सोमवार, 1 जून 2026

38-आदिम मानव का वन बी एच के कैसा रहा होगा


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा- अब तक आप लोगों ने पढ़ा कि छात्र सुबह सुबह ट्रेंच पर पहुँच गए हैं और मनुष्य की उत्पत्ति के बारे में बातें कर रहे हैं । बातचीत से पता चला कि ज्ञात मनुष्य जाति की आयु लगभग दस लाख साल है लेकिन उससे पहले तीन करोड़ सत्तर लाख साल पहले प्लीओपिथेकस हुआ, फिर दो करोड़ साठ लाख साल पहले रेमापिथेकस हुआ, फिर तीस लाख साल पहले आस्ट्रेलोपिथेकस हुआ , फिर दस लाख साल पहले होमोइरेक्टस हुआ, फिर ढाई लाख साल पहले प्रारंभिक होमोसेपियन्स, सोलो नदी का मानव यानि पिथेकेंथ्रोपस, फिर डेढ़ लाख साल पहले नियेंडरथल  मानव हुआ और अभी चालीस हज़ार साल पहले आधुनिक होमोसेपियन्स क्रोमैंगनन या आधुनिक मानव यानि हम लोग पैदा हुए । इस बातचीत के बाद वे तम्बू में लौट आते हैं । इंसान की इस कहानी में पढ़िए आगे की कहानी *

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*भाग 38*

*आदिम मानव का वन बी एच के* 

जैसे कि रात होते ही अँधेरा दुनिया की हर चीज़ पर पसर जाता है तम्बू के भीतर हम लोग भी अपने बिस्तरों पर पसर चुके थे । बिस्तर अब पहले की तरह गर्म और सूखे हुए थे और पिछले दिनों की बारिश से उपजे गीलेपन का कोई चिन्ह उनमे मौज़ूद नहीं था । वातावरण की नमी गायब होकर जैसे हम लोगों की आँखों में आ गई थी । 

घर की बातें करते हुए हम लोगों को भी घर की याद सताने लगी थी । मन की फिजाँ में एक धुन तैर रही थी ..आ अब लौट चलें ...। अशोक और किशोर हम लोगों की तरह होमसिक नहीं थे इसलिए कि वे लोग उज्जैन में ही रहते हैं अपने घर में लेकिन मैं, रवीन्द्र और अजय अपने घर से दूर हॉस्टल में रह रहे हैं । वे लोग तो यहाँ से जाने के बाद अपने ही घर में रहेंगे लेकिन हम लोगों के लिए तो फिर वही हॉस्टल की जिंदगी ।

घर से दूर रहकर हम लोगों को घर की याद कुछ अधिक ही सताती है । घर से आये हुए भी काफी दिन बीत गए हैं । अब तो परीक्षाओं के बाद ही घर जाना होगा । फ़िलहाल तो बस चिठ्ठियों का सहारा है । 

माँ हमेशा पूछती है ..'बेटा घर कब आओगे ?' मैं भी हमेशा की तरह जवाब देता हूँ ..'बस माँ जल्दी ही आऊंगा ।' 

हालाँकि मुझे पता है, घर से बाहर निकलने के बाद जल्दी लौटना कहाँ होता है ,पढाई पूरी करने के बाद जाने कहाँ नौकरी मिले किस अनजान प्रदेश के किस शहर में दाना-पानी लिखा हो पता नहीं । हालाँकि लौटना तो तब भी होगा लेकिन इसी तरह छुट्टियों में कभी कभार । 

फिर भी ग़नीमत है, लौटने के लिए हम लोगों के पास एक घर तो है । दुनिया में जाने कितने लोग हैं जो जीवन भर भटकते रहते हैं और कभी घर नहीं लौट पाते इसलिए कि उनका कोई घर ही नहीं होता  । हमारे आदिम पुरखे भी तो इसी तरह भटकते थे ।

 अजय के मानस में पेड़ पर रहने वाले उस बेघर इंसान का चित्र उमड़ -घुमड़ रहा था । उसने पूछा “हाँ यार, यह बात तो सही है कि पेड़ ही उस प्रारंभिक मनुष्य के घर थे, लेकिन पेड़ों पर रहने वाला इंसान आखिर घर बनाने की स्थिति तक कैसे आया होगा ।" 

