गुरुवार, 28 मई 2026

23-ये बकरे और मुर्गे नहीं.. इंसान हैं

कौन हैं यह लोग जिनकी जान की कीमत एक जानवर से भी कम  है ,पढ़िए इस एपिसोड में 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा-पिछले भाग में आपने पढ़ा रोम के गुलामों के बारे में कि कैसे जब  इन खदानों का पता जैसे ही अखाड़ों के मालिकों को पता चला, वे गुलामों को खरीदने के लिए इन खानों में पहुँचने लगे । ये लोग जैसे ही खानों में पहुँचते नग्न गुलाम इनके सामने प्रस्तुत किये जाते और ये लोग जिस तरह बैल या बकरे खरीदते है उस तरह इन्हें खरीदने वाले इनके शरीर के अंग टटोल टटोल कर इनका सौदा करते और इनकी कीमत लगाते । ज़िबह किये जाने वाले जानवर से भी कभी उसकी मर्ज़ी पूछी नहीं जाती । वैसे भी इन खदानों में इन  गुलामों की ज़िन्दगी साल या ज़्यादा से ज़्यादा दो साल होती थी । खदान के मालिकों को उनके मरने से पहले उनकी कीमत मिल जाती थी । “ इतना कहकर मैं चुप हो गया । मुझे नींद नहीं आ रही थी लेकिन मैं कुछ कहना भी नहीं चाहता था ।

 📒📒📒📒📒

23  भाग तेईस 23 

*ये बकरे और मुर्गे नहीं.. इंसान हैं*  

मैं तम्बू की छत की ओर एकटक देख रहा था जैसे मुझे वहाँ रोम के उन गुलामों के यातना गृह दिखाई दे रहे थे । “ क्या हुआ शरद ? ” रवीन्द्र ने मुझे छत की ओर ताकते देख पूछा । 

    मैंने छत की ओर देखते हुए ही जवाब दिया ... “ देखो रवीन्द्र ..अखाड़ों के दलाल, नूबिया की उस खदान में स्पार्टाकस को और अन्य गुलामों को खरीदने आए हैं । स्पार्टाकस और उसका एक थ्रेशियन साथी चुपचाप उनके सामने खड़े है ..नंग-धड़ंग, दोनों की दाढ़ी बढ़ी हुई है, उनके शरीर पर अनगिनत ज़ख्म हैं जिनमें मवाद पड़ चुका है, देह पर चाबुकों की नीली धारियाँ हैं, शरीर से असहनीय बदबू उठ रही है, शरीर का मल और गन्दगी शरीर पर ही सूखी पपड़ियों के रूप में चिपकी हुई है । 

उनके शरीर से मांस गायब है और चमड़ी में मढ़ी हुई हड्डियाँ दिखाई दे रही हैं , आँखें मानो अपने पपोटों से बाहर आ चुकी हैं , दलाल उनके  निरीह, लटके हुए ,निरर्थक जननांगों को छूकर देख रहे हैं जैसे वे यह तय करना चाहते हों कि रोम के अखाड़ों में इन ग्लेडियेटर्स के नग्न शरीर लड़ते हुए कितनी उत्तेजना उत्पन्न करेंगे  और उनके प्रदर्शन से वे कितना धन कमा सकेंगे  .. । 

इन ग्लेडिएटरों का जीवन बस एक या दो माह का है इतने बस के लिए इन्हें खिला पिलाकर मर जाने के लिए  तैयार किया जाएगा, इन्हें मरता हुआ देख रोम की यह संपन्न अभिजात्यवर्गीय जनता खुश होगी ... । “ रवीन्द्र मुझे थपकियाँ देकर सुलाने की कोशिश करने लगा । उसने सिर्फ इतना कहा कि ..” मुझे भी बाज़ार में बिकते बकरों और मुर्गों को देख कर यही अनुभूति होती है ..। “

  “रवीन्द्र...“ मैं अचानक ज़ोरों से चीखा “ ये बकरे और मुर्गे नहीं हैं.. इंसान हैं .. मेरे - तुम्हारे जैसे इंसान, इनके पास भी वही सब कुछ है जो हमारे पास है ..हमारे जैसा मस्तिष्क और चेतना ..और इनका कत्ल करने के इरादे से इन्हें खरीदने वाले भी इन्हीं के जैसे इंसान है .. इंसान-इंसान में इतना भेद ? क्या इन्हें एक मनुष्य की तरह जीने का हक़ नहीं है ? ” इसके बाद रवीन्द्र ने कुछ नहीं कहा , वह तब तक मुझे थपकियाँ देता रहा ..जब तक मुझे नींद नहीं आ गई ।

सुबह नदी से लौटते हुए अशोक ने कहा “ सॉरी यार, कल बहुत ज़ोरों से नींद आ रही थी, आगे की कहानी सुन नहीं पाया अच्छा यह बता कि फिर स्पार्टकस अखाड़े तक कैसे आया ?" सुबह तक मैं रात की भावनाओं की गिरफ़्त से बाहर निकल चुका था । 

