सोमवार, 1 जून 2026

44-पूछ मेरा क्या नाव रे नदी किनारे गाँव रे


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼


*पिछले भाग में आपने मनुष्य की पशुपालन अवस्था के बारे में किस तरह वह जंगलों से जीवित जानवर पकड़ लाता था और उन्हें पालता था उन्हें मारकर खा जाने की अपेक्षा उन्हें पालने में उसे क्या लाभ था।  इस भाग में पढ़िए कि झीलों के किनारे बस्ती कैसे बसी , वहाँ क्या क्या कठिनाइयाँ थीं , इस तरह से आग लग जाने पर सब कुछ नष्ट हो जाता था यह रोचक वर्णन आपको पसंद आएगा*

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*भाग 44*

*पूछ मेरा क्या नाव रे नदी किनारे गाँव रे* 

आज सुबह हम लोग और दिनों की अपेक्षा जल्दी जाग गए थे । इतनी सुबह, सुबह और अधिक सुहावनी लग रही थी । मैं और रवींद्र काफी देर तक फुर्सत में पत्थरों पर बैठकर चम्बल की बहती धारा को देखते रहे । लहरों को देखते हुए हम अक्सर एक खेल खेलते हैं ..किसी एक लहर पर नज़र जमा लेते हैं और उसे तब तक देखते रहते हैं जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो जाती । बहते हुए पानी को देखने का यह सुख व्यतीत होते हुए जीवन को देखने की तरह होता है । हम समय  के किसी टुकड़े को तब तक ही देख पाते हैं जब तक वह हमारे सामने रहता है, कुछ देर बाद जब समय का एक नया खण्ड हमारे सामने उपस्थित हो जाता है और हम पिछले समय को भूल जाते हैं । 


चम्बल के जल के साथ यह खेल खेलते हुए हम उसकी आवाज़ सुनने की कोशिश कर रहे थे  । लेकिन आज उसका बहाव इतना शांत था कि कोई आवाज़ हमें सुनाई नहीं दे रही थी । वैसे भी जाने कितने हादसों का दुःख अपने भीतर समेटे चम्बल अन्य दिनों की अपेक्षा बसंत के इस मौसम में बहुत शांत बहा करती है । हम लोग उसकी लहरों की ओर देखते हुए उसके जल में उस इन्सान का अक्स ढूँढने की कोशिश करते रहे जो सदियों पहले यहाँ रहता था जिसके लिए यह नदी ही सब कुछ थी हालाँकि हमें पता था कि उनके सुख-दुःख का गवाह वह जल तो जाने कबका बह चुका होगा । 


आज घाट पर रवींद्र ने कहा "तुझे पता है शरद, चम्बल के बारे में एक किंवदंती है कि अपने अपमान से क्रुद्ध होकर द्रौपदी ने इसे शाप दिया था कि जो भी इस नदी का पानी उपयोग में लायेगा उसका अनिष्ट होगा ।" हम पुरातत्ववेत्ताओं का ऐसी किंवदंतियों और पुराणकथाओं से अक्सर सामना होता है । मैंने रवींद्र की बात को यथार्थ की कसौटी पर कसते हुए कहा " यह तो नदी किनारे बसने वाली बस्तियों के लोगों की नियति है, वे जल का उपयोग करें न करें बाढ़ आयेगी तो उन्हें डूबना ही होगा । हाँ पानी पीने मात्र से किसी का अनिष्ट हो ऐसा नहीं होता जब तक वह दूषित जल न हो ।" 


"किंवदंतियों का क्या है वे तो बनती बिगड़ती रहती हैं ।" रवींद्र ने कहा ” हाँ,मनुष्य के भोजन की आवश्यकता ने उसे नदियों के किनारे बस्ती बसाने को विवश किया । भले ही कुछ समय के लिए वह यह जगह छोड़ कर चला गया हो लेकिन कुछ समय बाद फिर आकर बस गया । इसीलिए प्राकृतिक विपदाओं में बस्तियाँ नष्ट हो जाने के बावज़ूद भी हम देखते ही हैं कि अधिकांश बस्तियाँ तो नदियों के किनारे ही बसीं, और फलती फूलती रहीं । वैसे मुझे लगता है नदियों के किनारे आवास बनाने के बारे में प्रागैतिहासिक मनुष्य का भोजन के बारे में ही मुख्य कॉन्सेप्ट रहा होगा ? “ 


