सोमवार, 1 जून 2026

49-यह भी लड़की उठाकर लाया है


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

*पिछले भाग में आपने पढ़ा कि किस तरह विदेशियों ने भारत की खोज की और उसे किस तरह हमारे यहाँ के लोगों द्वारा स्वीकार कियागया । अब छात्रों के वापस जाने का दिन आ गया है वे लोग बहुत उदास हैं और बेचैन भी हैं । लेकिन बातों की कमी नहीं है उनके पास आज की चर्चा में शामिल है आदिम मातृसत्तात्मक समाज , स्त्रियों की स्थिति कृषि और पशुपालन में उनकी भागीदारी आदि। साथ ही पढ़िए कि प्राचीन समय में विवाह की क्या क्या पद्धतियाँ थीं और कितने तरह के विवाह हुआ करते थे। इनका रोचक वर्णन ।*

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*भाग 49*

*यह भी लड़की उठाकर लाया है*  

आज शाम से ही बेचैनी बार बार मन के भीतर झाँक रही थी । पता नहीं यह मौसम बदलने की वज़ह से हो रहा था या यह सोचकर कि अब हमारे वापस जाने के दिन आ गए हैं । ऐसा होता है कि शुरू में कोई नई जगह हमें अच्छी नहीं लगती लेकिन जब वहाँ रहने की आदत हो जाती है तो वह हमें अच्छी लगने लगती है फिर वहाँ से वापस जाने का ख्याल भी बुरा लगता है । हम लोग बार बार मन को समझा रहे रहे थे कि यह बेचैनी वापस जाने के ख़याल से नहीं है बल्कि मौसम की वज़ह से है । मौसम भी तो बड़ा अजीब हो रहा है इन दिनों । दिन अपना चरित्र बदलते हुए गर्म हो जाता तो रात ठंडी । धूप जो कुछ दिनों पहले भली सी लगती है अब बुरी तरह चुभने लगी है । शाम तक काम करते हुए हम लोग पसीने से तरबतर हो जाते हैं ।


काम ख़त्म करने के बाद हम लोग हाथ मुँह धोने घाट की और चल दिए । आज दंगवाड़ा जाने का भी मन नहीं था । जितना कुछ उस गाँव से हमें मिलना था हमने ले लिया था और अब हमारी यह सिटी हमें उबाऊ लगने लगी थी अब तो बस अपना शहर याद आ रहा था । फिर भी शाम थी और तम्बू में बैठकर तो नहीं बिताई जा सकती थी । हमें ख्याल आया कि पास ही बरगदों के निकट हाल ही में बना एक मंदिर है सो हम टहलते हुए वहाँ तक चले गए । सामान्यतः इस मंदिर तक गाँव के लोग नहीं आते हैं और यह सूना ही पड़ा रहता है । गाँव से बीच बीच में एक पुजारी जी आते हैं जो इसकी देखभाल करते हैं । रवीन्द्र ने बताया कि चैत्र के नव रात्र आते ही देवी के मंदिरों में भीड़ शुरू हो जायेगी । उस समय इस मंदिर में भी काफी लोग आते हैं और यह वीरान सी जगह गुलज़ार हो जाती है । "कितनी अच्छी बात है न ।" अजय ने कहा "देवियों को साल भर में दो बार नौ दिनों तक पूजा जाता है जबकि अन्य देवताओं को पुजवाने का इतना चांस नहीं मिलता । ऐसा लगता है देश में देवी के भक्तों की संख्या अधिक है । " 


रवीन्द्र ने कहा " भाई, ऐसा नहीं है पूजा तो सभी देवताओं की साल भर होती है लेकिन नवरात्र के इन दिनों में देवी की विशेष पूजा होती है । देवी देवताओं की पूजा करने वाले हमारे देश में अनेक पंथ रहे हैं । शैव शिव की पूजा करते हैं, वैष्णव विष्णु की पूजा करते हैं और शाक्त शक्ति अर्थात देवी की उपासना करते हैं । अब जिसकी जैसी श्रद्धा । हो सकता है कि शाक्तों की संख्या सबसे अधिक हो । लेकिन यह अच्छी बात है कि स्त्री को शक्ति का प्रतीक माना जाता है । "रहने दे यार ।" अशोक ने कहा "यह सब झूठे पाखण्डी लोग हैं , स्त्री को देवी का रूप मानते हैं, शक्ति का प्रतीक मानते हैं, साल में दो दो बार नौ दिनों तक उपवास करते हैं ,ऊँची ऊँची पहाडी चढ़कर देवी के दर्शन को जाते हैं लेकिन वहीं अपने घर की स्त्री को प्रताड़ित भी करते हैं, उसकी अवमानना करते हैं ।"


अशोक की बात पर अजय ने तुरंत प्रतिवाद किया " ऐसा नहीं है यार सब लोग ऐसे नहीं होते आज भी स्त्रियों का सम्मान करने वाले लोगों की संख्या अधिक है । और स्त्री भी अब पहले जैसी स्त्री नहीं है वह पहले की तुलना में अधिक ताकतवर हुई है आज की स्त्री पढ़ी लिखी है , ऐसा कौन सा काम है जो वह नहीं कर सकती वह नौकरी करती है , बड़े बड़े पद संभालती है म हवाई जहाज तक चलाती है और फिर घर आकर खाना भी पकाती है न बच्चे भी संभालती है देवी के आठ हाथ होते हैं न प्रतिमाओं में हमारे देश की स्त्री के भी आठ हाथ होते हैं , एक में दफ्तर की फाइल ,एक में कर का स्टीयरिंग , एक में बच्चे के दूध की बोतल, एक में चश्मा, एक में बेलन , एक में करछुल , एक में सब्जी से भरी थैली और एक में .." " बस भैया बस , आठ की गिनती हो गई " अशोक ने अजय के नवीन स्त्री प्रतिमा शिल्प के विवरण पर रोक लगाते हुए कहा .. अब चलें हमारे भाटीजी के दो हाथों से पकाया हुआ खाना खाने .. ज़ोरों की भूख लग रही है ।


खाना खाते हुए आज हम लोग अपनी अपनी माँ के हाथों बनाये खाने को याद करते रहे । आज टहलने का सत्र अधूरा रह गया था इसलिए खाने के बाद फिर हम लोग टहलने निकले । अशोक की भूख ने आज अजय की प्राणरक्षा कर दी थी । हम लोग चाहते थे कि किसी नए टॉपिक पर बात करें लेकिन अजय ने फिर वही राग  छेड़ दिया "लेकिन स्त्री को हमारे देश के ही लोग देवी मानते हों ऐसा नहीं है, विश्व की सभी सभ्यताओं में और धर्मों में स्त्री के देवी रूप को ही पूजा गया है । ग्रीस में देवी अथीना का मंदिर हैं । इसाइयत में मरियम है, इस्लाम में भी औरत का बहुत महत्व है , हमारे यहाँ भी सिर्फ हिन्दू धर्म में ही नहीं बल्कि बौद्ध और जैन धर्म में भी जाने कितनी देवियों के नाम से कई मंदिर हैं, फिर सप्त मातृकाएँ हैं महाविद्या समूह की देवियाँ हैं .. ।"


अशोक का मूड पता नही किस बात से उखड़ा हुआ था "रेन दे यार, बोला ना जितने भी यह सब देवी को पूजने वाले लोग हैं सब पाखंडी लोग हैं मंदिर में स्त्री के देवी रूप की पूजा करते हैं और घर में उसकी पिटाई करते हैं ।"  "तुम्हारा कहना अंशतः सही है अशोक ।"  मुझे किसी न किसी तरह अशोक का उखड़ा हुआ मूड ठीक करना था  "लेकिन शुरू से ऐसा नहीं था । स्त्री को वाकई में पूजनीय ही माना जाता था और न केवल उसके दैवी रूप की अपितु मानवी रूप की भी समाज में प्रतिष्ठा थी, लेकिन धीरे धीरे जब पुरुषप्रधान व्यवस्था हुई तो सब कुछ बदल गया । अजय ने पूछा "हाँ यार यह तो पता है कि पहले मातृसत्ता थी लेकिन पितृसत्ता में अचानक परिवर्तन कैसे हुआ ? 


