रविवार, 31 मई 2026

30-सात्विक भोजन का असर तामसिक भी होता है


नहीं ऐसा कैसे हो सकता है भाई , कहीं कुछ तो गड़बड़ है 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा - छात्र अपने एजुकेशन टूर में औरंगाबाद पहुंचते हैं और उस इमारत के सामने खड़े हैं जिसे धर्मशाला कहते हैं और उसका पियक्कड़  मैनेजर जिसका नाम बेवड़ा है, सॉरी देवड़ा है उस से वो बात कर रहे हैं । अब पुरानी इमारतों की बात आई है तो कहानी के साथ साथ हम  प्राचीन इमारतों की देखभाल और उनका रख रखाव पर भी बात कर लेते हैं ।

लेकिन इतनी सीरियस पोस्ट भी नहीं है भाई यहाँ बात उस जीर्ण शीर्ण धर्मशाला के साथ शुरू होती है जिसमे छात्रों को आज ठहराया गया है ।अब आगे देखिये खाना खाने का समय है और जैन साहब छात्रों को लेकर रेलवे की कैंटीन जा रहे है लेकिन दो छात्र मानते नहीं हैं और रात में सबकी नज़र बचाकर शहर घूमने निकल जाते हैं ।आखिर कुछ मस्ती तो होनी ही चाहिए

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*भाग 30*

सात्विक भोजन का तामसिक असर  

सुबह घाट पर प्रक्षालन हेतु प्रस्थान करते हुए रवीन्द्र कहने लगा "यार वो धर्मशाला की इमारत वाकई किसी ऐतिहासिक इमारत की तरह ही लग रही थी ।" अशोक को पता नहीं क्या सूझी वह ज़ोर से हँसने लगा । "अरे! इसमें हँसने की क्या बात है ?" रवींद्र का आश्चर्य स्वाभाविक था । "भाई हम लोग इतिहास के विद्यार्थी हैं सो हम लोगों को पढ़ने के लिए या ठहरने के लिए और रहने के लिए भी ऐतिहासिक इमारत ही मिलेगी न ?" 

अशोक ने हँसने पर फुल स्टॉप लगते हुए कहा । "अपने डिपार्टमेंट की बिल्डिंग को ही देख लो, पूरे ह्यूमेनिटी ब्लॉक से अलग थलग पीछे की ओर अकेली खड़ी है किसी प्राचीन ऐतिहासिक इमारत की तरह । दीवारों पर पेड़ उगने लगे हैं । क्लास में बैठो तभी समझ में आता है कि पर्यटन के लिए नहीं बल्कि पढ़ने के लिए आये हैं  ।" 

रवीन्द्र के चेहरे पर बस थोड़ी सी मुस्कान आई । "भाई , फिर भी अपन लोग पढ़ने ही तो आते हैं ..पर्यटन स्थल तो वह ह्यूमेनिटी  ब्लॉक है जहाँ आर्ट्स कामर्स वाले कई छात्र तफरीह करने आते हैं उनसे तो हम लाख गुना अच्छे हैं ।" 

फिर वह अपनी बातो की गाड़ी को हांक कर चर्चा की मुख्य सड़क पर ले आया .." पर्यटन स्थलों में औरंगाबाद की उस इमारत की तरह ऐसी कई प्राचीन इमारतें हैं जहाँ धर्मशालाएं और ढाबे चल रहे हैं । दरअसल हमारे देश में प्राचीन व ऐतिहासिक इमारतों का महत्व अब तक नहीं जाना गया है । जिन इमारतों को पुरातत्व विभाग ने अपने अधीन कर लिया है उनका हाल तो ठीक है लेकिन अन्य कई इमारतें अभी भी उपेक्षित हैं ।“ 

“ ठीक कह रहे हो तुम । “ मैंने कहा “हमारे यहाँ अभी ऐसी कई इमारतों का ठीक से अध्ययन भी नहीं किया गया है । यहाँ तक कि बहुत सी इमारतों का तिथि निर्धारण भी सही सही नहीं हो पाया है । 

“हाँ ।“ रवीन्द्र ने कहा “ प्राचीन स्थापत्य की जानकारी देने वाली साहित्यिक कृतियाँ तो हमारे पास विपुल मात्रा में उपलब्ध हैं और धार्मिक, कलात्मक, दार्शनिक, राजनैतिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी उनकी अंतर्वस्तु अत्यन्त मूल्यवान है लेकिन वास्तुकला एवं स्थापत्य की सूक्ष्मता की दृष्टि से उनमें बहुत सी कमियाँ हैं । इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि उनमें रचनाकाल और रचनास्थल का उल्लेख नहीं है । शायद इन्हें इस तरह भविष्य के ऐतिहासिक दृष्टिकोण से लिखा भी न गया हो । “

“हाँ ऐसा ही है ।“ मैंने कहा “उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक इतिहास लेखन को वैज्ञानिक रूप से मान्यता नहीं प्राप्त हुई थी इसलिए  साहित्य के आधार पर इन इमारतों और नगरों का अध्ययन कर पाना कठिन है । तुम्हें  पता ही होगा कि भारत के वास्तुशिल्प और उसके इतिहास पर पहला ग्रंथ ब्रिटिश स्कॉटिश वास्तुकार और इतिहासकार जे फ़र्ग्युसन ने लिखा था ‘हिस्ट्री ऑफ इन्डियन ऐन्ड ईस्टर्न आर्किटेक्चर‘ जो अठारह सौ सड़सठ में लन्दन से प्रकाशित हुआ था । लेकिन इसमें भी भारतीय वास्तुशिल्प का वर्गीकरण बौद्ध, जैन व मुस्लिम आधार पर हुआ है ।“ 

“ यही तो मुश्किल है ।“ रवीन्द्र ने कहा “धार्मिक आधार पर वर्गीकरण होने से वास्तुशिल्प के अध्ययन में बहुत सारे पक्ष छूट जाते हैं या कह सकते हैं कि जानबूझ कर छोड़ दिए जाते हैं और यह भी कि इसके अन्तर्गत सभी इमारतों को शामिल करना भी कठिन होता है । यही कारण है कि हमारे यहाँ की प्राचीन वास्तुकला को विदेशों में जो स्थान प्राप्त होना चाहिये था वह नहीं हो सका ।“

"लेकिन अब स्थितियाँ बदल रही हैं ।“ मैंने प्रतिवाद करते हुए कहा । “स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात इस दिशा मे सराहनीय कदम उठाये गए हैं । पुरातात्विक खोजों का सिलसिला लगातार जारी है । इतिहास व संस्कृति सम्बन्धी विभिन्न शोधपत्र लिखे जा रहे हैं । प्राचीन नगरों और इमारतों का पुनर्मूल्यांकन किया जा रहा है । हालाँकि अभी भी बहुत से पुनरुत्थान वादी लोग धार्मिक आधार पर ऐतिहासिक इमारतों का पुनर्मूल्यांकन करने की अपनी ज़िद पर अड़े हुए हैं ।

यह प्रवृत्ति आगे चलकर ख़तरनाक हो सकती है हो सकता है आगे चलकर लोग धर्म के आधार पर इन ऐतिहासिक इमारतों पर अपना दावा पेश करने लगें । 

कल को मुगलों के वंशज कह दें कि ताजमहल हमारा है और इसके पर्यटन से प्राप्त राजस्व पर हमारा हक़ है ।" 

"बराब्बर" अशोक ने कहा " यही तो मैं कह रहा हूँ जैसे मंदिर वाले अपना दावा करते हैं वैसे ही मस्जिद और मकबरे वाले भी करेंगे ।" "लेकिन इससे क्या होगा क्या हम धर्म के आधार पर अपनी इस साझी धरोहर को बाँट लें ? यह कोई प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं है जल्द से जल्द इसके लिए कोई कड़ा कानून बनना चाहिए ।"

अजय अपने दाँतों पर बेरहमी से ब्रश चला रहा था और हम लोगों की बातें सुन रहा था, उसने पच से टुथपेस्ट का झाग थूका और कहा “ भाई कानून तो पहले से ही है लेकिन सिर्फ कानून से क्या होगा ? जनता को धर्म के उन्माद से बचाना जरुरी है तब ही हम इन ऐतिहासिक इमारतों को बचा पाएंगे वर्ना भीड़ का क्या भरोसा ? क्या पता कब इन्हें नष्ट कर दे । वैसे भी जब तक हम इन इमारतों को कानून बनाकर बचा पाएंगे तब तक तो हमारे यहाँ की जनता इन्हें नष्ट कर देगी

उस वक्त यह चित्र  कहीं चर्चा में ही नहीं था 

प्राचीन मंदिरों में जाकर देखो पुरातत्व विभाग ने साफ साफ लिखा है कि यह संरक्षित स्मारक है लेकिन लोग बाग पूजा करने, दही दूध से अभिषेक करने और गंदगी फैलाने से बाज नहीं आते । 

मैंने कहा “ भाई पूजा प्रार्थना के अधिकार का यह अलग मुद्दा है, साथ ही साथ संवेदनशील भी है और फिलहाल हम इस पर चर्चा नहीं कर रहे है । इसके लिए  बेहतर होगा आप पंडित राम मिलन जी से चर्चा करें, वे आपको बता देंगे कि उनके पूर्वजों द्वारा बनाए गए प्राचीन मंदिरों में पूजा पाठ करने का उनका हक़ उनसे छीन कर आप इस देश की ऐतिहासिक परम्परा के साथ क्या खिलवाड़ करने वाले हैं । “ 


