यानी हम सबके प्रिय डॉ वि श्री वाकणकर जिन्होंने 1957 मे भीमबैठका मे चट्टानों पर बनाए गए चित्रों की खोज की थी
📕 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📕
✍🏽 *शरद कोकास* ✍🏽
उज्जैन से बड़नगर जाने के मार्ग पर इंगुरिया है जहां से भीतर की ओर एक गाँव है दंगवाड़ा यहाँ चम्बल नदी के किनारे एक ताम्रशमयुगीन साइट मिली थी जहाँ सन 1979- 80 मे विक्रम यूनिवर्सिटी और मध्यप्रदेश शासन द्वारा उत्खनन करवाया गया था । विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला के छात्रों के लिए इस उत्खनन मे शामिल होना उनके कोर्स या प्रेक्टिकल के अंतर्गत शामिल था ।
तो अब हम अतीत मे वर्तमान का प्रक्षेपण करते हुए चलते हैं उन दिनों मे जब यह छात्र उत्खनन के लिए 'दंगवाड़ा' नामक स्थल पर आये हुए हैं । आने के बाद से वे विभिन्न चर्चाओं में लगे हैं और अब तक उनकी बातचीत में अयनांत की चर्चा, हरक्युलिस और हनुमान, मिस्त्र के पिरामिड, ग्रीक माइथोलॉजी, ट्रॉय का युद्ध, सिक्कों के बारे में बातचीत आदि शामिल हो चुके हैं । आज उनका तीसरा दिन है और सुबह हो चुकी है । चम्बल के घाट पर स्नानादि से निवृत होकर और भाटीजी की भोजनशाला में नाश्ता करने के उपरान्त अब सभी छात्र ट्रेंच पर पहुँच चुके हैं ..अब आगे पढ़िए
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8⃣ *भाग -आठ* 8⃣
भाग 8 - *भीमबैठका के आलू वाले बाबा*
उज्जैन के निकट दंगवाड़ा के इस पुरातात्विक उत्खनन शिविर में हम लोगों का यह तीसरा दिन है । हालाँकि सही ढंग से काम की शुरुआत का यह पहला ही दिन था । परसों हम लोग पहुँचे थे और कल का दिन तो केवल निरीक्षण में ही बीत गया था ।
आज हम लोग बिलकुल ठीक टाइम पर साईट पर पहुँच गये । डॉ.वाकणकर अपना चोगे नुमा काले रंग का लम्बा सा कोट पहने ट्रेंच पर उपस्थित थे और मजदूरों से पिछले दिन के काम की रपट लेते हुए उनके हालचाल पूछ रहे थे ।
यह फरवरी की एक सुहानी सुबह थी और बरगद के घने पत्तों से झाँकती हुई नर्म धूप हम तक पहुँच रही थी हालाँकि वातावरण में उपस्थित ठण्ड से वह खौफ़ खा रही थी और कुछ सहमी सी थी । हमने धूप को सलाम किया और उससे कहा ..डरो मत ठण्ड तुम्हें खा नहीं जायेगी ।
वाकणकर सर अपने दोनों हाथ किसी क्रिकेट अम्पायर के कोट की तरह दिखाई देने वाले अपने कोट की लम्बी जेबों के भीतर डाले हुए थोड़ा झुककर ट्रेंच की गहराई देख रहे थे । कार्य प्रारंभ करने से पूर्व यह परीक्षण आवश्यक होता है । मेरी इच्छा उनके हाथों को देखने की हो रही थी । मैं जानता था यही वे हाथ हैं जो इतिहास में गहराई तक उतरने का हौसला रखते हैं ।
रवीन्द्र ने देखा कि मैं सर के कोट को बहुत ध्यान से देख रहा हूँ तो जाने कैसे उसने मेरे मन की बात समझ ली । "पता है शरद " उसने कहा ... " सर हमेशा ऐसे ही लम्बी लम्बी जेबों वाले कोट पहनते हैं, ऐसे ही इनके एक कोट का किस्सा भीमबैठका गुफ़ाओं में शैलचित्रों की खोज से भी जुड़ा है ।
"अच्छा !" मुझे वह किस्सा जानने की उत्सुकता हो रही थी.. " कोट का भीमबैठका से क्या सम्बन्ध है ? ऐसा क्या हुआ था, बताओ तो .." मैंने उससे पूछा ।
