अगिया बेताल (या अग्नि बेताल) मुख्य रूप से पौराणिक कथाओं, लोककथाओं और हिंदी मुहावरों में इस्तेमाल होने वाला एक शब्द है। इसे अलग-अलग संदर्भों में अलग तरह से समझा जाता है: [1, 2]
1. पौराणिक और लोककथाओं में (एक शक्ति या भूत)
लोक मान्यताओं के अनुसार, 'अगिया बेताल' एक प्रकार की अलौकिक या भूत-प्रेत योनि है जिसके मुख से आग निकलती है। ऐसा माना जाता है कि यह रात के समय श्मशान या मरघट में दिखाई देती है।
📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘 लोक मान्यताओं के अनुसार, 'अगिया बेताल' एक प्रकार की अलौकिक या भूत-प्रेत योनि है जिसके मुख से आग निकलती है। ऐसा माना जाता है कि यह रात के समय श्मशान या मरघट में दिखाई देती है।
✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼
पूर्वकथा - छात्रों का यह दल उत्खनन शिविर में दंगवाडा नामक स्थान पर पहुँचा है ।छात्रों को इस शिविर में आये काफी दिन हो गए हैं और वे थोड़ा थोड़ा ऊबने भी लगे हैं इसलिए कुछ मस्ती तो चाहिए ।राममिलन भैया इन छात्रों में सबसे बड़े हैं और ईश्वर और धर्म कर्म को मानने वाले भी सो यह छात्र उनके साथ थोड़ी बहुत शरारत करते रहते हैं ।आज के इस भाग में भी ऐसी ही एक शरारत का किस्सा है पढ़िए आपको मज़ा आएगा *
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*भाग 18*
*माचिस कौन ले गया , अगिया बेताल*
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*भाग 18*
*माचिस कौन ले गया , अगिया बेताल*
वाकणकर सर के साथ अवशेषों को संरक्षित करने की प्रक्रिया पूर्ण करते ही हम लोगों के अध्ययन का एक आवश्यक अध्याय पूर्ण हो चुका था सो शाम को हम लोग थोड़ा मनोरंजन चाहते थे और उसके लिए सिटी अर्थात दंगवाड़ा जाने से बेहतर और क्या हो सकता था ।
किशोर हमेशा की तरह मुखर था और बार बार राममिलन को छेड़े जा रहा था । नदी के पास बरगद का एक बड़ा पेड़ देखकर किशोर ने कहा “ जानते हो पंडत , इस बरगद पर एक भूत रहता है ।“ राममिलन ने गुस्से में कहा “वो हमें भूत - वूत से डर नाही लगता हमरे बजरंग बली सब भूतों की छुट्टी कर देते हैं । भूत पिसाच निकट नहीं आवै महावीर जब नाम सुनावै ।"
हमें नहीं पता था पंडित राममिलन शर्मा की यह बात सुनकर किशोर त्रिवेदी के दिमाग़ में कोई शरारत जन्म ले चुकी है । खैर, ऐसे ही हँसी मज़ाक करते हुए हम लोगों ने नाला पार किया और दंगवाड़ा गाँव पहुंचे । चौक में पहुँच कर उसी दुकान के पटिये पर बैठकर चाय पी, अखबार पढ़ा और थोड़ी देर गाँव वालों के साथ गपशप करने के बाद वापस कैम्प में जाने के लिए निकल पड़े ।
इतने दिनों में गाँव वालों पर हम लोग ऐसा रोब जमा चुके हैं जैसे हम उन्हीं के बाप-दादों का इतिहास लिखने के लिए यहाँ आये हैं, सो हम लोगों की ख़ातिरदारी भी बढ़िया होने लगी है । गाँव की यह सैर हम लोगों के लिए बहुत रोमांचक होती है । हमें गाँव के लोगों की ज़िन्दगी को करीब से जानने का अवसर भी मिल रहा है और हमारी सामाजिकता की भूख भी इससे शांत हो रही है ।
" गाँव की ज़िंदगी भी कितनी अच्छी होती है ।" अजय ने ज़मीन पर पड़ा एक पत्थर उठाया और काल्पनिक आम की कैरी तोड़ने के अंदाज़ में उसे पेड़ की ओर घुमाकर फेंक दिया ।
