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गुरुवार, 10 सितंबर 2020

मनुष्य जब पहली बार मरा तब क्या हुआ होगा

मनुष्य जब पहली बार मरा तब क्या हुआ होगा 

📕 मित्रों, 'एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी' के पहले भाग ' चम्बल के पानी में चाँद'  में आपने पढ़ा कि 'प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व' अध्ययनशाला विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के छात्र शरद कोकास,रवींद्र भारद्वाज,अशोक त्रिवेदी,अजय जोशी और राममिलन शर्मा उज्जैन के निकट चम्बल नदी के किनारे 'दंगवाड़ा' नामक पुरातात्विक स्थल पर प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता , विश्वप्रसिद्ध भीमबैठका गुफाओं के खोजकर्ता ,पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के निर्देशन में चल रहे उत्खनन शिविर में पहुँचे हैं । सभी छात्र युवा हैं ,उर्जा से भरे हुए हैं और कुछ कर गुजरने की आकांक्षा लिए हुए हैं । शिविर में पहुँचते ही उनका सामना एक ऐसे दृश्य से होता है जिसमें भूख की वज़ह से एक मजदूर स्त्री को चक्कर आ जाते हैं और उस पर  प्रेत बाधा का असर माना जाता है । डॉ.वाकणकर सबके मन से यह अन्द्धविश्वास  दूर करते हैं । इसके बाद छात्र टीले की ओर घूमने निकल जाते हैं और चाँद के सान्निध्य में शाम बिताते हैं । लीजिये अब पढ़िए आगे की दास्तान ।

शरद कोकास

दंगवाड़ा की पुरातात्विक साईट पर चल रहे उत्खनन शिविर में आगमन के पश्चात सर्द मौसम की यह पहली रात हमारी प्रतीक्षा कर रही थी । उसकी काली आँखों में धीरे धीरे हमारा अक्स उभर रहा था ।अभी उसे बहुत सारा वक़्त हमारे साथ बतकहियों में बिताना था । आसमान साफ़ था और हमारे और तारों के बीच सीधे संवाद की पूरी पूरी संभावना थी लेकिन सर्द रात में अधिक देर तक बाहर रहना एक मूर्खतापूर्ण ख़याल था  । रात तो हमें  अपने तम्बू के भीतर ही बितानी थी । शिविर के व्यवस्थापकों ने यहाँ आवास हेतु चार तम्बुओं की व्यवस्था की है इसके अलावा अवशेष और उपकरण रखने हेतु एक तम्बू तथा भोजन तैयार करने हेतु एक तम्बू और है ।

 तम्बू में स्थित इस भोजनशाला के प्रभारी भाटी जी हैं जिनका कार्य सभी शिविरार्थियों को सुबह का नाश्ता,शाम की चाय और दो समय का भोजन करवाना है ।  ज्यों ज्यों अँधेरा बढ़ता जा रहा था हमारी भूख भी अपना आकार बढ़ाती जा रही थी । दोपहर का भोजन हम लोग उज्जैन से लेकर निकले थे जो जीप के उबड़-खाबड़ रास्ते पर चलने की वज़ह से और हमारे बेहतरीन हाजमे की वज़ह से समय से पूर्व ही हज़म हो चुका था । इधर भूख रोज़ पाठशाला आने वाले पढ़ाकू बालक की तरह लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी । हमने भूख के आग्रह पर भाटी जी को नमस्कार किया । उन्होंने ज़मीन पर पड़ी भोजन पट्टिकाओं की ओर इशारा किया । हमने तुरंत ज़मीन पर पट्टिकाएं बिछाई और पालथी मारकर बैठ गए । भाटी जी ने फिर थालियों की ओर इशारा किया । हम समझ गए, शिविर का यही अनुशासन होता है अपनी थालियाँ खुद उठानी होती हैं सो हम फिर उठे और थालियाँ और गिलास लेकर बैठ गए ।


भाटीजी ने उसके बाद भोजन परोसना शुरू किया । इतने में वाकणकर सर भी अपनी थाली और गिलास लेकर पंगत में शामिल हो गए ।भाटी जी ने आलू बैंगन की सुस्वादु सब्ज़ी बनाई थी,साथ में दाल चावल और रोटी । हम लोगों ने रोटी का कौर तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि वाकणकर सर ने इशारा किया .. रुको दुष्टों पहले मन्त्र पढ़ना है । उन्होंने आँखें  बंद कीं ,थाली के सामने हाथ जोड़े और मंत्रोच्चारण शुरू किया ..ओम सहना ववतु.. सहनौ भुनक्तु .. हम लोग अपनी बेचारगी में उनके साथ साथ यह मन्त्र बुदबुदाते रहे और सर की आँख खुलने से पहले ही भोजन पर टूट पड़े । हम लोगों ने कुछ इस तरह भोजन किया जैसे कई बरसों के भूखे हों ।

भोजन के पश्चात हम लोग अपने तम्बू में आ गए । तम्बू के बीचोबीच बांस के सहारे लटकते बिजली के लट्टू पर हमारी नज़र पड़ी । वह लगातार बाहर के अँधेरे से लड़ने की कोशिश कर रहा था । मैंने रवीन्द्र से कहा " यहाँ जंगल में बिजली कहाँ से आ गई ?" रवीन्द्र ने कहा ..' तूने देखा नहीं गाँव के पास गुजरने वाली बिजली की लाइन से यहाँ तक तार खींचकर बिजली लाई गई है ।" " ग़नीमत है " मैंने कहा वर्ना हमें लालटेन युग में जीने का एक मौका मिल जाता । तम्बू में बल्ब होने के बावज़ूद बाहर का अँधेरा भीतर घुसने का भरसक प्रयास कर रहा था .. मैंने इसका कारण ढूँढने के लिए एक नज़र बाहर की ओर डाली और महसूस किया कि बल्ब की रोशनी और जंगल के अँधेरे के बीच सिर्फ कपड़े की दीवारें हैं । उन पर पड़ती हमारी परछाइयाँ भी अँधेरे का ही साथ दे रही थीं । 


भोजन के बाद तुरंत सोने की आदत किसी की नहीं है । वैसे भी हॉस्टल में रहकर हम लोग इतने तो बिगड़ ही चुके हैं  कि जब तक कमरों के दरवाज़े खटखटाकर मित्रों से उनका हालचाल न पूछ लें और थोड़ी मस्ती न कर लें नींद आती ही नहीं है । सो यहाँ भी किसीको नींद नहीं आ रही थी । लेकिन बाहर ठण्ड थी और जिनके हाल जानना था वे सारे मित्र भी एक ही तम्बू में थे सो बिस्तर में घुसने के अलावा कोई चारा नहीं था । हम सब चुपचाप लेट गए और तार्पोलीन की बनी तम्बू की छत की ओर ध्यान लगाकर देखने लगे, शायद देश की शासन व्यवस्था की तरह उसमें भी कोई छेद दिख जाए ताकि हम ठण्ड का दोष उस पर मढ़ सकें । लेकिन ऐसी कोई गुंजाइश हमें दिखाई नहीं दी । 


वैसे यह फरवरी का दूसरा सप्ताह था । लम्बे समय के लिए मायके आई बेटी जिस तरह ससुराल वापस जाने की तैयारी में होती है ठण्ड भी उसी तरह अब विदाई की तैयारी कर रही थी । हालाँकि  हम शहर में रहने वाले लोग इस बात की कल्पना नहीं कर पाए थे कि जंगल में ठण्ड शहर से ज़्यादा होगी । मुझे लगा था जैसे शहर में अब ठण्ड समाप्त हो गई है वैसे ही गाँव में भी हो गई होगी सो मैं अपनी बदमस्ती में रज़ाई लेकर नहीं आया था । रवीन्द्र की ठण्ड से बहुत पुरानी दुश्मनी थी  सो उसका मुक़ाबला करने के लिए  ज़िरह बख्तर की तरह रज़ाई उसके साथ थी  । मैं किसी  घुसपैठिये की तरह रवीन्द्र की रज़ाई में घुसने की कोशिश करने लगा ।  रवीन्द्र अकेला सोने का आदी था और रज़ाई शेयर करने में उसे कोई दिलचस्पी नहीं थी ...

‘ मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी   ‘ की तर्ज़ पर उसने कहा “ मैं अपनी रज़ाई नहीं दूँगा  । “ मैंने उससे निवेदन किया..” भाई मेरे , यहाँ बहुत कड़ाके की ठण्ड होगी ऐसा मुझे पता नहीं था सो मुझसे ग़लती हो गई , मैं तो खैर कम्बल ओढ़कर सो जाऊंगा लेकिन इस अच्छे खासे उत्खनन कैम्प में तुम लोगों का एक दिन मेरे अंतिम संस्कार के लिए बर्बाद हो जायेगा  “ मेरी बात  सुनकर रवीन्द्र जोर से हँसा और उसे मुझ पर दया आ गई, वैसे भी वह मेरा प्यारा दोस्त है । अंततः एक ही रजाई में एक दूसरे की ओर पीठ करके सोने की बात पर समझौता हो गया ।

लेकिन रज़ाई में घुसने के बावज़ूद नींद का कुछ अता-पता नहीं था । वैसे भी नींद  का समय अभी कहाँ हुआ था । सर्दियों में अँधेरा जल्दी हो जाता है लेकिन घड़ी तो अपने हिसाब से चलती है ? अचानक डॉ.वाकणकर की शाम को कही गई एक  बात मुझे याद आ गई और मेरी हँसी फूट पड़ी  । “ लगता है ठण्ड तेरे दिमाग़ में चढ़ गई है जो अकेला अकेला हँस रहा है  ? ” मुझे हँसता देख रवीन्द्र ने पूछा । मैंने रवीन्द्र से कहा  ” कुछ नहीं यार ,सर की वह कंकाल के साथ सोने वाली बात याद आ गई ..कि खोपडियाँ और कंकाल तो बिस्तर में भी मेरे साथ रहते हैं.. अच्छा बताओ, तुम कभी किसी कंकाल के साथ सोये हो ? “रवीन्द्र हँसने लगा..” कंकाल के साथ सोने के लिए दक्षिण अफ्रीका जाना पडेगा माय डिअर, क्योंकि हमारे यहाँ तो कंकाल मिलने से रहा, इसलिए फ़िलहाल तो तेरे साथ सो रहा हूँ । ”


मैंने कहा “ मज़ाक मत उडाओ ..इतना भी दुबला पतला नहीं हूँ यार । वैसे यह बात तुम सही कह रहे हो कि कंकाल तो दक्षिण अफ्रीका में ही मिलेगा , हमारे यहाँ के डरपोक अन्द्धविश्वासी  लोग कंकाल तो क्या खोपडी या कहीं पड़ी हुई हड्डी देखकर ही डर जाते हैं..लेकिन एक बात है ....।” अंतिम संस्कार यह शब्द मेरे अवचेतन में अब भी विद्यमान था और मैं पहले मनुष्य के अंतिम संस्कार के विषय में सोच रहा था । मेरी बात सुनकर रवीन्द्र ने शतुर्मुर्ग की तरह रज़ाई से बाहर गर्दन निकाल कर पूछा .. “क्या ? ”

मैंने कहा “ हमने शव जलाने की प्रथा शुरू कर इतिहास का बडा भारी नुकसान किया है । ” “ वो कैसे ? ” रवीन्द्र ने पूछा । मैंने बताया “ कंकाल ही तो मनुष्य का इतिहास तय करते हैं यार, वे कितने पुराने हैं यह विज्ञान से पता चलता है उसीसे मानव सभ्यता की प्राचीनता तय होती है । गनीमत सभी जगह शव को नष्ट कर देने की यह प्रथा नहीं है , अगर दक्षिण अफ्रीका और योरोप में गाड़ने की बजाय शव जलाने की प्रथा होती  तो हमें लाखों साल पहले के पृथ्वी के पहले पहले मनुष्य के दर्शन ही नहीं होते ।“


