कथाएं, बुद्ध की विभिन्न मुद्राएँ, मुद्राओं में दुख की परिभाषा, चेहरे पर वैराग्य की अनिवार्यता और संसार को सही सही जान लेने का भाव । इसके अलावा भी बहुत कुछ था इन चित्रों में …गृहस्थ जीवन के प्रति पति की उदासीनता से आहत यशोधरा, भिक्षुओं के भिक्षाटन ,उपदेश श्रवण,संगीति जैसे विभिन्न क्रियाकलाप, दान की गाथाएँ और जाने क्या क्या, इसका वर्णन शब्दों में संभव ही नही है । उन्नीस गुफाओं को पार करते हुए जैसे मैं एक युग पार कर चुका था । हम जिस कला व संस्कृति की बात करते हैं, वह संस्कृति तो यहाँ छुपी हुई है । ऐसी संस्कृति जिसे किसी धर्म या जाति या देश काल की परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता ।

"लेकिन अँधेरी गुफाओं के भीतर कलाकारों ने यह चित्र बनाये कैसे होंगे ?" अजय ने मुझसे सवाल किया । "आसान था ।" मैंने कहा । फिल्म की शूटिंग के लिए कैमरामैन जिस तरह रिफ्लेक्टर का उपयोग करते हैं उसी तरह इन कलाकारों ने भी सूर्य की रौशनी को भीतर तक लाने के लिए चमकीली सतह वाले रिफ्लेक्टर्स का उपयोग किया होगा और रंग भी फूल, पत्तों, रंगीन पत्थर  और प्राकृतिक वस्तुओं जैसे चर्बी , पौधों का अर्क आदि की सहायता से बनाये होंगे इसीलिए अब तक यह चित्र जस के तस हैं ।"

"लेकिन मैंने देखा है बहुत सारे चित्रों में अब रंगों का क्षरण हो रहा है ।" अशोक ने कहा । " हाँ यह तो है," मैंने कहा  "इतने सारे लोगों का आना, कृत्रिम रौशनी और प्रदूषण कुछ न कुछ असर तो होगा ही, इसीलिए अब कुछ चित्रों को संरक्षित करने के लिए उन पर टचिंग की जा रही है ।" "लेकिन इससे तो मूल पेंटिंग्स ख़राब हो जाएँगी " अशोक ने कहा । "हाँ हो सकता है लेकिन किया भी क्या जा सकता है, अजंता अब एक बहुत बड़ा पर्यटन उद्योग है । खैर आगे सुनो " इतना कहकर मैंने फिर डायरी वाचन प्रारंभ कर दिया । 

"गुफाएँ देखते हुए दोपहर के तीन बज चुके थे लेकिन हमें वापस भी लौटना भी था । हम जैसे अध्ययनकर्ताओं के लिए चार -पांच घंटों का यह समय बहुत कम था । यह सोचकर कि ठीक ठाक नौकरी मिल जाने के बाद एक बार फिर दो - चार दिनों के लिए  यहाँ आएँगे हम लोगों ने संतोष कर लिया । हमसे बिछड़कर जैन सर जाने कब पत्थर की गुफाओं से निकल कर लोहे की गुफा यानि बस में आकर बैठ गए थे । वैसे भी वे पूर्व में अनेक बार यहाँ आ चुके थे, यह उनके लिए एक रूटीन वर्क की तरह था । हमें आता देख उन्होंने चिन्ता प्रकट की “अरे भाई , भूख- वूख नहीं लगी क्या तुम लोगों को ?” भूख एक सच्चाई की तरह हमारे सामने थी और उसे रोटी के चित्र से नहीं मिटाया जा सकता था चाहे वह कितना भी रंगीन और आकर्षक हो । “चलो महेश ।“ मैंने कहा “ भूख मिटाने का कुछ इन्तज़ाम किया जाए ।“ और हम लोग किसी होटल की तलाश में निकल पड़े ।"