“चलो चलो जल्दी करो  “रवीन्द्र ने फरमान जारी किया …” आज भाटी जी ने नाश्ते में जलेबी का इंतज़ाम किया है । जलेबी जैसे टेढ़े इस मुद्दे पर फिर कभी बात करेंगे । “ राममिलन भैया हम लोगों से काफी दूर थे लेकिन अपना नाम जैसे ही उनके कानों में पड़ा वे पल भर के लिए ठिठके फिर तम्बुओं की ओर बढ़ गए ।

आज मजदूर काम पर वापस आ गए थे इसलिए काम समय पर समाप्त हो गया । आज दंगवाड़ा जाने का प्लान भी नहीं था इसलिए भोजन भी हमने समय से कुछ पहले ही कर लिया और रात की बैठक भी हमने जल्दी ही शुरू कर दी । 

भाई लोगों को डायरी पाठ सुनने की इतनी ज़्यादा उत्सुकता थी कि व्यर्थ समय गंवाना बिलकुल गवारा न था । हालाँकि एक फालतू सा विचार उनके मन में आया था था कि आज एलोरा प्रवास का वर्णन और वापसी मे धार, मांडू की यात्रा सब के बारे में सुन लेंगे । जबकि मुझे पता था कि आज के आज सब कुछ बता पाना संभव नहीं है । हमारे डायरी पाठ के श्रोता सुनते हुए बैल की तरह सीधे सीधे रास्ते पर कहाँ चलते थे उन्हें तो सांड की तरह  बातों की गलियों में इधर उधर घुस जाने की आदत थी । 

तो हम कहाँ थे ?

डायरी खोलकर पन्ने पलटते हुए मैंने एक फालतू सा सवाल किया “तो हम कहाँ थे ? “ यात्रा विवरण सुनने की उत्सुक जनता में अजय नामक उत्साही बालक ने याद दिलाया “आप बेवड़ा …मतलब देवड़ा की धर्मशाला में प्रवेश कर चुके थे और कुएँ से पानी भरती हुई कांता बहन को निहार रहे थे ।“ 

“ऐसा कहाँ लिखा है यार मैंने डायरी में ?“ मैंने चौंक कर कहा । “ नहीं लिखा है इसलिए तो कह रहे हैं ।“ किशोर भैया ने चुटकी ली “हमें पता है आप क्या लिखते हैं और क्या नहीं लिखते । 

आप भी इस देश के गौरवशाली परम्परा के वाहक इतिहासकारों की तरह हैं, जो नहीं हुआ है उसे इतिहास कह कर लिख देंगे और जो वास्तव में घटित हुआ है वह नहीं लिखेंगे । “

“ठीक है ठीक है, इतिहासकारों की बदमाशी पर बात बाद में करेंगे फ़िलहाल आप आगे का वर्णन सुनिये …।” मैंने डायरी के पन्ने पलटते हुए कहा । 

“हाँ तो हाथ मुँह धोकर हम लोगों ने अपना सामान ऊपर हाल में रख दिया और भोजन की तलाश में निकलने ही वाले थे कि जैन साहब सामने दिखाई दिए । उन्होंने हमें  आगाह किया ... “ देखो भाई, भोजन हेतु उत्तम स्थान की तलाश करना, पिछली बार जब हम यहाँ आए थे तो बाज़ार का कुछ उल्टा- सीधा खाकर कुछ छात्रों को उल्टियाँ हो गईं थीं । “ 

जैन साहब की बात पर हमें  पूरा विश्वास था लेकिन इससे पहले कि वे उस प्रवास की इस दुखद घटना का विस्तार से बयान करते सारे छात्र चुपचाप खिसक लिए और शेष रह गए मैं, महेश और राममिलन । 

जैन साहब ने पिछली यात्रा के इस दुखद वमन प्रसंग का उपसंहार करते हुए छात्रों की क्षीण उपस्थिति को लक्ष्य करते हुए कहा “ कोई बात नहीं , जिन लोगों को जाना था चले गए आप लोग मेरे साथ चलिए ।“ 

और फिर रेल्वे के शुद्ध सात्विक भोजन की प्रशंसा करते हुए वे हमें  पैदल पैदल औरंगाबाद रेल्वे स्टेशन के भोजनालय में ले गए । जब भोजन हमारे सामने आया तो हमने देखा, कुछ सूखी सूखी सी रोटियाँ, पानी जैसी पतली दाल, और फ़ीकी फ़ीकी सी लौकी की सब्ज़ी । 

मैंने महेश से कहा “चुपचाप खा ले, सात्विक भोजन इसे ही कहते हैं । “ महेश भीलवाड़ा राजस्थान का रहने वाला है और तेज़ मिर्च खाने का आदी है, उसने कहा तो कुछ नहीं लेकिन उसकी आँखों से गुस्सा साफ साफ झलक रहा था । बाहर निकल कर मैंने उससे कहा “चलो शुद्धता से तो साक्षात्कार हो गया स्वाद से कहीं और कर लेते हैं ।“

अब दो आवारा रात मे निकलते हैं औरंगाबाद की सड़कों पर 

धर्मशाला पहुँचकर जैन सर आराम से सो गए । बाकी छात्र भी लौट आए थे और अपना अपना बिस्तर लगा कर सो रहे थे । मेरी और महेश की आँखों में नींद नहीं थी । पूरे पैसे देकर भी पेट भर भोजन न कर पाने का मलाल था सो नींद कैसे आती । महेश ने धीरे से इशारा किया । हम लोग दबे पाँव उठे और कुर्ते -पायजामे में ही बाहर आ गए । कपडे-वपड़े बदलने की कोई ज़रूरत नहीं थी वैसे भी इस नए शहर में हमें कौन पहचान सकता था । फिर हम लोगों ने विदेशी टूरिस्टों को देखा है  वे तो हाफ़ पैंट पहने हुए ही दुनिया भर की यात्रा कर लेते हैं और उनके साथ की गौरांग महिलाएँ भी इतने कम कपड़े पहनती हैं कि भारतीय पर्यटकों के लिए वे भी दर्शनीय वस्तु बन जाती हैं । 

बाहर आकर देखा तो सारा शहर जाग रहा था ।  टूरिस्ट सेन्टर होने के कारण यहाँ  देर रात तक चहल पहल रहती है । वैसे भी अधिक रात नहीं हुई थी यही कोई रात का दस बजा होगा । पास ही बस स्टॉप था । हम लोग एक बस में बैठे और यात्रियों से किसी चहल-पहल वाली जगह का पता पूछकर शाहगन्ज की टिकट ले ली । रास्ते भर हम लोग मुसाफिरों से गाइड का काम लेते रहे । औरंगपुरा, वहाँ से रॉक्सी टाकीज़ और फिर शाहगंज यानि ‘ हार्ट ऑफ सिटी ‘ । शाहगंज में हम लोग बस से उतरे और पैदल पैदल भटकने लगे । एक घंटा  घूमकर हम लोगों ने सारा बाज़ार देख लिया । 

यह एक पर्यटन स्थल का बाज़ार था । सभी हॉटल्स, रेस्तराँ और दुकाने खुली हुई थीं । सड़क पर गाड़ियाँ बहुत कम थीं और ज़्यादातर लोग पैदल ही टहल रहे थे ।चारों ओर बड़े बड़े होर्डिन्ग्स और नियान लाइट में चमकते हुए होटलों के नाम रात की जवानी की दास्ताँ बयाँ कर रहे थे । 

रोशनी में नहाया हुआ शहर का यह हिस्सा बेहद खूबसूरत लग रहा था । सैलानियों के आकर्षण के लिए  यहाँ तमाम इन्तज़ाम थे । खाने की भी कई दुकानें खुली हुई थीं । कुछ ठेलों पर कोयले की अंगीठी पर कबाब सिंक रहे थे और उनसे उठता हुआ धुआं और भुने मांस की गंध वातावरण में अजीब सी रूमानियत पैदा कर रही थी । खाने की दुकानों के बाहर एल्युमिनियम के बड़े बड़े बर्तनों में बिरयानी रखी हुई थी और मसालों की गन्ध से वातावरण खुशगवार हो रहा था । मुझे चेखव की एक कहानी याद आने लगी जो मैंने बचपन में पढ़ी थी ।

अचानक महेश ने पूछा “ यार यह औरंगज़ेब का बसाया हुआ शहर है, यहाँ कहीं मुजरा भी तो होता होगा ? “ मुझे ज़ोरों की हँसी आई, सात्विक भोजन का ऐसा तामसिक असर तो पहली बार देखा है । “ भाई " मैंने कहा " औरंगज़ेब बहुत सात्विक किस्म का व्यक्ति था । खाने पीने में, वेशभूषा में वह बहुत संयम बरतता था तुम उसके राज्य में ऐसी किसी चीज़ की कल्पना भी नहीं कर सकते । लेकिन तुम सही बताओ तुम्हें सही में मुजरा देखना है ? “ मैंने महेश से पूछा । 

