✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼
पूर्वकथा- पिछले भाग में आपने आदिम मनुष्य के आवास के बारे में पढ़ा ।आज वाकणकर सर उपलब्ध हैं उनका होना छात्रों के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है वे जिस तरह चीज़ों को आसान करके बताते हैं वैसा कोई नहीं बता सकता आज वे बता रहे हैं आदिम मनुष्य की कला,गुफाओं में चट्टानों पर उसकी चित्रकारी एवं उसके आदिम विश्वास और आदिम धर्म के बारे में यह महत्वपूर्ण जानकारी आपके काम आयेगी*
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*भाग 39*
*चट्टान की मुंडेर पर एक चिड़िया*
चम्बल के किनारे पीपल के पेड़ पर बने चिड़िया के उस घोंसले को मैं रोज़ ही देखता था और अपने घर को याद करता था । लेकिन न मुझे उस घोंसले में चिड़िया दिखाई देती थी न उसके बच्चे । मैं सोचता था शायद उसके बच्चे बड़े हो गए हों और दाने-पानी की खोज में कहीं उड़ गए हों और फिर वह चिड़िया भी खुद का पेट भरने के लिए कहीं चली गई हो । आज अचानक मुझे वह चिड़िया दिखाई दे गई । उसकी आँखों में उदासी थी । उसे देखकर मुझे माँ की याद आने लगी ।
मैंने रवीन्द्र से कहा "देखो वह चिड़िया कितनी उदास है ।" रवीन्द्र इतने दिनों तक मेरे साथ रहकर मेरी भाषा समझने लगा था । उसने कहा "हाँ, उदास तो होगी ही उसके बच्चे जो अपना घर छोड़कर चले गए हैं ।" "हम भी इसी तरह एक दिन नौकरी करने के लिए अपना घर छोड़कर चले जायेंगे तब हमारी माँ भी इसी तरह उदास रहा करेगी ।"
मैंने कहा । रवीन्द्र बोला "हाँ यही जीवन का सच है । अब मुझे भी भानपुरा में तो नौकरी मिलने से रही.. क्या पता मुझे किस शहर में जाना पड़े ।" "ठीक है यार ।" मैंने कहा " हम कोशिश करेंगे कि एक ही शहर में रहें और अपने सुख दुःख बाँटें ।"
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घर परिवार की बातें करते हुए हम लोग घाट से कैम्प वापस आ गए । भाटी जी की भोजनशाला से मसालों की खुशबू आ रही थी । कपड़े बदलकर हम लोग तैयार हो गए और भोजनशाला में पहुँच गए । मालवा की विशेष शैली में सौंफ डालकर बनाया हुआ गरमा गरम पोहा एक बर्तन में रखा हुआ था । हम लोगों ने अपनी अपनी प्लेट में पोहा लिया और स्वाद का आनन्द लेने लगे ।
इतने में वाकणकर सर का प्रवेश हुआ । हमने उन्हें अभिवादन किया । उन्होंने जवाब देते हुए कहा "क्या बात है दुष्टों ,तुम लोग आजकल रात में जल्दी सोते नहीं हो , क्या करते रहते हो ? “
“कुछ नहीं सर ।” मैंने कहा “ बस बातें करते रहते हैं ।" इससे पहले कि वे पूछें क्या बातें करते रहते हो, मैंने खुद ही बता दिया … “सर कल हम लोग गुफा में रहने वाले मानव के बारे में बातें कर रहे थे ।“
मेरे प्रश्न के तारतम्य में रवींद्र ने भी तपाक से पूछ लिया …” सर, यह प्रागैतिहासिक मानव गुफा में चित्र किसलिए बनाता था ? “ हम लोग यह अवसर खोना नहीं चाहते थे आख़िर हम विश्वप्रसिद्ध भीमबैठका की गुफाओं में शैलचित्रों के खोजकर्ता डॉ.वि.श्री.वाकणकर से मुखातिब थे l