           
पत्थर की कब्र 
अशोक अब तक चुपचाप था और सिगरेट का आनन्द ले रहा था । उसने एक लम्बा कश लेकर छत की ओर धुआँ फेंका और धुएँ के केंद्र में अपनी निगाहें स्थिर करते हुए कहा ” मैं सोच रहा हूँ ...पहली बार जब कोई इंसान मरा होगा तो उसे गाड़ा गया होगा या जलाया गया होगा..। ” मैंने कहा “ ना गाडा गया था , ना जलाया गया था । पहली बार जब मनुष्य ने मनुष्य की मृत देह देखी होगी तो उसकी  समझ में आया ही नहीं होगा कि उसके जैसे दिखने वाले इस जीव को आखिर हुआ क्या है । वह बहुत देर तक उसके पास चुपचाप बैठा रहा होगा फिर उसकी आँख खोलकर देखी होगी, उसे हिलाया-डुलाया होगा ,यह सोचकर कि शायद इस तरह यह फिर से चलने लगे या बोलने लगे , फिर उसका मुँह खोलकर देखा होगा ,शायद वह फिर से बोलने लगे । लेकिन इन प्रयासों के बाद भी जब कुछ नहीं हुआ होगा तो उसे उसके हाल पर छोड़कर वह अपनी भूख का इंतज़ाम करने निकल गया होगा । 

"हद है.." अशोक ने कहा " उसके भीतर क्या उस समय तक संवेदना जैसी कोई चीज़ नहीं थी?" मैंने कहा " थी ना.. आखिर था तो वह उसके जैसा ही मनुष्य, जो उसके साथ रहता था, उसके साथ खाता-पीता था ,शिकार पर जाता था ,उसके हर सुख दुःख में उसका साथी था । इसीलिए फिर कुछ समय बाद वह फिर उसके पास लौटा होगा यह सोचकर कि शायद उसके भीतर पूर्ववत कोई हलचल हो रही हो ..लेकिन तब तक तो जंगली जानवर मृत देह को खा चुके थे । हो सकता है उसे देह की यह दुर्दशा देख कर अच्छा नहीं लगा होगा । यहीं पर पहली बार मनुष्य को आत्मा का ख्याल भी आया होगा । उसे लगा होगा कि उसके भीतर कोई चीज़ थी जिसकी वज़ह से वह चलता-फिरता था, हँसता- बोलता था जो अब उसकी देह से निकलकर बाहर चली गई है । यही उसकी अवधारणा भविष्य में उसके धर्म की नींव बनी ।"

"लेकिन फिलहाल तो सवाल उस मृत देह के सम्मान का था ।" मैंने अपनी बात जारी रखी " सो अगली बार जब उसके मित्र या परिजन की मृत्यु हुई उसने मृत देह को जानवरों से बचाने के लिए  उसके चारों ओर, और उसके मृत शरीर के ऊपर बड़े- बड़े पत्थर रख दिये । इस तरह यह मनुष्य की पहली कब्र बनी  और इसी तरह मनुष्य का पहला अंतिम संस्कार हुआ । ज़मीन में गाड़ना , शव को बहाना या जलाना जैसे काम तो जल और लकड़ी  की उपलब्धता और भौगोलिक आधार पर बाद में शुरू हुए ।” “वाह वाह ..'पहला अंतिम संस्कार' .. तेरे 'पहला' और 'अंतिम' का जवाब नहीं भाई । ” रवीन्द्र ने उबासी लेकर कहा ” लेकिन अब सो जाओ भाई .. नहीं तो सपने में कंकाल ही कंकाल दिखेंगे । “ठीक है । ”  मैंने कहा  “ चलो सोने की कोशिश करते हैं । ”

शुक्रवार, 19 जून 2020

रूमानियत का किला उसके इस डायनामाईट से ध्वस्त हो चुका था


इस जंगल में हमारे लिए  यह पहला मुफ़्त का मनोरंजन कार्यक्रम था । बरगद के ढेर सारे पेड़ों के बीच में लगा था हमारा शिविर । पास ही चम्बल नदी बहती थी । हम लोगों ने अपना सामान तम्बू में रखा और नदी पर चल दिये हाथ मुँह धोने । हमने अब तक चम्बल के बीहड़ और उनमे रहने वाले डाकुओं के बारे में ही सुना था लेकिन यहाँ न बीहड़ थे न डाकू  । फिर भी हम हाथ मुंह धोते हुए अगल बगल देखते रहे ..कहीं किसी डाकू का घोड़ा न बंधा हो । लौटकर आए  तो रसोई प्रभारी भाटी जी ने गरमा गरम चाय पिलाई । चाय पीकर हम लोग टीले पर पहुँच गए  । यद्यपि हम लोगों का काम अगले दिन से प्रारम्भ होना था लेकिन उत्खनन स्थल देखने की उत्सुकता तो थी ही ।

अद्भुत दिखाई दे रहा था वह टीला..चांद के प्रकाश में । बीच में कहीं कहीं टेकडियों की छाँव जैसे पहली क्लास के किसी बच्चे ने अपनी ड्राइंग कॉपी में चित्र बनाये हों । शांत वेग से बह रही थी चम्बल जैसे कोई माँ अपने बच्चे को सुलाने के बाद आधी नींद में सो रही हो । हवा चलती तो चांद का अक्स पानी में लहराता हुआ नज़र आता । वातावरण इतना खामोश कि हम बहते हुए पानी की आवाज़ साफ साफ सुन सकते थे ।

डॉ.वाकणकर ने दो दिन पूर्व जिस आयताकार ट्रेंच की खुदाई शुरू की थी वह अभी नींद के आगोश में थी , उसे जगाना हमने उचित नहीं समझा और दूर खड़े चुपचाप उसे देखते रहे । उसके भीतर गहन अन्धकार था , सदियों से भीतर अवस्थित  अन्धकार । मैं उसे देखता रहा ..कविता कहीं भीतर से बाहर आने को आतुर थी ..मैंने कहा ..” ऐसा लगता है जैसे इस अतल गहराई में कोई रंगमंच है, जिस पर सैकडों सालों से कोई ड्रामा चल रहा है । जाने कितनी सभ्यताओं के पात्र आवागमन कर रहे हैं । कहीं युद्ध चल रहा है तो कहीं कोई चरवाहा किसी पेड़ के नीचे बैठकर बंसी बजा रहा है । कहीं कोई बच्चा पेड़ से लटके झूले पर बैठा झूला झूल रहा है ,कहीं कोई हरकारा दूर से अपने घोड़े पर बैठा आता हुआ दिखाई दे रहा है । “ “ सुनो सुनो  ...” अजय ने अचानक कहा “ मुझे तो घोडों की टापों की आवाज़ भी आ रही है...” “ बस कर यार ।” रवीन्द्र बोला ” जुकाम के कारण तेरे कान बन्द हैं , यह बलगम की आवाज़ होगी ।“ हम लोग रूमानियत से वास्तविकता के धरातल पर आ चुके थे ।

कल दिन में निखात के उस अंधेरे से साक्षात्कार करेंगे  यह सोच कर हम लोग टीले की ढलान पर बैठ गए  । मैंने कमर सीधी करनी चाही । 
पूरा आसमान मेरी आँखों के सामने था और उसमें चमक रहा था पूर्णिमा का पूरा चांद । चाँद की रौशनी की वज़ह से सितारे थोड़े मद्धम हो गए थे । मैंने उनमें  ध्रुव तारा ढूँढना चाहा ताकि मैं उत्तर दिशा का पता लगा सकूँ । चाँद को देखते हुए मुझे अचानक ऋतुओं का ख़याल आया और फिर ऋतुओं और चाँद सूरज के सम्बन्ध के बारे में । 

रवीन्द्र ने डॉ.वाकणकर के सान्निध्य में अपने खगोलीय ज्ञान का काफी विस्तार कर लिया था । मैंने रवीन्द्र से सवाल किया " यार यह बसंत का अयनांत तो नहीं है ? " रवींद्र ने जवाब दिया " भाई अभी अयनांत कहाँ, पिछला अयनांत 21 दिसंबर को हो चुका है और अगला इक्कीस जून को आएगा ।  मैंने फिर रवींद्र से सवाल किया ..यार लेकिन यह अयनांत और विषुव निर्धारित तिथि पर कैसे आते हैं ?"

रवींद्र ने कहा " चलो मैं तुम्हें एक सिरे से समझाता हूँ कि अयनांत यानी सोलिस्टीस और विषुव यानी इक्विनॉक्स क्या होता है । सबसे पहले विषुव यानि इक्विनॉक्स के बारे में बताता हूँ जब रात और दिन बराबर होते हैं । 
यह हमारे देश में 21 मार्च और 23 सितम्बर को होता है जब रात और दिन बराबर होते हैं । पहले कुछ बेसिक बातें समझ लो । 
तुमने ग्लोब में यह देखा होगा कि पृथ्वी अपनी धुरी पर साढ़े तेईस डिग्री झुकी हुई है और वह स्वयं इसी तरह घूमते हुए सूर्य के चक्कर भी लगाती है । उसका यह पथ गोलाकार अथवा लम्बवत नहीं होता बल्कि दीर्घ वृत्ताकार यानि इलेप्टिकल होता है । पृथ्वी के ठीक मध्य से अर्थात उसके पेट से एक काल्पनिक रेखा जाती है जिसे भूमध्य रेखा कहते हैं । 
पृथ्वी का उपरी हिस्सा जो नासपाती जैसा चपटा है उत्तर ध्रुव तथा दक्षिणी हिस्सा दक्षिण ध्रुव कहलाता है । इस तरह दो गोलार्ध बनते हैं उत्तरी व दक्षिणी ।

अब होता यह है कि सूर्य के चारों ओर घूमते  हुए पृथ्वी की  साल में एक बार ऐसी स्थिति आती है जब वह सूर्य की ओर अधिक झुकी होती है और एक बार ऐसी स्थिति आती है जब वह सूर्य के विपरीत झुकी रहती है । 

पहली स्थिति में दिन बड़ा होता है और दूसरी स्थिति में रात । लेकिन दो बार ऐसी स्थिति आती है जब पृथ्वी का झुकाव न सूर्य की ओर होता है न उसके विपरीत बल्कि वह मध्य में होती है । इन दोनों  स्थितियों में रात और दिन बराबर होते हैं और इन्हें विषुव अथवा इक्विनॉक्स  कहते हैं । अगर इक्विनोक्स के समय हम भूमध्य रेखा पर खड़े हों तो सूर्य ठीक हमारे सर के ऊपर होता है । वैसे दिन और रात बराबर होने कि स्थिति सैद्धांतिक है वास्तव में ऐसा होता नहीं है, फिर अलग अलग देशों में तिथियों में भी फर्क होता है ।

मैंने कहा " इसका अर्थ यह हुआ कि  पृथ्वी का एक गोलार्ध छह माह तक सूर्य की  ओर झुका रहता है और दूसरा गोलार्ध अगले छह माह तक । इसी वज़ह से उत्तर व दक्षिण ध्रुव पर छह माह का दिन और छह माह की रात होते हैं । और जब उत्तरी गोलार्ध में गर्मी होती है तो दक्षिणी गोलार्ध में ठण्ड पड़ती है उत्तरी ध्रुव पर रहने वाले लोगों के लिए इक्विनॉक्स  के अगले छह माह दिन वाले होते हैं जबकि दक्षिण ध्रुव पर रहने वालों के लिए अगले छह माह रात के । मतलब इस विशेष दिन दोनों ध्रुव के लोगों को सूर्य का प्रकाश एक जैसा देखने को मिलता है ।

" बिलकुल ठीक " रवींद्र ने कहा " अब अयनांत या सोलिस्टीस  के बारे में बताता हूँ यह भी साल में दो बार आता है 21 जून को जब दिन सबसे बड़ा होता है और 21 दिसंबर को जब दिन सबसे छोटा होता है । ग्रेगोरियन वर्ष आरम्भ होने के समय अर्थात जनवरी में सूरज दक्षिणी गोलार्ध में होता है फिर वह उत्तरी गोलार्ध में जाना शुरू करता है मकर संक्रांत से । 

लेकिन दिसंबर आते आते फिर दक्षिणी गोलार्ध में पहुँच जाता है । इस तरह आते जाते सूर्य वर्ष में दो बार भूमध्य रेखा पर होता है । असल में सूर्य कहीं नहीं जाता वस्तुतः यह भी पृथ्वी के घूमने के कारण ही होता है । अयनांत को कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि जून में यदि उत्तर ध्रुव से देखा जाए तो सूर्य  सर्वोच्च ऊंचाई पर होता है इसे ग्रीष्म अयनांत  कहते है उसी तरह दिसंबर में यह सूर्य  दक्षिण ध्रुव से देखा जाए तो यह वहाँ से सर्वोच्च ऊंचाई पर होता है ऐसा दिसम्बर में होता है इसलिए उसे शीत अयनांत कहते हैं । जो एक ध्रुव के लिए ग्रीष्म अयनांत होता है वह दुसरे ध्रुव के लिए शीत अयनांत होता है

