सोमवार, 1 जून 2026

35-मेरे पास यह डंडा है मेरे भाई

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼



पूर्वकथा- पिछले भाग में आपने पढ़ा कि 'डायरी भीतर डायरी' अर्थात अजंता,एलोरा,दौलताबाद,घ्रश्नेश्वर,मांडू और धार की यात्रा का विवरण समाप्त हो चुका है । छात्रों को यह यात्रा वृतांत सुनने में बहुत आनंद आया, उम्मीद करता हूँ कि आपको भी आया होगा । दंगवाड़ा स्थित इस पुरातात्विक उत्खनन शिविर में इन छात्रों का आज सत्रहवां दिन है । राममिलन,किशोर,अशोक,रवींद्र,अजय और शरद इन युवा पुरातत्ववेत्ताओं से आपका परिचय तो हो ही चुका है और आपको इनका साथ अच्छा भी लग रहा होगा । इस भाग से हम शुरू करने जा रहे हैं 'मानव की कहानी' हो सकता है यह कहानी आपने पढ़ी हो लेकिन कुछ तकनीकी डिटेल्स के साथ फिरसे यह पढ़ना अच्छा लगेगा और न भी लगे तो इन छात्रों की बातचीत में आपको आनंद तो आएगा ही । आपके हस्तक्षेप की प्रतीक्षा रहेगी ।

 📒📒📒📒📒

*भाग 35*

*मेरे पास यह डंडा है मेरे भाई* 

मुझे लगता है कल रात भी हैरान हो रही होगी हम लोगों के देर रात तक जागने पर । हमारे तम्बू की झिर्रियों से झाँककर चुपचाप हमारी बातें सुनते हुए शायद उसे भी याद आ रहा होगा रानी रूपमती के महल का वह झरोखा जिसमे चुपके से वह प्रवेश करती थी और सुनती थी बाजबहादुर और रूपमती के प्यार में पगे हुए बोल । 

उसके कानों में भी गूँज रहे  होंगे वे शब्द जो रूपमती के गले से निकली स्वर लहरियों पर सवार होकर मांडू की वादियों में गूंजते थे । उसकी आँखों में बसे होंगे वे प्रणय दृश्य जिन्हें वह अँधेरे की ओट प्रदान करती होगी और कनखियों से निहारती होगी । 

समय पलों के रूप में जन्म लेता है और सदियों तक उसका विस्तार हो जाता है, बीतते हुए वह अतीत की यात्रा भी करता है और भविष्य की आहट उसके कानों में होती है । इसी द्वंद्वात्मकता में उसका जीवन  व्यतीत होता है

हम लोग दंगवाड़ा के इस पुरातात्विक उत्खनन स्थल पर अपने प्रशिक्षण के सोलह दिन पूर्ण कर चुके हैं । प्रशिक्षण कार्य भी अब समाप्ति की ओर है । हमारी डायरी में निखात की जाँच ,आवश्यक सावधानियाँ ,अवशेषों की पहचान ,उनकी साफ सफाई और संरक्षण सम्बन्धी विभिन्न बातें दर्ज हो चुकी हैं । फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ छूट गया है । 

शायद हमें कुछ दिन और अभी यहाँ ठहरना पड़े  या फिर जैसा भी वाकणकर सर का आदेश हो । हमें जो निखात अलाट की गई है वह हर सुबह हमारी राह देखती है । हम उसे सीढ़ी बनाकर रोज़ थोड़ा थोड़ा अतीत की गहराइयों में उतरते जाते हैं । 

हम नियम से प्रतिदिन प्राप्त होने वाले अवशेषों की पहचान, उनकी स्थिति आदि डायरी में दर्ज करते हैं और उन्हें सर को सौंप देते हैं । अतीत की ओर हमारी यह यात्रा निरंतर जारी है लेकिन इसका अंत कहाँ है यह हमें भी नहीं पता । 

एक दिन तो ऐसा आएगा जब वह निखात हमसे कहेगी बस ..अब नहीं.. मेरे गर्भ में अतीत के जितने रहस्य थे वे सब आप लोगों ने जान लिए हैं .. सारे अवशेष तो आप निकाल कर ले जा चुके हैं ,अब मेरे पास बचा ही क्या है ..अब अगर इससे पहले की कहानी आपको जानना है तो आपको कहीं और जाना पड़ेगा  । 