महेश हँस दिया “ नहीं यार, ऐसे ही पूछ रहा हूँ, जेब में खाने के लिए  पैसे नहीं है मुजरा कहाँ से देखेंगे ।“ खाने का पैसा तो हम लोग रेल्वे की कैन्टीन में खर्च कर चुके थे और आज की तारीख में भोजन के लिए अब कोई बजट नहीं था, सो हम लोगों ने कबाब की खुशबुओं के बीच किसी योगी के समान टहलते हुए दिल बहलाने के लिए एक पैकेट फल्ली दाना लिया और टूँगते हुए धर्मशाला वापस आ गए । सारे के सारे लोग घोड़े बेचकर सो रहे थे, हमारी इस आवारागर्दी की किसीको कानों कान खबर नहीं हुई और हम लोग अपने बिस्तर में घुस कर सो गए ।“

शरद कोकास 

शहर की रात्रिकालीन रौनक में घूमने के लिए ये स्थान प्रमुख हैं:
  • बीबी का मकबरा (Bibi Ka Maqbara): 'दक्कन का ताज' कहलाने वाले इस स्मारक को रात में दूधिया रोशनी (Floodlights) से जगमगाया जाता है। इस समय यहाँ का शांत और मनमोहक नज़ारा देखने लायक होता है। [1, 2]
  • गुलमंडी और सिटी चौक (Gulmandi & City Chowk): स्थानीय खरीदारी और स्ट्रीट फूड के लिए ये सबसे बेहतरीन जगहें हैं। रात के समय इन बाज़ारों की चहल-पहल और स्थानीय संस्कृति बहुत आकर्षक लगती है।
  • सफ़ारी पब और कैफ़े कल्चर (Cafes & Nightlife): शहर के पॉश इलाकों जैसे उस्मानपुरा और अदालत रोड पर रात के समय युवा रौनक देखने को मिलती है। यहाँ के आधुनिक कैफ़े और रेस्टोरेंट देर रात तक खुले रहते हैं। [1]
  • शहर की लाइट और नज़ारे: रात में शहर के मुख्य चौराहों और ऐतिहासिक दरवाज़ों (जैसे भडकल गेट) की सजावट और रोशनी शहर की खूबसूरती को चार चांद लगा देती है। [1]
रात में घूमने के दौरान आप ऑटोरिक्शा या कैब की मदद ले सकते हैं। स्थानीय जायके का स्वाद चखने के लिए मुख्य बाज़ारों और कैफे का रुख ज़रूर करें।


29-उजड़ी इमारत की तरह दिखाई देता था वह इंसान


आखिर कौन था वह और उसमे ऐसी कौनसी खास बात थी ?
📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा- प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व की एम ए  की कक्षा के यह छात्र अपने एजुकेशन टूर पर निकले है और टीम पहुँच गई है औरंगाबाद जहाँ पर यह देख रहे हैं बीबी का मकबरा । आगे की कहानी सुनिए  इस भाग में आप पढेंगे कि छात्रों का यह दल अभी औरंगज़ेब द्वारा बनाये गए बीबी के मकबरे के परिसर में ही है वहाँ अभी कुछ और इमारते हैं देखने लायक यह सब देखकर वे लोग अब लौटेंगे एक धर्मशाला में जहाँ उनके रात में रुकने का इंतजाम है । यह इमारत भी किसी ऐतिहासिक इमारत की तरह है पढ़िए इस भाग में आपको मज़ा आएगा

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*भाग 29*

*उजड़ी इमारत की तरह का इंसान* 

चलो पहले थोड़ी सुख दुख की बातें कर लें   

उत्खनन शिविर में आये आज हमें पंद्रह दिन हो गए हैं । इन पंद्रह दिनों में मेहनतकशों के जीवन को बहुत क़रीब से जानने का अवसर हमें मिला है । मजदूरों से बातें करते हुए हमने उनके सुख-दुःख भी बांटे और जाना कि उनका जीवन बाहर से जैसा दिखाई देता है वास्तव में ऐसा नहीं है ।और लोगों की तरह हम भी यही समझते थे कि यह लोग खाते पीते मस्त रहते हैं और इन्हें कोई चिंता नहीं है । लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है । आम शहरी लोगों की तरह उन्हें सुविधाएँ हासिल नहीं हैं और वे बहुत कठिनाई से बहुत सीमित संसाधनों के साथ अपना जीवन व्यतीत करते हैं ।


  हम मध्यवर्गीय स्वयं को बहुत मेहनती और कार्यकुशल समझने के भ्रम में जीते हैं और सोचते हैं कि हम उतना ही श्रम कर लेंगे जितना कि श्रमिक करते हैं । लेकिन यदि एक दिन श्रमिक न आयें तो हमारा यह भ्रम टूट जाता है । साईट पर भी आज ऐसा ही कुछ हुआ । किसी कारणवश गाँव से आज अधिकांश श्रमिक नहीं आ पाये और उनकी अनुपस्थिति में मिटटी फेंकने और साफ़ सफ़ाई के कार्य भी हमें ही करने पड़े । शाम को ज्ञात हुआ कि हालत प्रतिदिन की अपेक्षा आज कुछ अधिक ही ख़राब है । शाम को चम्बल पर पहुँचकर हाथ-मुँह धोने तक अँधेरा होने लगा था सो हमने आज सिटी भ्रमण का कार्यक्रम स्थगित कर दिया और सन्ध्याकालीन भोजन भी शीघ्र ही ग्रहण कर लिया । आज शिवमंदिर की ओर टहलने जाने की भी मनस्थिति नहीं थी । 

भोजनशाला में कुछ देर आर्य सर से गपियाने के उपरांत हम लोग अपने तम्बू में आ गए । थकावट कितनी भी हो बिना बतियाये हम लोगों को नींद नहीं आने वाली थी । नींद के महल में प्रवेश करने हेतु यह प्रवेश पत्र आवश्यक था । बिना किसीके कुछ कहे मैंने अपनी डायरी निकाली और कथावाचक की मुद्रा में बैठ गया । राममिलन भैया खाना पचाने के लिए अभी बाहर ही टहल रहे थे । किशोर ने तम्बू से बाहर सिर निकाला और ज़ोर से आवाज़ लगाई “ अरे ओ राममिलनवा, जल्दी आओ कथा शुरू हो रही है ।“ जैसे ही राममिलन भैया भीतर आकर बैठे मैंने डायरी पाठ प्रारम्भ कर दिया …

”बीबी का मकबरा देखने के बाद हमने वहीं परिसर में स्थित अन्य इमारतों का अवलोकन प्रारंभ किया । आगे उसी दौर की एक पनचक्की थी जो बरसों से बंद पड़ी थी ।


कहते हैं इसे सम्राट ने फ़कीरों के लिए  आटे का इन्तज़ाम करने के उद्देश्य से बनाया था । यह कभी पानी की ताकत से चलती थी , ऐसी ताकत जिसे उस युग में ही पहचान लिया गया था और इसी पहचान की वज़ह से आधुनिक युग में बिजली का जन्म हुआ । आज हम बगैर बिजली के इस दुनिया के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं कर सकते । “
औरंगाबाद की पनचक्की 

“ अच्छा इसीलिए हमारे गाँव में हमारी दादी अभी भी बिजली से चलने वाली चक्की को पनचक्की ही कहती हैं ।" राममिलन भैया ने चक्की के इतिहास को लोकपरम्परा से जोड़ते हुए कहा ।

“ बिलकुल सही ।" रवींद्र ने कहा । "यही कारण है कि हम अपने जीवन में इतिहास को इस तरह शामिल पाते हैं । हमारे जीवन में हमारे इर्दगिर्द आज जो भी वस्तुएँ है उनकी पूर्वज वस्तुएँ उसी तरह की हुआ करती थीं जैसे बिजली का पंखा, मेज़,चाकू, सीढ़ियाँ और भी बहुत कुछ । हर वस्तु में उसका इतिहास छुपा हुआ है । भले ही उनके नाम पूर्व में कुछ और रहे हों । इसीलिए ना हम उत्खनन कर आज की वस्तुओं की पूर्वज वस्तुओं को ढूँढ निकाल रहे है ताकि इन वस्तुओं के माध्यम से उस परम्परा की खोज कर सकें ।“ 

ओह ,चक्की के चक्कर मे यह तो गंभीर चर्चा हो गई 

“ लेकिन इससे हो क्या जाएगा । परिवर्तन तो अवश्यम्भावी है ।“ अजय विमर्श के मूड में था  “आज जो वस्तुएँ हम देख रहे हैं यह पुरातन वस्तुओं का परिवर्तित रूप ही तो है । कल इनका भी रूप परिवर्तन हो जाएगा और यह पहले से ज़्यादा सुविधाजनक हो जाएंगी । जैसे हाथ के पंखे के बाद, रस्सी से खेंचे जाने वाले पंखे का अविष्कार हुआ, फिर बिजली के पंखे का, फिर कूलर और फिर ए सी का । हमें जो भी परिवर्तन करना है वह वर्तमान में उपलब्ध वस्तुओं में करना है पुरातन वस्तुओं से इस परिवर्तन में क्या सहायता मिलने वाली है ? और इससे मानवजाति के विकास की प्रक्रिया में क्या अन्तर होने वाला है ?

“ वाह !“ रवीन्द्र ने कहा “अंतर कैसे नहीं होगा ? जब तक आप पिछली वस्तु पर अनुसंधान नहीं करेंगे, उसकी कमियों, अच्छाइयों या सीमा के बारे में नहीं जानेंगे  तब तक उसका रूप परिवर्तन  कैसे कर सकेंगे ?” 

“नहीं, मैं यह नहीं कह रहा हूँ । " अजय ने अपनी बात स्पष्ट करने का प्रयास किया । "जिस वस्तु पर अनुसंधान हो चुका है और जो ज़मीन के भीतर दब चुकी है वह भविष्य की वस्तुओं के लिए किस तरह उपयोगी है ?" 

मैंने कहा “मैं तुम्हारा आशय समझ गया हूँ । तुम यही कहना चाहते हो कि अब कूलर और ए सी के ज़माने में हाथ के पंखे का क्या काम ? वह तो पुराने ज़माने की बात हो चुका है । “ रवीन्द्र ने ठहाका लगाया …”जब बिजली गुल हो जाती है ना बेटा ..तब यही हाथ का पंखा याद आता है ।“ 

मैंने कहा “नहीं इसका उत्तर इतना सरल भी नहीं है । दर असल वस्तुओं के साथ साथ उनसे जुड़ी तकनीक का भी विकास होता है और इस विकास के लिए  पिछले अनुभव और विकास की प्रक्रिया को जानना बहुत ज़रूरी होता है । 

यदि ऐसा नहीं करेंगे तो क्रमवार विकास दर्ज नहीं हो पायेगा और वही गलतियाँ दोहराई जायेंगी जो पहले की पीढ़ियों में हो चुकी हैं । जैसे अभी हम्फ़ी के उत्खनन में राजा कृष्णदेव राय द्वारा बनवाया गया एक रानी का महल मिला है जिसमें दीवारों के भीतर नालियाँ बनाई गईं थीं जिनमें पानी प्रवाहित कर वातानुकूलन की व्यवस्था  की गई थी । अर्थात वातानुकूलन में पानी की उपयोगिता को रेखांकित किया गया । उसके बाद ही कूलर बना और अब गैस की खोज हो जाने के बाद उससे चलने वाला ए सी ।" 

"तात्पर्य यह कि मनुष्य हर दौर में अपने आसपास उपलब्ध वस्तुओं की सहायता से अपने पूर्वजों द्वारा संचित ज्ञान के आधार पर ही विकास करता है ।" रवींद्र ने कहा । "हाँ ।" मैंने उसकी बात का समर्थन किया।  "अगर हम वस्तुओं के इतिहास को देखकर आगे विकास नही करेंगे तो  हम अपने अतीत को लेकर इतरा तो सकेंगे कि हमारे पूर्वजों ने यह किया, वह किया, लेकिन यह नहीं जान सकेंगे कि यह कैसे किया तथा उससे सबक लेकर उनके द्वारा अर्जित ज्ञान का उपयोग नहीं कर सकेंगे । इस तरह यह एक ऐसा खोखला पुरातन प्रेम बन कर रह जाएगा जिसकी कोई सार्थकता नहीं होगी । “ 

“ठीक है ठीक है “ किशोर भैया जो अब तक चुपचाप बैठे थे बोल पड़े …” भाई पनचक्की के आगे भी तो बढ़ो ।“ मैं उनका आशय समझ गया था । मैंने फ़िर डायरी पढ़ना प्रारंभ कर दिया …“ पनचक्की के पास ही जल से भरा एक विशाल कुण्ड था जिसमें कई छोटी - बड़ी अनेक मछलियाँ तैर रही थीं । पास ही खड़े थे कुछ बच्चे जो उन मछलियों को राजगीरे के लड्डू खिला रहे थे और खुशी से उन मछलियों की तरह ही उछल रहे थे । 

“चलो बच्चों..“ बच्चों के अभिभावक ने आवाज़ लगाई । “मछलियों के सोने का टाइम हो गया है ।“ मुझे मुस्कुराता देख एक बच्चे ने सवाल किया “ मछली सोती कैसे होगी अंकल उसकी तो पलकें ही नहीं होतीं ?“ मैंने उस बच्चे की पीठ थपथपाई । मुझे सवाल करने वाले बच्चे बहुत अच्छे लगते हैं ।

लेकिन हमारे पास पलकें भी थीं और हमें आज की रात चैन से सोना भी था और इसके लिए सर्वाधिक आवश्यक था सबसे पहले एक ठिकाना ढूँढना । जैन सर ने बताया कि ठहरने के लिए  औरंगाबाद में एक धर्मशाला पहले से ही उन्होंने तय कर रखी है । धर्मशाला का नाम सुनकर महेश ने मुँह बिचकाया । मैंने उसे इशारा किया कि फ़िलहाल चुप रहे । 

लेकिन जैन सर ने उसकी यह हरकत देख ली थी । वे बोले “ भई, हम लोगों का डिपार्टमेंट बहुत ग़रीब  है । अब होटल - वोटल में तो ठहरने लायक पैसा तो विश्वविद्यालय से नहीं मिलता है सो इसी में गुजारा करना होगा ।“

तो धर्मशाला का किस्सा यहाँ से शुरू होता है 

धर्मशाला के गेट पर पहुँचते ही ऐसा लगा जैसे हम लोग किसी ढहती हुई ऐतिहासिक इमारत के अहाते में प्रवेश कर रहे हों । प्रांगण में ढेर सारी जंगली घास उगी हुई थी । 

दीवारों पर सफ़ेदी हुए बरसों बीत चुके थे और मॉडर्न आर्ट की तरह जगह जगह काई के धब्बे दिखाई दे रहे थे । 

ईट- पत्थर मुन्डेरों पर इस तरह लटके हुए थे जैसे कुछ ही देर में आत्महत्या करने वाले हों  । 

बिजली भी शायद कट चुकी थी और अंधेरे कमरों में लालटेनें टिमटिमा रही थीं । 

प्रांगण में कुछ मुसाफ़िर ईट के चूल्हों पर शाम का भोजन पकाने में व्यस्त थे । धुएं की गंध के साथ रोटी की गंध मिलकर एक अजीब सी बू पैदा कर रही थी । 

हमारे जिस्मों का पसीना हमें बार बार चेतावनी दे रहा था कि उसे पानी से धो दिया जाए वर्ना वह हमारी रात बर्बाद करने में कोई कसर बाकी नहीं रखेगा । 

हमारे पहुँचने की खबर मिलते ही धर्मशाला का मैनेजर जिसका नाम शायद देवड़ा था, दौड़ा चला आया । वह जैन सर को जानता था । हम समझ गए.. हम से पहले की बैचेस को इस धर्मशाला में रहने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका है । 

देवड़ा नामक वह व्यक्ति मैले कुचैले से कपड़े पहने हुए था और पाँवों में स्पंज की टूटी हुई स्लीपर थी। वह आदमी कहीं से भी उस धर्मशाला का मैनेजर नहीं दिखाई दे रहा था । सर ने बताया कि उजड़ी इमारत की तरह दिखाई देने वाला यह इन्सान इस धर्मशाला का मालिक भी है जो पहले कभी बहुत संपन्न  हुआ करता था । 

“तो अब क्या हो गया है जो यह इस इमारत का मेन्टेनेन्स भी नहीं कर सकता ?“ मेरे मन में विचार आया लेकिन देवड़ा की लाल लाल आँखों, बहकती आवाज़ और लड़खड़ाते कदमों ने उसकी और इमारत की बदहाली का राज़ खोल दिया । अपने ज़माने का सम्पन्न देवड़ा अब पूरी तरह ‘बेवड़ा‘ हो चुका था ।

फिर भी वह होशियार था और कुछ व्यावसायिक बुद्धि तो उसमें थी ही । उसने हमारी आँखों में कौन्धता हुआ रोशनी का सवाल देखा और आवाज़ लगाई “इब्राहिम भाई, जल्दी से एक पेट्रोमैक्स का इन्तज़ाम करो ।“ 

फिर वह खिसियानी सी हँसी के साथ हमारी ओर मुख़ातिब हुआ “ क्या करें साब, वो बिल ज़्यादा आता था ना, दो तीन बार नहीं भर पाया इसलिए …हेहेहे…। फिर उसने काम करने वाली लड़की को आवाज़ लगाई …”कान्ता इन लोगों के लिए कुएँ से पानी निकाल दो …।” 

फिर वह मैनेजरों सी विशिष्ट स्टाइल में बोला ...“ चलिए साहब, आप लोगों के लिए एक बड़े हाल का इन्तज़ाम कर दिया है, सामान वगैरह रखकर हाथ मुँह धो लीजिए मैं आप लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था करता हूँ । फ़िर उसने इब्रहिम भाई के ज़रिये एक ढाबे वाले को बुलाया । 

जैन सर ने पूछा “ एक थाली का कितना लोगे ? “ उसने तपाक से उत्तर दिया “ आप लोगों के लिए मात्र पंद्रह रुपए सर । “ जैन सर कुछ देर सोचते रहे फिर उन्हें  लगा ज़रूर कहीं कुछ गड़बड़ है । उन्होंने देवड़ा से कहा “ रहने दीजिये भोजन की व्यवस्था हम खुद कर लेंगे ।“

“बस कर यार .. आज बहुत थक गए हैं अब नींद आ रही है ..आगे की डायरी कल सुनेंगे । " अशोक ने अपनी रजाई सर तक ओढ़ते हुए कहा । " यार कुछ भी कहो जैन साब खयाल तो बहुत रखते हैं हम लोगों का ।“ अजय भी सोने के लिए अपनी पोजीशन संभाल चुका था । रवीन्द्र ने उसकी रज़ाई खींची और उसे छेड़ते हुए चुटकी ली …” फिर भी बेटा, तुम मैडम के अंडर में डिज़र्टेशन लिख रहे हो ।“ “तो उससे क्या होता है  । “ अजय ने वापस अपनी रज़ाई गले तक ओढ़ते हुए कहा “ मैं तो जैन साहब की अनुशासन प्रियता और गुणों की बात कर रहा था । “ मैं समझ गया अब सब लोग सोने के मूड में आ गए हैं सो मैंने डायरी बंद की और उसे बैग में रखकर मैं भी बिस्तर में घुस गया ।

अब बाकी का किस्सा अगली पोस्ट मे उसमे तो बहुत मज़ा आएगा 


*शरद कोकास*


28. आपको पता है औरंगजेब की बीबी ने उससे क्या फरमाइश की थी ?


जानने के लिए पढिए रोचक किस्सागोई के शिल्प मे लिखा यह एपिसोड 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

*छात्रों का यह दल अब अजंता से वापस औरंगाबाद लौटने की तैयारी में है आज का रात्रि विश्राम औरंगाबाद में ही है लेकिन उससे पहले यानी दिन ढलने के पहले औरंगाबाद शहर देखने में क्या हर्ज है यहाँ हैं ताजमहल की प्रतिकृति यानि औरंगज़ेब द्वारा बनाया गया बीबी का मकबरा ।चलिए इन छात्रों के साथ सैर करते हैं इस ऐतिहासिक धरोहर की*

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*भाग 28*

औरंगजेबवा की लुगाई की फरमाईस 

    चम्बल नदी के किनारे स्थित पुराने घाट के बेरंग पत्थर अब हमारे पांवों का स्पर्श भलीभांति जान चुके हैं ।दिन भर यह पत्थर धूप से उसकी गर्मी चुराते हैं और रात भर खुले आकाश के नीचे रहने के बावज़ूद वे कुछ गर्मी हमारे लिए सहेज कर रखते हैं । 

    हम लोग कुछ देर उन पत्थरों पर बैठकर आपस में बतियाने के साथ साथ नदी से भी बतियाते हैं । मंथर गति से बहती हुई चम्बल नदी कभी कभी हमारी बातें सुनकर पल भर के लिए ठहर जाती है और फिर किसी मज़ेदार बात पर खिलखिलाकर आगे बढ़ जाती है । 

    सुबह स्नान के पश्चात हम लोग एक सीढ़ी पर बैठ गए और बहती नदी को देखने लगे । रवीन्द्र को लगा नदी जैसे झील बन कर ठहर गई है । उसने इस भ्रामक ठहराव को तोड़ने के लिए एक कंकर नदी के जल में उछाला और कहा “यार, तू कुछ भी कह  तेरी यात्रा डायरी सुनने में बहुत मज़ा आ रहा है ।" 

    मैंने कहा " ऐसी मज़े की उसमें  क्या बात है, हम तो इस यात्रा में साथ ही थे । " वह तो है.. " रवीन्द्र ने कहा " लेकिन यही तो लेखन कला का कमाल है, कभी कभी किसी दृश्य से अधिक सुन्दर उसका वर्णन लगता है क्योंकि उसमें लेखक की अनुभूतियों के अलावा वे बिम्ब और रूपक भी शामिल होते हैं जो साधारण व्यक्ति को नहीं दिखाई देते, इसीलिए तो लेखन को कला कहा जाता है । मुझे नहीं पता था यात्रा वृतांत भी इतना सुंदर हो सकता है ।"  

    "हाँ सभी कलाओं की यही विशेषता होती है ।" मैंने कहा "स्थापत्य कला, चित्र कला, संगीत कला, नाटक, शिल्प, साहित्य सभी इस सुन्दरता का ही बखान करते हैं ।" " यार कला के छात्र तो हम भी हैं लेकिन तुझे देखकर अच्छा लगता है कि हमारे बीच एक कलाकार भी है जो इतनी सुन्दर कल्पनाएँ करता है । " रवीन्द्र ने कहा ।

    "लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता " मैंने कहा । "कभी कभी यथार्थ कल्पना से अधिक भयावह होता है । तब उसे किसी कलारूप में प्रदर्शित करना बहुत कठिन भी होता है हालाँकि कला के रूप में उसकी बहुत तारीफ़ होती है .. जैसे गन्दी झोपड़पट्टी में ऐसे कोई जाना पसंद नहीं करेगा लेकिन यदि कोई कलाकार उसकी पेंटिंग  बनाकर किसी आर्ट गैलरी में लटका दे तो सारे अभिजात्य वर्गीय उसे देखने चले जायेंगे ।" 

    "तू भी ना यार बात को कहाँ से कहाँ ले जाता है ।" रवींद्र ने कहा । "और कला के पारखी सारे लोग ऐसे ही होते हैं क्या ? कुछ लोग तो होते हैं जिनका मन चित्र देखकर या कविता पढ़कर द्रवित होता होगा और वे समाज को इस स्थिति से बाहर निकालने हेतु प्रयास भी करते होंगे । आख़िर कला का कुछ असर तो होता ही है ।" 

    "छोड़ ना यार ,इस पर बात फिर कभी। " मैंने कहा "अभी एलोरा और औरंगाबाद की यात्रा भी बाक़ी है ना ?“ रवीन्द्र प्रसन्न हो गया “ बिलकुल । आज रात चलते हैं ना आगे की सैर के लिए । फ़िलहाल तो भोजनशाला पहुँचा जाए ..भूख पेट की यात्रा कर रही है ।" 


    प्रतिदिन की भांति तैयार होकर हम लोग ट्रेंच पर पहुँच गए । आज हमारा उत्खनन शिविर में चौदहवां दिवस था । ट्रेंच पर पहुँचकर हम लोगों ने अपनी कापियों पर नज़र डाली और कल छोड़े हुए काम की तस्दीक की । अब हमें कल से आगे के उत्खनन कार्य में व्यस्त हो जाना था । फिर आज का दिन भी उसी तरह बीत गया जैसे कि पिछले तेरह दिन बीते थे । 

    कोर्स की और परीक्षा की ज़रूरत के अनुसार जितना ज्ञान हमें चाहिये था उतना हम अर्जित कर चुके हैं और अब यहाँ मन भी नहीं लग रहा है । वैसे तो श्येड्युल के अनुसार हमें यहाँ एक माह रहना था लेकिन हमें पहले ही आने में देर हो गई इसलिए एक माह से पहले ही प्रशिक्षण कार्य पूर्ण करना होगा । फिर हमें थ्योरी की तैयारी भी करनी है जिसके लिए बहुत कम समय बचा है । इसलिए हम लोग यहाँ से जल्दी जाने की फिराक में हैं । 

    फ़रवरी की समाप्ति के साथ साथ हमें वापस उज्जैन पहुँचना है । हमें पता है कि उत्खनन कार्य काफी समय तक चलेगा सो परीक्षा के बाद फिर कभी आ जाएँगे ऐसा विचार कर हम लोग यहाँ से जाने का मन बना रहे हैं । फिर लौटकर अन्य विषयों की तैयारी भी तो करनी है वरना परीक्षा में अच्छे नम्बर नहीं मिलेंगे और अच्छे नम्बर नहीं मिलेंगे तो अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी और अच्छी नौकरी नहीं मिली तो जीवन इसी तरह व्यर्थ बीत जाएगा । 

    शाम से ही जाने क्यों सभी का मन उखड़ा हुआ था । ऐसा अक्सर होता है कि एक उम्र और एक सी परिस्थितियों में रहने वालों की मन:स्थिति भी एक सी हो जाती है । कभी कभी भविष्य की चिंताओं के कारण भी मन उदास हो जाता है  । 

    शाम को कहीं जाने का मन नहीं था लेकिन समय तो बिताना ही था और फिर सिटी यानि दंगवाड़ा गाँव जाने का चस्का भी लग चुका है सो यह भ्रमण कार्य भी संपन्न हुआ । गाँव वालों से हमारी मित्रता हो चुकी है । हम लोग उनके बीच जाकर उन्हीं की तरह हो जाते थे । 

    हमने ठान रखा है कि अन्य शहरियों की तरह उन्हें कोई उपदेश नहीं देंगे न उन्हें किताबी ज्ञान की बातें बताएँगे हालाँकि पर्यावरण ,अन्द्धश्रद्धा निर्मूलन और स्वास्थ्य जागरूकता सम्बन्धी बातें तो हम उन्हें बताते ही हैं । वे अपनी स्थितियों से भले ही पूरी तरह खुश न हों लेकिन हम जानते हैं कि उन्हें उनकी स्थितियों से बाहर निकालने के लिए हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं । ज़्यादा से ज़्यादा व्यवस्था को गाली दे सकते हैं और उन्हें  उनकी ज़िल्लत का अहसास दिला सकते हैं । लेकिन इससे क्या हो जाएगा ? क्या इससे उनकी दशा बदल जाएगी ? हमें अपनी सीमायें पता हैं और हम उन्हीं  सीमाओं के भीतर रहकर उनकी बेहतरी के लिए भरसक प्रयास कर रहे हैं । 

मुक्तिबोध ने कहा भी है .."इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए ।"

    फिर भी कभी कभी मन ख़राब हो जाता है अपने देश के गाँवों की स्थिति देखकर । आज़ादी के इतने साल बाद भी शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित यह लोग आखिर देश के विकास में क्या योगदान दे सकते हैं ? सत्ताधीश इन्हें केवल वोट बैंक समझते हैं और इन्हें  ठीक ठीक मनुष्य का दर्ज़ा भी नही देते । रवीन्द्र जब भी मुझसे इस परेशानी को शेयर करना चाहता मैं उसे दुष्यंत का वह शेर सुना देता हूँ “ 