मैं समझ गया ,मुझे अब अपने घर के बारे में सोचना छोड़कर अपने उस आदिम पुरखे के घर के बारे में सोचना था । “यह स्थिति एकाएक नहीं आई ।" मैं बरसों पहले के उस इंसान का एक चित्र मन में बना रहा था ।" पेड़ों से उतरने के बाद सबसे पहली समस्या उसके सामने थी कि ज़मीन पर रहने वाले हिंसक जानवरों से अपनी रक्षा कैसे की जाए ।“ 

“ लेकिन जब इतना डर था तो वह पेड़ से उतरा ही क्यों ?“ अजय ने फिर सवाल किया । 

“तू भी ना, रहेगा ज़िन्दगी भर भाभी का भैया ।“ रवींद्र ने कहा “तो क्या वह हमेशा पेड़ पर ही चढ़ा रहता, वहाँ क्या उसे जीवन भर फल मिलते रहते ? भाई, भोजन की निरंतर कठिन होती व्यवस्था के अलावा एक  प्रमुख कारण यह भी था कि पृथ्वी की जलवायु और तापमान में निरंतर परिवर्तन होता जा रहा था । ताड़, मैंग्नोलिआ, अन्जीर के पेड़ समाप्त होते जा रहे थे और शीतकाल में उगने वाले पेड़ों की संख्या बढ़ रही थी । जिन पेड़ों पर उसका आवास था उनकी संख्या कम होते जाने के कारण एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर जाने में उसे कठिनाई भी हो रही थी ।“

“यही तो मैं कह रहा हूँ ।“ अजय बोला । “बंदर तो अभी भी पेड़ों पर रहते हैं, उन्हें  कभी ज़रूरत नहीं पड़ी ज़मीन पर आने की । हाँ यह बात ज़रूर है कि जंगलों में पेड़ कट रहे हैं इसलिए आजकल वे अक्सर शहर में चले आते हैं ।

“ लेकिन बंदर और आदमी में फ़र्क है ना ।“ मुझे अंकल डार्विन याद आये । “अब यह तो मनुष्य था बंदरों की तरह एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक लम्बी छलांग भी नहीं लगा सकता था । उसकी शारीरिक बनावट भी इस तरह की नहीं थी । सो उसने निर्णय लिया कि अब पेड़ से उतरकर ज़मीन पर रहा जाए ।ठीक इसी जगह अपने रहन-सहन में मनुष्य बंदरों से अलग हो जाता है । पेड़ों से नीचे उतरकर वह दो पैरों पर चलना सीखता है, फिर ठंड से बचने और हिंसक जानवरों से अपनी रक्षा के लिए और कालांतर में शिकार का माँस संग्रहण करने के लिए गुफाओं में शरण लेता है । 

गुफाओं में आवास बनाने की स्थिति तक पहुँचने के लिए भी इस मनुष्य को लाखों वर्ष लगे । इस गुफावासी मनुष्य का चेहरा पहले से अलग था और उसका मस्तिष्क भी पूर्व की तुलना में अधिक बड़ा था ।"

"मतलब भीतर वाला मस्तिष्क ?" अजय ने भोंदू की तरह मुखाकृति बनाकर पूछा "तो क्या बाहर वाला भी कोई होता है क्या ? मस्तिष्क के बाहर तो सिर होता है । "रवींद्र ने चुटकी ली । 

"सॉरी, मैं वही समझा था ..मतलब मस्तिष्क उसका बड़ा कैसे हुआ ?" अजय ने उसकी चुटकी को नज़रंदाज़ करते हुए कहा । 

"भाई, सीधी सी बात है उसने मस्तिष्क से काम लेना शुरू किया तो मस्तिष्क की क्षमता और आकार में भी वृद्धि होती गई । अब तेरे समान दिमाग़ से काम न लेने वाला इंसान होता तो उसका भी छोटा का छोटा रह जाता ।" रवीन्द्र ने अजय के संभावित वार की आशंका से उसके और अपने बीच तकिये की दीवार बनाते हुए कहा । 

