सोमवार, 1 जून 2026

42-मेरे देश की धरती सोना उगले


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼


*पिछले भाग में आपने पढ़ा कि भाषा की खोज से पूर्व कैसे मनुष्य अपनी बात दूसरों तक संप्रेषित करता था उसके संकेत चिन्ह कैसे होते थे बोलने के लिए उसका जबड़ा कैसे नाकाफी था फिर भाषा की खोज कैसे हुई और उसने किस तरह उसे व्यवहार में लाया इस भाग में आप पढेंगे कि मनुष्य किस प्रकार अन्न संग्रहण की अवस्था से कृषि की अवस्था में आया उसके सामने क्या क्या कठिनाइयाँ आईं*

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*भाग 42*

*मेरे देश की धरती सोना उगले* 

सुबह सुबह हमने नींद की किताब बंद की और रात तक के लिए उसमे सपनों का मोरपंख लगाकर दिन से साक्षात्कार करने के लिए तैयार हो गए । आज कैम्प में हमारा बाईसवाँ दिन है । रोज़ रोज़ ट्रेंच पर वही वही काम करते हुए हम ऊब चुके हैं और हमारी स्थिति उन बच्चों की तरह हो गई है जो एक ही खिलौने से खेलते हुए ऊब जाते हैं और अपने मित्रों के खिलौने से खेलने लगते हैं । लेकिन यहाँ दंगवाड़ा की इस ताम्राश्म्युगीन साईट पर हमारे मित्र भी हमारे ही जैसे हैं और उनके पास खिलौने भी वही हैं जो हमारे पास हैं । दुनिया भर के मनोरंजन के साधनों से घिरे रहने वाले और भांति भांति के कामों से अपनी ऊब मिटाने वाले शहर के लोग इस बात को कभी नहीं समझ सकते कि एक पुरातत्ववेत्ता कितने सीमित साधनों के साथ अपना रोज का उबाऊ कार्य संपन्न करता है जो उसके लिए काम भी है और मनोरंजन भी ।  

डॉ.वाकणकर शायद हम लोगों की मनस्थिति समझ रहे हैं । उन्हें यह बात पता थी कि शहर में रहने वाले यह बच्चे अब प्रतिदिन के इस एकरस काम से ऊब गए हैं और इन्हें विविधता की तलाश है । सुबह सुबह वे हमारे तम्बू में आये और उन्होंने आज के कार्यक्रम की घोषणा करते हुए कहा "सज्जनों, आज आप लोगों को ट्रेंच पर काम नहीं करना है आज घूमने का दिन । " हम लोग अपने भीतर उमड़ रही ख़ुशी को चेहरे तक ला पाते इससे पहले उन्होंने कहा "आज आप लोगों को घूमते हुए पास के गाँव में एक खेत में एक्सप्लोरेशन के लिए जाना है । आज आप लोगों के साथ कोई नहीं जाएगा न कोई रहेगा, सिर्फ एक व्यक्ति आपको जगह दिखाने ले जाएगा बाक़ी काम आपको अकेले ही करना है और आपके टीम लीडर हैं किशोर त्रिवेदी ।" 

निरुद्देश्य भटकने के इस काम के बीच एक्सप्लोरेशन करने की यह शर्त पहले तो हमें मायूस कर गई लेकिन कोई हमारे साथ नहीं रहेगा यह बात हमारे भीतर छुपी मस्ती को गुदगुदाने लगी । हमने टीम लीडर किशोर भैया के नाम पर ज़ोरदार तालियाँ बजाईं । फिर जल्दी जल्दी हम लोग नहा धोकर तैयार हुए और नाश्ता करके खेत की ओर निकल पड़े । सर ने एक आदमी हमारे साथ भेज दिया था ।

फुलान में एक्सप्लोरेशन का अनुभव हमारे पास था ही और हमें क्या करना है यह बात हमें अच्छी तरह ज्ञात थी लेकिन पता नहीं क्यों एक्सप्लोरेशन में आज किसीका मन नहीं लग रहा था । वहाँ खेतों में बिखरे हुए अवशेष ढूँढते हुए हमें ऐसा महसूस हो रहा था जैसे हम लोगों का जन्म मानव की कंद मूल बीनने वाली अवस्था में हुआ है और हम अपने पेट की भूख मिटाने के लिए यह काम कर रहे हैं ।  आज एक्स्प्लोरेशन करते हुए हमें ऐसा ही कुछ महसूस हुआ । झुक झुक कर खेत में पड़े अवशेष ढूँढते हुए कुछ देर के लिए रवीन्द्र रुका । उसने अपनी कमर पर पीछे की ओर  हाथ रखकर उसे एक झटका देकर सीधा किया । उसे देखकर अशोक और अजय भी हमारे पास आ गए । उनके चेहरे पर भी ऊब के भाव थे ।

रवींद्र ने अपनी जेब से कुछ पंचमार्क सिक्के निकाले और उन्हें देखते हुए कहा "यार अशोक तू सही कह रहा था, क्या इसी तरह का उबाऊ काम करते हुए हमारी ज़िन्दगी बीतेगी ?" ऊब तो मैं भी हो रहा था लेकिन इससे पहले कि इस ऊब  का सर्वव्यापीकरण हो मैंने उसे उत्साह दिलाते हुए कहा  "भाई इसमें निराश होने जैसी कोई बात नहीं । माना कि ज़िंदगी में और भी सुख हैं लेकिन हम संग्रहण का यह कार्य हम अपने पेट की भूख मिटाने के लिए तो नहीं कर रहे हैं बल्कि हमारा उद्देश्य मानवता के इतिहास की खोज है । यह हमारा सामूहिक प्रयास है इसलिए अपनी निजता को भूलकर हमें एकजुट होकर इस महान कार्य को संपन्न करना है ।" 

"बस कर यार बहुत हो गया तेरा महानता पर भाषण ।" अशोक ने मेरी बात को हवा में उड़ाते हुए कहा " हमें नहीं बनना महान-वहान । हमसे पहले जिन लोगों ने यह महान कार्य किया वे भी कौनसे महान बन पाए ? इस समाज में पुरातत्ववेत्ता को जानता ही कौन है, घर में भी उसकी कोई इज्जत नहीं होती सब लोग आधुनिकता की बात करते हैं और वह पुराने जमाने की बात करता है । ऐसा लगता है जैसे टाइम मशीन से बाहर निकल कर आ रहा हो ।" " इतना निराश होने की जरुरत भी नहीं है भाई ।" मैंने अशोक के कंधे पर हाथ रखा । "दुनिया में महान काम करने वाले सब लोग भी महान नहीं होते । हमें सिर्फ आज उन्हीके नाम पता है जिन्होंने बहुत महान खोजें की हैं लेकिन उनके जो पूर्वज रहे और जिन्होंने उस काम को वहाँ तक लाकर छोड़ा उन्हें कौन जानता है ? इसलिए बिना निराश हुए हमें यह कार्य करना है । चलो अब जल्दी से काम ख़त्म करो और वापस चलो भूख भी लगने लगी है ।" अब इतना महान उद्देश्य मैंने सबके सामने रख दिया था ..फिर उसमे भूख की बात भी शामिल हो गई थी अब कोई क्या कहता । 

दंगवाड़ा का यह क्षेत्र पुरातात्विक सम्पदा से संपन्न है  । पुरातत्व की भाषा में इसे रिच साईट कहते हैं । इस क्षेत्र में जगह जगह ताम्राश्मयुगीन अवशेष बिखरे पड़े हैं । ज़मीनों पर लोग खेती भी कर रहे हैं, मकान बना कर रह भी रहे हैं । पटवारी के कागजों में भले यह ज़मीन उनके नाम लिखी हो लेकिन वे इस बात को जान रहे हैं कि इस ज़मीन पर रहने वाले वे पहले इंसान नहीं हैं, उनसे पहले भी एक सभ्यता यहाँ रह चुकी है । जो यहाँ के मूल निवासी थे वे जाने कहाँ चले गए । इस ज़मीन की मिल्कियत का कोई कागज़ भले उनके नाम का नहीं हो लेकिन उनके रहने के ढेर सारे प्रमाण यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं । अवशेष बटोरते हुए  रवीन्द्र के मन में एक विचार आया ... “ यार जो पहला मानव इस स्थान पर रहता होगा क्या उसने कभी सोचा होगा कि हज़ारों साल बाद कोई किसान उसकी इस धरती पर हल चलाएगा ? “ “ बिलकुल नहीं “ मैंने कहा । खेती किसानी क्या होती है यह उसे पता ही नहीं था । वह तो शिकारी संग्रहणकर्ता की अवस्था में था । उसके  हजारों साल बाद मनुष्य कृषि की अवस्था में आया ।"

“लेकिन इंसान के किसान बनने का किस्सा भी दिलचस्प है ना ? “ मैं समझ गया अजय मुझे उकसा रहा है ।“ पुरातत्ववेत्ताओं को कितनी मुश्किल से इस बात के प्रमाण मिले होंगे कि मनुष्य ने खेती बाड़ी शुरू कर दी..क्यों भाईजान ? “हाँ ।“ मैंने अजय का आशय समझते हुए कहा । " पुरातत्ववेत्ताओं को प्रागैतिहासिक स्थलों पर कृषि के प्रमाण सर्वप्रथम प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिले । उन्हें अनेक वस्तुओं के साथ साथ सर्वप्रथम मिट्टी के पात्र मिले जिनका सिलसिला आगे कृषि से जुड़ता है । इन मिटटी के पात्रों पर कुछ धारियाँ जैसी थीं । दरअसल प्रारंभ में यह पात्र इस तरह नहीं बनाए जाते थे जैसे कि आज बनाए जाते हैं । "

"तो फिर कैसे बनाये जाते थे महोदय ?" अजय ने घास के एक तिनके से अपने दांत में फंसा सुबह खाए हुए उपमा में डले टमाटर का छिलका निकालते हुए कहा । "यह बात तो उसे मालूम हो ही गई थी कि गीली मिटटी को आग में डालने से वह पक जाती है ।" मैंने बात को विस्तार देते हुए कहा " मिटटी का पात्र बनाने के लिए सरकंडे से बुनी हुई एक टोकरी की भीतरी सतह पर गीली मिट्टी की एक तह जमाई जाती थी और फिर उसे सुखाने के बाद आग में पकने के लिए रख दिया जाता था । आग में सरकंडे जल जाते थे और पका हुआ बर्तन तैयार हो जाता था । पकने के बाद बर्तन पर सरकंडों के निशान किसी डिज़ाइन की तरह ही दिखाई देते थे । बाद में मनुष्य ने बिना टोकरी की सहायता के बर्तन बनाना सीख लिया । लेकिन वे बर्तनों पर उसी तरह की चौखाने वाली आकृति बनाते थे, उनकी यह मान्यता थी कि इस तरह की आकृति बनाने के पीछे उनके पूर्वजों का कोई उद्देश्य रहा होगा । कभी कभार कुछ बर्तनों पर कुत्ते, बिल्ली या अन्य जानवरों की भी आकृति पाई जाती थी । “

“ यार ,तुम मानव के किसान बनने की कहानी सुना रहे हो या कुम्हार बनने की ? “ अशोक ने मेरी कथा से ऊब कर सवाल किया । “ मैं किसान की ही कहानी सुना रहा हूँ भाई, सारांश यह कि मनुष्य शिकारी अवस्था से एकदम किसान नहीं बन गया । इस बात के प्रमाण के लिए यह कथा ज़रूरी थी । हुआ यह कि पुरातत्ववेत्ताओं  को ऐसे ही बर्तनों पर अन्य आकृतियों के साथ जौ के दाने का एक निशान मिला और उन्होंने इसे शिकारी के किसान हो जाने का प्रमाण माना ।" "मतलब बर्तन पकाने में ग़लती से जो मिस्टेक हो गई वह आगे चलकर परंपरा और प्रमाण बन गई ।" यह रवींद्र का एक्सपर्ट कमेन्ट था । "बिलकुल " मैंने कहा " फिर आगे चलकर अन्न के निशान वाले बर्तनों के अलावा उन्हें कुदाल, अन्न कूटने के ऊखल आदि भी प्राप्त हुए । इसके अलावा गुफा चित्रों में भी ऐसे चित्र प्राप्त हुए हैं जिनमें स्त्रियों को शहद के छत्ते से घड़े में शहद इकठ्ठा करते हुए बताया गया है ।"

“ लेकिन उसका इस तरह परिवर्तन कैसे हुआ ? मेरा मतलब खेती करने का आयडिया उसके दिमाग में कैसे आया ?“ अशोक ने व्यग्र होकर पूछा । “ हाँ ।“ मैंने कहा “ वह सीधे सीधे शिकारी अवस्था से किसान नहीं बना । होता यह था कि जब घर के पुरुष शिकार के लिए जाते थे तब घर की स्त्रियाँ व बच्चे जंगल में खुम्भी, कंद, बेर आदि जंगली वनस्पति बीनने का काम करते थे । वे मधुमक्खी के छत्तों से शहद भी लाते थे और साथ ही बहुत सारी वनस्पतियाँ और जंगली अनाज भी बटोर लाते थे । औरतें खाद्य सामग्री का भंडारण करना अच्छी तरह जानती थीं इसलिए कि उन्हें  पता था, वर्षा की स्थिति में या शिकार न मिलने की स्थिति में उनके द्वारा संग्रहित सामग्री ही काम आएगी ।

“एक मिनट ।“ अशोक ने कहा ”मतलब स्त्रियाँ शिकार के लिए कभी गई ही नहीं ?“ “नहीं ऐसा भी नहीं है ।“ मैंने कहा “शुरू शुरू में स्त्रियाँ भी पुरुषों के साथ शिकार के लिए जाया करती थीं, शारीरिक रूप से उनके पास भी पर्याप्त बल था और शिकार करने की बुद्धि भी पुरुषों से कम नहीं थी लेकिन गर्भावस्था में उनका भागदौड़ करना कठिन हो जाता था । हालाँकि वे प्रसव से पूर्व तक इस कार्य को करती ही थीं जैसे कि आज भी खेतों में मजदूर स्त्रियाँ करती हैं  लेकिन प्रसव के उपरांत शिशु संगोपन में उनका इतना समय बीत जाता था कि उन्हें घर पर ही अधिक रहना पड़ता था । और यह सिलसिला उनके सम्पूर्ण मातृत्व जीवन तक चलता रहता । इस प्रकार धीरे धीरे उनका पुरुष के साथ शिकार पर जाना बन्द हो गया । हालाँकि गर्भावस्था से इतर दिनों में वे संग्रहण का कार्य भी करती रहीं लेकिन ऐसे दिन उनके जीवन में बहुत कम होते थे ।“

“ यार, कुछ भी कहो, यह स्त्रियाँ शुरू से ही समझदार रही हैं । “ अजय ने कहा …” अभी भी हम देखते हैं कि आड़े वक़्त के लिए संग्रहण की यह प्रवृत्ति स्त्रियों में विद्यमान है । हमारे घर की महिलाएँ बरी, पापड़, अचार ऐसे ही समय के लिए बनाती हैं । “  “वाह वाह ।“ रवींद्र ने कहा “ देखा हमारा भाभी का भैया शादी के बाद कितना समझदार हो गया है ।“ राममिलन भैया ने भी इस पर अपना मत व्यक्त करना उचित समझा …” बिलकुल ठीक कहत हो भैया, बरसात के मौसम मा जब सब्जी भाजी नही मिल सकै तब ई बरी का सब्जी मा आनंद आई जात है । “

“औरतें जंगल से बहुत सारी वस्तुएँ बटोर लाती थीं ।“ मैंने सज्जनों के स्त्री विमर्श में भाग न लेते हुए अपनी बात जारी रखी …”इनमें शहद, जंगली फल, बेर आदि के अलावा कोदो, कुटकी, जौ या ऐसे ही जंगली अनाज भी शामिल होते थे । जब वे उन अनाजों को मिटटी के पीपों, मटकों या पत्तों की टोकरियों में रखतीं तो कुछ अनाज ज़मीन पर गिर जाता था और मिट्टी में दब जाता था । पानी भी वहाँ गिरता रहता था । कुछ समय बाद उसमें से अंकुर निकलने लगते और जब वह पौधा बन जाता तो उसमें से उसी प्रकार का अनाज निकलने लगता । बरसों तक उन्होंने  इस प्रक्रिया का अध्ययन किया और अनायास होने वाले इस कार्य को सायास करने का प्रयास किया । मतलब यह कि बीज की ताकत को उन्होंने जाना और फिर इसे ख़ाली ज़मीन में बिखेरकर सायास उन्हें उगाना शुरू किया । इसके लिए वे बाकायदा कुदाल से गड्ढा खोदकर उसमें अनाज को गाडती थीं इस प्रकार खेती की प्रथा का शुभारंभ हुआ ।"

“ वैसे यह उनके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था । “ रवींद्र भी मनुष्य के किसान बनने की इस कथा को बेहतर जानता था…” वे अन्न को देवता समझते थे और इस तरह ज़मीन में उसे गाड़कर उसके उग  आने को फिर देवता की वापसी की तरह मानते थे ।“ अजय बोला “ समझ गया , इसीलिए हमारे किसान अभी भी अन्न को देवता मानते हैं , और इसी मान्यता के कारण फसल कटने पर उसकी पूजा करते हैं और उत्सव मनाते हैं । हमारे सारे त्यौहार भी तो इस मान्यता से ही जुड़े हैं ,भले ही बाद में उसमे धार्मिक कहानियाँ जोड़ दी गईं ।“

“ बिलकुल सही ।“ मैंने अजय की समझदारी पर प्रसन्न होते हुए कहा  "फिर वह किसान इस अनाज के इर्द गिर्द नृत्य करता था । अनाज बोने से लेकर काटने तक एक संस्कार सम्पन्न होता था ।"  "कितनी अजीब बात है ना …” रवींद्र ने कहा …”वे सारे संस्कार अब तक चले आ रहे हैं और हमारे सारे उत्सव भी फसल को लेकर ही हैं ।"  “ हाँ “ मैंने कहा “ लेकिन प्रकृति की बहुत सारी बातें वे उस तरह नहीं समझते थे जैसे कि आज का किसान समझता है । वे अनाज का उगना, आंधी का चलना, बादलों का बरसना, बिजली का कड़कना जैसी हर बात को जादू टोने से जोड़ते थे और हर गतिविधि के देवता का निर्माण  कर उसके नाम से अनुष्ठान करते थे । भाषा की खोज के साथ उन्होंने इस अनाज उगाने, काटने की प्रक्रिया को लेकर गीत भी रचे । आज भी आदिवासी समाज में फसलों को लेकर ऐसे ही कई गीत गाये जाते हैं । बच्चों के कई खेल भी ऐसे ही गानों पर आधारित हैं ।

"हाँ, हाँ ।" अजय ने कहा "मनोज कुमार के एक सिनेमा में भी ऐसे ही गाना था ..मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती" ... "ए भाई .. मैं लोक गीतों की बात कर रहा हूँ, तुम सिनेमा के गीतों की बात कर रहे हो .." मैंने अजय के फ़िल्मी उत्साह पर पानी फेरते हुए कहा  "दरअसल समय के साथ साथ और विज्ञान की प्रगति के साथ साथ इन गीतों से या कह लें कि इन संस्कारों से जादू टोने वाला प्रभाव समाप्त हो गया । आज किसान जानता है कि बीज से पौधा कैसे पैदा होता है, अच्छी फसल उगाने के लिए किन किन चीजों की ज़रूरत होती है अच्छा खाद, सिंचाई के लिए प्रचुर मात्रा में पानी, हवा और धूप सब ज़रूरी है । लेकिन वह यह भी जानता है कि इसके लिए प्रकृति का अनुकूल रहना भी ज़रूरी है । इसीलिए वह प्राकृतिक देवताओं को अब भी मानता है और उनकी पूजा करता है ।" 

"सही कहत हो भैया लेकिन अब तो भैया, इस बीज और खाद के लिए सरकारी कर्ज भी ज़रूरी है .. लेकिन फसल नहीं हुई तो सब बरबाद ।" राममिलन भैया कहने लगे । " यह भी सच है कि अभी भी किसान सिंचाई के लिए आसमान की बारिश पर निर्भर है, तो जादू तो यह अब भी है, फसल हो गई तो जादू चल गया देवता प्रसन्न हो गए और नहीं हुई तो देवता नाराज ..जादू फैल ..इसलिए अभी भी वेदों में वर्षा के लिए प्रार्थनाएँ मौजूद हैं, वर्षा के लिए यज्ञ किये जाते हैं । सो हम अभी भी उस अनुष्ठान की मानसिकता से बाहर कहाँ निकल पाए हैं ।"  मुझे महसूस हुआ कि राममिलन भैया ने बात तो बिलकुल पते की कही है फिर भी मैंने उनकी बात का प्रतिवाद करते हुए कहा " भैया, अगर यज्ञों से ही बारिश हो जाती तो क्या बात थी, हम अनाज उगाने में नंबर वन नहीं हो जाते । अब भी हमारी तुलना में वे देश ज्यादा फसल उगाते हैं जहाँ यज्ञ नहीं होते ।"

" तो फिर यह यज्ञ -फज्ञ सब बंद कर देना चहिये कौनो फायदा नहीं है जब इनसे ।" राममिलन भैया आज बहुत प्रगतिशील भूमिका में थे । मैंने कहा "ऐसा है भैया, हमारे यहाँ यह सब अनुष्ठान उन्ही परम्पराओं के तहत होते हैं जिनका उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में किया गया है । यह कोई नहीं सोचता कि यदि उनकी उपयोगिता उस काल में थी तो आज उसका क्या औचित्य है । अगर मनुष्य के भीतर इतिहास बोध होता तो वह इस बात को समझ सकता था कि यज्ञ वस्तुतः कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं थे बल्कि कृषक वैदिक संस्कृति के लोगों द्वारा ज़मीन को कृषि योग्य बनाने हेतु झाड़ -झंखाड़ जलाने की एक प्रविधि थी जिसने बाद में अनुष्ठान का रूप धारण कर लिया । उस समय भी काफी लोग पशुपालक और अन्न संग्रहण की अवस्था में भी थे और उनसे उनकी जमीन छीने जाने की स्थिति में उनसे युद्ध भी होते थे । ये वही लोग थे जो अपनी ज़मीन की रक्षा करते थे इसलिए राक्षस कहलाते थे ।

"अब हमें समझ में आया ।" राममिलन भैया ने अपनी रीढ़ की हड्डी को पूरी तरह तानते हुए कहा  । " इसीलिए इन राकछसों से अपने यज्ञ  को बचाने के लिए विश्वामित्र जी रामचंद्र जी को और उनके भ्राता लछमन जी को अपने साथ लेकर गए थे ।" " बिलकुल सही कह रहे हो पंडित " किशोर भैया ने जैसे ही राममिलन भैया की तारीफ़ की वे हाथ जोड़कर खड़े हो गए " लेकिन आज तो राक्षस नहीं है सो अब यज्ञ की क्या ज़रूरत ?" " वाह कईसे जरुरत नहीं है ।" राममिलन भैया ने कहा " अबके जमाने में वो बड़े बड़े सींग वाले राक्छस नहीं है तौन उनकी जगह दूसरे राक्छस पैदा हो गए हैं ।" वही ना जिनको तुम हर पांच साल में वोट देने जाते हो ?" अशोक ने हँसते हुए कहा । 

" चलो भाई , अब वापस चलें ..हमारे पेट में भी यज्ञ की ज्वाला जल रही है और उसमे रोटी सब्ज़ी की आहुति देना है ।" अजय ने वापसी की घोषणा करते हुए कहा। मैं समझ गया अब आज के एक्सप्लोरेशन के दौरान का चर्चा सत्र समाप्त हो गया है और हम लोगों को कैम्प की ओर वापस लौटना है । हम लोगों ने एक्सप्लोरेशन में प्राप्त पंचमार्क सिक्के , मनके और मृद्भांडों के टुकडे उठाकर खाली बोरियों में रखे और कैम्प की ओर चल दिए ।    

*शरद कोकास*


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