दोस्त अपने मुल्क की किस्मत पे रंजीदा न हो 

उनके हाथों में है पिन्जरा उनके पिंजरे में सुआ ।

    तो किस्सा कोताह यह कि आज भी  सूरज उसी तरह उगा जैसे कि रोज़ उगता है भाटी जी ने वैसे ही प्रेम से दोनों वक़्त का भोजन करवाया, शाम को सिटी का दौरा भी हुआ और फिर रात आई और हम लोग अपने तम्बू में रजाई ओढ़कर बैठ गए ।  “हाँ तो भाईजान आज क्या इरादा है, औरंगजेब की सल्तनत में चलें ? ” रजाई में पदस्थ हो जाने के बाद  रवीन्द्र ने मुझसे सवाल किया । “बिलकुल ।“ मैंने कहा “आज सुनाते हैं आगे की यात्रा की डायरी ।“  मैंने डायरी निकाली और पाठ शुरू कर दिया… 

अजंता से प्रस्थान के आगे की कथा 

“अजंता से हम लोगों ने शाम लगभग चार बजे प्रस्थान किया । लेकिन अब वापसी  जलगाँव की ओर नहीं थी बल्कि हमारा गन्तव्य औरंगाबाद था । वह दुनिया हम पीछे छोड़ आये थे जहाँ बुद्धम शरणम गच्छामि के स्वर गूंजा करते थे । शाम ढलने से पूर्व ही हमारी बस औरंगाबाद पहुँच गई । 

    बस की खिड़की से मार्च की धूप भीतर आ रही थी, मैं बाहर देखते हुए औरंगाबाद शहर का अक्स अपनी आँखों में बसाने की कोशिश कर रहा था । वातावरण में मग़रिब की अज़ान गूँज रही थी ..अल्ला हो अकबर ..। 

    मैं कुछ सोचकर मुस्कुराया...अच्छा हुआ कि उस दौर में अलग अलग धर्म अलग अलग समय में साँस लेते रहे वर्ना एक धर्म वालों द्वारा दूसरे धर्म वालों की सांसें रोक दी जाती । हालाँकि मेरा सोचना पूरी तरह सही भी नहीं था । बौद्ध धर्म के बाद यद्यपि इस्लाम सैकड़ों साल बाद आया लेकिन उस समय ब्राह्मण धर्म ने यह काम किया । मेरी आँखों के सामने अचानक पुष्यमित्र शुंग द्वारा अंतिम मौर्य सम्राट ब्रह्द्रथ की हत्या का दृश्य कौंध गया ।

    मैं बस की खिड़की से निरंतर बाहर की ओर देख रहा था । यह दो ऋतुओं के बीच का संक्रमण काल था और मौसम में बोरियत भरी उदासी छाई हुई थी । दिन अब लम्बी उबासी की तरह कुछ लम्बे होने लगे थे । 

    पंछी अभी आसमान में ही थे और पेड़ों के पास सन्नाटा छाया हुआ था । यह अजीब बात थी कि पंछियों के पास घर होने के बावजूद उन्हें भी घरौंदों में वापस लौटने की चिंता नहीं थी । 

    फिर सूरज तो ठहरा बेघर ..वह लौटता भी तो कहाँ लौटता सो लाल पीले नीले कपड़े पहने हुए मज़े में पश्चिम के फुटपाथ पर टहल रहा था । जल्दी तो खैर हमें भी नहीं थी । 

    हम सभी छात्र वैसे भी बेघर थे । अपना अपना घर छोड़कर कुछ बनने की इच्छा लेकर निकले थे, क्या बनेंगे, कहाँ रहेंगे किसी को नहीं पता था सो घर क्या और बाहर क्या, इस भाव के साथ इस यायावरी का आनंद ले रहे थे ।

चलो औरंगजेब की बीबी का मकबरा ही देख लें 

    दिन ढलने में अभी काफी समय था इसलिए तय किया गया कि धर्मशाला पहुँचने और अँधेरा होने से पहले बीबी का मक़बरा तो देख ही लिया जाए । हमारे बस ड्राइवर जमनालाल जी ने रास्ता पूछ पूछ कर आखिर बीबी का मक़बरा ढूँढ ही लिया । 

नहीं नहीं यह ताजमहल का डुप्लिकेट है 

    प्रवेश द्वार पर पहुँचते ही सामने थी मुगल काल की एक बेहतरीन इमारत  जिसे देखते ही बरबस मुँह से निकल गया …”अरे ! ताजमहल !“ ठीक ताजमहल की प्रतिकृति के रूप में उपस्थित थी वहाँ मुगल शासक औरंगज़ेब की बेग़म राबिया दौरानी की समाधि । लेकिन कहाँ ताजमहल और कहाँ बीबी का मक़बरा ! 

    ताजमहल बेहतरीन सफेद संगमरमर का बना है और बीबी के मक़बरे  में यह संगमरमर सिर्फ़ सामने वाले भाग में है और वह भी लगभग पाँच साढ़े पाँच फ़ीट बस । शेष इमारत बलुआ पत्थर की है और मीनारें ईटों की बनी हुई हैं । इन पर चूने का मसाला लगा है जिसमें सीपियों की भस्म मिली हुई है ।

    ताजमहल से इस इमारत की तुलना करते हुए एक प्रश्न मन में आया, दोनों ही इमारतें सम्पन्न मुगल शासकों द्वारा बनाई गई हैं फिर इनमें इतना अंतर क्यों है ? 

    जैन साहब ने हमारी शंका का समाधान किया …” प्रारंभिक मुग़ल शासकों के समय राज्य की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत थी, राजस्व की प्राप्ति भी अधिक होती थी और उनके खर्च भी अधिक नहीं थे इसलिए  इमारतें उच्च कोटि की सामग्री से बनाई जाती थीं, लेकिन बाद में साधनों के अभाव और धन की कमी के कारण उन्हें  सादा इमारतें बनानी पड़ीं, हालाँकि औरंगज़ेब ने भी सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में अपने शासनकाल के प्रारंभ में दिल्ली की मोती मस्जिद जैसी इमारत बनाई और लाहौर में बादशाही मस्जिद भी बनवाई परन्तु बाद में आर्थिक अभाव के कारण उसे बीबी के मक़बरे जैसी साधारण इमारत बनाने के लिए विवश होना पड़ा ।"

    " सर ,लेकिन यह औरंगज़ेब शुरू से औरंगाबाद में ही था क्या ? मुगलों का शासन तो उस समय आगरा में था ? " अजय ने सवाल किया । 

    सर ने बताना शुरू किया " औरंगज़ेब को उसके पिता शाहजहाँ ने सन सोलह सौ चौंतीस में दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया । उस वक्त उसकी उम्र सोलह वर्ष थी । उसने महाराष्ट्र  के गाँव किरकी को अपनी राजधानी बनाई और उसका नाम बदलकर औरंगाबाद कर दिया । 

    उसके बाद सोलह सौ सैंतीस में राबिया दुर्रानी से उसकी शादी हुई जिसका यह मकबरा उसने सोलह सौ अठहत्तर में बनवाया  । हालाँकि शादी के बाद सिर्फ सात साल वह यहाँ रहा और उसके बाद उसके पिता शाहजहाँ ने उसे गुजरात और फिर बदक्षां का सूबेदार बनाकर अफगानिस्तान भेज दिया । 

फिर उसने बाप को ही कैद मे डाल दिया 

    सोलह सौ अठ्ठावन में उसने अपने पिता को ताजमहल पर राजकीय खजाना खर्च करने का जुर्म लगाकर आगरे के किले में कैद कर दिया और खुद को बादशाह घोषित कर दिया । इसके बाद उसने सत्रह सौ सात तक यानि लगभग पचास वर्ष तक शासन किया ।"

    " सर, लेकिन इसका औरंगाबाद के बीबी के मकबरे की सादगी से क्या सम्बन्ध है ? मैंने पूछा ।

    " वही तो बता रहा हूँ ।" जैन सर ने कहा " चूँकि वह राजकीय कोश का व्यर्थ के कामों में खर्च करने के विरुद्ध था और खुद के लिए भी बहुत कम खर्च  करता था इसलिए उसने इस इमारत पर भी अधिक नहीं खर्च किया । हालाँकि उसने पैसा काफी कमाया जैसे उसने जजिया कर लगाया लेकिन वह सब राज्य के लिए खर्च किया ।" 

    बहरहाल, इस इमारत के ताजमहल के मुकाबले कम सुन्दर होने का कारण  हम लोगों की समझ में आ गया था ..बोले तो  जितना पैसा उतना काम । औरंगज़ेब के बारे में वास्तविक और गढ़े गए दोनों तरह के इतिहास को ताक पर रखकर हम लोगों ने उसके बसाये औरंगाबाद में जी भरकर ईरान, मध्य एशिया, दिल्ली और आगरा से आई वास्तुकला की मुगल शैली के इस स्थापत्य का आनंद लिया और आगे बढ़ गए ।“ 

चलो अब वापस तंबू मे 

    राम मिलन भैया जो हम लोगों से रूठकर पिछले दिनों अलग तम्बू में चले गए थे, उनका गुस्सा हमारे माफ़ीनामे के बाद शांत हो चुका है और एक सज्जन व्यक्ति की तरह वे हम दुर्जनों के बीच आकर बैठने लगे हैं । वे भी सब लोगों के साथ मेरा डायरी पाठ सुन रहे थे  । 

    सुनते हुए  हुए अचानक उन्होंने एक महत्वपूर्ण जिज्ञासा सबके सामने प्रस्तुत की... “ का हो, ई शाहजहाँ ने तो अपन लुगाई की फ़रमाइस पर ताजमहल बनवा दिया, औरंगज़ेबवा की लुगाई की भी कौनो फ़रमाइस रही थी क्या ? “ 

    राममिलन भैया की बात सुनकर पहले तो हम लोग बहुत हँसे  फिर अजय ने जवाब दिया “ अब क्या पता पंडित, हो सकता है कि बहू ने सोचा हो जब हमारी सास के लिए  इतना बड़ा मक़बरा  बना है तो छोटा-मोटा हमारे लिए  भी बन जाए । आखिर बड़े घर की सास है तो बहू भी कम बड़े घर की नहीं है । अब उसका आदमी कंजूस है तो क्या हुआ ।“ 

    मुगलकालीन इतिहास के इस विखंडन पर मैं क्या कहता, मैंने अपना सिर पीट लिया और कहा “ बस भैया , आज के लिए बहुत हो गया,  बाकी का यात्रा विवरण कल ।" 


*शरद कोकास* 


शनिवार, 30 मई 2026

27.घोड़े की नाल के आकार में क्यों बनी हैं अजंता की गुफ़ाएं

 📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

 🏼 *शरद कोकास* 🏼

*छात्रों का यह दल अजंता पहुँच गया है आज की डायरी में आप पढेंगे अजंता की गुफाओं की खोज कैसे हुई?, इनमे किन विषयों पर चित्र बने हैं ? यह चित्र कैसे बनाये गए ?इनमे किन रंगों का प्रयोग हुआ ?आदि आदि  *

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*भाग 27*

 जनता के साथ अजंता की सैर    

            भोजन के पश्चात पेट ही नहीं मन भी भरा भरा सा लगता है । भोजन शरीर में पहुँचकर उर्जा उत्पन्न करता है वह उर्जा कोशिकाओं में पहुँचकर रक्त प्रवाह को गति देती है और वह रक्त मस्तिष्क तक पहुँचकर समस्त क्रियाकलापों को गति देता है आखिर मन मस्तिष्क के इन्ही सब क्रियाकलापों का योग ही तो है । 

    भाटी जी ने आज हरे मटर की रसेदार सब्ज़ी बनाई थी जो उन्हें गाँव के मज़दूर दे गए थे ,साथ में टमाटर की चटनी भी । होटल के बेस्वाद भोजन से अलग इस भोजन के स्वाद की बात ही कुछ और थी सो हमारा मन प्रफुल्लित था इसलिए आज खाने के बाद टहलने का मन भी नहीं हुआ ।

            भोजनशाला से निकलकर हम लोग सीधे तम्बू में पहुँचे । जिस तरह घूमने जाने की इच्छा रखने वाला नन्हा शिशु अपने पिता का ध्यान आकर्षित कराने के लिए साइकल की ओर ऊँगली  से संकेत करता है उसी तरह अजय ने  मेरे बैग से मेरी डायरी निकाली और  मुझे थमा दी । 

    मैं समझ गया सबकी इच्छा  आगे का यात्रा वृतांत सुनने की है । मैंने डायरी खोली और सवाल किया " तो हम कहाँ थे ? " 

    अजय ने तपाक से कहा " सुलभ शौचालय में .. मेरा मतलब शौच आदि से निवृत होकर आप लोग जलगाँव के बस अड्डे पर गर्मागर्म चने की की मिसल वाला आलू पोहा खा रहे थे । " 

    "ओके ओके ।" मैंने कहा और फिर जनता के बीच अजंता यात्रा का वाचन प्रारम्भ कर दिया ।

            "तो इस तरह नाश्ते के बाद हम लोगों ने अजंता के लिए कूच किया । हमारी डॉज के ड्राईवर जमनालाल जी ने बताया कि जलगाँव से अजंता की दूरी इकसठ किलोमीटर है और इस यात्रा में लगभग एक घन्टा लगता है । आज किसी सीट पर किसी का रिज़र्वेशन नहीं था इसलिए मैंने खिड़की के पास की एक सीट चुनी और उस पर बैठ गया । 

    बचपन से ही यात्रा में खिड़की से बाहर के दृश्यों को देखना मुझे अच्छा लगता है । जिस ज़िंदगी को हम जी नहीं सकते उसकी एक झलक ही मिल जाए तो क्या कम है । 

    हिंदी साहित्य में आलोचना के अंतर्गत जब किसी के द्वारा ग्रामीण जीवन पर कुछ लिखा जाता है और उसमे गाँव के सुख दुःख शामिल नहीं होते अथवा गाँव का बहुत रूमानी वर्णन होता है तो अक्सर कहा जाता है कि उसकी कविता में गाँव बस या रेल की खिड़की से देखे हुए गाँव जैसा है ।"

            "इसीलिए तो भैया हम तेरे को दंगवाड़ा गाँव घुमाने ले जाते हैं ताकि तू आगे चलकर जब बड़ा कवि बने तो गाँव के जीवन का यथार्थ वर्णन कर सके ।" अजय ने तपाक से मेरी इस बात पर कमेन्ट किया ।

    " ठीक है ठीक है, आगे जब बड़े होंगे तब देखेंगे ..क्या पता इस पुरातत्व विभाग में ऐसी जगह नौकरी मिले जहाँ गाँव में ही रहना अनिवार्य हो .. तब भी यह इच्छा पूरी हो जाएगी और बड़े कवि की छोड़ कवि ही बन जाएँ इतना काफी है ।"  

    "ओके भाई .." रवीन्द्र ने कहा " तब की तब देखी जाएगी, चल आगे की डायरी सुना ।"

            " लो सुनो । " मैंने कहा । खिड़की के पास बैठकर बाहर के दृश्यों को देखते हुए कब अजंता आ गया पता ही नहीं चला । अजंता की दूरी दर्शाने वाले मील के पत्थर दिखाई देने लगे थे और मैं उन्हें पढ़ता जा रहा था …अजंता की गुफाएँ 4 कि मी, अजंता केव्ज़  3 कि मी, अजिंठ्या लेण्या 2 कि मी । बौद्धकालीन अजंता की गुफाओं के विषय में कोर्स में मैंने काफी कुछ पढ़ रखा था । 

    मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं कुछ ही देर में बौद्धकालीन युग में प्रवेश करने वाला हूँ । चारों ओर विशालकाय पहाड़ियाँ थीं । आँखों को तृप्त करने वाली हरियाली से यात्रियों को आकर्षित करते हुए दूर दिखाई देने वाले छोटे - बड़े पौधे बस की विपरीत दिशा में भागते प्रतीत हो रहे थे । 

    मेरा मन उससे भी पीछे भाग रहा था । मुझे लगा कि बस कुछ ही देर बाद मेरी आँखों के सामने एक अद्भुत दृश्य होगा जिसमें गेरुए वस्त्रों में कलाकार से दिखाई देने वाले कुछ बौद्ध भिक्षु होंगे, जिनके हाथों में कूचियाँ होंगी और वे किसी गुफा के भीतर चित्रकारी में रत होंगें ।

             मैं सोचने लगा उस कालखंड विशेष के बारे में जब यहाँ यह पक्का रास्ता नहीं रहा होगा, यह मील के पत्थर भी नहीं रहे होंगे,  न वाहनों की कर्कश आवाज़ होगी न धूल न धुआं । बस यहाँ रही होगी यह निर्जन पहाड़ी, नाल के आकार में गुफाओं की लम्बी कतार, आकाश में विचरण करते ढेर सारे पक्षी और वातावरण  में गूंजते  ‘ बुद्धम शरणम गच्छामि ‘ के स्वर । अचानक बस ने आख़िरी  मोड़ लिया और अतीत के खुले आसमान में विचरण करता हुआ मेरा स्वप्न सैलानियों की कारों, टूरिस्ट बसों, छोटी छोटी दुकानों और होटलों की दमघोटू भीड़ के बीच गिरकर चकनाचूर हो गया । वहाँ का शोर सुनकर मुझे लगा जैसे मैं किसी मेले में आ गया हूँ । ड्राइवर ने बस एक किनारे पर लगा दी । हम लोग उतर कर नीचे आए । मैंने एक अंगड़ाई ली और हवा को ज़ोर से भीतर खींचकर फेफड़ों में भर लिया ।

             मैंने चारों ओर नज़रें इस तरह घुमाकर फेंकी जैसे कोई मछुआरा अपना जाल घुमाकर फेंकता है । मुझे उन गुफाओं की तलाश थी जिनके बारे में मैं बचपन से सुनता चला आया था । पूछने पर ज्ञात हुआ कि उन गुफाओं की श्रंखला के प्रवेश द्वार तक पहुँचने के लिए पहले सीढ़ियाँ चढ़नी होंगी । उसके बाद उन गुफाओं का संसार प्रारम्भ होगा जो आज पूरी दुनिया में मशहूर हैं । 

    सीढ़ियों पर चढ़कर हम लोगों ने टिकट खरीदे और प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश किया । मैं अपनी मूर्खता पर मन ही मन हँस रहा था । जाने क्यों मुझे इस बात का गुमान था कि गुफायें अब भी ढाई हज़ार साल पहले की स्थिति में होंगी । 