" मतलब यह कि अभी फरवरी का महिना है और दिन बड़े होते जा रहे हैं " मैंने निष्कर्ष दिया । इस वक़्त चाँद हमारे सामने था और हमारी यह गुस्ताख़ी थी कि हम चाँद की बात न करके सूरज की बात कर रहे थे । चाँद हमसे नाराज़ न हो जाए इसलिए मैंने अपने भीतर के वैज्ञानिक ,खगोलज्ञ और पुरातत्ववेत्ता से कहा .." तुम अभी चुप रहो " और कवि से कहा .. " कोई कविता सुनाओ " मैंने गुनगुनाना शुरू किया ..और बेसाख्ता मेरे मुँह से एक गीत फूट पड़ा..”ये पीला बासंतिया चांद…संघर्षों का ये दिया चांद… .चंदा ने कभी रातें पी थीं… रातों ने कभी पी लिया चांद । “ कभी क्षेत्रीय शिक्षा महाविद्यालय भोपाल में अध्ययन के दौरान कवि रमेश यादव से यह गीत सुना था।


“ बस कर यार । ” इतनी ठण्ड में तुझे बासंतिया चांद कहाँ से दिखाई दे रहा है ? रवीन्द्र भारद्वाज ने मेरे भीतर के कवि और गायक से पुरातत्ववेत्ता की तरह सवाल किया । 

मेरा रूमानियत का किला उसके इस डायनामाईट से ध्वस्त हो चुका था ..मैं भौंचक होकर उसकी ओर देखता रहा कि अचानक मुझे चुप कर वह खुद शुरू हो गया ‘शरद रैन मदमात विकल भई , पिउ के टेरत भामिनी कैसी, कैसी निकसी चांदनी कैसी..चांदनी चांदनी चांदनी....। उसके बाद हम लोग बसंत और शीत ऋतु के कालखंड और अयनांत पर बहस करते हुए अपने तम्बू में वापस आ गये । 

🔲 शरद कोकास 🔲

बुधवार, 10 जून 2020

सर्दियाँ उस साल कुछ देर तक ठहर गई थीं


आज से पैंतीस साल पहले पांच हज़ार साल पुरानी उस ताम्राश्म युगीन सभ्यता में जाने का अवसर एक बार मुझे भी प्राप्त हुआ था । उन दिनों मैं विक्रम विश्वविद्यालय में ‘प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व’ में स्नातकोत्तर का छात्र था । इस संकाय के अंतर्गत हम लोग मुद्राशास्त्र, कला एवं स्थापत्य, प्रतिमाविज्ञान, अभिलेख शास्त्र आदि विषयों का अध्ययन कर रहे थे । इसके अतिरिक्त विभिन्न विषयों पर शोध, म्यूजियम्स का अध्ययन और शैक्षणिक यात्राएं भी हमारे पाठ्यक्रम के अंतर्गत थीं । अन्य सैद्धांतिक विषयों की भांति ‘पुरातत्व’ विषय केवल सैद्धांतिक नहीं था अपितु उसमें  प्रायोगिक परीक्षा भी होती थी और उसके लिए किसी उत्खनन में शामिल होना अनिवार्य था ।

उन दिनों विक्रम विश्वविद्यालय के तत्वावधान में उज्जैन के निकट ‘दंगवाड़ा’ नामक स्थान पर हमारे पुरातत्व विषय के गुरु डॉ. वि. श्री. वाकणकर के मार्गदर्शन में एक उत्खनन शिविर लगा हुआ था । ‘दंगवाड़ा’  की इस साईट की खोज सन 1966 -67 में डॉ. वाकणकर ने उज्जैन के श्री विष्णु नाइक की सहायता से की थी तत्पश्चात पासलोद के श्री मांगीलाल पंड्या की सहायता से यहाँ पर्याप्त मुद्राएँ खोजी गईं । उसके पश्चात आठ दस बार यहाँ सर्वेक्षण किया गया और वर्ष 1978 में मध्यप्रदेश शासन के पुरातत्व विभाग द्वारा ताम्राश्म युगीन अवशेषों की व्यापक खोज के उद्देश्य से यहाँ उत्खनन प्रारंभ किया गया ।  वहीं एक माह रहकर एक पुरातत्ववेत्ता की तरह हमें अपना प्रायोगिक कार्य संपन्न करना था । यह कालखंड मेरे जीवन का अविस्मरणीय कालखंड रहा और इस दौरान मैं पुरातत्व के व्यावहारिक ज्ञान से समृद्ध हुआ  ।  उन दिनों कुछ दिनों के लिए ही सही हम लोग छात्र से पुरातत्ववेत्ता बन गए थे ।

इस डायरी में उन्हीं  दिनों की घटनाएँ दर्ज हैं, इसमें पुरातत्व की तकनीकी बातें है,इतिहास के अनछुए पन्नों का अध्ययन है, छात्र जीवन की शरारतें  हैं, यात्राओं के विवरण हैं, ज्ञान और विज्ञान की बातें हैं, साहित्य पर बहस है, मजदूरों के दुःख और शोषण की कहानियां हैं । उम्मीद है कि बतकही के अंदाज़ में लिखी यह डायरी आपको अवश्य पसंद आयेगी ।

फरवरी माह की बस शुरुआत ही हुई थी । सर्दियाँ उस साल कुछ देर तक ठहर गई थीं इसलिए बसंती हवाओं के लिए उन्होंने अपने दरवाज़े पर सख्त़ मुमानियत की तख्ती लगा दी थी । फिर भी सूर्य अपनी समय सारिणी के अनुसार ही चल रहा था । हमारे दंगवाड़ा पहुँचते पहुँचते दरख्तों के लम्बे सायों के पीछे से अँधेरा झांकने लगा था । दंगवाड़ा ग्राम की मुख्य सड़क पर एक चाय की टपरी वाले से पूछने पर पता चला कि वह टीला जिस पर विक्रम विश्वविद्यालय के तत्वावधान में खुदाई हो रही है , गाँव से दो किलोमीटर भीतर जंगल में है । हम लोग जिस वाहन में थे, वह युनिवर्सिटी की एक पुरानी जीप थी । हमने ड्राईवर से जानना चाहा कि गाडी वहाँ तक जाएगी या नहीं या फिर हमें अपना बिस्तरबन्द लादकर वहाँ तक पैदल ही जाना होगा ।

ड्राइवर खुशीलाल हंसने लगा “ भैया, मैं चार बार वहाँ तक जा चुका हूँ ,जंगल में भी मैंने अपनी गाडी जाने लायक रास्ता बना ही लिया है । आपको किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं है । “ चलो फिर ठीक है । ” रवीन्द्र भारद्वाज ने उछलकर कहा । हम लोगों ने चैन की साँस ली । उस दिन पूर्णिमा थी और फरवरी की उस धुंधलाती हुई शाम के विदा लेने की प्रतीक्षा करता हुआ बड़ा सा चांद बस निकलने ही वाला था । डूबते सूरज की मद्धम रोशनी में भी जंगल साफ दिखाई दे रहा था । खुशीलाल ने अपना बनाया रास्ता पहचानकर कैम्प तक गाडी पहुँचा दी ।

अद्भुत द्रश्य था वहां । जाने कितने बरगद अपना आंचल फैलाये खड़े थे और उनके नीचे सफ़ेद तम्बुओं की एक कतार थी । तम्बुओं के करीब कुछ भीड़ सी दिखाई दी । गाड़ी से उतरकर देखा तो एक मज़दूर औरत ज़मीन पर लेटी हुई है और लोग उसे घेरे खड़े हैं । पता चला कि शाम को वह काम खत्म होने के पश्चात अचानक बेहोश होकर गिर पड़ी थी और उसके साथी गाँव से किसी झाड़-फूँक वाले को लेकर आ गए थे। डॉ.वाकणकर भी वहीं खड़े-खड़े उनसे बातें  कर रहे थे । हम सभी छात्रों ने उन्हें प्रणाम किया । उन्होंने नमस्ते का जवाब देते हुए अपनी बात ज़ारी रखी..” कईं भूत- वूत नई लग्यो है..ईको उपवास थो, न ऊपर से इनने लंगन कर ल्यो, अणि लिए  अणे चक्कर अईया, अबार होश में अई जांगा..” “ नई बा साब ” ओझा अपनी इज़्ज़त बचाना चाहता था “ अणि टीला में..जणि टीला की खुदाई कर रेया हो,उणमें लोगाँ की आत्मा रेवे हे, अब खुदई से वे बाहर अईगी हे, ओर उणी में से कोई आत्मा लागी गी हे..आज तो पूर्णिमा हे ..टांका का दिन..”

डॉ.वाकणकर हँसने लगे “ यदि ऐसा होता तो सबसे पहले आत्मा को मुझे पकडना चाहिये था , मैं तो ऐसे कई टीलों की , कब्रस्तानों की खुदाई करवा चुका हूँ , और खोपडियाँ और कंकाल तो बिस्तर में भी मेरे साथ रहते हैं,कोई आत्मा - वात्मा नहीं होती  , सब फालतू बात है ...” वे कह ही रहे थे कि सबने देखा वह स्त्री होश में आ रही है । उन्होंने  कहा “ देखो , यह होश में आ गई है , इसे घर ले जाओ ठीक से खाना - वाना खिलाओ.. सब ठीक हो जाएगा । और आइन्दा से फालतू उपवास करने की कोई ज़रूरत नहीं । “ इसके बाद वे हम लोगों से मुखातिब हुए… “ चलो रे सज्जनों, तुम लोगों को तुम्हारे तम्बू दिखा दें ।”  मैं रवीन्द्र, अजय,अशोक और राममिलन  अपना अपना डेरा-डंडा उठाकर उनके साथ तम्बुओं की ओर चल दिये ।


शरद कोकास 

एक सभ्यता के पश्चात दूसरी सभ्यता का आगमन होता है

एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी

शरद कोकास
भूमिका

उत्खनन स्थल का एक दृश्य
उत्खनन स्थल का एक दृश्य 
  मनुष्य का यह सहज स्वभाव है कि वह वर्तमान में   जीते हुए भी कभी कभी अतीत में अथवा भविष्य में  जीने की कल्पना करता है ।  कभी न कभी यह ख़याल   हर एक के मन में आता है कि वह कुछ बरस पहले के  समय में चला जाए ताकि वह एक नए सिरे से वहाँ से  अपना जीवन प्रारम्भ कर सके , जो उस समय अप्राप्य  था उसे   प्राप्त कर सके, अपनी गलतियाँ सुधार सके ,  दुखों को दूर कर सके   और उन सुखों को भोग सके जिन्हें वह भोग नहीं पाया था । ।   ऐसा केवल कल्पना में संभव है । आज तक कोई ऐसी टाइम मशीन  नहीं बनी है कि मनुष्य उसमे बैठ जाए और सुदूर अतीत में पहुँच जाए । विज्ञान के बढ़ते चरणों के बावज़ूद यह संभव नहीं है, इसलिए कि जो बीत चुका है वह ठीक उसी तरह दोबारा कभी घटित नहीं होता । समय की अपनी एक गति होती है और बीते हुए समय में शामिल होना किसी के लिए संभव नहीं है । जब हमें अपने व्यतीत किये गए जीवन में शामिल होना संभव नहीं है तो उस समय में शामिल होना तो बिलकुल ही असम्भव है जो समय हमने नहीं देखा है । हम केवल उपलब्ध विवरणों के आधार पर उस दृश्य का पुनर्निर्माण कर सकते हैं । पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकार इसमें हमारी सहायता करते हैं  । मनुष्य भौतिक रूप से भले ही उन दिनों में नहीं पहुँच सकता लेकिन उस कालखंड के ध्वस्त अवशेषों से उस सभ्यता का एक चित्र निर्माण कर सकता है  ज़मीन की परतों में दबी उस सभ्यता की साँसें  सुन सकता है ।

मनुष्य जाति के विकास की यह यात्रा उसके उद्भव से प्रारंभ हुई जो आज तक लगातार जारी है । इस बीच उसने बहुत कठिन समय देखा है । अपनी जैविक इच्छाओं को लेकर पैदा हुआ मनुष्य भूख के इशारे पर नित नई खोज करता रहा ।  आज के सुविधा संपन्न मनुष्य का जीवन देखते हुए मुझे अक्सर उस मनुष्य का ख़याल आता है जिसका जीवन प्रकृति की कृपा पर अवलंबित था जो कभी भी किसी जंगली जानवर का भोजन बन जाता था या किसी प्राकृतिक आपदा का शिकार हो जाता था । लेकिन इन तमाम कठिनाइयों के बावज़ूद उस मनुष्य ने हार नहीं मानी और प्रकृति से द्वंद्व करते हुए, हिमयुगों में समाप्त हो जाने के खतरों से बचते हुए अपनी विकास यात्रा जारी रखी इसलिए कि उसके पेट के साथ उसके आश्रितों का पेट जुड़ा था । यह वह दौर था जब व्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज नामक संस्था का निर्माण जारी था । यह पांच हज़ार साल पुरानी बात है जब मनुष्य के पास औज़ार बनाने के लिए उपयुक्त  पत्थरों का भण्डार समाप्त होने की कगार पर था उसने  ताम्बे की खोज कर ली थी और अब वह पत्थरों के युग से ताम्बे के युग में प्रवेश कर रहा था । लेकिन उसके सामने अब नई चुनौतियाँ थीं । वह यायावरी की ज़िंदगी से तंग आकर एक स्थायी जीवन बिताना चाहता था । प्रकृति ने उसे ऐसे अवसर प्रदान किये और उसकी बिखरी हुई ज़िन्दगी धीरे धीरे बसने लगी । पुरापाषाण युग से निकल कर आने वाले मनुष्य के जीवन के इस कालखंड को ताम्राश्म युगीन सभ्यता का नाम दिया गया ।


जीवन अपने संप्रत्यय में स्थायी होते हुए भी व्यक्तिगत रूप में स्थायी नहीं होता । जैसे मनुष्य की मृत्यु होती है वैसे ही सभ्यताओं का भी विनाश होता है । एक सभ्यता के पश्चात दूसरी सभ्यता का आगमन होता है । एक बस्ती मिट जाती है और उसके अवशेषों पर दूसरी बस्ती का निर्माण होता है । समय की चादर उन अवशेषों को मिटटी में गहरे दफ्न कर देती है । अगर हम उस सभ्यता तक जाना भी चाहें तो एकाएक उस तक नहीं पहुँच सकते । पहले हमारा सामना बाद की सभ्यताओं से होता है और उसके पश्चात हम उस प्राचीन सभ्यता तक पहुँच सकते हैं । एक पुरातत्ववेत्ता कालक्रमानुसार अतीत की खोज करते हुए यही काम करता है । वह परत दर परत ज़मीन के भीतर पहुँचते हुए अंततः उस सभ्यता तक पहुँच जाता है जिसके पास इस मनुष्य जाति के प्रारंभिक स्वप्न थे ।

शरद कोकास 


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बुधवार, 3 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी - दूसरा दिन - पांच

6- बैंक ने दिया बेबी को लोन कुदाल की हुंकार थम चुकी थी , घमेलों का झनझनाना भी रुक गया था ,मिटटी छानने वाली छन्नी भी अपनी खिसियानी हँसी बंद कर चुकी थी । मजदूर एक पांत बनाकर चम्बल की और रवाना हो गए थे जिसे पारकर उन्हें अपने गाँव जाना था । शाम होने लगी थी और अँधेरा अपने दूतों को इस दुनिया में भेजकर अपने आगमन के लिए उचित वातावरण की तलाश में था । इधर सूरज भी लौट जाने की बहुत जल्दी मचा रहा था । ऐसा लग रहा था जैसे उसे एक साईट पर अपना काम ख़त्म कर दूसरी साईट पर जाना हो । वैसे होता भी यही है, हमारे यहाँ सूरज डूब जाता है लेकिन कहीं न कहीं तो वह आसमान में अपने आसन पर विराजमान होता ही है । सूरज जब अपने औज़ार समेटकर चला गया अँधेरा अपनी ड्यूटी पर हाज़िर हो गया । हमेशा की तरह पंछी अपने घरौंदों में लौटने लगे और जंगल के बीच स्थित दंगवाड़ा की इस पुरातात्विक साईट पर धीरे धीरे ख़ामोशी अपना बिस्तर बिछाकर नींद की राह तकने लगी । हम लोगों ने भी साईट से अपने औज़ार उठाये और कैम्प में लौट आये । हाथ-पाँव और चेहरे पर धूल की परत जमी हुई थी और उसे विदा करना ज़रूरी था सो तम्बू से तौलिया और साबुन लिया और चल दिए चम्बल के घाट पर । ठन्डे पानी से हाथ मुंह धोने के बाद हमने एक दूसरे के चेहरे को देखकर धूल साफ़ हो जाने की पुष्टि की और कैम्प में वापस आ गये । हम लोग जंगल में खुले आसमान के नीचे थे सो हमें कुछ ठण्ड सी महसूस हो रही थी । दिनभर मेहनत की थी इसलिए पेट भी खाली हो गया था । हम लोग भाटीजी की भोजनशाला में चूल्हे के पास आग तापते हुए बैठ गए और बातों के साथ साथ खुशबुओं से पेट भरने की कोशिश करने लगे । भाटी जी ने हम लोगों की हालत देखकर शीघ्र ही भोजन तैयार कर दिया, गोभी की रसेदार सब्ज़ी, दाल और रोटी । गरमागरम भोजन से पेट भरने के बाद जब सारा लहू भोजन को हज़म करने के लिए आमाशय की ओर दौड़ गया था तब ठण्ड और ज़्यादा तेज़ लगने लगी । हमें तम्बू में बिछे बिस्तर की याद आई जहाँ नर्म - गर्म रज़ाइयाँ हमारा इंतज़ार कर रही थीं । तम्बू के बाहर ठंडी हवाएँ थीं और भीतर हम हल्की हल्की सी कँपकँपाहट के बीच अपने आपको वर्तमान में सुरक्षित महसूस करते हुए अतीत की गलियों में भटकने की तैयारी में थे । आज की रात हम लोगों को मेसोपोटेमिया या प्राचीन सुमेरिया की सैर के लिए जाना था । हम लोग रज़ाई ओढकर बैठ गए । प्राचीन विश्व का एक नक्शा जिसे मैं उज्जैन से आते हुए अपने साथ लेता आया था मैंने अपने सामने फैला लिया । नक्शे के साथ इतिहास पढ़ना मुझे हमेशा से अच्छा लगता है ऐसा लगता है जैसे हम साथ साथ उस जगह की सैर कर रहे हों । इस तरह यह मेरे अभ्यास में शामिल है । नक़्शे में एक स्थान पर उँगली रखते हुए रवीन्द्र से मैंने कहा “यह पश्चिम एशिया का क्षेत्र है । पृथ्वी के जिन भूभागों में प्राचीन सभ्यता का अविर्भाव सबसे पहले हुआ उनमें पश्चिम एशिया भी है । इसके पूर्व में ईरान का पठार है और पश्चिम में भूमध्य सागर और काला सागर । यह सम्पूर्ण क्षेत्र रेगिस्तान और शुष्क मैदानी क्षेत्र है लेकिन बीच बीच में कई उपजाऊ क्षेत्र भी हैं, नदियाँ हैं, हरियाली है और घाटियाँ भी हैं । वर्तमान में जहाँ इराक और कुवैत है यही क्षेत्र प्राचीन समय में मेसोपोटेमिया कहलाता था । यहीं दज़ला और फरात नदियाँ बहती हैं, दज़ला का वर्तमान नाम टिग्रीस है और फरात का नाम यूफ्रेटिस है । इन नदियों का उद्गम काकेशिया के दक्षिण में स्थित पहाड़ों से हुआ है और अंत फारस की खाड़ी में होता है । इनके मध्य व निचले भागों में स्थित प्रदेश को प्राचीन निवासियों ने “ मेसोपोटेमिया “ अर्थात नदियों के बीच का प्रदेश या दोआब कहा । "आज लेकिन इराक और कुवैत तो तेल के लिए जाना जाता है ?" अशोक का प्रश्न जायज था । " हाँ "मैंने कहा । "लेकिन उस समय न तो तेल की खोज हुई थी न तेल से चलने वाले इंजन की । उस समय तो यह क्षेत्र अपनी हरियाली के लिए मशहूर था जो इन नदियों में बाढ़ की वज़ह से होती थी । यहाँ वसंत के मौसम में पहाड़ों पर बर्फ पिघलने की वज़ह से बाढ़ आती थी उसके बाद सब और हरियाली छा जाती थी । लेकिन यहाँ का तापमान फिर पचास डिग्री के आसपास हो जाता था इसलिए वह सूख भी जाती थी । यहाँ कोई भी खनिज नहीं पाया जाता था लेकिन अपनी मिटटी की वज़ह से यह प्रदेश काफी उपजाऊ था । "यहीं पर कहीं बेबीलोन शहर भी था ना जिसके हैंगिंग गार्डन बहुत प्रसिद्ध थे ?"रवींद्र ने सवाल किया । " हाँ " मैंने कहा "यहीं फरात नदी के किनारे जहाँ दज़ला फ़रात के बहुत क़रीब आ जाती है बेबीलोन नामक एक प्रसिद्ध शहर था जिसे बाबुल भी कहते हैं । बेबीलोन काफी समृद्ध शहर रहा है । नदियों के मार्ग से यहाँ बजरों और नावों पर व्यापारियों द्वारा अनेक तरह का माल लाया जाता था । यहाँ की भूमि बहुत उपजाऊ थी सो यहाँ खजूर गेहूँ,जौ आदि का काफी उत्पादन होता था जिनका अन्य सामानों से विनिमय किया जाता था । यहाँ की चिकनी मिटटी से घड़े, संदूक और ईटें भी बनाई जाती थीं । मेसोपोटामिया के सड़क मार्ग भी बेबीलोन से होकर गुजरते थे । यहाँ उन्नीसवीं शताब्दी में उत्खनन हुआ जिससे अनेक प्राचीन सभ्यताओं का पता चला ।" भैया राममिलन काफी देर से चुप बैठे थे और नक़्शे पर नज़र गड़ाए भूगोल पर मेरा व्याख्यान सुन रहे थे । अचानक मैंने उनकी ओर देखा तो वे बोल उठे “ का हो, ई बेबीलोन नाम कहाँ से आया ? इहाँ बैंक ने कौनो बेबी- वेबी को लोन दिया था का ? मैंने हथेली से अपना माथा पीटते हुए कहा “ भैया इस बेबीलोन का अंग्रेजी के बेबी और लोन से कोई सम्बन्ध नहीं है । “ भैया राममिलनवा पर लेकिन कोई असर नहीं पड़ा वे अपनी रौ में बोले..” भैया ऐसा है कि ई बड़े लोग बहुत चालाक होवत हैं, ई लोग बेबी क्या अपन कुत्ता बिल्ली के नाम से भी लोन ले लेवत हैं और फिर सब कुछ हजम कर के भागी जात हैं ।“ राममिलन भैया ने बात तो बिलकुल सही कही थी लेकिन चर्चा बेबीलोन पर चल रही थी इसलिए मैंने उन्हें उंगली से चुप रहने का इशारा किया और आगे बात बढाई ”भाईसाहब, बेबीलोन शब्द बेविल या बेविलिम से बना है जिसका अर्थ होता है देवताओं का द्वार, वैसे यह ग्रीक शब्द है । बेबीलोन शहर की स्थापना सरगोन के राजा द्वारा तेईस सौ चौंतीस ईसापूर्व में की गई थी । उस समय प्राप्त मिटटी की एक मुद्रा से इसका पता चलता है लेकिन इसका वास्तविक इतिहास राजा हम्मुराबी के काल से प्रारंभ होता है जिसका काल सत्रह सौ ब्यानबे से सत्रह सौ पचास ईसा पूर्व माना जाता है । हम्मुराबी काफी बलशाली राजा था और उसने एक उत्कृष्ट सेना का निर्माण किया था अपनी ताकत के बल पर उसने पूरे मेसोपोटामिया पर कब्ज़ा कर लिया था । लेकिन इतिहास में हम्मुराबी अपनी कानून संहिता के लिए प्रसिद्ध है । उसने शहर के बीचोबीच एक काले पत्थर पर अपनी प्रजा के लिए कुछ क़ानून खुदवाए थे जिनका पालन करना पूरी प्रजा के लिए अनिवार्य था । "क्या लिखा था भाई उसमें ? " अजय नाक तक रज़ाई ओढ़े रज़ाई के भीतर घुसा हुआ था उसने तत्काल अपनी गर्दन बाहर निकाली और पूछा । " अरे इस विधि-संहिता में बहुत भयंकर बातें लिखी थीं जैसे कि किस अपराध के लिए क्या दण्ड दिया जाना चाहिए ।" मैंने कहा । " रुको रुको मैं बताता हूँ " रवीन्द्र अचानक उठकर खड़ा हो गया अपने कानों पर लपेटा हुआ मफ़लर खोलकर उसे पगड़ी की तरह सर पर बांधा और नाटकीय अंदाज़ में कहने लगा " सुनो, सुनो, सुनो.. समस्त प्रजाजन ध्यान से सुनो..मैं हम्मुराबी देवताओं द्वारा नियुक्त शासक, सभी राजाओं में प्रथम और फरात के तटवर्ती सभी ग्रामों, नगरों का विजेता हूँ । मैंने समस्त देश को सत्य और न्याय की शिक्षा दी है और लोगों को समृद्धि प्रदान की है । "इसमें भयंकर जैसी क्या बात क्या है ?" अजय ने ऊबकर कहा और वापस रजाई के भीतर गर्दन छुपा ली । "तू ना यार एक्टिंग भी नहीं करने देता है ।" रवीन्द्र ने किंचित नाराज़ होते हुए कहा । " सुनो तो उस विधि संहिता में आगे क्या लिखा था मैं बताता हूँ । उसमें लिखा था, आज से मेरे राज्य में जो मंदिर अथवा राजा की संपत्ति चुराएगा उसे प्राणदंड मिलेगा, जो दास अथवा दासी चुराएगा उसे भी प्राणदंड मिलेगा ,जो भागे हुए दास को शरण देगा उसे भी प्राणदंड मिलेगा । " मतलब हर बात के लिए प्राणदंड ? " अजय ने पूछा । " नहीं ,कुछ हल्की सजायें भी है भाई ।" रवींद्र कहने लगा " जैसे, जो शरीर पर गोदा हुआ दास का निशान मिटाएगा उसकी उँगलियाँ काट दी जाएँगी, जो पराये दास की हत्या करेगा उसे बदले में दास देना पड़ेगा, बैल के बदले में बैल देना पड़ेगा, जो अपने से उच्च वर्ग के सभ्रांत पुरोहित आदि को थप्पड़ मारेगा उसे बैल के चमड़े से साठ कोड़े लगाये जायेंगे, कर्जदार की पत्नी, पुत्र या पुत्री को तीन वर्ष तक दास बनकर रहना होगा । मैं हम्मुराबी ,न्यायप्रिय राजा हूँ और ये विधान मुझे सूर्यदेव शम्स ने प्रदान किये हैं । मेरे शब्द उदात्त हैं और मेरे कार्य अनुपम हैं ..." अबकी बार अजय ने रवीन्द्र को एप्रिशिएट करते हुए ताली बजाई । "मगर यह बहुत बाद की बात है ।" मैंने कहा "उससे पहले यहाँ भीषण बारिश होती थी जिसकी वज़ह से नदियों में बाढ़ आती थी यह बाढ़ अपने साथ मिटटी की गाद लेकर आती थी जो बहुत उपजाऊ होती थी । सातवीं- छठवीं सहस्त्राब्दी ईसापूर्व तक यहाँ के निवासी कुदाल से खेती करने के अलावा भेड़ बकरियाँ व गाय पालने लग गए थे । वे दलदल में उगने वाले सरकंडों से और मिट्टी से अपने घर बनाते थे ।“ “ और खाना खाकर आराम से सो जाते थे । “अजय जोशी ने एक लम्बी उबासी लेते हुए कहा और माथे तक रज़ाई खींचकर लम्बा हो गया । “नहीं भाई इतना सुख कहाँ था ।“ मैंने कहा “यहाँ की नदियों में हर साल भीषण बाढ़ आती थी और उनकी सारी मेहनत पर पानी फिर जाता था, झोपड़ियाँ बह जाती थीं, आदमी और मवेशी नष्ट हो जाते थे, दलदली बुखार, बिच्छू, कीड़े-मकोड़ों से लोग त्रस्त रहते थे, जंगली शेर और सुअर हमला कर देते थे ..” “ एक मिनट भाईसाहब, शेर तो जंगली ही होते हैं ना ? ” राममिलन भैया ने बहुत देर बाद मुँह खोला था । “ हाँ भाई उस समय भी जंगली थे और आज भी जंगली ही हैं, सुअरों की बात मैं नहीं कर रहा हूँ ।” राममिलन भैया ने एक्सपर्ट कमेंट किया । “ सुअर तो सब शहर में बस गए हैं और अब चुनाव भी लड़ने लगे हैं ।" मैंने बात आगे बढ़ाई “ लेकिन तीसरी सहस्त्राब्दि ईसा पूर्व तक मेसोपोटेमिया के इन लोगों ने अनेक कठिनाइयों पर विजय पा ली थी । दलदल सुखाने और सिंचाई के लिए यहाँ नहरें खोदी गईं, खेतों में गेहूँ और जौ की फसलें उगाई जाने लगीं । कृषकों ने हल का अविष्कार भी कर लिया था । खजूर यहाँ बहुतायत में होता था जिसके फलों से आटा व गुड़ तैयार किया जाता था । पेड़ की छाल के रेशों से रस्सी बुनी जाती थी ,चरागाहों में घुंघराले बालों वाली भेड़ें नर्म नर्म घास चरती थीं । नगरों में शिल्पी, बढ़ई आदि कारीगर रहा करते थे और ऊन, खजूर, अनाज आदि का व्यापार भी अच्छा था । “ "यार अब समझ में आया कि अरब देशों के लोग खजूर को इतना पसंद क्यों करते हैं ।" अजय ने कहा "और यह भी समझ में आ गया कि मुसलमान लोग रमज़ान के महीने में रोजा खोलने के लिए खजूर का इस्तेमाल क्यों करते हैं । "हाँ यह सही है ।" मैंने कहा "जिस क्षेत्र में किसी धर्म का उदय होता है उस क्षेत्र का खान-पान, रीति रिवाज़, रहन - सहन सब कुछ उस धर्म में शामिल हो जाता है ,फिर उस धर्म के लोग दुनिया के किसी भी क्षेत्र में रहें वे उन्ही रीति -रिवाजों का पालन करते हैं । लेकिन यह बात जो मैं बता रहा हूँ यह इस्लाम के अविर्भाव से हजारों साल पहले की है ।" “मतलब यह कि मेसोपोटेमिया वासियों को सुखी होने में तीन-चार हज़ार साल लग गए ? ” रवीन्द्र ने मेरी बात को फ़िर से पटरी पर लाते हुए कहा । “हाँ” मैंने बताया, "लेकिन इस तरह सुखी होने की प्रक्रिया में कुछ लोग तो सम्पन्न हो गए और शेष वैसे ही विपन्न रहे । दरअसल अधिकता ही इस भेद को जन्म देती है । उस समय दक्षिण मेसोपोटामिया की उर्वर ज़मीन में एक दाने से सौ दाने पैदा होते थे और खजूर का एक पेड़ वर्ष में पचास किलो से भी अधिक खजूर देता था । इसका अर्थ यह हुआ कि उन लोगों के पास आवश्यकता से अधिक अन्न हो गया लेकिन इसके मालिक सब नहीं हुए ।" "हमारे यहाँ भी तो यही हाल है भाई " अशोक ने कहा । "हमारे यहाँ भी किसान इतना अनाज पैदा करता है लेकिन सब बड़े बड़े लोगों के गोदामों में जमा हो जाता है किसान के पास तो बमुश्किल अपने खाने लायक अनाज बचा रहता है ।" " तुम ठीक कह रहे हो " मैंने कहा " लेकिन इसकी वज़ह से यह हुआ कि कुछ संभ्रांत और पुरोहित किस्म के लोगों ने ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लिया और शेष लोग जिनमें युद्धबंदी भी थे उनके दास हो गए । गरीबों के पास अपनी भूमि नहीं थी वे ज़मींदारों के यहाँ काम करने लगे । इस तरह दक्षिण मेसोपोटामिया में कृषि, पशुपालन और शिल्प का विकास तो हुआ ही साथ साथ दासों , सामुदायिक किसानों और संपन्न दास स्वामियों के वर्ग भी बन गए । बहुत से शिल्पी और किसान धनी लोगों के कर्जदार बनते गए ।" "मतलब यह सिर्फ हमारे देश में ही नहीं हो रहा बल्कि पूरी दुनिया में सदियों से चला आ रहा है ।" अशोक ने कहा और रज़ाई के भीतर मुँह घुसा लिया । मैंने देखा कि सबको नींद सी आ रही है । अशोक की बात ख़त्म होते ही रवींद्र ने आज की रात्रिकालीन सभा की समाप्ति की घोषणा करते हुए पहला फरमान जारी किया .."अभी भी कहाँ कुछ बदला है न बदलने वाला है चलो अब सब लोग सो जाओ ।"

मंगलवार, 2 जून 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दूसरा दिन-चार




कैंप से निकलकर टीले की ओर जाते हुए हमें अहसास हुआ जैसे हम अपने हॉस्टल से क्लासरूम की  ओर जा रहे हों । वैसे यह सच भी था । टीले पर खुदी निखात पर ही हमारी क्लास लगनी थी सो वह एक तरह से हमारी कक्षा ही थी । जैसे ही हम आगे बढ़े टीला हमारे सामने था । दिन की रौशनी में हम दंगवाड़ा का यह टीला पहली बार देख रहे थे । रात के अँधेरे में जो टीला डरावना और रहस्यमय लग रहा था वही दिन में शांत और सुन्दर प्रतीत हो रहा था । वहाँ न रात का अँधेरा था ,न पेड़ों के साये । यह इस टीले से हमारा नया परिचय था । टीले की ओर देखते हुए मैं सोचने लगा ..रौशनी और अँधेरे का खेल भी कितना अजीब होता है ना । अँधेरे में जो कुछ छुपा छुपा होता है वह रौशनी में आते ही अनावृत हो जाता है । अँधेरा अगर रहस्य है तो रौशनी रहस्योद्घाटन । अँधेरा भय उत्पन्न करता है और प्रकाश उस भय से मुक्ति प्रदान करता है ।

दिन के इस उजाले में कल रात के अँधेरे के बारे में सोचते हुए मुझे मुक्तिबोध की कविता 'अँधेरे में' याद आने लगी .."ज़िन्दगी के / कमरों में अँधेरे / लगाता है चक्कर / कोई एक लगातार / आवाज़ पैरों की देती है सुनाई / बार- बार ...बार-बार / वह नहीं दीखता /नहीं ही दीखता / किन्तु वह रहा घूम / तिलिस्मी खोह में गिरफ़्तार / कोई एक / भीत- पार आती हुई पास से  / गहन रहस्यमय अंधकार - ध्वनि  सा / अस्तित्व जनाता / अनिवार कोई एक /और, मेरे हृदय की धक -धक / पूछती है - वह कौन / सुनाई जो देता , पर नहीं देता दिखाई ....." कितना डूबकर लिखा है मुक्तिबोध ने ..ऐसा लगता है जैसे एक कुदाल लेकर सदियों से निर्मित मनुष्य के अवचेतन को खोद डाला हो ।  

            सदियों से व्याप्त यह कैसी विडम्बना है कि बचपन में ही हमारे अवचेतन में अँधेरे और भय का यह सम्बन्ध स्थापित कर दिया जाता  है । हमें बताया जाता  है कि अँधेरे का अर्थ बुराई है, रहस्य है, अँधेरे में बुरे काम होते हैं, अँधेरे में बुरी आत्माएँ भटकती हैं आदि आदि और फिर हम जीवन भर अन्धेरे से डरते रहते हैं । अक्सर रोते हुए बच्चे को चुप कराने के लिए हम कहते हैं  “ चुप ! रोना बुरी बात है, अब रोया तो अँधेरे में  फेंक देंगे ।‘’ इसकी मनोवैज्ञानिक परिणति अँधेरे और भय के सम्बन्ध में होती है । फिर वह वह बच्चा जीवन भर अँधेरे का सम्बन्ध  भय, पाप, बुराई, भूत-प्रेत और बुरी शक्तियों से जोड़ता है । वह यही समझता है कि सारे बुरे काम और अपराध अँधेरे में ही होते हैं । अफ़सोस उस बच्चे को यह नहीं बताया जाता कि अँधेरा सूर्य की अनुपस्थिति का दूसरा नाम है ।

            रात का वह अँधेरा कबका समाप्त हो चुका था और सुबह की धूप टीले को अपना दुलार दे रही थी । रात में आसमान से टपकी हुई ओस किसी बादल का हिस्सा बन चुकी थी और बादल का एक टुकड़ा आसमान में खड़ा खड़ा अपने अतीत की ओर निहार रहा था । हम भी दुनिया के अतीत में कदम रखने के लिए तैयार हो चुके थे । हमने सोचा आज पहला दिन है सो कुदाल हाथ में लेकर मज़दूर की भूमिका निभाई जाए । आखिर हर पुरातत्ववेत्ता को शुरुआत तो यहीं से करनी पड़ती है । मैंने एक मज़दूर के हाथ से कुदाल ली और ज़मीन पर चलाने की मुद्रा में आया ही था कि आर्य सर ने मुझे रोक दिया " ऐसे नहीं भाई, निखात में कुदाल किस तरह चलाना है और उसके लिए क्या क्या सावधानी बरतनी है पहले यह आपको सीखना होगा ।" 

            “मतलब हम मज़दूर बनने के लायक भी नहीं हैं ?"  अजय ने आश्चर्य पूर्वक सवाल किया । “नहीं भाई, ऐसा नहीं है ।" आर्य सर समझ गए थे कि उनका इस तरह टोकना हमें खल गया है । उन्होंने समझाते हुए कहा "कुदाल चलाना बड़ी बात नहीं है ,हम सभी जीवन में कभी न कभी कुदाल पकड़ चुके हैं  लेकिन पुरातात्विक स्थल पर कुदाल चलाने के  लिए  और अधिक कार्य कुशलता की आवश्यकता होती है । आपकी ज़रा सी असावधानी से भी ज़मीन के भीतर दबी कोई महत्वपूर्ण वस्तु टूट सकती है, इसलिए गड्ढा खोदने और निखात के निर्माण हेतु  कुदाल चलाने में अंतर है ।और कुदाल चलाने से पहले आप लोगों को कुछ प्रारम्भिक बातें जानना भी आवश्यक है ।“

            बात हमारे भेजे में ठीक तरह से प्रवेश कर गई थी सो हमने कुदाल चलाने का विचार त्याग दिया । कुदाल चलाने की बात पर मुझे फिर मुक्तिबोध याद आये । कविता लिखना भी  मनुष्य जाति  के सामूहिक अवचेतन में कलम रूपी कुदाल चलाने की तरह ही है लेकिन उसके लिए भी प्रशिक्षण और अभ्यास की आवश्यकता तो होती ही है । मुक्तिबोध ऐसे ही बड़े कवि नहीं बन गए ।

            वैसे भी उत्खनन का हमारा यह पहला दिन था और यह दिन हम लोगों की डायरी में ऑब्ज़रवेशन के लिए  तय था । इस दिन हमें सिर्फ यह देखना था कि ट्रेंच के लिए जगह कैसे तय की जाती है, किस तरह ट्रेंच का आकार तय किया जाता है, कैसे नाप लिया जाता है, मार्किंग कैसे की जाती है, टूल्स कैसे तैयार किये जाते है वगैरह वगैरह । आर्य सर हम लोगों को टीले के एक सिरे पर ले गए ,वहाँ एक चौकोर गड्ढा खुदा हुआ था । सर ने बताया कि यह टेस्ट पिट है । किसी भी पुरातात्विक स्थल का चयन करने के पश्चात सर्वप्रथम वहाँ पर एक टेस्ट पिट या टेस्ट ट्रेंच खोदी जाती है । इसे हम परीक्षण निखात भी कह सकते हैं । इस टेस्ट पिट द्वारा हमें ज्ञात होता है कि इस साईट पर अमूमन कितनी गहराई पर कितनी सतहें प्राप्त होंगी। इस आधार पर ही फिर उत्खनन प्रारंभ किया जाता है

            इसके बाद उन्होंने हमें निखात क्रमांक एक के पास बुलाया और कहा " देखिये यह निखात या ट्रेंच है । हम लोगों ने यहीं से उत्खनन कार्य प्रारंभ किया है ।  ट्रेंच एक प्रकार का वर्गाकार या आयताकार गड्ढा होता है जो सामान्यतः अपनी लम्बाई चौड़ाई के मुकाबले अधिक गहरा होता है । इसमें खुदाई करते हुए जो सबसे उपरी सतह होती है उसे फर्स्ट लेयर कहते हैं जिसमे सबसे बाद की सभ्यता के अवशेष मिलते हैं इसके नीचे जाने पर दूसरी लेयर या सतह मिलती हैं जहाँ उस समय से पूर्व के अवशेष प्राप्त होते हैं । दोनों सतहों के बीच का हिस्सा बहुत महत्वपूर्ण होता है जिसके अवलोकन से हमें पिछली सभ्यता के नष्ट होने के प्रमाण मिलते हैं । यह हिस्सा भूस्खलन ,बाढ़ आदि की वज़ह से निर्मित होता है ।"

            अजय ने कहा "सर यह किसी खाली डिब्बे को भरने के सामान ही है । जैसे किसी गहरे डिब्बे में हम लोग एक के बाद एक चार तरह की वस्तुएँ डालते हैं लेकिन जब निकालते हैं तो सबसे पहले वह वस्तु बाहर आती है जो सबसे बाद में डाली जाती है जो ऊपर होती है और सबसे अंत में वह वस्तु निकलती है जो सबसे पहले डाली जाती है ।  ठीक उसी तरह जो सभ्यता सबसे अंत में बसी होती है उसके अवशेष सबसे पहले मिलते हैं और जो सबसे पहले बसी हुई सभ्यता होती है उसके अवशेष सबसे नीचे अंत में मिलते हैं । अजय ने इतने सरल ढंग से आर्य सर की बात समझा दी थी कि उसके लिए हमारा तालियाँ बजाना अनिवार्य हो गया था ।

            डॉ.आर्य बहुत रूचि के साथ हमें निखात के उत्खनन सम्बन्धी तकनीकी जानकारी प्रदान कर रहे थे लेकिन पहले दिन स्कूल आये बच्चों की तरह हमारा मन भी क्लास में नहीं लग रहा था । सर समझ गए कि इन लोगों को एक जगह बिठाकर सारा तकनीकी ज्ञान एक दिन में इनके दिमागों में उंडेल  देना उचित नहीं है सो उन्होंने एक नया आइडिया लगाया । सर ने कहा " अच्छा यह बताओ तुम लोगों में से कितने लोगों ने ज़मीन पर पड़े पैसे इकठ्ठे किये हैं ?" मैंने झट से हाथ उठाया " सर हमारे बचपन में बैतूल में हमारे घर के सामने इतवार और गुरूवार को बाज़ार लगता था । शाम को बाज़ार उठ जाने के बाद हम बच्चे निकलते थे और सिक्के ढूँढा करते थे ,हमें बहुत से सिक्के मिल जाया करते थे ।" मेरी बात खत्म होते ही अजय ने कहा .." सर हम लोगों के घर के सामने से जब शवयात्रा निकलती थी तो उसमे लाई के साथ चिल्लर पैसे भी लोग मुर्दे के ऊपर से फेंकते थे , उनके जाने के बाद हम लोग दौड़कर वे पैसे उठा लेते थे ।

            अजय की बात सुनते ही राममिलन भैया ने अपने कानों पर हाथ रखे .." शिव शिव शिव .. कितना घ्रणित काम करते थे भाई तुम लोग ..मुर्दे पर फेके हुए पैसे नहीं उठाना चाहिए ..कहीं भूत-वूत पीछे लग जाता तो ?" अशोक ने हँस कर  कहा .." अरे ये लोग खुद ही इतने बड़े भूत हैं इनके पीछे क्योंकर भूत लगता ,सर हम लोग तो शादी में दुल्हे के ऊपर फेंके हुए सिक्के बीन लेते थे ,और पैसे बीनने से ज़्यादा मजा तो सत्यनारायण कि कथा में पंडित जी की आरती की थाली से पैसे चुराने में आता था ।" " बस बस काफी है " आर्य सर ने कहा तुम लोगों के पास सिक्के बीनने का काफी अनुभव है सो आज यही काम करो देखो इस टीले के पास काफी सारे ताम्बे के पंचमार्क सिक्के हजारों साल से पड़े हुए हैं ,देखते हैं तुममे से कौन कितने सिक्के बीन कर लाता है ।"  

            इस तरह हमें आज दिन भर के लिए काम मिल गया था । मिटटी के भीतर प्रवेश करने से पहले मिटटी की उपरी सतह से परिचय करना ज़्यादा ज़रूरी था सो हम लोग टीले के आसपास के क्षेत्र में घूम घूम कर ताम्बे के पंचमार्क या आहत सिक्के एकत्रित करने निकल पड़े  । लेकिन यहाँ हमें सिक्के बहुत मुश्किल से मिल रहे थे । बरसों पहले ढाले गये यह सिक्के आंधी ,तूफ़ान,बाढ़, भूस्खलन जैसी प्राकृतिक विपदाओं से आँख मिचौली खेलते हुए कहीं किसी पत्ते, पेड़ की जड़ ,पत्थर या मिटटी की सतह के नीचे छुप गए थे । हमने देखा कि यह सिक्के ठीक उसी तरह के थे जैसे कभी ताम्बे का एक पैसे का सिक्का चला करता था । लेकिन यह  सिक्के उनसे भी  पुराने थे, ताम्बे के  हवा के संपर्क में आ जाने के कारण उन पर आक्साइड की परत चढ़ी हुई थी और वे कुछ हरे से रंग के हो गए  थे और इसी वज़ह से उन पर मार्क की हुई सील भी पढी नहीं जा रही थी ।

            कुछ देर सिक्के इकठ्ठा करने के बाद हम लोग ट्रेंच पर लौट आये । अपने पास इकठ्ठा चार-छह सिक्के  सर को सौंपते हुए रवीन्द्र ने आर्य सर से सवाल किया " सर इन्हें पंचमार्क सिक्के क्यों कहा जाता है ? सर ने जवाब दिया " भारत में सबसे पहले लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व में आहत करके, चोट करके या पंच  करके बनाये गए । यह सिक्के ईसा पूर्व छठी शताब्दी से चलन में आये जो ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी तक चलन में रहे । सबसे पहले यह सिक्के चांदी के बनते थे । इनके निर्माण के लिए एक पतली चांदी की चादर को बराबर बराबर टुकड़ों में काटा जाता, फिर इन टुकड़ों के  कोने काटकर इन्हें एक जैसे वज़न का बनाया जाता, फिर  एक वज़न के इन टुकड़ों पर कोई एक मुहर या ठप्पा रखा जाता और उस पर हथौड़े से प्रहार किया जाता या पंच किया जाता, इसीलिए अंग्रेजों ने इन्हें पंचमार्क सिक्के नाम दिया । इस तरह प्रहार करने की वज़ह से ही यह अलग अलग आकार के हो गए हालाँकि इनकी पहचान इन पर अंकित चिन्ह से ही होती थी ।"

            "लेकिन सर हमें तो जो सिक्के यहाँ मिल रहे हैं वे चांदी के नहीं बल्कि ताम्बे के हैं ?" अजय ने सवाल किया । आर्य सर ने जवाब दिया "हाँ पहले यह सिक्के चांदी के ही बनते थे, ताम्बे के सिक्कों का चलन मौर्यकाल में माना जाता है । चांदी के सिक्के ज़्यादातर गंगा किनारे के जनपदों में पाए जाते हैं, इन पर उस राज्य की मोहर अंकित होती थी । " तो क्या सर यह सिक्के अन्य जनपदों में नहीं चलते थे ? "अजय ने सवाल किया ।

            "क्यों नहीं चलते थे ।" आर्य सर ने कहा । "जब व्यापार या अन्य माध्यमों से यह सिक्के अन्य जनपदों में पहुँचते थे तो उस राज्य की मुद्रा या चिन्ह उस पर अंकित कर दिया जाता, अधिकतर पीछे की  ओर । इसके अलावा कई छोटे छोटे जनपद थे जिनकी आर्थिक स्थिति कमज़ोर थी तो उन्होंने ताम्बे के सिक्के बनाये । इसलिए इन्हें जनपदीय सिक्के भी कहा जाता है । जैसे मालव, यौधेय आदि जनपदों ने अपने सिक्के बनाये । अनेक स्थानों पर चांदी और ताम्बे के सिक्के एक साथ भी पाए गए ।"