डॉ वाकणकर ने अपने चश्मे के ऊपर से हमें देखा …"क्यों, यह सवाल तो तुम लोगों के कोर्स में है ना ? पढ़ा नहीं क्या ?“ हमें नहीं पता था कि इस तरह हम अपनी पोल खुद ही खोल देंगे । हम सभी चुप हो गए । मैंने धीमे स्वर में कहा .."सर पढ़ा तो है लेकिन आपसे थोड़ा और समझना चाहते हैं ।" सर मुस्कुराये फिर हँस कर कहा .."कोई बात नहीं.. परीक्षा देने लायक तो पढ़ ही लेना ।“ हमें लगा वे अब शायद ही कुछ बतायें ।
सर ने अपनी प्लेट में पोहा लिया और एक चम्मच पोहा मुँह में डालते हुए कहा …” मानव की गुफाओं में चित्रकारी वस्तुतः उसका प्रकृति के प्रति एक अनुष्ठान था । इन चित्रों में उसका जीवन दर्शन था । तुम लोगों ने देखा होगा प्राचीन गुफ़ाओं में बहुत से ऐसे चित्र मिले हैं, किसीमें कोई आदमी जानवर का मुखौटा पहने हुए है, दैत्य की तरह उसका सिर लगता है.. सींगवाला, किसी में उसकी दुम है, यह बाइसन की खाल ओढ़े आदमी का चित्र है ।"
पोहा चबाते हुए हम लोगों का मुँह चल रहा था लेकिन ध्यान सर की ओर ही था । उन्होंने कहना जारी रखा "उस समय होता यह था कि मनुष्य शिकार करता था और उसे ज़्यादा से ज़्यादा शिकार मिले इसके लिए इन चित्रों द्वारा अनुष्ठान करता था । जैसे शिकार पर जाने से पहले दीवार पर वे हिरण का चित्र बनाते थे और अपने भाले की नोक से उसका स्पर्श करते थे । इसका अर्थ यह होता था कि उनका शिकार सफल हो ।
कई बार वे उस जानवर का चित्र बनाकर उसे धन्यवाद भी देते थे कि वह उनका आहार बना । इसी तरह वे मारे गए बाइसन, हिरन या रीछ को लाकर उसके पास भोजन से भरा बर्तन रखते थे और सिर से पूँछ तक उसका स्पर्श करते थे । बस यही सब अनुष्ठान,उनकी शिकार कथा,उनके उत्सव आदि इन दीवारों पर चित्रित हैं । और ऐसा वे सहज रूप से करते थे, कहीं कोई नियम नहीं था । यह समझ लो कि उन्होंने अपना पूरा जीवन ही चित्रित कर दिया है गुफा की दीवारों पर । “
“सर, लेकिन इन सभी चित्रों के अर्थ तो अलग अलग होंगे और प्रयोजन भी ? “ मैंने सर से सवाल किया ।
“बिलकुल“ सर ने कहा “हर चित्र का प्रयोजन अलग अलग है । यह पूरी चित्रकला शिकार और उसकी संग्रहण वृति से ही सम्बंधित है । वह जिन जीव जंतुओं का शिकार करता था अथवा जिन फलों का भक्षण करता था उनके चित्र गुफाओं में बनाता था । यह पशु और पेड़ उसके टोटेम या गण चिन्ह थे, उसका जीवन इन्ही पर निर्भर था । जब तक यह प्रचुर मात्रा में मिलते थे यह उनका भक्षण करता था तथा उनकी कमी होने पर उनके भक्षण का निषेध करता था । अभी भी अनेक आदिवासियों में यह प्रथा चली आ रही है कि कुछ जीवों अथवा वनस्पतियों को खाना उनके यहाँ निषिद्ध है ।"
अचानक वाकणकर सर रुके और भाटीजी की ओर देखकर उन्होंने कहा "भाटीजी, पोहा तो कईं ज़ोरदार बन्यो हे ,थोड़ा नमकीन ओर देना ।" फ़िर वे हमसे मुख़ातिब हुए "कई आदिवासी अपने आप को उन पशुओं अथवा वनस्पतियों का वंशज भी मानते हैं । उनका यह अदम्य विश्वास है कि उनके पूर्वज किसी पेड़ से या किसी पशु से पैदा हुए हैं । यह पेड़ अथवा पशु ही उनके गणचिन्ह होते हैं । उन पेड़ों के फल खाना अथवा उन पशुओं का मांस खाना उनके यहाँ निषिद्ध है ।
