शनिवार, 30 मई 2026

26.ताज़ा जन्मे बच्चे की तरह होते हैं ज़मीन से निकले अवशेष


📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼


पूर्वकथा-अब यात्रा आगे बढ़ती है । छात्र इंदौर पहुँच चुके हैं ।आपने पढ़ा कि विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययन शाला के स्नातकोत्तर कक्षा के कुछ छात्र दंगवाड़ा नामक स्थान पर उत्खनन हेतु पहुंचे हैं । शिविर में आये उन्हें ग्यारह दिन हो चुके हैं । इन दिनों में उन्होंने उत्खनन सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करने के अलावा अपने सर डॉ वि श्री वाकणकर और डॉ आर्य से और भी बहुत सारी जानकारी प्राप्त की है । 

इन छात्रों के रोचक किस्सों के साथ साथ विश्व इतिहास की कुछ प्रमुख घटनाओं के बारे में और मिस्त्र ,यूनान के किस्से तो आप पढ़ ही चुके हैं। पिछले भाग से शुरू हो चुका है डायरी के भीतर डायरी के शिल्प में एक यात्रा वृतांत जो इन छात्रों के शैक्षणिक टूर से सम्बंधित है । इस यात्रा वृतांत में आपको बहुत रोचक अंदाज़ में भारत के कुछ ऐतिहासिक स्थलों के बारे में जानकारी मिलेगी और आप इन छात्रों के साथ साथ यात्रा का आनंद भी ले सकेंगे ।*

 📒📒📒📒📒

भाग 26

पूड़ी भंडार का किस्सा 

    प्राचीन भारतीय इतिहास,संस्कृति एवं पुरातत्व के छात्रों के इस शैक्षणिक टूर में हमारी क्लास के कुछ दक्षिण भारतीय मित्र भी हमारे साथ थे जो हॉस्टल में रहते थे  । हमने देखा इस बीच बहुत से छात्रों ने अपने बैग़ से खाने के पैकेट निकाल लिए हैं  । यह सभी छात्र मेस से पूड़ियाँ बन्धवा कर ले आए  थे । उन्होंने हम शहरवासियों को पूड़ियाँ ऑफर भी की लेकिन हम ठहरे जन्मजात स्वाभिमानी । हमने इंकार कर दिया । 

    वैसे भी इन्दौर शहर में आएँ  और वहाँ के सुस्वादु भोजन और खाद्य सामग्री का आनन्द न लें ऐसा कैसे हो सकता था । फिर हमारी हालत तो जनम जनम के भूखों की तरह हो रही थी  सो हमने जैन सर से इज़ाज़त ली और एक पूड़ी भंडार पर धावा बोल दिया । 

    पूड़ी भण्डार के काउंटर पर एक सुन्दर सी लड़की थी । उससे हमने पूछा " पूड़ियाँ क्या भाव हैं ? " उसने कहा छह रुपये किलो साथ में सब्ज़ी फ्री । हमने किलो के भाव से पूड़ियाँ खरीदीं और आलू की गर्मागर्म रसेदार सब्ज़ी के साथ उन्हें  आमाशय तक पहुँचने का मार्ग दिखाया और भूख के खिलाफ़ हो रही नारेबाज़ी बंद करवाई ।

मैं बहुत तल्लीन होकर डायरी पढ़ रहा था कि अचानक अजय ने एक कहकहा लगाया । “ क्या हुआ ?” मैंने गुस्से से उसकी ओर देखा …” इसमें हँसने की क्या बात है ? आमाशय ही तो लिखा है ।“ अजय हँसते हँसते बोला .. “ वो तो बेटा तुम लोग उस दुकानवाली के चक्कर में थे, और उसे इम्प्रेस करने के लिए बेहिसाब पूड़ियाँ उदरस्थ करते जा रहे थे हमें सब पता चल गया था । 

“ ठीक है, ठीक है । “ मैंने झेंपते हुए कहा “दुकानवाली के चक्कर की क्या बात है अब भूख ही इतनी तेज़ थी तो क्या करते ..लो आगे भी तो सुनो ।" और मैंने आगे की डायरी पढ़ना शुरू कर दी । इंदौर पहुँचने पर हमें ज्ञात हुआ कि इस बार टूर में मध्यप्रदेश के भूतपूर्व पुरातत्व निदेशक डॉ. एच.वी. त्रिवेदी भी हम लोगों के साथ यात्रा पर चलेंगे  सो उन्हें लेने के लिए हम लोग उनके घर पहुंचे  । 

बहुत खूबसूरत घर था डॉ.त्रिवेदी का । वैसे भी एक पुरातत्ववेत्ता का घर देखने का अपना अलग आनंद होता है । ड्राइंग रूम में कुछ बेहतरीन पेंटिंग्स और प्राचीन प्रतिमाओं के इमिटेशन शिल्प सजावट को एक नया आयाम दे रहे थे । हम लोग जब पहुँचे सर भोजन कर रहे थे । उन्हें साथ लेकर रात लगभग दस बजे हमारी बस इंदौर से रवाना हुई । 

    इंदौर के बाद हमारा अगला गंतव्य जलगाँव था । सबके पेट भरे हुए थे  । उदर की मांग पूर्ण हो चुकी थी और  मस्तिष्क ने अपनी माँग का प्रदर्शन प्रारंभ कर दिया था । मैंने नींद लेने की कोशिश की लेकिन बस ड्राइवर के ‘ स्टियरिंग कन्ट्रोल ‘ और बस के ‘ रॉक एण्ड रोल ‘ के बीच नींद ने भी न आने की कसम खा ली थी । यदि कुछ आसार नज़र भी आते तो पिछली सीट हमें छत की ओर उछाल कर बार बार अपना विरोध दर्ज कराने लगती । इस तरह थोड़ी बहुत झपकी के साथ सारी रात इसी उछल कूद में बीत गई । 

    उस दिन हमें  समझ में आया कि बस की लम्बी यात्रा में लोग आगे की सीटों की मांग क्यों करते हैं ।

सुबह सुबह लगभग साढ़े तीन बजे हम लोगों की बस महाराष्ट्र के जलगाँव बस अड्डे पर जा पहुँची । जैन साहब ने एक अच्छे अभिभावक की तरह प्रस्ताव रखा कि होटल वगैरह ढूँढने में समय बरबाद करने से बेहतर है प्लेटफॉर्म पर ही बिस्तर लगा कर एक - दो घन्टे की नींद ले ली जाए । इस प्रस्ताव का विरोध करने की न किसी में हिम्मत थी और न इच्छा । हालाँकि दबी ज़ुबान से कुछ लोगों ने होटल - लॉज जैसे शब्द भी कहे । 

    वैसे यह बात सर्वविदित थी कि कुछ देर पश्चात हमें अजन्ता के लिए प्रस्थान करना था और वापसी में औरंगाबाद लौटना था जहाँ पहले से हमारा निवास तय था सो लॉज में कमरा लेने का कोई औचित्य भी  नहीं था । इस बीच महेश अपना बेडिंग बस से उतार लाया था और इससे पहले कि  अन्य लोग किसी फैसले पर पहुँचें हम दोनों एक कोने में बिस्तर लगाकर नींद से दोस्ती करने की ठान चुके थे । प्लेटफ़ॉर्म भी हमारे मध्यप्रदेश के बस स्थानकों के प्लेटफ़ॉर्म की तुलना में काफी साफ सुथरा नज़र आ रहा था हालाँकि इतना ध्यान देने लायक धैर्य और शक्ति हम में नहीं थी । 

सुबह सुबह बसों की घरघराहट और खोमचे वालों की कर्कश आवाज़ों से हमारी नींद खुली । जिस तरह हिन्दी फिल्मों में लम्बी बेहोशी से जागने के बाद नायक सवाल करता है ...” मैं कहाँ हूँ ? “ 

    कुछ इसी तरह का हाल हमारा भी था । देखा कि आसपास सफाई करने वाले कुछ भाई लोग हाथों में झाड़ू- पोछा लिए खड़े हैं । हमारे आसपास के क्षेत्र की सफाई हो चुकी थी, बस हम दोनों वहाँ हमारे बिस्तर से चिपके हुए ख़ाली रैपरों और बीड़ी सिगरेट के ख़ाली खोकों के साथ सहअस्तित्व बनाए पड़े हुए थे । 

    नींद से बोझिल पलकें, सूखे होंठ, बिखरे बाल लिए मैले कपड़ों में हम लोग, सुबह सुबह अपने घरों से फ्रेश होकर आए मुसाफिरों के बीच भिखमंगों  की तरह लग रहे थे  । हमने तुरंत उन लोगों का संकेत समझा और फटाफट उठकर अपना बिस्तर लपेटकर एक बेंच पर रख दिया । 

पता चला कि इस बीच अन्य लोग भी जाग चुके है और नाश्ते की दुकान पर पहुँच चुके हैं । हम लोगों ने तकाज़ा किया कि आप लोगों ने हमें  क्यों नहीं जगाया तो हमारे मित्र मुरलीधर रेड्डी ने ने टका सा जवाब दिया “ देर तक सोने की आदत वालों को सुबह सुबह नींद से जगाकर गाली खाने का किसे शौक है ।“ 


    बहरहाल हम लोग जल्दी जल्दी बस स्टैन्ड के साफ-सुथरे सुलभ शौचालय में जाकर प्रात:क्रियाओं से निवृत हुए और एक दुकान पर जाकर महाराष्ट्र का विशेष नाश्ता आलू पोहा चने की गर्मागर्म मिसल के साथ भर पेट  खाया । हमारा अगला पड़ाव था अजंता ।“ 


“ बस कर भाई अब अजंता की सैर के लिए कल जाएँगे । “ अजय ने जमुहाई लेते हुए कहा । “ आज के लिए इतना काफी है । “ रवीन्द्र को इस यात्रा वृतांत में मज़ा आ रहा था सो कहने लगा “ अभी कहाँ ज़्यादा रात हुई है यार । “ फिर उसने सबके उनींदे चेहरों की ओर देखा और कहा ...” ठीक है , जैसी पंचों की राय । “ फिर धीरे से मुझसे कहा ...” लेकिन यार अब तू वो सुना जो तैने यहाँ नहीं लिखा है । “ मैंने कहा “ ठीक है ,चलो लेटे लेटे बात करते हैं ।“  

अगली सुबह 

सुबह आर्य साहब ने पूछा  “ क्या बात है कल तुम लोग काफी देर तक जागते रहे ? “ रवीन्द्र ने कहा “ हाँ सर, कल शरद अपनी टूर डायरी पढ़कर सुना रहा था … अजंता एलोरा वाले टूर की । “ “ अरे वा ! “ आर्य सर ने कहा “ यह तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन तुम लोग भी तो गए थे ना अजन्ता ? “ हाँ “ रवीन्द्र बोला “ लेकिन शरद की ज़ुबानी उस यात्रा का वर्णन सुनना बहुत मज़ेदार है । हम लोग तो केवल पुरातत्व के छात्र हैं लेकिन यह कवि भी है ना, जो चीज़ें हम नहीं देख पाते वह सब यह देख लेता है । जहाँ न पहुँचे रवि ... “ 

    “ बस बस ..बहुत पुराना हो गया । “ मैंने उसे चुप कराते हुए कहा । फिर रोज़ की तरह हम लोग उत्खनन कार्य में लग गए । ट्रेंच से कुछ न कुछ नए अवशेष रोज़ ही निकल रहे थे  और हमारे ज्ञान में निरंतर वृद्धि होती जा रही थी । आज का दिन कल की अपेक्षा कुछ गर्म था और हवाएँ कुछ इस तरह थमी हुई थीं मानो किसी ने उन्हें बाँहों में थाम लिया हो । ऐसा लग रहा है कि शीत ऋतु अब अपने दायित्व का निर्वाह कर प्रस्थान करने वाली है । 

शाम काफी देर तक काम करते रहे हम लोग । अवशेषों को साफ़ कर उन्हें सीलबंद कर संरक्षित करने का कार्य उस दिन हम ठीक से नहीं सीख पाये थे । डॉ.वाकणकर ने आज हम सब लोगों को अलग अलग मनके,सिक्के, पॉटरी आदि दिए और उन्हें साफ़ करना सिखाया । 

    अवशेष को साफ़ करना बहुत महत्वपूर्ण काम है । इसके लिए छोटे बड़े अनेक प्रकार के ब्रशों, ब्लोअर और सुइयों का उपयोग किया जाता है । हम आम वस्तुओं की तरह साबुन या पानी से उनकी सफाई नहीं कर सकते इसलिए कि इनकी रासायनिक क्रियाओं द्वारा उनके स्वरूप में परिवर्तन हो सकता है । पानी से धोने में भी इस बात का ख़तरा रहता है कि इनमे यदि कोई हिस्सा पानी में घुलनशील हो तो वह नष्ट हो जाता है ।

सर ने बताया कि "सफाई करते समय इस बात का ध्यान रखना सबसे अधिक ज़रूरी होता है कि किसी प्रकार के आघात से उनके किसी हिस्से की टूट-फूट न हो । सफाई करने वाले ब्रश का दबाव कितना हो उसे किस एंगल से घुमाया जाए इसका भी ध्यान रखना होता है । हालाँकि इस तरह से सफ़ाई में बहुत समय लगता है कभी कभी तो एक मुहर को साफ़ करने में दो-तीन दिन तक लग जाते हैं ।" जब हम पॉटरीज़ को साफ़ कर रहे थे तो हमने देखा कि उनमे कुछ ऐसी भी हैं जो साबुत नहीं हैं । 

मेरे मन में एक सवाल उठ रहा था जो मैंने सर के सामने रखा "सर, यदि कोई मिटटी का बर्तन अथवा उसका कोई हिस्सा जो पहले से ही टूटा हुआ है सफाई करते हुए अगर थोड़ा और टूट भी गया तो क्या हो जायेगा ?" सर ने कहा " भाई पहले की टूट-फूट और अभी की टूट-फूट में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है । किसी भी पॉटरी में  जो टूट-फूट हुई है वह तो हज़ारों साल पहले की है और उससे यह पता लगाना होता है कि वह कब टूटा था किस वज़ह से टूटा था आदि ।  

    लेकिन सफाई करते हुए यदि वह टूटता है तो उससे भ्रम उत्पन्न होता है और उसका कालक्रम निर्धारित करने में कठिनाई होती है ।इसलिए उसके साथ विशेष नोट लगाकर वह टूटा हुआ हिस्सा भी रखना होता है ।"

सर ने हमें सफाई के उपरांत की प्रक्रिया भी समझाई । सर ने बताया कि "सफ़ाई के बाद प्रत्येक अवशेष को एक सफ़ेद कपडे की थैली में सुरक्षित रख दिया जाता है और उस पर एक टैग लगा दिया जाता है जिसमें यह जानकारी होती है कि वह अवशेष किस साईट से, किस तारीख को, किस ट्रेंच से, उत्खनन के किस स्तर पर प्राप्त हुआ है तथा यह उत्खनन किसके मार्गदर्शन में हुआ है आदि आदि । इसके पश्चात उसे राजकीय संरक्षण में भेज दिया जाता है  । यह सब इसलिए ज़रूरी होता है कि जब उनके बारे में लिखा जाए तो उससे सम्बंधित सारे सन्दर्भ एक साथ मिल सकें ।"


*शरद कोकास*

 

Dr. H.V. Trivedi (Dr. Harihar V. Trivedi) was an eminent Indian epigraphist, numismatist, and historian who served as the Deputy Director of Archaeology, Archives, and Museums for the Government of Madhya Pradesh. He is widely celebrated as one of the country's foremost scholars of ancient Indian scripts and history. [1, 2, 3, 4, 5]
Key Contributions and Works
  • Epigraphy: He authored the definitive Epigraphs of Madhya Pradesh and edited volumes of the Corpus Inscriptionum Indicarum (Volume VII), which focused on the inscriptions of the Paramaras, Chandellas, and Kachchhapaghatas. [1, 2]
  • Numismatics: He penned the authoritative Catalogue of the Coins of Naga Kings of Padmavati. [1]
  • Excavations: He directed significant state excavations, including the excavation of an early 8th-century Shiva temple at Indragarh in the Mandasor district and assisted in digs at the Chalcolithic site of Manoti. [1, 2]

शुक्रवार, 29 मई 2026

25-चलो नीली डॉज मे बैठकर घूमने चलते हैं

इस एपिसोड मे पढ़ेंगे आप घुमक्कड़ी का किस्सा 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा- अब तक आपने पढ़ा कि विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययन शाला के स्नातकोत्तर कक्षा के कुछ छात्र दंगवाड़ा नामक स्थान पर उत्खनन हेतु पहुंचे हैं ।शिविर में आये उन्हें ग्यारह दिन हो चुके हैं । इन दिनों में उन्होंने उत्खनन सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करने के अलावा अपने सर डॉ वि श्री वाकणकर और डॉ आर्य से और भी बहुत सारी जानकारी प्राप्त की है । इन छात्रों के रोचक किस्सों के साथ साथ विश्व इतिहास की कुछ प्रमुख घटनाओं के बारे में और मिस्त्र ,यूनान के किस्से तो आप पढ़ ही चुके हैं।इस भाग से शुरू हो रहा है डायरी के भीतर डायरी के शिल्प में एक यात्रा वृतांत जो इन छात्रों के शैक्षणिक टूर से सम्बंधित है । इस यात्रा वृतांत में आपको बहुत रोचक अंदाज़ में भारत के कुछ ऐतिहासिक स्थलों के बारे में जानकारी मिलेगी और आप इन छात्रों के साथ साथ यात्रा का आनंद भी ले सकेंगे ।

 📒📒📒📒📒

*भाग 25* 

25 - डायरी भीतर डायरी , नीली डॉज में सैर  

आज शिविर में हम लोगों का बारहवाँ दिन है । शाम को दंगवाड़ा गाँव से लौटते हुए अँधेरे की तरह ऊब अजय के चेहरे पर पसरी हुई थी । “यार यह सिटी जाना नहीं होता तो अब तक इस जंगल में ऊब गए होते ।“ “ लेकिन हम लोगों का सिटी फ्रेन्ड तो आया ही नहीं इस बार । “ रवीन्द्र ने महेश को याद करते हुए कहा  । “ अच्छा तुम अपने भीलवाड़ा के हीरो महेश चन्द्र शर्मा  की याद कर रहे हो  ? “ अशोक रवींद्र का संकेत समझ गया था  । “ हाँ यार, अपना यह  हीरो तो आया ही नहीं , उसने सर से कहा था कि घर से लौटते ही वह कैम्प में आएगा ..पता नहीं क्या हुआ ..अभी तक आया कैसे नहीं ? “ मुझे भी महेश की चिंता होने लगी थी  । 

“ आ जाएगा यार , वह मस्त मौला है .. वैसे तैने उसके साथ बहुत मस्ती की थी ना पिछले साल अजन्ता एलोरा के टूर में …क्यों ?" रवीन्द्र ने मुझे छेड़ा । "अच्छा तो तुझे सब पता है ।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा  । “ वाह पता कैसे नहीं है ..हमने आँखें बंद थोड़े ही कर रखी थीं ।" रवीन्द्र की आँखों में शरारत थी । " अच्छा ,तैने तो डायरी में भी लिख रखा है ना उस टूर का किस्सा ? “ “ हाँ “ मैंने कहा । “ तो सुना ना यार, तेरी डायरी बड़ी मज़ेदार होती है, वैसे तू डायरी लेकर आया है ना ?

“ रवीन्द्र उस टूर का किस्सा जानने हो बेताब दिखाई दे रहा था  । रवींद्र की बात सुनकर अजय उछल पड़ा " तो सुना ना यार ..अब में तो गया नहीं था तुम लोगों के साथ इस बहाने मैं भी तुम लोगों के साथ यात्रा कर लूँगा । " मैंने अशोक की ओर देखते हुए कहा "अशोक भाई कहेंगे तो ज़रूर सुनाऊंगा ।" अशोक ने कुछ कहा नहीं बस अपने दाहिने हाथ का अंगूठा ऊपर उठा दिया ।" तो बात डन.." मैंने सबकी सहमति पाकर कहा .." आज भोजन के पश्चात यात्रा डायरी का पाठ करेंगे ।"

रात्रि भोजन के पश्चात रजाइयों के बीच हम लोगों की महफ़िल जम गई । तम्बू में सौ वाट का बल्ब जल रहा था जिसकी उपस्थिति हमें अँधेरे में सूरज की तरह लग रही थी । इस उत्खनन कैम्प में प्रकाश व्यवस्था के लिए काफी दूर से बिजली की लाइन खींचकर लाई गई है  और भोजनशाला के अलावा सभी तम्बुओं में एक एक बल्ब की व्यवस्था की गई है  । सभी बल्बों का स्विच एक ही जगह है  और रात्रि का भोजनादि समाप्त हो जाने के बाद ग्यारह बजे के लगभग स्विच ऑफ़ कर दिया जाता है । पिछले दिनों हुई बारिश और ठण्ड के मद्देनज़र हमने सर से अनुरोध किया कि रात में भी बिजली चालू रखें ताकि थोड़ी गर्मी मिलती रहे । रोशनी में नींद न आने जैसी समस्या से बढ़कर आजकल ठण्ड की समस्या है सो उन्होंने हमारा कहना मान लिया । वैसे भी रात में सांप-बिच्छू का अंदेशा रहता है  सो उसके लिए भी पर्याप्त रौशनी का रहना आवश्यक है । रौशनी में नींद न आने जैसी समस्या हम लोगों के साथ नहीं है । वैसे भी दिन भर काम करते हुए हम लोग इतना थक जाते हैं कि अगर बल्ब की जगह सूरज भी जलता रहे तो नींद आ जायेगी ।

रजाइयों में घुसकर सभी के व्यवस्थित हो जाने के उपरान्त मैंने बैग से डायरी निकाली और पन्ने पलटने लगा । इस बीच रवीन्द्र अपनी भूमिका प्रस्तुत करने लगा …” याद है ना होली के दिन गए थे अपन लोग, अरे ..दो दिन तक तो इन लोगों की भंग ही नहीं उतरी थी, ऐसी ऐसी हरकतें की इन लोगों ने कि पूछो मत । हमारी बस में सामने की ओर एक ही दरवाज़ा था और यह लोग भांग के नशे में बार-बार पीछे जाकर दरवाज़ा ढूँढते थे और इंदौर में उस पूड़ी की दुकान की ख़ूबसूरत मालकिन को इम्प्रेस करने के चक्कर में तीन किलो पूड़ी खा गए, आखिर रात में रास्ते में नाले के किनारे बस रुकवानी पड़ी ।“ “चुप रहो यार“ मैंने गुस्से का अभिनय करते हुए कहा "जब देखो तब तुम लोगों को मस्ती सूझती है।"  " ऐसा नहीं है यार " रवीन्द्र ने सफाई दी " मैं तो तेरा बटन स्टार्ट कर रहा था " "ठीक है ठीक है अपने भीतर कोई स्टार्टिंग ट्रबल नहीं है .." मैंने  डायरी के पृष्ठ पलटते हुए  कहा “ अगर तू ही  बता देगा पूरा किस्सा तो मेरे लिए क्या बाक़ी रहेगा ?" " ठीक है भाई तू ही सुना ..अब पढ़ना शुरू भी कर  " रवींद्र ने वाचन के सम्पूर्ण अधिकार मुझे सौंपते हुए कहा ।

मैंने डायरी वाचन से पहले कुछ भूमिका बांधनी चाही  .. " तुम लोगों को याद होगा वह धुलैंडी का दिन था । न रंग का नशा ठीक से उतरा था न भंग का।   उस दिन शाम को हम लोग बस से निकले थे और हमारे साथ हमारे प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति पुरातत्व अध्ययन शाला के एच.ओ.डी.डॉ .कैलाशचन्द्र जैन और इन्दौर से मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग के भूतपूर्व निदेशक डॉ. एच .वी. त्रिवेदी भी थे । “ “ तू किस्सा सुनाता है या नहीं , यह सब तो हमको भी मालूम है । “ अब मुझे कोंचने की बारी रवीन्द्र की थी । “ भाई सुन तो लो" मैंने उसे शांत करते हुए कहा " आखिर भूमिका बताना भी तो ज़रूरी है ना , और यह भी कि यह डायरी मैंने अजन्ता से लौटकर आने के बाद औरंगाबाद की उस टूटी- फूटी धर्म शाला में बैठकर लिखी थी ।“ “हाहाहा “ अजय ज़ोर से हँस दिया …” अबे, टूटी फूटी नहीं जीर्ण - शीर्ण, हिन्दी का लेखक होकर भी ग़लत शब्द का प्रयोग करता है । जैसे हमारे कुछ लेखक लिखते हैं ‘ महिला लेखिकाएँ ‘… बताओ, लेखिका क्या पुरुष भी होते हैं… “  “ ठीक है माई-बाप आइंदा से ध्यान रखूँगा । मैंने उस चुप कराने के उद्देश्य से कहा और डायरी पाठ प्रारम्भ कर दिया ।

26 मार्च, रविवार । प्रस्थान के लिए कल 25 मार्च का दिन तय हो चुका था । हालाँकि कल धुलैंडी थी लेकिन सब को पता था कि दोपहर तक होली के सारे रंग फीके पड़ जाएँगे । महेश और राममिलन जब विश्राम लॉज स्थित मेरे रूम पर पहुँचे चार बज चुके थे और मैं मल्होत्रा के कमरे में उसके आईने के सामने खड़ा शेव कर रहा था । 

मेरे कमरे का आईना पिछले ही दिन  टूट गया था । “क्यों चलना नहीं है क्या ?“ महेश ने कमरे में प्रवेश करते ही मेरी हालत देखकर कहा । मैंने उत्तर में धीरे से उसकी ओर देखा और मुस्कुराते हुए स्लो मोशन में अपनी गर्दन हाँ में हिलाई  । महेश ने मेरी ओर देखा और मुस्कुराकर कहा “ तो लगता है मेरी तरह तुमने भी ठंडाई जम कर ली है आज । “ मैं भी यह सुनकर उसी की तरह मुस्कुराने लगा । हम दोनों का एक दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुराने का यह सिलसिला कुछ देर चलता रहा, फिर महेश राममिलन भैया की ओर मुखातिब हुआ और उनसे कहा... “ राममिलन भैया ,भाईजान को तो तैयार होने में अभी कुछ विलम्ब है ,तुम यहीं रुको, मैं रूम से अभी अपना सामान लेकर आता हूँ । “ इतना कह कर वह लक्ष्मीनगर स्थित अपने रूम के लिए  प्रस्थान कर गया  ।

मैं कुछ ही देर में नहा - धोकर तैयार हो गया । नहाने के बाद काफी ताज़गी सी महसूस हो रही थी । देह और मन दोनों सफ़र के लिए तैयार थे । “क्यों राममिलन भैया, नीचे चले ? “ मैंने राममिलन से पूछा । “और क्या । “ उन्होंने  जवाब दिया ..”बस तो नीचे ही आएगी ना ।“ हम लोग अपने बैग लेकर विश्राम लॉज की सीढ़ियों से नीचे उतरे और उज्जैन के फ्रीगंज इलाके में स्थित शहीद पार्क के एक कोने में चौरसिया के पान ठेले के सामने खड़े रहकर बस की प्रतीक्षा करने लगे ।

अभी गर्मियों की शुरुआत नहीं हुई थी लेकिन हवाओं में वाष्प की कुछ गर्म गर्म सी गंध थी । पेड़ों के साये पार्क से बाहर निकलकर सड़क तक पहुँच चुके थे और आती जाती गाड़ियाँ उन्हें  रौंद रहीं थीं । मैं देखने लगा , गाड़ियाँ गुजर जाने के बाद भी वे साये ज्यों के त्यों दिखाई देते थे और वे उनका बाल बाँका नहीं कर पा रही थीं । इससे पहले कि कोई भाववादी टाइप का विचार मेरे मन में आता, मुझे बाबा नागार्जुन की कविता याद आ गई और मैंने नारे के अन्दाज़ में उसका पाठ करते हुए कहा ... “ जले ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक, बाल न बाँका कर सकी शासन की बन्दूक ।“ 

“ का हो सरदवा ? का हुई गवा ? बड़े खुस हो ?“ राममिलन भैया ने मुझे कविता का सस्वर पाठ करते देखा तो पूछा ।  मैंने उनकी बात के जवाब में उनकी ओर देखकर दो बार आँखें मिचकाईं  और होली की इस ढलती दोपहर में मादक गंध अपने भीतर समाये धीमे धीमे बहती हवाओं की भांति मंद मंद मुस्कुराने लगा । यह बसन्त का मौसम था और विदा लेती हुई धूप मन में पुलक पैदा कर रही थी । हवा के झोंके अजीब तरह से गुदगुदा रहे थे । वहाँ खड़े खड़े हम लोग काफी देर तक विक्रम विश्वविद्यालय के जियालॉजी डिपार्टमेंट की मिनी बस की प्रतीक्षा करते रहे, लेकिन बस थी कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी । रेल की बजाय बस से जाने का उद्देश्य यही था कि अपनी गाड़ी रहने से सुविधा रहेगी और साइट सीइंग का खर्चा भी बच जाएगा । ऐसा हमारे एच. ओ. डी. जैन साहब का विचार था । 

आखिर प्रतीक्षा समाप्त हुई । कुछ ही देर में दूर से नीले रंग की वह ‘ डॉज ‘ आती दिखाई दी । महेश भी इस बीच पहुँच चुका था । उसने हाथ बढ़ाकर गाड़ी रोकी और पीछे से घुसने की कोशिश करने लगा । खिड़की से झाँकते मित्रों ने हँसते हुए कहा … "भैया दरवाज़ा पीछे नहीं सामने है …। ” हमें तो बस महेश का अनुसरण करना था । देखा तो बस में हमारे एच.ओ.डी.डॉ .कैलाशचन्द्र जैन सबसे आगे की सीट पर बैठे थे । हम लोगों ने उन्हें नमस्कार किया । हमारे प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति व पुरातत्व के हॉस्टल में रहने वाले छात्रों ने पहले ही सामने की जगह कैप्चर कर ली थी । हम लोगों के हिस्से में आईं पीछे की सीटें ।

बस ने टावर चौक से बाईं ओर एक टर्न लिया और उज्जैन की सीमा से बाहर निकल कर इंदौर की ओर चल पड़ी । न मैं बहुत खुश था न बहुत उदास लेकिन बसंती हवाओं ने मेरी उदासी कुछ और बढ़ा दी थी । अशोक समझ गया कि मुझे नॉस्टेल्जिया का दौरा पड़ा है ।“ क्या हो गया ? “ उसने पूछा ..” कोई बचपन की मुहब्बत याद आ रही है क्या ? “ मैंने घूरकर उसकी ओर देखा तो वह खिड़की से बाहर झाँकने लगा । ख़ामोशी दिखाई नहीं दे रही थी लेकिन वह मेरे साथ बस की सीट पर आकर बैठ गई थी  । एक मन हुआ कि बैठे बैठे सो जाऊँ लेकिन पंडित राममिलन आज चुटकुले सुनाने के मूड में थे और बार बार मुझे सम्बोधित कर रहे थे .. “चुटकुला सुनो भैया सरद..” अब ऐसे माहौल में कोई कितनी देर उदास रह सकता है । अंतत: मेरा मूड ठीक हो गया, ओढ़ी हुई उदासी का आवरण छिटक कर दूर हो गया और मैं भी सबके साथ कहकहों के समन्दर में गोते लगाने लगा । 

हमारा पहला स्टॉप था इंदौर जहाँ डिनर लेकर हमें तत्काल जलगाँव के लिए  रवाना होना था । शाम सात बजे लगभग हम लोग इंदौर पहुँच गये । बस से नीचे उतरते ही हम लोगों ने महसूस किया कि भूख की तीव्रता के कारण हम लोगों का पेट आंदोलन करने पर आमादा हो गया है । वैसे भी हमारे दिन फ़ाकामस्ती में कट रहे थे और सुबह से कुछ खाया भी नहीं था । अशोक ने अपनी कमीज़ ऊपर उठाई और भीतर घुसा हुआ अपना पेट दिखाकर कहा .. लो, देख लो और चाहो तो कान लगाकर सुन लो  .. भीतर से भी खाना दो, खाना दो की आवाज़ आ रही है या नहीं । 

“ अरे.. कमीज़ नीचे कर ..” रवीन्द्र ने ऑंखें फाड़ते हुए कहा ..” सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील प्रदर्शन करना उचित नहीं है । अशोक ने घबराकर कमीज़ नीचे कर ली और बड़ी मासूमियत से कहा “ पेट ही तो दिखाया था यार ....। ” मैंने अशोक की प्राणरक्षा की .. “ प्यारे .. सब कुछ इस पेट का ही तो चक्कर है, ज़बान भले ही एक बार खामोश हो जाए यह खामोश नहीं रहता , शोषण और उत्पीड़न के ख़िलाफ़ विद्रोह की आवाज़ यहीं से उठती है । इसकी आवाज़ से बड़े बड़े पूंजीपतियों के कलेजे दहल जाते हैं । इसके प्रदर्शन से अच्छे अच्छे घबरा जाते हैं । इसलिए उन लोगों ने भूख के प्रदर्शन को अश्लील और अनैतिक करार दे दिया है । जबकी असली अनैतिकता तो मजदूर की आवाज़ को दबाना है ।“ " बस बस कॉमरेड .. रवीन्द्र ने होंठों पर ऊँगली रखकर चुप रहने का इशारा करते हुए कहा  "भाषण बाद में देना पहले खाने का प्रबंध करो । " 


🔲 *शरद  कोकास* 🔲


◼◼◼◼◼◼◼◼





24 - हत्या के दृश्य की रनिंग कमेंट्री

इसे पढ़कर निश्चित ही आप दहल जाएंगे ,अगर कमज़ोर दिल वाले हों तो ना पढ़ें 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼


पूर्वकथा- रोम के उन गुलामों के जीवन का दुःख हमारे हर दुःख से बड़ा है शायद इसीलिए उनके दुःख के आगे हमारे दुःख छोटे लगते हैं । हाँ हम अपने दुखों को अभिव्यक्त कर सकते हैं लेकिन उन्हें तो अभिव्यक्ति का अधिकार भी नहीं था । इसी संसार में एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के साथ ऐसा बर्ताव कर सकता है ऐसा हम सोच भी नहीं सकते लेकिन इतिहास में इससे भी बुरा घटित हो चुका है यह बात अविश्वसनीय नहीं है । ..चलिए रोम के गुलामों की कथा का यह अंतिम भाग भी पढ़ लीजिये वर्णन थोड़ा वीभत्स है लेकिन इसे सहन तो करना पड़ेगा शायद उस दौर के गुलामों की कथा पढ़कर हम आज के दमित शोषित वर्ग का दुःख जान सकें । अगले भाग से प्रारंभ करेंगे अजंता एलोरा की यात्रा का वृतांत ।

 📒📒📒📒📒

*भाग- चोवीस* 

*24 - हत्या के दृश्य की रनिंग कमेंट्री*  

दोपहर का भोजन संपन्न करने के उपरान्त हम लोग सीधे ट्रेंच पर आ गए । मजदूर अभी खाना खाकर नहीं आये थे और आर्य सर भी नहीं लौटे थे । हम लोग ट्रेंच के पास पसरकर बैठ गए । 

अशोक ने बात शुरू की "प्राचीन रोम के अभिजात्य वर्ग के मनोरंजन हेतु खेले जाने वाले ग्लेडिएटरों के इस ख़ूनी खेल का वर्णन रोमांचक तो है लेकिन इसका किस्सा सुनते हुए बहुत तकलीफ़ होती है ।"  “यार, तू जब इस खेल का  वर्णन कर रहा था तो मुझे लगा जैसे फ्रीगंज चौराहे पर दो दादाओं की लड़ाई का वर्णन सुना रहा हो  ।“ अजय ने कहा  । 

“नहीं ऐसा नहीं है ।“ मैंने कहा “ दादाओं की लड़ाई आपसी दुश्मनी, ज़मीन, धन या स्त्री को लेकर होती है, या अपने वर्चस्व को लेकर और आजकल तो धर्म को लेकर भी होती है लेकिन इन ग्लेडियेटर्स की तो आपस में कोई दुश्मनी नहीं है, ये विवश गुलाम केवल धनाढ्य लोगों के मनोरंजन के लिए एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं । गुंडों में और गुलामों में  बहुत फर्क होता है । हालाँकि आजकल गुण्डे भी आजकल अपने राजनैतिक आकाओं के गुलाम ही होते हैं ।" 

"हाँ चल आगे का हाल सुना ।" अशोक ने कहा " तो हम कहाँ थे ? मैंने अपने अंदाज़ में पूछा ।अजय ने कहा "पहले एक ग्लेडिएटर ने दूसरे को छुरा घोंप दिया फिर प्रत्युत्तर में दूसरे ने उस पर अपने भाले से वार किया ।

" "ओके ।" मैंने लड़ाई का पिछले वर्णन की स्मृतियों को संग्रहित करते हुए कहा  “ देखो, एरिना में लड़ते हुए उन दोनों ग्लेडिएटर में से जिसे अधिक चोट लगी है वह ज़मीन पर गिर गया है ..खून से दोनों के जिस्म तरबतर हैं .. उनकी लड़ाई देखने वाले रोम के ये रईस लोग उन्माद से पागल हो रहे हैं ...मार डालो काट डालो की आवाज़ें गूंज रही हैं .. 

इस शोर - शराबे में भी जाने कहाँ से खून पीकर जीने वाली एक चिड़िया उड़ती हुई आ गई है  और रेत पर गिरी खून की बूँदें चुग रही है । 

अब कुछ देर के लिए दोनों ठहर गए हैं,  शायद अपनी नियति के बारे में सोच रहे हैं । उन्हें पता है कि उन दोनों में से एक को अभी इसी वक़्त मरना है या क्या पता दोनों को ही  । 

"लेकिन दोनों कैसे मरेंगे मरना तो एक को ही होगा ?" अजय ने कहा । अशोक ने जवाब दिया "भाई एक को तो दूसरा अभी मार देगा लेकिन दूसरा इतना ज़ख़्मी है कि वह कभी भी मर सकता है ।" "बिलकुल ठीक ।" मैंने कहा "अब देखो ..उन्हें रुका हुआ देख कर चाबुक लिए एक उस्ताद वहाँ आ गया है और देखो उसने दोनों  की पीठ पर कोड़े बरसाना शुरू कर दिया  ..” लड़ों हरामजादों  रुक क्यों गए  ?” लड़ो,लड़ो,लड़ो,मार डालो ..काट डालो  ..”। लेकिन अगला क्या करे , उसमें तो उठने की ताकत ही नहीं है । उस्ताद अब उस खड़े हुए ग्लेडिएटर को ललकार रहा है .. मार दे इसे ..मार डाल, ख़त्म कर दे । 

वह ग्लेडिएटर ज़मीन पर पड़े ग्लेडिएटर के जिस्म पर खड़ा है, एक पांव उसके दाईं  ओर और दूसरा उसके बाईं ओर । उसकी निगाहें दर्शकों से होते हुए सबसे ऊँची कुर्सी पर बैठे हुए रोम के सम्राट पर जाकर ठहरती हैं । सम्राट एक नज़र  दर्शकों पर डालता है .. सब ओर से आवाजें आ रही हैं .. मारो, मारो, मार डालो .. 

अचानक सम्राट मुस्कुराता है और उसकी ओर से एक फरमान गूंजता है ..वह एक हाथ हवा में उठता है और अंगूठा नीचे की ओर झुका देता है .. यह संकेत है ..हत्या कर दो, मार डालो उसे । खड़ा हुआ ग्लेडियेटर दोनों  हाथों से अपना भाला हवा में ऊँचा उठाता है और ज़मीन पर पड़े हुए दूसरे ग्लेडियेटर के सीने में पूरी ताकत से भोंक देता है ।"

"भयानक उन्माद से भरी चीखें पूरे कोलोसियम में व्याप्त हैं । जनता हत्या के इस दृश्य को देखकर पागल हो गई है, उनका उन्माद चरम पर पहुँच चुका है जैसे वह उस हत्यारे ग्लेडिएटर में अपना रूप देख रही है । 

राजा का एक सिपाही उस मरे हुए गुलाम के पास पहुँचता है, वह उसके सर को हिला कर देखता है, वह गुलाम मर चुका है इस बात की तसल्ली करने के लिए वह अपनी कमर में बन्धा एक भारी हथौड़ा निकालता है और उसे उस ग्लेडियेटर की लाश की कनपटी पर जोर से मारता है  ..उफ़..इस प्रहार से मरे हुए उस गुलाम का सर फट गया है और पीला पीला भेजा निकलकर बाहर आ गया है, प्रहार इतना तेज़ था कि भेजा भी चूर चूर हो गया है और खून में लिथड़े हुए उसके कुछ टुकड़े हथौड़े पर चिपक गए हैं  । 

अब वह सिपाही बाकी अंगों को चूर चूर करने के लिए उन पर भी हथौड़ा चला रहा है,  अब वह सिपाही हथौड़ा उठाकर रोमनों का अभिवादन कर रहा है जैसे उसने बहुत बड़ा काम किया हो । इतने में अखाड़े का एक दूसरा उस्ताद एक गधा लेकर वहाँ आ गया है उसने लाश को एक ज़ंजीर द्वारा उस गधे से बांध  दिया है , चाबुक पड़ते ही वह गधा दौड़ पड़ा है और मैदान के गोल गोल चक्कर लगा रहा है ...पूरे मैदान में उस लाश से भेजे और शरीर के टुकड़े टूट टूट कर गिर रहे हैं । 

रोमन जनता आनन्द विभोर होकर हँस रही है, खिलखिला रही है, उन्माद में तालियाँ बजा रही है, सीटियाँ बजा रही है, नाच रही है । इधर कोलोसियम के कर्मचारियों द्वारा उस खूनी रेत को पलट दिया गया है और उस शेड में अब अगला जोड़ा फिर मौत के इस खूनी खेल के लिए  तैयार है । “

“बस कर ..बस कर यार …“ रवीन्द्र चीखा “बन्द कर तेरी यह रनिंग कमेंट्री ...बहुत हो गया, अब यह बर्दाश्त से बाहर है ।“ ग्लेडियेटर्स की कहानी सुनकर सभी का मन बहुत भारी हो गया था । 

मैं ख़ुद अपने आप को बहुत अपसेट महसूस कर रहा था । जाने कितने प्रश्न मेरे मन में जन्म ले रहे थे .. क्या इस तरह के ख़ूनी खेल अब भी हमारे यहाँ नहीं खेले जाते ? क्या युद्ध और दंगों में इस तरह की वीभत्स हत्याएँ नहीं होतीं ? क्या हमारे देश की जनता को धर्मयुद्धों, क्रुसेड या जिहाद के नाम पर सदियों पहले इस तरह संस्कारित नहीं कर दिया गया है कि वे दुश्मनों का बहता खून देखकर प्रसन्न होते हैं और भूल जाते हैं कि मरने वाला कोई भी हो है तो आखिर मनुष्य ही ? 

रोमन सम्राटों के इस क्रूर खेल के ज़माने से लेकर आज तक भीड़ का यह पागलपन बढ़ता ही तो गया है ? पहले यह हत्याएँ सिर्फ एक खेल के मैदान में होती थीं और अब युद्ध के मैदानों से लेकर गली, मोहल्लों और चौराहों पर होती हैं । आज भी धर्म के नाम पर, विरोध के नाम पर या अपने विचारों से सहमत न होने के कारण किसी को भी मौत के घाट उतार दिया जाता है । 

चलो अब टॉपिक चेंज किया जाए 

दंगवाड़ा की इस पुरातात्विक साईट पर हम लोगों की भूमिका केवल एक छात्र पुरातत्ववेत्ता की तरह ही है  सो हमें इन चिंताओं के अलावा भी ट्रेंच पर अपना रोज़ का खुदाई का काम तो पूरा करना ही था । ऐसी ही मनःस्थिति के साथ हम लोगों ने शेष दिवस का अपना काम पूरा किया कुछ अवशेष और ढूँढ निकाले । खैर दिन का काम निपटाया गया और शाम को फिर सिटी घूमने का प्लान बन गया । 

लौट कर आने के बाद महसूस हुआ कि ठंड बहुत बढ़ गई  है और भोजन के बाद सिवाय बिस्तर में घुसने के और कोई चारा नहीं है । “ यार यह ठंड के दिन भी कितने मज़ेदार होते हैं । 

रवीन्द्र ने अपनी मंकी कैप के भीतर से झाँकते हुए कहा । “ घंट मजेदार होते हैं । “ अजय ने खीझकर कहा ..” घर में रहते तो दिन भर रजाई में घुसे रहते, बीबी के हाथ का गर्मागर्म खाना खाते ..और ... “ 

“चुप रह यार, तेरी बीबी है तो इतरा रहा है, हम कुँवारों पर कुछ तो रहम कर ।“ रवीन्द्र ने कहा  । “ यहाँ तो ठंड में हमारी कुल्फी जमी जा रही है, ऊपर से इस तम्बू में भी छेद भी  हैं, जाने कहाँ से रात में यह आवारा हवा घुस आती है । ऊपर से सुबह जल्दी जागो , वाकणकर सर के आदेश का पालन करते हुए चम्बल में नहाने जाओ ।  अब संस्कार ही कुछ ऐसे है अपन तो अशोक के समान नहाने की टैबलेट खाने से रहे, ठण्ड हो या ओले गिरें नहाना तो पड़ेगा ही  । “

  "फिर भी हम लोगों की ज़िन्दगी उन गुलामों से बेहतर है उन्हें तो जीने की सुविधा ही इसलिए प्रदान की जाती थी कि एक दिन उन्हें एक दिन मार दिया जाये । ग़नीमत है अब यह दास प्रथा समाप्त हो चुकी है ।" रवीन्द्र के दिमाग़ में अब तक वह दृश्य किसी चलचित्र की भांति चल रहा था । 

"हाँ " मैंने कहा । "हम लोग भी अंग्रेज़ों की गुलामी से मुक्त हो चुके हैं ।""लेकिन रोमन सम्राटों की उस गुलामी और इस गुलामी में अंतर है भाई ।" 

अशोक ने मेरा प्रतिवाद किया । "कहाँ अंतर है ?" मैंने कहा "क्या अंग्रेज़ों की गुलामी के समय देश की जनता को नारकीय जीवन भोगना नहीं पड़ा ? क्या उस समय भी वे भारतीय लोगों की ऐसे ही क्रूर तरीके से हत्या नहीं करते थे ?" "सही कह रहे हो ।" 

रवीन्द्र ने कहा " लेकिन उनके जाने के बाद भी जनता की हालत में भी बहुत ज्यादा सुधार नहीं हुआ । लोग तो अब भी भूख और ग़रीबी की वज़ह से मरते हैं ।" 

मैंने कहा " बस इस बात का संतोष है कि अब हम आज़ाद हैं और एक जनतंत्र में रह रहे हैं, दिल बहलाने के लिए यह ख़याल अच्छा है । ठीक है बाक़ी चर्चा कल, अब सब लोग मुँह ढांककर सो जाओ , ठण्ड बहुत तेज़ है वर्ना कल हम सब गुलामों की ठण्ड की वज़ह से मौत घोषित कर दी जाएगी ।"


🔲 *शरद  कोकास* 🔲


◼◼◼◼◼◼◼◼



गुरुवार, 28 मई 2026

23-ये बकरे और मुर्गे नहीं.. इंसान हैं

कौन हैं यह लोग जिनकी जान की कीमत एक जानवर से भी कम  है ,पढ़िए इस एपिसोड में 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

पूर्वकथा-पिछले भाग में आपने पढ़ा रोम के गुलामों के बारे में कि कैसे जब  इन खदानों का पता जैसे ही अखाड़ों के मालिकों को पता चला, वे गुलामों को खरीदने के लिए इन खानों में पहुँचने लगे । ये लोग जैसे ही खानों में पहुँचते नग्न गुलाम इनके सामने प्रस्तुत किये जाते और ये लोग जिस तरह बैल या बकरे खरीदते है उस तरह इन्हें खरीदने वाले इनके शरीर के अंग टटोल टटोल कर इनका सौदा करते और इनकी कीमत लगाते । ज़िबह किये जाने वाले जानवर से भी कभी उसकी मर्ज़ी पूछी नहीं जाती । वैसे भी इन खदानों में इन  गुलामों की ज़िन्दगी साल या ज़्यादा से ज़्यादा दो साल होती थी । खदान के मालिकों को उनके मरने से पहले उनकी कीमत मिल जाती थी । “ इतना कहकर मैं चुप हो गया । मुझे नींद नहीं आ रही थी लेकिन मैं कुछ कहना भी नहीं चाहता था ।

 📒📒📒📒📒

23  भाग तेईस 23 

*ये बकरे और मुर्गे नहीं.. इंसान हैं*  

मैं तम्बू की छत की ओर एकटक देख रहा था जैसे मुझे वहाँ रोम के उन गुलामों के यातना गृह दिखाई दे रहे थे । “ क्या हुआ शरद ? ” रवीन्द्र ने मुझे छत की ओर ताकते देख पूछा । 

    मैंने छत की ओर देखते हुए ही जवाब दिया ... “ देखो रवीन्द्र ..अखाड़ों के दलाल, नूबिया की उस खदान में स्पार्टाकस को और अन्य गुलामों को खरीदने आए हैं । स्पार्टाकस और उसका एक थ्रेशियन साथी चुपचाप उनके सामने खड़े है ..नंग-धड़ंग, दोनों की दाढ़ी बढ़ी हुई है, उनके शरीर पर अनगिनत ज़ख्म हैं जिनमें मवाद पड़ चुका है, देह पर चाबुकों की नीली धारियाँ हैं, शरीर से असहनीय बदबू उठ रही है, शरीर का मल और गन्दगी शरीर पर ही सूखी पपड़ियों के रूप में चिपकी हुई है । 

उनके शरीर से मांस गायब है और चमड़ी में मढ़ी हुई हड्डियाँ दिखाई दे रही हैं , आँखें मानो अपने पपोटों से बाहर आ चुकी हैं , दलाल उनके  निरीह, लटके हुए ,निरर्थक जननांगों को छूकर देख रहे हैं जैसे वे यह तय करना चाहते हों कि रोम के अखाड़ों में इन ग्लेडियेटर्स के नग्न शरीर लड़ते हुए कितनी उत्तेजना उत्पन्न करेंगे  और उनके प्रदर्शन से वे कितना धन कमा सकेंगे  .. । 

इन ग्लेडिएटरों का जीवन बस एक या दो माह का है इतने बस के लिए इन्हें खिला पिलाकर मर जाने के लिए  तैयार किया जाएगा, इन्हें मरता हुआ देख रोम की यह संपन्न अभिजात्यवर्गीय जनता खुश होगी ... । “ रवीन्द्र मुझे थपकियाँ देकर सुलाने की कोशिश करने लगा । उसने सिर्फ इतना कहा कि ..” मुझे भी बाज़ार में बिकते बकरों और मुर्गों को देख कर यही अनुभूति होती है ..। “

  “रवीन्द्र...“ मैं अचानक ज़ोरों से चीखा “ ये बकरे और मुर्गे नहीं हैं.. इंसान हैं .. मेरे - तुम्हारे जैसे इंसान, इनके पास भी वही सब कुछ है जो हमारे पास है ..हमारे जैसा मस्तिष्क और चेतना ..और इनका कत्ल करने के इरादे से इन्हें खरीदने वाले भी इन्हीं के जैसे इंसान है .. इंसान-इंसान में इतना भेद ? क्या इन्हें एक मनुष्य की तरह जीने का हक़ नहीं है ? ” इसके बाद रवीन्द्र ने कुछ नहीं कहा , वह तब तक मुझे थपकियाँ देता रहा ..जब तक मुझे नींद नहीं आ गई ।

सुबह नदी से लौटते हुए अशोक ने कहा “ सॉरी यार, कल बहुत ज़ोरों से नींद आ रही थी, आगे की कहानी सुन नहीं पाया अच्छा यह बता कि फिर स्पार्टकस अखाड़े तक कैसे आया ?" सुबह तक मैं रात की भावनाओं की गिरफ़्त से बाहर निकल चुका था । 

    मैंने कहा “बस, गुलामों का दलाल लेण्टुलस बाटियाटस अन्य गुलामों के साथ उसको भी खदान से खरीद लाया और लड़वाने के लिए तैयार करने लगा । “ अजय ने पूछा "तो उन्हें  ग्लेडियेटर बनने के लिए कोई ट्रेनिंग-वेनिंग दी जाती थी क्या ?” “ हाँ ।” मैंने कहा “ न केवल ट्रेनिंग दी जाती थी बल्कि अच्छी तरह से खिलाया पिलाया भी जाता था, गेहूँ, जौ, माँस और पनीर, और बाटियाटस तो उनके लिए  स्त्रियों का प्रबन्ध भी करता था ।“ “ अरे वा फिर तो ग्लेडियेटर के तो ऐश हो जाते होंगे । “ अजय ने खुश होते हुए कहा ।

“ नहीं ।“ मैंने कहा “उसका यह मानना था कि ग्लेडियेटर के भीतर दम खम पैदा करने के लिए उसे स्त्री का संग ज़रूरी है, तब वह अच्छी तरह खाता है और लड़ता है " "और अच्छी तरह मरता भी है ।“ अशोक ने बीच में  ही मेरी बात लोक कर कहा । “ हाँ सही है" मैंने कहा "मगर यह भी तो देखो कि वह बाटियाटस उन्हें किस तरह स्त्रियाँ परोसता था । यह उसी तरह था जैसे वह उन्हें  खाना और अन्य सुविधायें देता था  । उन्हें  स्वस्थ्य, पुष्ट और अक्षत कुमारी स्त्रियाँ देने से पहले वह ख़ुद उनकी आज़माइश करता था । यह दो हज़ार साल पहले का रोम का समाज था जहाँ स्त्रियों की स्थिति गुलामों से भी बदतर थी और उन्हें  मनुष्य न समझ कर एक जिंस समझा जाता था । जबकि सभ्यता के आरम्भ में ऐसा नहीं था । “

“उसने स्पार्टाकस भी को एक स्त्री दी थी ना ?” रवीन्द्र ने मेरे स्त्री विमर्श के भाषण को बीच में रोककर पूछा । “हाँ “ मैंने कहा “उसका नाम वारीनिया था । बाटियाटस उससे इसलिए चिढ़ता था क्योंकि पहली बार उसे हाथ लगाते ही उसने बाटियाटस को लात घूँसों से पीट डाला था, वह ख़ुद एक गुलाम थी और गुलामों के इस दलाल से घृणा करती थी । बाटियाटस ने उसे सज़ा के तौर पर स्पार्टाकस को सौंप दिया था इसलिए कि उसका मानना था कि वारीनिया को पुरुष की ज़रूरत नहीं है और स्पार्टाकस को स्त्री की  । लेकिन यह उसका भ्रम था, आगे जाकर उन दोनों में प्रेम हुआ और वारीनिया इतिहास में स्पार्टाकस की ऐसी प्रेमिका के रूप में प्रसिद्ध हुई जिसने स्पार्टाकस को रोम की इस क्रूर प्रथा और गुलामी के खिलाफ विद्रोह करने के लिए  प्रेरित किया ।“

“प्रेम इंसान को किन ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है ।“ रवींद्र ने कहा । “ हाँ यह सच है ।" मैंने कहा "प्रेम अपने आप में एक विद्रोह है, यह विद्रोह की मानसिकता को जन्म  देता है, सब कुछ बदल डालने की यह भावना जो अपनी स्थिति को बदलने से प्रारंभ होती है अपने परास में सम्पूर्ण समाज को शामिल कर लेती है । दुनिया में अनेक प्रेम कथाएँ मशहूर हैं जिनमे प्रेमियों ने अपने निज को विस्तार देने के लिए प्रेम किया लेकिन स्पार्टकस और वारीनिया का प्रेम उन हजारों हज़ार गुलामों की मुक्ति के लिए था जिन्हें रोम की राजसत्ता ने पशुओं से भी बदतर स्थिति में पहुँचा दिया था । " 

“ए भाई, ग्लेडियेटर्स की लड़ाई और रोमन सम्राटों के मनोरंजन के बारे में भी तो कुछ बता ।“ अजय ने कहा । इससे पहले कि मैं कुछ बोलता राममिलनवा बोल पड़े.. “ ऊ सब छोड़ो हियाँ हमरा पेट विद्रोह कर रहा है ..तनिक नास्ता वास्ता हुई जाए फिर सुनेंगे तोहार कहानी ।“ भूख तो हम सभी को लग रही थी और इससे पहले कि हम लोग अपने  ट्रेंच रूपी अखाड़े में कूद पड़ें पेट में कुछ डालना ज़रूरी था ..सो हम लोगों ने भोजनशाला की  ओर प्रस्थान किया ।

नाश्ते के बाद हम लोग टीले पर पहुँच गए  ..बहुत बड़ा टीला और बीच में ट्रेंच । अशोक ने कहा  “यह बिलकुल हमारे उज्जैन में जो पहलवानी के अखाड़े हैं उसकी तरह दिखाई दे रहा है, अगर इसमें  मिट्टी डाल दी जाए तो यह कुश्ती के काम आ सकता है ।“ रवीन्द्र के दिमाग़ में अभी तक रोम के एम्फिथियेटर अखाड़े घूम रहे थे । उसने पूछा .” शरद उन अखाड़ों में भी ऐसी ही मिट्टी होती थी क्या ?“ मैंने कहा “नहीं उनमें रेत होती थी क्योंकि सूर्य की रोशनी में रेत पर खून की चमकती हुई बूँदें अद्भुत दृश्य उपस्थित करती थीं जिन्हें  देख कर रोम के अय्याश लोगों को बहुत मज़ा आता था ।“

रवीन्द्र ने कहा “गज़ब का सौन्दर्यबोध था उनका, सच कहूँ तो बहुत विकृत । अच्छा ग्लेडियेटर्स की यह लड़ाई कैसे होती थी ?” मैंने कहा “ चलो तुम्हें  वहाँ का दृश्य दिखाता हूँ । जिस तरह हमारे यहाँ स्टेडियम होता है उस तरह का होता था यह एम्फिथियेटर । बीच में यह अखाड़ा जिसे एरीना कहते हैं । जिस तरह क्रिकेट देखने के लिए स्टेडियम में भीड़ इकठ्ठा होती है उस तरह की भीड़ यहाँ भी उपस्थित है । ठीक वैसा ही उन्माद, शोर, उत्तेजना । 

    साइड की दीवार के पास एक शेड है जहाँ ग्लेडियेटर के जोड़े लड़ने के लिए  प्रतीक्षारत हैं । शेड के दरवाजे से एरीना का दृश्य देखा जा सकता है । मैदान के एक ओर गाने - बजाने वालों का एक समूह बैठा है । जब तक लड़ाई शुरू नहीं हो जाती यह गायन से और वाद्ययंत्रों से लोगों का मनोरंजन करता रहेगा । लड़ने वाले हर जोड़े में एक थ्रेसियन है और एक यहूदी या अफ्रिका का रहने वाला हब्शी । जोड़े के दोनों ग्लेडियेटर आपस मंे घर परिवार की बातें कर रहे हैं , जबकि उन्हें  पता है कि उनमें से एक को थोड़ी देर बाद मर जाना है ।"

"पहला जोड़ा एरीना में दाखिल हुआ है । उन्होंने अपने हाथ व छुरे की मूठ को रेत से रगड़ा ताकि पकड़ मजबूत बनी रहे, अखाड़े के उस्ताद ने खेल के प्रारंभ होने की सूचना देते हुए अपनी चांदी की सीटी बजाई और दोनों ग्लेडियेटर आपस में भिड़ गए । वे लगातार पैंतरा बदलते हुए एक दूसरे पर वार करने की फ़िराक में हैं, लेकिन कोई दूसरे को मौका नहीं दे रहा है । शोर बढ़ता जा रहा है । 

    अचानक एक का छुरा चमका और दूसरे के सीने पर खून की एक लकीर खिंच गई । रोमन दर्शक तालियाँ बजा रहे हैं । फिर दोनों एक दूसरे से गुंथ गए हैं, जैसे उनमें बरसों पुरानी दुश्मनी हो, जैसे वे सचमुच एक दूजे के खून के प्यासे हों । फिर अचानक एक की बाँह में दूसरे का छुरा धँस गया है, रक्त  की एक धार निकली और रेत पर बिखर गई । वह धरती पर गिर पड़ा, फिर लड़खड़ाता हुआ उठ खड़ा हुआ, जनता उसके उठने पर ताली बजा रही है । उठते ही उसने  अपने भाले से पहले  ग्लेडियेटर पर वार किया । उसका चेहरा रक्त में डूब गया है । वह अपनी आँखों में भरा खून साफ़ कर रहा है ।"

"क्यों भाइयों ,आज काम-वाम नहीं शुरू करना है क्या ?" आर्य साहब ने टीले पर पहुँचते ही हम लोगों को बातों में मशगूल देखकर टोका ।"हाँ सर करते हैं न , यह शरद कल की अधूरी स्टोरी को पूरा कर रहा था । अजय ने कहा .. "भाई स्टोरी तो बाद में पूरी कर लेना पहले कल जो इस निखात में काम शुरू किया था उसे तो पूरा करो" आर्य सर ने कहा । इसके बाद हम लोगों ने कुदाल फावड़े उठा लिए और खुदाई के काम में लग गए काम करते हुए बात करना संभव नहीं था इसलिए ग्लेडिएटरों की लड़ाई के आख्यान को दोपहर के भोजन तक स्थगित कर हम लोग ताम्राश्मयुगीन सभ्यता की गुत्थियों से लड़ने में लग गए ।


⚫ *शरद कोकास* ⚫



◼◼◼◼◼◼◼


22 - जननांगों को ढँकने के लिए उनके पास एक चिन्दी तक नहीं थी

कौन थे वे लोग ? और कहाँ से आए थे ? क्यों उनके साथ ऐसा सलूक किया गया ,जानिए इस एपिसोड में 

📘 *एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी* 📘

✍🏼 *शरद कोकास* ✍🏼

2⃣2⃣ *भाग बाईस* 2⃣2⃣

जननांगों को ढँकने के लिए एक चिन्दी तक नहीं

    पूर्व कथा - इससे पूर्व के भागों में आपने पुरातत्व संबंधी विभिन्न बातों के अलावा संसार के विभिन्न देशों में प्रचलित परम्पराओं वहाँ के मिथकों , प्रतिमा विज्ञान , आदि के बारे में पढ़ा अगले तीन भागों में हम पढेंगे रोम के गुलामों की कहानी । यह कथा आपके भीतर के समस्त आवेगों को उद्वेलित कर देगी । यह आपकी संवेदना की परीक्षा भी है ।

 📒📒📒📒📒

  रात्रि भोजन के पश्चात रज़ाई में घुसते ही रवीन्द्र ने  कहा “ यार यह ठंड तो कम होने का नाम ही नहीं ले रही । “ ठण्ड तो मुझे भी लग रही थी लेकिन सुविधा की इस सांसद में मुझे विपक्ष की भूमिका अदा करनी थी  

    “रज़ाई में घुसे हो और ठंड से डर रहे हो .." मैंने आव्हान के अंदाज़ में कहा .." ज़रा रोम के उन गुलामों के बारे में सोचो जिन्हें भीषण ठंड में भी कपडे का एक टुकड़ा तक नसीब नहीं होता था । 

    “यार तू भी ना..." रवींद्र ने नाक चढ़ाते हुए तुरंत मेरी बात पर रिएक्ट किया" मिस्त्र मेसोपोटामिया, रोम, इटली से नीचे बात ही नहीं करता.. अपने इधर नई क्या ऐसा होता है ..बिहार में ही देख लो, रोज खबरें छपती हैं शीत लहर में इतने लोग मरे ।“ 

रवीन्द्र सीधे वार्तालाप का विषय अंतरराष्ट्रीय स्तर से उतारकर राष्ट्रीय स्तर पर ले आया । "भाई ।" मैंने अपनी प्रतिवादी की भूमिका जारी रखते हुए कहा " चलो भारत के बारे में ही बात की जाए । लेकिन तुम भारत जैसे स्वतन्त्र देश के वर्तमान की बात कर रहे हो । । हम इतिहास के विद्यार्थी हैं, एक नज़र उस दौर पर भी डाल लेते हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि वह स्वर्ण युग था । क्या उस समय लोग ठण्ड से नहीं मरते थे ?" 

    रवीन्द्र को इस तरह मेरा उसे वर्तमान से अतीत में ले जाना नागवार गुजरा .."अब क्या पता मरते थे या नहीं, इस बात का कोई प्रमाण भी तो नहीं है ।" "ज़रूर मरते होंगे..अकाल से मरने के तो प्रमाण मिलते ही हैं अब विज्ञान की प्रगति हो रही है हो सकता है आगे चलकर किसी कंकाल के परीक्षण से यह भी ज्ञात हो जाए कि फलां आदमी ठण्ड की वज़ह से मरा था ।"

    अजय ने मेरे पक्ष में अपनी बात रखते हुए कहा .."बिलकुल हो सकता है ग़रीबी तो उस समय भी रही होगी लेकिन स्वर्ण युग में शायद ही कोई मरता हो ।" 

    मुझे अजय की बात का उत्तर तो देना ही था .." स्वर्णयुग जैसी कोई चीज़ सच में हुई है या नहीं किसको पता । वह राजतन्त्र का दौर था, सारे राजा अपनी प्रजा के सुखी होने का दावा करते हुए अपने आप का नाम इतिहास में लिखाए जाने के लिए तत्पर थे । लेकिन वास्तविकता यह है कि ऐसे राजाओं के शासन में भी प्रजा की बहुत बुरी स्थिति थी । इतिहास में यह बात कहीं नहीं लिखी गई । गुलामों की स्थिति तो और भी बदतर थी । आज भी संपन्न देशों में कमोबेश यही स्थिति है ।" 

रवीन्द्र मेरी बात से कुछ कुछ सहमत होता प्रतीत हुआ  .." लेकिन विडम्बना यह है हमारे देश की ग़रीबी के बारे में तो सब जानते हैं, संपन्न देशों की ग़रीबी के बारे में कोई नहीं जानता । अमेरिका को ही देख लो ..क्या वहाँ भिखारी नहीं होते होंगे ? ब्रिटेन में क्या लोग ठण्ड से नहीं मरते होंगे ? और मरते तो साम्यवादी रूस में भी होंगे , लेकिन वहाँ से खबरें यहाँ कहाँ आ पाती हैं ।"

    "खबरें तो अमेरिका से भी नहीं आतीं ।" अशोक ने कहा  .."हमें सिर्फ वहाँ की सम्पन्नता का चित्र ही दिखाया जाता है, जबकि वे लोग जब भी यहाँ टूरिस्ट की तरह आते हैं तो हमारे यहाँ के भिखारियों की ,मदारियों की और साधुओं की फोटो खींचकर ले जाते हैं। हमारे यहाँ की छवि बिगाड़ने का काम इन्ही टूरिस्टों ने किया है ।"

"यार लेकिन इन पर रोक लगाने का कोई तरीका भी तो नहीं है ।" किशोर ने सरकारी अंदाज़ में कहा । 

अशोक जैसे उसकी बात का जवाब देने को तत्पर बैठा था  "मगर रोक लगाने की ज़रूरत भी क्या है ? टूरिस्ट तो आयेंगे ही और आयेंगे तो पुरातात्विक महत्व की इमारतों के साथ साथ यहाँ के जनजीवन की फोटो भी खींचकर ले जायेंगे । उनके पास अत्याधुनिक कैमरे होते हैं । उन पर रोक कैसे लगा सकते हैं ? ऐसा कोई कानून नहीं है । फिर अपने साथ वे विदेशी मुद्रा लेकर आते हैं और सरकार को उनके आने से आमदनी भी होती है । कश्मीर जैसी जगह में तो वहाँ के निवासियों का गुज़ारा ही इन टूरिस्टों की वज़ह से होता है । पर्यटन उद्योग को तो बढ़ावा मिलना ही चाहिए ।"

"अच्छा तुम रोम के गुलामों की बात कर रहे थे  ना जिन्होंने स्पार्टकस के नेतृत्व में विद्रोह किया था ? ” अजय हमारे पर्यटन मंत्रालय टाइप की बातचीत से बोर हो रहा था । 

    “ हाँ ।“  मैंने कहा । 

    अशोक बोला “ तो यार उसकी पूरी कहानी बताओ ना .. एक्चुअल में हुआ क्या था ? तुम तो बिना कैमरे के ही द्रश्य की फोटो खींचकर रख देते हो ।“ 

    “हाँ, यह हुई ना बात ।“ अपनी तारीफ़ से प्रसन्न होकर मैंने कहा .."लेकिन कहानी ज़रा लम्बी है ।" 

    "कोई बात नहीं ..जब तेरी इतनी लम्बी लम्बी कहानियाँ सुन ली तो यह भी सुन लेंगे । तेरी कहानी लम्बी ज़रूर होती है लेकिन उबाऊ नहीं । " अशोक ने किसी आलोचक के अंदाज़ में कहा। 

    किस्सा सुनाने को तो मैं आतुर था ही । मैंने रजाई के भीतर अपनी पोज़ीशन सम्भाल ली थी और किस्सागोई के मूड में आ गया था ।

“ यह आज से दो हज़ार साल पहले सन इकहत्तर ईसापूर्व से भी पहले की बात है । रोम उन दिनों अपने उत्कर्ष पर था । बड़े बड़े धनाढ्य  लोग, सम्पन्न लोग, सत्ता के सुख के साथ जीवन का सुख भोग रहे थे । ढेर सारे मनोरंजन के साधन थे, खेलकूद थे,  हम्माम थे, अय्याशी के लिए औरतें थीं और उनकी सेवा के लिए  हज़ारों गुलाम थे । मनोरंजन के लिए वहाँ के अखाड़ों में कुश्ती तो सामान्य बात थी लेकिन उन दिनों अचानक कुछ ऐसा हुआ था कि सब इस खेल के दीवाने हो गए थे । 

कई अखाड़ों का निर्माण किया गया । इन अखाड़ों को एम्फिथियेटर कहा जाता था और इनमें ग्लेडियेटर्स को आपस में या खूंख्वार जंगली जानवरों जैसे शेर आदि से लड़ाया जाता था । इन अखाडों के मालिकों ने खदानों में काम करने वाले गुलामों को खरीद लिया था और उन्हें  प्रशिक्षण देकर ग्लेडियेटर बना दिया था ।"                

“ लेकिन इतने सारे गुलाम आते कहाँ से थे ?” राममिलन भैया का यह स्वाभाविक प्रश्न था । 

“ बिलकुल सही पूछा राममिलन भैया ।“ मैंने कहा “प्राचीन मिस्त्र में थीव्ज़ के पास नूबियन रेगिस्तान है वहीं रेत के बीच सोना उगलने वाली कई खदानें हैं । प्रारंभ में यह सारे मिस्त्र के फराओं के गुलाम थे और सोने की खदानों में काम करते थे । जहाँ इन गुलामों की कई पीढ़ियाँ गुजर चुकी थीं । फराओं के पास यह गुलाम इस तरह आये कि शुरूआत में जब युद्ध होते थे वे सिपाही गुलाम बना लिए जाते थे  जो लड़ाई में मारे जाने से बच जाते थे । यह युद्धबंदी गुलाम तीन पीढ़ियों बाद कोरू कहलाये । मिस्त्र के फराओं का वैभव समाप्त हो जाने के बाद इन खदानों को रोम के धनाढ्य व्यापारियों ने खरीद लिया ।"

"ये खदानें दरअसल नर्क से भी बदतर थीं । आओ मैं तुम्हें वहाँ का एक दृश्य दिखलाता हूँ . ..कल्पना करो ..  देखो.. वह देखो.. सौ से भी अधिक गुलाम एक कतार में चल रहे हैं .. एकदम नंगे.. गर्म रेत में घिसटते हुए पाँव लेकर ... उनकी गर्दन में एक पट्टा है जो काँसे का है और जो अगले गुलाम की गर्दन में बन्धे पट्टे के साथ एक ज़ंजीर से बन्धा हुआ है । बार बार उस पट्टे के गर्दन में टकराने की वज़ह से उसकी गर्दन में घाव हो गए  है और उनसे खून बह रहा है । अँधेरा गहराता जा रहा है और यह गुलाम दिन भर का काम ख़त्म करके अपनी बैरकों में लौट रहे हैं । एक बार भीतर घुस जाने के बाद उन्हें  बाहर आने की इज़ाज़त नहीं है । वे केवल मरकर ही बाहर आ सकते हैं । 

"उफ़ ..क्या बेबसी है " रवींद्र ने कहा । मेरी आँखें तम्बू की छत की और देख रही थीं और मुझे वहाँ उन बैरकों का दृश्य दिखाई दे रहा था .."वे बैरकों की फर्श पर ही गन्दगी कर रहे है वहीं कहीं पहले का मल पड़ा हुआ है जो सड़कर सूख गया है । अभी थोड़ी देर में उन्हें  खाना दिया जाएगा ..गेहूँ और टिड्डी का शोरबा और एक मशक में एक सेर पानी जो उनकी भूख और प्यास के हिसाब से नाकाफी है .. उनका पानी ख़त्म हो चुका है ..वे और पानी मांग रहे हैं लेकिन उन्हें पानी नहीं दिया जा रहा है ।"

"लेकिन पानी क्यों नहीं ?" अजय ने पूछा "खाना भले ही कम दें लेकिन पानी तो मिलना चाहिए !" 

"अरे मूरख " अशोक ने कहा " वह रेगिस्तान है ,वहाँ पानी तो भोजन से भी अधिक मूल्यवान है ।" 

"ठीक कह रहे हो तुम" मैंने कहा "जब पानी की कमी से उनका गुर्दा खराब हो जाएगा और वे श्रम करने लायक नहीं रहेंगे उन्हें बैरक से बाहर कर दिया जाएगा और रेगिस्तान में मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा । इन बैरकों में सड़ान्ध है, घुटन है, इतनी बदबू है कि खाया पिया सब बाहर आ जाए  ..लेकिन गुलाम इसे जज़्ब कर लेते है वे उल्टी आने के बावज़ूद भी उल्टी नहीं करते क्योंकि वे जानते हैं कि एक बार उल्टी कर देने के बाद उनका पेट ख़ाली हो जाएगा और फिर उन्हें दिन भर भूखे रहना पड़ेगा । खाना भी सिर्फ इतना ही मिलेगा कि ज़िन्दा रहा जा सके । वे यह सोचते हुए कि  ज़िन्दा क्यों है, यह सर्द अन्धेरी रात काट देंगे ...।"                             

मैंने एक नज़र अपने मित्रों के चेहरे पर डाली । मुझे कहीं भी उनके चेहरों पर जुगुप्सा का भाव नहीं दिखाई दिया । उनके चेहरे देखकर मुझे संतोष  हुआ और इस बात का अहसास हुआ कि किस तरह एक मनुष्य के दुःख की गाथा सुनकर दूसरा मनुष्य उस दुःख को महसूस कर सकता है । यह संवेदनशीलता ही उसे मनुष्य बनाती है । 


मैंने रोम के गुलामों के इस दुःख की गाथा को शब्द देने शुरू किये   "देखो अब नगाड़े बजने लगे हैं, यह उनके लिए अलार्म है..अब सबको ज़ंजीरों में बान्धकर खदानों की ओर ले जाया जाएगा । वे अपना प्याला और कटोरा साथ रखकर घिसटते कदमों से चल पड़े हैं ...ठंड से काँपते हुए अपने नंगे बदन को हाथों से ढाँपने की कोशिश करते हुए वे अपनी जानवरों से भी बदतर ज़िन्दगी के बारे में सोच रहे हैं । खदान तक पहुँचकर  वे उन चट्टानों पर कुदाल और हथौडे चलायेंगे जो उनके मालिकों को सोना देती हैं । 

"उफ़ , कितना कठिन है यह सुनना ।" अजय ने अपने कानों पर हाथ रखते हुए कहा  

    "हाँ । " मैंने कहा " गुलामों की जीवन गाथा सुनना कठिन तो है । सारे गुलाम पसीने से तरबतर हैं  महीनों से उन्हें नहाना नसीब नहीं हुआ है , अब वे चार घंटे बिना रुके काम करेंगे, जिसका हाथ क्षण भर के लिए भी रुकेगा उसे कोड़ों से पीटा जाएगा .. इस तरह  चार घंटे लगातार काम करने के बाद तक उनके शरीर का पानी पसीना बनकर निकल चुका होगा, फिर उन्हें  ज़िन्दा रहने लायक थोड़ा सा खाना और पानी दिया जाएगा, जो जल्दी में गट गट पानी पीने की गलती करेगा पछतायेगा क्योंकि पेशाब बनकर पानी निकल जाने के बाद काम खत्म होने तक दोबारा नहीं मिलेगा ..

    लेकिन इस प्यास का क्या करें ..कैसी मजबूरी है यह .. पानी पियें  तो भी मौत नहीं पियें तो भी मौत ...। जो युवा हैं वे तो सह लेंगे लेकिन बच्चों का क्या ..देखो अभी अभी सोलह साल के उस थके हारे बालक ने भूख-प्यास, ठंड और गर्मी के इस उतार-चढ़ाव से लड़ते हुए स्पार्टकस की गोद में दम तोड़ दिया  है । स्पार्टकस रोते हुए उसकी लाश को बेतहाशा चूम रहा है । ” 

"बस कर यार “ किशोर के चीखने से मैं होश में आया । “क्या सुना रहा है तू ... पूरी रात बरबाद कर दी..ऐसा भी होता है कभी ..इतना अत्याचार ..“ किशोर ने गांजे की सिगरेट जला ली थी और मेरी तरफ बढ़ाते हुए कह रहा था .."ले एक सुट्टा लगा ले और वापस इस दुनिया में आजा .. बाकी कहानी कल सुनेंगे ।" 

    मैंने कहा  “ रेन दे यार अपन तो वेसेई टनाटन्न रेते हें....।

मेरी ख़ामोशी के पर्दे पर अभी भी उन निरीह गुलामों के चित्र उभर रहे थे । मैं काफी देर तक चुपचाप बैठा उन मनुष्यों के बारे में सोचता रहा । किशोर, अशोक, अजय सब नींद  के आगोश में जा चुके थे । मैं जाग रहा था और एकटक तम्बू की छत की ओर देख रहा था । मेरे साथ जाग रहा था मेरा अंतरंग मित्र रवीन्द्र जो मेरी मनस्थिति समझने की कोशिश में था । 

    “यार रवीन्द्र, तूने पढ़ी है हावर्ड फास्ट की “ आदिविद्रोही ” ? अचानक मैंने रवीन्द्र से पूछा । रवीन्द्र ने कहा “ पढ़ी तो नहीं है लेकिन सुना जरूर है कि उसमें स्पार्टाकस के विद्रोह की कथा है ।“ मैंने कहा “ मैंने तो जिस दिन से पढ़ी है मेरी नींद ही उड़ गई है । कैसे एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के प्रति इतना क्रूर भी हो सकता है, अपने मनोरंजन के लिए  एक इंसान की दूसरे इंसान द्वारा हत्या करवाना ?"

रवीन्द्र जानता था जब तक मेरे  भीतर की वेदना बाहर नहीं निकलेगी मुझे नींद नहीं आएगी । उसने पूछा “फिर उस सोने की खान के गुलामों के बीच से स्पार्टाकस बाहर कैसे आया और ग्लेडिएटर कैसे बना ? “  मुझे लगा उसकी आवाज़ कहीं दूर से आ रही है । हम मनुष्य इसीलिए कहलाते हैं कि हमें अपने आप को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता प्राप्त है । लेकिन ऐसा क्यों होता है कि कई बार अपनी वेदना अभिव्यक्त करने से ज़्यादा छटपटाहट दूसरे की वेदना व्यक्त करते हुए  होती है  । 

    शायद इसीलिए कि अपने दुख दूसरों के दुख की तुलना में गौण हो जाते हैं ? कभी कभी दूसरों के दुःख देखो तो लगता है अपने दुःख सिर्फ ओढ़े हुए दुःख हैं । आज मुझे लग रहा था कि स्पार्टाकस कहीं मेरे भीतर जीवित हो गया है और अपने दर्द को प्रकट करने के लिए  छटपटा रहा है ।

मैंने कहना शुरू किया “ इन खदानों का पता जैसे ही अखाड़ों के मालिकों को पता चला, वे गुलामों को खरीदने के लिए इन खानों में पहुँचने लगे । ये लोग जैसे ही खानों में पहुँचते नग्न गुलाम इनके सामने प्रस्तुत किये जाते और ये लोग जिस तरह बैल या बकरे खरीदते है उस तरह इन्हें खरीदने वाले इनके शरीर के अंग टटोल टटोल कर इनका सौदा करते और इनकी कीमत लगाते । “ 

“ लेकिन ये गुलाम इस तरह बिकने के लिए  तैयार हो जाते थे ?" रवीन्द्र ने पूछा । “ तैयार..? “ मैंने कहा “ ज़िबह किये जाने वाले जानवर से भी कभी उसकी मर्ज़ी पूछी जाती है क्या । वैसे भी इन खदानों में इन  गुलामों की ज़िन्दगी साल या ज़्यादा से ज़्यादा दो साल होती थी । खदान के मालिकों को उनके मरने से पहले उनकी कीमत मिल जाती थी । “ इतना कहकर मैं चुप हो गया । मुझे नींद नहीं आ रही थी लेकिन मैं कुछ कहना भी नहीं चाहता था । 


शरद कोकास 


◼◼◼◼◼◼◼