हम जानते हैं कि निखात की इस बात का हम लोगों के पास कोई जवाब नहीं होगा । भले ही हमें बीच में ही यह काम छोड़कर जाना पड़े लेकिन जैसे कि हर चीज़ का अंत होता है इस काम का भी कभी न कभी अंत होगा । अंत को देखने के लिए हम नहीं होंगे तो कोई और होगा । काम भी चलता ही रहेगा ..आखिर किसी के न रहने से दुनिया का कोई काम रुकता थोड़े ही है । संसार की तमाम वस्तुएँ एक दिन अवशेष में तब्दील हो जाती हैं । वस्तुओं की तरह हमें भी एक दिन अवशेष होकर मिटटी में समा जाना है । 

हम बेहतर जानते हैं कि न हम इस धरती के पहले मनुष्य हैं न अंतिम, उसी तरह  न हम इस दुनिया के पहले पुरातत्ववेत्ता हैं न अंतिम .. कल और लोग आयेंगे अपनी अपनी कुदाल लेकर और इस बूढ़ी धरती की छाती से कान लगाकर उसमें अटकी खाँसी की आवाज़ सुनने की कोशिश करेंगे । 

हम युवा पुरातत्ववेत्ता अपने निजी जीवन में वर्तमान से भविष्य की ओर यात्रा करेंगे और अपने प्रोफेशन में वर्तमान से अतीत की ओर । समय की तरह इसी द्वंद्वात्मकता में बीतेगा हमारा भी जीवन । अगर इस प्रोफेशन में आये तो ठीक वर्ना कहीं और कुछ काम करेंगे ..यहाँ नहीं तो कहीं और सही ..जीवन के इस सफ़र में औरों की तरह हम भी तो मुसाफ़िर ही हैं .. अपना डेरा-डंडा उठाकर फ़िर कहीं और चल देंगे ।

**********************

सुबह जब नींद खुली तो अजीब सा अवसाद मन पर छाया हुआ था । ऐसा लग रहा था कि लम्बी यात्रा की थकान के बाद जागा हूँ लेकिन थकान अभी दूर नहीं हुई है । यह अवसाद देर तक जागने की वज़ह से था या मनुष्य के अतीत का वैभव धूमिल  होते जाने की पीड़ा से परिचय होने की वज़ह से.. पता नहीं  । 

हम लोग जब चम्बल के घाट पर पहुँचे सूर्य आसमान में कुछ इस तरह मुस्कुरा रहा था मानो वह हमारे देरी से जागने पर व्यंग्य कर रहा हो । राममिलन भैया नहा धोकर जा चुके थे, अशोक अभी बिस्तर में ही घुसा हुआ था, हालाँकि हम लोग उसे जगाकर आ गए थे । किशोर भैया भी जल्दी जाग गए थे और शायद कहीं आसपास टहलने  निकल गए थे । घाट पर हम तीन ही पहुँचे मैं, रवीन्द्र और अजय । 

नहाते हुए रवीन्द्र ने आश्चर्य व्यक्त किया "अरे आज तो मछलियाँ भी नहीं दिखाई दे रही हैं ।" अजय ने उबासी लेते हुए कहा "वे हमारे समान लेट लतीफ थोड़े ही हैं, नहा धोकर अपने काम पर चली गई होंगी ।" मैंने कहा "हो सकता है सुबह सुबह तट पर आई हों और हम लोगों को न देख कर अपने गलफड़ों में ऑक्सीजन के साथ निराशा भरकर वापस चली गईं हों । "

गोया मछलियाँ न हों हमारी प्रेमिकाएँ हों 

 रवींद्र की मुस्कराहट में एक अर्थ था “तेरी बात अलग है यार, तू तो कवियों की तरह कल्पना करता है, गोया मछलियाँ न हों हमारी प्रेमिकाएँ हों ..लेकिन तेरी बात से याद आया ,मैंने कहीं पढ़ा था कि कई लाख वर्ष पूर्व कुछ मछलियाँ पानी से बाहर निकलकर सचमुच तट पर आ गई थीं और वहीं रहने लगी थीं । 

हम लोगों ने देखा तो है कि कई बार मछलियाँ नदी की मुख्य धारा से अलग किनारों के गड्ढों में भी जीवित रहती हैं । हमारे यहाँ शायद वह प्रजाति न हो लेकिन अभी भी अफ़्रीका, दक्षिण अमेरिका और आस्ट्रेलिया में मछलियों की कुछ प्रजातियाँ ऐसी हैं जो हल्की सी नमी या गीली गाद में भी ज़िन्दा रह सकती हैं । इनके गलफ़ड़ों के अलावा फेफड़े भी होते हैं । कुछ मछलियाँ कीचड़ से छलांग लगाकर पेड़ों पर भी चढ़ सकती हैं । “