“हाँ यह तो था ।” मैंने कहा ” गुफाओं से बाहर की दुनिया में जब वह आहार के लिए शिकार की तलाश कर रहा था तो उसने अनुभव किया कि मछलियाँ और जल में रहने वाले अन्य जीव उसके लिए बहुत बढिया आहार साबित हो सकते हैं, इसी आकर्षण में उसने नदियों के किनारे रहना प्रारंभ किया । यद्यपि यहाँ परेशानियाँ अधिक थीं । प्रतिवर्ष आनेवाली बाढ़ उसका सब कुछ बहा ले जाती थी और उसे किनारे के पेड़ों पर चढ़कर अपनी जान बचानी पड़ती थी । लेकिन कालांतर में उसने इस विपदा पर भी विजय प्राप्त कर ली । सबसे पहले उसने नदी के पास किसी ऊँचे टीले पर अपना मकान बनाया लेकिन जब वहाँ तक भी बाढ़ का पानी आने लगा तो उसे एक उपाय सूझा ।" "वह ज़रूर नदी से काफी दूर किसी टीले पर रहने चला गया होगा ।" रवींद्र ने अनुमान लगाया । 


"नहीं " मैंने रवींद्र की बात में आंशिक परिवर्तन किया " वह नदी से दूर कहाँ जा सकता था ,उस समय परिवहन के साधन तो नहीं थे और फिर बाढ़ का भी कोई भरोसा नहीं था वह निचले स्थानों पर दूर तक भी पहुँच सकती थी जबकि ऊँचे स्थान पर अधिक सुरक्षा थी ।  इसलिए उसने अपने आवास इन्ही टीलों पर बनाये लेकिन उसे सतह से काफी ऊँचा कर लिया । इस तरह के आवास के निर्माण के लिए उसने सर्वप्रथम  पेड़ काटे ,उन्हें  आड़ा और खड़ा एक दूसरे पर रखा और लताओं से बांधकर एक ऊँचा मचान जैसा बना लिया और इस तरह बाढ़ से अपनी रक्षा की । हालाँकि कालान्तर में नदियों के रास्ता बदलने से और बाढ़ के आधिक्य से यह बस्तियाँ भी नष्ट हो गईं ।


"इसका मतलब यदि नदियों का उत्खनन किया जाए तो उनके नीचे भी कई बस्तियाँ मिलेंगी ?" रवीन्द्र ने एक पुरातत्ववेत्ता की तरह सवाल किया । " हाँ, ऐसा हो तो सकता है ।" मैंने कहा "लेकिन सामान्यतः तेज़  बहाव के कारण एक ओर की ज़मीन को काटते हुए नदियाँ अपनी राह बदलती हैं और कुछ वर्षों पश्चात् अपना पूर्व निर्धारित मार्ग बदलकर फिर नए मार्ग से बहने लगती हैं । उनके किनारे पूर्व में जो बस्तियाँ बसी होती हैं वे तो गाद और मिटटी से बने टीलों के नीचे दबी मिल जाती हैं । लेकिन अभी वर्तमान में जिस मार्ग पर नदियाँ बह रही हैं उनके नीचे इसलिए बस्ती होना ज़रा मुश्किल है क्योंकि एक तरह से यह उनके लिए नया मार्ग है । लेकिन पुरातत्ववेत्ताओं को ऐसी झीलें और तालाब अवश्य मिले हैं जिनके नीचे गाँव बसे थे । " 



" गज़ब यार, ऐसा भी कहीं मिला है क्या ?" रवीन्द्र को मेरी बात पर सहसा विश्वास नहीं हुआ । "हाँ । " मैंने कहा । "मैंने कहीं पढ़ा था कि सन अठारह सौ त्रेपन में जब स्विट्ज़रलैंड में सूखा पड़ा था तो अनेक झील और तालाब सूख  गए थे । उनके नीचे बस्तियाँ मिली थीं । चलो तुम्हे पूरा किस्सा सुनाता हूँ ...ज्यूरिख झील के निकट आबेरमाइलेन  नाम का एक नगर था । सूखे की वज़ह से जब वहाँ की झील सूख गई तो वहाँ के लोगों ने सोचा कि झील की जगह तो अब ज़मीन हो गई  है सो क्यों ना उसका एक हिस्सा हथिया लिया जाए ।" 