"अरे यार जब देखो तब तुम मेरे से तुलना क्यों करते हो ?´अजय ने गुस्सा दिखाते हुए कहा । 

"ठीक है.. ठीक है लड़ो मत ..आगे की कहानी सुनो ।" मैंने दोनों के बीच होने वाले युद्ध को टालने के दृष्टिकोण से कहा । "तो वह मनुष्य जब पेड़ से नीचे आया तो उसके सामने पहली समस्या यही थी कि अब कहाँ रहा जाए । अचानक उसे पहाड़ों में चट्टानों के बीच गुफाएँ दिखीं । यह गुफाएँ न केवल हिंसक जानवरों से सुरक्षित थीं बल्कि सर्दी और बारिश से भी उसका बचाव करती थीं । इस तरह वह गुफाओं में रहने लगा । " 

" लेकिन यह पुरातत्ववेत्ताओं को कैसे पता चला? " अजय ध्यान से मेरी बात सुन रहा था । " अरे ! यह भी कोई सवाल है ?" मैंने कहा " पुरातत्ववेत्ता खोज करते हुए उन गुफाओं तक गए और ढूंढ लिया । और जब उन पुरातत्ववेत्ताओं को प्राचीन गुफाओं में इस मनुष्य के रहने के प्रमाण मिले तो इस बात से तय हुआ कि वह मानव इनमे रहता था । 

ग़नीमत है कि लाखों साल बाद भी यह प्राचीन प्राकृतिक गुफाएँ जस की तस हैं, अगर मनुष्यों के बनाए मकान होते तो कब के नष्ट हो जाते ।“

"जई बात तो हम कहत हैं ।" अब राममिलन भैया ने हाथ पर हाथ मरते हुए कहा  .."कि भगवान ने जौन बनाये हैं धरती, नदिया, पहाड़, ई गुँफा सब जस के तस है और आदमी जौन बनाय रहा मकान उकान ऊ सब खतम हुई गवा ।" 

किशोर भैया तो जैसे तैयार ही बैठे थे कि राममिलन कुछ कहें और वे उसका जवाब दें .."ऐसा है पंडत ये आदमी भी तो भगवान ने बनाया है वो फिर कैसे ख़तम हो जाता है ? अगर तुमको भी भगवान ने बनाया है तो क्या तुम कभी ख़तम नहीं होगे ?" मैं जानता था अगर दोनों के बीच नोकझोंक शुरू हुई तो शीघ्र समाप्त नहीं होगी । एक युद्धविराम अभी अभी घोषित किया था मैंने अब दूसरे की बारी थी । 

मैंने क्रोध प्रकट करते हुए कहा "सुनो भाई, अगर इस तरह से मुझे डिस्टर्ब करोगे तो आगे की बात नहीं बताऊंगा फिर एग्जाम में इस पर कोई सवाल आये तो मुझसे मत कहना । अभी गुफा मानव की बात चल रही है, आधुनिक मानव की बात बाद में कर लेना ।" सबने तुरंत अपने मुँह पर ऊँगली रख ली । सबको खामोश देख मैंने आगे अपनी बात शुरू की । 

 “उन दिनों होता यह था कि पहले एक मानव समूह गुफा में आकर रहने लगता, लेकिन वह समूह हमेशा के लिए वहाँ नहीं रहता था बल्कि कुछ समय बाद गुफ़ा छोड़ देता था । उसके छोड़कर जाने के बाद वहाँ दूसरा समूह आ जाता ।  

पुरातत्ववेत्ताओं को विभिन्न परतों में प्राप्त हड्डियों,चकमक पत्थरों और कोयले की राख के अध्ययन से यह ज्ञात हुआ । “ " इसका मतलब यह हुआ कि वह अपना समान वहीं छोड़ जाता था ?" अजय का सवाल था ।"अब ऐसा भी कोई ख़ास सामान तो था नहीं उसके पास " मैंने कहा " बस यही कुछ औज़ार आदि अब राख़ और कचरा तो अपने साथ ले जाने से रहा ।" 

"लेकिन यह बताओ यार कि उसकी छोड़ी हुई गुफ़ा में सब कुछ तो मिलता है लेकिन उस मनुष्य के कपड़े यानि जानवर की खाल क्यों नहीं मिलती ?“ किशोर ने सवाल किया । “बताया तो था भैया आर्य सर ने ।“ मैंने उन्हें याद दिलाया “समय के साथ वही वस्तुएँ सुरक्षित रहती हैं जो टिकाऊ हैं । इसलिए पुरातत्ववेत्ताओं को अलग अलग स्तर पर अलग अलग समुदाय के चकमक पत्थर, हड्डियाँ और राख़ मिली । खाल वगैरह तो नष्ट हो गई इसलिए चकमक की  सुई के आधार पर ही हमें  यह तय करना होता है कि उस समय इससे वस्त्र सिले जाते रहे होंगे ।

“लेकिन वह गुफा छोड़कर क्यों चला जाता था ?“ फ़िल्म शोले में जिस तरह वीरू को टंकी पर ख़ुदकुशी करने के लिए चढ़ा देख रामगढ़ वासी ने अपने साथी से सवाल पूछा था ना कि 'भैया ये अंग्रेज लोग सुसाइड क्यों करते हैं', उसी अंदाज़ में भैया राममिलन ने सवाल किया  । 

“इसके भी अनेक कारण हो सकते हैं ।“ मैंने कहा “जैसे शिकार की अनुपलब्धता, कोई प्राकतिक आपदा आदि ।" "फिर यह प्रॉब्लम थी तो दूसरा आदमी वहाँ क्यों रहने आता था ?" अशोक का सवाल वाजिब था । 

मुझे लग रहा था कि मैंने सब लोगों को बात करने से रोका था इसलिए सब लोग अपने अपने सवाल लेकर मुझ पर पिल पड़े हैं । मैंने संयत स्वर में जवाब दिया  " दूसरा मनुष्य एकदम नहीं आता था ..अब वह कोई किराये का मकान थोड़े ही था जो एक गया और दूसरा आ गया । हाँ लेकिन जब वह गुफा छोड़कर चला जाता तो वहाँ रीछ, लकड़बग्घे जैसे जानवर आकर रहने लगते थे ।“ 

“और रहने का किराया भी नहीं देते थे ।“ अजय ने फिर बीच में दखल दिया ।

 “ हाहाहा… किराया देते भी किसको ?“ मैंने भी हास्यबोध के साथ उत्तर दिया “उसका न कोई मालिक था न ही उसका कोई मेन्टेनेन्स करता था । छत से लगातार पत्थर गिरते रहते थे, धूल और मिट्टी की परत जमा होती रहती थी । फिर किसी दिन रीछ आदि जानवर भी गुफ़ा छोड़कर चले जाते ..फिर बरसों बाद जब अगला कोई कबीला वहाँ रहने के लिए आता तब तक तो वे सारे चिन्ह धूल मिटटी आदि में दब जाते । “ 

 “लेकिन इस मनुष्य ने अपना खुद का मकान बनाना कब सीखा ?“ अजय ने फिर पूछा ।

 “बताता हूँ भाई, तुम लोग मुझे कुछ कहने ही नहीं दे रहे हो बार बार सवाल किये जा रहे हो ।“ मैंने किंचित रोष प्रकट करते हुए कहा …” पहले कारण तो जान लो कि उसे अपना खुद का मकान बनाने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई । दरअसल अपना मकान बनाने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि मनुष्य के लिए यह गुफाएँ बहुत असुविधाजनक थीं । अब प्रकृति ने इन्हें मनुष्यों के रहने के लिए तो नहीं बनाया था । किसी गुफा का मुँह सँकरा होता तो किसी की छत नीची होती । किसी किसी में तो रेंगकर भीतर जाना भी मुश्किल होता । किसी की दीवारें इतनी ऊबड़ खाबड़ होतीं कि इंसान उनसे टकरा टकरा कर घायल होता रहता ।“

अजय को याद आया .."अभी पिताजी ने मकान बनाया तो उन्होंने भी ऐसे ही बाहरी दीवारें चिकनी रखने की बजाय सीमेन्ट की छर्री लगवा दी, अब यह हाल है कि ज़रा सा देखकर नहीं चलो तो शरीर छिल जाए । “ अजय के यह कहने पर रवींद्र ने उसे घूर कर देखा । 

मैंने कहा “ठीक है यार,जब कोई अपना नया मकान बनाता है तो कुछ दिन सिर्फ़ उसी की बात करता है, यह मानव स्वभाव है । वह प्रागैतिहासिक मानव भी यही करता था । हालाँकि वह चकमक पत्थरों से रगड़ रगड़ कर, खुरच कर और वांछित तोड़ फोड़ कर गुफ़ा की दीवारों और फ़र्श को चिकना और रहने लायक बना ही लेता था । 

स्त्रियाँ गढ्ढा खोदकर और उसमें पत्थरों की तह बिछाकर चूल्हा बना लेती थीं और माताएँ गढ्ढों में गर्म राख बिछा कर अपने बच्चों को लिटाने के लिए झूले जैसा कुछ बना लेतीं । यहीं किसी कोने में उसका भण्डारण गृह भी होता था जहाँ वह मांस और खाने पीने का अन्य सामान रखता था । दक्षिणी फ़्रांस के पर्वतों में पुरातत्ववेत्ताओं को ऐसे ही प्रागैतिहासिक आवासों के अवशेष मिले हैं ,स्थानीय लोग उन्हें ‘ शैतान का चूल्हा ‘ कहते हैं ।"

"शैतान का चूल्हा क्यों ? क्या वह आदिम मनुष्य शैतान था ? अजय का सवाल वाजिब था । मैंने उसका जवाब दिया " वस्तुतः शैतान शब्द की अवधारणा धार्मिक है । आज का मनुष्य सभ्य हो गया है लेकिन असभ्य मनुष्य को वह अभी भी शैतान, असुर, राक्षस जैसी उपाधियों से विभूषित करता है । 

इसी धार्मिक अवधारणा को जो समस्त पौराणिक ग्रंथों में है आधुनिक मनुष्य ने भी अपना लिया और इतिहासकारों और पुरातत्ववेत्ताओं ने भी अपनी बुद्धि का प्रयोग न करते हुए उसे यही कहा जबकि उन्हें अपना पूर्वज मानकर उनके लिए अच्छे सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग करना चाहिए था ।" 

मुझे लगा कि विषयांतर हो रहा है सो मैं फिरसे आदिम मानव के आवास की कहानी पर लौट आया .." बहरहाल, अपना घर बनाने की इस प्रक्रिया के अंतर्गत गुफ़ा में होने वाली असुविधाओं की वज़ह से धीरे धीरे मनुष्य गुफा से बाहर रहने के लिए आ गया । फिर उसने गुफ़ा के बाहर लकड़ी की बल्लियों आदि का प्रयोग कर पत्थर की दीवारों पर छत डालना सीखा । 

इस तरह वह घर बनाने की कला में पारंगत हो गया । पुरातत्ववेत्ताओं को जो सबसे प्राचीन घर मिला है उसका आकार एक गोल खाई की तरह ही था । दीवारें जानवरों की खालों से मढ़े लकड़ी के खम्भों  की थीं और उन्हें  मजबूत करने के लिए पत्थर की सिल्लियाँ और मैमथ के जबड़े की हड्डियाँ लगाई गईं थीं । यह दीवारें ऊपर जाकर आपस में जुड़ जाती थीं और इस आवास का आकार कुछ कुछ हमारे तम्बू जैसा ही दिखाई देता था । “

जैसे ही मैंने यह कहा सभी लोग तम्बू की छत की ओर देखने लगे । अशोक ने पूछा “लेकिन उस घर के अन्दर क्या क्या मिला ?“ “ घर के बीचोबीच एक गढ्ढा था ।“ मैंने अपनी बात जारी रखी । “यह गढ्ढा  संग्रह करने के काम में आता था, इसमें हड्डी की बनी सुइयाँ, जानवरों के दाँतों से बने मनके आदि सामान मिले हैं ।