“बस यार, बहुत हो गया, सुबह सुबह इतनी गप्प हज़म नहीं होती ।“ अजय ने हँसते हुए कहा । “अरे नहीं भाई, रवींद्र सच कह रहा है ।“ मैंने कहा “पुरातत्ववेत्ताओं को ऐसे जानवरों की हड्डियाँ मिली हैं जो पूरी तरह मछली भले न हो लेकिन बहुत कुछ मछली जैसे थे । स्कूल में विज्ञान की किताबों में हमने पढ़ा ही है कि आगे चलकर मछली से ही उभयचरों का अर्थात जल थल दोनों स्थानों पर रह सकने वाले प्राणियों का विकास हुआ था जो सरिसृपों अर्थात रेंगने वाले जीवों के पूर्वज थे और यह सरिसृप हम जैसे स्तनधारियों और पक्षियों के पूर्वज थे । 

आखिर सजीव प्राणि भी तो वातावरण के अनुसार हमेशा बदलते ही रहे हैं । यह बात तो सब जानते हैं कि बदलते हुए वातावरण के साथ जो प्राणि सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाए वे लुप्त हो गए, जैसे डायनोसर और अन्य कई प्रजातियाँ लुप्त हो गईं ।“

“लेकिन आदमी लुप्त नहीं हुआ ।“ अजय ने अपनी बाँहों की मछलियों पर हाथ फेरते हुए कहा “वाकई ,बड़ा ही दमदार जीव है आदमी ।“ 

“बिलकुल सही कह रहे हो तुम ।“ मैंने कहा “ आदमी जहाँ रहना चाहता है अपने आवास के अनुकूल वातावरण तैयार कर लेता है । वह हर हाल में प्रकृति से मुकाबला करता है । मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो जंगल में भी रह सकता है और दलदल में भी, सूखी ज़मीन पर तो खैर उसे कोई कठिनाई ही नहीं है । जंगलों और पहाड़ों पर तो वह अब भी रहता है लेकिन बहुसंख्य आबादी अब मैदानी इलाकों में रहती है । 

हालाँकि जंगलों से निकल कर मैदानी ज़मीन पर आने में ही इस इंसान को लाखों साल लग गए । क्या क्या नहीं सहा उसने इस बीच । और फिर मौसम भी उसके अनुकूल कहाँ था, जलवायु लगातार बदल रही थी, ठंड बढ़ती जा रही थी, भोजन भी मिलना इतना आसान नहीं था । हम अपने कठिन जीवन के बारे में सोच सोच कर दुखी होते हैं, ज़रा उस इंसान के बारे में सोचो जिसके लिए जीवन वाकई में एक सज़ा थी । फिर भी ज़मीन पर रहना पेड़ों पर रहने  से तो बेहतर था ही ।"

अजय ने सवाल किया “लेकिन इंसान को पेड़ से उतरकर ज़मीन पर आने की ज़रूरत क्यों पड़ी  ?“ 

रवींद्र ने चम्बल में एक डुबकी लगाई और कहा "अरे बापड़े, वो कोई बन्दर थोड़े ही था जो जीवन भर पेड़ पर रहता, आदमी अपने लिए बेहतर आवास की तलाश में रहता है या नहीं .. तेरे पप्पा ने कैसे बरसों किराये के मकान में रहने के बाद खुद का मकान बनाया ।" 

अजय ने हमेशा की तरह अपने दांत दिखा दिए । मैंने रवींद्र की बात  का समर्थन करते हुए कहा “ हाँ, इसका मुख्य कारण तो यही था कि वह बंदरों से अलग था और ज़मीन पर शिकार की खोज करते हुए उसने दो पैरों पर चलना सीख लिया था ।“  

“ तो फिर इस मानव की हड्डियाँ भी मिली होंगी पुरातत्ववेत्ताओं को ?“ अजय ने पानी में तैरते हुए सवाल किया । 

“हाँ ।“ मैंने कहा । “सन अठारह सौ इन्क्यान्बे में एमस्टर्डैम के पुरातत्ववेत्ता प्राध्यापक डॉ दुयुबुआ को इंडोनेशिया के जावा नामक स्थान में सोलो नदी के किनारे रेत में इस मानव के अवशेष मिले और उन्होंने इसे नाम दिया 'पिथेकेंथ्रोपस इरेक्टस' । 