"अरे ! ऐसा है क्या, हम सोचते थे कि हमारे देश में ही अनाधिकृत कब्ज़ा करने वाले लोग हैं ।" अजय जाने कब अपनी सुबह की आतिशबाज़ी निपटाकर हम लोगों के क़रीब आकर बैठ गया था । मैंने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा " भाई मैं सवा सौ साल से भी पहले की कहानी सुना रहा हूँ । उस समय हमारे देश में अंग्रेजों का शासन था अनाधिकृत कब्ज़ा तो वे लोग किये हुए थे । " रवीन्द्र ने अजय को चुप कराते हुए कहा " तू चुप रह यार, बात को कहाँ से कहाँ जोड़ देता है ,यह शरद कितनी महत्वपूर्ण बात बता रहा है ,ध्यान से सुन एग्जाम में काम आयेगी .. हाँ शरद ..तू बता फिर क्या हुआ ?" मैंने देख लिया था कि दोनों आगे की बात जानने को उत्सुक थे । "लेकिन इस तरह कब्ज़ा करने के लिए ज़रूरी था कि  शेष झील को ज़मीन से अलग कर दिया जाये क्योंकि झील के एक बड़े हिस्से में पानी तो था ही । सो इसके लिए झील और ज़मीन के बीच एक स्टॉप डैम बनाना ज़रूरी था वर्ना बारिश में झील भर जाती और उनकी बस्तियाँ डूब जातीं ।" 


"बस लोगों ने इस काम के लिए झील की सतह से ही मिटटी खोदनी शुरू कर दी । जाने कितनी ठेला गाड़ियाँ इस काम के लिए लगाई  गईं । फिर अचानक एक दिन ऐसा हुआ कि मिटटी  खोदते हुए एक व्यक्ति को सबसे पहले लकड़ी की एक बल्ली मिली, फिर उसने आगे खोदना शुरू किया तो और बल्लियाँ मिली और फिर जैसे जैसे वह खोदता गया मिटटी के साथ कई टूटे फूटे बर्तन , मछली पकड़ने के हड्डियों से बने कांटे, चकमक पत्थर के बने औज़ार, पत्थर के कुल्हाड़े, बर्छियां इत्यादि मिलने लगे ।" दोनों बहुत ध्यान से मेरी बात सुन रहे थे ।


"बस फिर क्या था, जैसे ही वहाँ के पुरातत्ववेत्ताओं को खबर मिली वे तत्काल वहाँ पहुँच गए और यह अवैध खुदाई रुकवाकर उस स्थान को अपने कब्ज़े में ले लिया ।" "मतलब लोगों का कब्ज़ा जमाने का प्लान फेल हो गया । हमारे यहाँ तो पुलिस भी यह काम नहीं रुकवा सकती बेचारे पुरातत्ववेत्ताओं की क्या औकात । " अजय ने कहा । "हाँ,बिलकुल ।" मैंने कहा । " राज्य ने फिर वह काम अपने हाथ में ले लिया और पुरातत्ववेत्ताओं को सौंप दिया ।आगे जब वहाँ विधिवत उत्खनन हुआ तो उन्हें उस बस्ती की संरचना मिली जो बरसों पहले झील में डूब गई थी । इसमें सबसे ऊपरी पहली परत तो रेत की थी फिर उसके नीचे गाद की एक परत थी जिसमें मनुष्यों के वहाँ रहने के ढेरों प्रमाण मौज़ूद थे,  जिनमें उनके औज़ार थे, घरेलू सामान थे । गाद की परत के नीचे फिर एक रेत की परत थी और उसे पार कर जैसे ही वे उसके नीचे पहुँचे फिर एक गाद की परत मिली जिसमे मनुष्यों के आवास के चिन्ह थे, इसके अलावा एक परत जले हुए कोयले की भी उन्हें मिली  ।"


"एक मिनट एक मिनट .." अजय ने मुझे रोकते हुए कहा .." इतना फास्ट नहीं भाई , पहले ज़रा हिसाब लगा लेने दो। अजय ने अपनी बाईं हथेली को इस तरह अपने सामने रखा कि चारों उँगलियाँ आँखों के सामने आ गईं फिर उसने पहली उंगली पर हाथ रखकर कहा "सबसे ऊपरी यानि पहली परत रेत की, फिर उसके नीचे दूसरी परत गाद मिटटी की ,फिर उसके नीचे तीसरी परत फिर रेत की ,फिर उसके नीचे चौथी परत फिर गाद की... मतलब वहाँ दो बार अलग अलग काल में बस्तियाँ बसी और दो बार डूब गई ।" रवींद्र ने ताली बजाते हुए कहा .."भाई, अब हमारा अजय पक्का पुरातत्ववेत्ता बन गया है । अजय अपनी जगह से उठा  और रवींद्र के सामने आकर उसे झुककर प्रणाम किया ।


