सोमवार, 1 जून 2026

48-चाचा चाचा कहानी सुनाओ ना


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

*पिछले भाग में आपने पढ़ा कि आदिम समय में विनिमय की क्या स्थिति थी , मनुष्य कैसे अपने उत्पादन का वितरण करता था साथ ही यह भी कि गाँव में हाट किस तरह होते थे । इस भाग में पढ़िए किस तरह विदेशियों ने भारत की खोज की और उसे किस तरह हमारे यहाँ के लोगों द्वारा लिया गया*

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*भाग 48*

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दंगवाड़ा का यह उत्खनन अब तक काफी प्रसिद्ध हो चुका है और इतिहास में रूचि रखने वाले देश -विदेश के कुछ शोध छात्र भी यहाँ पहुँचने लगे हैं । आज दोपहर के भोजन के समय ऐसे ही एक विदेशी छात्र से हमारी मुलाकात हुई । यह छात्र उत्तर भारत से भटकता हुआ यहाँ तक आ पहुँचा है  । अब इसे उसका दुर्भाग्य कहें या संयोग उसका सामना सबसे पहले  भारतीय संस्कृति के प्रेमी और विदेशी संस्कृति को गरियाने वाले राममिलन भैया से हुआ । उसने उनसे सवाल किया " हू डिस्कवर्ड दिस साईट?" राममिलन भैया ने जवाब दिया "हमका का मालूम ऊ हमरे सर हैं वही खोजे हैं ।" उसे कुछ समझ में नहीं आया । संयोग से आर्य साहब उसे मिल गए और वह उनसे बात करने लगा । 


साईट पर जाते हुए राममिलन भैया भुनभुनाये " ई देखो कोलम्बस का वंशज हमरे यहाँ आया है, जैसन कोलंबस ने डिस्कवर किया था अमरीका वैसन वो सोचता है । अरे हमरे यहाँ के लोग कुछ डिस्कवर नहीं कर सकते क्या ?" मैंने कहा " राममिलन भैया देश से बाहर तो सारी खोजें योरोप के लोगों ने ही की हैं इसलिए वह ऐसा सोचता होगा । उन्होंने ही अमरीका खोजा, आस्ट्रेलिया खोजा, मेक्सिको खोजा ।" "काहे?" राममिलन भैया विदेशियों की तारीफ़ सुनकर चिढ गए  "हमरे यहाँ वाकणकर सर ने भीमबैठका नहीं खोजा क्या ? और हड़प्पा मोहनजोदड़ो भी तो हमरे यहाँ के लोगों ने ही खोजा राखाल दास बैनर्जी सर ने ..नाम ऊ मार्शलवा का हुई गवा  ।" मैंने कहा "भाई हड़प्पा की प्रारम्भिक खोज भी तो अंग्रेजों के तत्वावधान में ही हुई । अब हमारे यहाँ तो हम खुद ही गुलाम थे । सो उन्होंने खोज के पश्चात जो लिख कर प्रस्तुत कर दिया वही हमें स्वीकारना पड़ा ।"


राममिलन भैया ने प्रतिवाद करते हुए कहा "वही तो ग़लती हुई न । अब जैसन वो बताये रहे वैसा ही हम मान लिए ।वो कहे रहे कि आर्य योरोप से आये तो हम मान लिए । वो कहे रहे कि हम जंगली थे और उन्होंने हमें सभ्य बनाया तो वो भी हम चुपैचाप मान लिए । ऐसा होता है कहीं ? हम गुलाम थे तो इसका ये मतलब तो नहीं कि सब मान जाते और अभी तक हम उन्हीका कहा मान रहे हैं ..यह ठीक बात नहीं है ।" राममिलन भैया गुस्से में ज़रूर कह रहे थे लेकिन ठीक बात कह रहे थे । "चलो चलो ट्रेंच पर पहुँचना है काम में देरी हो रही है ।"  आर्य साहब उस छात्र के साथ हम लोगों तक पहुँच गए थे । अब उस विदेशी छात्र की उपस्थिति में तो कुछ भी कहना असंभव था सो हम लोग इस विषय को रात्रिकालीन सत्र के लिए स्थगित कर ट्रेंच की ओर बढ़ लिए ।


शाम को काम समाप्त करने के पश्चात हम लोगों का विचार था कि उस विदेशी छात्र को घेरकर बैठा जाए और उसके साथ अपनी टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में बातें कर उसका मज़ा लिया जाए लेकिन वह जल्दी में था और पूरे समय आर्य सर के साथ था इसलिए हम अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पाए । शाम को फिर हम लोग गाँव की ओर निकल गए । लौटकर देखा तो वह जा चुका था ।


भोजन के उपरांत हम लोग तम्बू में आ गए हमारे आज के हीरो राममिलन भैया थे सो बात उन्हीं के कथन  से प्रारंभ हुई । "यार कुछ भी कहो राममिलन भैया ठीक कह रहे थे ।" अजय ने कहा । अशोक ने भी उनकी बात का समर्थन करते हुए कहा "सही बात है हम कब तक इन विदेशियों के गौरवगान से स्वयं को अपमानित और तुच्छ महसूस करते रहेंगे । सभ्य तो हम लोग भी योरोप के लोगों से पहले हुए हैं । एक समृद्ध परम्परा हमारे यहाँ रही है लेकिन योरोपीय पद्धति से हमारा इतिहास नहीं लिखा गया इसलिए योरोप के लोग हमें असभ्य मानते रहे  । जहाँ तक देश खोजने की बात है तब तक योरोपीय सभ्यताएँ भी इतनी विकसित हो चुकी थीं लेकिन उनके पास जहाजी बेड़े थे सो उन लोगों ने समुद्र के मार्ग से कई द्वीप खोज निकाले ।" 


'इसीलिए तो हम लोगों को अंग्रेज़ी ग्रामर में अभी भी पढ़ना पड़ता है ..कोलंबस डिस्कवर्ड अमेरिका, अमेरिका वास डिस्कवर्ड बाय कोलम्बस .." अजय ने कहा । "लेकिन हमका ई बताओ " राममिलन भैया आज फुल फॉर्म में थे  "जब ऊ कोलम्बस अमरीका पहुँचा तो अमरिका तो पहले से ही वहाँ था ना ? लोग भी वहाँ पहले से रहते थे, फिर उसने नया क्या खोजा ? जैसे कि वास्कोडिगामा के भारत आने से पहले भी भारत तो यहीं था ?"  मैंने कहा " बड़े भैया, बात तो तुम्हारी सही है लेकिन उस समय योरोपवासियों को यह कहाँ पता था कि उनके अलावा भी दुनिया में ऐसे भूभाग हैं जहाँ मनुष्य रहते हैं । वे तो यूरोप में ही पैदा हुए थे और वहीं सभ्य हुए थे । इसलिए जहाजी बेड़ों द्वारा जब वे लोग वहाँ पहुँचे तो उन्होंने देखा कि वहाँ नितांत पिछड़े हुए लोग हैं जबकि वे लोग खुद भी कई पीढ़ियों तक उस पिछड़ेपन से गुजरने के बाद ही सभ्यता की उस स्टेज तक पहुँचे थे । उन्होंने देखा कि उनके रहनसहन का तरीका बड़ा अजीब है,कपड़े भी ढंग के नहीं हैं, उनके पास वही पुराने चकमक के औजार हैं, वे लोग अभी भी शिकारी अवस्था में हैं और खेती के नाम पर कद्दू ,मक्का जैसे कुछ गिने चुने अनाज ही उनके पास हैं ।"


"लेकिन मैक्सिको में तो उस वक्त सोने की खदाने थी ना ? बहुत देर बाद रवीन्द्र की आवाज़ सुनाई दी । "हाँ ।" मैंने कहा " दक्षिण में जो आदिवासी रहते थे उनके पास ताम्बे के औजार अवश्य थे लेकिन सोने का पता उन्होंने लगा लिया था । यद्यपि सोने का महत्व वे नहीं जानते थे । इस चमकदार धातु के वे गहने बनाते थे । उनकी स्त्रियाँ नथ हंसुली जैसे आभूषण धारण करती थीं । इसलिए जब कोलम्बस के जहाजियों ने उन्हें सोने से लदे देखा तो वे ख़ुशी से उछल पड़े । उन्होंने उन आदिवासियों को कांच के टुकड़े दिए, सिगरेट के डिब्बे दिए और उनके बदले उनसे सोना ले लिया । "यह तो गलत है भाई, धोखा है ।" अजय ने कहा । "हाँ धोखा तो है ।" मैंने कहा  "लेकिन ऐसा तो अब भी होता है । हमारे यहाँ भी बस्तर जैसे आदिवासी क्षेत्रों में सभ्य समाज के जो लोग जाते हैं वे लोग वहाँ की महंगी वनोपज को बिलकुल सस्ते दाम में ले लेते हैं । जैसे शुरुआत में तो लोगों ने एक सेर नमक के बदले एक सेर चिरौंजी ले ली और उसे शहर में महंगे दामों में बेच दिया ।"


"ऐसे ही उन्होंने अमेरिका में भी किया । अमरीका का हाल यह था कि वहाँ के लोग आदिम अवस्था में थे ।  वे लकड़ी के सामूहिक घरों में पुरे कुनबे के साथ रहते थे । ज़मीन पर सबका सामूहिक स्वामित्व था । कोई दास नहीं था न कोई मालिक । सब लोग वस्तुओं का सामूहिक उपभोग करते थे जबकि योरोप उस समय संपत्ति का कानून बना चुका था । वहाँ कोई दूसरे की वस्तु न इस्तेमाल कर सकता था न चुरा सकता था अगर ऐसा करता तो उसे सजा दी जाती थी । लेकिन आदिम समाज में एक स्वतन्त्र व्यवस्था थी यहाँ न कोई चोर था न कोई थानेदार,  न किसी के पास कोई निजी संपत्ति थी बल्कि सारी संपत्ति कबीले की सामूहिक संपत्ति समझी जाती थी ।  उस वक़्त योरोप में राजतन्त्र था जिसमें राज्य के प्रमुख राजा रानी होते थे, राजकुमार होते थे जनता के बीच भी उनकी आर्थिक स्थिति के अनुसार नौकर और मालिकों जैसे लोग थे । धनाढ्य लोग अपनी सेवा के लिए नौकर रखते थे । लेकिन कबीलों में राजतन्त्र जैसा कुछ नहीं था इसलिए यहाँ ऐसा कोई राजा न था हाँ कबीले के सरदार ज़रूर थे जिन्हें उनकी योग्यता के अनुसार चुना जाता था लेकिन वे कबीले के मालिक नहीं थे । एक तरह से वे कबीले के जनप्रतिनिधि हुआ करते थे ।"


अजय ने कहा "जनप्रतिनिधि तो हमरे यहाँ भी होते हैं भैया लेकिन वे देश के सेवक नहीं बल्कि खुद को मालिक ही समझते हैं और खुद के बाद विरासत में यह देश अपनी औलादों  को सौंप देते हैं ।" "हाँ ।"  मैंने कहा " योरोप सहित सभी जगहों में उस समय भी ऐसा ही था । राजा राष्ट्र का प्रमुख होता था वही न्याय भी करता था और उसे प्रजा को दण्ड देने का अधिकार होता था । राजा के बाद उसकी संतान राज्य की मालिक होती थी । हमारे यहाँ भी उस समय ऐसे ही राजवंश चला करते थे । लेकिन अमेरिका के और आस्ट्रेलिया के उन आदिवासियों की दुनिया इनसे बिलकुल अलग थी वहाँ अभी भी मातृसत्तात्मक व्यवस्था चल रही थी । उनके घरों में स्त्रियाँ घर की प्रमुख हुआ करती थीं । बेटी विवाह के बाद पति को अपने घर लेकर आती थी जबकि पितृसत्ता वाली अनेक सभ्यताओं में बेटा विवाह के उपरांत अपनी पत्नी को घर लेकर आता था ।"


"भाई यह कैसे होता होगा ?" राममिलन भैया ने सवाल किया । "संसार में  अब तक तो यही हुआ है कि बेटे ही बहू को ब्याहकर लाये हैं, मतलब उस समय सब घर जमाई हुआ करते थे ।" "हाँ कहने को ऐसा कह सकते हैं ।"  मैंने कहा " लेकिन घर जमाई जैसा विचार उनकी परंपरा में था । सभ्य समाज में भी शुरुआत में ऐसा ही रहा होगा लेकिन बाद में औरत पर घर की ज़िम्मेदारी लाद दी गई और पुरुष को आर्थिक उपार्जन के लिए बाध्य किया गया जबकि उस प्राचीन आदिम समाज में स्त्रियाँ घर की व्यवस्था भी करती थीं और शिकार पशुपालन और खेती का काम भी करती थीं । वहाँ पति अपने कबीले या कुल से आता था । उसके कबीले का नाम उनके टोटेम देवता या टोटेम पशु जैसे भालू , खरगोश या शेर के नाम पर  हो सकता था जो उसके नाम से जुड़ा होता था और शादी के बाद भी वही नाम रहता था लेकिन माँ के कबीले का नाम अगर हिरण कबीला होता तो बच्चों को हिरण कबीले के नाम से ही जाना जाता था । 


"हमें लगता है यह बाघ ,कश्यप जैसे सरनेम ऐसे ही आये होंगे " राममिलन भैया ने कहा । " हाँ ऐसा हो सकता है ।" मैंने कहा " योरोप और अन्य देशों में बच्चे का नाम के साथ पिता का नाम जुड़ा होता था लेकिन मातृसत्तात्मक समाज में बच्चों के साथ उनकी माता का नाम जुड़ता था । स्त्रियों के पास असीमित अधिकार होते थे और अगर वे अपने पति से नाराज़ हो जाएँ तो उसे घर से निकाल भी सकती थीं और उन्हें बोरिया बिस्तर बांधकर घर से बाहर निकलना पड़ता था । यह एक स्वयं स्थापित व्यवस्था थी । स्त्रियों का बहुत सम्मान था । कबीले के सरदार भी उन्हीं की मर्ज़ी से चुने जाते थे और उन्हें बदलकर नया सरदार रखने का भी अधिकार उन्हीं के पास था । योरोप के लोगों ने जब यह देखा तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ उन्होंने इस मातृसत्तात्मक व्यवस्था को उनकी असभ्यता माना जबकि उनके भी पूर्वज इसी अवस्था से गुजर चुके थे । अफ़सोस यही कि यह योरोप के निवासी अपना इतिहास भूल चुके थे । "


"अच्छा हुआ भैया हम ऐसे समाज में पैदा नहीं हुए वर्ना .."  अजय ने कहा ।  " वर्ना क्या " रवीन्द्र ने चुटकी लेते हुए कहा " तेरे बच्चों के साथ भी भाभी का नाम जुड़ जाता ।" "क्या रवींद्र भैया " अजय ने झेंपते हुए कहा " अभी बच्चे पैदा तो होने दो ।" " हो जायेंगे भाई धीरज धर । " रवीन्द्र ने कहा "पहले पढ़-लिख कर कुछ कमाने लायक बन जा फिर बच्चों की सोचना वर्ना तेरे यहाँ भी मातृसत्तात्मक समाज ही चलेगा ..बच्चों को भाभी संभालेगी और तुझे घर से निकाल दिया जाएगा ।" " तो क्या हुआ मैं तुम्हारे यहाँ आ जाऊंगा , तुम्हारे बच्चों को कहानियां सुनाऊंगा, बच्चे मुझसे कहेंगे चाचा चाचा कहानी सुनाओ ना । " अजय ने हँसते हुए कहा । "लो आ गया भाई शोले का अमिताभ बच्चन ।" अशोक ने कहा । "चलो बच्चों..." रवींद्र ने कहा " आज की कहानी तो हमने शरद चाचा से सुन ली अब सब लोग ओढ़ आढ़ कर सो जाओ ।" 


*शरद कोकास*



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