इसके विपरीत कुछ आदिवासियों में उनके टोटेम पशु का मांस प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है । रूस के क्विचुआन कबीले में शिकारी मरने के बाद हिरन की टांगे पूर्व दिशा में रखते हैं, उसके सिर के पास कुछ भोजन रख देते हैं फिर उसके पास जाकर उसे धन्यवाद देते हैं, उसे सहलाते हैं इसलिए कि उसने उन्हें उसे शिकार के रूप में भोजन दिया ।"
"सर जी यह तो हमारे धरम में भी होता है " राममिलन भैया सर की यह बात सुनकर खुश हो गए हमारे यहाँ भी परसाद को पहले भगवान के पास रखा जाता है फिर उसे खाया जाता है ।"
सर ने राममिलन की पीठ पर हाथ रखा "बिलकुल, यह आदिम परंपरा ही है । मैं तुम्हें रूस के साइबेरिया के आदिवासियों का उदाहरण देता हूँ ।" वाकणकर सर पानी पीने के लिए कुछ देर रुके .."वे लोग रीछ का शिकार करते हैं । रीछ को मारकर घर में लाया जाता है, फिर उसे एक ऊँचे स्थान पर रख दिया जाता है, फिर आटे या पेड़ की छाल से बनी बारहसिंघे की आकृतियाँ उसके पास रख दी जाती हैं उसकी आँखों पर वे सिक्के रख देते हैं । अपने यहाँ नहीं कैसे भगवान को प्रसाद चढ़ाते हैं, यह उनका अपने टोटेम देवता को चढ़ावा होता है । फिर हर शिकारी उस रीछ के पास जाता है और उसके थूथन को स्पर्श करता है । फिर उनका नृत्य उत्सव शुरू होता है और कई दिनों तक चलता है अंत में वे उसका मांस भक्षण करते हैं लेकिन आश्चर्य यह कि उसका सर और अगले पंजों को नहीं खाया जाता ।“
“हाँ सर, यह तो विचित्र बात है ..सर और पंजों को क्यों छोड़ दिया जाता है ? और यह भी समझ में नहीं आया कि इतने दिनों में मांस ख़राब नहीं होता था ?” अजय का मासूम सा सवाल ।
“ अरे मूरख, मैं सायबेरिया के ठन्डे प्रदेशों की आदिवासी परंपरा की बात कर रहा हूँ, अपने झाबुआ के आदिवासियों की नहीं , वैसे भी इतनी अक्ल तो होती ही है उनमें कि मांस ख़राब होने से पहले उसका भक्षण कर लें । रही बात सिर और अगले पंजे न खाने की तो पशु के यह अंग ही उनके टोटेम देवता होते हैं ।
कई आदिवासी कबीलों में जानवर की जीभ नहीं खाई जाती तो कहीं उनके कान नहीं खाए जाते हैं क्योंकि वे लोग अपने कबीले के लोगों को उनके टोटेम पशु के उसी अंग से उत्पन्न मानते हैं । अनेक स्थानों पर यह भी माना जाता है कि उनके क़बीले की किसी आदिम स्त्री का सम्बन्ध उस पशु से हुआ होगा और वे सब उसीकी संताने हैं । यह सब उसके बाद हुआ होगा जब मनुष्य ने स्त्री को उनकी संतान को जन्म देते हुए देखा होगा ।"
"सर, पशु से मनुष्य की संतान कैसे हो सकती है ?" मेरे भीतर के तर्कशील छात्र ने सवाल किया । सर थोड़ा सा मुस्कुराये .."भाई, उस समय विज्ञान की उन्नति आज के समान थोड़े ही हुई थी । उन्हें यह भी नहीं पता था कि किसी इंसान या प्राणी का जन्म कैसे होता है ।
वे यही समझते थे कि हवाओं के, पानी के या किसी पशु के संसर्ग से मनुष्य जन्म लेता है । इसलिए उन्हें लगता था कि उनके पूर्वज भी ऐसे ही पैदा हुए होंगे । सो वे ऐसे पशुओं को अपना पूर्वज मानते थे । अपने यहाँ नहीं पुराणों में कथा है किसी का जन्म फल खाने से हुआ किसी का नाग से हुआ बस ऐसे ही ।
“सर, लेकिन गुफाओं में जो बायसन या हिरन की खाल पहने मनुष्यों के चित्र पाए जाते हैं उसका क्या अर्थ है ?" अबकी बार सवाल पूछने की बारी अशोक की थी ।