"खुश रहो ।" रवीन्द्र ने उसके सर पर हाथ रखकर कहा .." पंडित भारद्वाज का आशीर्वाद तुम्हारे साथ है । चल भाई आगे सुना ।" मैंने नकार में हाथ हिलाते हुए कहा  .." नहीं.. अभी यह पक्का पुरातत्ववेत्ता नहीं हुआ है क्योंकि कोयले की परत के बारे में इसने कुछ नहीं कहा ।" अजय आँखें फाड़कर मेरी ओर देखने लगा । मैंने कहा "कोई बात नहीं , उन पुरातत्ववेत्ताओं  के सामने भी यही प्रश्न था कि उपरी परत पर रेत मिलना और गाद में मनुष्यों के आवास के अवशेष मिलना तो स्वाभाविक है अर्थात वहाँ बस्ती होने के लक्षण हैं लेकिन वह कोयले की परत कैसे आई ? पुरातत्ववेत्ताओं ने अध्ययन किया और पाया कि पहले लोग झील पर आये और ठीक किनारे पर बस्ती बसाई । फिर जब झील में पानी बढ़ा तो वह बस्ती डूब गई । यह गाद की परत उसी की थी । फिर लोग कुछ दिनों के लिए थोड़ा दूर सरक गए, फिर कुछ समय बाद सूखा पड़ा तो लोगों ने फिर किनारे पर बस्ती बसा ली मतलब दोबारा वहाँ बस गए ।


रवींद्र ने कहा "मतलब इस तरह झील और मनुष्य के बीच युद्ध चलता रहा ।" हाँ ।" मैंने कहा "इस युद्ध में  कभी  झील की जीत होती तो कभी मनुष्य की । अंत में हुआ यह कि लोग इस युद्ध से ऊब गए क्योंकि झील ने भी अपनी हार नहीं मानी थी और मनुष्य भी झील से हार नहीं मानना चाहता था सो उन्होंने झील के किनारे मकान न बनाकर ठीक झील के ऊपर पानी की सतह पर मकान बनाने शुरू कर दिए ।" " यह कैसे हुआ होगा ?"  अजय का सवाल स्वाभाविक था । रवीन्द्र ने कहा "सिंपल है यार, जब गर्मियों में झील सूख गई होगी तो उन्होंने झील की मिटटी में ही लम्बी लम्बी बल्लियाँ गाड़ी होंगी और उन पर मचान की तरह मकान बना लिए होंगे हम जिस तरह नदी का पानी कम होने पर उस पर पुल बनाते हैं उसी तरह ।" 


"अरे वाह, मतलब वेनिस शहर की तरह पानी के ऊपर बस्ती ।" अजय ने खुश होकर कहा । "वैरी गुड  ।" रवीन्द्र ने अजय की पीठ थपथपाते हुए कहा " तेरे वैश्विक ज्ञान की दाद देता हूँ कि तुझे वेनिस याद आया, वैसे हमारे यहाँ कश्मीर में भी इस तरह के मकान देखने को मिलते हैं ।" "लेकिन यार, वे तो पानी पर तैरते मकान हैं.."अजय ने कहा  "यानि शिकारे या हाउस बोट, यह मचान पर बने मकान तो स्थिर ही रहते होंगे ना ।" "हाँ ।" मैंने कहा । "यह मकान स्थिर ही थे यहाँ तक कि मनुष्य मचान पर बनी पटियों की झिर्रियों से नीचे पानी भी देख सकता था ।"  "वो तो सब ठीक है भैया ..." राममिलन भैया जो कुछ देर पहले ही हम लोगों की मजलिस में आकर बैठे थे और ध्यान से हमारी बातें सुन रहे थे कहने लगे .."वो अपने मकान का सेप्टिक टैंक कहाँ बनाता होगा ? " मैंने हँसते हुए कहा " टैंक बनाने की क्या ज़रूरत थी , पूरी झील ही उनका सेप्टिक टैंक थी ।" "हे प्रभु !" राममिलन भैया ने कहा । "मतलब उसी पानी को पीना उसी में नहाना और उसी में ....शिव शिव शिव शिव ...!" 