    इन गुफाओं की खोज हुए भी जाने कितना समय बीत चुका है और अब तो यह बाकायदा एक टूरिस्ट सेन्टर बन चुका है । इस बात का हमें भान था कि हम लोग यहाँ टूरिस्ट की तरह नहीं बल्कि अध्ययनकर्ता की तरह आए हैं और हमें उसी तन्मयता के साथ इन गुफाओं का अवलोकन करना है जिस तन्मयता के साथ कलाकारों ने इन गुफाओं में चित्र उकेरे होंगे ।

गुफा क्रमांक 1 

सीढ़ियाँ चढ़ने के उपरांत हमें जो सबसे पहली गुफा मिली उसे पुरातत्व विभाग ने गुफा क्रमांक एक नाम दिया है । उसके बाद क्रम से गुफा क्रमांक दो, तीन,चार आदि हैं । इस क्रम  का इन गुफाओं के निर्माण काल से कोई सम्बन्ध नहीं है । वास्तव में सबसे पहले जिस गुफा में चित्र उकेरे गए वह गुफा क्रमांक दस है । 

गुफा क्रमांक 2 

इसके बाद इस गुफा के दोनों ओर क्रमश: गुफाएँ कटती चली गईं हैं । अजंता की यह गुफाएँ मनुष्य द्वारा निर्मित वे बेजोड़ गुफाएँ हैं जिन पर भारत को गर्व है । देश विदेश से आए सैलानी इन्हें  देख आश्चर्य चकित हो उठते हैं । अहा ! इतना अद्भुत सौंदर्य ! इन गुफाओं में चित्रकला व शिल्प कला के बेजोड़ नमूने हैं । इनकी किसीसे तुलना नहीं हो सकती । 

गुफा क्रमांक 6 

बुद्धि व श्रम के संयोग से निर्मित इन गुफाओं को देख कर आधुनिक तकनीक भी हैरान है । प्राकृतिक रंगों के निर्माण व उपयोग के बारे में उस युग के मनुष्य की समझ व ज्ञान को देख कर ऐसा नहीं लगता कि कला के प्रति उस मनुष्य का सौन्दर्यबोध किसी भी तरह कम रहा होगा । 

गुफा क्रमांक 10 

इन गुफाओं के निर्माण का उद्देश्य भी स्पष्ट है । इक्कीस सौ वर्ष पूर्व जब बौद्ध धर्म अपने चरम पर था, लाखों की तादाद में बौद्ध भिक्षु दीक्षा ले रहे थे और उन्हें अपनी साधना के लिए किसी एकांत की आवश्यकता थी । इसी आवश्यकता ने इन गुफाओं को जन्म दिया ।

गुफा क्रमांक 19 

मेरे डायरी वाचन के बीच अचानक अजय का एक सवाल कूद पड़ा “ लेकिन यार इन गुफाओं का पता कैसे चला ? इन तक भी डॉ. वाकणकर जैसा कोई व्यक्ति पहुँचा था क्या ? 

गुफा क्रमांक 23 

“हाँ बताता हूँ …” मैंने कहा “आगे यही लिखा है मैंने । बाघोरी नदी के किनारे नाल के आकार में बनी इन गुफाओं की खोज की कहानी भी अत्यंत रोचक है ।


सन अठारह सौ उन्नीस , अंग्रेज़ों के समय की बात है । एक दिन एक अंग्रेज़ शिकारी शिकार के लिए निकला और जंगल में रास्ता भटक गया । उसे एक किसान का लड़का मिला उसने शायद इनाम की लालच में शिकार प्राप्त होने की संभावित दिशा बताते हुए इन गुफाओं की ओर इशारा किया । उस समय यह गुफाएँ असंख्य पेड़ों और लताओं से घिरीं थीं । अंग्रेज़ शिकारी ने दूरबीन से इधर देखा। उसे पेड़ों के पीछे किसी गुफा में एक चित्र नज़र आ गया और वो खुशी से उछल पड़ा । इस तरह यह गुफाएँ सारे संसार में मशहूर हो गईं ।"
गुफा क्रमांक 24 अधूरी है 

इतना कह कर मैं चुप हो गया । मैंने देखा अजय, रवीन्द्र, अशोक सब इस तरह मुझे देख रहे थे जैसे यह बात मैं उन्हें  पहली बार बता रहा हूँ । “फिर क्या हुआ ?“ अशोक ने सवाल किया । “बस अजंता की कला देखते हुए मैं उसमें खो गया । एक एक गुफा की दीवारों पर चित्रित जातक कथाएं, बुद्ध की विभिन्न मुद्राएँ, मुद्राओं में दुख की परिभाषा, चेहरे पर वैराग्य की अनिवार्यता और संसार को सही सही जान लेने का भाव ।

इसके अलावा भी बहुत कुछ था इन चित्रों में …गृहस्थ जीवन के प्रति पति की उदासीनता से आहत यशोधरा, भिक्षुओं के भिक्षाटन ,उपदेश श्रवण,संगीति जैसे विभिन्न क्रियाकलाप, दान की गाथाएँ और जाने क्या क्या, इसका वर्णन शब्दों में संभव ही नही है । 

उन्नीस गुफाओं को पार करते हुए जैसे मैं एक युग पार कर चुका था । हम जिस कला व संस्कृति की बात करते हैं, वह संस्कृति तो यहाँ छुपी हुई है । ऐसी संस्कृति जिसे किसी धर्म या जाति या देश काल की परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता ।


"लेकिन अँधेरी गुफाओं के भीतर कलाकारों ने यह चित्र बनाये कैसे होंगे ?" अजय ने मुझसे सवाल किया । 

"आसान था ।" मैंने कहा । फिल्म की शूटिंग के लिए कैमरामैन जिस तरह रिफ्लेक्टर का उपयोग करते हैं उसी तरह इन कलाकारों ने भी सूर्य की रौशनी को भीतर तक लाने के लिए चमकीली सतह वाले रिफ्लेक्टर्स का उपयोग किया होगा और रंग भी फूल, पत्तों, रंगीन पत्थर  और प्राकृतिक वस्तुओं जैसे चर्बी , पौधों का अर्क आदि की सहायता से बनाये होंगे इसीलिए अब तक यह चित्र जस के तस हैं ।"


"लेकिन मैंने देखा है बहुत सारे चित्रों में अब रंगों का क्षरण हो रहा है ।" अशोक ने कहा । 

" हाँ यह तो है," मैंने कहा  "इतने सारे लोगों का आना, कृत्रिम रौशनी और प्रदूषण कुछ न कुछ असर तो होगा ही, इसीलिए अब कुछ चित्रों को संरक्षित करने के लिए उन पर टचिंग की जा रही है ।" 


"लेकिन इससे तो मूल पेंटिंग्स ख़राब हो जाएँगी " अशोक ने कहा । "हाँ हो सकता है लेकिन किया भी क्या जा सकता है, अजंता अब एक बहुत बड़ा पर्यटन उद्योग है । खैर आगे सुनो " इतना कहकर मैंने फिर डायरी वाचन प्रारंभ कर दिया । 

"गुफाएँ देखते हुए दोपहर के तीन बज चुके थे लेकिन हमें वापस भी लौटना भी था । हम जैसे अध्ययनकर्ताओं के लिए चार -पांच घंटों का यह समय बहुत कम था । यह सोचकर कि ठीक ठाक नौकरी मिल जाने के बाद एक बार फिर दो - चार दिनों के लिए  यहाँ आएँगे हम लोगों ने संतोष कर लिया । हमसे बिछड़कर जैन सर जाने कब पत्थर की गुफाओं से निकल कर लोहे की गुफा यानि बस में आकर बैठ गए थे । 

वैसे भी वे पूर्व में अनेक बार यहाँ आ चुके थे, यह उनके लिए एक रूटीन वर्क की तरह था । हमें आता देख उन्होंने चिन्ता प्रकट की “अरे भाई , भूख- वूख नहीं लगी क्या तुम लोगों को ?” 

भूख एक सच्चाई की तरह हमारे सामने थी और उसे रोटी के चित्र से नहीं मिटाया जा सकता था चाहे वह कितना भी रंगीन और आकर्षक हो । “चलो महेश ।“ मैंने कहा “ भूख मिटाने का कुछ इन्तज़ाम किया जाए ।“ और हम लोग किसी होटल की तलाश में निकल पड़े ।"

" हा आ आ आ " बड़ा सा मुँह फाड़ते हुए अजय ने कहा " बस कर यार इसके आगे की डायरी अब कल सुनेंगे, अभी तो बहुत ज़ोरों की नींद आ रही है ।" 

" ठीक है ।" मैंने कहा । "बाक़ी कल ।" वैसे भी हम लोगों का यह सामूहिक अनुशासन है कि यदि एक व्यक्ति सोने की इच्छा प्रकट करता है तो सभी के लिए वार्तालाप स्थगित करना अनिवार्य होता है । 


मैंने रज़ाई सर तक ओढ़ ली और अपनी आँखें बंद कर लीं । मेरा मन बुद्धकाल में पहुँच गया था । देह को यात्रा के लिए साधनों की आवश्यकता होती है लेकिन मन तो जाने कहाँ कहाँ भटकता रहता है मन की यह यात्रा जारी थी ..बोधगया, सारनाथ, लुम्बिनी, कुशीनगर ..। फिर जैसे तन की यात्रा में नींद आती है मन की यात्रा में भी आना स्वाभाविक था ।

*शरद कोकास*