सोमवार, 1 जून 2026

51-बरसों बाद का उपसंहार डायरी की अंतिम किश्त


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼


*वस्तुतः यह कोई भाग नहीं है ...यह बरसों बाद लिखा गया उपसंहार है। यह उपसंहार भी वस्तुतः उपसंहार नहीं है क्योंकि डायरी का कोई उपसंहार नहीं होता वह हमारे जीवन में हमारे जीवन के साथ साथ चलती है। बस यह समझ लीजिये कि उत्खनन कैम्प से आने के बाद डायरी का वह हिस्सा ख़त्म हो गया और जीवन के दूसरे हिस्से की डायरी शुरू हो गई जिसमे नौकरी के लिए जद्दोज़हद थी , कुछ ख़्वाब थे , आशाएं थी । वे ख़्वाब भी पूरे हुए ।मेरी नौकरी लग गई । लेकिन वह नौकरी पुरातत्व विभाग में नहीं लगी बल्कि स्टेट बैंक में लग गई। मेरा पी एच डी का ख़्वाब भी पूरा नहीं हो पाया , शायद यही एक टीस थी इस डायरी को आप सबके सामने लाने की ..खैर अपना रोना छोड़ता हूँ ..उसके आगे का यह उपसंहार पढ़ ही लीजिये आपको यह डायरी कैसी लगी इस बात का भी इंतज़ार रहेगा ।*

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*भाग 51*

*बरसों बाद का उपसंहार* 

उत्खनन से लौटने के पश्चात प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व की स्नातकोत्तर कक्षा की फाइनल एग्जाम हमारे सर पर थी । हम लोग जी जान से परीक्षा की तैयारी में जुट गए । परीक्षाएँ समाप्त हुईं और फिर परिणाम भी घोषित हो गए । मेरा शोध प्रबंध जंच नहीं पाया था इसलिए मेरा परीक्षा परिणाम घोषित होने में कुछ विलम्ब हो गया । परीक्षा के उपरान्त मैं अपने गृहनगर भंडारा लौट आया था लेकिन कुछ दिनों के अंतराल पर उज्जैन में हम सभी मित्र मिलते रहे और आगे की योजनाएं बनाते रहे । इसी तारतम्य में हम लोगों ने पी एच डी के लिए भी फॉर्म भरा और मैं, रवीन्द्र ,अशोक और अजय स्कूल ऑफ़ आर्क्यालाजी दिल्ली में एक इंटरव्यू भी देकर आये । हालाँकि वहाँ किसी का चयन नहीं हुआ । पहली बार हमें पता चला कि दिल्ली की तुलना में हम मध्यप्रदेश जैसे पिछड़े क्षेत्र के निवासी हैं ।


डायरी के अंत में मैंने एक स्वप्न का ज़िक्र किया था । हमें उम्मीद थी कि हम सब आगे चलकर सफल पुरातत्ववेत्ता या इतिहासकार बनेंगे, हम सब इस स्वप्न को पूरा करने की ज़द्दोज़हद में भी लगे थे । अंततः मेरा परीक्षा परिणाम घोषित हुआ । मैंने यह परीक्षा पास करते हुए विक्रम विश्वविद्यालय की प्रावीण्य सूची में प्रथम स्थान प्राप्त किया था । एलोरा के कैलाश मंदिर में डॉ. हरिहर त्रिवेदी द्वारा की गई भविष्यवाणी सही साबित हुई । लेकिन शायद पुरातत्ववेत्ता बनना मेरी नियति नहीं थी । इस बीच मैंने स्टेट बैंक में नौकरी के लिए परीक्षा दी और उसमे मेरा चयन हो गया । मैं नौकरी ज्वाइन करने के लिए छत्तीसगढ़ आ गया । पिता चाहते थे कि मैं भले ही पुरातत्ववेत्ता न बनूँ लेकिन इतिहास में पी एच डी करूँ और कॉलेज में प्रोफ़ेसर बन जाऊं लेकिन मैं उनकी यह इच्छा पूरी नहीं कर सका । 


मित्रों ने कहा कि ऐसी अच्छी नौकरी पुरातत्व में पी एच डी करने पर भी नहीं मिलेगी सो जब तक संभव है करते रहो । बाद में पी एच डी कर लेना और नौकरी बदल लेना । लेकिन मैं नौकरी मिलने के बाद थोड़ा सुविधाजीवी हो गया था और नौकरी में मुझे आनंद आने लगा था इसलिए उनकी इच्छा भी पूरी करने में असमर्थ रहा । आज हर दो चार माह में नौकरी बदलने वाले युवाओं को देखता हूँ तो लगता है मेरा वह निर्णय ग़लत था । मैंने नौकरी छोड़ने का निर्णय लिया अवश्य लेकिन तब तक पच्चीस साल बीत चुके थे ।


फिर अगले ही साल नौकरी के लिए मैं दुर्ग आ गया । नौकरी और कविता में मन रम गया था । विवाह हुआ और एक बेटी का पिता भी बन गया । फिर दिन बीते, माह बीते और साल बीतते गए । बरसों तक किसी मित्र से मुलाक़ात नहीं हो पाई । सारे मित्र भी यहाँ वहाँ हो गए । रवींद्र और अशोक ने ज़रूर पी एच डी करने के बाद कॉलेज में प्रोफ़ेसर की नौकरी ज्वाइन कर ली । फिर एक दो बार उज्जैन में उनसे मुलाकात हुई, कुछ महीनों तक पत्र व्यवहार भी चलता रहा और एक दिन वह भी बंद हो गया । रवींद्र से संपर्क अवश्य बना रहा बाद में उसीसे पता चला कि अशोक सख्त बीमार हो गया था और यह दुनिया छोड़कर चला गया । डॉ. वाकणकर भी नहीं रहे,  उनके कुछ समय बाद डॉ आर्य भी बीमार पड़े और दुनिया छोड़कर चले गए । डॉ कैलाश चन्द्र जैन और हरिहर त्रिवेदी सर भी अब दुनिया में नहीं हैं ।