“ बिलकुल सही सवाल है । “ सर ने कहा “ यह मनुष्य अपने उस टोटेम देवता या उस पशु के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करने के लिए उसकी खाल या उसके सींग पहनता था । हम आज भी विश्व के विभिन्न आदिवासी समूहों में प्रचलित नृत्यों में यह देखते हैं कि वे लोग जानवरों के मुखौटे, उनके सींग और उनसे सम्बंधित अन्य वस्तुएं पहनकर नृत्य करते हैं ।
“ हाँ सर मैंने कहीं पढ़ा था ।“ अशोक ने कहा “आदिवासी नृत्य में बाइसन की खाल पहनकर और सींग वाला उसका मुखौटा पहनकर नृत्य कर रहे हैं उनके हाथों में धनुष बाण और भाले हैं , एक आदिवासी बायसन बना है, वह नाचते हुए गिरने का अभिनय करता है , उस पर सब भाला तान देते हैं और बाण छोड़ते हैं । फिर सब उसे घसीटकर घेरे से बाहर कर दते हैं और नृत्य जारी रहता है । “
“हाँ ,सही कह रहे हो तुम ।“ सर ने कहा “ ठीक इसी दृश्य के चित्र गुफाओं में मिले हैं जिनमें लाल काले रंग से बायसन चित्रित है ,उसके शरीर पर तीर धसे हुए हैं ।"
“सर, लेकिन मैंने सुना था इसका सम्बन्ध जादू - टोने से भी है ?" अशोक ने पूछा ।
“ हाँ ।“ सर ने कहा “वैसे पूरी तरह तो ऐसा नहीं है ..फिर भी उन दिनों मनुष्य चमत्कारिक शक्तियों में तो विश्वास करता ही था । गुफा में बने नृत्य के चित्रों से यह अनुमान लगाया गया है कि कोइ ओझा जैसा व्यक्ति होता था जो शिकार के लिए अनुष्ठान करता था । यह कुछ कुछ उस शिकार को वश में करने जैसा भी था, हो सकता है, ऐसा उनका सोचना हो कि इस तरह से शिकार उनके वश में होकर उनकी ओर खिंचा चला आएगा । आज हम इन बातों को बहुत ही बेतुका मानते हैं लेकिन उस मनुष्य की जीवन पद्धति में यह शामिल था । अभी भी अनेक आदिवासी समाजों में यह प्रथाएँ प्रचलित हैं l" इतना कहकर सर उठे और किसी काम से बाहर निकल गए ।
रवीन्द्र ने मुझसे कहा "कितना सुंदर दृश्य होता होगा आदिम मनुष्य की इस कलावीथिका में । कुछ लोग पेड़ की जड़ों और पत्तों से रंग तैयार कर रहे हैं, कुछ लोग रंग बिरंगी चट्टानों को पीसकर उनसे रंग तैयार कर रहे हैं ,हरी टहनियों की नोक कुचलकर उन्होंने अपनी कूचियाँ बनाई हैं फिर वे पूरी तल्लीनता से इन रंगों और अपनी कूचियों के माध्यम से अपने जीवन को इन चट्टानों पर उतार रहे हैं ।
एक चित्र में कमर में हाथ डाले कितने लोग नृत्य कर रहे हैं, एक कोई ढोल जैसा कुछ बजा रहा है । दूसरे चित्र में जंगल की ओर भागता यह हिरणों का झुण्ड है । तीसरे चित्र में आसमान में उड़ती चिड़िया एक चिड़िया चट्टान की मुंडेर पर आकर बैठ गई है और अपने ही चित्र को निहार रही है जैसे वह उसका आईना हो । इतने में एक हिरण वहाँ आकर ठहर गया है और अपने ही किसी भाई की देह में धंसे भाले का चित्र देखकर उसकी आँख की कोर में एक आँसू आकर ठहर गया है । "
"यार रवींद्र .. लगता है तुझ पर भी इस कवि का असर हो गया है और तू भी कविता करने लगा है ।" अजय ने आँखे फाड़कर रवींद्र की ओर देखते हुए कहा । रवींद्र ने भी उसी तरह आँखे फाड़ी और अजय से कहा " ऐसा क्या , मुझे तो मालूम ही नहीं था कि यह कविता है ।"
*शरद कोकास*

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