            राममिलन भैया भी हम लोगों के साथ कुछ पंचमार्क सिक्के खोजकर लाये थे और अपना चश्मा उतारकर उसके मोटे से लेंस को मैग्निफाइंग ग्लास की तरह इस्तेमाल करते हुए उन सिक्कों पर अंकित आकृतियों को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे "सर हमें तो इन सिक्कन में कछु नाय दिख रहा है हाथी है कि घोड़ा है ?" सर हँसने लगे .." भाई, अब तक तो इतना क्षरण इन सिक्कों में हो चुका है कि ठीक से कुछ दिखना मुश्किल है लेकिन कई साइट्स में यह सिक्के अच्छी अवस्था में प्राप्त हुए हैं । अब तक पांच सौ से अधिक चिन्ह इनमें पहचाने जा चुके हैं जिनमे शेर, हाथी, घोड़े जैसी पशुओं की आकृतियाँ, विभिन्न मानव आकृतियाँ, रथ के चक्के, सूर्य, चन्द्रमा, तीर-कमान, पहाड़, नदियाँ और विभिन्न ज्यामितीय आकृतियाँ अंकित हैं ।

            "सर, तो क्या हर राज्य अपना अलग सिक्का बनाता था और उस पर अपनी आकृतियाँ अंकित करता था ? रिजर्व बैंक टाइप कौनो बैंक, कौनो नियम फियम नहीं था क्या ? " राममिलन की बात सुनकर  सर हँसने लगे  "भाई कैसा बैंक और कैसा नियम, हर राज्य की अपनी टकसाल होती थी और ज़रूरत के अनुसार वे अपने लिए सिक्के बनाते थे, एक राज्य का सिक्का जब दूसरे राज्य में पहुँच जाता तो वे उस पर अपनी मुहर लगाकर उसे अपना सिक्का बना लेते, इसीलिए एक सिक्के पर कई कई छाप मिलती हैं । " सर, फिर तो बहुत अराजकता होती होगी, इतने शिथिल नियमों की वज़ह से तो लोग अपने अपने सिक्के बना लेते होंगे ?" अशोक ने पूछा ।

            "नहीं ऐसा भी नहीं था ।" सर ने कहा "हालाँकि कई बड़े बड़े नगरों जैसे उज्जयिनी, तक्षशिला, कौशाम्बी आदि के वणिक संघों ने अपने अपने सिक्के भी बनाए थे ।" राममिलन से फिर सवाल किया "तो सर अभी जैसे गांधीजी हर नोट पर दिखाई देते हैं वैसा नहीं था, लेकिन उस समय भी आना, दो आना, जैसी कोई मुद्रा तो चलती होगी ? " " हाँ चलती थी ना " सर ने कहा "कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इनका उल्लेख है । उस समय एक आने को पण कहा जाता था, आधे आने को अर्ध पण, चौथाई आना पद कहलाता था और आने के आठवें हिस्से को अर्शपादिका कहते थे । सम्पूर्णता में सभी पंचमार्क सिक्कों के लिए कर्षपण शब्द प्रचलित था ।"   

            मैंने ज़मीन पर पड़ा एक सिक्का उठाकर अपनी हथेली पर रखा और उसे देखते हुए सोचने लगा … आज यह सिक्का मेरी हथेली पर रखा है लेकिन हजारों साल पहले हो सकता है ऐसा हुआ हो कि इसी सिक्के से उस काल का कोई पिता अपनी बेटी के लिए  गुड़िया खरीद कर लाया होगा, हो सकता है किसी किसान ने खेती  के लिए  बैल खरीदे होंगे ? हो सकता है किसी गृहणी ने इस सिक्के से अपने परिवार के लिए दाल -आटा खरीदा होगा । जाने कितने हाथों में यह सिक्का गया होगा । अशोक ने पता नहीं कैसे ताड़ लिया कि मैं ऐसा ही कुछ सोच रहा हूँ । उसने पूछा “ यार उस ज़माने में इस एक सिक्के में कितनी सिगरेट आती होंगी ? ” “चुप । “ मैंने कहा ” उस ज़माने के लोग सिगरेट नहीं पीते थे ।“ “तो फिर सुबह उनका मामला कैसे पिघलता था ?” अशोक बोला । अबकी बार मैंने उसे ऐसे घूरकर देखा कि वह बिलकुल चुप हो गया ।


इस तरह डॉ.आर्य के सान्निध्य में आज का यह दिन अच्छा बीता । हाँ सिक्के बीनने के अलावा वहाँ कार्यरत मज़दूरों से भी हमने दोस्ती कर ली क्योंकि वे निरक्षर ही सही कुदाल चलाना तो हमसे बेहतर जानते थे । हाँ हिंदी भाषा के अक्षर उनके लिए उसी तरह अनचीन्हे थे जिस तरह इतिहासकारों के लिए सिन्धु घाटी की लिपि, जिसे तमाम कोशिशों के बावज़ूद अब तक ठीक ठाक पढा नहीं जा सका था ।

शरद कोकास 



रविवार, 31 मई 2009

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-दूसरा दिन -तीन




4 - वो हेलनवा का क्या हुआ

            शीघ्र ही तैयार होकर हम लोग भाटी जी की भोजनशाला में पहुँच गए । नाश्ते में मालवी स्टाइल में बना गर्मागर्म पोहा हमारा इंतजार कर रहा था । हमने अपनी अपनी प्लेट में पोहा लिया और लौंग की नमकीन, अमचूर के पाउडर, और हरे धनिये से उसकी गार्निशिंग करने लगे । राममिलन भैया को भूख ज़्यादा लगी थी और इससे ज़्यादा उत्सुकता हेलेन के बारे में जानने की थी ।उन्होंने सीधे चम्मच भर पोहा मुँह  में डाला और आर्य साहब से सवाल किया "सर वो आप हेलनवा के बारे में कुछ कह  रहे थे, हम तो सिर्फ एक सनीमा वाली हेलन को जानते हैं ..ऊ.. पिया तू अब तो आजा वाली ..ई कऊन सी हेलन है ?"

            आर्य साहब ने मुस्कुराते हुए कहा " नहीं भाई, हम जिस हेलेन के बारे में कह रहे थे वह प्राचीन ग्रीक की हेलेन है । अब इसके लिए मुझे आप लोगों को होमर के महाकाव्य इलियड की पूरी कथा ही सुनानी पड़ेगी । " बिलकुल सर बताइए ना । " अजय ने भी उत्सुकता दिखाते हुए कहा । डॉ.आर्य ने अपनी घड़ी देखी और ट्रेंच पर पहुँचने के समय का अंदाज़ लगते हुए कहना शुरू किया "हेलेन और ट्रॉय के युद्ध की यह कथा हमें यूनान के प्रसिद्ध कवि होमर के महाकाव्यों में मिलती है । प्रसिद्ध इतिहासकार हेरोडोटस ने होमर का काल आठ सौ पचास ईसा पूर्व के लगभग बताया है ।  महाकवि होमर ने दो प्रसिद्ध महाकाव्य ‘इलियड’ और ‘ओडीसी’ की रचना की है  ।

            "सर ये वही होमर हैं ना जो हमारे यहाँ के सूरदास की भांति दृष्टिबाधित थे?" रवीन्द्र का सवाल था । सर ने प्रशंसा के भाव में सिर हिलाया " बिलकुल ! होमर के बारे में कहा जाता है कि वे एक निर्धन नेत्रहीन कवि थे और उन्होंने कुछ यथार्थ में अपनी कल्पना का सम्मिश्रण कर यह दो महाकाव्य रचे । वे अपनी रचनाओं का यूनान के विभिन्न राज्यों और नगरों में गायन भी किया करते थे । मौखिक परंपरा से होती हुई लगभग ईसापूर्व छठी शताब्दी में उनकी यह साहित्यिक कृति लिखित रूप पा सकी जिसमे बाद में और परिवर्तन हुए । प्राचीन यूरोप में होमर की लोकप्रियता का अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि सिकंदर अपनी मंजूषा में 'इलियड' की एक प्रति हमेशा रखता था और समय समय पर राजनीति में उससे उद्धरण भी दिया करता था ।यह बाइबिल के बाद सबसे अधिक लोकप्रिय कृति थी । एक तरह से यह यूनानियों का धर्मग्रंथ ही था ।"

            "सर आगे भी तो बताइये। " अजय की उत्सुकता बढती जा रही थी । आर्य साहब फिर मुस्कुराए और कहने लगे "भाई,तुम्हें बड़ी जल्दी है हेलेन के बारे में जानने की । पहले पूरी कथा और इसके पीछे का इतिहास तो जान लो । इतिहास के विद्यार्थियों को कोई भी साहित्यिक कृति पढ़ते हुए भी पूरे  इतिहास बोध से लैस होना चाहिए उसी तरह साहित्य के विद्यार्थियों को भी साहित्य पढ़ते हुए साहित्य के और देश दुनिया के इतिहास के बारे में जानना चाहिए ।"

            सर की बात सुनकर अजय थोड़ा सा झेंप गया । आर्य साहब ने उसकी ओर ध्यान न देते हुए आगे का बखान शुरू किया " दरअसल 'इलियड' की कथा ट्रॉय और स्पार्टा इन दो प्राचीन राज्यों के युद्ध की कहानी है इसलिए सबसे पहले थोडा बहुत मैं तुम लोगों को इन राज्यों के बारे में बताना चाहता हूँ । ट्रॉय जिसे प्राचीन यूनानी भाषा में इलियोस या इलियोन भी कहते हैं , यूनान से पश्चिम में इजियन सागर के तट पर बसा एक शहर था । कहा जाता है कि यूनानियों के देवता डारडेनस ने आइडा पर्वत की तलहटी में सर्वप्रथम डारडेनिया नामक नगर बसाया था । इसी डारडेनस के वंशज राजा ट्रोस के तीन बेटे हुए इलस, एसरेकस और गेनिमिडिज़ । इनमें से इलस या इलियास ने इसी स्थान पर आइडा पर्वत कि ढलान पर ट्रॉय नगर की स्थापना की थी, इसलिए ट्रॉय नगर को  इलियम भी कहते हैं । होमर के महाकाव्य 'इलियड' का नाम इसी 'इलियम' के नाम पर है ।"

            आर्य सर ने एक नज़र युवा चेहरों पर डाली । सब बहुत ध्यान से यह आख्यान सुन रहे थे । उन्होंने आगे कहना शुरू किया "ट्रॉय के निकट ही यूनान में स्पार्टा का राज्य था । ट्रॉय और स्पार्टा इन दोनों राज्यों के बीच एजियन सागर था और आज के हिसाब से इन दोनों के बीच की दूरी साढ़े छह सौ किलोमीटर थी । स्पार्टा में टेंटेलस का वंश चलता था । टेंटेलस के पौत्र एट्रियस के एगमेनन और मेनेलियस  यह दो पुत्र हुए  । इसी स्पार्टा के राजा मेनेलियस की पत्नी थी हेलेन । वह अपूर्व सुंदरी थी । ट्रॉय के राजा इलस के प्रपौत्र राजकुमार पैरिस ने स्पार्टा की रानी हेलेन के अभूतपूर्व सौन्दर्य के बारे में सुन रखा था । वह सौन्दर्य की देवी एफ्रोडायटी की प्रेरणा से यूनान देश की यात्रा पर निकला और स्पार्टा पहुंचा । अब यहाँ एक उपकथा और  है ।  तुम लोग कहो तो वह कथा भी तुम्हें सुनाऊँ ? " " हाँ,हाँ सर, ज़रूर सुनाइये " हम सभीने एक साथ कहा । कहानी में हेलेन का प्रवेश हो चुका था और हम लोगों की उत्सुकता में वृद्धि हो गई थी ।

            "तो सुनो" सर ने कहा " वैसे मैं तुम लोगों को बताना चाहता हूँ कि ग्रीक माइथोलॉजी की कथाओं में एक विशेषता यह है कि यहाँ भी देवी-देवता मनुष्यों के साथ युद्ध में भाग लेते हैं, उनसे विभिन्न कार्य करवाते हैं, उनके साथ उनके प्रणय सम्बन्ध और विवाह भी होते हैं ।" "मतलब देवी-देवताओं के मनुष्यों से प्रेम सम्बन्ध ?" अशोक ने अपनी जिज्ञासा प्रकट की । "हाँ" आर्य सर ने कहा ऐसा ग्रीक माइथोलॉजी में है । पेरिस मनुष्य था और एफ्रोडायटी देवी से उनके संबंधों के बारे में एक कथा है ।"

            "एक बार समुद्रदेव नीरियस की बेटी थेटिस और यूनानी योद्धा पीलियस के विवाह के अवसर पर सब देवता इकठ्ठे हुए । लेकिन कलह की देवी एरिस को वहाँ आमंत्रित नहीं किया गया सो उसने वहाँ कलह फैलाने के उद्देश्य से सोने का एक सेब रख दिया जिस पर लिखा था 'सबसे रूपवती के लिए' । सो सबसे लावण्यमयी कहलाने के लिए देवियों में होड़ लग गई । इस प्रतियोगिता में तीन देवियाँ हेरा, एथिनी और एफ्रोडायटी  शामिल हुई ।"

            "मतलब यह कि उस समय भी मिस यूनिवर्स टाइप की प्रतियोगिता होती थी ?" अजय ने सवाल किया । "हाँ बिलकुल" आर्य सर ने कहा । " ट्रॉय के राजा इलस के प्रपौत्र राजकुमार पैरिस को इस प्रतियोगिता का निर्णायक बनाया गया इसलिए कि उस समय पैरिस की ख्याति उदार और निष्पक्ष व्यक्ति के रूप में थी । तीनों देवियाँ स्केमेंडर नदी में स्नान के पश्चात  पैरिस के सन्मुख पूर्णतया निर्वस्त्र स्थिति में प्रकट हुई । अपने पक्ष में निर्णय देने के लिए हेरा ने उसे दुनिया पर शासन का ,एथिनी ने ज्ञान और विवेक का तथा एफ्रोडायटी ने उसे संसार की सबसे रूपवती स्त्री हेलेन को प्रदान करने का प्रलोभन दिया ।"

            "वैरी गुड मतलब उस समय भी भ्रष्टाचार चलता था ।" अशोक त्रिवेदी ने बीच में ही कहा  । "बिलकुल ! " आर्य सर ने कहा "अब पैरिस को न दुनिया पर शासन करने की इच्छा थी न उसे ज्ञान और विवेक की आवश्यकता थी मतलब न वह साम्राज्यवादी था न ज्ञानपिपासु था बल्कि रूप का लोभी था इसलिए उसके मन में हेलेन को पाने की इच्छा बलवती हो गई सो पैरिस ने एफ्रोडायटी  के पक्ष में सबसे रूपवती होने का निर्णय दे दिया । दरअसल यही निर्णय ट्रॉय के युद्ध का बीज साबित हुआ । हेरा और एथिनी यह दोनों देवियाँ पैरिस के इस निर्णय से क्रोधित हो गईं और ट्रॉय के युद्ध में उन्होंने पेरिस के विरुद्ध स्पार्टा का साथ दिया और ट्रॉय नगर को नष्ट कर दिया ।

            "लेकिन सर यह युद्ध कैसे हुआ ?" अजय ने सवाल किया " हाँ वही बता रहा हूँ ।" सर ने कहा " फिर वह एक दिन ट्रॉय का राजकुमार पेरिस एफ्रोडायटी  की प्रेरणा से स्पार्टा पहुँच गया । उसका भव्य स्वागत किया गया, आखिर वह पड़ोसी देश का राजकुमार था । लेकिन जैसे ही उसने रानी हेलेन को देखा उस पर उसका दिल आ गया और वह अपनी सुध-बुध खो बैठा । इस बीच कुछ दिनों के लिए हेलेन का पति राजा मेनेलियस किसी काम से स्पार्टा से क्रीट द्वीप गया हुआ था सो मौका देखकर पैरिस उसकी पत्नी को लेकर भाग गया । अपने राज्य ट्रॉय में पहुँचाने पर उसका भव्य स्वागत किया गया जैसे दूसरे की पत्नी का अपहरण करके उसने कोई बड़ा काम किया हो ।“

            राममिलन भैया से रहा नहीं गया और उन्होंने आश्चर्य से अपनी आँखे फाड़कर कहा “ जो भी हो यह काम उसने बहुत ग़लत किया दूसरे की लुगाई को भगाकर ले जाने में कौनो शान की बात है भैया ? हमरे यहाँ रामायण में ओ ससुरा  रावण भी इही किया रहा जौन की सजा उसे मिली। रामजी ने उसका काम तमाम कर दिया ।अब समझे इसी कारण वहाँ ट्राई की लड़ाई हुई होगी । तो नई बात का है ..ई तो हमरे रामायण जैसी ही कथा है । “ रवीन्द्र ने कहा " हो सकता है भैया ,अलग अलग देशों के महाकाव्यों में भी कुछ कथाएं होती हैं जो एक जैसी लगती हैं ।"

            डॉ.आर्य ने अपनी बात जारी रखी ”राममिलन ठीक कह रहे हैं,  युद्ध का कारण यही था । मेलेनियस जब लौटकर आया  तो हेलेन को अपने महल में न पाकर दुखी हो गया और उसने उसे वापस पाने के लिए ट्रॉय पर आक्रमण की योजना बनाई । उसने यूनान के तमाम कबीलों से इसके लिए मदद मांगी । जब हेलेन और मेलेनियस का विवाह हुआ था उस समय आसपास के तमाम राजा उस अवसर पर पधारे थे और उन्होंने आश्वासन दिया था  कि कोई भी मुसीबत आने पर वे उसका साथ देंगे सो वे सब लोग उसके साथ हो गए । इस तरह अस्त्र शस्त्र से सुसज्जित होकर स्पार्टा की सेना ने ट्रॉय पर आक्रमण के लिए कूच किया ।"

            "अब देखिये यहाँ यह होता है कि देवता भी परोक्ष रूप से इस युद्ध में कैसे हस्तक्षेप करते हैं ।" आर्य सर ने बात आगे बढ़ाई । "ट्रॉय जाते हुए रास्ते में उन्हें अनेक बाधाएँ भी मिलीं जैसे पवन देवता उनके प्रतिकूल हो गए । फिर उन्होंने उन्हें प्रसन्न करने के कुछ उपाय किये और अंततः वे लोग सागर के मार्ग से ट्रॉय  पहुंचे । ट्रॉय  नगर एक पहाड़ी पर स्थित था और उसके चारों ओर पत्थर की दीवार थी । मेलेनियस की सेना ने अपना शिविर सागर तट पर स्थापित किया और अपने सेना नायकों के नेतृत्व में ने ट्रॉय पर आक्रमण कर दिया । ट्रॉय वासियों ने जमकर उनका मुकाबला किया । यूनानी दस वर्ष तक ट्रॉय को घेरे रहे । इस बीच उनके अनेक योद्धा भी मारे गए । स्पार्टा के यूनानियों का प्रमुख योद्धा एकीलीज था जिसका युद्ध ट्रॉय के योद्धा हेक्टर से हुआ । कहते है एकीलीज एड़ी में तीर लगने से मरा, उसकी माँ थेटिस ने जो एक देवी थी बचपन में उसे एड़ी पकड़कर पवित्र स्टिक्स नदी में नहलाया था जिसके कारण एड़ी के अलावा उसका सारा शरीर कठोर बन गया था। ” “ अरे ! “ राममिलन ने कहा “ ऐसी ही कथा हमारे यहाँ दुर्योधन की भी तो है महाभारत में । “

            डॉ. आर्य ने अपनी कथा जारी रखी...“ हो सकता है ,पौराणिक कथायें एक सभ्यता से दूसरी सभ्यता में आती जाती रहती हैं । आगे सुनो .. इस बीच हेलेन का अपहरण करने वाला पेरिस भी मारा गया । क़ायदे से युद्ध बंद हो जाना चाहिए था और ट्रॉय वासियों को उन्हें हेलेन को सौंप देना चाहिए था लेकिन ट्रॉय के निवासी त्रोज़नो के हौसले तब भी बुलंद थे, वे स्पार्टा वासियों को ट्रॉय नगर में प्रवेश करने से रोकते रहे । जब स्पार्टा वासी यूनानी युद्ध में उन्हें नहीं हरा सके तो उन्होंने एक चाल चली ।"

            हम सब आर्य सर की बातें बहुत ध्यान से सुन रहे थे .."स्पार्टा के एक योद्धा ओडीसीयस की सहायता से  उन्होंने लकड़ी का एक विशालकाय घोड़ा बनाया जिसमें सबसे निचले भाग में एक खोखला स्थान रखा गया । इस भाग में यूनानी सैनिक अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर छुप गए । बाकी सभी वापस लौटने का दिखावा करते हुए पास के एक द्वीप पर चले गए  । घोड़ा उन्होंने नगर द्वार पर रख दिया । रात में ट्रायवासी अपने आप को जीता हुआ मानकर और यह सोचकर कि स्पार्टा के सैनिक वापस लौट गए हैं घोड़ा नगर के भीतर ले आए और राग-रंग और जीत के जश्न में डूब गए  । मौका देखकर उसमें छुपे हुए सैनिक बाहर निकले, उन्होंने ट्राय के सारे पुरुषों को मार डाला और स्त्रियों को बन्दी बना लिया तथा पूरे नगर में आग लगा दी । उसके बाद वे विजयोल्लास के साथ वापस स्पार्टा लौट गए  । यह पूरी योजना ओडिसियस नामक वीर योद्धा ने बनाई थी । नेत्रहीन कवि होमर ने अपने महाकाव्य  ‘ओडीसी’ में इसी ओडिसियस के वापस लौटने का वर्णन किया है । ‘इलियड’ में युद्ध की उत्तर कथा और सेना के वापस लौटने का वर्णन है । “

            अजय ने सवाल किया ” लेकिन सर, ऐसा क्या सचमुच में घटित हुआ था ?“ डॉ.आर्य ने बताया “ होमर के महाकाव्य में पौराणिक कथायें,दंतकथाएँ व लोककथायें इतनी  हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक तक लोग इन्हें पूरी तरह काल्पनिक ही मानते रहे लेकिन हेनरिख शिलेमान और आर्थर ईवान इन दो जर्मन पुरातत्ववेत्ताओं ने सन 1868 में  एशियाई कोचक में या वर्तमान टर्की में सागर तट के पास हिसारलिक नामक टीले की खुदाई की है । । यहाँ विभिन्न कालों की अनेक बस्तियों के साथ ट्राय के खन्डहर भी मिले हैं जिनके  अनुसार इतिहासकारों ने ट्राय पर यूनानी हमले की तिथी कोई 1200 ई.पू. तय की है । पर्याप्त प्रमाण न होने के कारण बहुत से इतिहासकार अभी भी इसे ऐतिहासिक घटना नहीं मानते हैं । हाँलाकि पुरावेत्ताओं का काम अभी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा है और इसमें अभी बहुत विवाद है ।“

            “लेकिन सर जी वो हेलनवा का क्या हुआ ? राम मिलन इलाहाबादी ने सवाल किया ।“ अरे यार ,तुम अभी हेलेन पर ही अटके हो ? “ अजय ने कहा ” अरे उसी की वज़ह से तो यह युद्ध हुआ था, बताया तो सर ने वे लोग वापस लौट आये, अब वापस लौटेंगे तो ख़ाली हाथ थोड़े आयेंगे, हेलेन को लेकर ही आयेंगे ना । अगर उसको वापस लाना न होता तो युद्ध काहे होता । “ मतलब हमारी सीता मैय्या जैसी ही कहानी है क्या ? ” राम मिलन ने पूछा ।

            “और क्या” आर्य सर ने कहा “भाई पौराणिक कथाएँ  और महाकाव्यों की कथाएँ तो सभी देशों में लगभग एक जैसी ही हैं ,बस देवी देवताओं,राजाओं और स्थानों के नाम देश-काल के अनुसार अलग अलग हैं ।” “लेकिन सर, कथाओं में जो है वैसा क्या सचमुच में घटित हुआ है ?” अजय ने पूछा । “भाई यही सच और झूठ में अंतर  ढूंढने का काम ही तो हम पुरातत्ववेत्ताओं का है, लेकिन विडम्बना है कि लोग यहाँ भी पूर्वाग्रह से काम लेते हैं ।” आर्य सर ने लम्बी साँस लेते हुए कहा फिर उठने का इशारा करते हुए बोले ” खैर छोड़ो इस विषय पर बाद में बात करेंगे । अब यूनान से वापस अपने देश में आ जाओ और मालवा की ताम्राश्मयुगीन सभ्यता की खोज में टीले पर चलो । ” हम लोग उठे और अपनी नोटबुक्स उठाकर टीले की ओर चल पड़े ।