रवीन्द्र ने धीमी आवाज़ में बताना शुरू किया .." यह सन सत्तावन की बात है । वाकणकर सर एक बार भोपाल होशंगाबाद मार्ग से कहीं जा रहे थे । अचानक बातों बातों में उनके एक सहयात्री ग्रामीण ने बताया कि साहब यहाँ जंगल के अन्दर भूत -प्रेतों के फोटो बने हुए हैं । वाकणकर साहब भूत-प्रेत में तो विश्वास करते नहीं हैं लेकिन उन्हें कुछ खटका हुआ, हो सकता है कोई प्राचीन धरोहर इन जंगलों में हो ।"
"अरे हाँ.." मैंने बीच में रवीन्द्र को टोकते हुए कहा "अजंता की गुफाओं की खोज भी तो ऐसे ही हुई थी ना, एक अंग्रेज़ को किसी चरवाहे ने बताया था कि जंगल में कोई भूत का फोटो है फिर उसने दूरबीन से देखकर गुफाओं में चित्र ढूँढे थे ।"
"हाँ ऐसा ही कुछ समझ लो ।" रवीन्द्र ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा " बस फिर क्या था, वे वहीं बस से उतर गए और जंगल के भीतर चले गए । वहाँ उन्हें एक बाबा की कुटिया मिली उन्होंने बाबा से वहाँ आने का अपना उद्देश्य बताया और उसी कुटिया में वे ठहर गए ।"
"फिर क्या हुआ ?" अब मुझे कहानी में मज़ा आ रहा था । "फिर.." रवीन्द्र ने मुझे उत्सुक जानकर मुस्कुराते हुए कहा । " अगले दिन वाकणकर सर जंगल के भीतर चले गए । वहाँ अभी जैसा कोई रास्ता तो था नहीं, बस जंगल ही जंगल था । फिर उन्हें बड़ी बड़ी चट्टानें मिलीं जिन पर चढ़ते - उतरते हुए वे पहली गुफ़ा तक पहुँच गए ।
उस पहली गुफ़ा में उन्हें जब आदिम मानव द्वारा बनाया गया पहला शैल चित्र मिला तो वे खुशी से उछल गए । फिर तो उन्होंने ठान लिया कि वे सुबह सुबह ही जंगल के भीतर निकल जाया करेंगे और गुफ़ाओं की खोज करेंगे ।
"यार, लेकिन गुफाओं की खोज से इस कोट का क्या ताल्लुक़ है? " मेरे दिमाग़ में अब भी वह कोट लहरा रहा था । " बता रहा हूँ ना भाई, इतने उतावले काहे हो रहे हो ।" रवीन्द्र ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और धीरे से कहा "अब वहाँ तो घना जंगल था । कुछ खाने पीने की व्यवस्था तो जंगल में थी नहीं । बाबाजी की कुटिया में भी कुछ नहीं था लेकिन कोई उनका भक्त उन्हें बोरा भर आलू दे गया था सो वे इसी चोगे नुमा कोट की जेब में बाबाजी की कुटिया से कुछ कच्चे आलू और माचिस रखकर जंगल के भीतर निकल जाते थे ।
वे दिन भर जंगल में भटककर लताओं और वृक्षों के झुरमुट के पीछे छुपी गुफाओं में हज़ारों साल पहले के मनुष्य द्वारा बनाई हुई रॉक पेंटिंग्स खोजते थे और शाम होते ही साधु बाबा की कुटिया में लौट आते । दिन में जब भी उन्हें भूख लगती वे आलू भूनकर खा लिया करते थे । । उनकी दाढ़ी बढ़ गई थी और हुलिया भी अजीब सा साधू सन्यासियों जैसा बन गया था ।
वे हमेशा जेब में आलू रखते थे और उन्हें भूनकर खाते थे इसलिए जंगल के पास के गाँव वासी उन्हें ‘आलू वाले बाबा‘ कहकर पुकारने लगे थे । आख़िर एक एक कर उन्होंने जंगल की गुफाओं में छिपे वे तमाम शैल चित्र ढूंढ निकाले जो उस आदिम मनुष्य ने बनाये थे । उनकी इस खोज के लिए उन्हें पद्मश्री अवार्ड हुई और सम्पूर्ण विश्व में उनका नाम हुआ । ऐसी होती है काम की लगन ।“