" हा आ आ आ " बड़ा सा मुँह फाड़ते हुए अजय ने कहा " बस कर यार इसके आगे की डायरी अब कल सुनेंगे, अभी तो बहुत ज़ोरों की नींद आ रही है ।" " ठीक है ।" मैंने कहा । "बाक़ी कल ।" वैसे भी हम लोगों का यह सामूहिक अनुशासन है कि यदि एक व्यक्ति सोने की इच्छा प्रकट करता है तो सभी के लिए वार्तालाप स्थगित करना अनिवार्य होता है । मैंने रज़ाई सर तक ओढ़ ली और अपनी आँखें बंद कर लीं । मेरा मन बुद्धकाल में पहुँच गया था । देह को यात्रा के लिए साधनों की आवश्यकता होती है लेकिन मन तो जाने कहाँ कहाँ भटकता रहता है मन की यह यात्रा जारी थी ..बोधगया, सारनाथ, लुम्बिनी, कुशीनगर ..। फिर जैसे तन की यात्रा में नींद आती है मन की यात्रा में भी आना 

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

एक पुरातत्ववेता की डायरी -दसवां दिन - छह


नेताओं के अल्पज्ञान के बारे में हम ढेर सारे किस्से सुनते हैं ,कई चुटकुले भी मशहूर है  जैसे एक नेता भाषण दे रहे थे हमारे देश मे तीन तरह के खेल होते है एक सेमी फाईनल एक फाईनल और एक ओलम्पिक .हाँलाकि अब तो नेताओं को ज़्यादा जानकारी रहती है और उनके पास उनके अधिकारी भी होते है । लेकिन इतिहास और पुरातत्व के बारे मे अब भी वही हाल है । लीजिये प्रस्तुत है एक नेता जी का एक सच्चा किस्सा जो हमे बरसों पहले डॉ. वाकणकर जी ने सुनाया था ।  
एक पुरातत्ववेता की डायरी -नौवाँ दिन -दो 
सरकार का पैसा क्या फालतू समझ रखा है ..बस ऊंडे जाओ ऊंडे जाओ
“ क्या यार इतने दिनों से खुदाई कर रहे हैं बस इतना ही खोद पाये । “ अजय ने खीझते हुए कहा । जाने कैसे डॉ. वाकणकर ने उसकी बात सुन ली और कहा “ धीरज रखो बेटा पुरातत्व की खुदाई इतनी आसान नहीं है । यह गढ्ढा खोदने का काम नहीं  है , रोज़ थोड़ा थोड़ा खोदते हुए आगे बढ़ना होता है , किसी वैज्ञानिक की तरह .किसी खोजी की तरह , किसी चिकित्सक की तरह । हम लोग पहले से ही मायूस थे ,उनकी बात सुनकर और मायूस हो गये । सर हम लोगों की उदासी भाँप गये । और फिर अचानक उन्होने कहा “ अरे दुष्टों इसमे उदास होने की क्या बात , चलो तुमको एक बढ़िया किस्सा सुनाता हूँ । 
एक बार कि नई क्या हुआ हम लोग एक साइट पर खुदाई कर रहे थे । एक माह से काम चल रहा था और एक ट्रेंच से बहुत महत्वपूर्ण तथ्य मिल रहे थे । कुछ भी नष्ट न हो इसलिये हम सावधानी से काम ले रहे थे ।एक दिन वहाँ एक नेताजी घूमते हुए आ गये । ट्रेंच को देखते हुए उन्होने अपने अन्दाज़ में पूछा “ हूँ... कितने दिनों से खुदाई चल रही है ? “ हमने बताया “ साब एक माह से । “ इतना सुनते ही वे आग बबूला हो गये और ट्रेंच की ओर इशारा करके चिल्लाने लगे “ एक महीने से खुदाई चल रही है और बस इतना ही खोदा है आप लोगों ने ? " फिर उन्होने मजदूरों की भीड़ देखी  तो और नाराज़ हुए .."कितने आदमी लगा रखे हैं .. सरकार का पैसा क्या फालतू समझ रखा है जो इस तरह बरबाद कर रहे हो ।अगर ठीक से खोदना नहीं आता तो बन्द कर दो खुदाई ।" इससे पहले कि हम उन्हे कुछ समझा पाते कि पुरातत्व की खुदाई और गढ्ढा खोदने मे फर्क होता है ..वे गुस्से मे निकल गये और जाते जाते कह गये ..” अभी तीन दिन बाद मैं फिर इधर आउंगा ,मुझे ठीक- ठाक काम दिखना चाहिये “
 “बस फिर क्या था “ सर ने कहा “ मेने दो मज़दूरों को बुलाया और साइट से बाहर दूर की एक ज़मीन बताकर कहा “ वहाँ खोद डालो रे जितना खोद सको ,बस ऊंडे जाओ ऊंडे जाओ  ।ये नेताजी को बड़ा सा गढ्ढा देखना है ..इन्हे इतिहास .तकनीकी और पुरातत्व विज्ञान से क्या मतलब ।“ तो ऐसा है अपने सत्ताधीशों का पुरातत्व ज्ञान । 
डॉ. वाकणकर की बात सुनकर हम लोग हँस हँस कर लोट पोट हो गये । सर ने कुछ देर बाद गम्भीर होकर कहा “ ऐसा नहीं है कि वे कुछ नहीं जानते या यह केवल तकनीकी ज्ञान के अभाव के वज़ह से उनका यह व्यवहार है । यह मनोवृति इतिहास को गैरज़रूरी समझने के कारण है । इतिहास बोध तो अपनी जगह है लेकिन अतीत को लोग इसलिये भी रहस्यमय मानते हैं कि   वो उनकी समझ से परे है ।  
अब डॉ. वाकणकर जैसे विद्वान पुराविद ने यह बात कह दी तो मै क्या कह सकता हूँ ..प्रतीक्षा है उनकी इस बात पर आपकी प्रतिक्रिया की - चित्र गूगल से साभार                                                                                             