यह जावा नामक स्थान पर मिला था इसीलिए इसे 'जावा मानव' भी कहते हैं । हालाँकि प्रारंभ में डॉ दुयुबुआ का भी बहुत विरोध हुआ लेकिन बाद में अन्य स्थानों पर भी इस तरह के मानव के अवशेष मिले । इस  मानव के खोपड़ी  के उपरी भाग, दाँत और जांघ की हड्डियों के आधार पर उसकी एक छवि का निर्माण किया गया । 

“ मतलब .. यह बताया गया कि हमारा यह पूर्वज दिखता कैसा था..हाँ यार कैसा दिखता होगा ?" अजय अब पानी से बाहर आ चुका था और तौलिया से अपना बदन पोछ रहा था । 

रवींद्र हँसने लगा …” बस तू अभी जैसा दिख रहा है वैसा ही दिखता होगा, नंग धड़ंग ।“ 

अजय ने फुर्ती से टॉवेल अपनी कमर के इर्द-गिर्द लपेटा .." कहाँ ..में तो जांघिया पहने हूँ यार ।" 

अजय की इस हरकत पर मुझे भी हँसी आ गई …”नहीं भाई ।“ मैंने हँसी दबाते हुए कहा “अजय तो दोनों पांवों पर सीधा खड़ा होने वाला सुन्दर दिखाई देने वाला मनुष्य है और आधुनिक मानव प्रजाति का है जो ज़्यादा नहीं बस चालीस हज़ार साल पुरानी है । यह आदिम मानव या जावा मानव हम लोगों से बिलकुल अलग दिखाई देता था । उसका ललाट हमसे बिलकुल अलग था, माथा चपटा था और कुछ नीचे की ओर था और दोनों आँखों के बीच हड्डी का एक पुल था । 

चेहरा अवश्य वानर जैसा था लेकिन मस्तक कुछ बड़ा था । विशेष बात यह कि वह पत्थर के औज़ार भी बनाना जानता था, भले ही उसे आग जलाना नहीं आता था लेकिन जंगल में पेड़ों के टकराने से प्राप्त आग को संरक्षित करना वह जान चुका था । पुरातत्ववेत्ताओं  को चीन की चोउ कोउ तियेन गुफा में इसके प्रमाण भी मिले हैं । “

 “ लेकिन वह खाता क्या था ?“ अजय ने अपने पिचके हुए पेट पर हाथ घुमाते हुए अगला सवाल किया  । मैं समझ गया कि नाश्ते का समय हो गया है और अजय को भूख लग रही है । 

मैंने कहा “ वही खाता था भाई जो उस समय उपलब्ध था जैसे कंदमूल, गिरीफल, मांस ,मछली और क्या.. लेकिन सबसे बड़ी विडम्बना तो यह थी कि वह ख़ुद भी कभी कभी शेर या बाघ जैसे हिंसक प्राणियों का भोजन बन जाता था । " 

"अरे ..यह तो हद है यार " अजय ने चौंकते हुए कहा " इतना बलिष्ठ था उस समय मनुष्य, अपनी आत्मरक्षा का उपाय तो उसे आता ही होगा ? कुछ तो करता ही होगा वह शेर से बचने के लिए ? “ 

"बिलकुल ठीक बोला भाई, तू तो ऐसे कह रहा है जैसे शेर सामने आते ही वह बन्दूक निकाल लेता होगा ।“ रवींद्र ने हँसते हुए कहा “ अच्छा बता शेर तेरे सामने आ जाये तो तू क्या करेगा ?" 

"में डेढ़ पसली का बेचारा आदमी, में क्या करूँगा भाईजान ।" अजय ने अपने दांत दिखाते हुए कहा " जो करना है शेर ही करेगा ।" 

" बरोब्बर बोला भाई " मैंने कहा " हमारे सामने भी शेर आ जाये तो हम कुछ नहीं कर सकते । हाँ लेकिन इस बीच एक क्रांति हो गई । एक दिन अचानक कोई लम्बी सी हड्डी, पेड़ की सूखी लकड़ी का एक टुकड़ा या एक डंडा उसके हाथ लग गया और..." 