"ख़ाक अच्छी होती है ! " रवीन्द्र ने तपाक से कहा "हम लोग एक पर्यटक की तरह यहाँ आये हैं इसलिए यह जीवन हमें अच्छा लग रहा है, अगर कुछ दिन गाँव में बिताना पड़े तो समझ में आ जायेगा, इसलिए कि जिन बुनियादी सुविधाओं की हमें आदत है वे यहाँ नहीं हैं ,सुबह सुबह लोटा लेकर कितने दिन जाओगे भाई ।"
" हाँ यह तुम ठीक कह रहे हो ।" अशोक ने कहा "यह गाँव भी भारत के अस्सी के दशक के अन्य गांवों जैसा ही है । यहाँ न ढंग का स्कूल है न ढंग का अस्पताल । सड़कें भी देखो कितनी ख़राब हैं, पीने का पानी भी अभी मिल रहा है लेकिन जैसे ही गर्मियाँ शुरू होंगी उसकी भी किल्लत हो जाएगी । देश के विकास के लिए कितनी पंचवर्षीय योजनायें बन चुकी हैं लेकिन विकास की रौशनी अभी तक यहाँ नहीं आई है ।"
" फिर भी यार गाँव का जीवन शहर से तो अच्छा है, शुद्ध प्रदूषण रहित वायु, शुद्ध सुस्वादु भोजन और निश्चिन्तता की ज़िन्दगी अहाहा ..। " अजय जैसे किसी वादविवाद प्रतियोगिता में ग्राम्य जीवन के पक्ष में बोल रहा था ।
किशोर भैया हमारी बातें सुनकर ज़रा चिंतित हो उठे " भाई, यह सही है कि हमारी कल्पना के गांवों में बहुत सुन्दर जीवन है, कल कल करती बहती हुई नदियाँ, तितलियों के पीछे भागते बच्चे, गाँव की अमराइयों में ठंडी ठंडी हवा, पेड़ों से आम की खट्टी मीठी कैरियां तोड़कर खाती हुई अल्हड़ युवतियां, मक्के की रोटी सरसों का साग, हरी मिर्च की चटनी ..दूध ,दही,घी, गुड़ शहद आदि की बहुलता ।
लेकिन यह सब होते हुए भी ग्रामवासियों का जीवन दुखद तो है । किसान की फ़सल जब ख़राब हो जाती है वह कर्ज में डूब जाता है, वैसे भी कृषि कार्य से होने वाली आमदनी अब पूरे परिवार की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाती । अन्य रोजगार और कुटीर शिल्प आदि की स्थिति भी ठीक नहीं है । अर्थाभाव के कारण बच्चों को भी काम पर जाना पड़ता है, उनकी शिक्षा पूरी नहीं हो पाती, बीमार पड़ने पर कोई अस्पताल नहीं मिलता, फिर भूत -प्रेत, जादू -टोने जैसे अन्द्धविश्वास के चक्कर में वे आ जाते हैं ।" किशोर ने ग्राम्य जीवन के वास्तविक चेहरे पर पड़ा रूमानियत का पर्दा खींचकर उसे बेनक़ाब कर दिया था ।
अशोक ने किशोर भैया की बात का समर्थन करते हुए कहा "यह सच है कि भारत के गांवों की दशा अब दयनीय होती जा रही है । सिंचाई आदि की उचित व्यवस्था न होने के कारण किसान सूखे की चपेट में आ जाते हैं या बाढ़ उनकी फ़सल लील जाती है फिर उन्हें महाजनों और साहूकारों के चक्कर काटना पड़ता है । इसके अलावा उनके आपसी झगड़े भी हैं जिनकी वज़ह से उन्हें अदालतों के चक्कर काटना पड़ता है । गांवों की बनिस्बत शहरों की स्थिति अभी काफी अच्छी है । यही कारण है कि शहरों की चकाचौंध गाँव के युवकों को आकर्षित कर रही है ..वह पान ठेले पर कुछ युवक हमसे नहीं कह रहे थे ,भैया हम लोगों को भी शहर में कुछ काम -वाम दिलवा दो ।"
बातें करते हुए हम लोग नाले तक पहुँच गए । हम लोग शिविर की ओर लौट रहे थे और अन्धेरा हो चुका था । गाँव की ओर जाते समय हमने इस बात पर ध्यान नहीं दिया था कि पिछले दिनों हुई वर्षा के कारण नाले में पानी कुछ बढ़ गया है और वे पत्थर जिन पर पाँव रखकर हम लोग पहले नाला पार करते थे पानी में डूब गए हैं । जाते समय काफी रौशनी थी और वे पत्थर साफ़ साफ़ दिखाई दे रहे थे लेकिन गपशप के बीच हमें ध्यान ही नहीं रहा कि इस बार जिन पत्थरों पर हमने पाँव रखकर नाला पार किया था उन पत्थरों को चिन्हित कर लें ।
हालाँकि इससे भी कोई फायदा नहीं होता, अँधेरा गहन होता जा रहा था और हम रौशनी के आदी शहर वासियों को गांववालों की तरह अँधेरे में भी वस्तुएँ पहचान लेने का अभ्यास नहीं था अतः ठीक से कुछ दिखाई देना मुश्किल था ।
राम मिलन उन्हें छेड़े जाने की वज़ह से गुस्से में थे और अपनी खामख्याली में हम लोगों से अलग-थलग और आगे आगे चल रहे थे । नाले तक पहुँचने से पहले ही किशोर ने हम लोगों को धीरे से एक टीले की ओट में छुप जाने का इशारा किया और ख़ुद राममिलन के पीछे चलते हुए उनसे कुछ दूरी बना ली । हम समझ गए किशोर अपनी शरारत को अंजाम देने जा रहे हैं । राममिलन नाले पर पहुँचकर कुछ पल ठहरे, हम लोगों की राह देखी फिर यह सोचकर कि हम लोग बहुत पीछे रह गए हैं नाला पार करने के लिए अकेले ही आगे बढ़ गए ।
पत्थरों पर सम्भल कर पाँव रखते हुए जैसे ही वे बीच नाले तक पहुँचे किशोर तेज़ी से दबे पाँव आगे बढ़े और धीरे से उन्हें धक्का दे दिया । राम मिलन धड़ाम से पानी में गिर पड़े और हाय-तौबा मचाने लगे “ अरे कौन है ससुरा हमका गिराय दिया ..। “ और वे जोरों से राम राम कहने लगे । किशोर ने कुछ कदम पीछे हटकर इस तरह अभिनय किया जैसे वे उनकी आवाज़ सुनकर दूर से दौड़े चले आए हों ।
“क्या हुआ पंडत कौनो भूत वूत धक्का दे दिया का ? “ किशोर भैया ने हाँफने का अभिनय करते हुए कहा ।
भूत का नाम सुनते ही पंडित जी की घिग्गी बन्ध गई और वे ज़ोर ज़ोर से रटने लगे “जय हनुमान ज्ञान गुन सागर जय कपीस तिहूँ लोक उजागर ..राम दूत अतुलित बल घामा अंजनी पुत्र पवनसुत नामा ..संकट तें हनुमान छुड़ावै मन क्रम बचन ध्यान जो लावै .. ।“
हम लोग चट्टानों की ओट से बाहर निकलकर जब तक उनके करीब पहुँचे तब तक वे उठकर खड़े हो चुके थे । लेकिन फिर उन्हें ध्यान आया कि उनका एक जूता पानी के भीतर रेत - वेत में कहीं दब गया है । वे झुक कर पानी में हाथ डालकर अपना जूता तलाशने लगे ।
किशोर ने चिल्लाकर कहा “ अरे अशोक जरा माचिस तो देना… पंडत का जूता अन्धेरे में दिख नहीं रहा है ।“ अशोक ने दूर से हाथ बढ़ाकर कहा “लो“ । कुछ सेकंड रुककर किशोर ने फिर कहा “ तुमसे कहा ना ..माचिस तो दे यार अशोक, अन्धेरे में कुछ सूझ नहीं रहा है ।“
अशोक बोला “ अभी तो यार तुम्हारे हाथ में पकड़ाई है माचिस ..तुमने हाथ बढ़ाया था ना या किसने हाथ बढ़ाया था ? “ किशोर सहित हम सब ने एक स्वर में कहा “ हमने तो हाथ नहीं बढ़ाया । “ “ किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया तो ससुरी माचिस कहाँ गई ..कौनो अगिया बेताल ले गया क्या ? “ किशोर बोला ।
अगिया बेताल का नाम सुनते ही राममिलन भैया की तो हवा बन्द हो गई । गनीमत इस समय तक उनका जूता मिल गया था । लेकिन वे जूते पहन ही नहीं पाए और उन्हें हाथ में लिए लिए गीले कपड़ों में ठण्ड से काँपते हुए, डर के मारे हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए और लगभग दौड़ते हुए कैम्प की ओर बढ़ गए ।
हम लोग भी उनके साथ ही थे और बमुश्किल अपनी हँसी दबाते हुए उनका साथ दे रहे थे । हाँलाकि कैम्प तक पहुँचते हुए हँसी रोकना मुश्किल हो गया । पंडित राममिलन तो कपड़े बदलने के लिए तम्बू में घुस गए और हम लोग बाहर ही रुककर पेट पकड़ पकड़ कर हँसने लगे । यह हमने सोचा ही नहीं कि राममिलन भैया हमारे इस तरह हँसने से हमारी शरारत समझ गए होंगे ।
इस घटना से राममिलन भैया अत्यंत दुखी हो गए और उन्होंने घोषणा कर दी कि अब वे एक पल भी इस कैम्प में नहीं रहना चाहते । डॉ. आर्य के आगे जैसे ही हमने अपने उद्दंडता पुराण का पाठ किया उन्होंने बहुत गम्भीरता से कहा “ देखो भाई ,लगता है पंडित बहुत डर गया है, अब उसे और ज़्यादा परेशान मत करो वरना वह कैम्प छोड़कर चल देगा और बात सर तक पहँच जाएगी तो बहुत मुश्किल हो जाएगी ।“
डॉ.वाकणकर कुछ देर पूर्व ही किसी कार्यवश उज्जैन के लिए निकल गए थे । हमने सोचा जब तक वे वापस आएँ तब तक तो मज़ा लिया ही जा सकता है, उसके बाद हम लोग राममिलन भैया से माफ़ी-वाफी मांग लेंगे और उन्हें प्रसन्न कर लेंगे, वैसे भी इतने सह्रदय हैं कि बुरा नहीं मानेंगे । सो हमने डॉ. आर्य को भी मनाकर अपनी शरारत कम्पनी में शामिल कर लिया ।
राममिलन भैया चूँकि हम लोगों से सख्त नाराज़ हो गये थे इसलिए उन्होंने बाहर आकर घोषणा की कि वे हम लोगों के साथ टेंट में रात नहीं बिताएंगे सो वे तुरंत अपना बिस्तर हम लोगों के टेंट से उठाकर ले गए और अवशेषों वाले तम्बू में शिफ्ट हो गए । भोजन करते वक़्त भी राममिलन भैया हम लोगों से रूठे रूठे रहे और चुपचाप अपना भोजन ग्रहण करने के उपरान्त बिना कुछ बोले जाने लगे ।
किशोर भैया ने उन्हें छेड़ते हुए कहा " देखना भैया, अच्छे से सोना, उस तम्बू के ठीक ऊपर एक बरगद का पेड़ है कोई कह रहा था कि उस पर भी एक हज़ार साल से कोई जिन्न रहता है ।"
वे हमारे पास आये और कहा "क्या ख्याल है जिन्न की आवाज़ निकाली जाए ?" मैंने उन्हें टालने के हिसाब से कहा " किशोर भाई अभी तो वो जाग रहे हैं सब समझ जायेंगे , जब सो जायें तब डराना ।" मुझे इस बात का आभास था कि अगर बात हद से बाहर चली गई तो मुश्किल हो जायेगी ।
फिर हम लोग अपने तम्बू में आ गए । रात के किस्सों में बस राममिलन भैया के ही किस्से शामिल थे । अशोक ने कहा " पता है अपने राममिलनवा एक बार पुलिस के सिपाही को धौंस देकर आ गए थे । " अरे.. अरे क्या हुआ था ?" अजय ने अपनी गर्दन सामने की ओर बढ़ाते हुए कहा ।
" हुआ यह कि .." अशोक ने बताना शुरू किया " अपना वह जूनियर नहीं है ..क्या नाम है उसका पटेल ,उसे अपनी साइकिल के पीछे बिठाकर राममिलन भाई कंठाल के पास से कहीं गुजर रहे थे । ग़लती से वे रांग साइड कहीं घुस गए । सामने ही ट्रेफिक का सिपाही था उसने इनकी साइकिल का हैंडल पकड़ लिया और कहा " रांग साइड कहाँ घुसते हो ?" राममिलन भैया का रौब तो उनके कपड़ों से ही जाहिर होता है , चुस्त पैंट वह भी कड़क क्रीज वाली, करीने से इन की हुई शर्ट ,चमचमाता हुआ चमड़े का जूता और आँखों पर गोगल्स । वे सीधे खड़े हो गए और कहा " हमका चीन्हे नहीं हो लगता । फिर डांटने के अंदाज़ में कड़कती हुई आवाज़ में उस सिपाही से कहा ..
ए यू पुलिस मैन ..आई ऑफिसर ..टू द हेड मास्टर आई बेग टू से दैट आई ऍम सफरिंग फ्रॉम फीवर सिंस लास्ट नाईट काइंडली ग्रैंट मी थ्री डेज़ लीव ,अंडरस्टैंड यू ट्रेफिक मैन रोड साइड ... बस पुलिसवाले ने उनकी यह भयानक अंग्रेज़ी सुनकर उन्हें सलूट मारा और कहा .. ठीक है सर.. जाइए ।" उसके बाद हँसते हँसते ही हम लोग सो गए ।
बहरहाल आज की सुबह अन्य दिनों की भांति ही हुई । आज हमारा यहाँ आठवां दिन है । डॉ.वाकणकर कल शाम ही उज्जैन निकल गए थे और आज शाम तक लौटने वाले थे । उनकी अनुपस्थिति में आर्य सर के मार्गदर्शन में हम लोगों ने हमें स्वतन्त्र रूप से सौंपी हुई ट्रेंच क्रमांक चार पर स्वतंत्र रूप से कार्य प्रारंभ किया ।
आज हमने पुन: 'पेग क्रमांक दो' से प्रारम्भ कर दक्षिण की ओर दो मीटर के वर्गाकार टुकड़े में खुदाई की । डॉ.वाकणकर की अनुपस्थिति और आर्य साहब की हमारी ट्रेंच पर निरंतर उपस्थिति की वज़ह से आज मुख्य ट्रेंच पर काम बंद था । वहाँ के सारे मज़दूर भी आदेशानुसार हमारी ट्रेंच पर पहुँच चुके थे इसलिए काम बहुत तेज़ी से हुआ । दोपहर तक हम लोग उत्खनन करते हुए 1.35 मीटर तक पहुँच चुके थे । हम लोगों के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि थी ।
आज हमने सबसे ऊपरी सतह से अर्थात पहले स्तर से कार्य प्रारंभ किया था । आधे मीटर नीचे उतरने के बाद दूसरे स्तर पर हमें दस सेंटीमीटर मोटी रेत की एक परत मिली । हमने डॉ.वाकणकर को दिखाने के उद्देश्य से रेत की उस परत को यथावत रखकर उसके साइड में खोदना प्रारंभ किया ।
इसके पश्चात और गहराई में उतरने पर तीसरे स्तर पर ईट का बना एक फ्लोर प्राप्त हुआ । इस तरह अब हमारे सामने सीढ़ीनुमा तीन सतह थीं सबसे ऊपरी सतह पर मिट्टी, फिर दूसरी सतह पर भी मिटटी लेकिन उसके नीचे रेत और तीसरी सतह पर ईटों का बना फ्लोर ।
इस फ्लोर को स्पष्ट रूप से प्राप्त करने के लिए हमने बाईं ओर इसका विस्तार किया अर्थात बाईं ओर थोड़ी खुदाई और की । ज़मीन के इतने नीचे रेत की परत देखकर हम लोगों को आश्चर्य हुआ क्योंकि उसके ऊपर के दो स्तरों में सिर्फ मिटटी थी । हम सोच में पड़ गए कि इतने नीचे रेत कैसे पहुँची होगी ?
