सोमवार, 1 जून 2026

32-इसे हिंदी में एलोरा और मराठी में वेरुळ कहते हैं


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

*युवा पुरातत्ववेत्ताओं की टीम दौलताबाद पहुँच चुकी है शरारतें भी चल रही है महेश ने मशालची को बातों में उलझाकर नीचे ही रोक दिया और अब छात्रों की टीम किले के ऊपर आ चुकी है दौलताबाद के बाद अब एलोरा की बारी है एलोरा बहुत प्रसिद्ध जगह है यहाँ की यात्रा में आपको आनंद आएगा।*

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*भाग 32*

*एलोरा कहें या वेरुल एक ही बात है*  

कुछ देर बाद अशोक को ख्याल आया... "भाया तूने अपनी डायरी क्यों बंद कर दी? अभी दौलताबाद का किस्सा तो बचा है ना ?" बचा तो है .." मैंने कहा "लेकिन मुझे लगा कि अब आप लोगों का सुनने का मूड नहीं है तो मैंने पढ़ना बंद कर दिया ।" 

" अरे ! कौन कहता है कि हमारा मूड नहीं है हम तो आज रात भर यह किस्सा सुनने के मूड में हैं । " किशोर भैया जो काफी देर से खामोश थे उठकर बोले " तुम बता रहे थे कि महेश ने गाइड को मज़ा चखाने के लिए आधे लोगों को मशालची के साथ पहले दौलताबाद के किले के ऊपर ले जाने का प्लान बनाया था ।" 

"सिर्फ गाइड को मज़ा चखाने वाली बात नहीं थी किशोर भैया ।" अशोक ने मेरी डायरी मुझे थमाते  हुए कहा "वो अभी रंगीन परिधान वाली लड़कियों की बात की थी ना शरद ने  ..हूँ.. मैं सब समझौ हूँ उन्ही के चक्कर में उसने यह प्लान बनाया था ।" 

" भाई.." मुझे महेश का चरित्र प्रमाणपत्र जारी करना था .." अब बेचारे महेश ने इतनी मेहनत की थी तो उसका भी तो कुछ हक़ बनता था, और फिर स्त्रियों का सान्निध्य किसे अच्छा नहीं लगता ..हालाँकि महेश से ज़्यादा शर्मीला कौन होगा ..खैर आगे की कथा सुनो ।" 

मैंने डायरी का पन्ना खोलकर अवचेतन में स्थित विराम चिन्ह को याद किया । " पहाड़ी पर बने दौलताबाद के उस किले में सीढ़ियाँ भी कम नहीं थीं, नीचे बेस से यहाँ तक आते आते अधिकांश महिलाएँ थक गईं थीं लेकिन उत्साह उनका कम नहीं हुआ था । इतनी देर में हम लोगों से उनकी  जान पहचान हो चुकी थी और वे इस बात से बहुत प्रभावित थीं कि हम लोग इतिहास के छात्र हैं और एजुकेशन टूर के लिए यहाँ आए हैं । 

हमारे साथ मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग के भूतपूर्व निदेशक का होना हमें अतिरिक्त महत्व प्रदान कर रहा था । हम लोगों ने उनसे बातचीत करते हुए इस किले के इतिहास के साथ साथ सन बारह सौ से पंद्रह सौ छब्बीस तक के मध्यकालीन इतिहास दिल्ली सल्तनत,गुलाम वंश,खिलजी वंश, तुगलक वंश , सैय्यद वंश, लोदी वंश, तथा दक्षिण के अहोम राज्य, रेड्डी राज्य, विजयनगर साम्राज्य, गजपति राज्य और दक्खिन सल्तनत आदि विभिन्न वंशों के शासन और बाबर के आगमन के बाद के मुगलकालीन इतिहास से भी उनका परिचय कराया । "

"हमारे पास वह जानकारी थी जो अक्सर गाइडों के पास नहीं होती है, जैसे उस काल की सामाजिक आर्थिक स्थिति और अन्य समीपवर्ती राज्यों की स्थिति का विवरण आदि । 

गाइड प्रोफेशनल होते हैं और केवल उतनी ही जानकारी उनके पास होती है जिसे सीमित समय में वे पर्यटकों को बता सकें । आजकल तो वे इतिहास के बारे में जानकारी न देकर यह बताने लगे हैं कि पिछले दिनों कौन कौन से राजनेता अथवा फ़िल्मी लोग यह स्थान देखने आये अथवा कहाँ कहाँ फिल्मों की शूटिंग हुई । 

हमने इतिहास सम्बन्धी जो बातें उन्हें बताई वे उनके गाइड ने उन्हें नहीं बताई थीं सो हमारी बातों का उनपर बहुत प्रभाव पड़ा । महेश और भाई राममिलन बीच बीच में सबका मनोरंजन कर ही रहे थे । राममिलन भैया के बारे में हमने उन्हें बताया कि वे वातावरण को सहज बनाने के लिए इस तरह के हँसी मज़ाक ज़रूर करते हैं लेकिन वास्तव में वे बहुत गंभीर स्कॉलर हैं ।

 राममिलन भैया वैसे भी उस दिन चुस्त पैंट और अपनी इलाहाबादी स्टाइल के साथ काले चश्मे में किसी स्कॉलर से कम नहीं लग रहे थे ।" इतना कहकर मैंने राममिलन भैया की ओर देखा अपनी प्रशंसा सुनकर  वे मंद मंद मुस्कुरा रहे थे ..मैंने उनकी ओर  देखकर हाथ जोड़े ,उन्होंने आशीर्वाद की मुद्रा में अपना हाथ ऊपर उठाया  और आगे पढ़ने का संकेत किया ।

मैंने फिर अपनी नज़रें डायरी में गड़ा दीं । " महिलाओं का वह दल बहुत गौर से हम लोगों की बातें सुन रहा था लेकिन उनके भावहीन चेहरे देखकर ऐसा भी लग रहा था कि देश के तमाम पढ़े लिखे सामान्य लोगों की तरह इतिहास में उनकी भी रूचि नहीं है । देश के सभी पढ़े लिखे नागरिक स्कूल की पाठ्य पुस्तकों में इतिहास पढ़ते अवश्य है लेकिन वह अध्ययन केवल परीक्षा पास करने तक ही सीमित रहता है । 