" यह अचानक नहीं हुआ ।" मैंने सब की आँखों में झाँककर देखा उन्हें जानने की उत्सुकता है या नहीं  । "हाँ न बता न यार ।" रवींद्र ने लाड़ करते हुए  कहा । मैंने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा "दरअसल स्त्री का महत्व पशुपालन अवस्था से प्रारंभ हुआ । मैंने बताया था ना कि पुरुष शिकार करने जंगल में जाता था और कई बार वह जिंदा प्राणियों को पकड़ लाता था । स्त्रियाँ घर में रहती थीं सो उनकी देखभाल करने का ज़िम्मा स्त्रियों पर आ गया । स्त्रियाँ उन प्राणियों को चारा खिलातीं और बड़ा करती । दूध दुहने का काम भी वे ही करती थी ।


"हाँ ।" रवीन्द्र ने कहा । "इसलिए वेदों में बेटी को दुहिता कहा गया है और उसीसे बना है अंग्रेजी का डॉटर ।" "बिलकुल सही ।" मैंने कहा । "आगे चलकर जब कृषि की शुरुआत हुई तो स्त्रियों ने ही इसका बीड़ा उठाया । लेकिन कृषि के प्रारम्भिक काल में वे अनाज बीनकर लाती थीं या जो अनाज अनायास उग आता था उसे सहेजती थीं । जब मांस कम पड़ जाता तो उनके द्वारा आपातकाल के लिए सहेजा हुआ अनाज, जंगली बेर, अचार, महुआ जैसे फल या शहद ही काम आता था ।" लेकिन वे गौमाता भी पालते थे तो उनका दूध भी तो काफी होता होगा ?" राममिलन भैया ने कहा । "हाँ ।" मैंने कहा " दूध की तो कोई कमी न थी और वे उसका विविध रूपों में उपयोग भी करते थे । इसके अलावा गौमाता का ही नहीं भेड़ मौसी का भी दूध होता था । स्त्रियाँ ही यह सब करती थीं ,वे अन्नपूर्णा थीं इसलिए घर में उनका सम्मान भी सबसे अधिक होता था ।"


"लेकिन अक्सर ऐसा होता कि यह संचित खाद्य भी परिवार के लिए कम पड़ जाता । इतने बड़े कुनबे के लिए वह नाकाफी था । ऐसे समय उन्हें भूख मिटाने के लिए अतिरिक्त उपाय करने पड़ते थे सो उन्होंने अनाज बोना शुरू किया । लेकिन यह भी आसान नहीं था । अनाज का उत्पादन कम होता था और उसके आसपास घास ज्यादा उग आती थी । फिर उन्हें यह भी नहीं पता था कि अनाज बोने के लिए पहले खरपतवार की सफाई करनी पड़ती है, जमीन को जोतना पड़ता है हालाँकि वे  कुदाल से गड्ढा करके अनाज गाड़ती थीं लेकिन गड्ढा बहुत ज्यादा नहीं हो पाता था और लगभग सतह पर पड़ा अनाज पानी या नमी की कमी से शीघ्र ही सूख जाता था या पक्षी उन्हें चुग लेते थे । जब वे पके हुए अनाज  को बीनने जातीं तो देखती वहाँ कुछ नहीं बचा है ।"


"गजब है यार, रोटी के लिए इतनी ज़द्दोज़हद ।" अजय ने कहा "लेकिन ये पुरुष क्या हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते थे ?"  "नहीं,उनकी समझ अधिक विकसित नहीं हुई थी । वे तो घास देखकर ज्यादा खुश होते थे क्योंकि अधिक घास का मतलब है पशुओं के लिए अधिक चारा ।" मैंने कहा । "सो वे अपने पशुओं को वहाँ चरने के लिए छोड़ देते थे । पशु निरंतर बढ़ते चले जाते थे जिनसे अधिक मांस और अधिक दूध उन्हें मिलता था । अनाज भले ही कम हो जाए लेकिन दूध का पनीर अधिक मात्रा में होता था । "वाह क्या दृश्य रहता होगा उनकी डिनर टेबल का नॉन वेज और वेज दोनों ।" अशोक का मूड अब तक ठीक हो गया था  "पनीर मटर की सब्जी , पनीर कोरमा, पनीर दो प्याजा, भेड़ के मांस की बिरयानी और भेड़ के मेमनों का शोरबा ।"  