    मैंने कहा “बस, गुलामों का दलाल लेण्टुलस बाटियाटस अन्य गुलामों के साथ उसको भी खदान से खरीद लाया और लड़वाने के लिए तैयार करने लगा । “ अजय ने पूछा "तो उन्हें  ग्लेडियेटर बनने के लिए कोई ट्रेनिंग-वेनिंग दी जाती थी क्या ?” “ हाँ ।” मैंने कहा “ न केवल ट्रेनिंग दी जाती थी बल्कि अच्छी तरह से खिलाया पिलाया भी जाता था, गेहूँ, जौ, माँस और पनीर, और बाटियाटस तो उनके लिए  स्त्रियों का प्रबन्ध भी करता था ।“ “ अरे वा फिर तो ग्लेडियेटर के तो ऐश हो जाते होंगे । “ अजय ने खुश होते हुए कहा ।

“ नहीं ।“ मैंने कहा “उसका यह मानना था कि ग्लेडियेटर के भीतर दम खम पैदा करने के लिए उसे स्त्री का संग ज़रूरी है, तब वह अच्छी तरह खाता है और लड़ता है " "और अच्छी तरह मरता भी है ।“ अशोक ने बीच में  ही मेरी बात लोक कर कहा । “ हाँ सही है" मैंने कहा "मगर यह भी तो देखो कि वह बाटियाटस उन्हें किस तरह स्त्रियाँ परोसता था । यह उसी तरह था जैसे वह उन्हें  खाना और अन्य सुविधायें देता था  । उन्हें  स्वस्थ्य, पुष्ट और अक्षत कुमारी स्त्रियाँ देने से पहले वह ख़ुद उनकी आज़माइश करता था । यह दो हज़ार साल पहले का रोम का समाज था जहाँ स्त्रियों की स्थिति गुलामों से भी बदतर थी और उन्हें  मनुष्य न समझ कर एक जिंस समझा जाता था । जबकि सभ्यता के आरम्भ में ऐसा नहीं था । “

“उसने स्पार्टाकस भी को एक स्त्री दी थी ना ?” रवीन्द्र ने मेरे स्त्री विमर्श के भाषण को बीच में रोककर पूछा । “हाँ “ मैंने कहा “उसका नाम वारीनिया था । बाटियाटस उससे इसलिए चिढ़ता था क्योंकि पहली बार उसे हाथ लगाते ही उसने बाटियाटस को लात घूँसों से पीट डाला था, वह ख़ुद एक गुलाम थी और गुलामों के इस दलाल से घृणा करती थी । बाटियाटस ने उसे सज़ा के तौर पर स्पार्टाकस को सौंप दिया था इसलिए कि उसका मानना था कि वारीनिया को पुरुष की ज़रूरत नहीं है और स्पार्टाकस को स्त्री की  । लेकिन यह उसका भ्रम था, आगे जाकर उन दोनों में प्रेम हुआ और वारीनिया इतिहास में स्पार्टाकस की ऐसी प्रेमिका के रूप में प्रसिद्ध हुई जिसने स्पार्टाकस को रोम की इस क्रूर प्रथा और गुलामी के खिलाफ विद्रोह करने के लिए  प्रेरित किया ।“

“प्रेम इंसान को किन ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है ।“ रवींद्र ने कहा । “ हाँ यह सच है ।" मैंने कहा "प्रेम अपने आप में एक विद्रोह है, यह विद्रोह की मानसिकता को जन्म  देता है, सब कुछ बदल डालने की यह भावना जो अपनी स्थिति को बदलने से प्रारंभ होती है अपने परास में सम्पूर्ण समाज को शामिल कर लेती है । दुनिया में अनेक प्रेम कथाएँ मशहूर हैं जिनमे प्रेमियों ने अपने निज को विस्तार देने के लिए प्रेम किया लेकिन स्पार्टकस और वारीनिया का प्रेम उन हजारों हज़ार गुलामों की मुक्ति के लिए था जिन्हें रोम की राजसत्ता ने पशुओं से भी बदतर स्थिति में पहुँचा दिया था । " 

“ए भाई, ग्लेडियेटर्स की लड़ाई और रोमन सम्राटों के मनोरंजन के बारे में भी तो कुछ बता ।“ अजय ने कहा । इससे पहले कि मैं कुछ बोलता राममिलनवा बोल पड़े.. “ ऊ सब छोड़ो हियाँ हमरा पेट विद्रोह कर रहा है ..तनिक नास्ता वास्ता हुई जाए फिर सुनेंगे तोहार कहानी ।“ भूख तो हम सभी को लग रही थी और इससे पहले कि हम लोग अपने  ट्रेंच रूपी अखाड़े में कूद पड़ें पेट में कुछ डालना ज़रूरी था ..सो हम लोगों ने भोजनशाला की  ओर प्रस्थान किया ।