" इसका उपयोग उसने शेर को भगाने के लिए किया ।" अजय ने तुरंत लपककर मेरी बात को कैच किया और उसे स्टंप की ओर उछाल दिया । "

 अरे बेवकूफ़.. " मैंने अपने माथे पर हाथ मारा " मामूली से डंडे से भी कहीं शेर भागेगा.. हाँ छोटे -मोटे सियार, कुत्ते, सांप आदि ज़रूर भाग जाते थे । प्रमुख रूप से इस डंडे का उपयोग उसने अपने भोजन हेतु कंद मूल प्राप्त करने अथवा पेड़ों की जड़े खोदने के लिए किया । वह उन लोगों की अपेक्षा अधिक सुविधाजनक स्थिति में था जो हाथ से खोदकर कंद-मूल निकालते थे । “

“ स्वाभाविक है, हाथ से कंद मूल खोदने या जड़ें खोदने के चक्कर में उसके हाथ लहुलुहान हो जाते होंगे ऐसे में यह डंडा उसकी बहुत मदद करता होगा । मतलब उन दिनों जिस आदमी के पास यह डंडा होता था वह सबसे अमीर आदमी होता होगा ।" 

रवींद्र ने बालों को सुखाते हुए कहा । "बिलकुल " मैंने रवींद्र की बात का समर्थन किया " आख़िर सिर्फ हाथ से जड़ें खोदने या कंदमूल खोदने वालों की तुलना में डंडे वाले इंसान की स्थिति तो बेहतर थी ही । " 

अजय ने अपने गीले वस्त्र उठाये और ऊपर की ओर जाने वाली घाट की सीढ़ी चढ़ते हुए कहा  “भाई , तुम्हारी अमीर आदमी वाली बात से मेरे दिमाग़ में एक ख़याल आ रहा है ..अपन ने वह दीवार पिक्चर देखी थी ना जिस में अमिताभ कहता है 

आज मेरे पास बिल्डिंग है, प्रॉपर्टी है, बैंक बैलेंस है, बंगला है, गाड़ी है तुम्हारे पास क्या है ..

इस पर शशिकपूर का डायलाग था ..मेरे पास माँ है । 

मान लो उन दिनों दीवार फिलीम बनती तो उसमें ऐसा डॉयलाग होता.. अमिताभ बच्चन  कहता, मेरे पास जंगल है, ज़मीन है, नदियाँ हैं, पहाड़ हैं, आसमान है, चांद सितारे हैं, क्या है तुम्हारे पास ? 

और इस पर शशि कपूर कहता … मेरे पास कंदमूल खोदने के लिए यह डंडा है मेरे भाई…।” पेट पकड़कर हँसने से भूख और ज़्यादा तेज़ हो गई थी ..मैं समझ गया अब हमें नाश्ते के लिए चल देना चाहिये ।


******************** 


आज नाश्ते में भाटी जी ने इडली सांभार बनाया था । “वाह ।“ राममिलन भैया ने कहा “हमरे इलाहाबाद में इसका स्वाद कोई नहीं जानता ।“ मैंने कहा “ऐसा नहीं है , इडली सांभार तो अब पूरी दुनिया में खाया जाने लगा है । “पूरी दुनिया में ?“ रवींद्र ने अविश्वास के साथ आश्चर्य व्यक्त किया । 

“अगर ऐसा है तो यह अच्छी बात है । मैं अक्सर सोचता हूँ कि इसकी खोज सबसे पहले किसने की होगी ?“ हम लोग आजकल इतने जिज्ञासु हो गए हैं कि हर वस्तु को देखकर उसके उद्भव और विकास के बारे में जानने की कोशिश करते हैं । 

“अब क्या पता ?“ मैंने कंधे उचकाते हुए कहा “दक्षिण में चावल अधिक होता है सो चावल के विविध व्यंजन बनाने की शुरुआत भी वहीं हुई होगी । किसने की यह तो मित्र बी मुरलीधर रेड्डी या सुब्बाराव से पूछना पड़ेगा । वैसे भी यह मनुष्य का स्वभाव है कि स्थानीय रूप से उपलब्ध वस्तुओं में वह अपना आहार ढूँढ लेता है । प्रारंभिक आहार तो गेहूँ, जौ और चावल जैसे अनाज ही हैं इन्हीसे फिर उसने विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाये होंगे ।" 

रवींद्र ने भोज्य पदार्थों के अतीत में छलांग लगाई । “आज हमें भोजन के लिए इतनी विविध वस्तुएँ उपलब्ध हैं लेकिन उस आदिम मनुष्य के बारे में सोचिये जिसके पास खाने के लिए बहुत कम वस्तुएँ उपलब्ध थीं और उसका पूरा समय अपने आहार की व्यवस्था में ही बीतता था ।“ 