आपका - शरद कोकास                                                                                               

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी -दसवां दिन - पाँच

दंगवाड़ा के इस उत्खनन कैम्प में हमारा खुदाई का यह नौवाँ दिन है लेकिन  इस दिन एक ऐसी घटना घटी कि हम सभी को बहुत शर्मिन्दा होना पड़ा । क्या हुआ यह जानने से पहले ज़रा पाँचवें दिन की डायरीपर एक नज़र डाल लें। 

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी -पाँचवा दिन 


आज की सतह निरीक्षण में हमे स्वास्तिक चिन्ह युक्त एक सिक्का , एक टेराकोटा ऑब्जेक्ट तथा एक स्टोन बॉल प्राप्त हुआ । आज हमने सतह से खुदाई प्रारम्भ की  और 31 सेंटीमीटर तक पहुंचे । इन प्रारम्भिक बातों के लिये डॉ.आर्य हमारा मार्ग दर्शन करते रहे । शाम को कार्य समाप्त करने के बाद हमे यह भी बताया गया कि प्राप्त वस्तुओं की देखभाल कैसे की जाये और उन्हे सम्भाल कर कैसे रखा जाये । सदियों से जो अवशेष ज़मीन के भीतर दफ्न हैं बाहर आते ही ऐसे लगा जैसे वे हमसे बातें करने लगे है । मिट्टी का 4 से.मी. का एक छोटा सा पात्र हाथ में लिये अशोक उसे बहुत देर तक निहारता रहा । “क्या देख रहा है अशोक ?” मैने ध्यान से पात्र देखते हुए अशोक से पूछा । “ वाह कितना सुन्दर पात्र है “ अशोक ने कहा । मुझे लगा वह ताम्राश्मयुगीन सभ्यता की किसी विशेषता पर हम लोगों का ध्यान आकर्षित करने वाला है । लेकिन अशोक ने अपनी नज़रें उस पर से हटाये बगैर फिर कहा “ अपने तम्बू में सिगरेट की राख झाड़ने के लिये ऐश ट्रे नहीं है यह बढ़िया काम आयेगा । और फिर उसने धीरे से उसे अपनी पैंट की जेब में रख लिया ।

और अब ..एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी -नौवाँ दिन-एक
  काश यह वस्तु हमारे ड्राइंग रूम में होती !!!

सुबह सोकर उठे ही थे कि डॉ.वाकणकर इंस्पेक्शन के लिये हमारे तम्बू में प्रवेश कर गये । बिस्तर वगैरह तो हमने करीने से लगा रखे थे सारी चीजें कपड़े बैग आदि व्यवस्थित रखे थे  । लेकिन वाह वाह कहते हुए अचानक उनकी निगाह उस चाल्कोलिथिक पात्र पर पड़ गई जिसे पाँच दिन पहले अशोक ट्रेंच से उठाकर ले आया था और बतौर ऐश ट्रे उसका बखूबी इस्तेमाल कर रहा था । “ व्वा बेटा “ उन्होने कटाक्ष करते हुए कहा । “ शौक तो तुम्हारे रईसों के हैं । इससे पहले कि अशोक अपने धूम्रपान की चोरी पकड़ी जाने पर शर्मिन्दा होता उन्होने कहा “ जानते हो तुम्हारी इस ऐश ट्रे की कीमत क्या है ? ये एक लाख से कम की नहीं है । “ अशोक ने तुरंत माफी माँगी ,बाहर जाकर ऐश ट्रे खाली की और डॉ. साब को देने लगा तो उन्होने कहा “ ऐसे नहीं इसे अच्छी तरह धोकर साफ करो , सुखाओ और फिर आर्काईव में जमा करो .. नहीं तो  तुम्हारा कोई जूनियर चाल्कोलिथिक पीरियड में विल्स या पनामा का उद्भव जैसे विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत कर देगा । ‘
            सुबह सुबह डाँट खाने का असर ट्रेंच पर पहुंचने तक था । हाँलाकि अशोक को इस बात पर संतोष था कि सिगरेट के लिये उसे डाँट नहीं पड़ी । लेकिन ऐश ट्रे के लिये पड़ी डाँट के लिये भी हम सभी अपने आप को दोषी मान रहे थे । बिना अनुमति उत्खनन में निकली किसी भी वस्तु का कोई भी उपयोग अपराध तो था । यद्यपि उसे घर ले जाने जैसी कोई मंशा हमारी नहीं थी क्योंकि यह इतनी कीमती वस्तु थी जिसकी कीमत हम नहीं आँक सकते थे ।लेकिन उपयोग करने के  इसी अपराध बोध के कारण हम सभी असहज थे यद्यपि सर ने इसे सहज बनाने का प्रयास किया था  ।
 यह तो हुई उत्खनन की बात लेकिन यह बताइये कि क्या हम लोग इन वस्तुओं की कीमत समझते हैं । मन्दसौर के शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि उत्खनन से पूर्व वह तालाब में आधा गड़ा हुआ था और उस पर कपड़े  धोये जाते थे । अभी भी कई पुरातात्विक महत्व के स्थानों पर आसपास के गाँवों के लोग अनजाने में वस्तुएँ उठा ले जाते हैं । मूर्तियाँ घर में ,मन्दिर में रखकर उनकी पूजा की जाती है जबकि यही वस्तुएँ म्यूज़ियम में रहें तो सभी लोग उसे देख सकें ।व्यक्तिगत संग्रह की प्रवृत्ति हमें ऐसी है कि हम लोग जब किसी पुरातात्विक महत्व के स्थान पर जाते हैं तो हमारा मन नहीं करता कि कोई वस्तु उठाकर अपनी जेब में डाल लें ? गनीमत है कि म्यूज़ियम और ऐसे ही अन्य स्थानों पर कड़ा पहरा रहता है अन्यथा हमारे दिमाग़ में यह ख्याल तो आता ही है कि हमारे ड्राइंगरूम में यह वस्तु कैसी लगती ? अब आप समझ गये होंगे कि पुरातात्विक वस्तुओं की इतनी सुरक्षा क्यों की जाती है । बावज़ूद इसके तस्कर अपना काम कर जाते हैं और देश की बहुमूल्य वस्तुएँ, कीमती मूर्तियाँ रातों रात विदेश पहुँच जाती हैं । 
एक प्रश्न और ..विदेशी संग्रहालयों में अपने देश की मूर्तियाँ और बहुमूल्य वस्तुएँ देखकर कभी आपके मन में यह ख्याल आया कि ये यहाँ तक कैसे पहुँची होंगी ? और आज़ादी के पहले कितनी वस्तुएँ जा चुकी हैं । हम तो गान्धी जी के व्यक्तिगत सामानों के लिये हायतौबा कर रहे थे लेकिन उसके पहले जो कुछ जा चुका है उसके बारे में कभी सोचा है ? क्या वह सब हमें वापस नहीं मिलना चाहिये ? क्या वह हमारे देश की कीमती धरोहर नहीं है ? (चित्र गूगल से साभार ।) कुछ जानकारी आप यहाँ से भी प्राप्त कर सकते हैं ।  - आपका - शरद कोकास

