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रविवार, 27 सितंबर 2015

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी – तेरहवाँ दिन – पाँच



जनता के साथ अजंता की सैर    

            भोजन के पश्चात पेट ही नहीं मन भी भरा भरा सा लगता है । भोजन शरीर में पहुँचकर उर्जा उत्पन्न करता है वह उर्जा कोशिकाओं में पहुँचकर रक्त प्रवाह को गति देती है और वह रक्त मस्तिष्क तक पहुँचकर समस्त क्रियाकलापों को गति देता है आखिर मन मस्तिष्क के इन्ही सब क्रियाकलापों का योग ही तो है । भाटी जी ने आज हरे मटर की रसेदार सब्ज़ी बनाई थी जो उन्हें गाँव के मज़दूर दे गए थे ,साथ में टमाटर की चटनी भी । होटल के बेस्वाद भोजन से अलग इस भोजन के स्वाद की बात ही कुछ और थी सो हमारा मन प्रफुल्लित था इसलिए आज खाने के बाद टहलने का मन भी नहीं हुआ ।

            भोजनशाला से निकलकर हम लोग सीधे तम्बू में पहुँचे । जिस तरह घूमने जाने की इच्छा रखने वाला नन्हा शिशु अपने पिता का ध्यान आकर्षित कराने के लिए साइकल की ओर ऊँगली  से संकेत करता है उसी तरह अजय ने  मेरे बैग से मेरी डायरी निकाली और  मुझे थमा दी । मैं समझ गया सबकी इच्छा  आगे का यात्रा वृतांत सुनने की है । मैंने डायरी खोली और सवाल किया " तो हम कहाँ थे ? " अजय ने तपाक से कहा " सुलभ शौचालय में .. मेरा मतलब शौच आदि से निवृत होकर आप लोग जलगाँव के बस अड्डे पर गर्मागर्म चने की की मिसल वाला आलू पोहा खा रहे थे । " " ओके ओके ।" मैंने कहा और फिर जनता के बीच अजंता यात्रा का वाचन प्रारम्भ कर दिया ।

            "तो इस तरह नाश्ते के बाद हम लोगों ने अजंता के लिए कूच किया । हमारी डॉज के ड्राईवर जमनालाल जी ने बताया कि जलगाँव से अजंता की दूरी इकसठ किलोमीटर है और इस यात्रा में लगभग एक घन्टा लगता है । आज किसी सीट पर किसी का रिज़र्वेशन नहीं था इसलिए मैंने खिड़की के पास की एक सीट चुनी और उस पर बैठ गया । बचपन से ही यात्रा में खिड़की से बाहर के दृश्यों को देखना मुझे अच्छा लगता है । जिस ज़िंदगी को हम जी नहीं सकते उसकी एक झलक ही मिल जाए तो क्या कम है । हिंदी साहित्य में आलोचना के अंतर्गत जब किसी के द्वारा ग्रामीण जीवन पर कुछ लिखा जाता है और उसमे गाँव के सुख दुःख शामिल नहीं होते अथवा गाँव का बहुत रूमानी वर्णन होता है तो अक्सर कहा जाता है कि उसकी कविता में गाँव बस या रेल की खिड़की से देखे हुए गाँव जैसा है ।"

            "इसीलिए तो भैया हम तेरे को दंगवाड़ा गाँव घुमाने ले जाते हैं ताकि तू आगे चलकर जब बड़ा कवि बने तो गाँव के जीवन का यथार्थ वर्णन कर सके ।" अजय ने तपाक से मेरी इस बात पर कमेन्ट किया ।" ठीक है ठीक है, आगे जब बड़े होंगे तब देखेंगे ..क्या पता इस पुरातत्व विभाग में ऐसी जगह नौकरी मिले जहाँ गाँव में ही रहना अनिवार्य हो .. तब भी यह इच्छा पूरी हो जाएगी और बड़े कवि की छोड़ कवि ही बन जाएँ इतना काफी है ।"  "ओके भाई .." रवीन्द्र ने कहा " तब की तब देखी जाएगी, चल आगे की डायरी सुना ।"

            " लो सुनो । " मैंने कहा । खिड़की के पास बैठकर बाहर के दृश्यों को देखते हुए कब अजंता आ गया पता ही नहीं चला । अजंता की दूरी दर्शाने वाले मील के पत्थर दिखाई देने लगे थे और मैं उन्हें पढ़ता जा रहा था …अजंता की गुफाएँ 4 कि मी, अजंता केव्ज़  3 कि मी, अजिंठ्या लेण्या 2 कि मी । बौद्धकालीन अजंता की गुफाओं के विषय में कोर्स में मैंने काफी कुछ पढ़ रखा था । मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं कुछ ही देर में बौद्धकालीन युग में प्रवेश करने वाला हूँ । चारों ओर विशालकाय पहाड़ियाँ थीं । आँखों को तृप्त करने वाली हरियाली से यात्रियों को आकर्षित करते हुए दूर दिखाई देने वाले छोटे - बड़े पौधे बस की विपरीत दिशा में भागते प्रतीत हो रहे थे । मेरा मन उससे भी पीछे भाग रहा था । मुझे लगा कि बस कुछ ही देर बाद मेरी आँखों के सामने एक अद्भुत दृश्य होगा जिसमें गेरुए वस्त्रों में कलाकार से दिखाई देने वाले कुछ बौद्ध भिक्षु होंगे, जिनके हाथों में कूचियाँ होंगी और वे किसी गुफा के भीतर चित्रकारी में रत होंगें ।

             मैं सोचने लगा उस कालखंड विशेष के बारे में जब यहाँ यह पक्का रास्ता नहीं रहा होगा, यह मील के पत्थर भी नहीं रहे होंगे,  न वाहनों की कर्कश आवाज़ होगी न धूल न धुआं । बस यहाँ रही होगी यह निर्जन पहाड़ी, नाल के आकार में गुफाओं की लम्बी कतार, आकाश में विचरण करते ढेर सारे पक्षी और वातावरण  में गूंजते  ‘ बुद्धम शरणम गच्छामि ‘ के स्वर । अचानक बस ने आख़िरी  मोड़ लिया और अतीत के खुले आसमान में विचरण करता हुआ मेरा स्वप्न सैलानियों की कारों, टूरिस्ट बसों, छोटी छोटी दुकानों और होटलों की दमघोटू भीड़ के बीच गिरकर चकनाचूर हो गया । वहाँ का शोर सुनकर मुझे लगा जैसे मैं किसी मेले में आ गया हूँ । ड्राइवर ने बस एक किनारे पर लगा दी । हम लोग उतर कर नीचे आए । मैंने एक अंगड़ाई ली और हवा को ज़ोर से भीतर खींचकर फेफड़ों में भर लिया ।

             मैंने चारों ओर नज़रें इस तरह घुमाकर फेंकी जैसे कोई मछुआरा अपना जाल घुमाकर फेंकता है । मुझे उन गुफाओं की तलाश थी जिनके बारे में मैं बचपन से सुनता चला आया था । पूछने पर ज्ञात हुआ कि उन गुफाओं की श्रंखला के प्रवेश द्वार तक पहुँचने के लिए पहले सीढ़ियाँ चढ़नी होंगी । उसके बाद उन गुफाओं का संसार प्रारम्भ होगा जो आज पूरी दुनिया में मशहूर हैं । सीढ़ियों पर चढ़कर हम लोगों ने टिकट खरीदे और प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश किया । मैं अपनी मूर्खता पर मन ही मन हँस रहा था । जाने क्यों मुझे इस बात का गुमान था कि गुफायें अब भी ढाई हज़ार साल पहले की स्थिति में होंगी । इन गुफाओं की खोज हुए भी जाने कितना समय बीत चुका है और अब तो यह बाकायदा एक टूरिस्ट सेन्टर बन चुका है । इस बात का हमें भान था कि हम लोग यहाँ टूरिस्ट की तरह नहीं बल्कि अध्ययनकर्ता की तरह आए हैं और हमें उसी तन्मयता के साथ इन गुफाओं का अवलोकन करना है जिस तन्मयता के साथ कलाकारों ने इन गुफाओं में चित्र उकेरे होंगे ।

            सीढ़ियाँ चढ़ने के उपरांत हमें जो सबसे पहली गुफा मिली उसे पुरातत्व विभाग ने गुफा क्रमांक एक नाम दिया है । उसके बाद क्रम से गुफा क्रमांक दो, तीन,चार आदि हैं । इस क्रम  का इन गुफाओं के निर्माण काल से कोई सम्बन्ध नहीं है । वास्तव में सबसे पहले जिस गुफा में चित्र उकेरे गए वह गुफा क्रमांक दस है । इसके बाद इस गुफा के दोनों ओर क्रमश: गुफाएँ कटती चली गईं हैं । अजंता की यह गुफाएँ मनुष्य द्वारा निर्मित वे बेजोड़ गुफाएँ हैं जिन पर भारत को गर्व है । देश विदेश से आए सैलानी इन्हें  देख आश्चर्य चकित हो उठते हैं । अहा ! इतना अद्भुत सौंदर्य ! इन गुफाओं में चित्रकला व शिल्प कला के बेजोड़ नमूने हैं । इनकी किसीसे तुलना नहीं हो सकती । बुद्धि व श्रम के संयोग से निर्मित इन गुफाओं को देख कर आधुनिक तकनीक भी हैरान है । प्राकृतिक रंगों के निर्माण व उपयोग के बारे में उस युग के मनुष्य की समझ व ज्ञान को देख कर ऐसा नहीं लगता कि कला के प्रति उस मनुष्य का सौन्दर्यबोध किसी भी तरह कम रहा होगा । इन गुफाओं के निर्माण का उद्देश्य भी स्पष्ट है । इक्कीस सौ वर्ष पूर्व जब बौद्ध धर्म अपने चरम पर था, लाखों की तादाद में बौद्ध भिक्षु दीक्षा ले रहे थे और उन्हें अपनी साधना के लिए किसी एकांत की आवश्यकता थी । इसी आवश्यकता ने इन गुफाओं को जन्म दिया ।

मेरे डायरी वाचन के बीच अचानक अजय का एक सवाल कूद पड़ा “ लेकिन यार इन गुफाओं का पता कैसे चला ? इन तक भी डॉ. वाकणकर जैसा कोई व्यक्ति पहुँचा था क्या ? “हाँ बताता हूँ …” मैंने कहा “आगे यही लिखा है मैंने । बाघोरी नदी के किनारे नाल के आकार में बनी इन गुफाओं की खोज की कहानी भी अत्यंत रोचक है । सन अठारह सौ उन्नीस , अंग्रेज़ों के समय की बात है । एक दिन एक अंग्रेज़ शिकारी शिकार के लिए निकला और जंगल में रास्ता भटक गया । उसे एक किसान का लड़का मिला उसने शायद इनाम की लालच में शिकार प्राप्त होने की संभावित दिशा बताते हुए इन गुफाओं की ओर इशारा किया । उस समय यह गुफाएँ असंख्य पेड़ों और लताओं से घिरीं थीं । अंग्रेज़ शिकारी ने दूरबीन से इधर देखा। उसे पेड़ों के पीछे किसी गुफा में एक चित्र नज़र आ गया और वो खुशी से उछल पड़ा । इस तरह यह गुफाएँ सारे संसार में मशहूर हो गईं ।"

इतना कह कर मैं चुप हो गया । मैंने देखा अजय, रवीन्द्र, अशोक सब इस तरह मुझे देख रहे थे जैसे यह बात मैं उन्हें  पहली बार बता रहा हूँ । “फिर क्या हुआ ?“ अशोक ने सवाल किया । “बस अजंता की कला देखते हुए मैं उसमें खो गया । एक एक गुफा की दीवारों पर चित्रित जातक कथाएं, बुद्ध की विभिन्न मुद्राएँ, मुद्राओं में दुख की परिभाषा, चेहरे पर वैराग्य की अनिवार्यता और संसार को सही सही जान लेने का भाव । इसके अलावा भी बहुत कुछ था इन चित्रों में …गृहस्थ जीवन के प्रति पति की उदासीनता से आहत यशोधरा, भिक्षुओं के भिक्षाटन ,उपदेश श्रवण,संगीति जैसे विभिन्न क्रियाकलाप, दान की गाथाएँ और जाने क्या क्या, इसका वर्णन शब्दों में संभव ही नही है । उन्नीस गुफाओं को पार करते हुए जैसे मैं एक युग पार कर चुका था । हम जिस कला व संस्कृति की बात करते हैं, वह संस्कृति तो यहाँ छुपी हुई है । ऐसी संस्कृति जिसे किसी धर्म या जाति या देश काल की परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता ।

"लेकिन अँधेरी गुफाओं के भीतर कलाकारों ने यह चित्र बनाये कैसे होंगे ?" अजय ने मुझसे सवाल किया । "आसान था ।" मैंने कहा । फिल्म की शूटिंग के लिए कैमरामैन जिस तरह रिफ्लेक्टर का उपयोग करते हैं उसी तरह इन कलाकारों ने भी सूर्य की रौशनी को भीतर तक लाने के लिए चमकीली सतह वाले रिफ्लेक्टर्स का उपयोग किया होगा और रंग भी फूल, पत्तों, रंगीन पत्थर  और प्राकृतिक वस्तुओं जैसे चर्बी , पौधों का अर्क आदि की सहायता से बनाये होंगे इसीलिए अब तक यह चित्र जस के तस हैं ।"

"लेकिन मैंने देखा है बहुत सारे चित्रों में अब रंगों का क्षरण हो रहा है ।" अशोक ने कहा । " हाँ यह तो है," मैंने कहा  "इतने सारे लोगों का आना, कृत्रिम रौशनी और प्रदूषण कुछ न कुछ असर तो होगा ही, इसीलिए अब कुछ चित्रों को संरक्षित करने के लिए उन पर टचिंग की जा रही है ।" "लेकिन इससे तो मूल पेंटिंग्स ख़राब हो जाएँगी " अशोक ने कहा । "हाँ हो सकता है लेकिन किया भी क्या जा सकता है, अजंता अब एक बहुत बड़ा पर्यटन उद्योग है । खैर आगे सुनो " इतना कहकर मैंने फिर डायरी वाचन प्रारंभ कर दिया । 

"गुफाएँ देखते हुए दोपहर के तीन बज चुके थे लेकिन हमें वापस भी लौटना भी था । हम जैसे अध्ययनकर्ताओं के लिए चार -पांच घंटों का यह समय बहुत कम था । यह सोचकर कि ठीक ठाक नौकरी मिल जाने के बाद एक बार फिर दो - चार दिनों के लिए  यहाँ आएँगे हम लोगों ने संतोष कर लिया । हमसे बिछड़कर जैन सर जाने कब पत्थर की गुफाओं से निकल कर लोहे की गुफा यानि बस में आकर बैठ गए थे । वैसे भी वे पूर्व में अनेक बार यहाँ आ चुके थे, यह उनके लिए एक रूटीन वर्क की तरह था । हमें आता देख उन्होंने चिन्ता प्रकट की “अरे भाई , भूख- वूख नहीं लगी क्या तुम लोगों को ?” भूख एक सच्चाई की तरह हमारे सामने थी और उसे रोटी के चित्र से नहीं मिटाया जा सकता था चाहे वह कितना भी रंगीन और आकर्षक हो । “चलो महेश ।“ मैंने कहा “ भूख मिटाने का कुछ इन्तज़ाम किया जाए ।“ और हम लोग किसी होटल की तलाश में निकल पड़े ।"

" हा आ आ आ " बड़ा सा मुँह फाड़ते हुए अजय ने कहा " बस कर यार इसके आगे की डायरी अब कल सुनेंगे, अभी तो बहुत ज़ोरों की नींद आ रही है ।" " ठीक है ।" मैंने कहा । "बाक़ी कल ।" वैसे भी हम लोगों का यह सामूहिक अनुशासन है कि यदि एक व्यक्ति सोने की इच्छा प्रकट करता है तो सभी के लिए वार्तालाप स्थगित करना अनिवार्य होता है । मैंने रज़ाई सर तक ओढ़ ली और अपनी आँखें बंद कर लीं । मेरा मन बुद्धकाल में पहुँच गया था । देह को यात्रा के लिए साधनों की आवश्यकता होती है लेकिन मन तो जाने कहाँ कहाँ भटकता रहता है मन की यह यात्रा जारी थी ..बोधगया, सारनाथ, लुम्बिनी, कुशीनगर ..। फिर जैसे तन की यात्रा में नींद आती है मन की यात्रा में भी आना 

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी –दसवां दिन- सात


एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी –दसवां दिन - सात 
वे इतने गुलाम थे कि जननांगों को ढँकने के लिये एक चिन्दी तक उपलब्ध नहीं थी                                                               
रात्रि भोजन के पश्चात रज़ाई में घुसते ही रवीन्द्र ने  कहा “ यार यह ठंड तो कम होने का नाम ही नहीं ले रही । “ मैने कहा “ रज़ाई में घुसे हो और ठंड से डर रहे हो .. ज़रा रोम के उन गुलामों के बारे में सोचो जिन्हे  ठंड में भी कपडे का एक टुकड़ा तक नसीब नहीं होता था । “ “ अच्छा तुम रोम के गुलामों की बात कर रहे हो  ना जिन्होने स्पार्टकस के नेतृत्व में विद्रोह किया था   ? ” अजय ने सवाल किया । “ हाँ “ मैने कहा । अशोक बोला “ यार उसकी पूरी कहानी बताओ ना .. एक्चुअल में हुआ क्या था ? “ “ हाँ , यह हुई ना बात “ किस्सा सुनाने को तो मैं आतुर था ही .मैने अपनी पोज़ीशन सम्भाल ली थी और किस्सागोई के मूड में आ गया था ।
“ यह 71 ईसापूर्व से भी पहले की बात है । रोम जब अपने उत्कर्ष पर था । बड़े बड़े धनाढ्य ,सम्पन्न लोग सत्ता के सुख के साथ जीवन का सुख भोग रहे थे । ढेर सारे मनोरंजन के साधन थे, हम्माम थे , अय्याशी के लिये औरतें थीं और सेवा के लिये हज़ारों गुलाम थे । मनोरंजन के लिये वहाँ के अखाड़ों में कुश्ती तो सामान्य बात थी लेकिन उन दिनों अचानक कुछ ऐसा हुआ था कि सब उसके दीवाने हो गये थे । कई अखाड़े हो गये थे जिन्हे एम्फिथियेटर कहा जाता था जिनमें इन ग्लेडियेटर्स की लड़ाई होती थी । इन अखाडों के मालिकों ने खदानों मे काम करने वाले गुलामों को खरीद लिया था और इन्हे ग्लेडियेटर बना दिया था ।                          
“ लेकिन इतने सारे गुलाम आते कहाँ से थे ?” राममिलन भैया का यह स्वाभाविक प्रश्न था । “ बिलकुल सही पूछा राममिलन भैया “ मैने कहा “ ये सारे गुलाम सोने की खदानो मे काम करते थे ? प्राचीन मिस्त्र में थीव्ज़ के पास नूबियन रेगिस्तान है वहीं रेत के बीच सोना उगलने वाली खदाने हैं जहाँ इन गुलामों की कई पीढ़ियाँ गुजर चुकी थीं । शुरू में लड़ाई में बचे हुए सिपाही गुलाम बनाये गये फिर तीन पीढ़ियों बाद वे कोरू कहलाये । मिस्त्र के फराओं का वैभव समाप्त हो जाने के बाद इन खदानों को रोम के धनाढ्य व्यापारियों ने ले लिया ।
ये खदानें दरअसल नर्क से भी बदतर थीं । आओ  मै तुम्हें वहाँ का एक दृश्य दिखलाता हूँ . ..कल्पना करो ..  देखो.. वह देखो.. सौ से भी अधिक गुलाम एक कतार में चल रहे हैं .. एकदम नंगे.. गर्म रेत में घिसटते हुए.पाँव लेकर ... उनकी गर्दन में एक पट्टा है जो काँसे का है और जो अगले गुलाम की गर्दन में बन्धे पट्टे के साथ एक ज़ंज़ीर से बन्धा हुआ है । बार बार उस पट्टे के गर्दन में टकराने की वज़ह से उनकी गर्दन में घाव हो गये है और उनसे खून बह रहा है ।                                                                                  
अन्धेरा हो चुका है और वे दिन भर का काम खत्म करने के बाद अपनी बैरकों में लौट रहे हैं । एक बार भीतर घुस जाने के बाद उन्हे बाहर आने की इज़ाज़त नहीं है । वे केवल मरकर ही बाहर आ सकते हैं । वे बैरकों की फर्श पर ही गन्दगी करते हैं जो सड़कर सूख गई है । अभी थोड़ी देर में उन्हे खाना दिया जायेगा ..गेहूँ और टिड्डी का शोरबा और एक मशक में एक सेर पानी जो बहुत नाकाफी है .. जब पानी की कमी से उनका गुर्दा खराब हो जायेगा तो उन्हे रेगिस्तान में मरने के लिये छोड़ दिया जायेगा ।
इन बैरकों में सड़ान्ध है, घुटन है ,बदबू है इतनी कि खाया पिया सब बाहर आ जाये ..लेकिन गुलाम इसे जज़्ब कर लेते है क्योंकि एक बार उल्टी कर देने के बाद उन्हे भूखे रहना पड़ेगा । खाना भी सिर्फ इतना ही मिलेगा कि ज़िन्दा रहा जा सके । वे यह सोचते हुए कि  ज़िन्दा क्यों है .अन्धेरी रात काट देंगे ...।                                     
            फिर सुबह होगी नगाड़े की आवाज़ के साथ ..सबको ज़ंजीरों में बान्धकर ले जाया जायेगा ।वे अपना प्याला और कटोरा साथ रखेंगे ...ठंड से काँपते हुए अपने नंगे बदन को हाथों से ढाँपने की कोशिश करते हुए वे अपनी जानवरों से भी बदतर ज़िन्दगी के बारे में सोचेंगे और फिर उन चट्टानों पर कुदाल और हथौडे चलायेंगे जो उनके मालिकों को सोना देती हैं । पसीने से तरबतर गुलाम जो महीनों से नहाये नहीं हैं ,चार घंटे बिना रुके काम करेंगे ,हाथ रोकते ही उन्हे कोड़ों से पीटा जायेगा .. इस तरह  चार घंटे तक उनके शरीर का पानी पसीना बनकर निकल चुका होगा , उन्हे खाना और पानी दिया जायेगा , जो गट गट पानी पीने की गलती करेगा पछतायेगा क्योंकि पेशाब बनकर पानी निकल जाने के बाद काम खत्म होने तक दोबारा नहीं मिलेगा ..लेकिन इस प्यास का क्या करें ..कैसी मजबूरी है यह .. पानी पिये तो भी मौत नहीं पियें तो भी मौत ...।
देखो अभी अभी सोलह साल के उस थके हारे बालक ने भूख-प्यास ,ठंड और गर्मी  से लड़ते हुए स्पार्टकस की गोद में दम तोड़ दिया  है स्पार्ट्कस रोते हुए उसकी लाश को बेतहाशा चूम रहा है ।“
”बस कर यार “ किशोर के चीखने से मैं होश में आया । “ क्या सुना रहा है तू ... पूरी रात बरबाद कर दी  “ किशोर ने गांजे की सिगरेट जला ली थी और मेरी तरफ बढ़ाते हुए कह रहा था ..ले एक सुट्टा लगा ले और वापस इस दुनिया में आजा .. बाकी कहानी कल सुनेंगे । मैने कहा  “ रेन दे यार अपन तो वेसेई टनाटन्न रेते हें....।