“बिलकुल ।“ मैंने कहा । "हम आज ‘टाइम नहीं है’ इस जुमले का बार बार प्रयोग करते हैं, लेकिन सच पूछा जाए तो टाइम उस आदिम मनुष्य के पास नहीं था । प्रागैतिहासिक मानव सुबह से रात तक जंगलों में घूमा करता था और अपने व बच्चों के लिए भोजन जुटाता था । बहुत मुश्किलों और अनेक जानलेवा प्रयोगों के बाद उसने खाद्य व अखाद्य वस्तुओं में भेद करना सीखा । पता नहीं भोजन की तलाश में कितने मनुष्यों को अपनी जान गंवानी पड़ी होगी ।"

“लेकिन वह सब कुछ कच्चा कैसे खाता होगा भाई ?“ अजय ने चम्मच से गरम गरम सांभर मुँह में डालते हुए सवाल किया । “भई बताया तो था, उसे इस तरह पका पकाया खाना तो मिलता नहीं था, वह अपना पेट जंगल की बेर, गिरीफल, हरी टहनियाँ, पत्ते, कंदमूल, चूहे, घोंघे, कीड़े - मकोड़े, इल्लियाँ, चीटियाँ, मछलियाँ, छोटे मोटे जानवर और ऐसी ही जाने कितनी अल्लम-गल्लम चीज़ें खाकर भरता था ।“ 

" छी छी छी ..क्या गन्दी गन्दी चीज़ें खाता था यार ।" अजय ने कहा । मैंने अजय की प्लेट में इडली रखते हुए कहा “ और क्या कर सकता था वह ..भूख लगती तो जो भी सामने आता उसे खाने की कोशिश करता । इस चक्कर में कई बार ज़हरीली वस्तुएँ वनस्पति या कीट खाकर उसने प्राण भी गँवाए होंगे । 

हालाँकि खाने योग्य यह वस्तुएँ बहुत पोषक नहीं थीं और कई बार इनसे उसका पेट भी नहीं भरता था लेकिन मजबूरी में उसे यही सब खाना पड़ता था । 

"सही तो है ।" अजय ने इडली को साम्भर में डुबाया और नन्हे काक्रोच सी दिखाई देने वाली हरी धनिया की  एक पत्ती को सांभर से निकालकर बाहर फेंकते हुए कहा  "हम दिन भर में चाहे कितना कुछ अटर-सटर खा लें पेट तो दाल, चावल, सब्जी, रोटी से ही भरता है ।"  

“ फिर उसने खाद्य -अखाद्य में फर्क करना कैसे सीखा और बड़े पैमाने पर शिकार करना कब प्रारंभ किया ?“  अशोक ने सवाल किया । 

इस बीच आर्य सर वहाँ प्रवेश कर चुके थे और हमारी बातें सुन रहे थे । उन्होंने कहा “मनुष्य ने बड़े पैमाने पर शिकार तब प्रारंभ किया जब उसने शिकार हेतु उचित एवं पर्याप्त पत्थर के औज़ार और हथियार बना लिए । किसी भी बड़े जानवर के शिकार के लिए वह डंडा या हड्डी का टुकड़ा नाकाफ़ी था जिसका उपयोग वह पेड़ की जड़ें खोदने या कंदमूल खोदने के लिए करता था ।“ 

“लेकिन यह हथियार बनाने का ख्याल उसे कैसे आया और उसने यह हथियार कैसे बनाए ? “ अजय ने मेरी ओर इस अंदाज़ से देखा कि देखो डंडे वाली बात तो सर को भी मालूम है । 

“बताते हैं ।" आर्य सर ने कहा …” पहले ट्रेंच पर चलो, आज वैसे भी तुम लोगों के चक्कर में बहुत देर हो गई है । पता नहीं आजकल रात रात भर जागकर तुम लोग क्या करते रहते हो ,फिर देर से जागते हो और देर से ट्रेंच पर पहुंचते हो .." 

"कहाँ सर.." अशोक ने बचाव पक्ष के वकील की तरह ज़िरह शुरू की .." आज ही तो देर हुई है, रोज़ तो जल्दी ही सो जाते हैं ..कल तो शरद की अजंता एलोरा और मांडू की यात्रा कथा का अंतिम पाठ था ना इसलिए देर हो गई .. कल से बराबर समय पर जायेंगे ।" ठीक है ठीक है अभी तो चलो .." आर्य सर ने कहा "बाक़ी बातें चलते हुए .. वर्ना वाकणकर जी की डांट पड़ेगी ।"

*शरद कोकास*


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें