सोमवार, 1 जून 2026

44-पूछ मेरा क्या नाव रे नदी किनारे गाँव रे


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼


*पिछले भाग में आपने मनुष्य की पशुपालन अवस्था के बारे में किस तरह वह जंगलों से जीवित जानवर पकड़ लाता था और उन्हें पालता था उन्हें मारकर खा जाने की अपेक्षा उन्हें पालने में उसे क्या लाभ था।  इस भाग में पढ़िए कि झीलों के किनारे बस्ती कैसे बसी , वहाँ क्या क्या कठिनाइयाँ थीं , इस तरह से आग लग जाने पर सब कुछ नष्ट हो जाता था यह रोचक वर्णन आपको पसंद आएगा*

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*भाग 44*

*पूछ मेरा क्या नाव रे नदी किनारे गाँव रे* 

आज सुबह हम लोग और दिनों की अपेक्षा जल्दी जाग गए थे । इतनी सुबह, सुबह और अधिक सुहावनी लग रही थी । मैं और रवींद्र काफी देर तक फुर्सत में पत्थरों पर बैठकर चम्बल की बहती धारा को देखते रहे । लहरों को देखते हुए हम अक्सर एक खेल खेलते हैं ..किसी एक लहर पर नज़र जमा लेते हैं और उसे तब तक देखते रहते हैं जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो जाती । बहते हुए पानी को देखने का यह सुख व्यतीत होते हुए जीवन को देखने की तरह होता है । हम समय  के किसी टुकड़े को तब तक ही देख पाते हैं जब तक वह हमारे सामने रहता है, कुछ देर बाद जब समय का एक नया खण्ड हमारे सामने उपस्थित हो जाता है और हम पिछले समय को भूल जाते हैं । 


चम्बल के जल के साथ यह खेल खेलते हुए हम उसकी आवाज़ सुनने की कोशिश कर रहे थे  । लेकिन आज उसका बहाव इतना शांत था कि कोई आवाज़ हमें सुनाई नहीं दे रही थी । वैसे भी जाने कितने हादसों का दुःख अपने भीतर समेटे चम्बल अन्य दिनों की अपेक्षा बसंत के इस मौसम में बहुत शांत बहा करती है । हम लोग उसकी लहरों की ओर देखते हुए उसके जल में उस इन्सान का अक्स ढूँढने की कोशिश करते रहे जो सदियों पहले यहाँ रहता था जिसके लिए यह नदी ही सब कुछ थी हालाँकि हमें पता था कि उनके सुख-दुःख का गवाह वह जल तो जाने कबका बह चुका होगा । 


आज घाट पर रवींद्र ने कहा "तुझे पता है शरद, चम्बल के बारे में एक किंवदंती है कि अपने अपमान से क्रुद्ध होकर द्रौपदी ने इसे शाप दिया था कि जो भी इस नदी का पानी उपयोग में लायेगा उसका अनिष्ट होगा ।" हम पुरातत्ववेत्ताओं का ऐसी किंवदंतियों और पुराणकथाओं से अक्सर सामना होता है । मैंने रवींद्र की बात को यथार्थ की कसौटी पर कसते हुए कहा " यह तो नदी किनारे बसने वाली बस्तियों के लोगों की नियति है, वे जल का उपयोग करें न करें बाढ़ आयेगी तो उन्हें डूबना ही होगा । हाँ पानी पीने मात्र से किसी का अनिष्ट हो ऐसा नहीं होता जब तक वह दूषित जल न हो ।" 


"किंवदंतियों का क्या है वे तो बनती बिगड़ती रहती हैं ।" रवींद्र ने कहा ” हाँ,मनुष्य के भोजन की आवश्यकता ने उसे नदियों के किनारे बस्ती बसाने को विवश किया । भले ही कुछ समय के लिए वह यह जगह छोड़ कर चला गया हो लेकिन कुछ समय बाद फिर आकर बस गया । इसीलिए प्राकृतिक विपदाओं में बस्तियाँ नष्ट हो जाने के बावज़ूद भी हम देखते ही हैं कि अधिकांश बस्तियाँ तो नदियों के किनारे ही बसीं, और फलती फूलती रहीं । वैसे मुझे लगता है नदियों के किनारे आवास बनाने के बारे में प्रागैतिहासिक मनुष्य का भोजन के बारे में ही मुख्य कॉन्सेप्ट रहा होगा ? “ 


“हाँ यह तो था ।” मैंने कहा ” गुफाओं से बाहर की दुनिया में जब वह आहार के लिए शिकार की तलाश कर रहा था तो उसने अनुभव किया कि मछलियाँ और जल में रहने वाले अन्य जीव उसके लिए बहुत बढिया आहार साबित हो सकते हैं, इसी आकर्षण में उसने नदियों के किनारे रहना प्रारंभ किया । यद्यपि यहाँ परेशानियाँ अधिक थीं । प्रतिवर्ष आनेवाली बाढ़ उसका सब कुछ बहा ले जाती थी और उसे किनारे के पेड़ों पर चढ़कर अपनी जान बचानी पड़ती थी । लेकिन कालांतर में उसने इस विपदा पर भी विजय प्राप्त कर ली । सबसे पहले उसने नदी के पास किसी ऊँचे टीले पर अपना मकान बनाया लेकिन जब वहाँ तक भी बाढ़ का पानी आने लगा तो उसे एक उपाय सूझा ।" "वह ज़रूर नदी से काफी दूर किसी टीले पर रहने चला गया होगा ।" रवींद्र ने अनुमान लगाया । 


"नहीं " मैंने रवींद्र की बात में आंशिक परिवर्तन किया " वह नदी से दूर कहाँ जा सकता था ,उस समय परिवहन के साधन तो नहीं थे और फिर बाढ़ का भी कोई भरोसा नहीं था वह निचले स्थानों पर दूर तक भी पहुँच सकती थी जबकि ऊँचे स्थान पर अधिक सुरक्षा थी ।  इसलिए उसने अपने आवास इन्ही टीलों पर बनाये लेकिन उसे सतह से काफी ऊँचा कर लिया । इस तरह के आवास के निर्माण के लिए उसने सर्वप्रथम  पेड़ काटे ,उन्हें  आड़ा और खड़ा एक दूसरे पर रखा और लताओं से बांधकर एक ऊँचा मचान जैसा बना लिया और इस तरह बाढ़ से अपनी रक्षा की । हालाँकि कालान्तर में नदियों के रास्ता बदलने से और बाढ़ के आधिक्य से यह बस्तियाँ भी नष्ट हो गईं ।


"इसका मतलब यदि नदियों का उत्खनन किया जाए तो उनके नीचे भी कई बस्तियाँ मिलेंगी ?" रवीन्द्र ने एक पुरातत्ववेत्ता की तरह सवाल किया । " हाँ, ऐसा हो तो सकता है ।" मैंने कहा "लेकिन सामान्यतः तेज़  बहाव के कारण एक ओर की ज़मीन को काटते हुए नदियाँ अपनी राह बदलती हैं और कुछ वर्षों पश्चात् अपना पूर्व निर्धारित मार्ग बदलकर फिर नए मार्ग से बहने लगती हैं । उनके किनारे पूर्व में जो बस्तियाँ बसी होती हैं वे तो गाद और मिटटी से बने टीलों के नीचे दबी मिल जाती हैं । लेकिन अभी वर्तमान में जिस मार्ग पर नदियाँ बह रही हैं उनके नीचे इसलिए बस्ती होना ज़रा मुश्किल है क्योंकि एक तरह से यह उनके लिए नया मार्ग है । लेकिन पुरातत्ववेत्ताओं को ऐसी झीलें और तालाब अवश्य मिले हैं जिनके नीचे गाँव बसे थे । " 



" गज़ब यार, ऐसा भी कहीं मिला है क्या ?" रवीन्द्र को मेरी बात पर सहसा विश्वास नहीं हुआ । "हाँ । " मैंने कहा । "मैंने कहीं पढ़ा था कि सन अठारह सौ त्रेपन में जब स्विट्ज़रलैंड में सूखा पड़ा था तो अनेक झील और तालाब सूख  गए थे । उनके नीचे बस्तियाँ मिली थीं । चलो तुम्हे पूरा किस्सा सुनाता हूँ ...ज्यूरिख झील के निकट आबेरमाइलेन  नाम का एक नगर था । सूखे की वज़ह से जब वहाँ की झील सूख गई तो वहाँ के लोगों ने सोचा कि झील की जगह तो अब ज़मीन हो गई  है सो क्यों ना उसका एक हिस्सा हथिया लिया जाए ।" 



"अरे ! ऐसा है क्या, हम सोचते थे कि हमारे देश में ही अनाधिकृत कब्ज़ा करने वाले लोग हैं ।" अजय जाने कब अपनी सुबह की आतिशबाज़ी निपटाकर हम लोगों के क़रीब आकर बैठ गया था । मैंने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा " भाई मैं सवा सौ साल से भी पहले की कहानी सुना रहा हूँ । उस समय हमारे देश में अंग्रेजों का शासन था अनाधिकृत कब्ज़ा तो वे लोग किये हुए थे । " रवीन्द्र ने अजय को चुप कराते हुए कहा " तू चुप रह यार, बात को कहाँ से कहाँ जोड़ देता है ,यह शरद कितनी महत्वपूर्ण बात बता रहा है ,ध्यान से सुन एग्जाम में काम आयेगी .. हाँ शरद ..तू बता फिर क्या हुआ ?" मैंने देख लिया था कि दोनों आगे की बात जानने को उत्सुक थे । "लेकिन इस तरह कब्ज़ा करने के लिए ज़रूरी था कि  शेष झील को ज़मीन से अलग कर दिया जाये क्योंकि झील के एक बड़े हिस्से में पानी तो था ही । सो इसके लिए झील और ज़मीन के बीच एक स्टॉप डैम बनाना ज़रूरी था वर्ना बारिश में झील भर जाती और उनकी बस्तियाँ डूब जातीं ।" 


"बस लोगों ने इस काम के लिए झील की सतह से ही मिटटी खोदनी शुरू कर दी । जाने कितनी ठेला गाड़ियाँ इस काम के लिए लगाई  गईं । फिर अचानक एक दिन ऐसा हुआ कि मिटटी  खोदते हुए एक व्यक्ति को सबसे पहले लकड़ी की एक बल्ली मिली, फिर उसने आगे खोदना शुरू किया तो और बल्लियाँ मिली और फिर जैसे जैसे वह खोदता गया मिटटी के साथ कई टूटे फूटे बर्तन , मछली पकड़ने के हड्डियों से बने कांटे, चकमक पत्थर के बने औज़ार, पत्थर के कुल्हाड़े, बर्छियां इत्यादि मिलने लगे ।" दोनों बहुत ध्यान से मेरी बात सुन रहे थे ।


"बस फिर क्या था, जैसे ही वहाँ के पुरातत्ववेत्ताओं को खबर मिली वे तत्काल वहाँ पहुँच गए और यह अवैध खुदाई रुकवाकर उस स्थान को अपने कब्ज़े में ले लिया ।" "मतलब लोगों का कब्ज़ा जमाने का प्लान फेल हो गया । हमारे यहाँ तो पुलिस भी यह काम नहीं रुकवा सकती बेचारे पुरातत्ववेत्ताओं की क्या औकात । " अजय ने कहा । "हाँ,बिलकुल ।" मैंने कहा । " राज्य ने फिर वह काम अपने हाथ में ले लिया और पुरातत्ववेत्ताओं को सौंप दिया ।आगे जब वहाँ विधिवत उत्खनन हुआ तो उन्हें उस बस्ती की संरचना मिली जो बरसों पहले झील में डूब गई थी । इसमें सबसे ऊपरी पहली परत तो रेत की थी फिर उसके नीचे गाद की एक परत थी जिसमें मनुष्यों के वहाँ रहने के ढेरों प्रमाण मौज़ूद थे,  जिनमें उनके औज़ार थे, घरेलू सामान थे । गाद की परत के नीचे फिर एक रेत की परत थी और उसे पार कर जैसे ही वे उसके नीचे पहुँचे फिर एक गाद की परत मिली जिसमे मनुष्यों के आवास के चिन्ह थे, इसके अलावा एक परत जले हुए कोयले की भी उन्हें मिली  ।"


"एक मिनट एक मिनट .." अजय ने मुझे रोकते हुए कहा .." इतना फास्ट नहीं भाई , पहले ज़रा हिसाब लगा लेने दो। अजय ने अपनी बाईं हथेली को इस तरह अपने सामने रखा कि चारों उँगलियाँ आँखों के सामने आ गईं फिर उसने पहली उंगली पर हाथ रखकर कहा "सबसे ऊपरी यानि पहली परत रेत की, फिर उसके नीचे दूसरी परत गाद मिटटी की ,फिर उसके नीचे तीसरी परत फिर रेत की ,फिर उसके नीचे चौथी परत फिर गाद की... मतलब वहाँ दो बार अलग अलग काल में बस्तियाँ बसी और दो बार डूब गई ।" रवींद्र ने ताली बजाते हुए कहा .."भाई, अब हमारा अजय पक्का पुरातत्ववेत्ता बन गया है । अजय अपनी जगह से उठा  और रवींद्र के सामने आकर उसे झुककर प्रणाम किया ।


"खुश रहो ।" रवीन्द्र ने उसके सर पर हाथ रखकर कहा .." पंडित भारद्वाज का आशीर्वाद तुम्हारे साथ है । चल भाई आगे सुना ।" मैंने नकार में हाथ हिलाते हुए कहा  .." नहीं.. अभी यह पक्का पुरातत्ववेत्ता नहीं हुआ है क्योंकि कोयले की परत के बारे में इसने कुछ नहीं कहा ।" अजय आँखें फाड़कर मेरी ओर देखने लगा । मैंने कहा "कोई बात नहीं , उन पुरातत्ववेत्ताओं  के सामने भी यही प्रश्न था कि उपरी परत पर रेत मिलना और गाद में मनुष्यों के आवास के अवशेष मिलना तो स्वाभाविक है अर्थात वहाँ बस्ती होने के लक्षण हैं लेकिन वह कोयले की परत कैसे आई ? पुरातत्ववेत्ताओं ने अध्ययन किया और पाया कि पहले लोग झील पर आये और ठीक किनारे पर बस्ती बसाई । फिर जब झील में पानी बढ़ा तो वह बस्ती डूब गई । यह गाद की परत उसी की थी । फिर लोग कुछ दिनों के लिए थोड़ा दूर सरक गए, फिर कुछ समय बाद सूखा पड़ा तो लोगों ने फिर किनारे पर बस्ती बसा ली मतलब दोबारा वहाँ बस गए ।


रवींद्र ने कहा "मतलब इस तरह झील और मनुष्य के बीच युद्ध चलता रहा ।" हाँ ।" मैंने कहा "इस युद्ध में  कभी  झील की जीत होती तो कभी मनुष्य की । अंत में हुआ यह कि लोग इस युद्ध से ऊब गए क्योंकि झील ने भी अपनी हार नहीं मानी थी और मनुष्य भी झील से हार नहीं मानना चाहता था सो उन्होंने झील के किनारे मकान न बनाकर ठीक झील के ऊपर पानी की सतह पर मकान बनाने शुरू कर दिए ।" " यह कैसे हुआ होगा ?"  अजय का सवाल स्वाभाविक था । रवीन्द्र ने कहा "सिंपल है यार, जब गर्मियों में झील सूख गई होगी तो उन्होंने झील की मिटटी में ही लम्बी लम्बी बल्लियाँ गाड़ी होंगी और उन पर मचान की तरह मकान बना लिए होंगे हम जिस तरह नदी का पानी कम होने पर उस पर पुल बनाते हैं उसी तरह ।" 


"अरे वाह, मतलब वेनिस शहर की तरह पानी के ऊपर बस्ती ।" अजय ने खुश होकर कहा । "वैरी गुड  ।" रवीन्द्र ने अजय की पीठ थपथपाते हुए कहा " तेरे वैश्विक ज्ञान की दाद देता हूँ कि तुझे वेनिस याद आया, वैसे हमारे यहाँ कश्मीर में भी इस तरह के मकान देखने को मिलते हैं ।" "लेकिन यार, वे तो पानी पर तैरते मकान हैं.."अजय ने कहा  "यानि शिकारे या हाउस बोट, यह मचान पर बने मकान तो स्थिर ही रहते होंगे ना ।" "हाँ ।" मैंने कहा । "यह मकान स्थिर ही थे यहाँ तक कि मनुष्य मचान पर बनी पटियों की झिर्रियों से नीचे पानी भी देख सकता था ।"  "वो तो सब ठीक है भैया ..." राममिलन भैया जो कुछ देर पहले ही हम लोगों की मजलिस में आकर बैठे थे और ध्यान से हमारी बातें सुन रहे थे कहने लगे .."वो अपने मकान का सेप्टिक टैंक कहाँ बनाता होगा ? " मैंने हँसते हुए कहा " टैंक बनाने की क्या ज़रूरत थी , पूरी झील ही उनका सेप्टिक टैंक थी ।" "हे प्रभु !" राममिलन भैया ने कहा । "मतलब उसी पानी को पीना उसी में नहाना और उसी में ....शिव शिव शिव शिव ...!" 


राममिलन भैया की बात पर जोर का ठहाका लगा । मैंने बात आगे बढ़ाई " भाई, वे भी तुम्हारी तरह मचान से उतारकर आसपास पिरामिड जैसी कोई चट्टान ढूँढते होंगे ..खैर जो भी हो, इस हिकमत से वे अपने घरों को पानी में डूबने से बचा सकते थे ..वर्षा के आधिक्य से पानी चाहे जितना ऊपर उठ जाए उनके मकान पानी से ऊपर ही रहते थे, वैसे यह इंजीनियरिंग भी कमाल की थी लेकिन इसमें भी एक मुश्किल थी, वे पानी से तो बच सकते थे लेकिन आग से नहीं बच सकते थे । अगर आग लग जाए तो बस्ती के जलकर ख़ाक हो जाने के अलावा कुछ नहीं हो सकता था । 


"अरे क्यों नहीं हो सकता था .." अजय मस्ती के मूड में था  "पम्प लगाते और नीचे का पानी ऊपर खींच लेते और फायर ब्रिग्रेड की तरह आग बुझा देते ।  "बहुत बढ़िया.." रवीन्द्र ने कहा " तू तो ऐसे कह रहा है जैसे उस ज़माने में तेरे बाप-दादों ने बिजली और पम्प का आविष्कार कर लिया था ।" "पता है भाई.." अजय ने कंधे उचकाते हुए कहा .."मी तो मजाक कर रिया था ।" मैंने कहा " हाँ, बस ऐसे ही एक बार आग ने भी उन लोगों के साथ भयानक मजाक कर डाला यानि मचान बना कर झील के ऊपर रहने वालों को और उनकी बस्ती को जलाकर राख कर दिया । वह जो कोयले की परत मिली थी वह उसी अग्निकांड की थी ।"


"मतलब इससे अच्छे तो उनके पूर्वज थे जो गुफाओं में रहते थे, गुफा की दीवारें तो पत्थर की थीं सो वहाँ आग लगाने का कोई चांस ही नहीं था ।" रवीन्द्र ने कहा । " हाँ ।" मैंने कहा "यह उनके लिए दुर्भाग्यपूर्ण तो था लेकिन इस आग से एक फ़ायदा हुआ कि वे वस्तुएँ जो लकड़ी आदि की बनी थीं इस आग में सुरक्षित रह गईं ।" "ज़रूर वे लोग पूजा पाठ करते होंगे इसलिए आग में भी लकड़ी नहीं जलीं जैसे कि हमारे भक्त प्रहलाद का आग ने कुछ नहीं बिगाड़ा था ।" राममिलन भैया ने तुरंत कहा । मैंने कहा "पंडित जी, पूरी बात तो सुन लो, यह वस्तुएँ आग में जली नहीं थीं बल्कि झुलस गईं थीं और उन की बाहरी सतह पर आंच के कारण कोयले की हलकी सी परत चढ़ गई .. जिन बल्लियों की बात मैंने शुरू में की थी उनके हज़ारों साल पानी में पड़े रहने के बावजूद न सड़ पाने का यही कारण था कि कोयले का पानी में कुछ नहीं होता वह बरसों बाद भी जस का तस रहता है । सो यह लकड़ी भी कोयले की परत की वज़ह से बची रह गई " 


"गजब यार.." अजय ने उछलकर कहा  "मैं शुरू में ही पूछने वाला था कि पुरातत्ववेत्ताओं को पानी में साबुत बल्लियाँ कैसे मिलीं, जबकि लकड़ियाँ तो पानी में सड़ जाती हैं ।" किशोर भैया भी इस बीच पहुँच गए थे उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा "तेरे में यही तो गड़बड़ है कि तू सही टाइम पर सवाल नहीं करता .. पता नहीं बीबी के साथ कैसे क्या करता होगा "  "देखो किशोर भैया..." अजय ने किंचित नाराज़ होते हुए कहा "अब मेरी पोल मत खोलो , मैंने तुमको कभी कुछ कहा क्या ?"  किशोर भैया बोले "हम भी कहाँ कुछ कह रहे हैं तुम अपनी पोल खुद ही खोल रहे हो ।" बस इसके बाद झील का किस्सा समाप्त हुआ और हम लोगों ने जल्दी जल्दी स्नान किया और अपने गीले वस्त्र आभूषण लेकर शिविर की ओर वापस लौट आये ।

        

*शरद कोकास*


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43-दाने आये घर के अन्दर कई दिनों के बाद


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

*पिछले भाग में आपने पढ़ा कि मनुष्य किस प्रकार अन्न संग्रहण की अवस्था से कृषि की अवस्था में आया उसके सामने क्या क्या कठिनाइयाँ आईं ।इस भाग में आप पढेंगे मनुष्य की पशुपालन अवस्था के बारे में किस तरह वह जंगलों से जीवित जानवर पकड़ लाता था और उन्हें पालता था उन्हें मारकर खा जाने की अपेक्षा उन्हें पालने में उसे क्या लाभ था।*

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*भाग 43*

*दाने आये घर के अन्दर कई दिनों के बाद* 

ऊब मिटाने के लिए हमें सौंपा गया एक्सप्लोरेशन का यह जॉब लंच से पहले ही समाप्त हो गया था । आज लंच के बाद ट्रेंच पर जाने की अनिवार्यता भी नहीं थी । भोजन के पश्चात कमर सीधी करने के लिए कुछ देर हम लोग तम्बू में जाकर लेट गए । वैसे भी अवशेष ढूँढते हुए काफी देर झुके रहने के कारण कमर में दर्द होने लगा था । आज ट्रेंच पर नहीं जाना था इसलिए आधे दिन के अवकाश जैसी अनुभूति हो रही थी । कुछ देर सुस्ताने के पश्चात फ्रेश होकर हम लोग लगभग साढ़े पांच बजे दंगवाड़ा  की ओर निकल गए । जब हम लोग दंगवाड़ा की गलियों में प्रवेश कर रहे थे गायें गौशालाओं की ओर लौट रही थीं, पंछी अपने घोसलों की ओर,  और किसान अपने अपने घरों की ओर । घरों की रसोईयों में अंगीठियाँ सुलग चुकी थीं और छप्परों से धुआँ उठने लगा था । हम लोग समवेत स्वरों में बाबा नागार्जुन की कविता का पाठ करते चल रहे थे..

 

"दाने आये घर के अन्दर कई दिनों के बाद

धुआं उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद, 

चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद 

कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।" 


गाँव की गलियों में भटकते हुए हमारी नज़र कच्चे घरों की रसोई तक पहुँच जाती थी । इधर स्त्रियों के हाथ पीतल की थालियों में आटा गूंध रहे थे और भूख के यज्ञ में आहुति देने के लिए अनाज सिंकती रोटी में परिवर्तित होकर समिधा बन रहा था । पंछियों के ऑर्केस्ट्रा से संगीतमय होकर शाम का वह समय बहुत भला लग रहा था । चौक में स्थित गुमटी पर अखबार चाट कर और चाय पीकर जब हम लोग वापस लौटने को हुए अँधेरा अपने पाँव  पसार चुका था । अक्सर शाम को हम लोगों का गाँव में देर तक रुकने का मन होता है । ऐसा लगता है कुछ देर वहाँ ठहरें और गाँव वालों से गपियायें, लेकिन शिविर का एक अनुशासन होता है सो हम लोगों का समय पर लौटना ज़रूरी हो जाता है । 


आज लौटते हुए मैंने रवीन्द्र से कहा " यार,गाँव के दृश्य देखते हुए मैं अक्सर सोचता हूँ कि हम शहर में रहने वाले लोग गाँव को कितनी रूमानियत भरी नज़र से देखते हैं । अगर हमेशा के लिए हमें  इस गाँव में रहना पड़े तो क्या हम रह लेंगे ? क्या तब भी हमें यह गौशालाएँ, जानवरों के गोबर की गंध, कंडों का धुआँ और गलियों की धूल अच्छी लगेगी ?" रवीन्द्र ने कहा "बंद कर यार थारो रांड रोणों, जब होगा तब देखा जाएगा ,अभी तो नहीं रहना है ना ।" 


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 रात भोजन के पश्चात तम्बू में घुसते ही मैंने मित्रों के सामने भी यही सवाल रखा । मैं अपने मित्रों के बीच उनके भविष्य में कार्य करने की स्थितियों और अन्य संभावनाओं को टटोलना चाहता था । इससे पहले कि कोई कुछ कहता अशोक ने कहा “यार, तेरी गाय-ढोर वाली  बात से याद आया कि तेरी इंसान की कहानी में एक चैप्टर तो रह ही गया ।“ “कौनसा ?“ मैंने पूछा । “अरे यार वही … कि जानवरों का शिकार करने वाला इंसान जानवरों को पालने वाला कैसे बना ।“अशोक ने कहा ।  


“अरे हाँ ।“ अशोक की बात सुनकर मैं भविष्य के जीवन की पड़ताल सम्बन्धी अपनी पिछली बात को भूलकर अतीत की कहानी सुनाने के मूड में आ गया था । “उसकी भी बड़ी इन्टेरेस्टिंग स्टोरी है । हमारे पुरखों के जीवन में एक परिवर्तनकारी समय ऐसा भी आया जब मानव किसान, शिकारी व पशुपालक एक साथ हो गया । महिलाएँ जब अनाज उगाने का काम करने लगीं तब पुरुष पहले की तरह शिकार के लिए जाने लगा । वह  समय भी ऐसा था कि एक आदमी की मेहनत से बमुश्किल गुजारा होता था । लेकिन उसमें एक नया परिवर्तन आया, वह यह कि अब वह शिकार से लौटता तो केवल मरे हुए जानवर लेकर नहीं लौटता था बल्कि अब वह कभी कभी अपने साथ ज़िन्दा जानवरों को भी पकड़ कर ले आता था । 

 

“ ई तो गजब है ।“ राममिलन भैया चौंक गए । “ इतने बड़े बड़े हाथी, मैंमथ, घोड़े पकड़कर लाना कौनो मजाक बात है का ? “ राममिलन भैया की बात सुनकर हम लोग पेट पकड़ पकड़ कर हँसने लगे । किशोर ने फिर उन्हें  छेड़ा …”अरे पंडत वो लोग कोई बजरंग बली के भक्त थोड़े ही थे जो हाथी को दुम से पकड़ते और उठा लाते । वे लोग तो बस छोटे -मोटे जानवर पकड़ते थे जैसे हिरण, भेड़ों के मेमने, खरगोश, छोटे छोटे  बछड़े आदि । “ 


“ अब हमका का मालूम । “ राममिलन भैया अपनी अनभिज्ञता पर ज़रा भी लज्जित नहीं हुए …” हम सोचे ऊ समय का आदमी अच्छा पहलवान रहा होगा और जैसे हनुमान जी लंका में हाथी लोगन को पूँछ से उठाय उठाय के पटके रहे वैसन वो भी पकड़ लाये रहे होंगे । “ हम सभी भैया के इस भोलेपन पर मुस्कुरा दिये । मैंने अपनी बात आगे बढ़ाई …” शुरु शुरु में वह इन जानवरों को खाने के लिए रख छोड़ता था, इसलिए कि उसे पता था जिस दिन शिकार नहीं मिलेगा उस दिन ये पशु काम आयेंगे, वैसे भी चारे की तो कोई कमी थी नहीं, जानवर चारा खाते थे और बढ़ते जाते थे, उनके शरीर पर  मांस भी बढ़ता जाता था सो यह उनके लिए घाटे का सौदा नहीं था । फिर यह भी हुआ कि नर मादा पशुओं को एक साथ रखने से प्रजनन के माध्यम से वे और बच्चों को जन्म  देने लगे । इस तरह से उसका जीवित मांस का भंडार भी बढ़ता गया । लेकिन इस भण्डार के उपयोग का अवसर उसे कम ही प्राप्त होता था क्योंकि नियमित रूप से शिकार उसे मिल ही जाता था । धीरे धीरे उसने महसूस किया कि इन्हें  मारकर खा जाने की अपेक्षा इन्हें जीवित रखने मे ज़्यादा लाभ है जैसे कि गाय से दूध मिलता है और भेड़ की ऊन लबादे बनाने के काम आती है ।"

 

अजय ने कहा "यह बात तो सही है कि भेड़ को एक बार मारकर उसका मांस खाया जा सकता है, एक बार ही उनकी खाल उतारी जा सकती है और एक बार ही ऊन निकाला जा सकता है लेकिन यदि एक बार ऊन निकालकर उसे जीवित रखा जाए तो उसे बार बार मूंडा जा सकता है ।"  "बिलकुल ।" रवीन्द्र ने कहा "जैसे कि  हमारे देश के नेता हमारे देश की जनता को पाल कर रखते हैं ताकि हर इलेक्शन में इन्हें मूंडा जा सके ।"  रवीन्द्र की इस बात पर एक ज़ोरदार ठहाका लगा । मैंने मित्रों को देश की राजनीति पर चर्चा से पुनः इंसान की कहानी की पटरी पर लाते हुए कहा "ठीक इसी तरह घोड़ों का उपयोग भी उसने बोझा ढोने के लिए किया । उसे यह बात समझ में आ गई थी कि पशुओं को जीवित रखने में  उसे ज्यादा फायदा है । फिर पशुओं से उसने खेती किसानी के काम लेने शुरु किए और वह पूरी तरह कृषक व पशुपालक बन गया । 


" यार एक बात बताओ " अजय ने कहा " हल में बैलों को जोतना तो उसने बाद में सीखा लेकिन उससे पहले वह हल कैसे चलाता था ?" "भाई ।" मैंने कहा " जब उसने देखा कि बीजों को ज़मीन में गाड़ने से पौधे निकल आते हैं तब इस काम को सुचारू रूप से करने के लिए अव्वल तो उसने हल का आविष्कार किया । हल की इस अवधारणा से पहले वह खेत में ऐसे ही दाने बिखेर देता था लेकिन प्राब्लम यह थी कि उन्हें चिड़िया चुग जाती थी । फिर उसे समझ में आया कि दानों को पंछियों द्वारा चुगे जाने से बचाने के लिए मिटटी के नीचे दबाकर रखना चाहिए सो उसने लकड़ी की सहायता से या जानवर के सींग की सहायता से धारियाँ बनाकर या गढ्ढे बनाकर अनाज गाड़ना शुरू किया । उसके बाद उसने लकड़ी का हल जैसा एक उपकरण बनाया जिसे एक आदमी दबाकर रखता था और दूसरा उसे खींचता था ।  फिर जब जानवर उसके यहाँ आये तो उनके सींगों से लकड़ी के हल को बांधकर उसने यह प्रयोग किया । इसी क्रम में फिर आज बैलों द्वारा हल खींचने की जो पद्धति है वह विकसित हुई । धातु की खोज के बाद हल के फाल भी धातु के बनने लगे ।"


  "भाई बैल न होते तो वाकई खेती-किसानी का काम कैसे होता, इसीलिए तो आज हम पोले  के दिन बैलों की पूजा करते हैं । लेकिन उसके पास तो गाय थी उसको भी तो उसने हल में जोता होगा?" अजय का सवाल सही था । "हाँ ।" मैंने कहा " उसने सबसे पहले गाय को ही हल में जोता होगा लेकिन गाय की गर्दन इतनी पतली होती है कि उससे हल खींचना संभव नहीं हुआ होगा । "लेकिन सांड को भी तो जोतना संभव नहीं है ?" अजय का तर्क वाकई लाजवाब था । "हाँ ठीक कह रहे हो तुम ।" मैंने कहा "हो सकता है पहले उसने सांड को नाथने की कोशिश की हो फिर वह जब ज़्यादा उछल कूद करने लगा हो तब उसे बधिया बना कर बैल बनाने की तरकीब भी उसके दिमाग़ में आई हो ।" 


मेरी बात सुनकर किशोर भैया जोर से हँस पड़े .." यार, हम लोग भी तो छुट्टे सांड जैसे ही हैं, लेकिन हमारे दिमाग़ में यह सवाल नहीं आया हाँ अपना अजय तो बेचारा शादीशुदा है सो इसने सही सवाल उठाया है ।" "क्या किशोर भैया, ले दे कर तुम मुझ पर ही क्यों आ जाते हो । अजय ने किशोर भैया का व्यंग्य समझकर किंचित नाराज़गी के साथ कहा । अशोक भी किशोर भैया की बात का मज़ा ले रहा था .."अब आप इसे शादीशुदा भी कह रहे हो और बेचारा भी ..सिर्फ शादीशुदा कहना काफी नहीं है क्या ? अजय की समझ में ही नहीं आया कि अशोक उसका पक्ष ले रहा है या मज़ाक उड़ा रहा है ।


"अरे भाई, लड़ो मत हम सब को भी एक दिन बैल ही बनना है और ज़िंदगी के जुए में जुतना है ।"रवीन्द्र ने अजय का बचाव करते हुए कहा । फिर वह मुझसे मुख़ातिब हुआ "लेकिन यार कुछ भी कहो, यह जानवर नहीं होते तो मनुष्य अकेले खेती नहीं कर सकता था ।" "ठीक कह रहे हो तुम ।" मैंने कहा "यह जानवर उसके लिए धीरे धीरे बहुत कीमती होते गये इसीलिए फिर इन जानवरों की रक्षा करने के लिए उसने देवी देवताओं की स्थापना की और चूँकि यह जानवर उसकी जीविका का साधन बने इसलिए उनकी भी उसने देवताओं की तरह पूजा शुरू की । इस तरह उसका जीवन चलता रहा । हालाँकि पशुओं को पालने के साथ साथ उसकी ज़िम्मेदारी और बढ़ गई क्योंकि अब उसे अपने परिवार के सदस्यों की तरह इनकी भी देखभाल करनी पड़ती थी । पशुओं को भी इंसान की ज़िम्मेदारी उठानी पड़ी जैसे कि गाय जो पहले केवल अपने बछड़े को दूध पिलाती थी उसे अब मनुष्य के लिए भी दूध देना पड़ा ।"


"सही कह रहे हो सरदवा इसीलिए तो हमारी गाय गौमाता कहलाई ।" राममिलन भैया का गौ प्रेम जागृत हो गया था । "हाँ यह बात तो सही है ।" मैंने कहा  "यद्यपि गाय को यह दर्जा वैदिक काल के पश्चात दिया गया । प्रारम्भ में तो वह अन्य जानवरों की तरह ही थी । लेकिन अन्य जानवरों की तुलना में गाय केवल दूध नहीं देती थी बल्कि खेती के लिए बैल भी देती थी सो माता का सम्मान उसे दिया गया । "लेकिन ।" अजय ने एक बढ़िया तर्क रखा "दूध तो और भी जानवर देते हैं जैसे बकरी ..फिर उसे हम माता क्यों नहीं कहते ?" किशोर ने कहा "भाई बकरी का अविर्भाव तो वाकई बहुत पहले का है, लेकिन वैदिक काल आते तक गाय की महत्ता दूध देने के अलावा खेती के लिए बैल देने के कारण भी स्थापित हो चुकी थी इसलिए उसे माता का दर्जा दिया गया ।" " फिर भी यार बकरी मनुष्य की इतनी पुरानी साथी है उसे कुछ तो दर्जा दिया जाना चाहिए ..गांधीजी भी गाय नहीं पालते थे, वे बकरी ही पालते थे, उन्होंने देश के लिए इतना कुछ किया लेकिन बकरी को सम्मान दिलाने के लिए कुछ नहीं किया?" अजय ने अपनी व्यथा प्रकट की ।

 

"हे भगवान, तुम लोग भी बात को कहाँ से कहाँ ले जाते हो ।" अशोक ने कहा " अरे बावले, गांधीजी के पास और कोई काम नहीं था क्या जो बकरी और मनुष्य का रिश्ता ढूँढते .. खैर कोई बात नहीं .. गाय को तुम माता बुलाते हो तो बकरी को बुआ कह दिया करो " "क्यों मौसी क्यों नहीं ? अजय ने पूछा .." अरे भाई मौसी तो भेड़ बन ही चुकी है .. क्योंकि वह गाय के जितनी पुरानी है .." अशोक ने जवाब दिया । अजय ने कहा " ठीक है .. फिर गाय  माता हो गई , भेड़  मौसी हो गई , बकरी इनसे भी प्राचीन है इसलिए बुआ हो गई तो भैंस क्या कहलाएगी वह भी तो दूध देती है ? इसके अलावा गधी का उल्लेख भी वेदों में आता है और वह दूध भी देती है सो उसके लिए भी कोई रिश्ता ढूँढना चाहिए ।"

 

"ढूंढ तो लिया है । " किशोर भैया ने कहा " तू भाभी को कभी कभी गधी नहीं कहता क्या ? तो तू क्या हुआ ? गधी का हसबैंड गधा ।" हमारी हँसी के बीच अजय ने किशोर की बात पर सिर ऊँचा उठाया और जोर से गधे के रेंकने जैसी आवाज़ निकालते हुए कहा "हौ गधे के बड़े भाई ।"  मैं इस बात को समझ रहा था कि अब इन लोगों की गंभीर चर्चा में कोई रूचि नहीं है । फिर भी उपसंहार तो करना ही था । 


मैंने खखारकर अपना गला साफ़ किया "ठीक है भाइयों, भैंस और गधी को मानव परिवार में उचित दर्जा दिलाने के लिए तुम लोग आन्दोलन वगैरह करते रहना, फिलहाल तो उस मनुष्य के बारे में सोचो जिसके जीवन में कृषि और पशुपालन ने सुविधाओं का स्वर्ग उपस्थित कर दिया । अब उसकी स्थिति अपने पूर्वजों से कहीं ज्यादा बेहतर थी । उसे अपने शिकारी पूर्वजों की तरह केवल शिकार पर आश्रित नहीं रहना पड़ता था । वह प्रकृति पर भी पूरी तरह निर्भर नहीं था, किसी भी मौसम में उसे खाद्य मिल ही जाता था, उसके पास ढेरों अनाज था, दूध था, शहद और जंगली फल तो होते ही थे और इसके अलावा पीला गए पशुओं के रूप में हमेशा के लिए एक मांस का भंडार तो था ही ।"


"लेकिन यह अजीब नहीं लगता कि वह मनुष्य जो गाय, भेड़, हिरण आदि पालता था उन्हें ही मारकर खा जाता था ?" रवीन्द्र के सवाल का प्रभाव यह हुआ कि अब बाक़ी मित्र भी हँसी मज़ाक छोड़कर गंभीरता से मेरी बात सुनने के लिए तत्पर हो उठे । मैंने कहा "नहीं, ऐसा जघन्य कार्य वह कम करता था क्योंकि प्राणियों को जीवित रखने में उसे ज़्यादा फायदा था । इसके अलावा प्राणियों के साथ रहने से उनके प्रति थोड़ा बहुत मोह भी उसके भीतर जागृत हो गया था इसलिए बहुत से प्राणी अपनी स्वाभाविक मृत्यु को ही प्राप्त होते थे  । फिर भी ज़रूरत के वक़्त ऐसा करने में कोई हर्ज नहीं था । आज भी लोग बकरियाँ,मुर्गियां,बतख,सूअर आदि मांस के लिए ही पालते हैं ,भले ही वे उनका व्यापार करते हों ।"


"वाकई यार, मैं सोचता हूँ कि हमारे पुरखों ने अपने श्रम और अक्ल से यह स्थिति प्राप्त की होगी ।" अजय गंभीरता से संवाद का उपसंहार प्रस्तुत कर रहा था । रवींद्र ने उसकी बात का समर्थन करते हुए कहा  "सही है, यह स्थिति इतनी आसानी से नहीं आई, उसे कितनी बार भूखे रहना पड़ा होगा, सूखा, अतिवृष्टि आदि समस्याओं से जूझना पड़ा होगा । इसी तरह प्रकृति भी देवता के रूप में उसके जीवन में स्थापित हुई। सर ने बताया था ना कि जैसे प्रारंभिक शिकारी पशुओं से अपना मांस दान देने की प्रार्थना करता था वैसे ही यह कृषक पशुपालक पृथ्वी और आकाश से अच्छी फसल देने की प्रार्थना करने लगा, उसके देवता जो पहले सिर्फ पशु या पेड़ थे धीरे धीरे पृथ्वी, सूर्य, आकाश, वर्षा आदि में बदलने लगे । कालांतर में उसने इनके लिए भी प्रार्थनाएं रचीं ।  वह अपने अनाज और पशुओं से प्राप्त मांस को देवताओं से मिला प्रसाद मानता था और इसीलिए अनाज और मांस का एक अंश चढ़ावे के रूप में उन्हें अर्पण भी करता था ।"


अशोक ने चुटकी लेते हुए कहा "हालाँकि उसे पता था कि देवता तो प्रसाद खाने से रहे  इसलिए उन्हें चढ़ाने के बहाने वह खुद खा जाता था ।" अजय तो प्रसाद के नाम से ही खुश हो गया "तो क्या हुआ.. इस बहाने नई नई चीज़ें तो खाने को मिलती हैं । मुझे तो परसाद में पंजीरी बहुत पसंद आती है । हमारे एक फूफाजी है वो बच्चों से बढ़िया मजाक करते हैं उन्हें आटे की सूखी हुई पंजीरी देते हैं और कहते हैं जोर से बोलो 'फूफाजी' । बच्चे पंजीरी फाँककर जैसे ही फू फा कहते हैं पूरी पंजीरी मुँह से बाहर उड़ जाती है । अजय का यह चुटकुला सुनकर हम लोग तो ज़ोर से हँस दिए लेकिन रवीन्द्र को हँसी नहीं आई । उसके दिमाग़ में कोई सवाल उथल पुथल मचा रहा था ।


"यार यह पंजीरी को प्रसाद के रूप में चढ़ाने का प्रचलन कबसे शुरू हुआ होगा ? उसने गंभीरता से पूछा । "बहुत सही सवाल किया है तुमने ।" मुझे लगा उसके सवाल में एक इतिहास छुपा हुआ है । "इसका सम्बन्ध आदिम मनुष्य की भोजन पकाने की विधि से है । जब उसने अनाज उगाना शुरू किया तो सबसे पहले उसके मन में यही आया होगा कि इसे खाया कैसे जाए । फिर जिस तरह वह आग में कंद  मूल और मांस भूँजकर खाता था उसने धान और जौ आदि अनाजों की बालियों को भूंजना प्रारंभ किया । फिर वह नाखून से उस अनाज को बाहर निकालता था और उसे पीसकर चूर्ण बना लेता था और खाता था । यही चूर्ण उसने प्रसाद के रूप में देवताओं को चढ़ाया । हो सकता है यही पंजीरी का आदिम रूप रहा हो । इसके अलावा वह सूखा अनाज भी देवताओं को अर्पित करता था । आज जैसे चढ़ावे के चावल को हम अक्षत कहते हैं वह इसी परम्परा में है ।"  


"लेकिन फिर अनाज को पकाने या आटा गूंदकर रोटी बनाने की पद्धति कब से शुरू हुई ?" अजय ने छेड़े जाने का ख़तरा उठाते हुए रसोई सम्बन्धी यह सवाल किया । "हो सकता है उसने फिर उस चूर्ण में पानी मिलाकर उसे गूंथकर रोटी जैसा कुछ बनाया हो फिर उसे आग में पकाकर खाया हो ।" मेरा दिमाग़ कुछ इस तरह सोच रहा था । "हालाँकि बर्तन में पकाने की कला तो मृद्भांड या धातु की खोज के बाद बर्तन बनाने से हुई लेकिन उसके पहले भी वह कपाल में अनाज रखकर उसे पकाने की विधि जानता था ।" मनुष्य के कपाल में रखकर अनाज पकाने की बात से राममिलन भैया कुछ चौंक से गए लेकिन उनके दिमाग़ में भुने हुए अनाज के चूर्ण को लेकर कुछ चल रहा था । "ठीक कह रहे हो सरदवा, उसने रोटी के आविष्कार से भी पहले सत्तू का आविष्कार किया । सत्तू को इसीलिए मनुष्य का सबसे पहला भोजन कहा जाता है , हमरे यहाँ तो जब कुछ नहीं मिले तो सत्तू खा लो ऐसा कहा जाता है, हमें तो बहुतै पसंद है जौ का सत्तू, चने का सत्तू, और हमरे इधर तो सत्तू का परसाद भी चढ़ाते हैं सतवाई अमावस्या  को कि हे भगवान तूने ही हमें यह सब कुछ दिया है । इसलिए पहला हिस्सा तेरा ।" राममिलन भैया बात ही बात में ईश्वर और चढ़ावे के प्रसाद का सम्बन्ध बता चुके थे ।


"अच्छा तो हम लोग मंदिर जाकर प्रसाद इसीलिए चढ़ाते हैं..।" अजय ने ऐसे कहा जैसे वह कुछ जानता ही नहीं हो ।  रवींद्र ने कहा । " हाँ लेकिन तेरे समान मंदिर में प्रसाद चढ़ाकर परीक्षा में पास होने के लिए भगवान की प्रार्थना नहीं करते, और परसाद चढ़ाने से कोई पास भी नहीं होता ..समझे ..उसके लिए पढाई करना पड़ता है बाबू ...। " "तो करता तो हूँ यार.." अजय ने रोनी सूरत बनाते हुए कहा । मैंने महसूस किया कि अब सबको नींद आ रही है और आगे की बातों में किसी की रूचि नहीं है सो मैंने सभा समाप्त होने की घोषणा कर दी और हम लोग निद्रा देवी को अपनी सांसों का और सुकून का प्रसाद चढ़ाकर उसकी आराधना में लीन हो गये ।


*शरद कोकास*


42-मेरे देश की धरती सोना उगले


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼


*पिछले भाग में आपने पढ़ा कि भाषा की खोज से पूर्व कैसे मनुष्य अपनी बात दूसरों तक संप्रेषित करता था उसके संकेत चिन्ह कैसे होते थे बोलने के लिए उसका जबड़ा कैसे नाकाफी था फिर भाषा की खोज कैसे हुई और उसने किस तरह उसे व्यवहार में लाया इस भाग में आप पढेंगे कि मनुष्य किस प्रकार अन्न संग्रहण की अवस्था से कृषि की अवस्था में आया उसके सामने क्या क्या कठिनाइयाँ आईं*

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*भाग 42*

*मेरे देश की धरती सोना उगले* 

सुबह सुबह हमने नींद की किताब बंद की और रात तक के लिए उसमे सपनों का मोरपंख लगाकर दिन से साक्षात्कार करने के लिए तैयार हो गए । आज कैम्प में हमारा बाईसवाँ दिन है । रोज़ रोज़ ट्रेंच पर वही वही काम करते हुए हम ऊब चुके हैं और हमारी स्थिति उन बच्चों की तरह हो गई है जो एक ही खिलौने से खेलते हुए ऊब जाते हैं और अपने मित्रों के खिलौने से खेलने लगते हैं । लेकिन यहाँ दंगवाड़ा की इस ताम्राश्म्युगीन साईट पर हमारे मित्र भी हमारे ही जैसे हैं और उनके पास खिलौने भी वही हैं जो हमारे पास हैं । दुनिया भर के मनोरंजन के साधनों से घिरे रहने वाले और भांति भांति के कामों से अपनी ऊब मिटाने वाले शहर के लोग इस बात को कभी नहीं समझ सकते कि एक पुरातत्ववेत्ता कितने सीमित साधनों के साथ अपना रोज का उबाऊ कार्य संपन्न करता है जो उसके लिए काम भी है और मनोरंजन भी ।  

डॉ.वाकणकर शायद हम लोगों की मनस्थिति समझ रहे हैं । उन्हें यह बात पता थी कि शहर में रहने वाले यह बच्चे अब प्रतिदिन के इस एकरस काम से ऊब गए हैं और इन्हें विविधता की तलाश है । सुबह सुबह वे हमारे तम्बू में आये और उन्होंने आज के कार्यक्रम की घोषणा करते हुए कहा "सज्जनों, आज आप लोगों को ट्रेंच पर काम नहीं करना है आज घूमने का दिन । " हम लोग अपने भीतर उमड़ रही ख़ुशी को चेहरे तक ला पाते इससे पहले उन्होंने कहा "आज आप लोगों को घूमते हुए पास के गाँव में एक खेत में एक्सप्लोरेशन के लिए जाना है । आज आप लोगों के साथ कोई नहीं जाएगा न कोई रहेगा, सिर्फ एक व्यक्ति आपको जगह दिखाने ले जाएगा बाक़ी काम आपको अकेले ही करना है और आपके टीम लीडर हैं किशोर त्रिवेदी ।" 

निरुद्देश्य भटकने के इस काम के बीच एक्सप्लोरेशन करने की यह शर्त पहले तो हमें मायूस कर गई लेकिन कोई हमारे साथ नहीं रहेगा यह बात हमारे भीतर छुपी मस्ती को गुदगुदाने लगी । हमने टीम लीडर किशोर भैया के नाम पर ज़ोरदार तालियाँ बजाईं । फिर जल्दी जल्दी हम लोग नहा धोकर तैयार हुए और नाश्ता करके खेत की ओर निकल पड़े । सर ने एक आदमी हमारे साथ भेज दिया था ।

फुलान में एक्सप्लोरेशन का अनुभव हमारे पास था ही और हमें क्या करना है यह बात हमें अच्छी तरह ज्ञात थी लेकिन पता नहीं क्यों एक्सप्लोरेशन में आज किसीका मन नहीं लग रहा था । वहाँ खेतों में बिखरे हुए अवशेष ढूँढते हुए हमें ऐसा महसूस हो रहा था जैसे हम लोगों का जन्म मानव की कंद मूल बीनने वाली अवस्था में हुआ है और हम अपने पेट की भूख मिटाने के लिए यह काम कर रहे हैं ।  आज एक्स्प्लोरेशन करते हुए हमें ऐसा ही कुछ महसूस हुआ । झुक झुक कर खेत में पड़े अवशेष ढूँढते हुए कुछ देर के लिए रवीन्द्र रुका । उसने अपनी कमर पर पीछे की ओर  हाथ रखकर उसे एक झटका देकर सीधा किया । उसे देखकर अशोक और अजय भी हमारे पास आ गए । उनके चेहरे पर भी ऊब के भाव थे ।

रवींद्र ने अपनी जेब से कुछ पंचमार्क सिक्के निकाले और उन्हें देखते हुए कहा "यार अशोक तू सही कह रहा था, क्या इसी तरह का उबाऊ काम करते हुए हमारी ज़िन्दगी बीतेगी ?" ऊब तो मैं भी हो रहा था लेकिन इससे पहले कि इस ऊब  का सर्वव्यापीकरण हो मैंने उसे उत्साह दिलाते हुए कहा  "भाई इसमें निराश होने जैसी कोई बात नहीं । माना कि ज़िंदगी में और भी सुख हैं लेकिन हम संग्रहण का यह कार्य हम अपने पेट की भूख मिटाने के लिए तो नहीं कर रहे हैं बल्कि हमारा उद्देश्य मानवता के इतिहास की खोज है । यह हमारा सामूहिक प्रयास है इसलिए अपनी निजता को भूलकर हमें एकजुट होकर इस महान कार्य को संपन्न करना है ।" 

"बस कर यार बहुत हो गया तेरा महानता पर भाषण ।" अशोक ने मेरी बात को हवा में उड़ाते हुए कहा " हमें नहीं बनना महान-वहान । हमसे पहले जिन लोगों ने यह महान कार्य किया वे भी कौनसे महान बन पाए ? इस समाज में पुरातत्ववेत्ता को जानता ही कौन है, घर में भी उसकी कोई इज्जत नहीं होती सब लोग आधुनिकता की बात करते हैं और वह पुराने जमाने की बात करता है । ऐसा लगता है जैसे टाइम मशीन से बाहर निकल कर आ रहा हो ।" " इतना निराश होने की जरुरत भी नहीं है भाई ।" मैंने अशोक के कंधे पर हाथ रखा । "दुनिया में महान काम करने वाले सब लोग भी महान नहीं होते । हमें सिर्फ आज उन्हीके नाम पता है जिन्होंने बहुत महान खोजें की हैं लेकिन उनके जो पूर्वज रहे और जिन्होंने उस काम को वहाँ तक लाकर छोड़ा उन्हें कौन जानता है ? इसलिए बिना निराश हुए हमें यह कार्य करना है । चलो अब जल्दी से काम ख़त्म करो और वापस चलो भूख भी लगने लगी है ।" अब इतना महान उद्देश्य मैंने सबके सामने रख दिया था ..फिर उसमे भूख की बात भी शामिल हो गई थी अब कोई क्या कहता । 

दंगवाड़ा का यह क्षेत्र पुरातात्विक सम्पदा से संपन्न है  । पुरातत्व की भाषा में इसे रिच साईट कहते हैं । इस क्षेत्र में जगह जगह ताम्राश्मयुगीन अवशेष बिखरे पड़े हैं । ज़मीनों पर लोग खेती भी कर रहे हैं, मकान बना कर रह भी रहे हैं । पटवारी के कागजों में भले यह ज़मीन उनके नाम लिखी हो लेकिन वे इस बात को जान रहे हैं कि इस ज़मीन पर रहने वाले वे पहले इंसान नहीं हैं, उनसे पहले भी एक सभ्यता यहाँ रह चुकी है । जो यहाँ के मूल निवासी थे वे जाने कहाँ चले गए । इस ज़मीन की मिल्कियत का कोई कागज़ भले उनके नाम का नहीं हो लेकिन उनके रहने के ढेर सारे प्रमाण यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं । अवशेष बटोरते हुए  रवीन्द्र के मन में एक विचार आया ... “ यार जो पहला मानव इस स्थान पर रहता होगा क्या उसने कभी सोचा होगा कि हज़ारों साल बाद कोई किसान उसकी इस धरती पर हल चलाएगा ? “ “ बिलकुल नहीं “ मैंने कहा । खेती किसानी क्या होती है यह उसे पता ही नहीं था । वह तो शिकारी संग्रहणकर्ता की अवस्था में था । उसके  हजारों साल बाद मनुष्य कृषि की अवस्था में आया ।"

“लेकिन इंसान के किसान बनने का किस्सा भी दिलचस्प है ना ? “ मैं समझ गया अजय मुझे उकसा रहा है ।“ पुरातत्ववेत्ताओं को कितनी मुश्किल से इस बात के प्रमाण मिले होंगे कि मनुष्य ने खेती बाड़ी शुरू कर दी..क्यों भाईजान ? “हाँ ।“ मैंने अजय का आशय समझते हुए कहा । " पुरातत्ववेत्ताओं को प्रागैतिहासिक स्थलों पर कृषि के प्रमाण सर्वप्रथम प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिले । उन्हें अनेक वस्तुओं के साथ साथ सर्वप्रथम मिट्टी के पात्र मिले जिनका सिलसिला आगे कृषि से जुड़ता है । इन मिटटी के पात्रों पर कुछ धारियाँ जैसी थीं । दरअसल प्रारंभ में यह पात्र इस तरह नहीं बनाए जाते थे जैसे कि आज बनाए जाते हैं । "

"तो फिर कैसे बनाये जाते थे महोदय ?" अजय ने घास के एक तिनके से अपने दांत में फंसा सुबह खाए हुए उपमा में डले टमाटर का छिलका निकालते हुए कहा । "यह बात तो उसे मालूम हो ही गई थी कि गीली मिटटी को आग में डालने से वह पक जाती है ।" मैंने बात को विस्तार देते हुए कहा " मिटटी का पात्र बनाने के लिए सरकंडे से बुनी हुई एक टोकरी की भीतरी सतह पर गीली मिट्टी की एक तह जमाई जाती थी और फिर उसे सुखाने के बाद आग में पकने के लिए रख दिया जाता था । आग में सरकंडे जल जाते थे और पका हुआ बर्तन तैयार हो जाता था । पकने के बाद बर्तन पर सरकंडों के निशान किसी डिज़ाइन की तरह ही दिखाई देते थे । बाद में मनुष्य ने बिना टोकरी की सहायता के बर्तन बनाना सीख लिया । लेकिन वे बर्तनों पर उसी तरह की चौखाने वाली आकृति बनाते थे, उनकी यह मान्यता थी कि इस तरह की आकृति बनाने के पीछे उनके पूर्वजों का कोई उद्देश्य रहा होगा । कभी कभार कुछ बर्तनों पर कुत्ते, बिल्ली या अन्य जानवरों की भी आकृति पाई जाती थी । “

“ यार ,तुम मानव के किसान बनने की कहानी सुना रहे हो या कुम्हार बनने की ? “ अशोक ने मेरी कथा से ऊब कर सवाल किया । “ मैं किसान की ही कहानी सुना रहा हूँ भाई, सारांश यह कि मनुष्य शिकारी अवस्था से एकदम किसान नहीं बन गया । इस बात के प्रमाण के लिए यह कथा ज़रूरी थी । हुआ यह कि पुरातत्ववेत्ताओं  को ऐसे ही बर्तनों पर अन्य आकृतियों के साथ जौ के दाने का एक निशान मिला और उन्होंने इसे शिकारी के किसान हो जाने का प्रमाण माना ।" "मतलब बर्तन पकाने में ग़लती से जो मिस्टेक हो गई वह आगे चलकर परंपरा और प्रमाण बन गई ।" यह रवींद्र का एक्सपर्ट कमेन्ट था । "बिलकुल " मैंने कहा " फिर आगे चलकर अन्न के निशान वाले बर्तनों के अलावा उन्हें कुदाल, अन्न कूटने के ऊखल आदि भी प्राप्त हुए । इसके अलावा गुफा चित्रों में भी ऐसे चित्र प्राप्त हुए हैं जिनमें स्त्रियों को शहद के छत्ते से घड़े में शहद इकठ्ठा करते हुए बताया गया है ।"

“ लेकिन उसका इस तरह परिवर्तन कैसे हुआ ? मेरा मतलब खेती करने का आयडिया उसके दिमाग में कैसे आया ?“ अशोक ने व्यग्र होकर पूछा । “ हाँ ।“ मैंने कहा “ वह सीधे सीधे शिकारी अवस्था से किसान नहीं बना । होता यह था कि जब घर के पुरुष शिकार के लिए जाते थे तब घर की स्त्रियाँ व बच्चे जंगल में खुम्भी, कंद, बेर आदि जंगली वनस्पति बीनने का काम करते थे । वे मधुमक्खी के छत्तों से शहद भी लाते थे और साथ ही बहुत सारी वनस्पतियाँ और जंगली अनाज भी बटोर लाते थे । औरतें खाद्य सामग्री का भंडारण करना अच्छी तरह जानती थीं इसलिए कि उन्हें  पता था, वर्षा की स्थिति में या शिकार न मिलने की स्थिति में उनके द्वारा संग्रहित सामग्री ही काम आएगी ।

“एक मिनट ।“ अशोक ने कहा ”मतलब स्त्रियाँ शिकार के लिए कभी गई ही नहीं ?“ “नहीं ऐसा भी नहीं है ।“ मैंने कहा “शुरू शुरू में स्त्रियाँ भी पुरुषों के साथ शिकार के लिए जाया करती थीं, शारीरिक रूप से उनके पास भी पर्याप्त बल था और शिकार करने की बुद्धि भी पुरुषों से कम नहीं थी लेकिन गर्भावस्था में उनका भागदौड़ करना कठिन हो जाता था । हालाँकि वे प्रसव से पूर्व तक इस कार्य को करती ही थीं जैसे कि आज भी खेतों में मजदूर स्त्रियाँ करती हैं  लेकिन प्रसव के उपरांत शिशु संगोपन में उनका इतना समय बीत जाता था कि उन्हें घर पर ही अधिक रहना पड़ता था । और यह सिलसिला उनके सम्पूर्ण मातृत्व जीवन तक चलता रहता । इस प्रकार धीरे धीरे उनका पुरुष के साथ शिकार पर जाना बन्द हो गया । हालाँकि गर्भावस्था से इतर दिनों में वे संग्रहण का कार्य भी करती रहीं लेकिन ऐसे दिन उनके जीवन में बहुत कम होते थे ।“

“ यार, कुछ भी कहो, यह स्त्रियाँ शुरू से ही समझदार रही हैं । “ अजय ने कहा …” अभी भी हम देखते हैं कि आड़े वक़्त के लिए संग्रहण की यह प्रवृत्ति स्त्रियों में विद्यमान है । हमारे घर की महिलाएँ बरी, पापड़, अचार ऐसे ही समय के लिए बनाती हैं । “  “वाह वाह ।“ रवींद्र ने कहा “ देखा हमारा भाभी का भैया शादी के बाद कितना समझदार हो गया है ।“ राममिलन भैया ने भी इस पर अपना मत व्यक्त करना उचित समझा …” बिलकुल ठीक कहत हो भैया, बरसात के मौसम मा जब सब्जी भाजी नही मिल सकै तब ई बरी का सब्जी मा आनंद आई जात है । “

“औरतें जंगल से बहुत सारी वस्तुएँ बटोर लाती थीं ।“ मैंने सज्जनों के स्त्री विमर्श में भाग न लेते हुए अपनी बात जारी रखी …”इनमें शहद, जंगली फल, बेर आदि के अलावा कोदो, कुटकी, जौ या ऐसे ही जंगली अनाज भी शामिल होते थे । जब वे उन अनाजों को मिटटी के पीपों, मटकों या पत्तों की टोकरियों में रखतीं तो कुछ अनाज ज़मीन पर गिर जाता था और मिट्टी में दब जाता था । पानी भी वहाँ गिरता रहता था । कुछ समय बाद उसमें से अंकुर निकलने लगते और जब वह पौधा बन जाता तो उसमें से उसी प्रकार का अनाज निकलने लगता । बरसों तक उन्होंने  इस प्रक्रिया का अध्ययन किया और अनायास होने वाले इस कार्य को सायास करने का प्रयास किया । मतलब यह कि बीज की ताकत को उन्होंने जाना और फिर इसे ख़ाली ज़मीन में बिखेरकर सायास उन्हें उगाना शुरू किया । इसके लिए वे बाकायदा कुदाल से गड्ढा खोदकर उसमें अनाज को गाडती थीं इस प्रकार खेती की प्रथा का शुभारंभ हुआ ।"

“ वैसे यह उनके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था । “ रवींद्र भी मनुष्य के किसान बनने की इस कथा को बेहतर जानता था…” वे अन्न को देवता समझते थे और इस तरह ज़मीन में उसे गाड़कर उसके उग  आने को फिर देवता की वापसी की तरह मानते थे ।“ अजय बोला “ समझ गया , इसीलिए हमारे किसान अभी भी अन्न को देवता मानते हैं , और इसी मान्यता के कारण फसल कटने पर उसकी पूजा करते हैं और उत्सव मनाते हैं । हमारे सारे त्यौहार भी तो इस मान्यता से ही जुड़े हैं ,भले ही बाद में उसमे धार्मिक कहानियाँ जोड़ दी गईं ।“

“ बिलकुल सही ।“ मैंने अजय की समझदारी पर प्रसन्न होते हुए कहा  "फिर वह किसान इस अनाज के इर्द गिर्द नृत्य करता था । अनाज बोने से लेकर काटने तक एक संस्कार सम्पन्न होता था ।"  "कितनी अजीब बात है ना …” रवींद्र ने कहा …”वे सारे संस्कार अब तक चले आ रहे हैं और हमारे सारे उत्सव भी फसल को लेकर ही हैं ।"  “ हाँ “ मैंने कहा “ लेकिन प्रकृति की बहुत सारी बातें वे उस तरह नहीं समझते थे जैसे कि आज का किसान समझता है । वे अनाज का उगना, आंधी का चलना, बादलों का बरसना, बिजली का कड़कना जैसी हर बात को जादू टोने से जोड़ते थे और हर गतिविधि के देवता का निर्माण  कर उसके नाम से अनुष्ठान करते थे । भाषा की खोज के साथ उन्होंने इस अनाज उगाने, काटने की प्रक्रिया को लेकर गीत भी रचे । आज भी आदिवासी समाज में फसलों को लेकर ऐसे ही कई गीत गाये जाते हैं । बच्चों के कई खेल भी ऐसे ही गानों पर आधारित हैं ।

"हाँ, हाँ ।" अजय ने कहा "मनोज कुमार के एक सिनेमा में भी ऐसे ही गाना था ..मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती" ... "ए भाई .. मैं लोक गीतों की बात कर रहा हूँ, तुम सिनेमा के गीतों की बात कर रहे हो .." मैंने अजय के फ़िल्मी उत्साह पर पानी फेरते हुए कहा  "दरअसल समय के साथ साथ और विज्ञान की प्रगति के साथ साथ इन गीतों से या कह लें कि इन संस्कारों से जादू टोने वाला प्रभाव समाप्त हो गया । आज किसान जानता है कि बीज से पौधा कैसे पैदा होता है, अच्छी फसल उगाने के लिए किन किन चीजों की ज़रूरत होती है अच्छा खाद, सिंचाई के लिए प्रचुर मात्रा में पानी, हवा और धूप सब ज़रूरी है । लेकिन वह यह भी जानता है कि इसके लिए प्रकृति का अनुकूल रहना भी ज़रूरी है । इसीलिए वह प्राकृतिक देवताओं को अब भी मानता है और उनकी पूजा करता है ।" 

"सही कहत हो भैया लेकिन अब तो भैया, इस बीज और खाद के लिए सरकारी कर्ज भी ज़रूरी है .. लेकिन फसल नहीं हुई तो सब बरबाद ।" राममिलन भैया कहने लगे । " यह भी सच है कि अभी भी किसान सिंचाई के लिए आसमान की बारिश पर निर्भर है, तो जादू तो यह अब भी है, फसल हो गई तो जादू चल गया देवता प्रसन्न हो गए और नहीं हुई तो देवता नाराज ..जादू फैल ..इसलिए अभी भी वेदों में वर्षा के लिए प्रार्थनाएँ मौजूद हैं, वर्षा के लिए यज्ञ किये जाते हैं । सो हम अभी भी उस अनुष्ठान की मानसिकता से बाहर कहाँ निकल पाए हैं ।"  मुझे महसूस हुआ कि राममिलन भैया ने बात तो बिलकुल पते की कही है फिर भी मैंने उनकी बात का प्रतिवाद करते हुए कहा " भैया, अगर यज्ञों से ही बारिश हो जाती तो क्या बात थी, हम अनाज उगाने में नंबर वन नहीं हो जाते । अब भी हमारी तुलना में वे देश ज्यादा फसल उगाते हैं जहाँ यज्ञ नहीं होते ।"

" तो फिर यह यज्ञ -फज्ञ सब बंद कर देना चहिये कौनो फायदा नहीं है जब इनसे ।" राममिलन भैया आज बहुत प्रगतिशील भूमिका में थे । मैंने कहा "ऐसा है भैया, हमारे यहाँ यह सब अनुष्ठान उन्ही परम्पराओं के तहत होते हैं जिनका उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में किया गया है । यह कोई नहीं सोचता कि यदि उनकी उपयोगिता उस काल में थी तो आज उसका क्या औचित्य है । अगर मनुष्य के भीतर इतिहास बोध होता तो वह इस बात को समझ सकता था कि यज्ञ वस्तुतः कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं थे बल्कि कृषक वैदिक संस्कृति के लोगों द्वारा ज़मीन को कृषि योग्य बनाने हेतु झाड़ -झंखाड़ जलाने की एक प्रविधि थी जिसने बाद में अनुष्ठान का रूप धारण कर लिया । उस समय भी काफी लोग पशुपालक और अन्न संग्रहण की अवस्था में भी थे और उनसे उनकी जमीन छीने जाने की स्थिति में उनसे युद्ध भी होते थे । ये वही लोग थे जो अपनी ज़मीन की रक्षा करते थे इसलिए राक्षस कहलाते थे ।

"अब हमें समझ में आया ।" राममिलन भैया ने अपनी रीढ़ की हड्डी को पूरी तरह तानते हुए कहा  । " इसीलिए इन राकछसों से अपने यज्ञ  को बचाने के लिए विश्वामित्र जी रामचंद्र जी को और उनके भ्राता लछमन जी को अपने साथ लेकर गए थे ।" " बिलकुल सही कह रहे हो पंडित " किशोर भैया ने जैसे ही राममिलन भैया की तारीफ़ की वे हाथ जोड़कर खड़े हो गए " लेकिन आज तो राक्षस नहीं है सो अब यज्ञ की क्या ज़रूरत ?" " वाह कईसे जरुरत नहीं है ।" राममिलन भैया ने कहा " अबके जमाने में वो बड़े बड़े सींग वाले राक्छस नहीं है तौन उनकी जगह दूसरे राक्छस पैदा हो गए हैं ।" वही ना जिनको तुम हर पांच साल में वोट देने जाते हो ?" अशोक ने हँसते हुए कहा । 

" चलो भाई , अब वापस चलें ..हमारे पेट में भी यज्ञ की ज्वाला जल रही है और उसमे रोटी सब्ज़ी की आहुति देना है ।" अजय ने वापसी की घोषणा करते हुए कहा। मैं समझ गया अब आज के एक्सप्लोरेशन के दौरान का चर्चा सत्र समाप्त हो गया है और हम लोगों को कैम्प की ओर वापस लौटना है । हम लोगों ने एक्सप्लोरेशन में प्राप्त पंचमार्क सिक्के , मनके और मृद्भांडों के टुकडे उठाकर खाली बोरियों में रखे और कैम्प की ओर चल दिए ।    

*शरद कोकास*


41-उसे फ़्लाइंग किस करना नहीं आता था


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा- पिछले भाग में आपने पढ़ा कि आग की खोज के बाद कैसे मनुष्य ने उसे अपने आवास में संभालकर रखना सीखा और किस तरह मनुष्य ने अपने आवास बनाये इस भाग में आप पढेंगे कि भाषा की खोज से पूर्व कैसे मनुष्य अपनी बात दूसरों तक संप्रेषित करता था उसके संकेत चिन्ह कैसे होते थे बोलने के लिए उसका जबड़ा कैसे नाकाफी था फिर भाषा की खोज कैसे हुई और उसने किस तरह उसे व्यवहार में लाया*

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*भाग 41*

*उसे फ़्लाइंग किस करना नहीं आता था* 

अँधेरे में रास्ता तलाशते हुए हम लोग टीले पर पहुँच चुके थे । पांवों को अब ऐसी आदत हो गई है  कि वे घुप्प अँधेरे में भी अपना मार्ग तलाश लेते हैं । टीले पर पहुँचकर हम लोग ढलान पर अपने पाँव पसार कर बैठ गए । चम्बल का जल अँधेरे में किसी पुराने मैले कपड़े की तरह दिखाई दे रहा था । हवा इतनी उदास थी कि सर झुकाए जंगल के एक कोने में बैठी थी । नदी के उस पार के गाँव में झोपड़ियों में टिमटिमाती हुई रौशनियाँ हम लोगों से कह रही थी कि यह बस्ती अभी निर्जन नहीं हुई है । भविष्य का तो उसे भी पता नहीं था क्या पता भविष्य में किसी दिन चम्बल अपनी राह बदल ले और बस्ती की तमाम रौशनियाँ बुझाते हुए उन्हें हमेशा हमेशा के लिए गाद के नीचे दफ्न कर दे ।


इस अनदेखे भविष्य के बारे में सोचते हुए हम लोग भी खामोश हो गए । उदासी अँधेरे की शह पाकर जंगल के निर्जन कोने से बाहर निकल आई और हम लोगों के निकट टीले पर फैलकर बैठ गई । रवीन्द्र ने मेरी ओर देखा  और कहा " यार यह ख़ामोशी आज बहुत उदास कर रही है, मेरा मन कोई उदास सा नगमा सुनने का होने लगा है ..चल यार,गाना सुना ना ।" मेरा मन गाने का नहीं था फिर भी भीतर एक लहर मचलने लगी..मैंने मुँह खोलकर भीतर ऑक्सीजन खींची और साथ ही ढेर सारी उदासी भी भर ली । हवा तो फेफड़ों में समा गई और उदासी दिमाग़ में । मैंने होंठ खोले.. एक आवाज़ निकली भीतर से ..मैं तो एक ख़्वाब हूँ ..इस ख़्वाब से तू प्यार न कर .. प्यार हो जाए तो फिर प्यार का इज़हार न कर .. । फिर मुझे पता नहीं कब यह गीत ख़त्म हुआ और दूसरा शुरू हो गया ..'ज़िन्दा हूँ इस तरह के गमे ज़िन्दगी नहीं जलता हुआ दिया हूँ मगर रोशनी नहीं '.दूसरा ख़त्म हुआ तो तीसरा फिर चौथा  जाने कितनी देर हम लोग बैठे रहे । मैं दोनों मित्रों को मुकेश के दर्द भरे नग़मे सुनाता रहा । 


अचानक ख्याल आया कि समय काफी हो गया है, अगर भाटीजी ने भोजनशाला बंद कर दी तो फिर हमें भूखे ही सोना पड़ेगा । उदासी तो एक बार बर्दाश्त कर ली जायेगी लेकिन भूख बर्दाश्त करना बहुत मुश्किल काम है । हम लोग उठे और लगभग दौड़ते हुए भोजनशाला तक आये । देखा तो भाटी जी सचमुच  भोजनशाला बंद करने की तैयारी में थे । हमारे अलावा सभी लोग खाना खाकर जा चुके थे । हमें गुस्सा आया अपने उन मित्रों पर जिन्होंने हमें ढूँढने तक की जहमत नहीं उठाई थी । ग़नीमत कि भाटी जी ने हम लोगों के लिए खाना बचाकर रखा था जिसे उनकी डांट के साथ हमें खाना पड़ा । खाना खाकर सीधे हम लोग तम्बू में आ गये और कपड़े बदलकर बिस्तर में घुस गये । खाने के बाद काफी उर्जा आ गई थी जिसने उदासी को स्थानापन्न कर दिया था ।


 “ हाँ रवींद्र तुम पूछ रहे थे ना कि इंसान ने पहला शब्दकोष कब बनाया ?" मैंने शाम  के संवादों की किताब से बुकमार्क हटाते हुए रवीन्द्र को याद दिलाई । रवींद्र उछलकर बैठ गया और उसने अशोक की ओर देखा । अशोक जाने किन ख्यालों में डूबा हुआ छत की ओर देख रहा था और ऐसा लग रहा था कि वह हम लोगों की बातों से पूरी तरह निर्लिप्त है । "लेकिन यह जानने से पूर्व हमें यह जानना भी तो ज़रूरी है कि शब्द और भाषा का उदय कैसे हुआ ।“ मैंने रवींद्र से कोई उत्तर न पाकर अपनी बात शुरू की “ हाँ यार अब तुम्ही बता दो कि कैसे हुआ ?“ अजय ने राममिलन भैया की और देखते हुए कहा …”वरना मैं फिर से वही जिन्न वाली भाषा बोलना शुरू कर दूँगा, क्यों पंडित जी बोलूँ क्या ?" उसने राममिलन भैया  से पूछा । राम मिलन भैया ने उसे धीरे से घुड़की दी तो वह हँसने लगा । 


मैंने मुस्कुराते हुए कहना शुरू किया  ” लोगों की एक बहुत बड़ी भ्रांति है कि इंसान ने बहुत पहले बोलना सीख लिया था । लेकिन सच्चाई यह है कि नियेंडरथल मानव की स्थिति तक पहुँचने पर भी उसके जबड़े की बनावट ऐसी नहीं हो पाई थी कि वह मनुष्य के समान शब्दों का उच्चारण कर सके । यह एक जैविक समस्या थी उसका माथा पीछे की ओर था और ठोड़ी न के बराबर थी जिसकी वज़ह से उसका जबड़ा बोलने के लिए समर्थ ही नहीं था ।“

 

“ यह तो तैने नई बात बताई …” रवींद्र अब तक अपने पुराने फॉर्म में वापस आ चुका था । “ लेकिन फिर वह आपस में संवाद किस तरह करता था ? प्रागैतिहासिक मानव की दृष्टि से तो यह काफी आगे की स्टेज है ।“ “हाँ वह बात तो करता था ।“ मैंने कहा …”लेकिन जुबान से नहीं बल्कि अपने पूरे शरीर से ।“ “तुम्हारा मतलब बॉडी लैन्गवेज से है ?“ अजय ने पूछा । “ बिलकुल …” मैंने कहा । “बोलने के लिए वह अपने हाथ, पैर, चेहरे की माँसपेशियों और कंधों का प्रयोग करता था । तुमने किसी पालतू जानवर मसलन गाय, बिल्ली या कुत्ते को देखा होगा । गाय को जब दुलार पाना होता है तब वह आपके करीब आकर गर्दन ऊँची कर देती है और हम उसे गर्दन के नीचे सहलाते हैं । इसी तरह कुत्ता भी अपना मुँह उठाता है अपना सिर आपकी गोद में रख देता है, पन्जे से विभिन्न संकेत करता है । बिल्ली को भी जब भूख लगती है तो आपकी गोद में आकर बैठ जाती है ।"


“ अरे ओ भाया..” किशोर भैया तम्बू की कपड़े की दीवार से चिपके हुए हमारी बातें ध्यान से सुन रहे थे । …”तू आदमी के बारे में बता रहा है कि जानवरों के बारे में ।“  "बता रहा हूँ भाई ।“ मैने किशोर भैया को शांत हो जाने का संकेत करते हुए कहा । “इस दौर का इंसान भी भाषा के मामले में पशु की तरह ही था । जैसे उसे कहना होता कि यह वस्तु मुझे दो, तो वह अपना हाथ फैला देता । खाने के लिए वह हाथ को मुँह तक ले जाकर संकेत देता । उसे जब प्यास लगती तो वह अंजुली से चुल्लू की आकृति बनाता इसलिए कि वह नदी से या झरने से इसी तरह पानी पीता था ।पानी पीने के लिए यह मुद्रा हम अब भी बनाते हैं । हालाँकि अब पानी पीने के लिए हम गिलास का उपयोग करने लगे हैं इसलिए प्यास का संकेत अंगूठे को मुँह से लगा कर देते हैं । जब वह कहना चाहता था कि इसे काटना है वह अपना एक हाथ हवा में हाथ ऊपर से नीचे की ओर लहराता । बादल के बारे में उसे कुछ कहना होता तो आसमान में दो मुठ्ठी तान देता, आग का इशारा करने के लिए हाथ को ऊपर की ओर लहराते हुए ले जाता ।“

 

“ अरे यह सब इशारे तो हम अब भी करते हैं ।“ किशोर ने कहा …” यह बात अलग है कि अब इसमे नये नये इशारे और जुड़ गए हैं जैसे आँख मारना, फ़्लाइंग किस करना वगैरह ।“ “क्या किशोर भैया…” अजय ने कहा "इतने बड़े हो गए हो लेकिन अपने ज़माने को भूले नहीं ..कितनी लड़कियों को आँख मारी है आपने?“ राममिलन धीरे धीरे मुस्कुरा रहे थे और किशोर के साथ अजय की छेड़खानी देखकर उसका आनंद ले रहे थे । धीरे से उन्होंने भी एक तीर छोड़ ही दिया “हमें  तो लगता है ई किसोरवा बचपनै से बदमास रहा है । “ किशोर भी कम नहीं थे उन्होंने राममिलन पर उलटा वार किया …” देखो पंडत, इलाहाबाद में तुम क्या क्या किए हो हमें  सब मालूम है । सुना है ऊ रामकली का बहुत मुजरा देखे हो गंगा के घाटवाली का …” मैं समझ गया कि अब केवल इलाहाबाद और उज्जैन की भाषा ही चलेगी, आदिम इंसान की भाषा पर चर्चा को यहीं विराम देना उचित होगा । राममिलन भैया रंग में आ गए थे और फिर उन्होंने अपने शहर इलाहाबाद के ढेर सारे किस्से सुनाये ।


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सुबह नाश्ते के उपरान्त जल्दी ही हम लोग ट्रेंच की ओर निकल गए । दोपहर में खाना खाने की छुट्टी में हम लोग भोजनशाला में आए तो अजय ने फिर कल का किस्सा छेड़ा … "भाई यह तो बताओ कि इंसान ने मुँह से बोलना कब शुरू किया ?“ “ अरे हाँ…कल वाली बात तो अधूरी ही रह गई थी । तो हम कहाँ थे ?" मैंने अजय से पूछा । अजय ने कहा “ रामकली के अड्डे पर । “ अरे नहीं यार उससे पहले कहाँ थे ?" मैंने फिर पूछा ।  “उससे पहले…” अजय कुछ याद करता हुआ बोला “ वह प्रागैतिहासिक मानव अपनी उंगलियों से इशारे करता था ।“  "हाँ “ मैंने कहा। "उसे बोलना तभी आया जब उसे हमारे तुम्हारे जैसा जबड़ा मिल गया । लेकिन शब्द तब भी उसके पास नहीं थे इसलिए वह गुर्राकर या चिल्लाकर अपनी बात प्रकट करता था । इसके बीच की एक कड़ी और है, अभिनय के माध्यम से संवाद । जैसे जिस जानवर के बारे में उसे बताना हो वह उसका अभिनय करके बताता । वह जीभ से ध्वनियाँ निकालने की कोशिश भी करता था और उसके हाथ इसमें उसकी सहायता करते थे । अंतत: जीभ विजयी रही और उसने शब्दों का उच्चारण करना सीख लिया । जीभ से निकली यह ध्वनियाँ क्रियाओं से बहुत मिलती थीं । “


“ समझ गया समझ गया ..” अजय ने यूरेका यूरेका जैसी स्टाइल में कहा “ बिलकुल जैसे हम कहते हैं,सन सन बहती हवा ,खन खन करते सिक्के , या चर्र चर्र करती चप्पल या टप टप बरसा पानी ,पानी में नहाये गोरी की जवानी ।…'"हाहाहा “ रवीन्द्र ने ज़ोर का ठहाका लगाया । सब लोग रवींद्र का मुँह देखने लगे । मैंने अपने माथे पर हाथ मारा “ क्या यार इतनी गम्भीर चर्चा चल रही है और तुम्हें  मस्ती सूझ रही है । “ रवींद्र बोला "यार तेरा कहना सही है लेकिन इतने अच्छे भोजन के बाद किसी गम्भीर विषय पर चर्चा करने की अब अपनी इच्छा नहीं है ।“

 

इच्छा तो खैर मेरी भी नहीं थी वैसे भी हम पुरातत्व कर्म के इतने अभ्यस्त नहीं हुए थे कि चलते फिरते ऐसे गंभीर विषयों पर बात करें सो हम लोग ट्रेंच पर जाकर अपने काम में लग गए और शाम तक काम में लगे रहे । शाम को काम खत्म कर हम लोग लौटे और घाट पर जाकर हाथ-मुँह धोने के पश्चात सिटी जाने के उद्देश्य से फिर तम्बू में आ गए । गाँव जाने के लिए तैयार होकर जब हम भोजनशाला के सामने से निकल रहे थे भाटी जी ने हमें देख लिया । भाटी जी को कल के हमारे समोसा सेवन सत्र के विषय में ज्ञात हो चुका था । उन्होंने कहा " देखो भाई वहाँ से केवल चाय पीकर लौटना कुछ अटर सटर मत खाना नहीं तो टाइम पर भूख नहीं लगेगी ।आज मैं तुम लोगों की राह नहीं देखने वाला । जल्दी आ जाना , आज डिनर के मेनू में बैंगन का स्वादिष्ट भरता है ।" कुछ भरते का आकर्षण और कुछ भाटीजी की कल की डांट का असर हमने उनकी बात स्वीकार कर ली । अजय ने वहाँ पड़ी हुई जलाऊ लकड़ी का एक टुकड़ा उठाया और कटघरे में खड़े रहने के अंदाज़ में कहा " मैं भोजन पकाने वाली इस लकड़ी पर हाथ रखकर कसम खाता हूँ कि वहाँ सिर्फ चाय लूँगा और चाय के सिवा कुछ नहीं लूँगा ।" भाटीजी हमारी बात से आश्वस्त हो चुके थे, उन्होंने मुस्कुराकर हमें जाने की इज़ाज़त दे दी । 


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  दंगवाड़ा से लौटकर हम लोग सीधे भोजनशाला में प्रवेश कर गए । भाटी जी हम लोगों की राह ही देख रहे थे । हमारे पहुँचते ही उन्होंने थालियाँ लगाईं और एक कटोरी में सरसों का तेल गर्म कर एक एक चम्मच तेल  बैंगन के भरते में डाल दिया । इस तरह भरते का स्वाद द्विगुणित हो गया । भोजन के पश्चात एक चक्कर हम लोगों ने शिवमंदिर का लगाया और लौटकर तम्बू में आ गए । कपड़े बदलकर हम लोग रजाई में घुस गए । मैंने रवीन्द्र से कहा .. " अब इच्छा जागृत हो गई हो तो आगे की बात सुनाऊं?" " अवश्य,अवश्य " रवीन्द्र ने कहा । 


मैंने वेताल की तरह रोज़ का अपना सवाल दोहराया " तो हम कहाँ पर थे ?" अजय ने फिर उसी शरारत वाले अंदाज़ में जवाब दिया " पानी में नहाती हुई गोरी की जवानी पर " "चुप ।" मैंने उसे आंखे दिखाते हुए कहा " तुझे यह सब फ़ालतू बातें याद रहती है और काम की बात भूल जाता है ।" अजय ने तुरंत अपने कान पकड़े । मैंने कहा " तेरी यह संकेत भाषा मेरी समझ में आ गई है, जा माफ़ किया । हाँ तो मैं बता रहा था कि इसी तरह वह मनुष्य भी ऐसे ही संकेतों द्वारा अपनी बात कहता था । अगर कोई हिंसक जानवर आ जाये तो उस जानवर की आवाज़ निकालकर खतरे का संकेत देता था । शिकार की संभावनाओं के बारे में बतलाने के लिए भी वह ऐसे ही संकेतों का प्रयोग करता था । फिर धीरे धीरे उसने ध्वनियों को शब्दों में ढाला और इस तरह भाषा का जन्म हुआ । यह एक लम्बी कहानी है । आज पुरातत्ववेत्ता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि उस विलुप्त भाषा की खोज कैसे की जाए, अब उत्खनन में मिली खोपड़ी तो कुछ बोलने से रही और भाषा की खोज के लिए उत्खनन के औज़ार भी नाकाफी हैं । ग़नीमत है कि हर भाषा ने अपने आदिम पूर्वजों के कुछ शब्द सहेज कर रखे हैं, हज़ारों पीढ़ियों का अनुभव किसी न किसी भाषा में होता हुआ ही हम तक पहुंचा है ।"


राममिलन भैया बहुत ध्यान से हमारी बातें सुन रहे थे अचानक उनका पांडित्य जाग गया और उन्होंने कहा "लेकिन भाई हमने तो सुना है कि वेदभाषा संस्कृत ही सबसे पहली भाषा है और सब भाषाओं  की जननी है । बहुत सारे विद्वान विदेश की भी अनेक भाषाओं  का मूल संस्कृत ही बताते है और कई शब्द भी उन्होंने बताये हैं जैसे संस्कृत का दुहित्र अंग्रेजी का डाटर हुई गवा और पितृ से फादर हो गया वही जर्मनी में पेटर हो गया तो संस्कृत मूल भाषा नहीं हुई ?" 


" भैया माफ़ करना " मैंने कहा "संस्कृत तो बहुत बाद की भाषा है, संस्कृत से पहले भी जिन लोगों की संस्कृति थी वे मूलतः अन्न का संग्रहण करने वाले, वनोपज पर जीविका उपार्जन करने वाले लोग थे, उनकी भाषा संस्कृत नहीं थी, उनकी अपनी अलग अलग बोलियाँ थीं । वे लोग जब उन्नत अवस्था में अथवा कृषि और पशुपालन की अवस्था में आये तब उनका रहन सहन और जीविका के तरीक़े भी बदले और भाषा भी बदली । उस समय भारत भी एक विशाल क्षेत्र था । योरोप के साथ मिली इस सभ्यता को हमारे यहाँ भारोपीय सभ्यता कहा जाता है सो यहाँ की भाषाओं में उन्हीं प्राचीन बोलियों का विकसित रूप हम देख सकते हैं । अनेक भाषाओं के साथ यह भी हुआ कि उनमें शामिल प्राचीन बोलियों के शब्द विलुप्त हो गए और उन्होंने नई शब्दावली गढ़ ली ।"


रवीन्द्र ने मेरी बात का समर्थन करते हुए कहा "अभी भी कहीं सुदूर अंचल में ऐसे कबीले मिलते हैं जिन्होंने उस आदिम मनुष्य की भाषा को सहेजकर रखा है । भाषा के शोधकर्ता इन्ही भाषाओं की तलाश में पूरी दुनिया में भटकते हैं, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका,रूस के शिकारी कबीलों में अब भी उनके पूर्वजों की भाषा के अवशेष विद्यमान हैं । यह अवश्य है कि उस समय जैसी स्थिति रही होगी उसीके अनुसार उनकी भाषा रही होगी जैसे कि जब व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा नहीं होगी तब ‘मेरा‘ जैसा भी कोई शब्द नहीं रहा होगा । यह भी कि उनके अधिकांश शब्द शिकार और भोजन से सम्बंधित रहे होंगे या उन्होंने अपने औजारों को कोई नाम दिया होगा ।“ 

 

“ बिलकुल सही । “ मैंने कहा ” लेकिन उस आदिम मनुष्य की भाषा अब हमारे पास नहीं है । मनुष्य जैसे जैसे दुनिया के अलग अलग भागों में बसता गया वह अपने लिए नई भाषा का अविष्कार करता गया ।“ “ तो क्या हमें कभी नहीं पता चल पायेगा कि वह आदिम मनुष्य किस भाषा का इस्तेमाल करता था ? “ अजय ने पूछा । “ मुश्किल तो है …” मैंने कहा । “ लेकिन भाषा के शोधकर्ता अपना काम कर रहे हैं । इस लुप्त भाषा की तलाश में वे सुदूर उत्तर व दक्षिण में यात्राएँ करते हैं ,आदिम कबीलों से मिलते हैं और ठीक पुरातत्ववेत्ता की तरह ही खोज करते हैं इस समाज की गहरी उपत्यकाओं में । लेकिन उनका काम औरों से कठिन होता है इसलिए  कि लुप्त भाषा का कोई भौतिक रूप नहीं होता । जाने कितनी सदियाँ बीत चुकी हैं, हर सदी के साथ शब्द बदल चुके हैं शब्दों के अर्थ बदल चुके हैं, ध्वनियाँ बदल चुकी हैं, उच्चारण बदल चुके हैं, क्रियाएँ बदल चुकी हैं, कर्ता बदल चुके हैं लेकिन पुरातत्ववेत्ता अभी चुके नहीं है , और न कभी चुकेंगे ।


“ वाह वाह …। ” रवींद्र ने कहा “ मुझे लगा जैसे तू कोई कविता पढ़ रहा है । सचमुच दिलचस्प है विलुप्त भाषा की यह खोज और कठिन भी । “ कठिन है इसीलिए तो पुरातत्ववेत्ता इस काम में लगा रहता है , वह चैलेंज स्वीकार करता है और हर कठिनाई से जूझते हुए अन्तिम सतह तक पहुँचता है ।" मैंने बात को विराम दिया और हम लोग अपने अपने बिस्तरों में घुसकर नींद को उसकी भाषा में आवाज़ देने लगे ।


*शरद कोकास*


40- क्या आकाश से देवता आग लेकर आए थे ?


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पिछले भाग में आपने आदिम मनुष्य की कला,गुफाओं में चट्टानों पर उसकी चित्रकारी और उसके आदिम विश्वास  और आदिम धर्म के बारे में पढ़ा । इस भाग में पढ़िए मनुष्य के आवास के बारे में और यह भी कि जले हुए मकान के अवशेष से पुरातत्ववेत्ता कैसे उसका चित्र प्रस्तुत कर देते हैं*

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*भाग 40*

*संभालकर रखना अपनी आग* 

" अच्छा, सबका नाश्ता हो गया कि नहीं ?" वाकणकर सर इतनी देर में लौटकर आ गए थे । "हाँ सर ।" हम लोगों ने समवेत स्वर में जवाब दिया ।  "तो फिर बैठे क्यों हो.. चलो सब लोग ट्रेंच पर, आज का काम नहीं शुरू करना है क्या ?" काम तो हमें शुरू करना ही था लेकिन सर से बातें करने में भी बहुत आनंद आ रहा था l हम लोग सर से उनकी वैश्विक खोज भीमबैठका के बारे में बातें करना चाहते थे लेकिन हमारे सीनियर्स ने बताया था कि सर उस पर ज़्यादा बातें किसी से करते नहीं हैं  । भीमबैठका की खोज कैसे हुई यह  कथा वैसे तो हम सब लोगों को मालूम ही थी लेकिन उसे डॉ.साहब के मुँह से सुनने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ था । उनकी पी. एच. डी. भी भीमबैठका पर ही थी, वह हम लोगों ने लायब्रेरी में देख रखी थी । मात्र सौ पन्नों की वह थीसिस थी वह  जबकि लोग इससे बड़े शोध प्रबंध लिखते थे । सुनते हैं कि  पहले उनकी थीसिस कम पन्नों की होने के कारण स्वीकृत नहीं हुई थी लेकिन उनकी खोज इतनी महत्वपूर्ण थी कि अंततः उन्हें पी एच डी अवार्ड करनी ही पड़ी । मैंने और रवीन्द्र ने आँखों आँखों में ही इशारा किया कि यह बात से से न पूछी जाए उसीमे बेहतरी है ।


 “ सर एक सवाल और …। “ रवींद्र ने कहा । मैं समझ गया वह सर से किसी नए टॉपिक पर कुछ पूछना चाहता है और सर की उपस्थिति को भुनाने का आज उसका पूरा इरादा है । “सर, उत्खनन में किसी आवास के अवशेषों में जब राख मिलती है तो कैसे पता चलता है कि वह राख चूल्हे की है या अग्निकांड की ?“ “ यह बढ़िया सवाल पूछा तुमने ।“ सर ने हम लोगों को उठने का इशारा करते हुए कहा .."चलो ट्रेंच की ओर चलते हुए बताता हूँ ।" हम लोगों ने अपनी कापियाँ उठाईं और सर के साथ हो लिए । सर ने चलते चलते अपनी बात जारी रखी .." चलो, तुम लोगों से एक सवाल पूछता हूँ , ठीक से जवाब देना । मान लो एक पुरातत्ववेत्ता को किसी उत्खनन में एक जले हुए आवास के चिन्ह मिलते हैं । अब सीन कुछ ऐसा है कि फर्श पर एक से अधिक गढ्ढे हैं और वे गढ्ढे राख़ और जले हुए कोयलों से भरे हुए हैं , उनके साथ सरकंडे के जले हुए टुकड़े भी हैं । कोयले की अनेक लम्बी काली धारियाँ एक बिंदु पर मिलती हुई दिखाई दे रही हैं और आवास के ठीक बीचोबीच सफेद राख की एक परत है । सफ़ेद राख़ की इस परत के नीचे नीचे जली हुई रेत की एक लाल परत है ।" 


सर की बात हम लोग ध्यान से सुन रहे थे । हो सकता है आगे पुरातत्व विभाग की नौकरी के किसी इंटरव्यू में हमसे ऐसा ही सवाल पूछा जाये । सर आगे कहने लगे "इस तरह इस अग्निकांड में सब कुछ अस्तव्यस्त सा है । अब इतने अवशेष देखकर एक सामान्य आदमी अन्दाज़ नहीं लगा सकता कि वास्तव में यहाँ क्या हुआ होगा । चलो तुम लोग अपना दिमाग़ लगाओ कि इस अग्निकांड में जला हुआ आवास किस प्रकार का रहा होगा ?" इतना कहकर सर चुप हो गए । हम लोग तो सर का सवाल भी ठीक से समझ नहीं पाए थे लेकिन जवाब तो देना ही था । 


" सर, इतना तो तय है कि उस झोपडी की छत सरकंडों से बनी हुई होगी और राख़ और कोयले से भरे जो गढ्ढे हैं वे उस मनुष्य का खाना पकाने का स्थान होगा । " अशोक ने अपना दिमाग़ लगाकर जवाब दिया । सर मुस्कुराये " भाटीजी को देख लो वे इस छत के नीचे एक ही जगह पर चूल्हा जलाते हैं या अलग अलग जगह पर और हम सबके घर में भी एक ही रसोई होती है ।" फिर हम लोगों के मायूस चेहरे देखकर उन्होंने कहा .."कोई बात नहीं मैं बताता हूँ । इस दृश्य को देखकर पुरातत्ववेत्ताओं ने यह अनुमान लगाया कि राख व कोयले से भरे गढ्ढे जहाँ हैं वहाँ छत को थामने वाली बल्लियाँ रही होंगी । बल्लियाँ गिर गईं और उनके गिरने से बने गड्ढों  में राख़ और कोयला जमा हो गया । जले हुए सरकंडों के टुकड़े यह बताते हैं कि छत सरकंडों  की बनी थी यह अशोक ने सही बताया । और फर्श पर दिखाई देने वाली काली लम्बी धारियाँ जली हुई बल्लियों के नीचे गिरने से बनी हैं ।"


"सर, वो मकान के बीचोबीच जो सफ़ेद राख़ है उसका क्या चक्कर है?" अजय से रहा नहीं जा रहा था । सर ने हम लोगों की ओर देखा और कहा "देखो इसको बड़ी जल्दी है, थोड़ा खुद दिमाग़ लगा कर बताओ ?" अजय ने पलकें झपकाईं और कहा "सर, यदि राख़ और कोयले वाली जगह पर चूल्हा नहीं था तो फिर इस सफ़ेद राख़ वाली जगह पर ज़रूर चूल्हा रहा होगा ।" इतना कहकर वह दो कदम पीछे हो गया । सर ने कहा .."अरे, वह चूल्हा जैसा दिखता ज़रूर है लेकिन वहाँ खाना नहीं पकाया जाता था । मैंने बताया ना कि वहाँ एकदम साफ़ और सफ़ेद राख़ है इसका मतलब यह है कि वहाँ केवल आग सम्भाल कर रखी जाती थी । अब उन्हें आग जलाना तो आता नहीं था इसलिए पेड़ों के घर्षण से जंगल में जो आग लगती थी उसे वे ले आते थे और लकड़ियाँ वगैरह डाल कर उसे एक निश्चित स्थान पर जलाये  रखते थे । ऐसा कई पीढ़ियों तक चलता रहता था । और इस स्थान पर सफ़ेद राख़ के नीचे जो जली हुई रेत की मोटी परत मिली है वह एक तरह से आग प्रज्वलित रखने के उस स्थल का बेस है ।" 


"तो सर फिर खाना कहाँ बनाते थे वे लोग ?" हम लोगों के भीतर उमड़ते सवाल को किशोर ने स्वर दिया । सर ने कहा " हाँ , यह बात मैंने तुम्हे नहीं बताई कि इस काली राख़ और सफ़ेद राख़ की जगह के अलावा उन्हें एक जगह और मिली थी जहाँ की राख मैली थी, खाना उस स्थान पर बनता था । इसलिए कि हड्डियाँ भी उसके पास पाई गईं  । अगर एक आवास में एक से ज़्यादा चूल्हे पाए जाते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि वह एक समूह या संयुक्त परिवार होता है या बहुत सारे परिवार भी एक साथ वहाँ रह सकते हैं । इसके अलावा बीच में जो खाली जगह है उसका उपयोग किसी समारोह या संस्कार के लिए होता है ।“ हम लोगों ने महसूस किया कि ट्रेंच पर पहुँचने से पूर्व ही आज की हमारी क्लास शुरू हो चुकी है ।


दोपहर आज कुछ गर्म थी । धूप में भी तेज़ी थी । लेकिन एक पुरातत्ववेत्ता के लिए गर्मी या धूप क्या मायने रखती है । हम लोगों ने ट्रेंच क्रमांक चार पर अपना काम आगे बढाया और उस सतह पर प्राप्त फ्लोर को थोड़ा और विस्तार दिया । लेकिन कुछ देर बाद ही वह फ्लोर समाप्त हो गई ..आगे केवल मिटटी थी । हम सतह के नीचे जो पूरा मकान मिलने की आशा कर रहे थे वह सचमुच मिटटी में मिल गई । हम लोगों ने चूल्हा भी ढूँढने की कोशिश की लेकिन न चूल्हा मिला न राख । शाम काम ख़त्म करने तक  हम लोग पसीने से भीग चुके थे । मैंने रवीन्द्र से कहा " मेरा तो यार नहाने का मन कर रहा है ।" रवीन्द्र हँसने लगा .."बावला मत बन, अभी अभी सर्दी कम हुई है, कहीं ठण्ड लग गई और सन्निपात हो गया तो तू भी सन्निपात के रोगी सिकंदर की तरह बड़बड़ाने लगेगा ।" मैंने कहा "भाई , कहाँ सिकंदर कहाँ अपन कलंदर ..हटाओ, नहीं नहाते, हाथ मुँह धोकर ही काम चला लेंगे । सो हाथ मुँह धोकर हम लोग फिर सिटी यानि दंगवाड़ा गाँव की ओर घूमने निकल गए ।


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आज दंगवाड़ा की गलियों में घूमते हुए हम रुक रुक कर मकानों की ओर देख रहे थे और उनमें  उस मकान के शिल्प को ढूँढने का प्रयास कर रहे थे जिसके बारे में सर ने आज हमें बताया था । हालाँकि वैसा घर मिलना अब असम्भव ही था । आज मनुष्य इतना विकास कर चुका है कि जिस आग को उसे जलाना नहीं आता था और उसे सहेजने के लिए घर के बीचोबीच एक बड़ी सी जगह की ज़रूरत होती थी, आज वही आग माचिस की एक छोटी सी डिब्बी में कैद हो कर उसकी जेब में आ गई है । छत पर सरकंडों की जगह अब कवेलू हैं यदयपि कहीं कहीं घासफूस के छत वाली झोपड़ियाँ अब भी दिख जाती हैं । हाँ, छत को थामे बल्लियाँ अब भी मौज़ूद हैं लेकिन दीवारों के आगे उनकी भूमिका गौण है ।


  सिटी से लौटकर जब हम लोग अपने तम्बू में आए तो अजय अपना पेट पकड़कर अजीब सी हरकतें करने लगा । हम लोगों ने आज दंगवाड़ा में चाय वाले की दुकान पर समोसे  भी खाये थे । हमें लगा उसने ज़्यादा समोसे खा लिए हैं जिन्हें हज़म करने में उसे कष्ट हो रहा है । “क्या हुआ अजय ?“ किशोर भैया ने एक अभिभावक की तरह सवाल किया । “कुछ नहीं भ्राताश्री…” अजय पेट पकड़े पकड़े बताने लगा …”आज सायंकाल से मानस के स्मृति भंडार में संरक्षित भार्या की स्मृति अवचेतन की विभिन्न सतहों को विखंडित करती हुई चेतना में स्थानापन्न हो रही थी फलस्वरूप भान न रहा और मैंने आवश्यकता से अधिक तैलीय खाद्य उदरस्थ कर लिया अत: आमाशय में अनेकानेक रासायनिक परिवर्तनों के साथ साथ मानस में अजीब अजीब आकृतियाँ उभर रही हैं ।“ 


हम लोग अजय की बदमाशी समझ रहे थे सो उसकी यह बात सुनकर कहकहे लगाने लगे । लेकिन राममिलन भैया अचानक गम्भीर हो गए । वे पहले उसके थोड़ा क़रीब गए, फिर छिटक कर दूर खड़े हो गए और शिकायत के लहज़े में कहने लगे…”मना किया था.. हमने मना किया था । परसों अमावस थी, इसको  मना किया था कि बड़ के उस पुराने पेड़ के नीचे पेशाब न करे लेकिन यह माना ही नहीं, अभी गाँव से लौटते हुए यह उसी पेड़ के नीचे से होता हुआ आया है .. पकड़ लिया न उस बरगद वाले जिन्न ने …होना ही था यह तो । अब इसको फुंकवाने ले जाना पड़ेगा । ” 


राममिलन भैया की बात पूरी होने से पहले ही अजय जोर से हँस दिया …” ऐसा कुछ नहीं हुआ है पंडित जी, जिन्न मुझे क्या पकड़ेगा मैं तो खुद जिन्न हूँ । दरअसल मैं तो शुद्ध हिन्दी बोलने का प्रयास कर रहा था ।“ राममिलन कुछ नाराज़ से लगे …”तो नाटक कर रहे थे ऐसा बोलो न .. अब हमका का मालूम ..हम सोचे कौनो भूत-प्रेत पकड़ लिया है और तुम उसी की भाषा बोल रहे हो । अब इतनी दुरूह और क्लिष्ट हिन्दी बोलोगे तो हमें ऐसा ही लगेगा ना । अब ऐसी भाषा भी किस काम की जिसके लिए डिक्शनरी लेकर बैठना पड़े । “ “डिक्शनरी नहीं पंडित जी शब्दकोष कहिए शब्दकोष ।“ अजय फिर खिलखिलाकर हँस पड़ा ।


“यार, इंसान ने पहली डिक्शनरी कब बनाई होगी ?“ अचानक रवींद्र ने सवाल किया । अशोक ने घूरकर उसे देखा और कहा …” तू भी ना यार रविन्दर …थारे  भीतर किसी मरे हुए आर्कियालॉजिस्ट का भूत घुस गया है, जब देखो तब, इंसान ने यह कब किया होगा, इंसान ने वह कब किया होगा यही पूछता रहता है । और कोई बात नहीं आवै है रे थारे दिमाग में ? “ रवींद्र खिसियानी सी हँसी हँसकर चुप हो गया । मैंने उसका पक्ष लेते हुए कहा …” तो क्या हो गया यार, यह सहज स्वाभाविक जिज्ञासा है, आखिर दुनिया भर के पुरातत्ववेत्ता भी तो इसी काम में लगे हैं, यह जानने में कि मनुष्य का जन्म कैसे हुआ, उसने घर बनाना कैसे सीखा, बोलना कैसे सीखा,भाषा कैसे आई और इस खोज में तब तक लगे रहेंगे जब तक मनुष्य का इतिहास पूरा नहीं हो जाता । हम लोग भी तो आगे जाकर यही करने वाले हैं ।“

 

“ रेन दे रेन दे …” अशोक ने हाथ मटकाते हुए कहा । मैं ये सब नहीं करने वाला, घर से दूर जंगल में पड़े रहो भूखे प्यासे, अन भाटा से अपना सर फोड़ो । और मनुष्य का इतिहास, वह कभी पूरा होने वाला नहीं, इसलिए कि जैसे ही कोई क्षण बीतता है वह जाकर इतिहास में जमा हो जाता है, रक्तबीज की तरह है यह, एक जगह खोज पूरी हुई नहीं कि दूसरी जगह खोज के लिए तैयार । यह तो इंसान का अपना इतिहास है इसलिए वह जी जान से लगा है । अपनी ही खोज कर रहा है । हम भी एक दिन मर खप जायेंगे और  यह बात इतिहास में कहीं शामिल भी नहीं होगी कि उज्जैन से कुछ उधमी छात्रों का दल वाकणकर गुरूजी के निर्देशन में चम्बल के किनारे दंगवाड़ा के इस टीले पर अपना सर फोड़ने आया था ।"


“ काश यह बात इतिहास में शामिल होती !“ अशोक की साधारण सी बात के पीछे छुपे निहितार्थ को समझते हुए मैंने कहा । “इसलिए कि इतिहास तो अब तक बड़े बड़े लोगों का ही लिखा गया है, राजा महाराजाओं का लिखा गया है । हम जैसे आम लोगों का इतिहास न कभी लिखा गया न कभी लिखा जाएगा । लेकिन तू चिंता मत कर मेरे यार अशोक, एक दिन मैं लिखूंगा कि अशोक के साथ हम पांच दोस्त चम्बल नदी के किनारे दंगवाड़ा नामक एक जगह पर पुरातात्विक उत्खनन के लिए गये थे और हमारे गुरूजी थे पद्मश्री डॉ.वी. एस वाकणकर ।“ इतने में मेरा ध्यान रवींद्र की ओर गया । वह अब तक उदास था और शून्य में ताक रहा था । मैंने रवीन्द्र और अशोक के कंधे पर हाथ रखा और कहा " चलो यारों, टीले तक एक चक्कर लगा कर आते हैं, चम्बल के किनारे चतुर्थी के चाँद को ढूंढेंगे .. खाना आज देर से खायेंगे, पेट में अभी समोसा उछल-कूद मचा  रहा है ।


*शरद कोकास*


39-लेकिन पशु से मनुष्य की संतान कैसे हो सकती है ?


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा- पिछले भाग में आपने आदिम मनुष्य के आवास के बारे में पढ़ा ।आज वाकणकर सर उपलब्ध हैं उनका होना छात्रों के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है वे जिस तरह चीज़ों को आसान करके बताते हैं वैसा कोई नहीं बता सकता आज वे बता रहे हैं आदिम मनुष्य की कला,गुफाओं में चट्टानों पर उसकी चित्रकारी एवं उसके आदिम विश्वास और आदिम धर्म के बारे में यह महत्वपूर्ण जानकारी आपके काम आयेगी*

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*भाग 39*

*चट्टान की मुंडेर पर एक चिड़िया*

चम्बल के किनारे पीपल के पेड़ पर बने चिड़िया के उस घोंसले को मैं रोज़ ही देखता था और अपने घर को याद करता था । लेकिन न मुझे उस घोंसले में चिड़िया दिखाई देती थी न उसके बच्चे । मैं सोचता था शायद उसके बच्चे बड़े हो गए हों और दाने-पानी की खोज में कहीं उड़ गए हों और फिर वह चिड़िया भी खुद का पेट भरने के लिए कहीं चली गई हो । आज अचानक मुझे वह चिड़िया दिखाई दे गई । उसकी आँखों में उदासी थी । उसे देखकर मुझे माँ की याद आने लगी ।

मैंने रवीन्द्र से कहा "देखो वह चिड़िया कितनी उदास है ।" रवीन्द्र इतने दिनों तक मेरे साथ रहकर मेरी भाषा समझने लगा था । उसने कहा "हाँ, उदास तो होगी ही उसके बच्चे जो अपना घर छोड़कर चले गए हैं ।" "हम भी इसी तरह एक दिन नौकरी करने के लिए अपना घर छोड़कर चले जायेंगे तब हमारी माँ भी इसी तरह उदास रहा करेगी ।" 

मैंने कहा । रवीन्द्र बोला "हाँ यही जीवन का सच है । अब मुझे भी भानपुरा में तो नौकरी मिलने से रही.. क्या पता मुझे किस शहर में जाना पड़े ।" "ठीक है यार ।" मैंने कहा " हम कोशिश करेंगे कि एक ही शहर में रहें और अपने सुख दुःख बाँटें ।"

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घर परिवार की बातें करते हुए हम लोग घाट से कैम्प वापस आ गए । भाटी जी की भोजनशाला से मसालों की खुशबू आ रही थी । कपड़े बदलकर हम लोग तैयार हो गए और भोजनशाला में पहुँच गए । मालवा की विशेष शैली में सौंफ डालकर बनाया हुआ गरमा गरम पोहा एक बर्तन में रखा हुआ था । हम लोगों ने अपनी अपनी प्लेट में पोहा लिया और स्वाद का आनन्द लेने लगे ।

 इतने में वाकणकर सर का प्रवेश हुआ । हमने उन्हें अभिवादन किया । उन्होंने जवाब देते हुए कहा "क्या बात है दुष्टों ,तुम लोग आजकल रात में जल्दी सोते नहीं हो , क्या करते रहते हो ? “ 

“कुछ नहीं सर ।” मैंने कहा “ बस बातें करते रहते हैं ।" इससे पहले कि वे पूछें क्या बातें करते रहते हो, मैंने खुद ही बता दिया … “सर कल हम लोग गुफा में रहने वाले मानव के बारे में बातें कर रहे थे ।“ 

मेरे प्रश्न के तारतम्य में रवींद्र ने भी तपाक से पूछ लिया …” सर, यह प्रागैतिहासिक मानव गुफा में चित्र किसलिए बनाता था ? “ हम लोग यह अवसर खोना नहीं चाहते थे आख़िर हम विश्वप्रसिद्ध भीमबैठका की गुफाओं में शैलचित्रों के खोजकर्ता डॉ.वि.श्री.वाकणकर से मुखातिब थे l

डॉ वाकणकर ने अपने चश्मे के ऊपर से हमें देखा …"क्यों, यह सवाल तो तुम लोगों के कोर्स में है ना ? पढ़ा नहीं क्या ?“ हमें नहीं पता था कि इस तरह हम अपनी पोल खुद ही खोल देंगे । हम सभी चुप हो गए । मैंने धीमे स्वर में कहा .."सर पढ़ा तो है लेकिन आपसे थोड़ा और समझना चाहते हैं ।" सर मुस्कुराये फिर हँस कर कहा .."कोई बात नहीं.. परीक्षा देने लायक तो पढ़ ही लेना ।“ हमें लगा वे अब शायद ही कुछ बतायें । 

सर ने अपनी प्लेट में पोहा लिया और एक चम्मच पोहा मुँह में डालते हुए कहा …” मानव की गुफाओं में चित्रकारी वस्तुतः उसका प्रकृति के प्रति एक अनुष्ठान था । इन चित्रों में उसका जीवन दर्शन था । तुम लोगों ने देखा होगा प्राचीन गुफ़ाओं में बहुत से ऐसे चित्र मिले हैं, किसीमें कोई आदमी जानवर का मुखौटा पहने हुए है, दैत्य की तरह उसका सिर लगता है.. सींगवाला, किसी में उसकी दुम है, यह बाइसन की खाल ओढ़े आदमी का चित्र है ।"

पोहा चबाते हुए हम लोगों का मुँह चल रहा था लेकिन ध्यान सर की ओर ही था । उन्होंने कहना जारी रखा "उस समय होता यह था कि मनुष्य शिकार करता था और उसे ज़्यादा से ज़्यादा शिकार मिले इसके लिए इन चित्रों द्वारा अनुष्ठान करता था । जैसे शिकार पर जाने से पहले दीवार पर वे हिरण का चित्र बनाते थे और अपने भाले की नोक से उसका स्पर्श करते थे । इसका अर्थ यह होता था कि उनका शिकार सफल हो । 

कई बार वे उस जानवर का चित्र बनाकर उसे धन्यवाद भी देते थे कि वह उनका आहार बना । इसी तरह वे मारे गए बाइसन, हिरन या रीछ को लाकर उसके पास भोजन से भरा बर्तन रखते थे और सिर से पूँछ तक उसका स्पर्श करते थे । बस यही सब अनुष्ठान,उनकी शिकार कथा,उनके उत्सव आदि इन दीवारों पर चित्रित हैं । और ऐसा वे सहज रूप से करते थे, कहीं कोई नियम नहीं था । यह समझ लो कि उन्होंने अपना पूरा जीवन ही चित्रित कर दिया है गुफा की दीवारों पर । “

“सर, लेकिन इन सभी चित्रों के अर्थ तो अलग अलग होंगे और प्रयोजन भी ? “ मैंने सर से सवाल किया । 

“बिलकुल“ सर ने कहा “हर चित्र का प्रयोजन अलग अलग है । यह पूरी चित्रकला शिकार और उसकी संग्रहण वृति से ही सम्बंधित है । वह जिन जीव जंतुओं का शिकार करता था अथवा जिन फलों का भक्षण करता था उनके चित्र गुफाओं में बनाता था । यह पशु और पेड़ उसके टोटेम या गण चिन्ह थे, उसका जीवन इन्ही पर निर्भर था । जब तक यह प्रचुर मात्रा में मिलते थे यह उनका भक्षण करता था तथा उनकी कमी होने पर उनके भक्षण का निषेध करता था । अभी भी अनेक आदिवासियों में यह प्रथा चली आ रही है कि कुछ जीवों अथवा वनस्पतियों को खाना उनके यहाँ निषिद्ध है ।"

अचानक वाकणकर सर रुके और भाटीजी की ओर देखकर उन्होंने कहा "भाटीजी, पोहा तो कईं ज़ोरदार बन्यो हे ,थोड़ा नमकीन ओर देना ।" फ़िर वे हमसे मुख़ातिब हुए "कई आदिवासी अपने आप को उन पशुओं अथवा वनस्पतियों का वंशज भी मानते हैं । उनका यह अदम्य विश्वास है कि उनके पूर्वज किसी पेड़ से या किसी पशु से पैदा हुए हैं । यह पेड़ अथवा पशु ही उनके गणचिन्ह होते हैं । उन पेड़ों के फल खाना अथवा उन पशुओं का मांस खाना उनके यहाँ निषिद्ध है । 

इसके विपरीत कुछ आदिवासियों में उनके टोटेम पशु का मांस प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है । रूस के क्विचुआन कबीले में शिकारी मरने के बाद हिरन की टांगे पूर्व दिशा में रखते हैं, उसके सिर के पास कुछ भोजन रख देते हैं फिर उसके पास जाकर उसे धन्यवाद देते हैं, उसे सहलाते हैं इसलिए कि उसने उन्हें उसे शिकार के रूप में भोजन दिया ।"

"सर जी यह तो हमारे धरम में भी होता है " राममिलन भैया सर की यह बात सुनकर खुश हो गए हमारे यहाँ भी परसाद को पहले भगवान के पास रखा जाता है फिर उसे खाया जाता है ।" 

सर ने राममिलन की पीठ पर हाथ रखा "बिलकुल, यह आदिम परंपरा ही है । मैं तुम्हें रूस के साइबेरिया के आदिवासियों का उदाहरण देता हूँ ।" वाकणकर सर पानी पीने के लिए कुछ देर रुके .."वे लोग रीछ का शिकार करते हैं । रीछ को मारकर घर में लाया जाता है, फिर उसे एक ऊँचे स्थान पर रख दिया जाता है, फिर आटे या पेड़ की छाल से बनी बारहसिंघे की आकृतियाँ उसके पास रख दी जाती हैं उसकी आँखों पर वे सिक्के रख देते हैं । अपने यहाँ नहीं कैसे भगवान को प्रसाद चढ़ाते हैं, यह उनका अपने टोटेम देवता को चढ़ावा होता है । फिर हर शिकारी उस रीछ के पास जाता है और उसके थूथन को स्पर्श करता है । फिर उनका नृत्य उत्सव शुरू होता है और कई दिनों तक चलता है अंत में वे उसका मांस भक्षण करते हैं लेकिन आश्चर्य यह कि उसका सर और अगले पंजों को नहीं खाया जाता ।“

“हाँ सर, यह तो विचित्र बात है ..सर और पंजों को क्यों छोड़ दिया जाता है ? और यह भी समझ में नहीं आया कि इतने दिनों में मांस ख़राब नहीं होता था ?” अजय का मासूम सा सवाल । 

“ अरे मूरख, मैं सायबेरिया के ठन्डे प्रदेशों की आदिवासी परंपरा की बात कर रहा हूँ, अपने झाबुआ के आदिवासियों की नहीं , वैसे भी इतनी अक्ल तो होती ही है उनमें कि मांस ख़राब होने से पहले उसका भक्षण कर लें । रही बात सिर और अगले पंजे न खाने की तो पशु के यह अंग ही उनके टोटेम देवता होते हैं । 

कई आदिवासी कबीलों में जानवर की जीभ नहीं खाई जाती तो कहीं उनके कान नहीं खाए जाते हैं क्योंकि वे लोग अपने कबीले के लोगों को उनके टोटेम पशु के उसी अंग से उत्पन्न मानते हैं । अनेक स्थानों पर यह भी माना जाता है कि उनके क़बीले की किसी आदिम स्त्री का सम्बन्ध उस पशु से हुआ होगा और वे सब उसीकी संताने हैं । यह सब उसके बाद हुआ होगा जब मनुष्य ने स्त्री को उनकी संतान को जन्म देते हुए देखा होगा ।"

"सर, पशु से मनुष्य की संतान कैसे हो सकती है ?" मेरे भीतर के तर्कशील छात्र ने सवाल किया । सर थोड़ा सा मुस्कुराये .."भाई, उस समय विज्ञान की उन्नति आज के समान थोड़े ही हुई थी । उन्हें यह भी नहीं पता था कि किसी इंसान या प्राणी का जन्म कैसे होता है । 

वे यही समझते थे कि हवाओं के, पानी के या किसी पशु के संसर्ग से मनुष्य जन्म लेता है । इसलिए उन्हें लगता था कि उनके पूर्वज भी ऐसे ही पैदा हुए होंगे । सो वे ऐसे पशुओं को अपना पूर्वज मानते थे । अपने यहाँ नहीं पुराणों में कथा है किसी का जन्म फल खाने से हुआ किसी का नाग से हुआ बस ऐसे ही ।

“सर, लेकिन गुफाओं में जो बायसन या हिरन की खाल पहने मनुष्यों के चित्र पाए जाते हैं उसका क्या अर्थ है ?" अबकी बार सवाल पूछने की बारी अशोक की थी । 

“ बिलकुल सही सवाल है । “ सर ने कहा “ यह मनुष्य अपने उस टोटेम देवता या उस पशु के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करने के लिए उसकी खाल या उसके सींग पहनता था । हम आज भी विश्व के विभिन्न आदिवासी समूहों में प्रचलित नृत्यों में यह देखते हैं कि वे लोग जानवरों के मुखौटे, उनके सींग और उनसे सम्बंधित अन्य वस्तुएं पहनकर नृत्य करते हैं । 

“ हाँ सर मैंने कहीं पढ़ा था ।“ अशोक ने कहा “आदिवासी नृत्य में बाइसन की खाल पहनकर और सींग वाला उसका मुखौटा पहनकर नृत्य कर रहे हैं उनके हाथों में धनुष बाण और भाले हैं , एक आदिवासी बायसन बना है, वह नाचते हुए गिरने का अभिनय करता है , उस पर सब भाला तान देते हैं और बाण छोड़ते हैं । फिर सब उसे घसीटकर घेरे से बाहर कर दते हैं और नृत्य जारी रहता है । “

“हाँ ,सही कह रहे हो तुम ।“ सर ने कहा “ ठीक इसी दृश्य के चित्र गुफाओं में मिले हैं जिनमें लाल काले रंग से बायसन चित्रित है ,उसके शरीर पर तीर धसे हुए हैं ।" 

“सर, लेकिन मैंने सुना था इसका सम्बन्ध जादू - टोने से भी है ?" अशोक ने पूछा । 

“ हाँ ।“ सर ने कहा “वैसे पूरी तरह तो ऐसा नहीं है ..फिर भी उन दिनों मनुष्य चमत्कारिक शक्तियों में तो विश्वास करता ही था । गुफा में बने नृत्य के चित्रों से यह अनुमान लगाया गया है कि कोइ ओझा जैसा व्यक्ति होता था जो शिकार के लिए अनुष्ठान करता था । यह कुछ कुछ उस शिकार को वश में करने जैसा भी था, हो सकता है, ऐसा उनका सोचना हो कि इस तरह से शिकार उनके वश में होकर उनकी ओर खिंचा चला आएगा । आज हम इन बातों को बहुत ही बेतुका मानते हैं लेकिन उस मनुष्य की जीवन पद्धति में यह शामिल था । अभी भी अनेक आदिवासी समाजों में यह प्रथाएँ प्रचलित हैं l" इतना कहकर सर उठे और किसी काम से बाहर निकल गए ।

रवीन्द्र ने मुझसे कहा "कितना सुंदर दृश्य होता होगा आदिम मनुष्य की इस कलावीथिका में । कुछ लोग पेड़ की जड़ों और पत्तों से रंग तैयार कर रहे हैं, कुछ लोग रंग बिरंगी चट्टानों को पीसकर उनसे रंग तैयार कर रहे हैं ,हरी टहनियों की नोक कुचलकर उन्होंने अपनी कूचियाँ बनाई हैं फिर वे पूरी तल्लीनता से इन रंगों और अपनी कूचियों के माध्यम से अपने जीवन को इन चट्टानों पर उतार रहे हैं । 

एक चित्र में कमर में हाथ डाले कितने लोग नृत्य कर रहे हैं, एक कोई ढोल जैसा कुछ बजा रहा है । दूसरे चित्र में जंगल की ओर भागता यह हिरणों का झुण्ड है । तीसरे चित्र में आसमान में उड़ती चिड़िया एक चिड़िया चट्टान की मुंडेर पर आकर बैठ गई है और अपने ही चित्र को निहार रही है जैसे वह उसका आईना हो । इतने में एक हिरण वहाँ आकर ठहर गया है और अपने ही किसी भाई की देह में धंसे भाले का चित्र देखकर उसकी आँख की कोर में एक आँसू आकर ठहर गया है । "

"यार रवींद्र .. लगता है तुझ पर भी इस कवि का असर हो गया है और तू भी कविता करने लगा है ।" अजय ने आँखे फाड़कर रवींद्र की ओर देखते हुए कहा । रवींद्र ने भी उसी तरह आँखे फाड़ी और अजय से कहा " ऐसा क्या , मुझे तो मालूम ही नहीं था कि यह कविता है ।"


*शरद कोकास*