क्या सोच रहे हैं आप ..? क्या भाव आ रहा है मन में ? दया ? करुणा ? या जुगुप्सा ? स्पार्टाकस भी इनमें से ही एक गुलाम था उसके मन में सिर्फ आक्रोश आता था .. इसलिये उसने एक ऐसा काम किया कि वह इतिहास में अमर हो गया .. यह उसने कैसे किया यह  कहानी ..अगली किश्त में  - शरद कोकास   

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

एक पुरातत्ववेता की डायरी -दसवां दिन - छह


नेताओं के अल्पज्ञान के बारे में हम ढेर सारे किस्से सुनते हैं ,कई चुटकुले भी मशहूर है  जैसे एक नेता भाषण दे रहे थे हमारे देश मे तीन तरह के खेल होते है एक सेमी फाईनल एक फाईनल और एक ओलम्पिक .हाँलाकि अब तो नेताओं को ज़्यादा जानकारी रहती है और उनके पास उनके अधिकारी भी होते है । लेकिन इतिहास और पुरातत्व के बारे मे अब भी वही हाल है । लीजिये प्रस्तुत है एक नेता जी का एक सच्चा किस्सा जो हमे बरसों पहले डॉ. वाकणकर जी ने सुनाया था ।  
एक पुरातत्ववेता की डायरी -नौवाँ दिन -दो 
सरकार का पैसा क्या फालतू समझ रखा है ..बस ऊंडे जाओ ऊंडे जाओ
“ क्या यार इतने दिनों से खुदाई कर रहे हैं बस इतना ही खोद पाये । “ अजय ने खीझते हुए कहा । जाने कैसे डॉ. वाकणकर ने उसकी बात सुन ली और कहा “ धीरज रखो बेटा पुरातत्व की खुदाई इतनी आसान नहीं है । यह गढ्ढा खोदने का काम नहीं  है , रोज़ थोड़ा थोड़ा खोदते हुए आगे बढ़ना होता है , किसी वैज्ञानिक की तरह .किसी खोजी की तरह , किसी चिकित्सक की तरह । हम लोग पहले से ही मायूस थे ,उनकी बात सुनकर और मायूस हो गये । सर हम लोगों की उदासी भाँप गये । और फिर अचानक उन्होने कहा “ अरे दुष्टों इसमे उदास होने की क्या बात , चलो तुमको एक बढ़िया किस्सा सुनाता हूँ । 
एक बार कि नई क्या हुआ हम लोग एक साइट पर खुदाई कर रहे थे । एक माह से काम चल रहा था और एक ट्रेंच से बहुत महत्वपूर्ण तथ्य मिल रहे थे । कुछ भी नष्ट न हो इसलिये हम सावधानी से काम ले रहे थे ।एक दिन वहाँ एक नेताजी घूमते हुए आ गये । ट्रेंच को देखते हुए उन्होने अपने अन्दाज़ में पूछा “ हूँ... कितने दिनों से खुदाई चल रही है ? “ हमने बताया “ साब एक माह से । “ इतना सुनते ही वे आग बबूला हो गये और ट्रेंच की ओर इशारा करके चिल्लाने लगे “ एक महीने से खुदाई चल रही है और बस इतना ही खोदा है आप लोगों ने ? " फिर उन्होने मजदूरों की भीड़ देखी  तो और नाराज़ हुए .."कितने आदमी लगा रखे हैं .. सरकार का पैसा क्या फालतू समझ रखा है जो इस तरह बरबाद कर रहे हो ।अगर ठीक से खोदना नहीं आता तो बन्द कर दो खुदाई ।" इससे पहले कि हम उन्हे कुछ समझा पाते कि पुरातत्व की खुदाई और गढ्ढा खोदने मे फर्क होता है ..वे गुस्से मे निकल गये और जाते जाते कह गये ..” अभी तीन दिन बाद मैं फिर इधर आउंगा ,मुझे ठीक- ठाक काम दिखना चाहिये “
 “बस फिर क्या था “ सर ने कहा “ मेने दो मज़दूरों को बुलाया और साइट से बाहर दूर की एक ज़मीन बताकर कहा “ वहाँ खोद डालो रे जितना खोद सको ,बस ऊंडे जाओ ऊंडे जाओ  ।ये नेताजी को बड़ा सा गढ्ढा देखना है ..इन्हे इतिहास .तकनीकी और पुरातत्व विज्ञान से क्या मतलब ।“ तो ऐसा है अपने सत्ताधीशों का पुरातत्व ज्ञान । 
डॉ. वाकणकर की बात सुनकर हम लोग हँस हँस कर लोट पोट हो गये । सर ने कुछ देर बाद गम्भीर होकर कहा “ ऐसा नहीं है कि वे कुछ नहीं जानते या यह केवल तकनीकी ज्ञान के अभाव के वज़ह से उनका यह व्यवहार है । यह मनोवृति इतिहास को गैरज़रूरी समझने के कारण है । इतिहास बोध तो अपनी जगह है लेकिन अतीत को लोग इसलिये भी रहस्यमय मानते हैं कि   वो उनकी समझ से परे है ।  
अब डॉ. वाकणकर जैसे विद्वान पुराविद ने यह बात कह दी तो मै क्या कह सकता हूँ ..प्रतीक्षा है उनकी इस बात पर आपकी प्रतिक्रिया की - चित्र गूगल से साभार                                                                                             

आपका - शरद कोकास                                                                                               

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी -दसवां दिन - पाँच

दंगवाड़ा के इस उत्खनन कैम्प में हमारा खुदाई का यह नौवाँ दिन है लेकिन  इस दिन एक ऐसी घटना घटी कि हम सभी को बहुत शर्मिन्दा होना पड़ा । क्या हुआ यह जानने से पहले ज़रा पाँचवें दिन की डायरीपर एक नज़र डाल लें। 

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी -पाँचवा दिन 


आज की सतह निरीक्षण में हमे स्वास्तिक चिन्ह युक्त एक सिक्का , एक टेराकोटा ऑब्जेक्ट तथा एक स्टोन बॉल प्राप्त हुआ । आज हमने सतह से खुदाई प्रारम्भ की  और 31 सेंटीमीटर तक पहुंचे । इन प्रारम्भिक बातों के लिये डॉ.आर्य हमारा मार्ग दर्शन करते रहे । शाम को कार्य समाप्त करने के बाद हमे यह भी बताया गया कि प्राप्त वस्तुओं की देखभाल कैसे की जाये और उन्हे सम्भाल कर कैसे रखा जाये । सदियों से जो अवशेष ज़मीन के भीतर दफ्न हैं बाहर आते ही ऐसे लगा जैसे वे हमसे बातें करने लगे है । मिट्टी का 4 से.मी. का एक छोटा सा पात्र हाथ में लिये अशोक उसे बहुत देर तक निहारता रहा । “क्या देख रहा है अशोक ?” मैने ध्यान से पात्र देखते हुए अशोक से पूछा । “ वाह कितना सुन्दर पात्र है “ अशोक ने कहा । मुझे लगा वह ताम्राश्मयुगीन सभ्यता की किसी विशेषता पर हम लोगों का ध्यान आकर्षित करने वाला है । लेकिन अशोक ने अपनी नज़रें उस पर से हटाये बगैर फिर कहा “ अपने तम्बू में सिगरेट की राख झाड़ने के लिये ऐश ट्रे नहीं है यह बढ़िया काम आयेगा । और फिर उसने धीरे से उसे अपनी पैंट की जेब में रख लिया ।

और अब ..एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी -नौवाँ दिन-एक
  काश यह वस्तु हमारे ड्राइंग रूम में होती !!!

सुबह सोकर उठे ही थे कि डॉ.वाकणकर इंस्पेक्शन के लिये हमारे तम्बू में प्रवेश कर गये । बिस्तर वगैरह तो हमने करीने से लगा रखे थे सारी चीजें कपड़े बैग आदि व्यवस्थित रखे थे  । लेकिन वाह वाह कहते हुए अचानक उनकी निगाह उस चाल्कोलिथिक पात्र पर पड़ गई जिसे पाँच दिन पहले अशोक ट्रेंच से उठाकर ले आया था और बतौर ऐश ट्रे उसका बखूबी इस्तेमाल कर रहा था । “ व्वा बेटा “ उन्होने कटाक्ष करते हुए कहा । “ शौक तो तुम्हारे रईसों के हैं । इससे पहले कि अशोक अपने धूम्रपान की चोरी पकड़ी जाने पर शर्मिन्दा होता उन्होने कहा “ जानते हो तुम्हारी इस ऐश ट्रे की कीमत क्या है ? ये एक लाख से कम की नहीं है । “ अशोक ने तुरंत माफी माँगी ,बाहर जाकर ऐश ट्रे खाली की और डॉ. साब को देने लगा तो उन्होने कहा “ ऐसे नहीं इसे अच्छी तरह धोकर साफ करो , सुखाओ और फिर आर्काईव में जमा करो .. नहीं तो  तुम्हारा कोई जूनियर चाल्कोलिथिक पीरियड में विल्स या पनामा का उद्भव जैसे विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत कर देगा । ‘
            सुबह सुबह डाँट खाने का असर ट्रेंच पर पहुंचने तक था । हाँलाकि अशोक को इस बात पर संतोष था कि सिगरेट के लिये उसे डाँट नहीं पड़ी । लेकिन ऐश ट्रे के लिये पड़ी डाँट के लिये भी हम सभी अपने आप को दोषी मान रहे थे । बिना अनुमति उत्खनन में निकली किसी भी वस्तु का कोई भी उपयोग अपराध तो था । यद्यपि उसे घर ले जाने जैसी कोई मंशा हमारी नहीं थी क्योंकि यह इतनी कीमती वस्तु थी जिसकी कीमत हम नहीं आँक सकते थे ।लेकिन उपयोग करने के  इसी अपराध बोध के कारण हम सभी असहज थे यद्यपि सर ने इसे सहज बनाने का प्रयास किया था  ।
 यह तो हुई उत्खनन की बात लेकिन यह बताइये कि क्या हम लोग इन वस्तुओं की कीमत समझते हैं । मन्दसौर के शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि उत्खनन से पूर्व वह तालाब में आधा गड़ा हुआ था और उस पर कपड़े  धोये जाते थे । अभी भी कई पुरातात्विक महत्व के स्थानों पर आसपास के गाँवों के लोग अनजाने में वस्तुएँ उठा ले जाते हैं । मूर्तियाँ घर में ,मन्दिर में रखकर उनकी पूजा की जाती है जबकि यही वस्तुएँ म्यूज़ियम में रहें तो सभी लोग उसे देख सकें ।व्यक्तिगत संग्रह की प्रवृत्ति हमें ऐसी है कि हम लोग जब किसी पुरातात्विक महत्व के स्थान पर जाते हैं तो हमारा मन नहीं करता कि कोई वस्तु उठाकर अपनी जेब में डाल लें ? गनीमत है कि म्यूज़ियम और ऐसे ही अन्य स्थानों पर कड़ा पहरा रहता है अन्यथा हमारे दिमाग़ में यह ख्याल तो आता ही है कि हमारे ड्राइंगरूम में यह वस्तु कैसी लगती ? अब आप समझ गये होंगे कि पुरातात्विक वस्तुओं की इतनी सुरक्षा क्यों की जाती है । बावज़ूद इसके तस्कर अपना काम कर जाते हैं और देश की बहुमूल्य वस्तुएँ, कीमती मूर्तियाँ रातों रात विदेश पहुँच जाती हैं । 
एक प्रश्न और ..विदेशी संग्रहालयों में अपने देश की मूर्तियाँ और बहुमूल्य वस्तुएँ देखकर कभी आपके मन में यह ख्याल आया कि ये यहाँ तक कैसे पहुँची होंगी ? और आज़ादी के पहले कितनी वस्तुएँ जा चुकी हैं । हम तो गान्धी जी के व्यक्तिगत सामानों के लिये हायतौबा कर रहे थे लेकिन उसके पहले जो कुछ जा चुका है उसके बारे में कभी सोचा है ? क्या वह सब हमें वापस नहीं मिलना चाहिये ? क्या वह हमारे देश की कीमती धरोहर नहीं है ? (चित्र गूगल से साभार ।) कुछ जानकारी आप यहाँ से भी प्राप्त कर सकते हैं ।  - आपका - शरद कोकास

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी :दसवां दिन - चार


कैम्प में ओलम्पिक की चर्चा जारी है । मनुष्यों से बात घोड़ों पर आ गई है । और यहाँ एक रहस्य खुलता है । जैसे हम मनुष्यों के पूर्वज हुआ करते थे वैसे घोड़ों के भी तो रहे होंगे ? और उसके हाथ पाँव भी होंगे हमारे जैसे ?
एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी :आठवाँ दिन : छह                                                                                           
घोड़े की भी मनुष्यों जैसी पाँच उंगलियाँ होती थीं
           “ सर वो ओलम्पिक..” अजय ने फिर गाड़ी पटरी पर लाने के लिये इशारा किया । “ हाँ तो मैं बता रहा था “ सर ने कहा “ इन ओलम्पिक खेलों में कुश्ती,चक्रफेंक,भालाफेंक,घुड़दौड़ रथदौड़ आदि प्रमुख खेल थे । रथदौड़ के मैदान को हिप्पोड्रोम कहते थे । एक ईवेंट में एक रथ को मैदान के बारह चक्कर लगाने होते थे । कई बार आपस में टकराकर भीषण दुर्घटनायें भी होती थीं । जैसे आजकल कार रेस में होती हैं ।"                                                                                   “ सर लेकिन इसमें तो केवल सम्पन्न लोग ही भाग ले पाते होंगे आखिर रथ और चार घोड़े जुटाना आसान नहीं है । मैने कहा । हाँ “ सर बोले सम्पन्न लोग ही विजेता होते थे क्योंकि विजेता रथ का सारथी नहीं बल्कि मालिक कहलाता था जिसके पास ज़्यादा घोड़े वो विजेता और दुर्घटना में भी सारथी ही मरता था मालिक को इनाम मिलता था । “                                                                                                                                                                                    
“और बेचारे घोड़े का कोई रोल नहीं “ मैने कहा “ जंगल के घोड़े ने उंगलियाँ  गँवाकर खुर क्या प्राप्त किया इंसान का वाहन बन गया । ““ ये क्या कहानी है भाई ? “ रवीन्द्र ने सवाल किया ।“ तुम्हे नहीं पता “ मैने कहा । “ लाखों साल पहले घोड़े की पाँच उंगलियाँ हुआ करती थीं और वह जंगलों में रहता था जहाँ सूखे पत्तो पर दौड़ने के लिये उंगलियाँ काम आती थीं । फिर जंगल कम हुए , और मैदान में दौड़ने के लिये उंगलियों की ज़रूरत ही नहीं बची सो अगली नस्लों में पाँच से घटकर तीन उंगलियाँ हुईं और अंतत: एक खुर रह गया । इन प्रजातियों के क्रमश: हिप्पस, मेसोहिप्पस ,प्लियोहिप्पस और इक्वस नाम हैं । “ अच्छा इसलिये ओलम्पिक में घुड़्दौड़ के मैदान को हिप्पोड्रोम कहते हैं ।“ रवीन्द्र ने कहा । “ लेकिन यह बात तो है कि कहानियों का कोई ओलम्पिक होगा तो शरद को गोल्डमेडल ज़रूर मिलेगा । “  ठीक है ठीक है चलो अब सो जाकर सुबह जल्दी सोकर नहीं उठे तो खैर नहीं । “ सर ने आखरी फरमान जारी किया ।   अच्छा हुआ ना हमारे हाथ पैरों की  उंगलियाँ नहीं घिसीं वरना हम भी खुर वाले मनुष्य कहलाते और फिर क्या होता आप कल्पना कर सकते हैं ---शरद कोकास (चित्र गूगल से साभार )

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी : दसवां दिन - तीन

                 जिन दिनो मैं विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से पुरातत्व में एम.ए. कर रहा था , वहीं पास ही चम्बल नदी के किनारे एक उत्खनन कैम्प में जाना हुआ , डॉ. वाकणकर के निर्देशन मे हम लोग पन्द्रह दिन वहाँ रहे । उस दौरान काम के साथ साथ बहुत सारी बातों पर चर्चा होती रही ,हम मित्रों के बीच । यही सब प्रस्तुत कर रहा हूँ इन दिनों इस " एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी में "। इसे आप कहीं से भी पढ़ सकते हैं इसलिये की डायरी के लिये कविता या कहानी जैसी कोई शर्त नहीं होती कि इसे प्रारम्भ से ही पढ़ा जाये ।इस तरह इस चर्चा में भी आप भाग ले सकते हैं । इसे भविष्य में पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित करने की योजना है । तय है कि उसमें ब्लॉग के पाठक भी शामिल रहेंगे ।
               फिलहाल चर्चा चल रही है ओलम्पिक पर और उसमें होने वाले खेलों और भाग लेने वाले खिलाड़ियों पर । मुद्दा यह है कि उस समय स्त्रियों को खेल में भाग लेने की इज़ाज़त क्यों नहीं थी । चलिये आगे पढ़ते हैं...  
         एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी : आठवाँ दिन : पाँच 
ओलम्पिक में स्त्रियों को भाग लेने की इज़ाज़त नहीं थी ।
             “ सर वो ओलम्पिक के बारे में बता रहे थे आप “ अजय ने सर को मूल विषय पर वापसी के लिये संकेत दिया । “ हाँ “ सर बोले “ मैं कह रहा था कि ओलम्पिक देखने हज़ारों की संख्या में लोग आते थे । तम्बुओं में उनके रहने की व्यवस्था की जाती थी लेकिन स्त्रियों के लिये इस ओलम्पिक में प्रवेश निषेध था । इस नियम का उल्लंघन करने वाली स्त्री को मौत की सज़ा तक दी जा सकती थी ।

              “ यह तो बड़ा अन्याय है सर “ रवीन्द्र ने कहा । “ हाँ “ सर बोले “ हो सकता है देशकालानुसार ऐसा नियम रहा हो , यह तो बहुत बाद में स्त्रियों ने खेल में भाग लेना शुरू किया ।शुरू शुरू में जियस के मन्दिर में होने वाले खेलों में ही उन्हे इज़ाज़त दी गई । हमारे देश में भी स्त्रियों के लिये बहुत से खेल वर्जित थे और आज देखो लड़कियाँ ही सर्वाधिक पदक जीतती हैं ।
                “ अपने देश में कहाँ जीतती हैं सर ? अपने यहाँ तो बचपन से ही लड़कियों को लड़कों के खेल खेलने से मना किया जाता है । लड़कों को सारे खेल खेलने की अनुमति है लेकिन लड़की ने जहाँ लड़कों के साथ खेलना चाहा कि बस ..। लड़के खेलते हैं क्या गुड्डे -गुड़ियों से ?  “ अशोक बोला ।
                 " इसीलिये तो लड़कियाँ पीछे रह जाती हैं । भले ही देश मे लड़कियों की हॉकी , फुटबाल ,क्रिकेट टीम हो लेकिन विश्व स्तर पर कहीं कोई नाम है क्या उनका ? और इन खेलों की छोड़ो अन्य खेलों में भी कहीं नाम है क्या ? अथेलेटिक्स में अन्य देशों की लड़कियाँ कितने करतब दिखलाती हैं हमारे देश की कोई खिलाड़ी नज़र आती है क्या ? इसका मतलब साफ है, हमारे देश में लड़के -लड़कियों  में भेदभाव किया जाता है ।  अजय ने गुस्से से कहा ।
                  बातचीत यूनान के ओलम्पिक से शुरू होकर भारत के खेल तक पहुंच चुकी थी और मैं इस प्रयास में था कि उसे फिर इतिहास की ओर ले जाऊँ लेकिन ,वर्तमान को इतिहास से फिर जोड़ना  इतना आसान नहीं था ।मैने कहा " इस पर विवाद मत करो भाई , कुछ इतिहास कारों का तो यह भी कहना है कि शुरू में स्त्रियाँ ही इस खेल में भाग लेती थीं , पुरुषों को बाद में अवसर दिया गया ।
                  " यह तो तुम नई बात बता रहे हो " रवीन्द्र ने कहा । मैने कहा " हाँ ओलम्पिक का इतिहास  तो यही कहता है ।

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दसवां दिन –दो




ओलम्पिक ,कालभैरव और बजरंगबली
                आज ठंड कुछ बढ़ गई थी इसलिये भोजनोपरांत कहीं टहलने जाने की बजाय हम लोग तम्बू के सामने आग जलाकर बैठ गये । कुछ लकडियाँ हम भोजनशाला से ले आये कुछ आसपास से इकठ्ठा कर लीं । आर्य साहब ने कहा “ जो सबसे ज़्यादा लकड़ियाँ इकठ्ठा करेगा उसे मेडल प्रदान किया जायेगा । 
“ क्यों यहाँ ओलम्पिक हो रहा है क्या ? “
डॉ.वाकणकर ने अलाव के पास आते हुए आर्य साहब की घोषणा सुन ली थी । सर के लिये हमने बैठने की व्यवस्था की और इस बात के लिये उत्सुक हो गये कि आज कोई ज्ञानवर्धक बात सुनने को मिलेगी । अजय ने तुरंत उनकी बात के तारतम्य में प्रश्न उछाल दिया “ सर ये ओलम्पिक खेलों की शुरुआत तो ग्रीस से हुई है ना ? “ हाँ “ सर ने कहा । “ प्राचीन यूनान में उत्सव-पर्व आदि पर खेलकूद प्रतियोगितायें होती थीं । और सबसे मशहूर प्रतियोगिता यूनान के पेलोपोनेसस प्रांत में ओलम्पिया नामक स्थान पर होती थी । यहाँ ग्रीक देवता ओलिम्पी जियस का मन्दिर था जिसमें यूनानी मूर्तिकार फीडियस द्वारा निर्मित जियस की मूर्ति थी साथ ही इस मन्दिर के आसपास अन्य देवी देवताओं ,वीर पुरुषों और ओलम्पिक विजेताओं की भी अनेक मूर्तियाँ थी । यहाँ व्यायामशालायें भी थीं ।
                “ सर जी , उनका देवता तो जीयस था फिर ये ओलिम्पी जियस कोई अलग देवता था क्या ? “ अजय ने सवाल किया । “अरे नहीं रे बावड़े “ सर ने कहा । “ अपने यहाँ कैसे एक देवता के अलग अलग नाम होते हैं जैसे ..” वे आगे उदाहरण देने ही वाले थे कि राम मिलन ने तपाक से कहा “ जैसे बजरंग बली के नाम दक्षिणमुखी हनुमान , उत्तरमुखी हनुमान , मनोकामना हनुमान । “ 
                 “देखो ये बजरंगबली के भक्त ने बिलकुल सही बताया । अपने यहाँ उज्जैन में कैसे कालभैरव के नाम से  भेरू बाबा के कितने मन्दिर बन गये हैं । “आर्य साहब ने कहा ।
                 “ हाँ सर “ मैने कहा ।“ मैने भी देवास गेट पर एक उखाड़-पछाड़ भेरू बाबा का मन्दिर देखा है । कहते हैं कि जब भेरू बाबा नाराज़ हो जाते है तो तबाही मचा देते हैं ।.“ 
                  अशोक ने  कहा "सही है एक भगवान से किसीका मन नहीं भरता इसलिये सभीने अपने अपने भगवान बना लिये हैं , और उनके नाम पर अपने अपने धर्म बना लिये हैं ,और लड़ रहे हैं आपस में , मेरा भगवान बड़ा है , मेरा धर्म बड़ा है । और तो और एक धर्म के भीतर भी लड़ाईयाँ हो रही  हैं क्योंकि एक धर्म के भीतर भी कई उपधर्म है उनके अपने भगवान हैं , जिनके भगवान एक हैं उनके अनुयायियों में लड़ाइयाँ हो रही हैं .कि हम बड़े भक्त है । सबके अपने नियम हैं और वे अपने नियमों से दूसरों को भी संचालित करना चाहते हैं ।  
             " यहाँ तक तो ठीक है " किशोर ने कहा " लेकिन अपने धर्म को बड़ा और सही धर्म बताकर और अपने देवता को दूसरे के देवता से बड़ा बताकर जो वैमनस्यता फैलाई जाती है वह तो बिलकुल गलत है । "
             " इसका सिर्फ एक कारण है " मैने अपना ज्ञान बघारना शुरू किया " कि लोगों ने इतिहास को ठीक ढंग से पढ़ा ही नहीं है ,केवल सतही ज्ञान और अपने ग्रंथों के आधार पर डींग हाँकना कहाँ तक उचित है । " 
             "बिलकुल सही , ग्रंथ भी तो इसी उद्देश्य से लिखे गये , अशोक ने कहा , जैसे बौद्ध धर्म की महत्ता समाप्त करने के लिये मनुस्मृति रची गई । ग्रंथ लिखे जाने के बाद उनकी अपने अपने ढंग से व्याख्याएँ की गईं ।फिर किताबों को लेकर भी लोग लड़ने लगे ।  वैसे कुल मिलाकर यह धर्म है ही झगड़े की जड़ ।" 
            आर्य सर समझ गये कि बातचीत गम्भीर मोड़ की ओर जा रही है सो उन्होने इंटरप्ट किया , " भाई ये भेरू बाबा से तुम लोग कहाँ पहुंच गये ।फिर वे  ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे ,बोले “ भेरू से याद आया तुम लोगों से दो बैच पहले एक स्टुडेंट था भेरू मालवी नाम था उसका । एक दिन वो मेरे पास आया और रुआँसा होकर बोला “ सर मेरा नाम बहुत खराब है मुझे शर्म आती है , मै इसे बदलना चाहता हूँ ।“ तो मैने कहा “ अरे तुम्हारा नाम तो बहुत बढ़िया है भेरू याने भैरव ,कालभैरव ,शिव का नाम है यह । तुम्हारा नाम है भैरव मालवी देखो कितना सुन्दर लगता है । “ 
             हम समझ गये कि अब इस विषय पर गम्भीर  चर्चा नहीं हो सकती ।( चित्र गूगल से साभार )  
  

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दसवां दिन –एक


एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-आठवाँ दिन –तीन
मनुष्य का कोई अगला या पिछला जन्म नहीं होता ।

फिर भी इतनी शर्म तो थी हम मे कि उस दिन हमने दंगवाड़ा जाना स्थगित कर दिया और समय बिताने के लिये भाटीजी की भोजनशाला के इर्द-गिर्द मँडराते रहे । हम लोगों ने प्लानिंग की कि राम मिलन भैया को मस्का लगाया जाये और उनकी नाराज़गी दूर की जाये । राम मिलन उसी दिन से हम लोगों से बेहद नाराज़ थे और हमारा तम्बू छोड़कर ,उस तम्बू में उन्होने अपनी स्थापना कर ली थी जहाँ उत्खनन के औज़ार फावड़ा गैंती घमेले इत्यादि रखे थे । वहीं उन्होने प्लास्टिक की निवाड़ वाले एक पलंग का जुगाड़ भी कर लिया था ।                                                                   
भैया के तम्बू में जब हम लोग पहुँचे तब वे मंकी कैप लगाये हनुमान चालीसा का पाठ करने में व्यस्त थे । हाँलाकि ठंड की वज़ह से पाठ में उनका मन नहीं लग रहा था । हम लोगों के तम्बू में प्रवेश करते ही उन्होने अपना पाठ बन्द कर दिया  और खीझते हुए कहा “ पता नहीं पिछले जनम में कउन से पाप किये थे जौने के लाने प्राचीन भारतीय इतिहास मे इम्मे करना पड़ा और यहाँ जंगल में मरने के लिये आना पड़ा । “                
हम लोग सोचकर गये थे कि उस दिन की घटना के लिये राममिलन भैया से माफी माँगेंगे और ऐसी कोई बात नहीं करेंगे जिस से उन्हे बुरा लगे । लेकिन इस से पहले कि हम कुछ कहते उनके ज़िगरी दुश्मन किशोरवा ने उन्हे छेड़ दिया “ तुम पिछ्ले जनम में क्या थे पंडत ? “ राम मिलन ने कोई जवाब नहीं दिया तो किशोर का हौसला बढ़ गया । “ज़रूर बन्दर रहे होगे । “ हमने तुरंत किशोर को आँख से इशारा किया लेकिन उस पर क्या असर होना था । राम मिलन जो पहली बात पर धैर्य धारण किये हुए थे इस बात पर उखड़ गये ..” और तुम किशोरवा ज़रूर गधे रहे होगे या उल्लू या सुअर । “ अरे रे राममिलन भैया काहे नाराज़ हो रहे हो “ किशोर ने तुरंत बात सम्भाली “ हम तो इसलिये कह रहे थे कि तुम इतनी हनुमान चालीसा पढ़ते हो ,बन्दर माने आखिर हनुमान जी के वंशज ही हुए ना ? “ हनुमान जी का नाम सुनकर राम मिलन थोड़े नर्म हुए और हँसने लगे । हम समझ गये कि वे खुश हो गये है । मैने सोचा अब बात कुछ सम्भाली जाये और एक फार्मूला छोड़ ही दिया जाये सो कहा “ भाई सही तो यह है कि मनुष्य का कोई अगला या पिछला जन्म नहीं होता । कोशिकाओं से यह शरीर बनता है और कोशिकाओं के मरने के साथ ही मर जाता है । न उसमे कोई जीव होता है न कोई आत्मा ,न कोई दबी छुपी इच्छा शेष रहती है न कोई पाप पुण्य बचा रहता है । यह जो जीवन है बस एक बार का है ।                                                 
“ सही कह रहे हो “ रवीन्द्र ने कहा “ भूत प्रेत होते तो वे लोग हमारी मदद को नहीं आते ? आखिर हम उन्ही का अतीत तो खोज रहे हैं । रात भर में ट्रेंच खोद देते ,सुबह हम अवशेष बटोर लेते । हमे इतनी मेहनत तो ना करनी पड़ती ।“ बस उसके बाद फिर भोजन के समय तक भूतों के किस्से ही चलते रहे (चित्र गूगल से साभार )                

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-नवां दिन –दो

 नहीं भाई राव साहब ,डायरी बिला नहीं गई ,मै नवरात्र की कविताओं मे इतना व्यस्त हो गया था कि बिलकुल फुरसत नही मिली यह समझो कि खुदाई का काम बन्द हो गया था । चलो आज से फिर शुरू कर देते हैं । दर असल पुरातत्ववेत्ता के साथ ऐसा ही होता है ,वह करता कुछ है और लोग समझते कुछ हैं । चम्बल के किनारे उज्जैन के पास दंगवाड़ा के इस टीले पर भी हमारे साथ ऐसा ही हुआ । चलिये चलते हैं,रवीन्द्र भारद्वाज,अशोक त्रिवेदी.किशोर त्रिवेदी,अजय जोशी और राममिलन शर्मा के साथ और पूछते है डॉ.वाकणकर से कुछ नये सवाल । हाँ पहले उस दिन का किस्सा ज़रा याद कर लिया जाये । दृश्य यह है कि  ट्रेंच मे कहीं से एक साँप घूमता घामता आ गया है और काम वहीं रुक गया है सारे मज़दूर डरे हुए हैं और सच पूछो तो हम भी और डॉ. साहब हम लोगों का उत्साहवर्धन करने का प्रयत्न कर रहे हैं .. 

हम ज़मीन में गड़ा हुआ धन खोजने आये हैं
                     ट्रेंच से साँप की विदाई के पश्चात काम फिर आगे बढ़ा । आज हमें रेत की लेयर के नीचे फ्लोर तक पहुँचना ही था । लेकिन मज़दूरों में कोई उत्साह नहीं दिखाई दे रहा था । शायद वे साँप देखकर डर गये थे । “ कईं व्ही गयो ? “ डॉ. वाकणकर ने उनकी असमंजसता देख कर उनसे पूछा । एक मज़दूर ने धीरे से कहा “ बासाब यहाँ गड़ा हुआ खजाना तो नहीं है ? “ सर ने ज़ोरदार ठहाका लगाया और कहा ..” अरे तुम लोग कहीं यह तो नहीं समझ रहे हो कि यह खजाने वाला साँप था और अपने खजाने की रक्षा के लिये यहाँ बैठा था ? “ मज़दूर बेचारे क्या कहते वे तो सदियों से चली आ रही इस मान्यता के निरक्षर संवाहक थे । “ भई न तो ज़मीन में गड़ा कोई खजाना होता है न ही उसकी रक्षा करने वाला साँप होता है ,सब मनगढ़ंत बातें हैं ।
फिर सर हम लोगों की ओर मुखातिब होकर बोले “ देखो अपने देश में कैसी कैसी मान्यतायें व्याप्त हैं । हम लोग एक साइट पर उत्खनन कर रहे थे वहाँ गाँव वाले रोज़ आते थे और पूछते थे “ कईं बा साब सोणा खोदण वास्ते आया हो कईं ? “ एक गड़रिया बालक तो रोज़ आता था और घंटों खड़ा रहता था । रोज़ सुबह आते ही सबसे पहले वह पूछता “ कईं सोणा मिल्यों कईं ? “ मैं ना में सर हिला देता तो वो फिर पूछता “फेर कईं मिल्यो ? “ तो मैं ये टूटी –फूटी पॉटरीज़ की ओर इशारा कर देता और कहता “ई मिल्यो है”। तो वह बड़े लोगों की तरह सिर हिलाता और कहता .”.हूँ ठीकरो मिल्यो है । “ और फिर वह हँसता हुआ चला जाता ।
सही है रवीन्द्र ने कहा “ आम लोग अभी भी यही समझते हैं कि हम लोग गड़ा हुआ धन खोजने आये हैं । हम लोग जब शाम को दंगवाड़ा जाते हैं तो गाँव के लोग यही सवाल करते हैं । “ अरे बाप रे.. दंगवाड़ा का नाम रवीन्द्र ने क्या लिया सर का ध्यान हम लोगों की शरारत की ओर चला गया । उन्हे आर्य साहब ने बता दिया था कि हम लोगों ने राम मिलन के साथ शरारत की है और उसे अगिया बेताल के नाम पर डराने की कोशिश की है । उन्होने तुरंत कहा “ अच्छा तो तुम लोग दंगवाड़ा इसीलिये जाते हो कि बापड़े को परेशान करो । वो तो अच्छा हुआ मैने तुम लोगों की तरफ से समझा दिया नहीं तो वो कैम्प छोड़कर जा रहा था । “हम लोग क्या कहते कहाँ हमे डाँट खाने की उम्मीद थी लेकिन सर ने तो खुद ही हमे उबार लिया था।


20 - पाँच खुर वाला घोड़ा 


            ठण्डी हवाओं ने आज अपने बक्से से कुछ तेज़ सुइयाँ निकाल ली हैं और हमें चुभो रही है  । ठण्ड से डरने का एक कारण यह भी है कि हम लोग शहर के रहने वाले हैं और इतनी ठण्ड की हमें आदत नहीं है । राममिलन भैया का बिस्तर अपने तम्बू में स्थापित करने के उपरांत हम लोग भोजन करने के लिए भोजनशाला में चले गए । अधिक रात नहीं हुई थी सो इतनी जल्दी बिस्तर में घुसने का मन भी नहीं था । ठण्ड की वज़ह से कहीं  टहलने जाने की इच्छा भी नहीं हो रही थी । लेकिन किसी न किसी तरह समय तो बिताना ही था और हम किसी उपाय की तलाश में थे । कभी कभी ऐसा होता है कि हम समय बिताने के समस्त विकल्पों के बावज़ूद संतुष्ट नहीं होते हैं और किसी नवीनता की तलाश में रहते हैं ।

            ठण्ड भगाने के उपायों के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है । सामान्य ठण्ड होती है तो हम हल्का फुल्का कोई स्वेटर पहन लेते हैं ,फिर ठण्ड बढ़ी तो कानों को ढँक लेते हैं । कोट, ओवरकोट,ऊनी पैंट , मफलर , इनर ,टोपी,शाल जाने कितने विकल्प होते हैं हमारे पास । लेकिन दुनिया में ऐसे करोड़ों लोग हैं जिनके पास यह सब कुछ नहीं होता । मुझे उस हिमयुग में जीवित रहने वाले उस आदिम मनुष्य की याद आई जिसके पास तन ढंकने के लिए भी कुछ न था उसके बाद भी वह भीषण ठण्ड में बचा रहा । ऐसा क्या था उसके पास मैं सोचने लगा और मुझे याद आया ...हाँ उसके पास आग थी ।

            सो हमने भी आज भोजनोपरांत कहीं टहलने जाने की बजाय तम्बू के सामने आग जलाकर ठण्ड से मुकाबला करते हुए गपशप करने का प्लान बनाया । कुछ लकडियाँ हम भोजनशाला से ले आए कुछ आसपास से इकठ्ठा कर लीं । आर्य साहब ने हम लोगों को लकड़ियाँ चुनते देखा तो खुश हो गए .." अच्छा तो आज कैंप फायर का प्रोग्राम है ?" मैंने कहा " सर, पहले लकड़ियाँ तो इकठ्ठी हो जायें , फायर तो बाद की बात है ।" उन्होंने हमारा उत्साह वर्धन करने के लिए घोषणा कर दी  “ जो सबसे ज़्यादा लकड़ियाँ इकठ्ठा करेगा उसे मेडल प्रदान किया जाएगा ।" इतने में डॉ. वाकणकर आते हुए दिखाई दिए उन्होंने आर्य साहब की यह घोषणा सुन ली थी । “ क्यों यहाँ कोई ओलम्पिक हो रहा है क्या ? “ उन्होंने सवाल किया । " हाँ सर , आग जलाने के लिए लकड़ी चुन कर लाने की स्पर्धा हो रही है । " अजय ने कहा ।