रेत की परत के विषय में बताते हुए डॉ.आर्य ने कहा " तीसरे स्तर पर जो ईटों का फ्लोर है वह किसी बस्ती का प्रतीक है । हो सकता है उस समय नदी की बाढ़ यहाँ तक आई हो और उसमें यह बस्ती डूब गई हो ,यह रेत की सतह उसी वज़ह से है, लेकिन अगर यह इसी स्तर पर काफी दूर तक मिलेगी तभी यह कन्फर्म होगा अन्यथा यह किसी के द्वारा इकठ्ठा की गई रेत भी हो सकती है । उसके ऊपर की सतह पर मिटटी होने का अर्थ है कि बाढ़ के बाद जब कई बरस बीत गए और यह ज़मीन गाद मिटटी आदि से पट गई उस पर फिर से नई बस्ती बस गई ।"
शाम का काम समाप्त होने से पूर्व डॉ.वाकणकर शिविर पहुँच चुके थे । मुख्य ट्रेंच देखने के बाद वे हमारी प्रशिक्षण ट्रेंच पर आये । सबसे पहले उन्होंने तीसरे स्तर पर प्राप्त ईटों की इस फ्लोर का अवलोकन किया। हम लोगों ने उनसे रेत की उस सतह के विषय में भी पूछा ।
काफी देर तक अवलोकन करने के पश्चात उन्होंने कहा " यह ईटों का फ्लोर किसी ताम्राश्मयुगीन मकान का हिस्सा लगता है जो किसी आक्रमण, अग्निकांड अथवा बाढ़ के फलस्वरूप नष्ट हुआ है । केवल रेत के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता है कि यह सभ्यता बाढ़ की वज़ह से नष्ट हुई होगी । यह भी केवल अभी अनुमान है । अभी हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच रहे हैं । उत्खनन के विस्तार में जाने पर ही यह तय हो सकेगा कि वास्तविक कारण क्या था ।"
सर द्वारा प्रदत्त इस जानकारी ने हमें उत्साह से भर दिया । हमें याद आया कि हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो में भी खुदाई के दौरान इसी तरह पूरा का पूरा शहर निकला था । वहाँ उन अवशेषों के बीच खड़े पुरातत्ववेत्ताओं के छाया चित्र हम लोगों ने किताबों में छपे हुए देखे थे ।
हम लोग कल्पना करने लगे कि बस दो-तीन दिनों में हम भी यहाँ पूरा शहर ढूँढ निकालेंगे और फिर इन अवशेषों के बीच खड़े रहकर फोटो खिचवायेंगे । ग़नीमत कि डॉ वाकणकर से हम लोगों ने अपने इस शेखचिल्ली वाले ख़्वाब के बारे में कुछ नहीं कहा वर्ना वे उसी क्षण हमें डंटियाते हुए हमारा स्वप्न भंग कर देते ।
यह बात तो हमें बहुत बाद में समझ आई कि किसी भी अवशेष की प्रारम्भिक अवस्था को देखकर उसके भविष्य के बारे में अटकलें नहीं लगाना चाहिये क्योंकि अनुमान गलत भी हो सकते हैं । बिना सम्पूर्ण प्रमाणों के केवल पूर्वाग्रहों के आधार पर लिखा गया इतिहास हमेशा हमेशा के लिए गलत मान्यताओं को स्थापित कर देता है । हमारे देश के इतिहास लेखन में कई बार ऐसा हुआ है जब यथार्थ से अधिक अनुमान या कल्पना को स्थान दिया गया ।
शिविर में वापस लौटते हुए हमने सर से सवाल किया "सर, लेकिन केवल अनुमान या कल्पना के आधार पर लोग इतिहास कैसे लिख देते हैं ? ' सर ने कहा "इसके अनेक कारण हो सकते हैं जैसे काम की जल्दबाज़ी, आधा अधूरा ज्ञान, पूर्वाग्रह, पुरस्कार या नाम हासिल कर लेने का लोभ या सत्ता का दबाव आदि । हालाँकि कई बार पूरे प्रमाण मिलते ही नहीं हैं । इतिहासकारों में इस बात पर विवाद अब तक जारी है कि ऐसी स्थिति में निष्कर्ष पर मुहर लगानी चाहिए या नहीं ।"
जो भी हो आज साईट से लौटते समय हम लोग बहुत उत्साह में थे । ऐसा लग रहा था जैसे हमारा आना सार्थक हो गया है । इस खुशी में आज हम लोग फिर एक बार सिटी का चक्कर लगा आए । हाँ ..आज राम मिलन भैया हमारे साथ नहीं गए ।
*शरद कोकास*
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