"ए भाई तुझे पुरातत्ववेत्ता का काम करना है या वेटर का ?" अजय ने अशोक को छेड़ते हुए कहा "ऐसी ऐसी डिशेस का नाम लेकर हमारी लौकी की सब्ज़ी का जायका क्यों ख़राब कर रहा है भाई ।"  "चुप रहो यार, इतनी सीरियस बात चल रही है तुम लोगों को मजाक सूझ रहा है ।" रवींद्र ने दोनों को चुप कराते हुए कहा ..हाँ आगे बता शरद ।" मैंने दोनों की ओर मुस्कुराते हुए देखा और कहा "लेकिन इस तरह पुरुष का काम ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया । क्योंकि घर की आन्तरिक व्यवस्था भले स्त्रियों के हाथ में हो दूध और मांस के लिए पशुओं की व्यवस्था तो पुरुष ही करता था।" "समझ गया मैं ।"  अजय ने कहा "पुरुष आज भी यही कहता है.. मैं सब्जी लाता हूँ खाना तुम पकाओ ।" 


मैंने कहा "बिलकुल ऐसा ही कुछ था । इस तरह पुरुष को अपनी प्रधानता स्थापित करने का अवसर मिलता गया । उसने पशुओं को खेती के काम में लगाना शुरू किया और एक हल भी बना लिया । औरतें जो बीज बोने के लिए बमुश्किल कुदाल से जो ज़मीन खोद पाती थीं उसे अब हल और बैल की मदद से पुरुष खोदने लगा और फिर बीज भी बोने लगा । उसके पशुओं ने घास खाकर ज़मीन भी साफ़ कर दी । यही नहीं उसके यह पशु उसका अनाज ढोते थे उसे अपनी पीठ पर लादकर अपने मालिक के घर तक पहुँचाते थे । पहिये का आविष्कार नहीं हुआ था लेकिन बिना पहियों की गाड़ी बन चुकी थी ।"


किशोर ने इस बीच एक इंटेलिजेंट कोश्चन किया  "लेकिन क्या इन सब बातों के कहीं पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं ?" "हाँ ।" मैंने कहा " कुछ शैलचित्रों में यह दृश्य मिलता है कि  हल को बैलों की जोड़ी खींच रही है और यह हलवाहा भी साथ है । इस तरह अब पुरुष की भूमिका शिकारी के साथ चरवाहा और फिर कृषक की भी हो गई । स्त्री से जब उसके द्वारा मांस, अनाज, फल की व्यवस्था करने जैसे सब काम छीन लिए गए तो उसकी महत्ता भी कम होने लगी । अब स्त्रियों की महत्ता इसी बात में थी कि वे संतान को जन्म दे सकती थीं जो काम पुरुष नहीं कर सकता था । पहले जो आदेश पत्नी पति को देती थी अब वह पति पत्नी को देने लगा । पत्नी की नानी, मौसी आदि का जो आधिपत्य घर के पुरुष पर होता था वह भी धीरे धीरे ख़त्म होने लगा । अब उस जामाता पुरुष के साथ सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार किया जाने लगा इसलिए कि वह उनके कुनबे के लिए मांस, दूध, अनाज, वनस्पति आदि का प्रबंध करता था और उनके लिए मेहनत करता था । यही नहीं अब वे अपने कुल के बेटों को भी दूसरों के कुल में देने में झिझकने लगी क्योंकि एक पुरुष का शादी करके दूसरे घर जाना मतलब भोजन की व्यवस्था करने वाला एक हाथ कम हो जाना था ।" 


"इसका मतबल घर जमाई वाला सिस्टम भी फैल हो गया ?" राममिलन भैया ने कहा । "हाँ ।" मैंने जवाब दिया " यह प्रथा लगभग समाप्त हो गई । पहले बेटी किसी के बेटे को ब्याहकर घर ले आती थी अब बेटा बहू को ब्याहकर घर लाने लगा । धीरे धीरे उत्तराधिकार के नियम भी बदले । पहले पति की बहन और उसके बच्चे उत्तराधिकारी होते थे अब यह कानून बदलने लगा । इसका एक बढ़िया उदाहरण मैंने एक किताब में पढ़ा था । रूस के एक कबीले में जब कोई आदमी मरने लगता या मर जाता तो उसकी संपत्ति को न्यायपूर्ण और अन्याय पूर्ण ऐसे दो हिस्सों में बाँटा जाता । यह न्यायपूर्ण संपत्ति वही होती थी  जो उसे जीवनकाल में अपनी माँ से मिली होती यह  न्यायपूर्ण भाग तो उसे अपनी बहन के बच्चों को देना  पड़ता था  । अन्यायपूर्ण हिस्सा वह होता जिसे वह अपनी पत्नी के घर में रहते हुए इकठ्ठा करता । इसी भाग में युद्ध और लूटपाट से जीता माल भी शामिल होता था । यह हिस्सा घर में ही रहता और उसके बेटों को मिलता ।" "इसका मतलब यह हुआ कि शादी के बाद पुरुष के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार किया जाता था इसीलिए न शादी के बाद की कमाई संपत्ति अन्यायपूर्ण संपत्ति कहलाती थी " अजय ने ठंडी साँस भरते हुए कहा । " बेटा तुझपर यह नियम लागू नहीं होता " अशोक ने अजय को छेड़ते हुए कहा " तू तो अभी बाप कमाई पर ही बीबी को पाल रहा है "  


इससे पहले कि अजय और अशोक में वाकयुद्ध प्रारंभ होता मैंने कहा " भाई , अब हमारे बीच यही तो एकमात्र अन्याय का मारा है उसे बख्श दो ..खैर आगे की बात सुनो । अब हुआ यह कि पुरुष युवा अपना सामर्थ्य बढ़ जाने के कारण अपनी पसंद की स्त्री को लेकर घर आने लगे । लेकिन चूँकि पहले ऐसे  प्रथा नहीं थी सो उन्हें अपनी पत्नी को चुराकर लाना पड़ता । "ओ तेरे की ।" अजय ने कहा । "मतलब अपहरण ..अभी भी आदिवासी समुदाय में यही  प्रथा तो चलती है उठा लाने की ।" हाँ । " मैंने कहा " इस अपहरण के लिए सारे पुरुष साथी उस स्त्री के घर के आसपास कटार भाले लेकर छुप जाते थे और फिर मौका देखकर लड़की को उठा लाते । लड़की के घर वाले उनका विरोध करते मारपीट होती और खून ख़राबा भी होता । लेकिन बाद में जब सर्वसम्मति से ऐसा होने लगा तो यह प्रथा बन गई । तब भी वे लोग लड़की को उठाने ज़रूर जाते लेकिन लड़की वाले मारपीट नहीं करते बल्कि उन्हें नाश्ता वगैरह कराते और अपनी मुक्ति के लिए मूल्य में उपहार देते । लड़की उठाये जाते समय चीख चीख कर और घरवालों से लिपट कर रोती ।" 


"बस बस मैं सब समझ गया ।"  अजय ने कहा " आज भी यह प्रथा चली आ रही है , लड़का बारात लेकर जाता है फिर बारातियों का स्वागत होता है , दहेज़ दिया जाता है , लड़की का विदाई के समय रोती -धोती है .. सब क्लियर हो गया ।" रवीन्द्र ने कहा " देख ले यार ..इस अजय का हाल ..जब तू पितृसत्ता के प्रारंभ होने के बारे में बता रहा था तब यह अजय अपने शादी के बारे में सोच रहा था । अभी ताज़ा ताज़ा यह भी तो लड़की उठाकर लाया है ।"  अजय चलते हुए रुका और पलटकर तुरंत रवीन्द्र के घुटनों का स्पर्श किया । "महाराज, उठाकर नहीं लाया हूँ बल्कि सम्पूर्ण विधि विधान से ब्राह्म पद्धति से विवाह किया है ।" रवीन्द्र ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा ..तूने कोई गलत काम नहीं किया वत्स, सही पद्धति से ही विवाह किया है । हमारे यहाँ वैदिक काल में जो आठ पद्धतियों से विवाह होते थे उनमे से कुछ में ऐसी ही लड़की उठाकर लाने की प्रथा थी हो सकता है कुछ आदिवासी क्षेत्रों में अब भी वही प्रथाएँ चल रही हों । वैसे तूने उन आठ विवाह पद्धतियों के बारे में कोर्स में तो पढ़ा ही होगा? " अजय ने झट ऊँगली पर गिनना शुरू किया " पढ़ा है न महाराज, ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच ।" "बिलकुल ठीक " रवीन्द्र ने ताली बजाते हुए कहा "अच्छा है तुझे कोर्स का यह कोश्चन अब तक याद है । तो फिर यह भी याद होगा कि इन विवाह पद्धतियों की विशेषता क्या थी ?"


अजय ने बिना समय गँवाए जवाब दिया "ब्राह्म विवाह में दोनों पक्षों की सहमति से विवाह होता था,उचित एवं समान वर्ग के वर का चुनाव कर उससे कन्या का विवाह किया जाता था ,उसे उपहार आदि दिए जाते थे ,यह विवाह पद्धति हमारे यहाँ की अरेंज्ड मैरिज जैसी है जो आज भी चल रही है । दूसरी पद्धति यानि दैव पद्धति में वर वेदमंत्रों का ज्ञाता होता था इसलिए कन्या पक्ष द्वारा उसे उचित धन धान्य देकर कन्या का उससे विवाह किया जाता था । तीसरी पद्धति यानि आर्ष पद्धति में कन्या पक्ष वर से गाय बैल का एक जोड़ा प्राप्त करता था । प्राजापत्य विवाह भी ब्राह्म विवाह जैसा होता था लेकिन इसमें कन्या की सहमति  आवश्यक नहीं थी ,बाक़ी सब लेनदेन वैसे ही होता था । पांचवी पद्धति आसुर पद्धति के विवाह में दैव पद्धति के विपरीत वर पक्ष द्वारा कन्या पक्ष को धन धान्य और संपत्ति दिया जाना अनिवार्य था । इसके बाद गान्धर्व विवाह में केवल वर और कन्या की सहमति ही पर्याप्त थी मतलब आजकल की लव मैरिज । दुष्यंत और शकुंतला का विवाह इसी पद्धति से हुआ था । राक्षस विधि का विवाह सबसे ख़राब था इसमें वर पक्ष द्वारा कन्या पक्ष को आहत करके उनसे मारपीट करके जबरन रोती चीखती कन्या को उठा लिया जाता था और उससे विवाह कर दिया जाता था । और आठवीं पद्धति यानि पैशाच पद्धति का विवाह तो सबसे निकृष्ट कोटि का था । इसमें नींद में मत्त प्रमत्त ,बेहोश अथवा मानसिक रूप से निर्बल कन्या के साथ जबरन सम्भोग किया जाता तत्पश्चात उसके साथ विवाह कर लिया जाता था ।" 


"बिलकुल सही जवाब दिया तैने ।" रवींद्र ने कहा लेकिन एग्जाम में सिर्फ इतना लिखने से काम नहीं चलेगा, इसे विस्तार देना होगा ।" "चलो भाई , बहुत देर हो गई , अब वापस लौटें अपने डेरे में ,नींद आ रही है " अशोक ने वापसी का फरमान जारी किया फिर तो लौटते हुए अजय की शादी के किस्से चलते रहे जो बिस्तर में घुसने के बाद उसकी सुहागरात के किस्सों पर जाकर समाप्त हुए । अब मुश्किल यह है कि वह सब तो मैं यहाँ लिख नहीं सकता ।


*शरद कोकास* 


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