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी :दसवां दिन - चार


कैम्प में ओलम्पिक की चर्चा जारी है । मनुष्यों से बात घोड़ों पर आ गई है । और यहाँ एक रहस्य खुलता है । जैसे हम मनुष्यों के पूर्वज हुआ करते थे वैसे घोड़ों के भी तो रहे होंगे ? और उसके हाथ पाँव भी होंगे हमारे जैसे ?
एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी :आठवाँ दिन : छह                                                                                           
घोड़े की भी मनुष्यों जैसी पाँच उंगलियाँ होती थीं
           “ सर वो ओलम्पिक..” अजय ने फिर गाड़ी पटरी पर लाने के लिये इशारा किया । “ हाँ तो मैं बता रहा था “ सर ने कहा “ इन ओलम्पिक खेलों में कुश्ती,चक्रफेंक,भालाफेंक,घुड़दौड़ रथदौड़ आदि प्रमुख खेल थे । रथदौड़ के मैदान को हिप्पोड्रोम कहते थे । एक ईवेंट में एक रथ को मैदान के बारह चक्कर लगाने होते थे । कई बार आपस में टकराकर भीषण दुर्घटनायें भी होती थीं । जैसे आजकल कार रेस में होती हैं ।"                                                                                   “ सर लेकिन इसमें तो केवल सम्पन्न लोग ही भाग ले पाते होंगे आखिर रथ और चार घोड़े जुटाना आसान नहीं है । मैने कहा । हाँ “ सर बोले सम्पन्न लोग ही विजेता होते थे क्योंकि विजेता रथ का सारथी नहीं बल्कि मालिक कहलाता था जिसके पास ज़्यादा घोड़े वो विजेता और दुर्घटना में भी सारथी ही मरता था मालिक को इनाम मिलता था । “                                                                                                                                                                                    
“और बेचारे घोड़े का कोई रोल नहीं “ मैने कहा “ जंगल के घोड़े ने उंगलियाँ  गँवाकर खुर क्या प्राप्त किया इंसान का वाहन बन गया । ““ ये क्या कहानी है भाई ? “ रवीन्द्र ने सवाल किया ।“ तुम्हे नहीं पता “ मैने कहा । “ लाखों साल पहले घोड़े की पाँच उंगलियाँ हुआ करती थीं और वह जंगलों में रहता था जहाँ सूखे पत्तो पर दौड़ने के लिये उंगलियाँ काम आती थीं । फिर जंगल कम हुए , और मैदान में दौड़ने के लिये उंगलियों की ज़रूरत ही नहीं बची सो अगली नस्लों में पाँच से घटकर तीन उंगलियाँ हुईं और अंतत: एक खुर रह गया । इन प्रजातियों के क्रमश: हिप्पस, मेसोहिप्पस ,प्लियोहिप्पस और इक्वस नाम हैं । “ अच्छा इसलिये ओलम्पिक में घुड़्दौड़ के मैदान को हिप्पोड्रोम कहते हैं ।“ रवीन्द्र ने कहा । “ लेकिन यह बात तो है कि कहानियों का कोई ओलम्पिक होगा तो शरद को गोल्डमेडल ज़रूर मिलेगा । “  ठीक है ठीक है चलो अब सो जाकर सुबह जल्दी सोकर नहीं उठे तो खैर नहीं । “ सर ने आखरी फरमान जारी किया ।   अच्छा हुआ ना हमारे हाथ पैरों की  उंगलियाँ नहीं घिसीं वरना हम भी खुर वाले मनुष्य कहलाते और फिर क्या होता आप कल्पना कर सकते हैं ---शरद कोकास (चित्र गूगल से साभार )

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी : दसवां दिन - तीन

                 जिन दिनो मैं विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से पुरातत्व में एम.ए. कर रहा था , वहीं पास ही चम्बल नदी के किनारे एक उत्खनन कैम्प में जाना हुआ , डॉ. वाकणकर के निर्देशन मे हम लोग पन्द्रह दिन वहाँ रहे । उस दौरान काम के साथ साथ बहुत सारी बातों पर चर्चा होती रही ,हम मित्रों के बीच । यही सब प्रस्तुत कर रहा हूँ इन दिनों इस " एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी में "। इसे आप कहीं से भी पढ़ सकते हैं इसलिये की डायरी के लिये कविता या कहानी जैसी कोई शर्त नहीं होती कि इसे प्रारम्भ से ही पढ़ा जाये ।इस तरह इस चर्चा में भी आप भाग ले सकते हैं । इसे भविष्य में पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित करने की योजना है । तय है कि उसमें ब्लॉग के पाठक भी शामिल रहेंगे ।
               फिलहाल चर्चा चल रही है ओलम्पिक पर और उसमें होने वाले खेलों और भाग लेने वाले खिलाड़ियों पर । मुद्दा यह है कि उस समय स्त्रियों को खेल में भाग लेने की इज़ाज़त क्यों नहीं थी । चलिये आगे पढ़ते हैं...  
         एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी : आठवाँ दिन : पाँच 
ओलम्पिक में स्त्रियों को भाग लेने की इज़ाज़त नहीं थी ।
             “ सर वो ओलम्पिक के बारे में बता रहे थे आप “ अजय ने सर को मूल विषय पर वापसी के लिये संकेत दिया । “ हाँ “ सर बोले “ मैं कह रहा था कि ओलम्पिक देखने हज़ारों की संख्या में लोग आते थे । तम्बुओं में उनके रहने की व्यवस्था की जाती थी लेकिन स्त्रियों के लिये इस ओलम्पिक में प्रवेश निषेध था । इस नियम का उल्लंघन करने वाली स्त्री को मौत की सज़ा तक दी जा सकती थी ।

              “ यह तो बड़ा अन्याय है सर “ रवीन्द्र ने कहा । “ हाँ “ सर बोले “ हो सकता है देशकालानुसार ऐसा नियम रहा हो , यह तो बहुत बाद में स्त्रियों ने खेल में भाग लेना शुरू किया ।शुरू शुरू में जियस के मन्दिर में होने वाले खेलों में ही उन्हे इज़ाज़त दी गई । हमारे देश में भी स्त्रियों के लिये बहुत से खेल वर्जित थे और आज देखो लड़कियाँ ही सर्वाधिक पदक जीतती हैं ।
                “ अपने देश में कहाँ जीतती हैं सर ? अपने यहाँ तो बचपन से ही लड़कियों को लड़कों के खेल खेलने से मना किया जाता है । लड़कों को सारे खेल खेलने की अनुमति है लेकिन लड़की ने जहाँ लड़कों के साथ खेलना चाहा कि बस ..। लड़के खेलते हैं क्या गुड्डे -गुड़ियों से ?  “ अशोक बोला ।
                 " इसीलिये तो लड़कियाँ पीछे रह जाती हैं । भले ही देश मे लड़कियों की हॉकी , फुटबाल ,क्रिकेट टीम हो लेकिन विश्व स्तर पर कहीं कोई नाम है क्या उनका ? और इन खेलों की छोड़ो अन्य खेलों में भी कहीं नाम है क्या ? अथेलेटिक्स में अन्य देशों की लड़कियाँ कितने करतब दिखलाती हैं हमारे देश की कोई खिलाड़ी नज़र आती है क्या ? इसका मतलब साफ है, हमारे देश में लड़के -लड़कियों  में भेदभाव किया जाता है ।  अजय ने गुस्से से कहा ।
                  बातचीत यूनान के ओलम्पिक से शुरू होकर भारत के खेल तक पहुंच चुकी थी और मैं इस प्रयास में था कि उसे फिर इतिहास की ओर ले जाऊँ लेकिन ,वर्तमान को इतिहास से फिर जोड़ना  इतना आसान नहीं था ।मैने कहा " इस पर विवाद मत करो भाई , कुछ इतिहास कारों का तो यह भी कहना है कि शुरू में स्त्रियाँ ही इस खेल में भाग लेती थीं , पुरुषों को बाद में अवसर दिया गया ।
                  " यह तो तुम नई बात बता रहे हो " रवीन्द्र ने कहा । मैने कहा " हाँ ओलम्पिक का इतिहास  तो यही कहता है ।

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दसवां दिन –दो




ओलम्पिक ,कालभैरव और बजरंगबली
                आज ठंड कुछ बढ़ गई थी इसलिये भोजनोपरांत कहीं टहलने जाने की बजाय हम लोग तम्बू के सामने आग जलाकर बैठ गये । कुछ लकडियाँ हम भोजनशाला से ले आये कुछ आसपास से इकठ्ठा कर लीं । आर्य साहब ने कहा “ जो सबसे ज़्यादा लकड़ियाँ इकठ्ठा करेगा उसे मेडल प्रदान किया जायेगा । 
“ क्यों यहाँ ओलम्पिक हो रहा है क्या ? “
डॉ.वाकणकर ने अलाव के पास आते हुए आर्य साहब की घोषणा सुन ली थी । सर के लिये हमने बैठने की व्यवस्था की और इस बात के लिये उत्सुक हो गये कि आज कोई ज्ञानवर्धक बात सुनने को मिलेगी । अजय ने तुरंत उनकी बात के तारतम्य में प्रश्न उछाल दिया “ सर ये ओलम्पिक खेलों की शुरुआत तो ग्रीस से हुई है ना ? “ हाँ “ सर ने कहा । “ प्राचीन यूनान में उत्सव-पर्व आदि पर खेलकूद प्रतियोगितायें होती थीं । और सबसे मशहूर प्रतियोगिता यूनान के पेलोपोनेसस प्रांत में ओलम्पिया नामक स्थान पर होती थी । यहाँ ग्रीक देवता ओलिम्पी जियस का मन्दिर था जिसमें यूनानी मूर्तिकार फीडियस द्वारा निर्मित जियस की मूर्ति थी साथ ही इस मन्दिर के आसपास अन्य देवी देवताओं ,वीर पुरुषों और ओलम्पिक विजेताओं की भी अनेक मूर्तियाँ थी । यहाँ व्यायामशालायें भी थीं ।
                “ सर जी , उनका देवता तो जीयस था फिर ये ओलिम्पी जियस कोई अलग देवता था क्या ? “ अजय ने सवाल किया । “अरे नहीं रे बावड़े “ सर ने कहा । “ अपने यहाँ कैसे एक देवता के अलग अलग नाम होते हैं जैसे ..” वे आगे उदाहरण देने ही वाले थे कि राम मिलन ने तपाक से कहा “ जैसे बजरंग बली के नाम दक्षिणमुखी हनुमान , उत्तरमुखी हनुमान , मनोकामना हनुमान । “ 
                 “देखो ये बजरंगबली के भक्त ने बिलकुल सही बताया । अपने यहाँ उज्जैन में कैसे कालभैरव के नाम से  भेरू बाबा के कितने मन्दिर बन गये हैं । “आर्य साहब ने कहा ।
                 “ हाँ सर “ मैने कहा ।“ मैने भी देवास गेट पर एक उखाड़-पछाड़ भेरू बाबा का मन्दिर देखा है । कहते हैं कि जब भेरू बाबा नाराज़ हो जाते है तो तबाही मचा देते हैं ।.“ 
                  अशोक ने  कहा "सही है एक भगवान से किसीका मन नहीं भरता इसलिये सभीने अपने अपने भगवान बना लिये हैं , और उनके नाम पर अपने अपने धर्म बना लिये हैं ,और लड़ रहे हैं आपस में , मेरा भगवान बड़ा है , मेरा धर्म बड़ा है । और तो और एक धर्म के भीतर भी लड़ाईयाँ हो रही  हैं क्योंकि एक धर्म के भीतर भी कई उपधर्म है उनके अपने भगवान हैं , जिनके भगवान एक हैं उनके अनुयायियों में लड़ाइयाँ हो रही हैं .कि हम बड़े भक्त है । सबके अपने नियम हैं और वे अपने नियमों से दूसरों को भी संचालित करना चाहते हैं ।  
             " यहाँ तक तो ठीक है " किशोर ने कहा " लेकिन अपने धर्म को बड़ा और सही धर्म बताकर और अपने देवता को दूसरे के देवता से बड़ा बताकर जो वैमनस्यता फैलाई जाती है वह तो बिलकुल गलत है । "
             " इसका सिर्फ एक कारण है " मैने अपना ज्ञान बघारना शुरू किया " कि लोगों ने इतिहास को ठीक ढंग से पढ़ा ही नहीं है ,केवल सतही ज्ञान और अपने ग्रंथों के आधार पर डींग हाँकना कहाँ तक उचित है । " 
             "बिलकुल सही , ग्रंथ भी तो इसी उद्देश्य से लिखे गये , अशोक ने कहा , जैसे बौद्ध धर्म की महत्ता समाप्त करने के लिये मनुस्मृति रची गई । ग्रंथ लिखे जाने के बाद उनकी अपने अपने ढंग से व्याख्याएँ की गईं ।फिर किताबों को लेकर भी लोग लड़ने लगे ।  वैसे कुल मिलाकर यह धर्म है ही झगड़े की जड़ ।" 
            आर्य सर समझ गये कि बातचीत गम्भीर मोड़ की ओर जा रही है सो उन्होने इंटरप्ट किया , " भाई ये भेरू बाबा से तुम लोग कहाँ पहुंच गये ।फिर वे  ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे ,बोले “ भेरू से याद आया तुम लोगों से दो बैच पहले एक स्टुडेंट था भेरू मालवी नाम था उसका । एक दिन वो मेरे पास आया और रुआँसा होकर बोला “ सर मेरा नाम बहुत खराब है मुझे शर्म आती है , मै इसे बदलना चाहता हूँ ।“ तो मैने कहा “ अरे तुम्हारा नाम तो बहुत बढ़िया है भेरू याने भैरव ,कालभैरव ,शिव का नाम है यह । तुम्हारा नाम है भैरव मालवी देखो कितना सुन्दर लगता है । “ 
             हम समझ गये कि अब इस विषय पर गम्भीर  चर्चा नहीं हो सकती ।( चित्र गूगल से साभार )