बाक़ी दोस्तों की हम लोगों ने बहुत तलाश की लेकिन उनका कुछ पता नहीं चल पाया । अजय जोशी पता नहीं अब कहाँ हैं । राममिलन शर्मा भी शायद उसी समय इलाहाबाद लौट गए थे और  महेश शर्मा भी राजस्थान चला गया था । किशोर भैया का कुछ पता नहीं शायद उज्जैन में ही हों ।  बी मुरलीधर रेड्डी , केम्पुला लक्ष्मीनारायण और सुब्बा रेड्डी दक्षिण के निवासी थे सो अपने घर चले गए । अभी कई सालों बाद सोशल मीडिया के माद्यम से उनसे संपर्क स्थापित हुआ है । अन्य मित्रों की तलाश भी जारी है ।


इन तमाम झंझावातों के बीच बस रवीन्द्र और मेरा साथ बना रहा और अब तक बना हुआ है । हम लोग अक्सर फोन पर बतियाते हैं और गुज़रे ज़माने को याद करते रहते हैं । हम लोगों की बातों में छात्र जीवन का वह समय होता है जिसे हम लोगों ने भरपूर जिया है  । जाने कितने बरस बीत चुके हैं दंगवाड़ा के इस उत्खनन कार्य को संपन्न हुए । दंगवाड़ा गाँव शायद अब पहले जैसा न हो । चम्बल भी अब शायद पहले जैसी न हो और उसने अपना रास्ता बदल लिया हो । लेकिन मुझे यकीन है कि उसके किनारे का वह टीला अब भी वैसा ही होगा और उस पर अब भी कोई नई बस्ती नहीं बसी होगी । जिन बरगदों के साये में हमारा शिविर लगा था वे बरगद के पेड़ अब कुछ और बूढ़े हो चुके होंगे । किनारे का शिव मंदिर शायद अब पहले से कुछ भव्य हो गया होगा । वह नाला जिसे पार कर हम सिटी जाते थे शायद पहले से अधिक दूषित हो गया हो ।


जिन मजदूरों के साथ हमने अपने सूख दुःख बाँटे थे वे मजदूर भी जाने कहाँ होंगे । हो सकता है मजदूरी करते हुए ही उनका जीवन बीता हो । हर सर्वहारा की यही नियति है । उन्हें शायद याद भी न हो कि कुछ छात्र कभी उनके घर आये थे और उनके घर के मिष्टान्न का स्वाद चखा था । आर्य सर की प्यारी बिटिया मागो शायद अब तक कई बच्चों की माँ बन चुकी होगी । वक्त का एक ऐसा भी टुकड़ा था जो खुशियों का गुलदस्ता लेकर उसके जीवन में आया था शायद उसे याद ही न हो । अब भी वह सांटा को हांटा और 'समझ नहीं आयो' को 'हमज नहीं आयो' ही कहती होगी । मैंने उससे फिर आने का एक वादा किया था , शायद उसे मेरा वह झूठा वादा याद भी न हो ।


दंगवाड़ा के उस एक माह के उत्खनन शिविर का भले ही मेरे कैरियर में कोई योगदान न रहा हो लेकिन एक माह का वह समय मेरे मनुष्य बनने की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है । इस एक माह में इतिहास और पुरातत्व को लेकर मेरी कई भ्रांतियां दूर हुईं, एक पुरातत्ववेत्ता के जीवन को मैंने क़रीब से देखा , धूप बारिश और ठण्ड जैसे मौसम के वैपरीत्य में उनका श्रम देखा और महसूस किया कि जिस इतिहास को हम यूँ ही अपनी श्रद्धा और आस्था के आधार पर तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत कर देते हैं उसका यथार्थ कितने प्रयोगों और परिणाम के पश्चात कितनी कठिनाई  से हासिल किया जाता है । यह भी सच है कि यदि यह समय मेरे जीवन में नहीं आता तो मैं 'पुरातत्ववेत्ता' जैसी लम्बी कविता की रचना भी नहीं कर पाता इसलिए अपने जीवन के उस कालखंड को मैं हमेशा धन्यवाद देता हूँ और कामना करता हूँ कि हरेक के जीवन में ऐसा समय अवश्य आये जो उनके सपनों की ज़मीन बने, जिसकी नींव पर वे मनुष्य होने का दायित्व पूर्ण करते हुए भाईचारे सौहार्द्र और आपसी सामंजस्य के एक संसार का निर्माण कर सकें ।


एक तमन्ना अभी बाक़ी है कि कभी हम सारे दोस्त मिलें और फिर एक बार दंगवाड़ा होकर आयें । रवींद्र ने बताया था कि उस साईट से अधिक कुछ हासिल नहीं हुआ इसलिए सरकार ने वहाँ उत्खनन का कार्य बंद करा दिया था । इसलिए हो सकता है कि हमारे संजोये हुए स्वप्न वहाँ पहुँचकर बिखर जाएँ । लेकिन स्वप्नों का क्या है, स्वप्न जन्म लेते हैं और एक झटके में टूट कर बिखर जाते हैं । सपनों का पूरा होना वस्तुतः एक भ्रम ही तो है । फिर यह स्वप्न तो वैसे भी पूरा नहीं होगा, अशोक जो हमारे साथ नहीं होगा और वाकणकर सर और आर्य सर भी नहीं होंगे । अब वे केवल तस्वीरों में शेष हैं, शेष उम्मीदों की तरह ।


*शरद कोकास*


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