            अजय दौड़कर सर के तम्बू से एक मोढ़ा लेकर आ गया और उनके लिए बैठने की व्यवस्था कर दी । अब तक पर्याप्त लकड़ियाँ इकठ्ठा हो चुकी थीं । सर ने कहा "भाई आग तो जलाओ ।" अशोक की जेब में माचिस थी लेकिन पोल खुल जाने के भय से उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि जेब से माचिस निकाल कर आग लगाए । " अभी आया " कहकर वह उठा और भोजनशाला तक गया फिर तुरंत वहाँ से लौटकर आया और जेब से माचिस निकालकर आग जलाने लगा । सर मुस्कुराए और धीरे से कहा .. " अरे जेब में थी तो यहीं निकाल लेना था ना  ...इतना नाटक करने की क्या ज़रूरत थी ।" अशोक ने कुछ नहीं कहा और शर्म की वज़ह से लकड़ियों के परदे में अपना मुँह छुपा लिया ।

            हम लोग भी आग सुलगाने में अपनी अपनी तरह से अशोक की मदद करने लगे  । जैसे ही लकड़ियों ने आग पकड़ी और लपटें  कुछ तेज़ हुई  हम लोग उसके इर्द -गिर्द पालथी मारकर बैठ गए और सर से कुछ ज्ञानवर्धक बात सुनने की आशा में अपने कान खड़े कर दिए ।  हमें पता था, सर से जब तक कोई सवाल नहीं करेंगे उनके मुखारविंद से कोई ज्ञानवर्धक बात नहीं निकलेगी । अजय ने इसका ज़िम्मा लिया और तुरंत उनकी पिछली बात के तारतम्य में प्रश्न उछाल दिया “ सर ये ओलम्पिक खेलों की शुरुआत कैसे  हुई ?

            सर ने कहा “ यूनान या ग्रीस के बारे में तो तुम लोग जानते ही हो । ग्रीक माइथोलॉजी के अनुसार सबसे पहले खेल की यह प्रतियोगिताएँ ओलिम्पस पर्वत पर रहने वाले यूनानी देवी देवताओं के बीच प्रारंभ हुईं । एक दंतकथा के अनुसार एक प्रतियोगिता में सर्वोच्च देवता का पद प्राप्त करने के लिए उनके देवता ज्यूस या जीयस ने अन्य देवताओं को हराया । कुछ लोग कहते हैं हेराक्लीज़ नाम के एक देवता ने इसकी शुरुआत की । वैसे ओलम्पिक की शुरुआत के बारे में कुछ और दंतकथाएँ भी हैं । एक कथा तुम लोगों को सुनाता हूँ ।"

            सर की बात सुनकर हम लोग आग के और करीब आ गए । सर ने कहानी शुरू की । " प्राचीन यूनान में ओयेनामस नामका एक राजा था । उसकी हिप्पोडामिया नामक एक सुन्दर कन्या थी । एक श्राप के अनुसार यह तय था कि राजा की मृत्यु उसके ही दामाद के हाथों होगी इसलिए वह अपनी बेटी का विवाह ही नहीं होने देता था । लेकिन जब ज़रूरत हुई और रिश्ते आने लगे तो उसने यह शर्त रखी कि विवाह का इच्छुक जो भी युवक होगा उसे सर्वप्रथम राजा को रथ दौड़ में हराना होगा तभी वह उसकी कन्या से विवाह कर सकेगा । राजा ओयेनामस के पास समुद्र के देवता पोसाईडान द्वारा दिया गया एक दिव्य रथ था जिसके घोड़े हवा से भी तेज़ दौड़ते थे, इसलिए वह जानता था कि उसे हराना असम्भव है ।"

            कहानी में हम लोगों को मज़ा आने लगा था । सर ने कहानी आगे बढ़ाई "अब जो भी युवक राजा की  बेटी से विवाह करने आता था वह रथ दौड़ में राजा से हार जाता था और उसके हाथों मारा जाता । इस तरह अठारह युवकों को रथ दौड़ में हार जाने की वज़ह से अपनी जान गंवानी पड़ी । अंततः पोलेप्स नामक एक राजकुमार हिप्पोडामिया से विवाह करने आया । वह इतना सुन्दर था कि उसे देखते ही राजकुमारी उसे अपना दिल दे बैठी । इधर राजकुमार पोलेप्स ने इस दौड़ में जीतने के लिए एक चाल चली । उसने राजा के इस दिव्य रथ के सारथी मार्तिलस को पटा लिया । उसने उसे प्रलोभन दिया कि वह अगर जीतेगा तो वह राजा को मार डालेगा और उसके राज्य का स्वामी बनने के बाद उसे आधा राज्य भी दे देगा । यही नहीं बल्कि विवाह के बाद उसे पहली रात भी राजकुमारी के साथ बिताने को मिलेगी ।"

            "बाप रे ।" अजय ने कहा । " यह तो बड़ा भारी प्रलोभन था ।" "आगे सुनो.." सर ने कहा । "मार्तिलस ने पोलेप्स की बातों में आकर राजा के रथ के पहिये से कांसे की पिन निकालकर उसकी जगह मोम की पिन लगा दी । अब जैसे ही रथ दौड़ प्रतियोगिता प्रारंभ हुई कुछ ही देर में राजा के रथ की मोम की पिन पिघल गई और वह अपने ही रथ के नीचे आ गया इस तरह उसकी मृत्यु हो गई  । हाँ उसका सारथी इसमें बच गया लेकिन राजकुमार ने उसे पकड़कर उसकी हत्या कर दी । "

            " बिलकुल ठीक किया सर उसने " अजय ने कहा । " लेकिन अपनी बीबी का सौदा किया यह अच्छा नहीं किया ।" "अरे यह कहानी है भाई ।" रवींद्र ने कहा "कहानियों में ऐसा ही होता है, हमारे यहाँ नहीं धर्मराज युधिष्ठिर ने अपनी पत्नी को ही दांव पर लगा दिया था । ' फिर वह सर की ओर मुख़ातिब होकर बोला .." हाँ सर, फिर क्या हुआ ?

            "फिर क्या होना था ।" सर ने कहा " उसकी राजकुमारी से शादी हो गई । कहते हैं कि इसी जीत की स्मृति में और राजा को श्रद्धांजलि स्वरूप पोलेप्स द्वारा ओलम्पिक खेलों की शुरुआत की गई । इस तरह प्राचीन यूनान में उत्सव-पर्व आदि पर खेलकूद प्रतियोगिताएं  आयोजित होने लगीं । कहते हैं यह मशहूर प्रतियोगिता यूनान के पेलोपोनेसस प्रांत में ओलम्पिया नामक स्थान पर होती थी । इसीलिए इसका नाम ओलम्पिक पड़ा । यहाँ ओलिम्पस पर्वत पर रहने वाले ग्रीक देवता ओलिम्पी जियस का मन्दिर था जिसमें यूनानी मूर्तिकार फीडियस द्वारा निर्मित जियस की मूर्ति थी । साथ ही इस मन्दिर के आसपास अन्य देवी देवताओं, वीर पुरुषों और ओलम्पिक विजेताओं की भी अनेक मूर्तियाँ थी । यहाँ व्यायामशालायें भी थीं । एक दंतकथा के अनुसार हेराक्लीज़ ने यह ओलिम्पी जीयस का मंदिर बनवाया था । हालाँकि पुरातत्ववेत्ता जानते हैं कि सारे मंदिर और मूर्तियाँ मनुष्यों ने ही बनाई थीं ।"

            “सर जी, उनका देवता तो जियस था फिर ये ओलिम्पी जियस नामक देवता उससे कोई अलग देवता था क्या ?“ अजय ने बीच में ही सवाल किया । “अरे नहीं रे बावड़े ।“ सर ने कहा “अपने यहाँ कैसे एक ही देवता के अलग अलग नाम होते हैं जैसे … “ वे आगे उदाहरण देने ही वाले थे कि राममिलन ने तपाक से कहा …” जैसे बजरंग बली के नाम पवनसुत, अंजनीपुत्र, महावीर, केसरी नंदन ,फिर दक्षिणमुखी हनुमान, उत्तरमुखी हनुमान, मनोकामना हनुमान आदि । “ वाह भाई वाह ।“ आर्य सर ने कहा …” देखो इस बजरंग बली के भक्त ने बिलकुल सही बताया । अपने यहाँ उज्जैन में जैसे कालभैरव हैं और उन्हें लोकभाषा में भेरू बाबा कहा जाता है उनके नाम से भेरू बाबा के कितने मंदिर बन गए हैं । "हाँ सर“  मैंने कहा “मैंने भी देवास गेट पर एक उखाड़ पछाड़ भेरू बाबा का मंदिर देखा है । ऐसा कहते हैं कि जब भेरू बाबा नाराज़ हो जाते हैं तो तबाही मचा देते हैं ।“ वाकणकर सर को पता नही यह सुनकर क्या याद आया , वे उठे और अभी आता हूँ कहकर अपने तम्बू की ओर चले गए ।
            अशोक ने उनके जाते ही कहा “भाई अपने यहाँ तो भेरू बाबा ने अभी तक कोई तबाही नहीं मचाई है, लेकिन यह सही है कि एक भगवान से लोगों का मन नहीं भरता इसलिए सभी ने अपने अपने भगवान बना लिए हैं, उनके नाम पर अलग अलग धर्म बना लिए हैं और अब अपने अपने भगवानों को लेकर आपस में लड़ रहे हैं । एक कहता है मेरा भगवान बड़ा है दूसरा अपने भगवान को बड़ा बताता है, और तो और एक धर्म के भीतर भी कई उपधर्म हो गए हैं और उनके भी अपने अलग अलग भगवान हैं । जिनके भगवान एक हैं उनके अनुयायियों  में भी इस बात के लिए लड़ाई हो रही है कि मैं बड़ा भक्त हूँ । और जिनके अनुयायी एक हैं, उनके भगवानों में लड़ाई हो रही है । कहीं मनुष्य ने अपने आप को भगवान घोषित कर दिया है और दूसरे मनुष्य के भगवान को खारिज कर दिया है । सबके अपने अपने नियम हैं और वे अपने नियमों से अन्य को संचालित करना चाहते हैं । “
            “ यहाँ तक तो ठीक है …” किशोर ने कहा । “ लेकिन अपने धर्म को बड़ा और अपने भगवान को बड़ा और अन्य के धर्म और भगवान को छोटा बताकर जो वैमनस्यता फैलाई जाती है और दंगे किए जाते हैं वह तो बिलकुल ग़लत है । “ “ इसका केवल एक कारण है …” मैंने अपना ज्ञान बघारना शुरू किया । “ वास्तव में लोगों ने इतिहास को ठीक ढंग से पढ़ा ही नहीं है । इतिहास बोध के अभाव में केवल सतही ज्ञान व अपने ग्रंथों के आधार पर डींग हाँकना कहाँ तक उचित है । “ “ बिलकुल सही …” अशोक ने कहा “ कुछ ग्रंथ तो लिखे भी इसी उद्देश्य से गए जैसे बौद्ध धर्म की महत्ता समाप्त करने के लिए मनुस्मृति रची गई । फिर ग्रंथ लिखे जाने के बाद अपने ढंग से उनकी व्याख्या की गई । फिर किताबों को लेकर भी लोग लड़ने लगे । कुल मिलाकर यह धर्म है ही झगड़े की चीज ।“
            आर्य सर समझ गए कि अब बहस गम्भीर मोड़ की ओर जा रही है सो उन्होंने  इन्टरप्ट किया …”भाई यह भेरू बाबा से तुम लोग कहाँ पहुँच गए ?" फिर वे ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे और बोले …” सुनो,सुनो ..भेरू से याद आया, तुम लोगों से दो बैच पहले एक स्टूडेंट था भेरू मालवी नाम था उसका । एक दिन वो मेरे पास आया और कहने लगा, सर मेरा नाम बहुत खराब है मैं इसे बदलना चाहता हूँ । मैंने कहा, अरे तुम्हारा नाम तो बहुत बढ़िया है भेरू यानि भैरव, कालभैरव, शिव का नाम है यह । तुम अपने नाम का उच्चारण भैरव मालवी करो देखो कितना अच्छा लगता है । बस नाम को लेकर उसकी ग्लानि समाप्त हो गई ।“ हम लोग समझ गए कि धर्म  पर अब कोई गम्भीर चर्चा नहीं हो सकती ।           
            वाकणकर सर इस बीच अपने तम्बू से एक चक्कर लगाकर वापस आ चुके थे और मोढ़े पर विराजमान हो गए थे । “सर वो ओलम्पिक के बारे में बता रहे थे आप ।“ अजय ने सर को वापस आया देखकर मूल विषय पर वापसी के लिए संकेत दिया । “हाँ ।“ सर बोले “मैं कह रहा था कि उस दौर में ओलम्पिक देखने हज़ारों की संख्या में लोग आते थे । तम्बुओं में उनके रहने की व्यवस्था  की जाती थी लेकिन स्त्रियों के लिए इस ओलम्पिक में प्रवेश निषेध था । इस नियम का उल्लंघन करने वाली स्त्री को मौत की सज़ा तक दी जा सकती थी ।“

          “यह तो बड़ा अन्याय है सर ।“ रवीन्द्र ने कहा । “हाँ ।“ सर ने कहा “ हो सकता है देशकालानुसार ऐसा नियम रहा हो, यह तो बहुत बाद में स्त्रियों ने खेल में भाग लेना शुरू किया । हमारे देश में भी स्त्रियों के लिए बहुत से खेल वर्जित थे और आज देखो लड़कियाँ ही सर्वाधिक पदक जीतती हैं ।“  “ सर अपने यहाँ तो बचपन से ही लड़कियों को लड़कों के खेल खेलने से मना किया जाता है अपने यहाँ की लड़कियाँ कहाँ पदक जीतती हैं । “ अशोक बोला ।

            “ सर वो ओलम्पिक..” अजय ने फिर गाड़ी पटरी पर लाने के लिए इशारा किया । “ हाँ तो मैं बता रहा था... “ सर ने कहा “ इन प्राचीन ओलम्पिक खेलों में कुश्ती, चक्रफेंक, भालाफेंक, घुड़दौड़, रथदौड़ आदि प्रमुख खेल थे । रथदौड़ के मैदान को हिप्पोड्रोम कहते थे । एक ईवेंट में एक रथ को मैदान के बारह चक्कर लगाने होते थे । कई बार आपस में टकराकर भीषण दुर्घटनायें भी होती थीं ।"

            “सर लेकिन इसमें तो केवल सम्पन्न लोग ही भाग ले पाते होंगे आखिर रथ और चार घोड़े जुटाना आसान नहीं है ।“ मैंने कहा । “हाँ ।“ सर बोले “सम्पन्न लोग ही विजेता होते थे । लेकिन वे रथ नहीं दौड़ाते थे बल्कि उनके सारथी दौड़ाते थे और विजेता भी रथ का सारथी नहीं बल्कि मालिक ही होता था । भले ही दुर्घटना में सारथी मारा जाये इनाम मालिक को ही मिलता था । क्योंकि सारथी तो दास होता था और उसकी कोई हैसियत नहीं थी । “

            "यह तो बहुत ही ग़लत बात है सर ।“ रवींद्र ने कहा " मतलब सारथी को मनुष्य ही नहीं समझा जाता था ।" " यार, तुम लोगों को मालिक और दास की पड़ी है और बेचारे घोड़े का कोई रोल नहीं ? इनाम तो घोड़े को भी मिलना चाहिए । “ मैंने कहा । मेरी बात सुनकर सारे लोग हँसने लगे " लो सुन लो इनकी बात ।" रवीन्द्र ने कहा यहाँ इंसान की बात हो रही है और इन्हें घोड़े की चिंता है । मैंने कहा " क्यों नहीं होगी भाई आख़िर है तो वह इंसान के बराबर का ही साथी आख़िर जंगल के घोड़े ने उंगलियाँ  गँवाकर खुर क्या प्राप्त किया इंसान का वाहन बन गया ।" “ ये क्या कहानी है भाई ? “ रवीन्द्र ने सवाल किया ।“ तुम्हें  नहीं पता ? “ मैंने कहा । “ चलो बताता हूँ ।"

            अब सब लोगों का ध्यान मेरी ओर था । मैंने अपनी बात शुरू की "लाखों साल जब इस धरती पर जंगल ही जंगल थे  घोड़े की पाँच उंगलियाँ हुआ करती थीं । इसका कारण यह था कि जंगलों में ज़मीन पर सूखे पत्ते बिछे होते थे और उन पर दौड़ने के लिए अधिक उंगलियाँ ही काम आती थीं । इनकी वज़ह से उसे ज़मीन पर पैर अच्छी  तरह टिकाने में मदद मिलती थी । कालांतर में जब महावन कम होते गए और मैदानों की संख्या में वृद्धि होने लगी तब घोड़े के उन पूर्वजों को भी खुले मैदान में आना पड़ा । जंगल में छुपने की जगह नहीं बची थी और केवल वही जानवर बच सके जिनकी लम्बी टांगें थीं जिनसे वे तेज़ दौड़ सकते थे । उस वक़्त सबसे ज्यादा तेज़ दौड़ने वाले जानवर घोड़े ही थे ।

"लेकिन उसे मैदानी इलाके में आने की ऐसी क्या ज़रूरत पद गई ?" अजय ने सवाल किया ।मैंने कहा " अरे भाई ,उसे भी तो चारा चाहिए था ना और पहले जंगल में वह हिंसक प्राणियों से अपनी रक्षा कर लेता था जब जंगल कम हुए तो उसे भी मैदान में आना पड़ा । अब मैदान में दौड़ने के लिए  अधिक उंगलियों की ज़रूरत ही नहीं बची सो घोड़े की अगली नस्लों में पाँच से घटकर तीन उंगलियाँ हुईं और अंतत: हजारों साल बाद केवल दो उँगलियाँ रह गईं जिन्हें आज हम खुर कहते हैं  । इसके अलावा घोड़े भी पहले आज जैसे कद्दावर नहीं थे बल्कि बौने थे इधर उनकी उँगलियाँ कम होती गईं और कद बढ़ता गया । यह सब उनके जींस में परिवर्तन के कारण हुआ । पुरातत्ववेत्ताओं को सभी काल के घोड़ों की हड्डियाँ मिल चुकी हैं जिनके आधार पर घोड़े की इन प्रजातियों के नाम क्रमश: हिप्पस, मेसोहिप्पस ,प्लियोहिप्पस और इक्वस रखे गए हैं ।"

            सभी ने मेरी बात पर ताली बजाई । रवींद्र ने कहा “अच्छा इसलिए  ओलम्पिक में घुड़दौड़ के मैंदान को घोड़े के जैविक नाम हिप्पो की वज़ह से हिप्पोड्रोम कहते हैं ।“अजय का अभी ओलम्पिक की बात से मन नहीं भरा था उसने सर से कहा " सर यह तो हो गई प्राचीन काल के ओलम्पिक खेलों की बात लेकिन आधुनिक काल में यह खेल कैसे शुरू हुए ?" सर ने कहा "भाई, आधुनिक ओलम्पिक खेलों के बारे में तो कोई खिलाड़ी ही अच्छी तरह से बता पायेगा । लेकिन मेरी जानकारी में  तीन सौ तिरानबे ईसवी में यह खेल बंद हो गए थे । दोबारा इनकी शुरुआत 1896 में हुई । उसके बाद हर चार साल के अंतराल पर यह खेल होते रहे । बीच में शायद युद्ध के समय यह खेल बंद भी हुए थे ।" अजय ने फिर पूछा " सर भारत ने कब इन खेलों में भाग लिया ?" सर ने ऊब कर कहा.." अब सब मुझ से ही पूछोगे क्या .. वैसे मेरी जानकारी के अनुसार भारत ने उन्नीस सौ में इन खेलों में भाग लिया था और एथलेटिक्स में दो रजत पदक भी जीते थे ।

            हम सब लोगों को अब नींद आने लगी थी । रवीन्द्र ने कहा "आज ओलम्पिक  के बारे में बढ़िया कहानी सुनने को मिली, लेकिन यह बात तो है कि कहानियों का कोई ओलम्पिक होगा तो शरद को गोल्डमेडल ज़रूर मिलेगा । “ठीक है ठीक है । चलो अब सो जाकर …सुबह जल्दी सोकर नहीं उठे तो खैर नहीं । और सुनो ..ओलम्पिक की शुरुआत करने वाली उस राजकुमारी का नाम याद है न ..हिप्पोडामिया  ..इसका अर्थ होता है घोड़ों को काबू में रखने वाली, सो वह राजकुमारी भी कई घोड़ों की मालकिन थी । चलो अब सभा समाप्त ।“ सर ने हमारी अलाव सभा बर्खास्त करते हुए फरमान जारी किया ।