कालांतर में वे उस इतिहास को भी भूल जाते हैं और पुराण कथाओं और किंवदंतियों को इतिहास समझने लगते हैं । इसी बात का फायदा उठाकर धर्म और राजनीती के मठाधीश उन्हें उस इतिहास को मानने के लिए बाध्य कर देते हैं जिससे उन्हें धार्मिक अथवा राजनीतिक लाभ पहुँचता है । हमें इस बात का अफ़सोस हो रहा था कि यदि देश के सामान्य नागरिक इतिहास में रूचि लेकर उसे भलीभांति पढ़ते तो आज इतिहास को लेकर सत्ता द्वारा जनता को बरगलाने की जो कोशिश की जा रही है उसकी नौबत ही नहीं आती  ।"

 "राममिलन भाई के कानों में उनकी प्रशंसा के शब्द पड़ चुके थे और  वे काफी प्रसन्न थे  । इतिहास के रूखे वर्णन के बीच हास्यबोध उत्पन्न करने के उद्देश्य से वे महेश की ओर मुख़ातिब हुए और उन्होंने एक सवाल पूछा  " का हो महेस, ई तुगलक पगलवा ने इत्ती ऊँची मीनार काहे बनाई रही ?" 

हमेशा की तरह महेश ने जवाब दिया ...“ अरे इतनी सी बात नहीं जानते, जैसे आज के जमाने में लोग प्रेम करते हैं वैसे उस जमाने में भी करते थे । उनमे से कुछ सफल होते थे और कुछ असफल । अब आज की तरह तो प्रेमी होते नहीं थे कि एक प्रेम ख़तम हो जाए तो दूसरी प्रेमिका ढूंढली सो कुछ प्रेमी आत्महत्या भी कर लेते थे । फिर उस समय आत्महत्या के लिए अधिक साधन भी नहीं थे । 

वैसे भी दिल टूटने के बाद आदमी  मरने के लिए कहाँ जगह तलाश करता फिरे सो मुहम्मद बिन तुगलक ने उनके लिए यह व्यवस्था कर दी थी । बस इसी मीनार पर चढ़ते थे और अपनी प्रेमिका का नाम लेकर नीचे कूद जाते थे ।" हमने देखा महेश की इस गप्प पर कहकहे लगाने में इस बार महिलाओं का दल भी हमारे साथ था ।"

हँसी का ज़लज़ला हमारे तम्बू में भी आ चुका था । अबकी बार मेरी बात सुनकर राममिलन भैया भी सबके साथ पेट पकड़कर हँसने में शामिल हो गए .. उनकी हँसी रुकी तो उन्होंने कहा " हमका समझ में आ गया था कि ई महेस की बदमासी है लेकिन इतनी बढ़िया इस्टाइल से वो सुना रहा था जैसे बिलकुल सच्ची बात बता रहा हो .. खैर तुमने बहुतै बढ़िया लिखा है सरदवा ..सच्ची ..मजा आ गया ..। चलो आगे का लेखा सुनाओ ।" 

मैंने पुनः राममिलन भैया का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए हाथ जोड़े और आगे का डायरी वाचन प्रारम्भ किया "  इस बीच पुणे मुंबई के उस पर्यटक दल का दूसरा हिस्सा और उनके साथ वह गाइड भी वहाँ पहुँच चुका था । उसने कोशिश की कि दोनों दलों को एक साथ ले आए लेकिन महिलाओं और बच्चों का दल हम लोगों के सानिध्य में प्रसन्न था और ऐसा आशय उन्होंने व्यक्त भी कर दिया । 

बहरहाल किले की ऊपरी सतह पर पड़ी कुछ तोपें और अन्य अवशेष देख कर हम लोग नीचे आ गए । बस के पास पहुँचकर सबसे पहले हम लोगों ने गन्ने का रस पिया और पसीने की वज़ह से जो उर्जा का क्षय हुआ था ग्लूकोज से उसे चार्ज किया  । अन्य पर्यटन स्थलों की तरह वहाँ भी कुछ दुकानें सज गई थीं जिनमें कृत्रिम मोतियों की मालाएँ और ऐसी ही सामग्री बिक रही थी । मैंने छोटी बहन के सीमा के लिए एक माला और भाई शेखर के लिए एक चित्रों की किताब वहाँ से खरीदी ।

दौलताबाद फ़ोर्ट से जब हम लोगों ने एलोरा के लिए प्रस्थान किया तो सुबह के दस बज रहे थे । एलोरा का रास्ता महज़ एक घन्टे का था । मैं तमाम रास्ते चुपचाप पिछली सीट पर बैठा रहा और खिड़की से बाहर के दृश्य देखता रहा । 

मेरे मन में विचार आया कि उन दिनों जब यहाँ कुछ भी नहीं था न रास्ते थे, न बस्ती थी किन लोगों के मन में यह विचार आया होगा कि इस जगह पर किले बसाए जाएँ, गुफाएँ तलाशी जाएँ, चट्टानों में मूर्तियाँ और मन्दिर तराशे जाएँ । आखिर किस बात ने उन्हें इसके लिए प्रेरित किया होगा । 

मैंने महसूस किया कि सारे छात्र मस्ती में लगे हैं और इस बात से उन्हें  कोई सरोकार नहीं है कि मैं क्या सोच रहा हूँ । अचानक रवीन्द्र की आवाज़ आई “ अरे शरद तुम यहीं हो हमें लगा तुम उस बस में एलोरा निकल गए । “मैं उसका आशय समझ गया था, मैंने कहा “ अरे भाई मुझसे कोई खतरा नहीं है, यह बात तुम महेश के बारे में कहते तो कुछ बात भी होती । “ उसने कहा “ क्या पता आखिर हो तो तुम महेश के दोस्त । चोर चोर ....।“ “ बस बस ..” मैंने कहा “ ..पुराना हो गया । 

“बेटा .. मुझे सब पता है ..।” रवींद्र ने डायरी पाठ के बीच व्यवधान उपस्थित करते हुए कहा । मैं समझ गया, एक ब्रेक का टाइम हो गया है । “ क्या पता है ? “ मैंने पूछा  । “मैनू पता है यार तू उस पुणे वाली भाभी में बड़ा इंटेरेस्ट ले रहा था, जाने क्या क्या  कह रहा था मराठी में .. अब हमें मराठी आती तो हम बताते ।“ रवींद्र ने कहा । 

“कुछ नहीं यार मैं उनसे देसी चने की मिसल बनाने की विधि पूछ रहा था ।“ मैंने रवीन्द्र की बात का जवाब दिया । रवीन्द्र हंसने लगा .... “ छोड़ यार, मैं तो मजाक कर रहा था , मुझे पता है, स्त्रियों का सम्मान करना तो पुरुषों को तुझसे सीखना चाहिए । तेरी कविताएँ पढ़कर कोई भी जान सकता है कि तू उनके दुःख - दर्द और सामाजिक स्थिति के बारे में कितनी गहराई से सोचता है । देखना तेरी कविता एक दिन इसी स्वर के लिए प्रसिद्ध होगी । “ 

“ठीक है ठीक है ...” मैंने कहा “मेरी कविताओं में नारीवादी स्वर पर चर्चा बाद में करेंगे ..आगे की डायरी सुनाऊं ?"  " रुक जा भाई थोड़ा हल्के -भारी हो लें । ब्लेडर फुल्ल हो गया है ।" अजय ने कहा । हम सब उठे और तम्बू के पीछे मैदान में जाकर वातावरण में थोड़ी नमी उत्पन्न करने के पश्चात पुनः अपनी रजाइयों में घुस गए ।

“चल भाई आगे सुना इंटरवल ख़तम ।“ अशोक ने सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए कहा ।  मैंने आगे पढ़ना शुरू किया ... "इतनी देर में हमारी बस एलोरा पहुँच गई । प्रवेश द्वार के बाहर ढेर सारी दुकानें थीं जहाँ किसिम किसिम की सामग्री बिक रही थी । हम लोगों ने एलोरा की जानकारी देने वाली चित्रमय पुस्तकें वहाँ से खरीदी । फिर हम लोगों ने एक ओर से गुफाएँ देखना प्रारम्भ किया । जैसे जैसे हम लोग यह गुफाएँ देखते गए इसकी भव्यता का अहसास हमें  होता गया । 

छत पर सिंह इस तस्वीर में भी हैं 

एलोरा का मूल नाम ‘वेरुल‘ है और मराठी में इसे ‘वेरुल च्या लेण्या‘ कहते हैं । यह बौद्ध, हिन्दू व जैन स्थापत्य का बेहतरीन नमूना है । यहाँ बारह बौद्ध गुफाएँ, सत्रह हिन्दू गुफाएँ और पाँच जैन गुफाएं हैं । इनमें से अधिकांश गुफाएँ राष्ट्रकूट वंश के शासकों द्वारा बनाई गईं है और इनका निर्माण काल छह सौ से एक हज़ार ईसवी माना जाता है । गुफा क्रमांक पंद्रह में राष्ट्रकूट दन्तिदुर्ग का एक अभिलेख भी मिला है जो 757 ईसवी का है । ब्राह्मण धर्म और बौद्ध धर्म की गुफाएँ राष्ट्रकूटों के समय ही बनीं लेकिन जैन गुफाओं का निर्माण काल राष्ट्रकूटों के बाद का है । 

1958 की इस तस्वीर में मेरे पिता जगमोहन कोकास 

एलोरा क्षेत्र प्रारंभ से ही व्यापारी मार्ग से जुड़ा था इसलिए यह गुफाएँ अजंता की गुफाओं की तरह लुप्त नहीं हुईं  । मुगलों के समय और अंग्रेज़ों के समय भी लोग इन्हें देखने आते रहे । उन्नीसवीं शताब्दी में ये होलकरों के नियंत्रण में थी, फिर हैदराबाद के निज़ाम के और स्वतंत्रता के पश्चात  भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अंडर में आ गईं । 

सह्याद्री पर्वतमाला

इनकी विशेषता यह है कि यह गुफाएँ बेसाल्ट की चट्टानों को काटकर बनाई गईं है जो कि सह्याद्री पर्वतमाला का एक हिस्सा है । यह चट्टानें करोड़ों साल पहले ज्वालामुखी का लावा बहने से बनी थीं । इन्हें डेक्कन ट्रैप भी कहा जाता है । ट्रैप शब्द स्केंडिनेविया से आया है जिसका सम्बन्ध ज्वालामुखीय निक्षेपों की सीढ़ीनुमा संरचना से है । अपक्षय होने पर चट्टानों के शिखर सपाट हो जाते हैं और सीढ़ीनुमा बन जाते हैं । 

डेक्कन ट्रैप 

“ ए भाई, यह सब कोर्स में हमने भी पढ़ा है कुछ नई बात हो तो बताओ “ अजय ने ऊब कर कहा । “वह टूरिस्ट बस वहाँ पहुँची या नहीं ?“  अजय की बात सुनकर मैंने एक ज़ोर का ठहाका लगाया …”अरे हाँ यह बताना तो मैं भूल ही गया । इस बीच वे लोग भी वहाँ पहुँच चुके थे और लगभग अलग अलग समूहों में हम लोगों के साथ ही एलोरा की गुफायें देख रहे थे । 

उनका गाइड उन्हें हम लोगों के भरोसे छोड़कर जाने कहाँ गायब हो जाता था और फिर कुछ देर बाद प्रकट हो जाता था । हम लोगों की उन लोगों से इस बीच अच्छी दोस्ती हो चुकी थी और हमारे आइक्नोग्राफ़ी के ज्ञान से वे लोग काफ़ी प्रभावित दिखाई दे रहे थे । जब हम लोग किसी मूर्ति के सामने खड़े होकर उसके लक्षणों पर बात करते वे लोग इसे बहुत ध्यान से सुनते । इतनी अच्छी और तकनीकी जानकारी तो कोई गाइड उन्हें नहीं दे सकता था ।

एक चट्टान से बना है कैलाश मंदिर 

 “और वो तेरा त्रिवेदी जी वाला किस्सा तो सुना ।“ रवीन्द्र ने कहा । “अरे हाँ, वह वाकया तो बहुत ही मज़ेदार था । हम लोग गुफा क्रमांक सोलह में कैलाश मंदिर के परिसर में थे । इस मंदिर के बारे में यह बात उल्लेखनीय है कि यह बेसाल्ट पत्थर की एक ही पहाड़ी को तराश कर बनाया गया है । “ 

“ अरे वाह, कितनी अद्भुत बात है ।“ अजय ने कहा “मतलब एक मज़दूर पहाड़ी की चोटी पर बैठा होगा, उसने वहाँ से चट्टान को काटना प्रारंभ किया होगा और काटते काटते उसे मंदिर की शक्ल दे डाली ।“ मैंने कहा “ सिर्फ़ इतना ही नहीं फिर उसके भीतर मूर्तियों को भी तराशा और गलियारे बनाए उसमें विभिन्न पैनल बनाए । 

यह कम मेहनत का काम नहीं है, हथौड़े की एक ग़लत चोट से सब कुछ बिगड़ सकता था और पूरी मेहनत पर पानी फिर सकता था । इसके निर्माता के रूप में नाम भले ही राष्ट्रकूट राजा कृष्ण प्रथम का हो  का हो लेकिन असली मेहनत तो उन शिल्पकारों की है जिन्होंने इसे बनाया ।" 

"लेकिन यार तुम कह रहे हो एक मजदूर चट्टान पर बैठा और उसे काटना शुरू किया ..आखिर एक मजदूर ने यह सब अकेले कैसे बनाया होगा? अजय ने बहुत गंभीरता से कहा । रवींद्र ने अपने माथे पर हाथ पटका और कहा " तू रहेगा भाभी का भैया ..अरे उसने लाक्षणिक अर्थ में ऐसा कहा इसका मतलब यह थोड़े ही है कि इतना बड़ा मंदिर एक मजदूर ने बनाया होगा इसमें तो सैकड़ों मजदूर लगे ओंगे जाने कितने बरसों तक यह काम चला होगा ता जाकर इतना सुन्दर मंदिर बन पाया है .. चल बाहर टहल कर आते हैं तेरा दिमाग़ काम नहीं कर रहा ।

हम लोग उठकर बाहर आ गए ।बाहर मौसम बहुत ही सुहावना था। अँधेरा काफी था लेकिन चाँद अभी निकला नही था या शायद डूब गया था ।बहुत दिनों से हम लोगों ने चाँद को ठीक से देखा नहीं था न ही चाँद के बहाने टीले पर गए थे ।दरअसल आज से शुक्ल पक्ष दोबारा शुरू हुआ था और यह चाँद प्रतिपदा या दूज का चाँद था जो न जाने कब आता है और कब जाता है पता ही नहीं चलता ।हम लोग चाँद को नदारद पाकर फिर वापस अपने तम्बू में लौट आये ।

*शरद कोकास*

कैलाश मंदिर, जो महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) के एलोरा में स्थित है, दुनिया की सबसे बड़ी अखंड (monolithic) चट्टान-कटाई वाली संरचना है। यह भगवान शिव को समर्पित एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है जो अपनी अद्वितीय वास्तुकला और ऐतिहासिक रहस्यों के लिए प्रसिद्ध है। [1, 2, 3, 4, 5]
यहाँ इस प्राचीन चमत्कार के बारे में कुछ मुख्य और दिलचस्प बातें दी गई हैं:
🌟 मुख्य विशेषताएँ
  • ऊपर से नीचे का निर्माण: अधिकांश मंदिर नीचे से ऊपर बनाए जाते हैं, लेकिन यह दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसे एक विशाल पहाड़ी को ऊपर से नीचे की ओर काटकर तराशा गया है। [1, 2]
  • एक ही चट्टान: इसे अलग-अलग पत्थरों को जोड़कर नहीं बनाया गया, बल्कि पूरी संरचना को एक ही कठोर बेसाल्ट चट्टान से तराश कर बाहर निकाला गया है। [1, 2]
  • इंजीनियरिंग का चमत्कार: इसे बनाने में बिना किसी आधुनिक मशीन के केवल छेनी और हथौड़े की मदद से लगभग \(400,000\) टन पत्थर बाहर निकाला गया था। [1, 2, 3, 4]
  • निर्माण का समय: इस भव्य मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी में राष्ट्रकूट वंश के राजा कृष्ण प्रथम (757-783 ईस्वी) के शासनकाल में हुआ था। [1, 2]
  • आकार: यह मंदिर करीब \(100\) फीट ऊँचा, \(195\) फीट लंबा और \(145\) फीट चौड़ा है। [1]
🏛️ ऐतिहासिक महत्व और रहस्य
  • कलाकारी: इसके प्रांगण, मुख्य गर्भगृह और दीवारों पर रामायण, महाभारत और भगवान शिव के कई प्रसंगों को बेहद बारीकी से उकेरा गया है। [1, 2]
  • मलबा कहाँ गया?: निर्माण के दौरान चट्टान काटकर निकाले गए लगभग \(4,000\) लाख किलो (4 लाख टन) पत्थर का कोई मलबा आज आस-पास मौजूद नहीं है, जो आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ा रहस्य है। [1, 2]
  • वास्तु संतुलन: इसे इतनी सटीक ज्यामितीय गणना (Geometric calculations) के साथ बनाया गया है कि यह 1200 से अधिक वर्षों से भूकंपों और प्राकृतिक आपदाओं को झेलते हुए सुरक्षित खड़ा है। [1]
अधिक जानकारी, चित्र और पर्यटन संबंधी गाइड के लिए आप विकिपीडिया कैलासा मंदिर पृष्ठ देख सकते हैं।
दक्कन ट्रैप (Deccan Traps) पश्चिम-मध्य भारत में फैला हुआ एक विशाल ज्वालामुखीय चट्टानी प्रदेश है。 इसका निर्माण लगभग 6.6 करोड़ वर्ष पहले अत्यधिक मात्रा में दरारी ज्वालामुखी विस्फोटों (Fissure Eruptions) से निकले बेसाल्टिक लावा के ठंडा होकर जमने से हुआ था。 [1, 2, 3, 4]
इसे "ट्रैप" इसलिए कहा जाता है क्योंकि लावा के क्रमिक प्रवाह से बनी चट्टानें सीढ़ीनुमा (सीढ़ी या 'Trappa') दिखाई देती हैं。 [1, 2, 3]

31-बताइए पागल राजा कौन था और उस की राजधानी कहाँ थी

अरे भूल गए विक्षिप्त मुहम्मद बिन तुगलक का नाम जो दिल्ली से दौलताबाद राजधानी लेकर गया था । 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा- किसी को पता ही नहीं चला और शरद और महेश दोनों दोस्त औरंगाबाद शहर की सैर कर वापस आकर धर्मशाला में सो गए । चोरी छुपे शहर की सैर करना उनके लिए एक अद्भुत अनुभव था । छात्र जीवन की भी कैसी विवशता होती है आसपास कितने विविध तरह का भोजन था लेकिन उनके जेब में पैसे नहीं थे ।  खैर अब आगे की कहानी पढ़िए ।  आज यह लोग जा रहे हैं मुहम्मद बिन तुगलक की राजधानी यानि दौलताबाद देखने वहाँ इन लोगों ने जो शरारतें की हैं उसे देखकर आप हँस हँस कर लोटपोट हो जाएंगे । *

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*भाग 31*

रात मे तंबू के भीतर का दृश्य देखिए 

" यार सोने की बात मत करो ,सोने की बात से ही मुझे नींद आने लगती है । " अशोक ने लम्बी सी उबासी ली और जेब में रखा अपना सिगरेट का पैकेट और माचिस निकाल ली । 

मैंने कहा " भाई मेरे, मैं तो औरंगाबाद की उस जीर्ण-शीर्ण धर्मशाला में सोने की बात कर रहा था यहाँ तो अपन अभी जागे हुए ही हैं । 

"लेकिन यार एक बात बता .." अशोक ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा " तू जब सो गया था तो तूने डायरी कब लिखी ? मतलब तू डायरी लिखने का समय कैसे निकालता था ?" अशोक का सवाल वाजिब था । 

मैंने उसे डायरी लिखने का रहस्य बताया । " भाई इतनी भागदौड़ के बीच डायरी लिखना तो वाकई कठिन था इसलिए मैं सोने से पूर्व या बस में बैठे बैठे एक कॉपी में जल्दी जल्दी नोट्स ले लेता था और फिर फुर्सत मिलते ही उन्हें व्यवस्थित रूप से डायरी में उतार लेता था । 

बहुत कुछ तो मैंने उज्जैन वापस आने के बाद लिखा है । यही मेरी डायरी लेखन की रचना प्रक्रिया है ।" " अच्छा इसलिए तेरी डायरी इतनी सुव्यवस्थित है भाषा और शिल्प के लिहाज़ से ।" अशोक की इस प्रशंसा पर मैंने उसे हाथ जोड़कर प्रणाम किया ।

अजंता एलोरा के उस टूर में अजय हम लोगों के साथ नहीं गया था इसलिए उसे यात्रा के बारे में जानने की उत्सुकता सबसे अधिक थी । आगे की डायरी वाचन के लिए मुझे उकसाते हुए उसने पूछा । “औरंगाबाद के बाद अगला गन्तव्य तुम लोगों का एलोरा था ना ? 

“हाँ“ रवीन्द्र ने कहा … एलोरा की यात्रा के बीच मुहम्मद बिन तुगलक की राजधानी भी पड़ी थी और वहाँ हमारे राममिलन भैया और महेश ने मिल कर ऐसा उधम मचाया कि पूछो मत । “  

“अरे वा ! बताओ ना यार फिर क्या हुआ ।" अजय की उत्सुकता इतनी बढ़ गई कि उसने ऊँट की तरह अपनी गर्दन आगे बढ़ा ली । रवीन्द्र ने उसकी गर्दन पकड़ी, उसे पीछे की ओर खींचा और ठीक से बैठा दिया ।

रवीन्द्र और अजय के बीच घटित यह दृश्य इतना नाटकीय था कि मुझे हँसी आ गई । मैंने कहा “बताता हूँ यार । औरंगाबाद की इस धर्मशाला में सोने की सुविधाजनक स्थितियाँ तो नहीं थीं किन्तु थकान नींद का साथ दे रही थी अतः सुविधाजीविता को उसके आगे परास्त होना ही था । 

रात देर से सोने के बावजूद सुबह हम लोग जल्दी ही जाग गए और नहा धोकर तैयार हो गए । अक्सर जब सुबह सुबह कहीं निकलना होता है तो हम अपने आलस्य को अपने उत्साह के साथ समायोजित कर लेते हैं । धर्मशाला के सामने ही एक दुकान पर गर्मागर्म चने की मिसल वाला पोहा उपलब्ध था । एक कढ़ाई में तैयार पोहे का ढेर उस पर हरी मिर्ची,कटे हुए नीबू और लाल टमाटरों की सजावट हमें आकर्षित कर रही थी । वहीं एल्युमिनियम के एक गंज में देसी चने की रसेदार सब्ज़ी जिसे महाराष्ट्र में मिसल कहते हैं खदबदा रही थी । दोसे की तरह पोहा भी एक राष्ट्रीय नाश्ता है और काफी गरिष्ठ भोजन है फिर हम जैसे मुफलिसों के लिए तो यह नियामत है ।"

देसी चने  की मिसल 

 "यह मिसल और पोहे का क्या सम्बन्ध है ?" अजय ने मुझे बीच में ही रोककर पूछा ।अजय की यह अच्छी आदत है कि वह किसी भी जिज्ञासा को पेंडिंग नहीं छोड़ता और तुरंत पूछ लेता है । मैंने उसकी जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहा  "अपने मालवा में जैसे पोहे पर सेव डालकर देते हैं

वैसे ही महाराष्ट्र में पोहे पर उबले चने या मटर की गर्मागर्म सब्ज़ी यानि मिसल डालकर देते हैं ,इस तरह ठण्डा पोहा भी गर्म हो जाता है साथ ही तीखा खाने वालों की जिव्हा को उसका मनवांछित स्वाद भी मिल जाता है ।" अजय को जैसे नए ज्ञान की प्राप्ति हो गई थी .. " अच्छा समझ गया, अपने यहाँ जैसे गर्म पानी की गंजी पर पोहे की कढ़ाई रखकर उसे चोवीस घंटे गर्म रखते हैं वैसे ही वहाँ मिसल को गर्म रखने का चलन होगा ।" 
वड़ा पाव 

"हाँ, ऐसा ही कुछ है ।" मैंने कहा " मिसल के साथ यदि पाव यानि डबलरोटी लो तो उसे मिसल पाव कहते हैं और यदि उसी पाव को गर्मागर्म सब्जी यानि भाजी के साथ खाओ तो उसे भाजी पाव कहते हैं और वड़ा अर्थात आलूबोंड़े के साथ खाओ तो वह वड़ा पाव हो जाता है ।

पाव भाजी 
महाराष्ट्र में खासकर मुंबई में यह गरीबों और मिल मजदूरों का खाना रहा है जो किसी ज़माने में बहुत सस्ता मिलता था । अंग्रेज़ों के ज़माने में जो मज़दूर कपड़ा मिलों में काम करते थे उनसे इतना काम लिया जाता था कि खाना पकाने का उनके पास समय नहीं रहता था सो इसी  भोजन से वे अपनी भूख मिटाया करते थे । इनमे से पाव भाजी यह भोजन भी अब इडली-दोसे की तरह राष्ट्रीय भोजन हो चला है जिसे अब मक्खन - वक्खन के आडम्बर के साथ अभिजात्य वर्गीयों ने अपना लिया है । "

"खैर आगे सुनो ।" भोजन पर अपना वक्तव्य समाप्त करते हुए मैंने कहा " मिसल पोहे का नाश्ता करने के बाद हम लोग बस में आकर बैठ गए । हमें लौटकर औरंगाबाद नहीं आना था इसलिए हम लोगों ने अपना सामान भी बस में रख लिया था । बसंत का यह मौसम  बहुत ही सुहावना था और हवा भी मंद मंद बह रही थी । 

बस की खिड़की से मैंने एक बार धर्मशाला की उस इमारत की और देखा सुबह के उजाले में वह कल की अपेक्षा ज़्यादा स्वस्थ्य लग रही थी । सब लोग जब बस के भीतर आकर बैठ गए तो जैन साहब ने एक बार पीछे मुड़कर देखा और पूछा " सब लोग आ गए ना ? " "यस सर " हम लोगों ने समवेत स्वरों में जवाब दिया । 

जैन साहब ने जमनालाल जी से कहा " चलो भाई । " ड्राइवर साहब ने जी साहब कहते हुए बस के सेल्फ में चाबी घुमा दी । हमारी बस अब  एलोरा की ओर निकल चुकी थी । हम लोगों के पेट भरे हुए थे , नींद भी पूरी हो चुकी थी सो कुछ कुछ गाने का मन कर रहा था .. 

" सुहाना सफ़र और ये मौसम हँसी .. हमें डर है हम खो न जाएँ कहीं .." 

मैंने तान छेड़ी ही थी कि देखा एक चमचमाती हुई टूरिस्ट बस हमारी मिनी बस की बगल से उसे ओवरटेक करते हुए आगे निकल गई  । हमने देखा कि उसमें बैठे यात्री अपनी खिडकियों से झांकते हुए बहुत कुतुहूल से हमारी पुराने ज़माने की डॉज़ को देख रहे हैं ।

हमारे एक तेलगू भाषी सहपाठी केम्पुला लक्ष्मी नारायण ने कहा  “ ये लोगां सोच रहे होयेंगे कि यह बस मोहन्जोदड़ो की खुदाई से निकली है ।“  उसकी बात पर हम सब लोगों ने ठहाका लगाया । 

केम्पुला की बात हमारी खटारा बस के ड्राइवर जमनालालजी के कानों तक भी पहुँच गई । उनके भीतर का अनुभवी कुशल चालक जाग गया और उन्होंने इस बात को ज़रा गम्भीरता से ले लिया । उन्होंने बस की स्पीड बढ़ाई और कुछ ही मिनटों में उस चमचमाती हुई टूरिस्ट बस से आगे निकल गए । 

जैसे ही हमारी डॉज़ उस बस से आगे निकली हम लोगों ने खुशी से 'हुर्रे…'  कहा । लेकिन कुछ मिनटों बाद टूरिस्ट बस के ड्राइवर ने मौका देखा और ओवरटेक कर अपनी बस को हमारी बस से आगे ले गया । अबकी बार 'हुर्रे' की आवाज़ उस बस से आई । 

लेकिन जमनालाल जी भी कहाँ मानने वाले थे, एक जगह मौका देखकर वे फिर अपनी डॉज उस बस से आगे ले गए ।फिर तो दौलताबाद तक यह चूहे बिल्ली का खेल चलता रहा । हम लोग मस्ती के मूड में थे, गाने गा रहे थे और शोर मचा रहे थे । ऐसा लग रहा था जैसे हम लोग सचमुच पिकनिक के मूड में हों । जैन साहब और त्रिवेदी सर हम छात्रों की उधमबाज़ी देखकर भी अनदेखा कर रहे थे और आँखें बन्द किए मन्द मन्द मुस्कुरा रहे थे ।

हमारा अगला पड़ाव था दौलताबाद, अर्थात देवगिरी, 

वह जगह जो मुहम्मद बिन तुगलक के तुगलकी फ़रमान की वज़ह से प्रसिद्ध है । हमने इतिहास की पुस्तकों में यह पढ़ रखा था कि सन 1325  ईसवी में तुगलक़ वंश के बादशाह गयासुद्दीन तुगलक़ की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र जौना खां  'मुहम्मद बिन तुगलक़'  की उपाधि धारण कर दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठा । 

वह अत्यंत बुद्धिमान,धर्मनिरपेक्ष, कलाप्रेमी और कुशल योद्धा था लेकिन उसके नाम के साथ अनेक विशेषण भी जुड़े हैं जैसे ‘ 

अंतर्विरोधों का विस्मयकारी मिश्रण ‘

, रक्त का प्यासा ‘ इत्यादि । वहीं उसे परोपकारी की उपाधि भी दी गई है ।  उसने धर्म,जाति ,नस्ल आदि के आधार पर पद आवंटित न कर योग्यता के आधार पर लोगों को पद प्रदान किये  थे ।

"मतलब मुहम्मद बिन तुगलक के समय आरक्षण जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी ?" अजय ने सवाल किया । 

"भाई उस समय आरक्षण जैसा कोई शब्द नहीं था यह तो हमारे देश की स्वतंत्रता के पश्चात देश के दलितों,पीड़ितों और शोषितों के उत्थान के लिए बाबासाहब आंबेडकर के प्रयासों से ही संभव हुआ । और यह ज़रूरी भी था । खैर ..." 

मैंने कहा "हम मुहम्मद बिन तुगलक की बात कर रहे थे । उस समय दिल्ली सल्तनत तेईस प्रान्तों में विभाजित थी । दक्षिण के वैभव और सम्पन्नता से आकर्षित होकर उसने एक फ़रमान जारी किया कि अबसे राजधानी दिल्ली नही बल्कि देवगिरी या दौलताबाद होगी । 

राजधानी परिवर्तन के कारणों पर इतिहासकारों में काफी विवाद है । कुछ लोगों का कहना है कि मंगोल आक्रमणकारियों से सुरक्षा हेतु उसने दक्षिण के इस स्थान का चयन किया ।जो भी हो  फ़रमान जारी करने के बाद मुहम्मद बिन तुगलक़ स्वयं अपना राजकाज यहाँ ले आया और जनता के लिए हुक्म जारी किया कि सब लोग दिल्ली खाली कर दें और दौलताबाद चले जाएँ । 

"यह बात तो इतिहास में बहुत चर्चा में रही है इसी कारण तो उसे पागल कहा गया" अजय ने कहा । 

"हाँ भाई ऐसा ही है लेकिन सुन लो फिर से रिविज़न हो जायेगा " मैंने कहा .." बस फिर क्या था, सारे बूढ़े - बच्चे, औरतें पैदल पैदल दौलताबाद के लिए रवाना हो गए । अब दिल्ली से दौलताबाद इतना करीब तो था नहीं कि एक दिन में पहुँच जाएँ । रास्ते में न जाने कितने लोग मर गए । लेकिन कुछ दिनों बाद उसका मूड बदल गया और उसने तेरह सौ पैंतीस में फिर फ़रमान जारी कर दिया कि सब लोग वापस दिल्ली आ जाएँ । 

थके-मांदे बीमार लोग पुन: दिल्ली के लिए  निकल पड़े, कुछ लोगों ने जाने से इंकार कर दिया और वे लोग यहीं या रास्ते में ही बस गए । यह अजीब तरह की पागलपन की हरकत थी इसीलिए  इतिहास मे उसका नाम विक्षिप्त के रूप में दर्ज है । हालाँकि दक्षिण में इस्लामिक संस्कृति के विकास में इस घटना का बहुत योगदान रहा । आगे चलकर बहमनी साम्राज्य की स्थापना में भी इसकी भूमिका रही ।

"मतलब अभी जो दौलताबाद के आसपास मुस्लिम आबादी है वह उन्हीं लोगों की वंशज है ?" अजय ने पूछा । 

"हाँ ऐसा हो सकता है ।" मैंने कहा .."खैर आगे सुनो.. दौलताबाद के इस चर्चित किले को  देखने के लिए हम लोग बस से उतरे । जैन साहब और डॉ एच. वी. त्रिवेदी बस में ही बैठे रहे । 

जैन सर ने कहा “ हम लोग इतनी बार यह किला देख चुके हैं कि अब हमें इसमें कोई रुचि नहीं है, जाओ तुम लोग देख आओ, इसका इतिहास तो तुम लोग जानते ही हो । “दोनों की बात सुनकर हम लोगों ने राहत की साँस ली, दरअसल हम लोग चाहते भी यही थे । लेकिन जाने से पहले उन लोगों ने हमारे लिए एक शर्त रख दी “देखें कौन जल्दी किला देखकर आता है ।“ 

मैंने महेश से कहा “भाई अपन तो नहीं जीतने वाले, वैसे भी यह शर्त इसलिए है कि हम लोग फालतू समय न बर्बाद करें ।“ हमारी बस के साथ भागमभाग का खेल खेलने वाली वह टूरिस्ट बस भी वहीं ठहर गई थी और सैलानी उतर कर प्रवेश द्वार की ओर आ रहे थे । यह पुणे या मुम्बई का कोई ग्रूप था जिसमें कई परिवार शामिल थे । रंगबिरंगे परिधानों में बस से उतरती लड़कियों को देखकर महेश बहुत अर्थपूर्ण ढंग से मेरी ओर देखकर मुस्कराया । 

संकेतात्मक चित्र 

“ हा हा हा  “ अचानक अजय जोर से हंसने लगा । “अरे क्या हुआ ?“ मैंने पूछा । “कुछ नहीं ।“ अजय ने कहा ..” मुझे महेश ने यह किस्सा सुनाया था कि उसने वहाँ कितनी बदमाशियाँ  की थीं  ।“ 

रवीन्द्र ने ऑब्जेक्शन लिया “लेकिन महेश ने कहाँ कोई बदमाशी की थी, ना किसी लड़की को छेड़ा, ना  किसीसे अभद्र व्यवहार किया । महेश स्मार्ट ज़रूर है लेकिन बदमाश नहीं है ..और हमारा यह मुन्ना भी बिलकुल बदमाश नहीं है, हाँ लड़कियों को देखकर इसकी आँखों में चमक ज़रुर आ जाती है और आवाज़ भी थोड़ी बदल जाती है  ।“ रवींद्र ने शरारत भरी नज़रों से मेरी ओर  देखते हुए कहा । 


“नहीं यार, बदमाशियों से मेरा मतलब उस टूरिस्ट गाइड को परेशान करने के लिए तुम लोगों ने जो हरकतें की थी उससे था । “ अजय ने कहा ।

“हाँ हाँ, वही किस्सा तो सुना रहा हूँ .. आगे सुनो ।“ मैंने कहा .. “उस किले को नीचे से देखने पर यह प्रतीत ही नहीं होता था कि वह किला इतनी ऊँचाई पर बना होगा । कुछ देर तक तो हम किले के भीतर समतल मार्ग पर चलते रहे तत्पश्चात सीढ़ियाँ प्रारंभ हो गईं । मुम्बई का वह पर्यटक दल भी हमारे साथ साथ चल रहा था या ऐसा कह लें कि हम उनके साथ साथ चल रहे थे । उनका गाइड उन्हें किले के बारे में विभिन्न जानकारियों से अवगत करा रहा था । 

अचानक राममिलन भैया ने सवाल किया “का हो ..यह नीचे की ओर जौन  बैरक जैसी बनी हैं यह किसलिए हैं ?“ 

महेश ज़ोर से हँसा और उसने तेज़ आवाज़ में कहा “ अरे का राममिलन भैया, इत्ती सी बात नहीं ना मालूम ? युद्ध के दौरान अगर किसी सिपाही को बीड़ी सिगरेट की तलब लगती तो वह कहाँ जा सकता था ? बस, यह बैरकें उसी काम में आती थीं .. दो सुट्टे मारो और फिर लड़ने लग जाओ ।“ 

हमने देखा कि ऐसा कहकर पर्यटक दल के बहुत सारे लोगों का ध्यान उसने अपनी ओर आकर्षित कर लिया था  । भीतर पहुँचते पहुँचते तक तो उसने कुछ लोगों से अच्छी - ख़ासी दोस्ती भी कर ली थी  । 

"ई महेसवा तो ई काम में बहुत माहिर है ,हमरा बहुतै मनोरंजन किया था उसने " राममिलन भैया की आँखों में दौलताबाद टूर का वह दृश्य कौंध रहा था । 

"आगे बताओ भाई सरद " उन्होंने उत्सुकता ज़ाहिर करते हुए कहा । " बिलकुल" मैंने आगे का वर्णन पढ़ना शुरू किया " किले के बेस से कुछ ऊपर की ओर जाने के पश्चात कुछ दूर चलकर एक गलियारा था जिसमें से कुछ चक्करदार सीढीयाँ किले के ऊपरी हिस्से की ओर जाती थीं । इन सीढ़ियों पर बिजली की व्यवस्था नहीं थी । गहन अन्धकार में उन सीढ़ियों से ऊपर की ओर जाना असंभव था इसलिए वहाँ एक मशालची की व्यवस्था की गई थी  जो थोडा बहुत मेहनताना लेकर मशाल की रौशनी में छोटे छोटे समूहों में पर्यटकों को ऊपर की ओर ले जाता था । 

हम लोगों ने जैसे ही ऊपर जाने के लिए मशालची से बात की उस लक्ज़री बस वाले पर्यटक दल का गाइड वहाँ आ गया और उसने कहा "आप लोग बाद में आये हैं पहले हमारे ग्रूप के लोग ऊपर जायेंगे ।" 

हम समझ गए, वह गाइड  बार बार उसकी बस से अपनी मिनी बस को आगे ले जाने वाली हमारी हरकतों की वज़ह से पहले से ही हमसे खफ़ा था और इसीलिए वह इस बात के लिए  अड़ गया कि पहले उसके दल के लोग ऊपर जाएँगे । 

हालाँकि हम लोग साथ साथ ही वहाँ पहुँचे थे और यह आवश्यक नहीं था कि हम लोग ही पहले ऊपर जाएँ लेकिन उसका कहने का अंदाज़ कुछ ऐसा था कि हम लोगों को वह अपमानजनक लगा । 

अब तो हम लोगों के लिए यह प्रेस्टिज का सवाल हो गया था । वैसे भी हम लोग कुछ  शरारत के मूड में थे सो हम भी अड़ गए कि यहाँ पहले हम आए थे इसलिए हम ही पहले ऊपर जाएँगे । 


हमने उसकी बात के विपरीत बहुत शालीनता के साथ अपना दावा प्रस्तुत किया और उसके दल के अन्य सदस्यों को भी कन्विंस करने की कोशिश की ।  उसके समूह के लोगों को भी हमारी बात उचित लगी । 

लेकिन उनके समूह में पर्यटकों की संख्या अधिक थी और एक बार में मशालची उन्हें ले भी नहीं जा सकता था इसलिए यह तय किया गया कि उनका आधा समूह पहले ऊपर जाएगा फिर हम लोग ऊपर जाएँगे और अन्त में उसके समूह के शेष लोग । सो सबसे पहले महिलाएँ व बच्चे ऊपर गए और उसके बाद हम लोग । 

ऊपर पहुँचते हुए महेश ने उस मशालची को अपनी बातों में उलझा लिया और थोड़ा रौब झाड़कर व आवश्यकता से अधिक मेहनताना देकर इस बात के लिए राजी कर लिया कि वह कुछ ठहरकर ही पुरुषों के ग्रूप को लेने नीचे जाएगा । दरअसल उसे उस गाइड को मज़ा चखाना था ।"

"हा हा हा " अशोक ने ठहाका लगाते हुए कहा " मैं ऐसे ही नहीं कहता हूँ कि यह महेश बहुत बदमाश है उसके दिमाग़ में जाने क्या क्या योजनायें चलती रहती हैं । वह उज्जैन में सिटी बस में भी बिना टिकट घूमता है , कंडक्टर को ऐसा राग देता है कि बिलकुल पैसे नहीं हैं उसकी जेब में । वह अपनी खटपटिया साइकिल से फ्रीगंज तक जाता है फिर उसे कंठाल जाना होता है तो कंडक्टर को पटा कर बस में ही अपनी साइकिल रख लेता है और वहाँ तक चला जाता है ।" हमारी बातचीत अब महेश पर केन्द्रित हो गई थी । मैंने भी अपनी डायरी बंद कर दी और गपशप में शामिल हो गया ।   

*शरद कोकास*

कुछ इतिहास से 

सन 1327 में दिल्ली सल्तनत के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से लगभग 1,100 किमी दूर दौलताबाद (तत्कालीन देवगिरी, महाराष्ट्र) स्थानांतरित की थी। सुल्तान के आदेश पर दिल्ली की पूरी आबादी को जबरन दौलताबाद भेजा गया था। [1, 2, 3]
जनता की स्थिति और पलायन का दर्द:
  • व्यापक विस्थापन: सुल्तान ने केवल दरबारियों को ही नहीं, बल्कि दिल्ली के आम नागरिकों, विद्वानों, संतों और व्यापारियों तक को शहर खाली करने का आदेश दिया। [1, 2]
  • कठिन यात्रा: लगभग 1,100 किलोमीटर की यह लंबी यात्रा पैदल तय करनी पड़ी। संसाधनों की कमी, भयंकर गर्मी और थकान के कारण रास्ते में ही बड़ी संख्या में लोग भूख, बीमारी और हादसों के कारण काल के गाल में समा गए। [1]
  • अमानवीयता: इतिहासकारों के अनुसार, आदेश इतना सख्त था कि जो लोग दिल्ली छोड़ने में आनाकानी करते थे, उन्हें सजा दी जाती थी। वृद्धों और बीमारों को घसीट कर ले जाया जाता था, जिससे कई लोग रास्ते में ही दम तोड़ देते थे।
  • दिल्ली की बर्बादी: कभी गुलज़ार रहने वाली दिल्ली वीरान हो गई। समकालीन इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी लिखते हैं कि दिल्ली के घरों में एक भी चिराग या धुआं तक दिखाई नहीं देता था। [1]
  • असफलता का दंश: जब जनता जैसे-तैसे दौलताबाद पहुँची, तो वहाँ पानी की कमी और नई परिस्थितियों के कारण भारी असंतोष फैला। अंततः, कुछ वर्षों बाद सुल्तान को अपनी गलती का एहसास हुआ और जनता को वापस दिल्ली लौटने की अनुमति दे दी गई, लेकिन तब तक दिल्ली की मूल रौनक और बहुत से लोगों की जान जा चुकी थी। [1, 2, 3]