राममिलन भैया की बात पर जोर का ठहाका लगा । मैंने बात आगे बढ़ाई " भाई, वे भी तुम्हारी तरह मचान से उतारकर आसपास पिरामिड जैसी कोई चट्टान ढूँढते होंगे ..खैर जो भी हो, इस हिकमत से वे अपने घरों को पानी में डूबने से बचा सकते थे ..वर्षा के आधिक्य से पानी चाहे जितना ऊपर उठ जाए उनके मकान पानी से ऊपर ही रहते थे, वैसे यह इंजीनियरिंग भी कमाल की थी लेकिन इसमें भी एक मुश्किल थी, वे पानी से तो बच सकते थे लेकिन आग से नहीं बच सकते थे । अगर आग लग जाए तो बस्ती के जलकर ख़ाक हो जाने के अलावा कुछ नहीं हो सकता था । 


"अरे क्यों नहीं हो सकता था .." अजय मस्ती के मूड में था  "पम्प लगाते और नीचे का पानी ऊपर खींच लेते और फायर ब्रिग्रेड की तरह आग बुझा देते ।  "बहुत बढ़िया.." रवीन्द्र ने कहा " तू तो ऐसे कह रहा है जैसे उस ज़माने में तेरे बाप-दादों ने बिजली और पम्प का आविष्कार कर लिया था ।" "पता है भाई.." अजय ने कंधे उचकाते हुए कहा .."मी तो मजाक कर रिया था ।" मैंने कहा " हाँ, बस ऐसे ही एक बार आग ने भी उन लोगों के साथ भयानक मजाक कर डाला यानि मचान बना कर झील के ऊपर रहने वालों को और उनकी बस्ती को जलाकर राख कर दिया । वह जो कोयले की परत मिली थी वह उसी अग्निकांड की थी ।"


"मतलब इससे अच्छे तो उनके पूर्वज थे जो गुफाओं में रहते थे, गुफा की दीवारें तो पत्थर की थीं सो वहाँ आग लगाने का कोई चांस ही नहीं था ।" रवीन्द्र ने कहा । " हाँ ।" मैंने कहा "यह उनके लिए दुर्भाग्यपूर्ण तो था लेकिन इस आग से एक फ़ायदा हुआ कि वे वस्तुएँ जो लकड़ी आदि की बनी थीं इस आग में सुरक्षित रह गईं ।" "ज़रूर वे लोग पूजा पाठ करते होंगे इसलिए आग में भी लकड़ी नहीं जलीं जैसे कि हमारे भक्त प्रहलाद का आग ने कुछ नहीं बिगाड़ा था ।" राममिलन भैया ने तुरंत कहा । मैंने कहा "पंडित जी, पूरी बात तो सुन लो, यह वस्तुएँ आग में जली नहीं थीं बल्कि झुलस गईं थीं और उन की बाहरी सतह पर आंच के कारण कोयले की हलकी सी परत चढ़ गई .. जिन बल्लियों की बात मैंने शुरू में की थी उनके हज़ारों साल पानी में पड़े रहने के बावजूद न सड़ पाने का यही कारण था कि कोयले का पानी में कुछ नहीं होता वह बरसों बाद भी जस का तस रहता है । सो यह लकड़ी भी कोयले की परत की वज़ह से बची रह गई " 


"गजब यार.." अजय ने उछलकर कहा  "मैं शुरू में ही पूछने वाला था कि पुरातत्ववेत्ताओं को पानी में साबुत बल्लियाँ कैसे मिलीं, जबकि लकड़ियाँ तो पानी में सड़ जाती हैं ।" किशोर भैया भी इस बीच पहुँच गए थे उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा "तेरे में यही तो गड़बड़ है कि तू सही टाइम पर सवाल नहीं करता .. पता नहीं बीबी के साथ कैसे क्या करता होगा "  "देखो किशोर भैया..." अजय ने किंचित नाराज़ होते हुए कहा "अब मेरी पोल मत खोलो , मैंने तुमको कभी कुछ कहा क्या ?"  किशोर भैया बोले "हम भी कहाँ कुछ कह रहे हैं तुम अपनी पोल खुद ही खोल रहे हो ।" बस इसके बाद झील का किस्सा समाप्त हुआ और हम लोगों ने जल्दी जल्दी स्नान किया और अपने गीले वस्त्र आभूषण लेकर शिविर की ओर वापस लौट आये ।

        

*शरद कोकास*


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