"लेकिन कुछ भी कहो, भीमबैठका की गुफाओं में शैलचित्रों की खोज बहुत महत्वपूर्ण काम है ।" मैंने कहा " अगर सर इन्हें नहीं खोजते तो न जाने और कितने साल यह चित्र जंगलों में लताओं और पेड़ों के बीच छुपे रहते । लेकिन उस आदिम मनुष्य के बारे में भी सोच कर देखो जिसने यहाँ ये चित्र बनाये होंगे । वैसे यहाँ कितने शैलाश्रय होंगे रवीन्द्र ? " रवीन्द्र ने बताया " यहाँ लगभग साढ़े सात सौ शैलाश्रय हैं जिनमें पाँच सौ शैलाश्रयों में चित्र बने हुए हैं जिनका काल चालीस हज़ार वर्ष से एक लाख वर्ष पूर्व तक का माना जाता है । इन आदिम गुफाओं में पूर्व पाषाण काल से मध्य पाषाण काल तक का मनुष्य रहता था ।
"भीमबैठका के इस पुरातात्विक क्षेत्र में इनके अलावा शिलाओं पर लिखी अनेक जानकारियाँ भी मिलती हैं । इन शैलचित्रों में उस आदिम मनुष्य के जीवन के अनेक क्षण चित्रित हैं जिनमें सामूहिक नृत्य, शिकार के दृश्य, पशु -पक्षी और वन्य प्राणियों के चित्र, युद्ध और मनुष्य के दैनिक क्रियाकलापों से जुड़े चित्र हैं । यह सारे चित्र विभिन्न खनिज और वानस्पतिक रंगों से बनाए गए हैं जिनमें गेरुआ, लाल, सफ़ेद रंग प्रमुख हैं कहीं कहीं पीले व हरे रंग का प्रयोग भी हुआ है ।" रवीन्द्र धीमी आवाज़ में वैश्विक महत्व के इन शैल चित्रों के बारे में बता रहा था ।
"बस कर भाई, तेरा तो पूरा निबंध रटा हुआ है ।" मैंने रवीन्द्र को रोकते हुए कहा " अब यह अपने कोर्स में भी नहीं है वर्ना मैं भी रट लेता ।" "तो मुन्ना, क्या जो चीज़ कोर्स में होगी वही रटेगा क्या और तुझे तो इस साल भी टॉप करना है फिर आगे चलकर कवि और कथाकार बनना है तुझे तो मनुष्य की इस कहानी में रूचि होना चाहिए ।"
रवींद्र की बात सुनकर मुझे थोड़ी झेंप सी महसूस हुई " नहीं यार, मनुष्य की कहानी तो मुझे अच्छी तरह पता है ,दरअसल जब से तूने आलू का ज़िक्र किया है मुझे भूख सी लगने लगी है और मेरा आलूबोंडा खाने का मन हो रहा है ।" " धत तेरे की ..भुक्खड़ कहीं का । " रवींद्र ने कहा ।" कोई बात नहीं ,भाटी जी से कहेंगे कल नाश्ते में आलुबोंडा ही बनवायेंगे ।
रवींद्र कुछ देर तक चुप रहा फिर उसने गंभीर होकर कहा "अब तुझमें और उस आदिम इंसान में फ़र्क ही क्या है वह भी इसी तरह रात दिन सिर्फ़ खाने के बारे में ही सोचता रहता था । शिकार के लिए सुबह सुबह निकलता और देर रात घर लौटता फिर अगले दिन वही काम ।
हाँ याद आया, भीमबैठका के इन गुफ़ा चित्रों में उस आदिम मनुष्य के जीवन की दैनिक घटनाओं के अलावा उस मनुष्य के आदिम धर्म तथा उससे सम्बंधित अनुष्ठानों के चित्र भी हैं, जैसे मनुष्य जब शिकार करने जाता था तो वह हिरन की आकृति बनाकर उस पर भाले से वार करता था, उसकी मान्यता थी कि इससे शिकार अवश्य ही प्राप्त होगा । कुछ गुफाओं में शहद जमा करने के चित्र हैं , कुछ में हाथी घोड़ों की सवारी के चित्र हैं , कुछ में सूअर, कुत्तों,साँप बिच्छू और घडियालों के चित्र भी हैं । कार्बन डेटिंग से पता चला है कि प्याले नुमा कुछ निशान तो एक लाख वर्ष से भी पुराने हैं ।"
रवीन्द्र भीमबैठका के बारे में बताते हुए जैसे उन गुफाओं में ही पहुँच गया था । हम लोग पुरातत्व के छात्र है सो हमारी रूचि कुछ टेक्नीकल बातों में अधिक होती है सो उसका बताने का तरीका भी कुछ ऐसा ही था । "लेकिन यार उसने वे रंग बनाये कैसे होंगे जिनसे बनाए चित्र आज तक कायम हैं ? मेरे मन में यह सवाल शुरू से ही उमड़ रहा था ।
"भाई ,वह आदिम मानव इस तकनीक में तो वाकई बहुत आगे था ।" रवींद्र ने कहा " उसने यह चित्र प्राकृतिक रंगों से बनाये । प्रारंभिक चित्र तो उसने सफ़ेद और लाल रंग से बनाये जिसके लिए उसने मैंगनीज़, हैमेटाईट जैसे खनिजों और लाल पत्थरों का उपयोग किया । मध्यकाल के कुछ चित्र हरे व पीले रंगों से बने हैं इसके लिए उसने वनस्पतियों का उपयोग किया । इसके अलावा लकड़ी के कोयले से बने रंगों का भी प्रयोग है ।"
"लेकिन यह रंग अब तक टिके कैसे हैं?" मेरा अगला सवाल था ।रवीन्द्र ने बताया " हाँ यह बात थोड़ी आश्चर्यजनक लगती है लेकिन केमिकल प्रोसेस से यह पता लगा है कि इसके लिए उसने रंगों में पत्तियों का अर्क और जानवरों की चर्बी जैसी वस्तुएँ मिलाईं ।"
"अरे वा !" मैंने कहा " इस तरह तो यह ऑइल पेंटिंग जैसी स्थाई वस्तु हो गई ।" " बिलकुल " रवीन्द्र ने कहा " इसके अलावा इनके बचे रहने का एक कारण और भी है जैसे अधिकांश चित्र गुफाओं की भीतरी दीवारों और छतों पर बने हैं इसलिए भी ये मौसम की मार से सुरक्षित रहे ।"
" अच्छा अब इतना बताया है तो यह भी बता दो कि इसका नाम भीमबैठका कैसे पड़ा ? किंवदंती तो यह है कि महाभारत के भीम से इसका सम्बन्ध है ।" मैंने रवीन्द्र को थोड़ा और कुरेदा ।
"तू भी ना यार.." रवीन्द्र ने कहा " किंवदंती तो किंवदंती होती है कोई भीम हुआ होता तब न उसकी बैठक होती । अब यहाँ सामने वाली जो विशालकाय चट्टान है उसे देखो तो लगता है कोई विशालकाय व्यक्ति उकडू बैठा हुआ है । अब विशालकाय के नाम से या तो पौराणिक पात्र भीम याद आता है या फिर कुम्भकरण । अब कुम्भकरण का नाम तो दिया नहीं जा सकता था क्योंकि वो दक्षिण में रहता था सो गुरुदेव ने इसे भीम का नाम दे दिया ।"
“क्या खुसुर-पुसुर चल रही है रे दुष्टों ?“ अचानक डॉ.वाकणकर का ध्यान हम लोगों की ओर गया । ‘सज्जनों’ और ‘दुष्टों’ उनके प्रिय सम्बोधन थे, जिनका अभिप्राय हम उनके बुलाने के तरीके से समझ जाते थे । जब उन्हें हम लोगों को कहीं ले जाना होता या किसी विषय पर जानकारी देनी होती वे हम लोगों को 'सज्जनों' कहते थे लेकिन हमारी बदमाशियों पर हमें डांटने के लहजे में 'दुष्टों' कहकर बुलाते थे, हालाँकि यह भी उनका प्यार भरा संबोधन ही होता था । हमें खुसुर-पुसुर करते देख उन्हें लगा कि हमारे दिमाग में कोई शरारत कुलबुला रही है सो उन्होंने हमें 'दुष्टों' कहकर सम्बोधित किया था ।
“ कुछ नहीं सर । ” रवीन्द्र ने मुस्कुराते हुए कहा “ हम लोग आपका कोट देख रहे थे ।”
“ऐसा क्या हे रे इस कोट में ?“ सर अपने कोट की दोनों जेबों में हाथ डाले हुए थे ,उन्होंने हाथों को थोड़ा सा फैलाया और भीतर की ओर झाँकते हुए कहा ।" सर, आप यही कोट पहनकर भीमबैठका के शैलचित्रों की खोज करने गए थे ना ?" मैंने उत्सुकतावश उनसे पूछ ही लिया ।
सर ज़ोर से हँसे .." अरे पगले वह उन्नीस सौ सत्तावन था .. इत्ते साल चलता है क्या कोई कोट ।" मैं थोड़ा झेंप गया फिर भी मैंने अपनी ओर से कहा " मतलब सर वह ऐसा ही मतलब इसी टाइप का लंबा सा कोट रहा होगा ना ।" सर को पता ही नहीं चला कि इस कोट के बहाने अभी अभी हम लोग भीमबैठका की सैर कर आये हैं । दरअसल वे ट्रेंच पर अपने काम में इतना डूबे हुए थे कि इन सब बातों के लिए उनके पास वक्त भी नहीं था ।
भीमबैठका की बात खतम औज़ारों की बात शुरू
सर ने चश्मे के ऊपर से मेरी ओर देखा और कहा " ठीक ठीक है ..वो सब बातें बाद में ..अभी चलो आज तुम लोगों का परिचय उत्खनन में काम आनेवाले औज़ारों से करवाते हैं । किताबों में इनके चित्र तो तुम लोग देख ही चुके हो । देखो यह कुदाल है, खुदाई की शुरुआत इसी से होती है और यह खुरपी, प्रारम्भिक खुदाई के पश्चात इसका प्रयोग समय समय पर किया जाता है ताकि कुदाल के आघात से कोई वस्तु टूट ना जाए ।
फावड़ों से मिट्टी हटाई जाती है घमेलों में भरकर और यह ब्रश है, यह छोटे-बड़े कई प्रकार के होते हैं ,उत्खनन में प्राप्त वस्तुओं को इनसे साफ किया जाता है । किसी परत में किसी अवशेष का ऊपरी हिस्सा दिखाई देने पर उसे बाहर निकालने के लिए भी ब्रश का उपयोग किया जाता है ।
यह ब्लोअर है गाड़ी के भोंपू जैसा, इसे दबाने से हवा निकलती है, जहाँ ब्रश से भी नुकसान की सम्भावना हो वहाँ इसका उपयोग करते हैं । और भी बहुत से टूल्स हैं नापने के लिए टेप, कपड़े की थैलियाँ, मार्क करने के लिए पेन, बड़ा करके देखने के लिए यह मैग्निफाइंग ग्लास और प्रत्येक अवशेष का चित्र लेने के लिए यह कैमरा ।“
हमारे मन की तरलता में कुछ प्रश्न तैर रहे थे ...इतने महत्वपूर्ण कार्य के लिए इतने साधारण से औज़ार ? पुरातत्ववेत्ता क्या इन्ही की सहायता से ज़मीन के नीचे दबा इतिहास खोज कर निकालते हैं ? विज्ञान के बढ़ते चरणों के साथ तकनीक भी कितनी आगे बढ़ चुकी है लेकिन एक पुरातत्ववेत्ता के पास साईट पर कितने कम औज़ार होते हैं ।
सर ने हमारे मन की बात समझते हुए कहा “ इनके अलावा बाकी और भी टूल्स होते है जैसे माइक्रोस्कोप, फिर आगे काल निर्धारण के लिए उपयोग में आने वाले या कार्बन डेटिंग की मेथड में काम आने वाले भी बहुत से टूल्स होते हैं लेकिन वे यहाँ नहीं होते बल्कि लैब में होते है । बाक़ी सब टूल्स का उपयोग तो तुम लोग देख देख कर समझ जाओगे ।“ सर ने जैसे हम लोगों के दिमाग़ में चलने वाले सवाल पढ़ लिए थे । फिर जालियों की ओर इशारा करते हुए कहा “जैसे वो देखो अलग अलग मोटी - पतली जालियों वाली छन्नियाँ । निखात से निकली मिट्टी फेंकने से पहले इनमें छानना ज़रूरी होता है ।“
“और सर अगर बगैर छाने फैंक दे तो ?” राममिलन ने अपनी सहजता में सवाल किया । “अरे दुष्ट ! और कहीं उसके साथ नूरजहाँ की अंगूठी का हीरा भी फिका गया तो ?" डॉ. वाकणकर ने हँसते हुए कहा ।
हम लोगों ने सर के इस हास्य बोध पर ज़ोरदार ठहाका लगाया । राममिलन ने अपने कान पकड़ते हुए कहा “ तब तो साहब ऊ शाहजहाँ की आत्मा हमें कभी माफ नहीं करेगी ।“ ”अरे पंडित जी.. शाहजहाँ की नहीं जहाँगीर की , शाहजहाँ की बेगम का नाम तो मुमताज महल था ...इसकी बेगम का नाम उसके साथ जोड़ोगे तो नहीं चलेगा । “ किशोर त्रिवेदी ने राममिलन के स्टेटमेंट को सुधारते हुए कहा ।
किशोर आज सुबह सुबह ही दंगवाड़ा पहुँचा था । राममिलन किशोर का इशारा समझ गया और ज़ोर का अट्टहास करते हुए कहा “ ऐसन है भैया, ऊ जमाने में नहीं चलता होगा । ई जमाने में तो सबै चलता है किसीकी लुगाई का नाम किसी के भी साथ जोड़ दो क्या फरक पड़ता है ।“ हम लोगों ने देखा सर मज़दूरों के साथ बातचीत में मशगूल थे और हमारी बकवास पर उनका ध्यान नहीं था ।
🔲 *शरद कोकास* 🔲


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