नाश्ते के बाद हम लोग टीले पर पहुँच गए  ..बहुत बड़ा टीला और बीच में ट्रेंच । अशोक ने कहा  “यह बिलकुल हमारे उज्जैन में जो पहलवानी के अखाड़े हैं उसकी तरह दिखाई दे रहा है, अगर इसमें  मिट्टी डाल दी जाए तो यह कुश्ती के काम आ सकता है ।“ रवीन्द्र के दिमाग़ में अभी तक रोम के एम्फिथियेटर अखाड़े घूम रहे थे । उसने पूछा .” शरद उन अखाड़ों में भी ऐसी ही मिट्टी होती थी क्या ?“ मैंने कहा “नहीं उनमें रेत होती थी क्योंकि सूर्य की रोशनी में रेत पर खून की चमकती हुई बूँदें अद्भुत दृश्य उपस्थित करती थीं जिन्हें  देख कर रोम के अय्याश लोगों को बहुत मज़ा आता था ।“

रवीन्द्र ने कहा “गज़ब का सौन्दर्यबोध था उनका, सच कहूँ तो बहुत विकृत । अच्छा ग्लेडियेटर्स की यह लड़ाई कैसे होती थी ?” मैंने कहा “ चलो तुम्हें  वहाँ का दृश्य दिखाता हूँ । जिस तरह हमारे यहाँ स्टेडियम होता है उस तरह का होता था यह एम्फिथियेटर । बीच में यह अखाड़ा जिसे एरीना कहते हैं । जिस तरह क्रिकेट देखने के लिए स्टेडियम में भीड़ इकठ्ठा होती है उस तरह की भीड़ यहाँ भी उपस्थित है । ठीक वैसा ही उन्माद, शोर, उत्तेजना । 

    साइड की दीवार के पास एक शेड है जहाँ ग्लेडियेटर के जोड़े लड़ने के लिए  प्रतीक्षारत हैं । शेड के दरवाजे से एरीना का दृश्य देखा जा सकता है । मैदान के एक ओर गाने - बजाने वालों का एक समूह बैठा है । जब तक लड़ाई शुरू नहीं हो जाती यह गायन से और वाद्ययंत्रों से लोगों का मनोरंजन करता रहेगा । लड़ने वाले हर जोड़े में एक थ्रेसियन है और एक यहूदी या अफ्रिका का रहने वाला हब्शी । जोड़े के दोनों ग्लेडियेटर आपस मंे घर परिवार की बातें कर रहे हैं , जबकि उन्हें  पता है कि उनमें से एक को थोड़ी देर बाद मर जाना है ।"

"पहला जोड़ा एरीना में दाखिल हुआ है । उन्होंने अपने हाथ व छुरे की मूठ को रेत से रगड़ा ताकि पकड़ मजबूत बनी रहे, अखाड़े के उस्ताद ने खेल के प्रारंभ होने की सूचना देते हुए अपनी चांदी की सीटी बजाई और दोनों ग्लेडियेटर आपस में भिड़ गए । वे लगातार पैंतरा बदलते हुए एक दूसरे पर वार करने की फ़िराक में हैं, लेकिन कोई दूसरे को मौका नहीं दे रहा है । शोर बढ़ता जा रहा है । 

    अचानक एक का छुरा चमका और दूसरे के सीने पर खून की एक लकीर खिंच गई । रोमन दर्शक तालियाँ बजा रहे हैं । फिर दोनों एक दूसरे से गुंथ गए हैं, जैसे उनमें बरसों पुरानी दुश्मनी हो, जैसे वे सचमुच एक दूजे के खून के प्यासे हों । फिर अचानक एक की बाँह में दूसरे का छुरा धँस गया है, रक्त  की एक धार निकली और रेत पर बिखर गई । वह धरती पर गिर पड़ा, फिर लड़खड़ाता हुआ उठ खड़ा हुआ, जनता उसके उठने पर ताली बजा रही है । उठते ही उसने  अपने भाले से पहले  ग्लेडियेटर पर वार किया । उसका चेहरा रक्त में डूब गया है । वह अपनी आँखों में भरा खून साफ़ कर रहा है ।"

"क्यों भाइयों ,आज काम-वाम नहीं शुरू करना है क्या ?" आर्य साहब ने टीले पर पहुँचते ही हम लोगों को बातों में मशगूल देखकर टोका ।"हाँ सर करते हैं न , यह शरद कल की अधूरी स्टोरी को पूरा कर रहा था । अजय ने कहा .. "भाई स्टोरी तो बाद में पूरी कर लेना पहले कल जो इस निखात में काम शुरू किया था उसे तो पूरा करो" आर्य सर ने कहा । इसके बाद हम लोगों ने कुदाल फावड़े उठा लिए और खुदाई के काम में लग गए काम करते हुए बात करना संभव नहीं था इसलिए ग्लेडिएटरों की लड़ाई के आख्यान को दोपहर के भोजन तक स्थगित कर हम लोग ताम्राश्मयुगीन सभ्यता की गुत्थियों से लड़ने में लग गए ।


⚫ *शरद कोकास* ⚫



◼◼◼◼◼◼◼


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें