📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘
✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼
*पिछले भाग में आपने पढ़ा कि मनुष्य किस प्रकार अन्न संग्रहण की अवस्था से कृषि की अवस्था में आया उसके सामने क्या क्या कठिनाइयाँ आईं ।इस भाग में आप पढेंगे मनुष्य की पशुपालन अवस्था के बारे में किस तरह वह जंगलों से जीवित जानवर पकड़ लाता था और उन्हें पालता था उन्हें मारकर खा जाने की अपेक्षा उन्हें पालने में उसे क्या लाभ था।*
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*भाग 43*
*दाने आये घर के अन्दर कई दिनों के बाद*
ऊब मिटाने के लिए हमें सौंपा गया एक्सप्लोरेशन का यह जॉब लंच से पहले ही समाप्त हो गया था । आज लंच के बाद ट्रेंच पर जाने की अनिवार्यता भी नहीं थी । भोजन के पश्चात कमर सीधी करने के लिए कुछ देर हम लोग तम्बू में जाकर लेट गए । वैसे भी अवशेष ढूँढते हुए काफी देर झुके रहने के कारण कमर में दर्द होने लगा था । आज ट्रेंच पर नहीं जाना था इसलिए आधे दिन के अवकाश जैसी अनुभूति हो रही थी । कुछ देर सुस्ताने के पश्चात फ्रेश होकर हम लोग लगभग साढ़े पांच बजे दंगवाड़ा की ओर निकल गए । जब हम लोग दंगवाड़ा की गलियों में प्रवेश कर रहे थे गायें गौशालाओं की ओर लौट रही थीं, पंछी अपने घोसलों की ओर, और किसान अपने अपने घरों की ओर । घरों की रसोईयों में अंगीठियाँ सुलग चुकी थीं और छप्परों से धुआँ उठने लगा था । हम लोग समवेत स्वरों में बाबा नागार्जुन की कविता का पाठ करते चल रहे थे..
"दाने आये घर के अन्दर कई दिनों के बाद
धुआं उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद,
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।"
गाँव की गलियों में भटकते हुए हमारी नज़र कच्चे घरों की रसोई तक पहुँच जाती थी । इधर स्त्रियों के हाथ पीतल की थालियों में आटा गूंध रहे थे और भूख के यज्ञ में आहुति देने के लिए अनाज सिंकती रोटी में परिवर्तित होकर समिधा बन रहा था । पंछियों के ऑर्केस्ट्रा से संगीतमय होकर शाम का वह समय बहुत भला लग रहा था । चौक में स्थित गुमटी पर अखबार चाट कर और चाय पीकर जब हम लोग वापस लौटने को हुए अँधेरा अपने पाँव पसार चुका था । अक्सर शाम को हम लोगों का गाँव में देर तक रुकने का मन होता है । ऐसा लगता है कुछ देर वहाँ ठहरें और गाँव वालों से गपियायें, लेकिन शिविर का एक अनुशासन होता है सो हम लोगों का समय पर लौटना ज़रूरी हो जाता है ।
आज लौटते हुए मैंने रवीन्द्र से कहा " यार,गाँव के दृश्य देखते हुए मैं अक्सर सोचता हूँ कि हम शहर में रहने वाले लोग गाँव को कितनी रूमानियत भरी नज़र से देखते हैं । अगर हमेशा के लिए हमें इस गाँव में रहना पड़े तो क्या हम रह लेंगे ? क्या तब भी हमें यह गौशालाएँ, जानवरों के गोबर की गंध, कंडों का धुआँ और गलियों की धूल अच्छी लगेगी ?" रवीन्द्र ने कहा "बंद कर यार थारो रांड रोणों, जब होगा तब देखा जाएगा ,अभी तो नहीं रहना है ना ।"
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रात भोजन के पश्चात तम्बू में घुसते ही मैंने मित्रों के सामने भी यही सवाल रखा । मैं अपने मित्रों के बीच उनके भविष्य में कार्य करने की स्थितियों और अन्य संभावनाओं को टटोलना चाहता था । इससे पहले कि कोई कुछ कहता अशोक ने कहा “यार, तेरी गाय-ढोर वाली बात से याद आया कि तेरी इंसान की कहानी में एक चैप्टर तो रह ही गया ।“ “कौनसा ?“ मैंने पूछा । “अरे यार वही … कि जानवरों का शिकार करने वाला इंसान जानवरों को पालने वाला कैसे बना ।“अशोक ने कहा ।
“अरे हाँ ।“ अशोक की बात सुनकर मैं भविष्य के जीवन की पड़ताल सम्बन्धी अपनी पिछली बात को भूलकर अतीत की कहानी सुनाने के मूड में आ गया था । “उसकी भी बड़ी इन्टेरेस्टिंग स्टोरी है । हमारे पुरखों के जीवन में एक परिवर्तनकारी समय ऐसा भी आया जब मानव किसान, शिकारी व पशुपालक एक साथ हो गया । महिलाएँ जब अनाज उगाने का काम करने लगीं तब पुरुष पहले की तरह शिकार के लिए जाने लगा । वह समय भी ऐसा था कि एक आदमी की मेहनत से बमुश्किल गुजारा होता था । लेकिन उसमें एक नया परिवर्तन आया, वह यह कि अब वह शिकार से लौटता तो केवल मरे हुए जानवर लेकर नहीं लौटता था बल्कि अब वह कभी कभी अपने साथ ज़िन्दा जानवरों को भी पकड़ कर ले आता था ।
“ ई तो गजब है ।“ राममिलन भैया चौंक गए । “ इतने बड़े बड़े हाथी, मैंमथ, घोड़े पकड़कर लाना कौनो मजाक बात है का ? “ राममिलन भैया की बात सुनकर हम लोग पेट पकड़ पकड़ कर हँसने लगे । किशोर ने फिर उन्हें छेड़ा …”अरे पंडत वो लोग कोई बजरंग बली के भक्त थोड़े ही थे जो हाथी को दुम से पकड़ते और उठा लाते । वे लोग तो बस छोटे -मोटे जानवर पकड़ते थे जैसे हिरण, भेड़ों के मेमने, खरगोश, छोटे छोटे बछड़े आदि । “
“ अब हमका का मालूम । “ राममिलन भैया अपनी अनभिज्ञता पर ज़रा भी लज्जित नहीं हुए …” हम सोचे ऊ समय का आदमी अच्छा पहलवान रहा होगा और जैसे हनुमान जी लंका में हाथी लोगन को पूँछ से उठाय उठाय के पटके रहे वैसन वो भी पकड़ लाये रहे होंगे । “ हम सभी भैया के इस भोलेपन पर मुस्कुरा दिये । मैंने अपनी बात आगे बढ़ाई …” शुरु शुरु में वह इन जानवरों को खाने के लिए रख छोड़ता था, इसलिए कि उसे पता था जिस दिन शिकार नहीं मिलेगा उस दिन ये पशु काम आयेंगे, वैसे भी चारे की तो कोई कमी थी नहीं, जानवर चारा खाते थे और बढ़ते जाते थे, उनके शरीर पर मांस भी बढ़ता जाता था सो यह उनके लिए घाटे का सौदा नहीं था । फिर यह भी हुआ कि नर मादा पशुओं को एक साथ रखने से प्रजनन के माध्यम से वे और बच्चों को जन्म देने लगे । इस तरह से उसका जीवित मांस का भंडार भी बढ़ता गया । लेकिन इस भण्डार के उपयोग का अवसर उसे कम ही प्राप्त होता था क्योंकि नियमित रूप से शिकार उसे मिल ही जाता था । धीरे धीरे उसने महसूस किया कि इन्हें मारकर खा जाने की अपेक्षा इन्हें जीवित रखने मे ज़्यादा लाभ है जैसे कि गाय से दूध मिलता है और भेड़ की ऊन लबादे बनाने के काम आती है ।"
अजय ने कहा "यह बात तो सही है कि भेड़ को एक बार मारकर उसका मांस खाया जा सकता है, एक बार ही उनकी खाल उतारी जा सकती है और एक बार ही ऊन निकाला जा सकता है लेकिन यदि एक बार ऊन निकालकर उसे जीवित रखा जाए तो उसे बार बार मूंडा जा सकता है ।" "बिलकुल ।" रवीन्द्र ने कहा "जैसे कि हमारे देश के नेता हमारे देश की जनता को पाल कर रखते हैं ताकि हर इलेक्शन में इन्हें मूंडा जा सके ।" रवीन्द्र की इस बात पर एक ज़ोरदार ठहाका लगा । मैंने मित्रों को देश की राजनीति पर चर्चा से पुनः इंसान की कहानी की पटरी पर लाते हुए कहा "ठीक इसी तरह घोड़ों का उपयोग भी उसने बोझा ढोने के लिए किया । उसे यह बात समझ में आ गई थी कि पशुओं को जीवित रखने में उसे ज्यादा फायदा है । फिर पशुओं से उसने खेती किसानी के काम लेने शुरु किए और वह पूरी तरह कृषक व पशुपालक बन गया ।
" यार एक बात बताओ " अजय ने कहा " हल में बैलों को जोतना तो उसने बाद में सीखा लेकिन उससे पहले वह हल कैसे चलाता था ?" "भाई ।" मैंने कहा " जब उसने देखा कि बीजों को ज़मीन में गाड़ने से पौधे निकल आते हैं तब इस काम को सुचारू रूप से करने के लिए अव्वल तो उसने हल का आविष्कार किया । हल की इस अवधारणा से पहले वह खेत में ऐसे ही दाने बिखेर देता था लेकिन प्राब्लम यह थी कि उन्हें चिड़िया चुग जाती थी । फिर उसे समझ में आया कि दानों को पंछियों द्वारा चुगे जाने से बचाने के लिए मिटटी के नीचे दबाकर रखना चाहिए सो उसने लकड़ी की सहायता से या जानवर के सींग की सहायता से धारियाँ बनाकर या गढ्ढे बनाकर अनाज गाड़ना शुरू किया । उसके बाद उसने लकड़ी का हल जैसा एक उपकरण बनाया जिसे एक आदमी दबाकर रखता था और दूसरा उसे खींचता था । फिर जब जानवर उसके यहाँ आये तो उनके सींगों से लकड़ी के हल को बांधकर उसने यह प्रयोग किया । इसी क्रम में फिर आज बैलों द्वारा हल खींचने की जो पद्धति है वह विकसित हुई । धातु की खोज के बाद हल के फाल भी धातु के बनने लगे ।"
"भाई बैल न होते तो वाकई खेती-किसानी का काम कैसे होता, इसीलिए तो आज हम पोले के दिन बैलों की पूजा करते हैं । लेकिन उसके पास तो गाय थी उसको भी तो उसने हल में जोता होगा?" अजय का सवाल सही था । "हाँ ।" मैंने कहा " उसने सबसे पहले गाय को ही हल में जोता होगा लेकिन गाय की गर्दन इतनी पतली होती है कि उससे हल खींचना संभव नहीं हुआ होगा । "लेकिन सांड को भी तो जोतना संभव नहीं है ?" अजय का तर्क वाकई लाजवाब था । "हाँ ठीक कह रहे हो तुम ।" मैंने कहा "हो सकता है पहले उसने सांड को नाथने की कोशिश की हो फिर वह जब ज़्यादा उछल कूद करने लगा हो तब उसे बधिया बना कर बैल बनाने की तरकीब भी उसके दिमाग़ में आई हो ।"
मेरी बात सुनकर किशोर भैया जोर से हँस पड़े .." यार, हम लोग भी तो छुट्टे सांड जैसे ही हैं, लेकिन हमारे दिमाग़ में यह सवाल नहीं आया हाँ अपना अजय तो बेचारा शादीशुदा है सो इसने सही सवाल उठाया है ।" "क्या किशोर भैया, ले दे कर तुम मुझ पर ही क्यों आ जाते हो । अजय ने किशोर भैया का व्यंग्य समझकर किंचित नाराज़गी के साथ कहा । अशोक भी किशोर भैया की बात का मज़ा ले रहा था .."अब आप इसे शादीशुदा भी कह रहे हो और बेचारा भी ..सिर्फ शादीशुदा कहना काफी नहीं है क्या ? अजय की समझ में ही नहीं आया कि अशोक उसका पक्ष ले रहा है या मज़ाक उड़ा रहा है ।
"अरे भाई, लड़ो मत हम सब को भी एक दिन बैल ही बनना है और ज़िंदगी के जुए में जुतना है ।"रवीन्द्र ने अजय का बचाव करते हुए कहा । फिर वह मुझसे मुख़ातिब हुआ "लेकिन यार कुछ भी कहो, यह जानवर नहीं होते तो मनुष्य अकेले खेती नहीं कर सकता था ।" "ठीक कह रहे हो तुम ।" मैंने कहा "यह जानवर उसके लिए धीरे धीरे बहुत कीमती होते गये इसीलिए फिर इन जानवरों की रक्षा करने के लिए उसने देवी देवताओं की स्थापना की और चूँकि यह जानवर उसकी जीविका का साधन बने इसलिए उनकी भी उसने देवताओं की तरह पूजा शुरू की । इस तरह उसका जीवन चलता रहा । हालाँकि पशुओं को पालने के साथ साथ उसकी ज़िम्मेदारी और बढ़ गई क्योंकि अब उसे अपने परिवार के सदस्यों की तरह इनकी भी देखभाल करनी पड़ती थी । पशुओं को भी इंसान की ज़िम्मेदारी उठानी पड़ी जैसे कि गाय जो पहले केवल अपने बछड़े को दूध पिलाती थी उसे अब मनुष्य के लिए भी दूध देना पड़ा ।"
"सही कह रहे हो सरदवा इसीलिए तो हमारी गाय गौमाता कहलाई ।" राममिलन भैया का गौ प्रेम जागृत हो गया था । "हाँ यह बात तो सही है ।" मैंने कहा "यद्यपि गाय को यह दर्जा वैदिक काल के पश्चात दिया गया । प्रारम्भ में तो वह अन्य जानवरों की तरह ही थी । लेकिन अन्य जानवरों की तुलना में गाय केवल दूध नहीं देती थी बल्कि खेती के लिए बैल भी देती थी सो माता का सम्मान उसे दिया गया । "लेकिन ।" अजय ने एक बढ़िया तर्क रखा "दूध तो और भी जानवर देते हैं जैसे बकरी ..फिर उसे हम माता क्यों नहीं कहते ?" किशोर ने कहा "भाई बकरी का अविर्भाव तो वाकई बहुत पहले का है, लेकिन वैदिक काल आते तक गाय की महत्ता दूध देने के अलावा खेती के लिए बैल देने के कारण भी स्थापित हो चुकी थी इसलिए उसे माता का दर्जा दिया गया ।" " फिर भी यार बकरी मनुष्य की इतनी पुरानी साथी है उसे कुछ तो दर्जा दिया जाना चाहिए ..गांधीजी भी गाय नहीं पालते थे, वे बकरी ही पालते थे, उन्होंने देश के लिए इतना कुछ किया लेकिन बकरी को सम्मान दिलाने के लिए कुछ नहीं किया?" अजय ने अपनी व्यथा प्रकट की ।
"हे भगवान, तुम लोग भी बात को कहाँ से कहाँ ले जाते हो ।" अशोक ने कहा " अरे बावले, गांधीजी के पास और कोई काम नहीं था क्या जो बकरी और मनुष्य का रिश्ता ढूँढते .. खैर कोई बात नहीं .. गाय को तुम माता बुलाते हो तो बकरी को बुआ कह दिया करो " "क्यों मौसी क्यों नहीं ? अजय ने पूछा .." अरे भाई मौसी तो भेड़ बन ही चुकी है .. क्योंकि वह गाय के जितनी पुरानी है .." अशोक ने जवाब दिया । अजय ने कहा " ठीक है .. फिर गाय माता हो गई , भेड़ मौसी हो गई , बकरी इनसे भी प्राचीन है इसलिए बुआ हो गई तो भैंस क्या कहलाएगी वह भी तो दूध देती है ? इसके अलावा गधी का उल्लेख भी वेदों में आता है और वह दूध भी देती है सो उसके लिए भी कोई रिश्ता ढूँढना चाहिए ।"
"ढूंढ तो लिया है । " किशोर भैया ने कहा " तू भाभी को कभी कभी गधी नहीं कहता क्या ? तो तू क्या हुआ ? गधी का हसबैंड गधा ।" हमारी हँसी के बीच अजय ने किशोर की बात पर सिर ऊँचा उठाया और जोर से गधे के रेंकने जैसी आवाज़ निकालते हुए कहा "हौ गधे के बड़े भाई ।" मैं इस बात को समझ रहा था कि अब इन लोगों की गंभीर चर्चा में कोई रूचि नहीं है । फिर भी उपसंहार तो करना ही था ।
मैंने खखारकर अपना गला साफ़ किया "ठीक है भाइयों, भैंस और गधी को मानव परिवार में उचित दर्जा दिलाने के लिए तुम लोग आन्दोलन वगैरह करते रहना, फिलहाल तो उस मनुष्य के बारे में सोचो जिसके जीवन में कृषि और पशुपालन ने सुविधाओं का स्वर्ग उपस्थित कर दिया । अब उसकी स्थिति अपने पूर्वजों से कहीं ज्यादा बेहतर थी । उसे अपने शिकारी पूर्वजों की तरह केवल शिकार पर आश्रित नहीं रहना पड़ता था । वह प्रकृति पर भी पूरी तरह निर्भर नहीं था, किसी भी मौसम में उसे खाद्य मिल ही जाता था, उसके पास ढेरों अनाज था, दूध था, शहद और जंगली फल तो होते ही थे और इसके अलावा पीला गए पशुओं के रूप में हमेशा के लिए एक मांस का भंडार तो था ही ।"
"लेकिन यह अजीब नहीं लगता कि वह मनुष्य जो गाय, भेड़, हिरण आदि पालता था उन्हें ही मारकर खा जाता था ?" रवीन्द्र के सवाल का प्रभाव यह हुआ कि अब बाक़ी मित्र भी हँसी मज़ाक छोड़कर गंभीरता से मेरी बात सुनने के लिए तत्पर हो उठे । मैंने कहा "नहीं, ऐसा जघन्य कार्य वह कम करता था क्योंकि प्राणियों को जीवित रखने में उसे ज़्यादा फायदा था । इसके अलावा प्राणियों के साथ रहने से उनके प्रति थोड़ा बहुत मोह भी उसके भीतर जागृत हो गया था इसलिए बहुत से प्राणी अपनी स्वाभाविक मृत्यु को ही प्राप्त होते थे । फिर भी ज़रूरत के वक़्त ऐसा करने में कोई हर्ज नहीं था । आज भी लोग बकरियाँ,मुर्गियां,बतख,सूअर आदि मांस के लिए ही पालते हैं ,भले ही वे उनका व्यापार करते हों ।"
"वाकई यार, मैं सोचता हूँ कि हमारे पुरखों ने अपने श्रम और अक्ल से यह स्थिति प्राप्त की होगी ।" अजय गंभीरता से संवाद का उपसंहार प्रस्तुत कर रहा था । रवींद्र ने उसकी बात का समर्थन करते हुए कहा "सही है, यह स्थिति इतनी आसानी से नहीं आई, उसे कितनी बार भूखे रहना पड़ा होगा, सूखा, अतिवृष्टि आदि समस्याओं से जूझना पड़ा होगा । इसी तरह प्रकृति भी देवता के रूप में उसके जीवन में स्थापित हुई। सर ने बताया था ना कि जैसे प्रारंभिक शिकारी पशुओं से अपना मांस दान देने की प्रार्थना करता था वैसे ही यह कृषक पशुपालक पृथ्वी और आकाश से अच्छी फसल देने की प्रार्थना करने लगा, उसके देवता जो पहले सिर्फ पशु या पेड़ थे धीरे धीरे पृथ्वी, सूर्य, आकाश, वर्षा आदि में बदलने लगे । कालांतर में उसने इनके लिए भी प्रार्थनाएं रचीं । वह अपने अनाज और पशुओं से प्राप्त मांस को देवताओं से मिला प्रसाद मानता था और इसीलिए अनाज और मांस का एक अंश चढ़ावे के रूप में उन्हें अर्पण भी करता था ।"
अशोक ने चुटकी लेते हुए कहा "हालाँकि उसे पता था कि देवता तो प्रसाद खाने से रहे इसलिए उन्हें चढ़ाने के बहाने वह खुद खा जाता था ।" अजय तो प्रसाद के नाम से ही खुश हो गया "तो क्या हुआ.. इस बहाने नई नई चीज़ें तो खाने को मिलती हैं । मुझे तो परसाद में पंजीरी बहुत पसंद आती है । हमारे एक फूफाजी है वो बच्चों से बढ़िया मजाक करते हैं उन्हें आटे की सूखी हुई पंजीरी देते हैं और कहते हैं जोर से बोलो 'फूफाजी' । बच्चे पंजीरी फाँककर जैसे ही फू फा कहते हैं पूरी पंजीरी मुँह से बाहर उड़ जाती है । अजय का यह चुटकुला सुनकर हम लोग तो ज़ोर से हँस दिए लेकिन रवीन्द्र को हँसी नहीं आई । उसके दिमाग़ में कोई सवाल उथल पुथल मचा रहा था ।
"यार यह पंजीरी को प्रसाद के रूप में चढ़ाने का प्रचलन कबसे शुरू हुआ होगा ? उसने गंभीरता से पूछा । "बहुत सही सवाल किया है तुमने ।" मुझे लगा उसके सवाल में एक इतिहास छुपा हुआ है । "इसका सम्बन्ध आदिम मनुष्य की भोजन पकाने की विधि से है । जब उसने अनाज उगाना शुरू किया तो सबसे पहले उसके मन में यही आया होगा कि इसे खाया कैसे जाए । फिर जिस तरह वह आग में कंद मूल और मांस भूँजकर खाता था उसने धान और जौ आदि अनाजों की बालियों को भूंजना प्रारंभ किया । फिर वह नाखून से उस अनाज को बाहर निकालता था और उसे पीसकर चूर्ण बना लेता था और खाता था । यही चूर्ण उसने प्रसाद के रूप में देवताओं को चढ़ाया । हो सकता है यही पंजीरी का आदिम रूप रहा हो । इसके अलावा वह सूखा अनाज भी देवताओं को अर्पित करता था । आज जैसे चढ़ावे के चावल को हम अक्षत कहते हैं वह इसी परम्परा में है ।"
"लेकिन फिर अनाज को पकाने या आटा गूंदकर रोटी बनाने की पद्धति कब से शुरू हुई ?" अजय ने छेड़े जाने का ख़तरा उठाते हुए रसोई सम्बन्धी यह सवाल किया । "हो सकता है उसने फिर उस चूर्ण में पानी मिलाकर उसे गूंथकर रोटी जैसा कुछ बनाया हो फिर उसे आग में पकाकर खाया हो ।" मेरा दिमाग़ कुछ इस तरह सोच रहा था । "हालाँकि बर्तन में पकाने की कला तो मृद्भांड या धातु की खोज के बाद बर्तन बनाने से हुई लेकिन उसके पहले भी वह कपाल में अनाज रखकर उसे पकाने की विधि जानता था ।" मनुष्य के कपाल में रखकर अनाज पकाने की बात से राममिलन भैया कुछ चौंक से गए लेकिन उनके दिमाग़ में भुने हुए अनाज के चूर्ण को लेकर कुछ चल रहा था । "ठीक कह रहे हो सरदवा, उसने रोटी के आविष्कार से भी पहले सत्तू का आविष्कार किया । सत्तू को इसीलिए मनुष्य का सबसे पहला भोजन कहा जाता है , हमरे यहाँ तो जब कुछ नहीं मिले तो सत्तू खा लो ऐसा कहा जाता है, हमें तो बहुतै पसंद है जौ का सत्तू, चने का सत्तू, और हमरे इधर तो सत्तू का परसाद भी चढ़ाते हैं सतवाई अमावस्या को कि हे भगवान तूने ही हमें यह सब कुछ दिया है । इसलिए पहला हिस्सा तेरा ।" राममिलन भैया बात ही बात में ईश्वर और चढ़ावे के प्रसाद का सम्बन्ध बता चुके थे ।
"अच्छा तो हम लोग मंदिर जाकर प्रसाद इसीलिए चढ़ाते हैं..।" अजय ने ऐसे कहा जैसे वह कुछ जानता ही नहीं हो । रवींद्र ने कहा । " हाँ लेकिन तेरे समान मंदिर में प्रसाद चढ़ाकर परीक्षा में पास होने के लिए भगवान की प्रार्थना नहीं करते, और परसाद चढ़ाने से कोई पास भी नहीं होता ..समझे ..उसके लिए पढाई करना पड़ता है बाबू ...। " "तो करता तो हूँ यार.." अजय ने रोनी सूरत बनाते हुए कहा । मैंने महसूस किया कि अब सबको नींद आ रही है और आगे की बातों में किसी की रूचि नहीं है सो मैंने सभा समाप्त होने की घोषणा कर दी और हम लोग निद्रा देवी को अपनी सांसों का और सुकून का प्रसाद चढ़ाकर उसकी आराधना में लीन हो गये ।
*शरद कोकास*

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