सोमवार, 1 जून 2026

41-उसे फ़्लाइंग किस करना नहीं आता था


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा- पिछले भाग में आपने पढ़ा कि आग की खोज के बाद कैसे मनुष्य ने उसे अपने आवास में संभालकर रखना सीखा और किस तरह मनुष्य ने अपने आवास बनाये इस भाग में आप पढेंगे कि भाषा की खोज से पूर्व कैसे मनुष्य अपनी बात दूसरों तक संप्रेषित करता था उसके संकेत चिन्ह कैसे होते थे बोलने के लिए उसका जबड़ा कैसे नाकाफी था फिर भाषा की खोज कैसे हुई और उसने किस तरह उसे व्यवहार में लाया*

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*भाग 41*

*उसे फ़्लाइंग किस करना नहीं आता था* 

अँधेरे में रास्ता तलाशते हुए हम लोग टीले पर पहुँच चुके थे । पांवों को अब ऐसी आदत हो गई है  कि वे घुप्प अँधेरे में भी अपना मार्ग तलाश लेते हैं । टीले पर पहुँचकर हम लोग ढलान पर अपने पाँव पसार कर बैठ गए । चम्बल का जल अँधेरे में किसी पुराने मैले कपड़े की तरह दिखाई दे रहा था । हवा इतनी उदास थी कि सर झुकाए जंगल के एक कोने में बैठी थी । नदी के उस पार के गाँव में झोपड़ियों में टिमटिमाती हुई रौशनियाँ हम लोगों से कह रही थी कि यह बस्ती अभी निर्जन नहीं हुई है । भविष्य का तो उसे भी पता नहीं था क्या पता भविष्य में किसी दिन चम्बल अपनी राह बदल ले और बस्ती की तमाम रौशनियाँ बुझाते हुए उन्हें हमेशा हमेशा के लिए गाद के नीचे दफ्न कर दे ।


इस अनदेखे भविष्य के बारे में सोचते हुए हम लोग भी खामोश हो गए । उदासी अँधेरे की शह पाकर जंगल के निर्जन कोने से बाहर निकल आई और हम लोगों के निकट टीले पर फैलकर बैठ गई । रवीन्द्र ने मेरी ओर देखा  और कहा " यार यह ख़ामोशी आज बहुत उदास कर रही है, मेरा मन कोई उदास सा नगमा सुनने का होने लगा है ..चल यार,गाना सुना ना ।" मेरा मन गाने का नहीं था फिर भी भीतर एक लहर मचलने लगी..मैंने मुँह खोलकर भीतर ऑक्सीजन खींची और साथ ही ढेर सारी उदासी भी भर ली । हवा तो फेफड़ों में समा गई और उदासी दिमाग़ में । मैंने होंठ खोले.. एक आवाज़ निकली भीतर से ..मैं तो एक ख़्वाब हूँ ..इस ख़्वाब से तू प्यार न कर .. प्यार हो जाए तो फिर प्यार का इज़हार न कर .. । फिर मुझे पता नहीं कब यह गीत ख़त्म हुआ और दूसरा शुरू हो गया ..'ज़िन्दा हूँ इस तरह के गमे ज़िन्दगी नहीं जलता हुआ दिया हूँ मगर रोशनी नहीं '.दूसरा ख़त्म हुआ तो तीसरा फिर चौथा  जाने कितनी देर हम लोग बैठे रहे । मैं दोनों मित्रों को मुकेश के दर्द भरे नग़मे सुनाता रहा । 


अचानक ख्याल आया कि समय काफी हो गया है, अगर भाटीजी ने भोजनशाला बंद कर दी तो फिर हमें भूखे ही सोना पड़ेगा । उदासी तो एक बार बर्दाश्त कर ली जायेगी लेकिन भूख बर्दाश्त करना बहुत मुश्किल काम है । हम लोग उठे और लगभग दौड़ते हुए भोजनशाला तक आये । देखा तो भाटी जी सचमुच  भोजनशाला बंद करने की तैयारी में थे । हमारे अलावा सभी लोग खाना खाकर जा चुके थे । हमें गुस्सा आया अपने उन मित्रों पर जिन्होंने हमें ढूँढने तक की जहमत नहीं उठाई थी । ग़नीमत कि भाटी जी ने हम लोगों के लिए खाना बचाकर रखा था जिसे उनकी डांट के साथ हमें खाना पड़ा । खाना खाकर सीधे हम लोग तम्बू में आ गये और कपड़े बदलकर बिस्तर में घुस गये । खाने के बाद काफी उर्जा आ गई थी जिसने उदासी को स्थानापन्न कर दिया था ।


 “ हाँ रवींद्र तुम पूछ रहे थे ना कि इंसान ने पहला शब्दकोष कब बनाया ?" मैंने शाम  के संवादों की किताब से बुकमार्क हटाते हुए रवीन्द्र को याद दिलाई । रवींद्र उछलकर बैठ गया और उसने अशोक की ओर देखा । अशोक जाने किन ख्यालों में डूबा हुआ छत की ओर देख रहा था और ऐसा लग रहा था कि वह हम लोगों की बातों से पूरी तरह निर्लिप्त है । "लेकिन यह जानने से पूर्व हमें यह जानना भी तो ज़रूरी है कि शब्द और भाषा का उदय कैसे हुआ ।“ मैंने रवींद्र से कोई उत्तर न पाकर अपनी बात शुरू की “ हाँ यार अब तुम्ही बता दो कि कैसे हुआ ?“ अजय ने राममिलन भैया की और देखते हुए कहा …”वरना मैं फिर से वही जिन्न वाली भाषा बोलना शुरू कर दूँगा, क्यों पंडित जी बोलूँ क्या ?" उसने राममिलन भैया  से पूछा । राम मिलन भैया ने उसे धीरे से घुड़की दी तो वह हँसने लगा । 


मैंने मुस्कुराते हुए कहना शुरू किया  ” लोगों की एक बहुत बड़ी भ्रांति है कि इंसान ने बहुत पहले बोलना सीख लिया था । लेकिन सच्चाई यह है कि नियेंडरथल मानव की स्थिति तक पहुँचने पर भी उसके जबड़े की बनावट ऐसी नहीं हो पाई थी कि वह मनुष्य के समान शब्दों का उच्चारण कर सके । यह एक जैविक समस्या थी उसका माथा पीछे की ओर था और ठोड़ी न के बराबर थी जिसकी वज़ह से उसका जबड़ा बोलने के लिए समर्थ ही नहीं था ।“

 

“ यह तो तैने नई बात बताई …” रवींद्र अब तक अपने पुराने फॉर्म में वापस आ चुका था । “ लेकिन फिर वह आपस में संवाद किस तरह करता था ? प्रागैतिहासिक मानव की दृष्टि से तो यह काफी आगे की स्टेज है ।“ “हाँ वह बात तो करता था ।“ मैंने कहा …”लेकिन जुबान से नहीं बल्कि अपने पूरे शरीर से ।“ “तुम्हारा मतलब बॉडी लैन्गवेज से है ?“ अजय ने पूछा । “ बिलकुल …” मैंने कहा । “बोलने के लिए वह अपने हाथ, पैर, चेहरे की माँसपेशियों और कंधों का प्रयोग करता था । तुमने किसी पालतू जानवर मसलन गाय, बिल्ली या कुत्ते को देखा होगा । गाय को जब दुलार पाना होता है तब वह आपके करीब आकर गर्दन ऊँची कर देती है और हम उसे गर्दन के नीचे सहलाते हैं । इसी तरह कुत्ता भी अपना मुँह उठाता है अपना सिर आपकी गोद में रख देता है, पन्जे से विभिन्न संकेत करता है । बिल्ली को भी जब भूख लगती है तो आपकी गोद में आकर बैठ जाती है ।"


“ अरे ओ भाया..” किशोर भैया तम्बू की कपड़े की दीवार से चिपके हुए हमारी बातें ध्यान से सुन रहे थे । …”तू आदमी के बारे में बता रहा है कि जानवरों के बारे में ।“  "बता रहा हूँ भाई ।“ मैने किशोर भैया को शांत हो जाने का संकेत करते हुए कहा । “इस दौर का इंसान भी भाषा के मामले में पशु की तरह ही था । जैसे उसे कहना होता कि यह वस्तु मुझे दो, तो वह अपना हाथ फैला देता । खाने के लिए वह हाथ को मुँह तक ले जाकर संकेत देता । उसे जब प्यास लगती तो वह अंजुली से चुल्लू की आकृति बनाता इसलिए कि वह नदी से या झरने से इसी तरह पानी पीता था ।पानी पीने के लिए यह मुद्रा हम अब भी बनाते हैं । हालाँकि अब पानी पीने के लिए हम गिलास का उपयोग करने लगे हैं इसलिए प्यास का संकेत अंगूठे को मुँह से लगा कर देते हैं । जब वह कहना चाहता था कि इसे काटना है वह अपना एक हाथ हवा में हाथ ऊपर से नीचे की ओर लहराता । बादल के बारे में उसे कुछ कहना होता तो आसमान में दो मुठ्ठी तान देता, आग का इशारा करने के लिए हाथ को ऊपर की ओर लहराते हुए ले जाता ।“

 

“ अरे यह सब इशारे तो हम अब भी करते हैं ।“ किशोर ने कहा …” यह बात अलग है कि अब इसमे नये नये इशारे और जुड़ गए हैं जैसे आँख मारना, फ़्लाइंग किस करना वगैरह ।“ “क्या किशोर भैया…” अजय ने कहा "इतने बड़े हो गए हो लेकिन अपने ज़माने को भूले नहीं ..कितनी लड़कियों को आँख मारी है आपने?“ राममिलन धीरे धीरे मुस्कुरा रहे थे और किशोर के साथ अजय की छेड़खानी देखकर उसका आनंद ले रहे थे । धीरे से उन्होंने भी एक तीर छोड़ ही दिया “हमें  तो लगता है ई किसोरवा बचपनै से बदमास रहा है । “ किशोर भी कम नहीं थे उन्होंने राममिलन पर उलटा वार किया …” देखो पंडत, इलाहाबाद में तुम क्या क्या किए हो हमें  सब मालूम है । सुना है ऊ रामकली का बहुत मुजरा देखे हो गंगा के घाटवाली का …” मैं समझ गया कि अब केवल इलाहाबाद और उज्जैन की भाषा ही चलेगी, आदिम इंसान की भाषा पर चर्चा को यहीं विराम देना उचित होगा । राममिलन भैया रंग में आ गए थे और फिर उन्होंने अपने शहर इलाहाबाद के ढेर सारे किस्से सुनाये ।


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सुबह नाश्ते के उपरान्त जल्दी ही हम लोग ट्रेंच की ओर निकल गए । दोपहर में खाना खाने की छुट्टी में हम लोग भोजनशाला में आए तो अजय ने फिर कल का किस्सा छेड़ा … "भाई यह तो बताओ कि इंसान ने मुँह से बोलना कब शुरू किया ?“ “ अरे हाँ…कल वाली बात तो अधूरी ही रह गई थी । तो हम कहाँ थे ?" मैंने अजय से पूछा । अजय ने कहा “ रामकली के अड्डे पर । “ अरे नहीं यार उससे पहले कहाँ थे ?" मैंने फिर पूछा ।  “उससे पहले…” अजय कुछ याद करता हुआ बोला “ वह प्रागैतिहासिक मानव अपनी उंगलियों से इशारे करता था ।“  "हाँ “ मैंने कहा। "उसे बोलना तभी आया जब उसे हमारे तुम्हारे जैसा जबड़ा मिल गया । लेकिन शब्द तब भी उसके पास नहीं थे इसलिए वह गुर्राकर या चिल्लाकर अपनी बात प्रकट करता था । इसके बीच की एक कड़ी और है, अभिनय के माध्यम से संवाद । जैसे जिस जानवर के बारे में उसे बताना हो वह उसका अभिनय करके बताता । वह जीभ से ध्वनियाँ निकालने की कोशिश भी करता था और उसके हाथ इसमें उसकी सहायता करते थे । अंतत: जीभ विजयी रही और उसने शब्दों का उच्चारण करना सीख लिया । जीभ से निकली यह ध्वनियाँ क्रियाओं से बहुत मिलती थीं । “


“ समझ गया समझ गया ..” अजय ने यूरेका यूरेका जैसी स्टाइल में कहा “ बिलकुल जैसे हम कहते हैं,सन सन बहती हवा ,खन खन करते सिक्के , या चर्र चर्र करती चप्पल या टप टप बरसा पानी ,पानी में नहाये गोरी की जवानी ।…'"हाहाहा “ रवीन्द्र ने ज़ोर का ठहाका लगाया । सब लोग रवींद्र का मुँह देखने लगे । मैंने अपने माथे पर हाथ मारा “ क्या यार इतनी गम्भीर चर्चा चल रही है और तुम्हें  मस्ती सूझ रही है । “ रवींद्र बोला "यार तेरा कहना सही है लेकिन इतने अच्छे भोजन के बाद किसी गम्भीर विषय पर चर्चा करने की अब अपनी इच्छा नहीं है ।“

 

इच्छा तो खैर मेरी भी नहीं थी वैसे भी हम पुरातत्व कर्म के इतने अभ्यस्त नहीं हुए थे कि चलते फिरते ऐसे गंभीर विषयों पर बात करें सो हम लोग ट्रेंच पर जाकर अपने काम में लग गए और शाम तक काम में लगे रहे । शाम को काम खत्म कर हम लोग लौटे और घाट पर जाकर हाथ-मुँह धोने के पश्चात सिटी जाने के उद्देश्य से फिर तम्बू में आ गए । गाँव जाने के लिए तैयार होकर जब हम भोजनशाला के सामने से निकल रहे थे भाटी जी ने हमें देख लिया । भाटी जी को कल के हमारे समोसा सेवन सत्र के विषय में ज्ञात हो चुका था । उन्होंने कहा " देखो भाई वहाँ से केवल चाय पीकर लौटना कुछ अटर सटर मत खाना नहीं तो टाइम पर भूख नहीं लगेगी ।आज मैं तुम लोगों की राह नहीं देखने वाला । जल्दी आ जाना , आज डिनर के मेनू में बैंगन का स्वादिष्ट भरता है ।" कुछ भरते का आकर्षण और कुछ भाटीजी की कल की डांट का असर हमने उनकी बात स्वीकार कर ली । अजय ने वहाँ पड़ी हुई जलाऊ लकड़ी का एक टुकड़ा उठाया और कटघरे में खड़े रहने के अंदाज़ में कहा " मैं भोजन पकाने वाली इस लकड़ी पर हाथ रखकर कसम खाता हूँ कि वहाँ सिर्फ चाय लूँगा और चाय के सिवा कुछ नहीं लूँगा ।" भाटीजी हमारी बात से आश्वस्त हो चुके थे, उन्होंने मुस्कुराकर हमें जाने की इज़ाज़त दे दी । 


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  दंगवाड़ा से लौटकर हम लोग सीधे भोजनशाला में प्रवेश कर गए । भाटी जी हम लोगों की राह ही देख रहे थे । हमारे पहुँचते ही उन्होंने थालियाँ लगाईं और एक कटोरी में सरसों का तेल गर्म कर एक एक चम्मच तेल  बैंगन के भरते में डाल दिया । इस तरह भरते का स्वाद द्विगुणित हो गया । भोजन के पश्चात एक चक्कर हम लोगों ने शिवमंदिर का लगाया और लौटकर तम्बू में आ गए । कपड़े बदलकर हम लोग रजाई में घुस गए । मैंने रवीन्द्र से कहा .. " अब इच्छा जागृत हो गई हो तो आगे की बात सुनाऊं?" " अवश्य,अवश्य " रवीन्द्र ने कहा । 


मैंने वेताल की तरह रोज़ का अपना सवाल दोहराया " तो हम कहाँ पर थे ?" अजय ने फिर उसी शरारत वाले अंदाज़ में जवाब दिया " पानी में नहाती हुई गोरी की जवानी पर " "चुप ।" मैंने उसे आंखे दिखाते हुए कहा " तुझे यह सब फ़ालतू बातें याद रहती है और काम की बात भूल जाता है ।" अजय ने तुरंत अपने कान पकड़े । मैंने कहा " तेरी यह संकेत भाषा मेरी समझ में आ गई है, जा माफ़ किया । हाँ तो मैं बता रहा था कि इसी तरह वह मनुष्य भी ऐसे ही संकेतों द्वारा अपनी बात कहता था । अगर कोई हिंसक जानवर आ जाये तो उस जानवर की आवाज़ निकालकर खतरे का संकेत देता था । शिकार की संभावनाओं के बारे में बतलाने के लिए भी वह ऐसे ही संकेतों का प्रयोग करता था । फिर धीरे धीरे उसने ध्वनियों को शब्दों में ढाला और इस तरह भाषा का जन्म हुआ । यह एक लम्बी कहानी है । आज पुरातत्ववेत्ता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि उस विलुप्त भाषा की खोज कैसे की जाए, अब उत्खनन में मिली खोपड़ी तो कुछ बोलने से रही और भाषा की खोज के लिए उत्खनन के औज़ार भी नाकाफी हैं । ग़नीमत है कि हर भाषा ने अपने आदिम पूर्वजों के कुछ शब्द सहेज कर रखे हैं, हज़ारों पीढ़ियों का अनुभव किसी न किसी भाषा में होता हुआ ही हम तक पहुंचा है ।"


राममिलन भैया बहुत ध्यान से हमारी बातें सुन रहे थे अचानक उनका पांडित्य जाग गया और उन्होंने कहा "लेकिन भाई हमने तो सुना है कि वेदभाषा संस्कृत ही सबसे पहली भाषा है और सब भाषाओं  की जननी है । बहुत सारे विद्वान विदेश की भी अनेक भाषाओं  का मूल संस्कृत ही बताते है और कई शब्द भी उन्होंने बताये हैं जैसे संस्कृत का दुहित्र अंग्रेजी का डाटर हुई गवा और पितृ से फादर हो गया वही जर्मनी में पेटर हो गया तो संस्कृत मूल भाषा नहीं हुई ?" 


" भैया माफ़ करना " मैंने कहा "संस्कृत तो बहुत बाद की भाषा है, संस्कृत से पहले भी जिन लोगों की संस्कृति थी वे मूलतः अन्न का संग्रहण करने वाले, वनोपज पर जीविका उपार्जन करने वाले लोग थे, उनकी भाषा संस्कृत नहीं थी, उनकी अपनी अलग अलग बोलियाँ थीं । वे लोग जब उन्नत अवस्था में अथवा कृषि और पशुपालन की अवस्था में आये तब उनका रहन सहन और जीविका के तरीक़े भी बदले और भाषा भी बदली । उस समय भारत भी एक विशाल क्षेत्र था । योरोप के साथ मिली इस सभ्यता को हमारे यहाँ भारोपीय सभ्यता कहा जाता है सो यहाँ की भाषाओं में उन्हीं प्राचीन बोलियों का विकसित रूप हम देख सकते हैं । अनेक भाषाओं के साथ यह भी हुआ कि उनमें शामिल प्राचीन बोलियों के शब्द विलुप्त हो गए और उन्होंने नई शब्दावली गढ़ ली ।"


रवीन्द्र ने मेरी बात का समर्थन करते हुए कहा "अभी भी कहीं सुदूर अंचल में ऐसे कबीले मिलते हैं जिन्होंने उस आदिम मनुष्य की भाषा को सहेजकर रखा है । भाषा के शोधकर्ता इन्ही भाषाओं की तलाश में पूरी दुनिया में भटकते हैं, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका,रूस के शिकारी कबीलों में अब भी उनके पूर्वजों की भाषा के अवशेष विद्यमान हैं । यह अवश्य है कि उस समय जैसी स्थिति रही होगी उसीके अनुसार उनकी भाषा रही होगी जैसे कि जब व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा नहीं होगी तब ‘मेरा‘ जैसा भी कोई शब्द नहीं रहा होगा । यह भी कि उनके अधिकांश शब्द शिकार और भोजन से सम्बंधित रहे होंगे या उन्होंने अपने औजारों को कोई नाम दिया होगा ।“ 

 

“ बिलकुल सही । “ मैंने कहा ” लेकिन उस आदिम मनुष्य की भाषा अब हमारे पास नहीं है । मनुष्य जैसे जैसे दुनिया के अलग अलग भागों में बसता गया वह अपने लिए नई भाषा का अविष्कार करता गया ।“ “ तो क्या हमें कभी नहीं पता चल पायेगा कि वह आदिम मनुष्य किस भाषा का इस्तेमाल करता था ? “ अजय ने पूछा । “ मुश्किल तो है …” मैंने कहा । “ लेकिन भाषा के शोधकर्ता अपना काम कर रहे हैं । इस लुप्त भाषा की तलाश में वे सुदूर उत्तर व दक्षिण में यात्राएँ करते हैं ,आदिम कबीलों से मिलते हैं और ठीक पुरातत्ववेत्ता की तरह ही खोज करते हैं इस समाज की गहरी उपत्यकाओं में । लेकिन उनका काम औरों से कठिन होता है इसलिए  कि लुप्त भाषा का कोई भौतिक रूप नहीं होता । जाने कितनी सदियाँ बीत चुकी हैं, हर सदी के साथ शब्द बदल चुके हैं शब्दों के अर्थ बदल चुके हैं, ध्वनियाँ बदल चुकी हैं, उच्चारण बदल चुके हैं, क्रियाएँ बदल चुकी हैं, कर्ता बदल चुके हैं लेकिन पुरातत्ववेत्ता अभी चुके नहीं है , और न कभी चुकेंगे ।


“ वाह वाह …। ” रवींद्र ने कहा “ मुझे लगा जैसे तू कोई कविता पढ़ रहा है । सचमुच दिलचस्प है विलुप्त भाषा की यह खोज और कठिन भी । “ कठिन है इसीलिए तो पुरातत्ववेत्ता इस काम में लगा रहता है , वह चैलेंज स्वीकार करता है और हर कठिनाई से जूझते हुए अन्तिम सतह तक पहुँचता है ।" मैंने बात को विराम दिया और हम लोग अपने अपने बिस्तरों में घुसकर नींद को उसकी भाषा में आवाज़ देने लगे ।


*शरद कोकास*


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