 “ अच्छा तो फिर यह उनका बेडरूम रहा होगा ।“ अजय ने कहा । हमने प्रश्नवाचक नज़रों से उसकी ओर देखा तो वह बोला …”अरे आलमारी और कीमती वस्तुएँ बेडरूम में ही रखी जाती हैं ना ।“ 

“चलो ठीक है मान लेते हैं ।“ मैंने कहा …”लेकिन घर में प्रवेश करने की शुरुआत तो हमें मेन गेट से करनी होगी ना ।“ 

बिलकुल सही है ।“ अशोक बोला …” नहीं तो क्या चिमनी से घर में घुसोगे ?“ “हाँ,यही सच है ।“ 

मैंने कहा “इस प्रागैतिहासिक घर में प्रवेश करने का रास्ता चिमनी से ही था । पुरातत्ववेत्ताओं को और कोई रास्ता मिला ही नहीं । हो सकता है हिंसक जानवरों से बचने के लिए उन्होंने यहीं से प्रवेश करने का निर्णय लिया हो ।“

“ और ड्राइंगरूम भी तो होता होगा ना उनके यहाँ ? “ अजय ने सवाल किया । “बिलकुल ।“ मैंने कहा । “ उनका ड्राइंगरूम भी था जिसमे मैंमथ के जबड़ों की हड्डियों का बना फर्नीचर था लेकिन सोते वे लोग ज़मीन पर ही थे क्योंकि पलंगनुमा कोई वस्तु उनके यहाँ नहीं मिली । ज़मीन पर बहुत सारी मिट्टी की ढेरियाँ थीं जिनका उपयोग संभवतः वे लोग तकिये की तरह करते थे । 

इसके अलावा घर में एक वर्कशॉप भी होता था उनका । पुरातत्ववेत्ताओं को यहाँ पत्थर की चिकनी सिल्लियों का ठीहा मिलता है जिसके आसपास बहुत सारे चकमक पत्थर बिखरे पड़े हैं । इनमें मनुष्य के बनाए औज़ार हैं, हड्डियों की खपच्चियाँ हैं और सुइयाँ हैं । इनमें कुछ रफ़ और कुछ चिकने किए हुए मनके भी हैं । बहुत सारी वस्तुएँ अधूरी बनी दिखाई देती हैं जिसका अर्थ यह हो सकता है कि किसी आपदा के आने के फलस्वरूप इन्हें  यह आवास बीच में ही छोड़कर जाना पड़ गया था ।“

“गज़ब है यार ।“ अशोक ने कहा …” पुरातत्त्ववेत्ता  भी किसी वैज्ञानिक की तरह अल्प प्रमाणों के बावज़ूद पूरा चित्र प्रस्तुत कर देते हैं । “हाँ ।“ मैंने कहा “लेकिन वे ऐसा केवल अभ्यास वश ही नहीं करते । एक लम्बी परम्परा का अध्ययन उन्होंने किया होता है और वैज्ञानिक दृष्टि के अलावा इन सब बातों के निर्धारण में विज्ञान भी उनका सहायक होता है ।" 

"चलो भाई अब सोया जाए , फिलहाल तो अपना घर यही तम्बू है , अपना ड्राइंग रूम ,लिविंग रूम और बेड रूम ।" अजय ने कहा । "बस बाथरूम का ख़याल रखना ,उसके लिए तम्बू के बाहर जाना पड़ेगा । " अशोक ने अजय को छेड़ते हुए कहा । 

अजय बोला " अपने को ज़रूरत ही नहीं है अब सुबह ही जायेंगे ।" अशोक ने कहा " भाई, सुबह तो जाओगे ही लेकिन नींद में ख़याल रखना । नहीं तो बिस्तर फिर से सुखाना पड़ेगा ।" अशोक की इस छेड़खानी पर अजय कुछ कहता इससे पहले ही अशोक मुँह ढांककर सो गया । 

*शरद कोकास*


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